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Double Game (Completed)

Story Hindi 84 pages 6 months ago

Chapter - 01
[ Plan & Murder ]
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Update - 01
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हीन भावना कभी कभी ऐसा भी रूप ले लेती है जिसका अंजाम ख़तरनाक भी हो सकता है। हम जैसा सोचते हैं या जैसा चाहते हैं वैसा होता ही नहीं है। दुनियां में दुःख का एक कारण ये भी है। हम चाहते हैं कि हमारे पास जो चीज़ हो वो सबसे ख़ास हो और वैसी चीज़ किसी और के पास हर्गिज़ न हो लेकिन ऐसा होता नहीं है। इंसान के जीवन में ऐसी बहुत सी चीज़ें होती हैं जिनके बारे में हमारे ख़याल कुछ ऐसे ही होते हैं लेकिन ऐसी चीज़ों पर हमारा कोई ज़ोर नहीं होता।

एक इंसान वो होता है जो वक़्त के साथ चीज़ों से समझौता कर लेता है और ख़ुद को झूठी ही सही लेकिन तसल्ली दे लेता है, लेकिन एक इंसान वो भी होता है जो किसी भी चीज़ से समझौता नहीं करना चाहता, बल्कि वो हर हाल में यही चाहता है कि उसकी हर चीज़ ख़ास ही हो और वैसी चीज़ किसी और के पास हर्गिज़ न हो। ऐसा इंसान इसके लिए हर वो कोशिश करता है जो कदाचित उसके बस से भी बाहर होता है।

किसी को भी अपने जीवन में सब कुछ नहीं मिल जाया करता। ये बात कहने के लिए तो बहुत ही ख़ूबसूरत है लेकिन असल ज़िन्दगी में इसकी ख़ूबसूरती का पता नहीं चलता या कहें कि इसकी खू़बसूरती दिखती ही नहीं है। मैं जानता हूं कि मैंने जो कुछ करने का मंसूबा बनाया है वो किसी भी तरह से सही नहीं है लेकिन ये भी सच है कि ऐसा करना मेरी मज़बूरी बन गई है। मज़बूरी इस लिए क्योंकि मैं वो इंसान हूं जिसे अपनी हर चीज़ ख़ास की सूरत में चाहिए। जिसकी किसी भी चीज़ को देख कर कोई ये न कह सके कि यार ये तो बहुत ही भद्दी है या ये तुम पर शूट नहीं करती है।

मैंने बहुत सोच समझ कर ये फैसला किया है कि मैं अपने पास मौजूद ऐसी उस एक मात्र चीज़ को अपने से दूर कर दूंगा, जिसकी वजह से मुझे लगता है कि उसके रहने से मुझे हमेशा अटपटा सा महसूस होता है और मैं ये तक सोच लेता हूं कि उसकी वजह से मेरी ज़िन्दगी में कोई रौनक ही नहीं है।

मैं अक्सर सोचता था कि जब मेरे पास मौजूद हर चीज़ बेहतर है तो एक वो चीज़ बेहतर क्यों नहीं है? अपने नसीब पर मेरा कोई ज़ोर नहीं था वरना क्या ऐसा हो पाता? हर्गिज़ नहीं, मैं दुनियां को आग लगा देता लेकिन ऐसा होने नहीं देता किन्तु मेरा नसीब और मेरी नियति मुझसे कहीं ज़्यादा प्रबल थे। नसीब या नियति ने भले ही मेरे साथ ऐसा मज़ाक किया था लेकिन मेरे बस में अब ये तो था कि उस मज़ाक बनाने वाली चीज़ को अपने से हमेशा के लिए दूर कर दूं। मैं जानता हूं कि ऐसा करना किसी भी तरह से सही नहीं है, बल्कि अपराध है लेकिन क्या करूं...मैं वो इंसान हूं जिसे अपनी हर चीज़ ख़ास वाली सूरत में ही चाहिए।

पिछले चार साल से मैं उस चीज़ को अपने जीवन में एक बोझ सा बनाए शामिल किए हुए हूं लेकिन अब और नहीं। अब और मैं उस चीज़ को अपनी आँखों के सामने नहीं देखना चाहता।

दुनियां की नज़र में भले ही उस चीज़ में कोई कमी न हो या उसमें कोई खोट न हो लेकिन मेरी नज़र में उसमें खोट के अलावा कुछ है ही नहीं।

मैं अक्सर सोचा करता हूं कि उसके माँ बाप ने आख़िर क्या सोच कर उसका नाम रूपा रखा रहा होगा? आख़िर रूप जैसी उसमें कौन सी बात थी जिसकी वजह से उसका नाम उसके माँ बाप ने रूपा रखा था? सच तो ये है कि उसका नाम रूपा नहीं बल्कि कुरूपा रखना चाहिए था जो कि उसके रंग रूप पर एकदम से फिट बैठता।

करूपा, ओह सॉरी..आई मीन रूपा, जी हां रूपा। मेरी बीवी का नाम रूपा है लेकिन जैसा कि मैंने बताया रूप जैसी उसमें कहीं पर भी कोई बात नहीं है। मुझे बनाने वाले से सिर्फ एक ही शिकायत रही है कि उसने ऐसे कुरूप प्राणी को मेरी बीवी क्यों बना दिया था? शादी के बाद जब पहली बार मैंने उसे देखा था तो मेरा मन किया था कि या तो मैं खुद को ही जान से मार दूं या फिर उसका गला घोंट कर उसे इस संसार सागर से विदा कर दूं लेकिन मैं चाह कर भी ऐसा न कर सका था।

आप समझ सकते हैं कि मेरे जैसे इंसान ने ऐसे कुरूप प्राणी को अपनी ज़िन्दगी में जोड़ कर चार साल कैसे बिताए होंगे? चार सालों में ऐसा कोई दिन या ऐसा कोई पल नहीं गुज़रा जब मैंने अपनी किस्मत को कोसा न हो और उस कुरूप प्राणी के मर जाने की दुआ न की हो।

मेरी बीवी से मेरे सम्बन्ध कभी भी अच्छे नहीं रहे और इसका सबूत ये था कि मैंने सुहागरात वाली रात से ले कर आज तक उसके जिस्म की तरफ देखा तक नहीं था उसे छूने की तो बात ही दूर है। सुहागरात में उसकी कुरूपता को देखते ही मुझे उससे बे-इन्तहां नफ़रत सी हो गई थी। उसके बाद मैंने उससे कभी कोई मतलब नहीं रखा।

मेरी तरह गांव देहात की ही लड़की थी वो और मेरे माता पिता ने उसे सिर्फ इस बात पर मेरे लिए पसंद कर लिया था कि उसका बाप दहेज़ में दो लाख रुपया, एक मोटर साइकिल, ढेर सारा फर्नीचर और दो बीघे का खेत देने को तैयार था। मुझे नहीं पता था कि मेरे माता पिता इस सबके लालच में मेरी इस तरह से ज़िन्दगी बर्बाद कर देंगे, अगर मुझे ज़रा सी भी इस बात की कहीं से भनक लग जाती तो मैं खुद ख़ुशी कर लेने में ज़रा भी देरी न करता। ख़ैर, अब भला क्या हो सकता था? कुछ तो पिता जी का आदर सम्मान और कुछ उनके ख़ौफ की वजह से मैं उस औरत को छोड़ देने का इरादा नहीं बना सका था, लेकिन इतना ज़रूर सोच लिया था कि पिता जी चाहे मुझे अपनी हर चीज़ से बेदखल कर दें लेकिन मैं उस औरत के पास कभी नहीं जाऊंगा जिसे मैं देखना भी पसंद नहीं करता।

मैंने एमएससी तक की पढ़ाई की थी इस लिए मैंने पूरी कोशिश की थी कि इस झमेले से बचने के लिए दूर किसी शहर में रह कर नौकरी करूं और मैं अपनी इस कोशिश में कामयाब भी हो गया था। मैंने शहर में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी शुरू कर दी थी और वहीं रहने लगा था।

शहर में रहते हुए न तो मैं कभी घर वालों को फ़ोन करता था और ना ही घर जाने का सोचता था। शादी के दो साल तक तो मैं घर गया भी नहीं था लेकिन फिर एक दिन पिता जी किसी के साथ शहर में मेरे पास आ धमके और मुझे खूब खरी खोटी सुनाई। जिसका नतीजा ये निकला कि मुझे घर जाना ही पड़ा। घर गया भी तो मैंने उस औरत की तरफ देखना ज़रूरी नहीं समझा जिसे ज़बरदस्ती मेरे गले से बाँध दिया गया था। वैसे एक बात बड़ी आश्चर्यजनक थी कि वो औरत ख़ुद भी मुझसे कभी बात करने की कोशिश नहीं करती थी और ना ही किसी बात की वो मुझसे शिकायत करती थी। जैसे वो अच्छी तरह समझती थी कि मैं उसे पसंद नहीं करता हूं और उससे कोई मतलब नहीं रखना चाहता हूं। उसने जैसे खुद को इस बात के लिए अच्छी तरह समझा लिया था कि अब जो उसके जीवन में लिखा होगा वो हर तरह से उसे स्वीकार है। हालांकि मैंने उसे समझने की कभी कोशिश भी नहीं की और ना ही मैंने ये सोचा कि वो क्या सोचती होगी अपने इस जीवन के बारे में लेकिन मेरे लिए अच्छी बात ये थी कि उसकी तरफ से मैं एक आज़ाद पंक्षी की तरह था।

मेरे माता पिता ने बहुत कोशिश की थी कि मैं उस औरत से सम्बन्ध रखूं लेकिन इस मामले में मैंने उनसे साफ़ कह दिया था कि वो औरत सिर्फ उनकी बहू है ना कि मेरी बीवी। यानी जिस औरत को मैं अपना कुछ समझता ही नहीं हूं उससे किसी तरह का समबन्ध रखने का सवाल ही नहीं पैदा होता। पिता जी ने मुझे हर तरह की धमकी दी और हर तरह से समझाने की भी कोशिश की लेकिन मैं इस मामले में जैसे पत्थर की लकीर था।

चार साल ऐसे ही गुज़र ग‌ए। मैं शहर में नौकरी करता और अपने में ही खोया रहता। अब तक मेरे माता पिता को भी समझ आ गया था कि उन्होंने धन के लालच में अपने बेटे के साथ कितना बड़ा गुनाह कर दिया था लेकिन अब पछताने से भला क्या हो सकता था? वैसे मैं खुद भी कभी कभी सोचता था कि चलो छोड़ो अब जो हो गया सो हो गया और मुझे अपने भाग्य से समझौता कर के उस औरत के साथ जीवन में आगे बढ़ना चाहिए लेकिन मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाता था। हर बार मेरी सोच इस बात पर आ कर ठहर जाती कि आख़िर क्यों? जब मेरी हर चीज़ ख़ास है तो वो औरत ख़ास क्यों नहीं हुई? ऊपर वाले ने मेरे जीवन में एक ऐसी चीज़ को क्यों शामिल कर दिया जिसकी वजह से मेरी बाकी की सारी ख़ास चीज़ें भी फीकी पड़ गईं हैं? मैं अपनी ज़िन्दगी की इस ट्रेजडी को हजम ही नहीं कर पा रहा था और फिर गुज़रते वक़्त के साथ जैसे ये बात मेरे दिलो दिमाग़ पर बैठती ही चली गई थी।

रूपा के मायके वाले भी इस सबसे बेहद परेशान और दुखी थे। उन्हें भी इस बात का एहसास हो चुका था कि उन्होंने धन का लालच दे कर जो कुछ किया था वो सही नहीं था और इसके लिए वो कई बार मुझसे माफियां भी मांग चुके थे लेकिन मेरी डिक्शनरी में माफ़ी वाला शब्द जैसे था ही नहीं।

मैंने उनसे साफ़ कह दिया था कि उन्हें अगर अपनी बेटी के भविष्य की इतनी ही फ़िक्र है तो वो उसे वापस ले जाएं और किसी और से उसकी शादी कर दें। शुरू शुरू में उन्हें मेरी ये बातें फ़िज़ूल टाइप लगती थीं। उन्हें लगता था कि अभी मैं इस सबसे नाराज़ हूं इस लिए ऐसा बोल रहा हूं लेकिन गुज़रते वक़्त के साथ मेरी सोच और मेरे ख़यालात बदल जाएंगे। वो तो उन्हें बाद में एहसास हुआ कि मेरी सोच और मेरे ख़यालात इस जीवन में कभी बदलने वाले नहीं हैं और इस चक्कर में उनकी बेटी का जीवन बर्बाद ही हो गया है। अब वो अपनी बेटी की शादी किसी और से करना भी चाहते तो कोई नहीं करता, फिर चाहे भले ही वो किसी को धन का कितना भी लालच देते। बेटी अगर सुन्दर होती तो इस बारे में सोचा भी जा सकता था लेकिन ब्राह्मण समाज की लड़की अगर एक बार ससुराल में इतने साल रह जाए तो ऐसी सिचुएशन में फिर उससे कोई शादी नहीं कर सकता। मेरे गांव तरफ तो ऐसा चलन है कि शादी होने के बाद लड़की अगर चार दिन ससुराल में रह जाए और अगर इस बीच वो विधवा हो जाए तो फिर उसे सारी ज़िन्दगी ससुराल में ही रहना पड़ता है। ब्राह्मण समाज का ये नियम कानून बाकी जाति वालों से बहुत शख़्त है।

कुदरत के खेल बड़े निराले होते हैं। वो कब क्या कर डाले अथवा वो क्या करने वाली होती है इसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। मेरे इस रवैये की वजह से जब चार साल ऐसे ही गुज़र गए तो मेरे माता पिता को इन सब बातों ने इतना ज़्यादा चिंतित वो दुखी कर दिया कि वो बीमार पड़ ग‌ए। धीरे धीरे उनकी तबीयत और भी बिगड़ती गई। मुझे पता चला तो मैंने उनके इलाज़ में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन उनकी सेहत में कोई सुधार न हुआ। उनकी बहू अपनी क्षमता से ज़्यादा उनकी सेवा करती थी और इस बात को मैं बेझिझक स्वीकार भी करता हूं। चार साल हो गए थे और मैं अक्सर ये सोच कर हैरान हो जाता था कि ये किस मिट्टी की बनी है कि मेरी इतनी बेरुखी के बाद भी वो पूरे मन से अपने सास ससुर की सेवा करती रहती है। मैं जब भी घर जाता था तो मैंने ऐसा कभी नहीं सुना था कि उसने किसी चीज़ के लिए मना किया हो या उसने किसी बात पर उनसे सवाल जवाब किया हो। चाभी से चलने वाली किसी कठपुतली की तरह थी वो। जिस तरफ और जिस तरीके से उसे घुमा दो वो उसी तरफ और उसी तरीके से घूम जाती थी। उसमें और चाभी से चलने वाले खिलौने में सिर्फ इतना ही फ़र्क था कि चाभी से चलने वाला खिलौना चलने से आवाज़ करने लगता है जबकि वो एकदम ख़ामोशी से चलती रहती थी। ऐसा लगता था जैसे वो गूंगी हो। वैसे चार साल तक मैं भी उसे गूंगी ही समझा था।

मेरे बहुत इलाज़ करवाने के बावजूद मेरे माता पिता की सेहत पर सुधार न हुआ था और फिर एक दिन उनका अंत समय आ गया।

अपने आख़िरी समय में उन दोनों ने मुझसे बस एक ही बात कही थी कि उनके जाने के बाद अब उनकी बहू का कोई सहारा नहीं होगा इस लिए अगर मेरे दिल में ज़रा सा भी उसके प्रति रहम या दया है तो मैं उसे अपना लूं और जहां भी रहूं उसे अपने साथ ही रखूं।

मैंने देखा था कि मेरे माता पिता के अंतिम समय में वो औरत ऐसे रो रही थी कि यकीनन उसके करुण क्रंदन से आसमान का कलेजा भी छलनी हो गया रहा होगा। माता पिता के गुज़र जाने के बाद मैंने विधि पूर्वक उनकी अंतिम क्रियाएं की और फिर शहर की तरफ रुख किया किन्तु इस बार वो औरत भी मेरे साथ थी। समय बदल गया था, नियति ने जैसे मुझे बेबस सा कर दिया था। हालांकि जब मैंने इस सबके बाद पहली बार उससे शहर चलने को कहा था तो उसने साफ़ शब्दों में कह दिया था कि उसे मेरे सहारे की ज़रूरत नहीं है। उसमें अभी इतना साहस और इतनी क्षमता है कि इतने बड़े घर में वो अपने जीवन का बाकी समय गुज़ार सकती है।

मुझे उस औरत की भावनाओं से कोई मतलब नहीं था, बल्कि मैं तो बस अपने माता पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करना चाहता था और ये भी कि कोई ये न कहे कि सास ससुर के गुज़र जाने के बाद पति ने उसे अकेले मरने के लिए छोड़ दिया और खुद शहर में ऐशो आराम से रह रहा है।

मैं रूपा को ले कर शहर आ गया था। उसके अपने माता पिता और भाई इस बात से बेहद खुश हुए थे। यकीनन उन्होंने इसके लिए ऊपर वाले का लाख लाख धन्यवाद दिया होगा। उन्हें नहीं पता था कि मैं इसके बावजूद उसे अपनी बीवी नहीं मानता था, बल्कि वो मेरे लिए एक ऐसी अंजान औरत थी जिसके साथ न तो मेरा कोई रिश्ता था और ना ही उसके लिए मेरे अंदर कोई जज़्बात थे। हालांकि वो औरत आज भी मुझे अपना पति ही मानती थी और इसका सबूत ये था कि उसकी मांग में पड़े सिन्दूर की लम्बाई कुछ ज़्यादा ही गहरी दिखती थी।

शहर में रूपा मेरे साथ रहने लगी थी। मैंने दो कमरे का एक फ्लैट ले रखा था इस लिए हम दोनों के ही कमरे अलग अलग थे। न मैं उसके कमरे में जाता था और ना ही उसे मेरे कमरे में आने की इजाज़त थी। मैं गांव में भी उससे बात नहीं करता था और यहाँ शहर में भी हमारे बीच ख़ामोशी ही कायम थी। इतना ज़रूर था कि मैं सारा ज़रूरत का सामान खुद ही ला कर रख देता था और अगर कोई ऐसा सामान उसे लेना होता था जो मेरी जानकारी में नहीं होता था तो हम दोनों ही कागज़ में लिख कर पर्ची छोड़ देते थे। कितनी अजीब बात थी न कि एक ही छत के नीचे रहते हुए हम एक दूसरे से कोई बात नहीं करते थे। मैं सिर्फ उसके हाथ का बना हुआ खाना खा लेता था बाकी मैं अपने कपड़े खुद ही धो लेता था। शहर में आने के बाद न उसने कभी बात करने की कोशिश की और ना ही मैंने। मेरे लिए तो वो वैसे भी न के बराबर ही थी।

शहर आए हुए छः महीने गुज़र चुके थे और हमारे बीच ज़िन्दगी गहरी ख़ामोशी के साथ गुज़र रही थी।

कोई सोच भी नहीं सकता था कि दुनियां के किसी हिस्से पर दो ऐसे प्राणी रहते हैं जो कहने को तो पति पत्नी हैं लेकिन उनके बीच पति पत्नी जैसा कुछ भी नहीं है। प्रकृति का ऐसा सिस्टम है कि अगर कोई दुश्मन भी अपने दुश्मन के पास दो पल के लिए रह जाए तो वो एक दूसरे से बिना बात किए रह नहीं सकते लेकिन हम दोनों तो जैसे प्रकृति के इस सिस्टम के अपवाद थे।

हर चीज़ का आदि और अंत होता है और हर चीज़ ख़ास वक़्त पर अपने बदलने का सबूत देती है। समय बदलता है तो समय के साथ साथ उससे जुड़ी हुई हर चीज़ भी बदलती है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे वो खुद भी अपनी सिचुएशन से ऊब जाता है इसी लिए तो अगले ही पल वो एक नए रूप और एक नए अंदाज़ में हमें दिखने लगता है।

शहर में अकेला रहता था तो इतना ज़्यादा नहीं सोचता था लेकिन जब से मैं उस औरत की मौजूदगी अपने पास महसूस करने लगा था तब से ज़हन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभरने लगे थे। अकेले कमरे में मैं अक्सर सोचता था कि क्या यही अपनी ज़िन्दगी है? क्या इस जीवन में इसके अलावा मुझे कुछ भी नहीं चाहिए? क्या मेरे सपने, मेरी ख़्वाहिशें सब कुछ ख़त्म हो चुकी हैं? इस दुनियां में अनगिनत लोग हैं जो अपने जीवन में न जाने क्या क्या हासिल करते हैं और न जाने क्या क्या करते हैं लेकिन क्या मुझे अपने जीवन में कुछ भी हासिल नहीं करना है? क्या मुझे अब किसी भी चीज़ की चाहत नहीं है? ऐसे न जाने कितने ही ख़याल मेरे ज़हन में उभरते रहते थे। हर रोज़ मैं इन ख़यालों में डूब जाता और मुझे उसका छोर न मिलता लेकिन एक दिन अचानक जैसे मैंने सोच लिया कि नहीं नहीं...मेरा जीवन सिर्फ इतने में ही नहीं सिमट सकता। मेरी चाहतें ऐसे ही ख़त्म नहीं हो सकतीं। हर किसी की तरह मुझे भी इस जीवन में बहुत कुछ हासिल करना है।

मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी पनौती वो औरत थी। वो जब से मेरे जीवन में आई थी तब से मेरी ज़िन्दगी जैसे किसी उजड़े हुए चमन का हिस्सा बन चुकी थी। मैं हमेशा से ही अपनी हर चीज़ ख़ास चाहता था लेकिन उस औरत की वजह से मेरे जीवन का हर पहलू जैसे फ़िज़ूल और बेरंग सा हो गया था।

मैंने सोचा था कि मैं ऐसा क्या करूं कि मेरा जीवन फिर से रंगीन और खुश हाल हो जाए? ख़ैर बहुत सोच विचार करने के बाद मैंने फैसला किया कि जिसकी वजह से मेरी ज़िन्दगी बर्बाद हुई पड़ी है उसको अपनी ज़िन्दगी से इतना दूर कर दूंगा कि फिर कभी उसका साया भी मुझ तक न पहुंच सके।

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Chapter - 01
[ Plan & Murder ]
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Update - 02
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इंसान जब किसी चीज़ से आज़िज़ आ जाता है तो वो अक्सर ऐसे रास्ते पर चल पड़ता है जो यकीनन ग़लत होता है किन्तु अगर किसी इंसान को वक़्त रहते सही ग़लत या गुनाह जैसे कर्म की गंभीरता का एहसास हो जाए तो फिर शायद वो ऐसा करने का अपना विचार ही त्याग दे।

अपनी समझ में मैंने हर पहलू के बारे में बहुत सोचा और आख़िर में इसी नतीजे पर पहुंचा कि एक अच्छी शुरुआत के लिए उस चीज़ को ख़त्म कर देना बेहतर होता है जिसकी वजह से आप ये समझ रहे हैं कि वो आपकी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी पनौती है। माता पिता के गुज़र जाने के बाद मैं चाहता तो रूपा को तलाक़ दे देता या उसे उसके माँ बाप के पास वापस भेज देता लेकिन ऐसा न करने के भी कुछ कारण थे। मैं उसे तलाक नहीं देना चाहता था, क्योंकि अब तक तो सारा गांव जान चुका था कि मेरी बीवी से मेरे कैसे सम्बन्ध हैं इस लिए अगर मैं उसे तलाक़ देता तो लोग तरह तरह की बातें करते या फिर ऐसा भी हो सकता था कि उसके माँ बाप व भाई मुझ पर उल्टा केस कर देते। ऐसे में मेरी ज़िन्दगी और भी बदतर हो जाती। रूपा को उसके माँ बाप के घर वापस नहीं भेज सकता था क्योंकि इससे सारी ज़िन्दगी उसके माँ बाप मुझ पर इस बात का दबाव बनाते रहते कि मैं उसे अपने पास ही रखूं जो कि मैं किसी भी कीमत पर नहीं चाहता था। मेरी नज़र में इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने का बस एक ही सही तरीका था कि कुछ ऐसा करो जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

मैंने अपने मंसूबों को परवान चढ़ाने की शुरुआत कर दी थी। मैंने साढ़े चार सालों में पहली बार रूपा से इस बात के लिए माफ़ी मांगी कि मैंने अब तक उसके साथ जो कुछ किया है उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूं और उसे पूरा हक़ है कि वो मुझे इसके लिए जो चाहे सज़ा दे दे। असल में ऐसा करना भी मेरे प्लान का एक हिस्सा था। मैं चाहता था कि मेरे और रूपा के बीच वैसे ही सम्बन्ध बन जाएं जैसे एक खुशहाल पति पत्नी के बीच होते हैं। ख़ैर जब मैंने रूपा से बहुत ही गंभीर हो कर ये कहा तो उसके चेहरे पर आश्चर्य का सागर स्वाभाविक रूप से तांडव करता नज़र आने लगा। आँखों में यकीन नाम का कहीं कोई नामो निशान नहीं था। उसकी ये हालत देख कर मुझे लगा कि कहीं मेरा मंसूबा बेकार न चला जाए। इस लिए अपनी गरज़ में मैंने फिर से उससे अपनी बात दोहराई और उसके जवाब की उम्मीद में मैं उसकी तरफ ख़ामोशी से देखने लगा था।

जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि हर चीज़ का एक दिन अंत भी होता है इस लिए इसका भी अंत हुआ। कहने का मतलब ये कि देर से ही सही किन्तु रूपा को ये एहसास और ये यकीन हो ही गया कि मैं सच में अपने किए पर शर्मिंदा हूं और अब चाहता हूं कि हम दोनों ख़ुशी ख़ुशी पति पत्नी के रूप में अपनी ज़िन्दगी की न‌ई शुरुआत करें। मैंने अपने चेहरे पर ऐसे भाव भी एकत्रित कर लिए थे ताकि रूपा को मेरी बातों का यकीन होने में ज़रा भी देर न लगे और ना ही उसे किसी बात का शक हो।

हालांकि मेरा ख़याल था कि इन साढ़े चार सालों में वो भी तो इस सबके बारे में कुछ न कुछ सोचती ही रही होगी और यकीनन उसके मन के किसी कोने में ये उम्मीद भी बनी रही होगी कि एक दिन ऐसा वक़्त ज़रूर आएगा जब उसका पति उसे अपनी बीवी का दर्ज़ा दे कर उसे अपना लेगा। अब जब कि ऐसा वक़्त आ गया था तो भला वो कैसे इसके लिए इंकार कर सकती थी? वैसे इंकार करने की भी कोई वजह नहीं थी।

मेरे दिलो दिमाग़ में उसके प्रति भले ही ज़हर भरा हुआ था या मैं भले ही उसे ज़रा भी पसंद नहीं करता था लेकिन अपने मंसूबों को परवान चढ़ाने के लिए मैंने ऐसा दर्शाया जैसे अब मेरे दिल में उसके लिए बेपनाह प्रेम है और मैं उस प्रेम के वशीभूत हो कर उसको दुनियां की हर ख़ुशी देना चाहता हूं।

हमारे बीच जब सब कुछ सही और सहज हो गया तो सबसे पहले मैं उसे हर उस जगह लेकर जाने लगा जिस जगह जाने के बारे में नया नया शादी शुदा जोड़ा सोचता है। उसे शहर घुमाता, सिनेमा में ले जा कर फिल्में दिखाता, और मॉल में ले जा कर उसकी पसंद के अनुसार ही उसे शॉपिंग करवाता। हप्ते दस दिन में ही हमारे बीच ऐसा प्यार दिखने लगा जैसे ऐसा प्यार हमारे बीच हमेशा से ही रहा हो। रूपा अपने प्रति मेरा ये प्यार देख कर बेहद खुश थी, ऐसा लगता था जैसे उसे संसार भर की खुशियां मिल गईं थी। जबकि उसे इस तरह खुश देख कर मैं अंदर ही अंदर ये सोच कर जल उठता कि बनाने वाले ने इसे आख़िर किस तरह बनाया है कि इतना खुश होने के बाद भी ये मुझे सुन्दर नज़र नहीं आती?

ये एक नेचुरल बात है कि जब दो लोगों के बीच प्यार इस तरह से बढ़ता है तो एक दिन उस प्यार को एक दूसरे से इज़हार करने का भी वक़्त आ जाता है। हालांकि हमारे लिए तो वैसे भी इज़हार करना अब बहुत ज़रूरी हो गया था क्योंकि शादी को साढ़े चार साल गुज़र गए थे और हमने अब तक अपनी सुहागरात नहीं मनाई थी। मेरा ख़याल है कि सुहागरात एक ऐसी चीज़ है जिसके प्रति एक मर्द से ज़्यादा लड़की के मन में क्रेज होता है। ऊपर से लड़की अगर रूपा जैसी हो तो क्रेज की पराकाष्ठा ही हो जाती है।

मैंने इसके लिए उसे वक़्त दिया। वैसे भी मेरे पास वक़्त की कोई कमी नहीं थी। जब मैंने महसूस कर लिया कि इन सारी ख़ुशियों के बाद अब रूपा के दिल में बस एक उसी ख़ुशी की हसरत रह गई है जिसे सुहागरात कहते हैं तो मैंने भी उसकी ख़ुशी का ख़याल रखते हुए उसकी सुहागरात को उसके लिए एक यादगार सुहागरात बना देने का सोचा।

सबसे पहले एक दिन हम दोनों मंदिर में जा कर पंडित जी से मिले और उस पंडित जी से कोई अच्छा सा शुभ मुहूर्त निकलवाया। ऐसा करने के पीछे मेरी बस यही सोच थी कि इन मामलों में ऐसा करने से बीवी पर ख़ास प्रभाव पड़ता है। ख़ास कर तब तो और भी ज़्यादा प्रभाव पड़ता है जब हमारे बीच पिछले साढ़े चार सालों से ऐसा आलम रहा हो।

ख़ैर पंडित जी ने शुभ मुहूर्त निकाला तो मैंने अपने ऑफिस से एक हप्ते की छुट्टी ले ली और ये एक हप्ते मैंने रूपा के नाम कर दिए।

मैंने सब कुछ रूपा की इच्छानुसार ही करने का सोचा था और उसे भी कह दिया था कि उसका जिस तरह से दिल करे उस तरह से वो हर चीज़ करे। सुहागरात वाले दिन रूपा न‌ई नवेली दुल्हन की तरह सजी हुई थी। अपनी समझ में उसने सोलह नहीं बल्कि बत्तीस श्रृंगार किए थे लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इसके बावजूद वो मुझे सुन्दर नहीं लग रही थी। ख़ैर अपने को तो वैसे भी इस सबसे कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला था। मैं तो बस वही कर रहा था जो मेरे प्लान और मेरे मंसूबों के लिए बेहद ज़रूरी था।

सुहागरात को मैंने हर काम रूपा की मर्ज़ी से ही किया। उसकी उम्मीद से ज़्यादा मैंने उसे प्यार दे कर खुश किया, बल्कि ये कहूं तो ज़्यादा बेहतर होगा कि उसे खुशियां दे कर तृप्त कर दिया। एक ही कमरे में और एक ही बेड पर सुहागरात मनाने के बाद हम दोनों दुनियां जहान से बेख़बर सो गए थे। रूपा मेरे सीने से छुपकी वैसी ही सो गई थी जैसे अब उसने मुकम्मल जहां पा लिया हो।

एक हप्ते की छुट्टी में मैंने रूपा को हद से ज़्यादा तृप्त कर दिया, लेकिन इस बात का ख़ास ख़याल रखा था कि उसके गर्भ में मेरा बीज न ठहर जाए जिसकी वजह से मेरे लिए एक नई समस्या पैदा हो जाए जोकि मैं सपने में भी नहीं चाहता था। एक हप्ते बाद मैं फिर से अपने ऑफिस जाने लगा। मैंने उसके साथ ऐसा ताल मेल बना के रखना शुरू कर दिया था कि उसे ज़रा भी ये न लगे कि हमारे बीच जो कुछ भी अब तक हुआ है या अभी हो रहा है वो महज एक सपना है या दिखावा है।

रूपा को मैंने पहले ही एक टच स्क्रीन वाला मोबाइल ख़रीद कर दे दिया था। मैं चाहता था कि वो अपनी बदली हुई ज़िन्दगी और किस्मत के बारे में अपने माँ बाप को भी खुश हो कर बताए ताकि उनके दिलो दिमाग़ में भी ये बात बैठ जाए कि उनकी बेटी की तपस्या पूरी हो चुकी है और अब उनकी बेटी और दामाद के बीच सब कुछ अच्छा हो गया है। वो तो ये सोच भी नहीं सकते थे कि इतना कुछ हुआ ही इस लिए था कि इसके बाद अब अगर कुछ और हो जाए तो वो उस बारे में ना तो सोच सकें और ना ही किसी बात का शक कर सकें।

मैंने अपने प्लान के पहले चरण को बिलकुल वैसे ही पार कर लिया था जैसा मैं चाहता था। अब मुझे अपने प्लान के दूसरे चरण को शुरू करना था। हालांकि इसकी शुरुआत भी मैंने तभी कर दी थी जब मेरे प्लान का पहला चरण शुरू हुआ था। मेरे लिए एक समस्या ये थी कि बनाने वाले ने मुझे बीवी ही ऐसी दी थी जिसकी शक्लो सूरत बहुत ही भद्दी थी। हालांकि सोचने वाली बात तो ये भी थी कि अगर बीवी सुन्दर मिली होती तो इतना कुछ होता ही क्यों?

मैं जिस कंपनी में काम करता हूं वहां पर निशांत सोलंकी नाम का मेरा एक सीनियर है।

मैं आज तक समझ नहीं पाया कि उसे मुझसे ऐसी कौन सी तक़लीफ है जिसके लिए वो अक्सर मेरे काम पर कोई न कोई नुक्श निकालता ही रहता है और अपनी सीनियरिटी का रौब झाड़ते हुए मुझे सबके सामने बातें सुना देता है। जबकि सब यही कहते हैं कि मेरे काम में कहीं कोई नुक्श जैसी बात नहीं होती थी।

पिछले महीने जब रूपा से पीछा छुड़ाने का मैंने मन बनाया था तो सहसा एक दिन मेरे ज़हन में अपने उस सीनियर के बारे में भी ख़याल आया था। कभी कभी हमारे ज़हन में अचानक से ऐसे ख़याल प्रकट हो जाते हैं जो खुद हमें ही चकित कर देते हैं। मैंने जब इस बारे में गहराई से सोचा तो मेरे होठों पर बड़ी ही जानदार मुस्कान उभर आई थी।

मैं अपने सीनियर निशांत सोलंकी के बारे में एक ख़ास बात जानता था कि वो पक्का लड़कीबाज़ और औरतबाज़ हैं। यहाँ तक कि उसके सम्बन्ध अपने ही कुछ जूनियर्स की बीवियों से थे जिनके बारे में अक्सर मेरा एक साथी बताया करता था। हालांकि उसका कहना तो ये भी था कि वो जूनियर्स अपने फ़ायदे के लिए अपनी बीवियों को उसके नीचे सुलाते थे। उसकी ये बात सुन कर मैं अक्सर सोचता था कि दुनियां में कैसे कैसे लोग हैं जो अपने फ़ायदे अथवा नुक्सान के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। हालांकि इस बात के सोचते ही सहसा मेरे ज़हन में खुद अपना ही ख़याल उभर आया कि मैं भी तो ऐसा ही करने जा रहा हूं।

मैंने अपने उस सीनियर से दोस्ती बनाने के लिए वही सब करना शुरू कर दिया जो उसे पसंद था या जो वो चाहता था। मैं अच्छी तरह जानता था कि अपने फ़ायदे के लिए मैं अपनी बीवी को उसके नीचे नहीं सुला सकता था, क्योंकि मेरी बीवी की मोहिनी सूरत देखते ही उसके मूड का सत्यानाश हो जाना था। इस लिए मैंने इसके लिए एक अलग ही रास्ता चुना। उस रास्ते में भी मेरा मकसद वही था जो उसके बाकी जूनियर्स करते थे लेकिन इसके लिए मैंने एक ख़ास तरीका चुना।

मैंने अपने पर्श पर एक ऐसी शादी शुदा औरत की तस्वीर रखी जो दिखने में ऐसी तो हो ही कि उसे देख कर कोई भी मर्द उस पर लट्टू हो जाए। ख़ैर कुछ ही समय में मेरे सीनियर से मेरी अच्छी बनने लगी। यहाँ तक कि अक्सर लंच टाइम में वो मुझे अपने पास ही लंच करने के लिए बुला लेता था। मेरे कुछ साथी इस बात से थोड़ा हैरान हुए कि मेरा उससे इतना अच्छा ताल मेल कैसे हो गया? एक दिन तो मेरे एक साथी ने मुझे समझाया भी कि भाई इस आदमी से ज़्यादा दोस्ती मत बढ़ाओ क्योंकि ये आदमी सीधा अपने जुनियर्स के घर ही पहुंच जाता है और फिर उनकी बीवियों को फ़साने लगता है। अपने उस साथी की बात सुन कर मैं ये सोच कर मन ही मन मुस्कुराया कि बेटा यही तो मैं चाहता हूं। अब उसे क्या पता कि मैं अपने उस सीनियर को ले कर कौन सा खेल खेलने वाला था।

एक दिन लंच करने के बाद हम दोनों ही अगल बगल कुर्सियों पर बैठे थे।

मैं अपने प्लान के अनुसार अपने पर्श में उस औरत की तस्वीर देख रहा था जिसे मैंने अपनी नकली बीवी बना कर रखा था। उस तस्वीर को देखने का मेरा सिर्फ यही मकसद था कि मेरे सीनियर की नज़र उस पर पड़ जाए। मैं क्योंकि जान बूझ कर अपने सीनियर के बगल से ही बैठा था इस लिए वो बड़ी आसानी से मेरे पर्श में मौजूद उस तस्वीर को देख सकता था और ऐसा हुआ भी। निशांत सोलंकी की नज़र उस तस्वीर पर पड़ी तो उसकी नज़रें जैसे उस तस्वीर पर जम सी ग‌ईं। मैंने कनखियों से निशांत की तरफ देखा तो उसे तस्वीर पर अपनी नज़रें गड़ाए हुए पाया। ये देख कर मैं मन ही मन मुस्करा उठा।

"काफी ख़ूबसूरत है।" सहसा निशांत ने मुस्कुराते हुए पूछा____"तुम्हारी बीवी है क्या?"
"और क्या मैं किसी और की बीवी की तस्वीर अपने पर्श में रखूंगा?" मैंने मुस्कुराते हुए जब ये कहा तो निशांत हंसते हुए बोला____"हां,‌ ये भी सही कहा तुमने। वैसे किस्मत वाले हो यार। क्या ख़ूबसूरत बीवी मिली है तुम्हें। कभी हमें भी मिलवाओ भाभी जी से।"

"बिल्कुल नहीं।" उसकी उम्मीद के विपरीत मैंने इंकार में सिर हिला कर कहा____"मैं अपनी बीवी को आपसे हर्गिज़ नहीं मिला सकता सर।"
"अरे! पर क्यों भाई?" निशांत ने चकित भाव से पूछा था___"आख़िर तुम मुझे भाभी जी से क्यों नहीं मिला सकते?"

"वो इस लिए कि मुझे आपके करैक्टर के बारे में सब पता है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा था____"अगर मैंने आपको अपनी बीवी से मिलवा दिया तो संभव है कि आप मेरी बीवी को अपना बनाने का सोच लें। देखिए ऐसा है सर कि किस्मत से मुझे इतनी ख़ूबसूरत बीवी मिली है जिसे मैं बहुत प्यार करता हूं, तो मैं ये हर्गिज़ नहीं चाहता कि कोई उसे मुझसे छीन ले।"

"हाहाहाहा...तुम भी हद करते हो विशेष।" निशांत ने हंसते हुए कहा____"यार तुम भी लोगों की फैलाई हुई बातों को सच मानते हो, जबकि सच तो ये है कि मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं हूं।"

"सारी सर।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा था____"लेकिन मैं ये अच्छी तरह समझता हूं कि अपने बारे में सब यही कहते हैं कि मैं बुरा इंसान नहीं हूं। आपके बारे में मैंने यहाँ बहुत सुन रखा है। अब हर कोई तो झूठ नहीं बोल सकता न और फिर भला किसी को आपसे ऐसी क्या दुश्मनी होगी जिससे लोग आपके बारे में ऐसी अफवाह उड़ाएं?"

उस दिन निशान्त को मैंने अपनी बीवी से मिलाने के लिए साफ़ मना कर दिया था। हालांकि मेरा प्लान तो अपनी बीवी से उसे मिलाने का ही था लेकिन मैं उस पर ये ज़ाहिर नहीं होने देना चाहता था कि असल में मेरे अंदर चल क्या रहा है। मैं अच्छी तरह जानता था कि निशांत सोलंकी अब मेरी बीवी की एक झलक पाने के लिए मुझसे बार बार कहेगा। यहाँ तक कि वो इसके लिए मुझे कई तरह के प्रलोभन देने पर भी उतारू हो जाएगा। उसके करैक्टर की यही तो विशेषता थी।

मुझे उसी दिन का इंतज़ार था जब निशांत मुझे किसी तरह का प्रलोभन दे।

उस दिन उसने जिस नज़र से मेरी बीवी को देखा था उससे मैं समझ गया था कि उसे वो तस्वीर वाली औरत बेहद ही पसंद आ गई है और अब वो उसको हासिल करने के लिए हर कोशिश करेगा। ख़ैर उस दिन के बाद से निशांत कुछ ज़्यादा ही मुझे भाव देने लगा था और ऐसा भी होने लगा था कि अगर मेरी वजह से कोई काम बिगड़ जाता था तो वो उसके लिए पहले की तरह मुझ पर गुस्सा नहीं होता था। कहने का मतलब ये कि वो मुझे खुश करने के लिए हर तरह से कोशिश कर रहा था। हर रोज़ लंच टाइम में वो मुझसे एक बार ज़रूर मेरी बीवी के बारे में पूछता था और फिर ये कहता कि यार अब तो हम अच्छे दोस्त बन गए हैं, तो अब तो किसी दिन भाभी जी से मिलवा दो लेकिन मैं अपनी बात पर कायम रहा।

एक तरफ निशांत अपने जुगाड़ में लगा हुआ था और दूसरी तरफ मैं अपने मंसूबों को परवान चढ़ा रहा था। मैंने रूपा से अपने सम्बन्ध बहुत ही अच्छे बना लिए थे। रूपा का चेहरा आज कल चाँद की तरह खिला खिला रहने लगा था। हालांकि वो मुझे किसी भी तरह से सुन्दर नहीं लगती थी और इसका मुझे कोई अफ़सोस भी नहीं था। ख़ैर मेरे प्लान का पहला चरण पूरा हो चुका था और अब प्लान के दूसरे चरण की तरफ मुझे रुख करना था। निशांत अपनी कोशिश में लगा हुआ था लेकिन मुझे इंतज़ार उस दिन का था जब वो मेरी बीवी से मिलने के लिए मुझे किसी तरह का प्रलोभन दे। आज कल किस्मत कुछ ज़्यादा ही मेहरबान थी मुझ पर। निशांत को जब समझ आ गया कि उसकी ऐसी कोशिशों से कुछ नहीं होने वाला तो उसने अपना असली हथकंडा अपनाया और उसके इसी हथकंडे का तो मुझे शिद्दत से इंतज़ार था।

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Chapter - 01
[ Plan & Murder ]
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Update - 03
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एक दिन ऑफिस की छुट्टी थी तो मैं रूपा को सिनेमा में फिल्म दिखाने ले गया। थिएटर में सलमान खान की फिल्म प्रेम रतन धन पायो लगी थी। मुझे रूपा ने बताया था कि उसे हीरो में सलमान खान बहुत पसंद है। ख़ैर तीन बजे से शाम के छह बजे तक हम दोनों ने सिनेमा हॉल में साथ बैठ कर फिल्म देखी। फिल्म वाकई में बहुत अच्छी थी और रूपा को तो कुछ ज़्यादा ही पसंद आई थी। शाम को बाहर ही हम दोनों ने खाना पीना खाया और फिर हम वापस अपने फ्लैट पर आ ग‌ए। वैसे मेरे लिए रूपा को अपने साथ फ्लैट से बाहर ले जाना ही बहुत बड़ी बात होती थी। वो कुरूप औरत मुझे ज़रा भी पसंद नहीं थी लेकिन क्योंकि मुझे अपने मंसूबों को परवान चढ़ाना था इस लिए इतना कुछ करना जैसे मेरी मज़बूरी थी।

हम दोनों वापस फ्लैट में आए ही थे कि मेरा मोबाइल फोन बजा। मैंने देखा निशांत सोलंकी का कॉल था। मैंने सोचा इस वक़्त उसने मुझे किस बात के लिए कॉल किया होगा? ख़ैर मैंने कॉल उठाया तो उधर से निशांत ने कहा कि मेरे फ्लैट पर आ जाओ, कुछ ज़रूरी काम है। उसकी ये बात सुन कर मैं मन ही मन मुस्कुराया। मैं जानता था कि उसके ज़हन में मेरी वो नकली बीवी बसी हुई है जिसे उसने मेरे पर्श में देखा था।

ख़ैर वक़्त ज़्यादा नहीं हुआ था इस लिए मैंने उससे कहा कि ठीक है आ रहा हूं।

रूपा को बता कर मैं उसके घर चल पड़ा। निशांत भी मेरी तरह एक फ्लैट में ही रहता था। कुछ साल पहले क्योंकि उसका तलाक़ हो गया था इस लिए फिलहाल वो अपने फ्लैट पर अकेला ही रहता था। औरतबाज़ वो शुरू से ही था इस लिए जब उसकी बीवी को उसकी इस सच्चाई का पता चला था तो दोनों के बीच रिश्ते ख़राब हो गए थे और फिर बात जब हद से ज़्यादा बढ़ गई तो एक दिन उसकी बीवी ने उससे तलाक़ ले लिया। निशांत ने भी उसे रोकने की ज़्यादा कोशिश नहीं की थी। ख़ैर अभी तो वो अकेला ही रहता था और दूसरी शादी करने के बारे में फिलहाल अभी उसका कोई इरादा भी नहीं था।

जब मैं निशांत के फ्लैट पर पहुंचा तो दरवाज़ा उसी ने खोला। उसके मुँह से शराब की स्मेल आई तो मैं समझ गया कि वो पहले से ही अपना मूड बनाए हुए है। जब से उससे मेरा दोस्ताना सम्बन्ध बना था तब से मैं उसके बुलाने पर उसके फ्लैट में जाने लगा था। ये अलग बात थी कि मैंने अब तक उसे अपने घर आने का निमंत्रण नहीं दिया था। हालांकि निमंत्रण देने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि ऐसा करने का मतलब था अपने ही प्लान को नेस्तनाबूत कर लेना।

मैंने देखा कि उसने टेबल पर शराब की बोतलें सजा रखीं थी और उसके साथ ही कुछ चखना वग़ैरा भी। उसने पहले से ही पी रखी थी और अभी आगे भी उसका पीने का इरादा जान पड़ता था। मुझे पता चला था कि वो पक्का पियक्कड़ भी था। ख़ैर उसने मुझे अपने सामने वाले सोफे पर बैठाया। मैं शराब नहीं पीता था और ये बात वो भी जानता था। जब मैं पहली बार उसके फ्लैट पर आया था तो उसने मुझे शराब ऑफर की थी लेकिन मैंने पीने से साफ़ इंकार कर दिया था।

"आपने मुझे किसी काम से बुलाया है क्या सर?" मैंने उससे पूछा। हालांकि मुझे काफी हद तक पता था कि उसने मुझे क्यों बुलाया था।
"यार कम से कम यहाँ पर तो तुम मुझे सर मत कहो।" उसने अपनी हल्की सुर्ख आँखों से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"वैसे भी हम दोनों दोस्त हैं तो तुम्हें मुझे सर वर कहने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम मेरा नाम लिया करो, इससे मुझे भी अच्छा लगेगा।"

"ये आप क्या कह रहे हैं सर?" मैंने हैरान होने की एक्टिंग की____"आप तो मेरे सर ही हैं इस लिए सर ही कहना पड़ेगा आपको और वैसे भी ऑफिस में अगर मैं आपको सर की जगह आपका नाम लूंगा तो लोग तरह तरह की बातें सोचने लगेंगे। वो समझ जाएंगे कि मेरे और आपके बीच कुछ ऐसा वैसा रिलेशन हो गया है।"

"भाड़ में जाएं लोग।" निशांत ने नशे में झूमते हुए बुरा सा मुँह बनाया____"जिसे जो सोचना है सोचे, मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तुम मेरे दोस्त हो और दोस्त को सर नहीं बोला जाता। अब से तुम मुझे सर नहीं बल्कि मेरा नाम ले कर ही बुलाओगे, समझ गए न?"

"ठीक है जैसा आप कहें।

" मैंने इस वक़्त उसके मन की ही करने का सोचते हुए कहा____"अब बताइए आपने मुझे किस लिए बुलाया है यहाँ?"

"यार विशेष मैंने तुम्हें एक बात बताने के लिए बुलाया है यहां।" निशांत ने कांच के गिलास में भरी शराब का एक घूँट हलक के नीचे उतारने के बाद कहा____"कंपनी में कुछ लोगों को प्रमोशन देने की बात चली थी इस लिए मैंने प्रमोशन के लिए उनमें से तुम्हारा नाम भी लिस्ट में जोड़ने का सोचा है। मेरा ख़याल है कि तुम्हें इससे बेहद ख़ुशी होगी।"

प्रमोशन की बात का ये हथकंडा उसका पुराना था। हालांकि प्रमोशन दिलवा देना उसके बस में भी था क्योंकि वो पहुंचा हुआ फ़कीर था। पता नहीं उसके पास ऐसे कौन से सोर्स थे जिसके चलते वो जिसे चाहता था प्रमोशन दिलवा देता था, लेकिन बदले में उसे वही चाहिए होता था जिसका वो रसिया था। ख़ैर मैंने तो उसे इसके लिए कहा ही नहीं था लेकिन मैं जानता था कि एक दिन वो प्रमोशन का हथकंडा अपनाते हुए मुझे इसका लालच ज़रूर देगा। उसे भी पता था कि पिछले साढ़े चार साल से मैं कंपनी में काम कर रहा हूं लेकिन अभी तक मेरा प्रमोशन नहीं हुआ है। अगर मेरे ज़हन में मेरे मंसूबों वाली बात न होती तो मैं उसके इस लालच की तरफ ध्यान भी नहीं देता लेकिन क्योंकि मुझे अपने मंसूबों को परवान चढ़ाना था इस लिए मैंने उसकी बात पर वैसा ही रिऐक्ट किया जैसा कि प्रमोशन पाने के लिए मरे जा रहे किसी एम्प्लोई को करना चाहिए था।

"आपने बिल्कुल सही कहा निशांत।" मैंने इस बार उसका नाम लिया____"प्रमोशन की बात से मैं बहुत खुश हो गया हूं। साढ़े चार साल हो गए मुझे इस कंपनी में काम करते हुए लेकिन अभी तक मेरा प्रमोशन नहीं हुआ। अब अगर आपकी वजह से मुझे प्रमोशन मिल जाएगा तो ये मेरे लिए ख़ुशी की बात तो होगी ही।"

"प्रमोशन के साथ साथ सैलरी भी बढ़ जाएगी।" निशांत ने अपनी समझ में मेरे अंदर और भी ज़्यादा लालच को भरते हुए कहा____"इतना ही नहीं बल्कि कंपनी की तरफ से रहने के लिए तुम्हें एक अच्छा सा फ्लैट और आने जाने के लिए एक कार भी मिल जाएगी।"

"क्या सच में?" मैंने आँखें फाड़ कर इस तरह कहा जैसे उसकी इस बात से मैं बहुत ही ज़्यादा चकित और खुश हो गया होऊं।
"अरे! भाई मैं भला तुमसे झूठ क्यों बोलूंगा?" निशांत ने गिलास उठा कर उसमें से फिर से शराब का घूँट लिया____"ख़ैर मैंने तो दोस्त के नाते तुम्हारे लिए इतना कुछ सोच लिया है पर अब तुम्हारी बारी है विशेष।"

"जी...मैं कुछ समझा नहीं?" मैंने न समझने की एक्टिंग करते हुए कहा तो उसने कहा____"अरे! भाई, सीधी सी बात है कि अब तुम्हें भी अपने इस दोस्त के बारे में कुछ सोचना चाहिए।"

"ओह! हां।" मुझे जैसे उसकी बात समझ में आ गई____"आप ही बताइए निशांत कि मैं अपने दोस्त के लिए क्या कर सकता हूं? आपने मुझे जो ख़ुशी दी है उसके लिए आप जो कहेंगे मैं वही करुंगा।"

"अच्छी तरह सोच कर बोलो विशेष।

" निशांत ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा____"क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि मैं तुमसे जो करने को कहूं वो तुम करने से इंकार कर दो।"

"नहीं करुंगा सर।" उतावलापन और जल्दबाज़ी का प्रदर्शन करते हुए मैंने जल्दी से कहा___"अगर मेरे बस में होगा तो मैं ज़रूर आपके लिए करुंगा। आप एक बार बताइए तो सही।"

"नहीं विशेष मुझे तुम्हारी बात पर यकीन नहीं है।" निशांत ने मानो गहरी सांस ली____"लेकिन हाँ अगर तुम भाभी जी की कसम खा कर कहो तो मैं मान लूंगा।"

"इसमें भला आपके भाभी की कसम खाने की क्या ज़रूरत है निशांत।" मैंने इस तरह कहा जैसे मुझे उसके इरादों का ज़रा भी अंदाज़ा न हो____"फिर भी अगर आप यही चाहते हैं तो ठीक है। मैं अपनी ख़ूबसूरत बीवी की कसम खा कर कहता हूं कि मैं अपने दोस्त के लिए वही करुंगा जो मेरा दोस्त कहेगा। अब ठीक है न?"

मेरी बात सुन कर निशांत के चेहरे पर हज़ार वाल्ट के बल्ब जैसी चमक आ गई थी। शायद वो ये समझता था कि मैं अपनी बीवी से सच मुच बहुत प्यार करता हूं और उसकी कसम खाने के बाद अब मैं सच में वही करने पर मजबूर हो जाऊंगा जो वो कहेगा। अब भला उसे क्या पता था कि वो मुझे नहीं बल्कि मैं उसे अपने जाल में फंसा रहा था।

"हां अब मुझे यकीन है कि तुम सच में वही करोगे जो मैं कहूंगा।" निशांत ने इस बार मुस्कुराते हुए कहा था।
"तो बताइए सर।" मैंने अपने उसी उतावलेपन को ज़ाहिर करते हुए कहा____"मुझे अपने दोस्त के लिए क्या करना होगा?"

"ज़्यादा कुछ नहीं विशेष।" निशांत ने मेरी तरफ अपनी नशे से भारी हो गई आँखों से देखते हुए कहा____"तुम्हें अपने इस दोस्त के लिए सिर्फ इतना ही करना है कि अपनी ख़ूबसूरत बीवी को मेरे पास एक रात के लिए भेज देना है।"

"क्...क्या???" मैंने बुरी तरह उछल पड़ने की एक्टिंग की और साथ ही फिर गुस्सा होने की____"ये क्या कह रहे हैं आप? आप होश में तो हैं न? आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसा कहने की?"

"तुम अपनी बीवी की कसम खा चुके हो विशेष।" निशांत ने सपाट लहजे में कहते हुए जैसे मुझे मेरी कसम याद दिलाई____"इस लिए अब तुम्हें वही करना पड़ेगा जो मैंने कहा है। वैसे भी एक ही रात की तो बात है यार। एक रात में मैं तुम्हारी ख़ूबसूरत बीवी को बस थोड़ा सा प्यार ही तो करुंगा। उसके बदले तुम्हें प्रमोशन के साथ साथ इतना सब कुछ भी तो मिल जाएगा। उसके बाद तुम्हारी लाइफ़ इससे कहीं ज़्यादा बेहतर हो जाएगी।"

"इसका मतलब सच ही कहते थे ऑफिस के वो सब लोग।" मैंने नाराज़गी दिखाते हुए कहा____"ये कि आप अपने जूनियर्स को फंसा कर उनकी बीवियों के साथ ग़लत करते हैं।"

"तुम ग़लत समझ रहे हो विषेश।" निशांत ने खाली गिलास में शराब डालते हुए कहा____"ग़लत तब होता है जब किसी काम में किसी के साथ ज़बरदस्ती की जाए, जबकि मैं जो करता हूं उसमें ज़बरदस्ती नहीं बल्कि दूसरे ब्यक्ति की सहमति होती है।

सिर्फ एक रात की ही बात होती है उसके बाद मैं दुबारा कभी उनके साथ संबंध बनाने के लिए नहीं कहता। मेरे समझदार जूनियर भी ये समझ लेते हैं कि एक रात में भला उनकी बीवियों की और कितना फट जाएगी? अरे! भाई वो ऐसी चीज़ थोड़ी है जो किसी के द्वारा एक बार के घिसने से घिस जाएगी।"

मैं क्योंकि अपने मंसूबों को परवान चढ़ाने के मिशन पर था इस लिए कुछ देर में मैंने अपनी नाराज़गी ये कहते हुए दूर कर ली कि अपनी बीवी की कसम की वजह से मैं अब वही करने को मजबूर हो गया हूं जो उसने कहा है। मैंने ये भी मान लिया कि एक बार के घिसने से सच में मेरी बीवी की घिस नहीं जाएगी। कहने का मतलब ये कि निशांत के अनुसार मैं एक ऐसा बकरा बन गया था जिसे उसने अपनी समझ के अनुसार बड़ी ही खूबसूरती से और ठीक उसी तरह फंसा लिया था जैसे उसने अब तक बाकियों को फंसाया था।

"तो कब भेज रहे हो अपनी बीवी को मेरे पास?" निशांत ने मुस्कुराते हुए पूछा____"भाई अब मुझसे इंतज़ार नहीं होगा। वैसे भी जितना देर तुम करोगे उतनी ही देर लगेगी तुम्हारा प्रमोशन होने में। अब ये तुम पर है कि तुम कितना जल्दी अपना काम करते हो।"

"मुझे थोड़ा समय चाहिए सर।" मैंने गंभीर भाव दिखाते हुए कहा था____"आप भी ये बात समझते हैं कि ये काम इतना आसान नहीं है। इसके लिए तो पहले मुझे अपनी बीवी से बात करनी होगी और उसे इसके लिए राज़ी भी करना होगा।"

"हां ये तो मैं अच्छी तरह समझता हूं भाई।" निशांत ने कहा____"चलो ठीक है। तुम अपनी बीवी से बात करो और उसे इसके लिए राज़ी करो, लेकिन यार ज़्यादा वक़्त जाया मत करना। मैं बता ही चुका हूं कि अब मुझसे इंतज़ार नहीं होगा।"

निशांत सोलंकी से बातें करने के बाद मैं वापस अपने घर आ गया था। मैं खुश था कि मेरे प्लान का दूसरा चरण ठीक वैसा ही कामयाबी की तरफ बढ़ रहा था जैसा कि मैं चाहता था। अगले दो तीन दिन ऐसे ही गुज़र गए। ऑफिस में निशांत मुझे मिलता तो वो ये ज़रूर पूछता कि मैंने अपनी बीवी से इस बारे में बात की या नहीं। जवाब में मैं मायूस होने का नाटक करते हुए यही कहता कि मैंने अपनी बीवी से बड़ी हिम्मत करके बात तो की है लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं हो रही है। बल्कि वो तो मुझसे इस बात से बेहद ही ख़फा हो गई है। निशांत मेरी बात सुन कर यही कहता कि यार किसी तरह अपनी बीवी को इसके लिए राज़ी करो। अगर ज़्यादा देर हुई तो मेरे प्रमोशन का मामला रुक जाएगा। यानि मजबूरन उसे मेरी जगह किसी और का नाम लिस्ट में डलवाना पड़ेगा।

निशांत को भला क्या पता था कि मैं क्या गेम खेल रहा था? वो तो यही समझता था कि मैंने सच में अपनी बीवी से इसके लिए बात की है और वो मेरी ऐसी बातों से मुझसे ख़फा हो गई है। एक दो दिन और ऐसे ही मैंने गुज़ार दिए। असल में मैं हर चीज़ को स्वाभाविक रूप से ही कर रहा था ताकि शक जैसी कोई बात न हो।

जब इस बात को एक हप्ता गुज़र गया तो मैंने सोचा कि अब प्लान के अनुसार आगे का काम शुरू करना चाहिए। ये सोच कर मैंने एक दिन निशांत से साफ़ साफ़ कह दिया कि मेरी बीवी इसके लिए बिल्कुल भी राज़ी नहीं हो रही है इस लिए इसके लिए मुझे कोई दूसरा रास्ता चुनना होगा। निशांत ने जब मुझसे दूसरे रास्ते के बारे में पूछा तो मैंने उसे बताया कि इसके लिए मैंने क्या सोचा है किन्तु इस दूसरे रास्ते के लिए मुझे उसकी मदद की ज़रूरत पड़ेगी। निशांत भला मेरी मदद करने से कैसे इंकार कर सकता था? उसके अनुसार फ़ायदा तो उसी का होना था। इस लिए वो मेरी हर तरह से मदद करने के लिए राज़ी हो गया।

कंपनी का हर आदमी मेरे बारे में यही समझता था कि मैं एक बहुत ही शरीफ़ और बहुत ही ईमानदार ब्यक्ति हूं। मैं दुनियादारी से ज़्यादा मतलब नहीं रखता हूं और ना ही मैं ऐसा हूं जो किसी के साथ धोखाधड़ी करने वाले काम करे। कंपनी के लोगों के ज़हन में मेरी छवि बहुत ही साफ़ और शांत स्वभाव वाली थी। निशांत सोलंकी सोच भी नहीं सकता था कि जिसे उसने अपनी समझ में बड़ी आसानी से फंसा लिया था वो असल में अपने अंदर कितना ख़तरनाक मंसूबा पाले बैठा था और ख़ुद उसी को फांस कर उसके साथ क्या करने वाला था।

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Chapter - 01
[ Plan & Murder ]
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Update - 04
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मैंने निशांत सोलंकी को अपने दूसरे रास्ते के बारे में जब बताया था तो वो मुझे इस तरह देखने लगा था जैसे मैं कोई अजूबा था। मैंने भी उसे संतुष्ट करने के लिए यही कहा कि ऐसा मैंने फिल्मों में देखा है और जिस तरह का मेरी बीवी का करैक्टर है उसके लिए यही एक रास्ता है जिसे अपनाना होगा। अब क्योंकि मैं ख़ुद ही ऐसा कह रहा था इस लिए निशांत ने भी सोचा कि चलो अच्छा ही है, यानि काम चाहे जैसे भी बने लेकिन काम होना चाहिए।

मैंने निशांत से उसका मोबाइल ले लिया था। उसने मोबाइल से अपना मेमोरी कार्ड निकाल लिया था। दूसरे रास्ते के बारे में मैंने उसे जो बताया था वही मेरे प्लान के दूसरे चरण का आख़िरी पड़ाव था। निशांत ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि उसने मुझे अपना मोबाइल दे कर मेरा काम कितना आसान कर दिया था। वो तो इसी बात से बेहद खुश था कि मैं प्रमोशन पाने के लिए अब इस हद तक उतर आया था कि खुद ही अपनी बीवी को ब्लैकमेल करने का रास्ता चुन लिया हूं, ताकि मैं उसे निशान्त के पास भेज सकूं। अब भला वो ये कैसे सोच सकता था कि उसका मोबाइल ही तो मेरे प्लान का सबसे बड़ा और ख़ास हिस्सा था।

रात में अपने मन को मार कर और ये सोच कर मैंने रूपा को प्यार किया कि अब इस कुरूप औरत से बहुत जल्द मेरा पीछा छूट जाएगा। ख़ैर प्यार की पारी समाप्त होने के बाद रूपा तो ख़ुशी ख़ुशी गहरी नींद में सो गई थी लेकिन मैं जागते हुए अपने प्लान और अपने मंसूबों के बारे में गहराई से सोचता रहा।

मैं हर एक पहलू के बारे में अच्छी तरह से सोच लेना चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि ज़रा सी चूक हो जाने की वजह से मेरे सारे किए कराए पर पानी फिर जाए।

दूसरा दिन मेरे लिए मेरे प्लान के अनुसार बेहद ही ख़ास था। छुट्टी का दिन था इस लिए हमेशा की तरह मैं रूपा को बाहर घूमाने ले जाने वाला था। मैंने रात में ही सोच लिया था कि अगले दिन मुझे क्या करना है। इस लिए सुबह होते ही मैंने रूपा को बता दिया कि आज हमें क्या क्या करना है। रूपा बेहद खुश थी और होती भी क्यों नहीं? साढ़े चार साल की तपस्या का उसे इतना अच्छा फल जो मिल रहा था। उसका पति उसे इतना प्यार और इतना मान जो दे रहा था। उसे अपनी पलकों पर बैठा लिया था और हर दिन नए तरीके से उसे खुश कर रहा था। ऐसी पत्नी को अपने पति से इसके अलावा भला और क्या चाहिए था?

घर से सुबह हम दोनों नास्ता कर के निकले थे। सुबह नौ से बारह सिनेमा हॉल में बैठ कर हम दोनों ने फिल्म देखी। उसके बाद रूपा के ही कहने पर मैं उसे चिड़िया घर दिखाने ले गया। वहां से हम दोनों ढाई बजे एक होटल में पहुंचे। मैंने उसे बताया था कि एक रात हम होटल के एक अच्छे से कमरे में रुकेंगे और वहीं पर एक दूसरे से प्यार करेंगे। रूपा मेरी ये बात सुन कर बेहद खुश हुई थी। अब भला वो ये कैसे सोच सकती थी कि होटल के कमरे में मैं उसे प्यार करने के अलावा और क्या करने वाला था?

दिन भर घूमने के चक्कर में रूपा कुछ ज़्यादा ही थक गई थी इस लिए होटल के कमरे में आते ही वो बेड पर सो गई थी। मैंने भी उसे आराम से सोने दिया, क्योंकि मेरे पास मेरे अपने काम के लिए काफी वक़्त था। कुछ देर मैं अपने प्लान के बारे में सोचता रहा और फिर मैं भी उसके बगल से सो गया। शाम को मेरी आँख खुली तो मैंने उसे जगाया। फ्रेश होने के बाद हम दोनों एक बार फिर घूमने निकल ग‌ए। घूम घाम कर हम वापस आठ बजे होटल आए। पहले तो होटल में हमने डिनर किया और फिर कमरे में आ गए।

डिनर कर के हम दोनों होटल के अपने कमरे में आ गए थे। रूपा बेहद खुश थी। मैंने भी समय बर्बाद न करते हुए रूपा को उसकी उम्मीद से ज़्यादा प्यार दे कर संतुष्ट किया। रूपा संतुष्ट होने के बाद बेड पर निढाल सी आँखें बंद किए पड़ी थी। उसके चेहरे पर परम संतुष्टि के भाव थे। मेरी तरह वो भी निर्वस्त्र थी। हालांकि बेड की चादर को उसने अपने पेट तक खींच कर अपने आधे जिस्म को ढँक लिया था। पेट से ऊपर उसके जिस्म का बाकी हिस्सा निर्वस्त्र ही था जिसमें उसकी बड़ी बड़ी लेकिन गहरी सांवली छातियां कमरे में फैले लाइट के दुधिया प्रकाश में चमक रहीं थी।

उसे इस हालत में देख कर सहसा मुझे याद आया कि मुझे अभी अपना असली काम करना है। मैं बहुत ही आहिस्ता से बेड से नीचे उतरा और अपनी पैंट की जेब से निशांत का मोबाइल निकाला। रूपा अभी भी वैसे ही पड़ी हुई थी।

मैंने निशांत के टच स्क्रीन मोबाइल से जल्दी जल्दी उसकी कुछ फोटो खींच ली। अब मैं चाहता था कि उसकी कुछ ऐसी फोटो भी लूं जिसमें उसकी आँखें खुली हुई हों और साथ ही वो थोड़ा हंसती मुस्कुराती नज़र आए। मैं ये भी चाहता था कि रूपा को ये न पता चल सके कि मैं उसकी फोटो खींच रहा हूं।

मैंने मोबाइल वाला हाथ पीछे किया और बेड में उसके थोड़ा क़रीब आ कर मैंने उसे पुकारा तो उसने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें खोली। इस बीच मैंने जल्दी से उसकी एक फोटो खींच ली थी और फिर झट से मोबाइल को छुपा लिया था। मैं उससे बातें करने लगा था और वो शरमाते हुए उठ गई थी। बेड की चादर उसके पेट तक ही थी इस लिए जब वो उठी तो वो सरक कर थोड़ा और नीचे हो गई थी। उसने अपनी ब्रा को खोजने के लिए बेड के दूसरी तरफ गर्दन घुमाई तो मैंने जल्दी से उसकी एक और फोटो खींच ली। इस बार मैंने मोबाइल को सामने ही अपने पैरों के पास इस तरह से रख लिया कि उसकी नज़र उस पर न पड़े। आगे की तरफ चादर थी जो उसके उठ जाने से बेड पर सिकुड़ कर थोड़ा ऊपर को उठ गई थी। ऐसे में उसे आसानी से मेरे हाथ में मौजूद मोबाइल नहीं दिख सकता था जबकि मैं नीचे से ही एंगल बना कर उसकी फोटो बड़े आराम से खींच सकता था।

रूपा को बातों में उलझा कर मैंने उसकी चोरी से कई सारी फोटो खींच ली थी। जब मैंने उसके जिस्म से उसके कपड़े उतारे थे तो मैंने जान बूझ कर उसके कपड़े कमरे के फर्श पर फेंक दिए थे ताकि बाद में उन्हें लेने के लिए उसे निर्वस्त्र हालत में ही बेड से नीचे उतरना पड़े और ऐसा हुआ भी। हालांकि रूपा को अपने निर्वस्त्र होने पर बेहद शर्म आ रही थी लेकिन फिर भी उसे कपड़े तो पहनने ही थे इस लिए मजबूरन उसे निर्वस्त्र ही बेड से उतरना पड़ा था। हालांकि मुझे तो ये भी डर था कि कहीं वो बेड की चादर को अपने जिस्म पर न लपेट ले, अगर ऐसा होता तो मेरे लिए समस्या हो जाती लेकिन अच्छा हुआ कि उसने ऐसा नहीं किया था। जब वो अपने कपड़े लेने के लिए बेड से उतर कर फर्श पर आई थी तो मैंने पीछे से उसकी फोटो बड़े आराम से खींच ली थी। उसके बाद अलग पोज़ में भी उसकी फोटो खींची थी। जब वो कपड़े उठाने लगी थी तब भी, और जब वो कपड़े ले कर सीधा खड़ी हुई तब भी। मैं उससे ऐसी बातें करता जा रहा था जिसमें उसके चेहरे पर हंसी भी दिखे और उसका मुस्कुराना भी।

मैं जो चाहता था वो हो चुका था इस लिए इस बात से मैं अंदर ही अंदर बेहद खुश हो गया था। रूपा को ज़रा भी इस बात की भनक न लग सकी थी कि मैंने उसकी निर्वस्त्र हालत वाली फोटो खींची थी। ख़ैर उसके बाद हम दोनों ही सो गए। दूसरे दिन हम दोनों होटल से वापस अपने घर आ गए।

दूसरे दिन जब मैं ऑफिस गया तो निशांत का मोबाइल भी अपने साथ ही ले कर गया।

लंच करते समय निशांत ने मुझसे पूछा कि मैंने अपनी बीवी को फंसाने का काम किया कि नहीं तो मैंने उससे झूठ मूठ कहा कि मेरी बीवी की तबियत ख़राब थी इस लिए उसे नहीं ले जा पाया। निशांत मेरी बात सुन कर मायूस सा हो गया था। उसने अपना मोबाइल माँगा तो मैंने कहा कि मोबाइल मेरे पास ही रहना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि कोई जुगाड़ बन जाए।

निशांत को मैंने विश्वास दिला दिया था कि उसका काम हो जाएगा, बदले में उसने भी ये कहा कि जब उसका काम हो जाएगा तभी वो मेरे प्रमोशन के लिए मेरा नाम लिस्ट में डलवाएगा। मेरे लिए ये एक प्लस पॉइंट था। निशांत के पास दूसरा मोबाइल भी था इस लिए उसे अपने मोबाइल की फ़िक्र नहीं थी। वैसे भी उसने अपना वही मोबाइल दिया था जिसका नंबर कंपनी में किसी के पास नहीं था। उसका मोबाइल अपने पास ही रखने का मेरा बस यही मकसद था कि कुछ दिनों तक मैं उसके मोबाइल से रूपा को निशांत बन कर ही मैसेजेस करुंगा।

अपनी कुरूप बीवी को अपनी ज़िन्दगी से हमेशा के लिए दूर करने का मेरा प्लान अब आख़िरी चरण पर था। यानि वो दिन दूर नहीं जब मुझे हमेशा के लिए मेरी बीवी से छुटकारा मिल जाएगा।

निशांत सोलंकी की हत्या करके उसकी हत्या में अपनी बीवी को फंसा देना ही मेरा असल प्लान था। इतने दिनों से ये जो कुछ भी मैं कर रहा था वो सब इसी बात की भूमिका थी। अब ऐसा तो हो नहीं सकता था कि निशांत सोलंकी मेरी बीवी रूपा पर इतना ज़्यादा फ़िदा हो जाता कि वो ख़ुद उसे फांसने का सोचता। सच तो ये है कि उसके मन में मेरी बीवी को भोगने का अगर ख़याल भी आता तो वो उसे देखते ही अपना ये ख़याल जीवन भर के लिए मिटा देता। उसके बाद मेरे उस मंसूबे का क्या होता जो मैंने बनाया हुआ था? यानि अपनी कुरूप बीवी से हमेशा के लिए छुटकारा पाना। ख़ैर इसी लिए मुझे ये सब करना पड़ा और इस तरीके से करना पड़ा कि निशांत को ज़रा भी इस बात का शक न हो सके कि इस सबके पीछे मेरा मकसद क्या है। कंपनी से जुड़ा कोई भी शख़्स ये नहीं जानता था कि मेरी बीवी दिखने में कैसी है। हालांकि ये तो सब जानते थे कि मैं शादी शुदा हूं लेकिन अगर कभी किसी ने मेरी बीवी की तस्वीर दिखाने की बात भी कही तो मैंने उन्हें कभी नहीं दिखाया। दिखाता भी कैसे? मैं अपने मोबाइल में उसकी तस्वीर रखता ही नहीं था। आप तो अच्छी तरह जानते हैं कि अगर बीवी की मोहिनी सूरत इस तरह की हो और उसका पति ऐसे ख़यालात वाला हो तो अपनी बीवी की तस्वीर मोबाइल में रखने का सवाल ही नहीं पैदा हो सकता। निशांत को जब मैंने बली का बकरा बनाने का सोचा था तो इसी लिए एक ऐसी सुन्दर औरत की तस्वीर अपने पर्श में रख कर उसकी नज़र में लाया था ताकि उसे देखते ही उसके मन में उसे भोगने की चाहत पैदा हो जाए। उसके बाद का तो सारा काम मुझे ही करना था।

सब कुछ करने वाला तो मैं ही था लेकिन करने वाला असल में निशान्त कहलाता। मुझे ये दिखाना था कि निशांत ही वो शख़्स था जिसने मेरी बीवी को ग़लत इरादे से अपने जाल में फंसाया और इतना ही नहीं बल्कि मेरी बीवी ने खुद भी अपने पति की चोरी से ख़ुशी ख़ुशी उससे सम्बन्ध बना लिया।

मेरी थ्योरी के अनुसार, शुरुआत के कुछ दिन तो बहुत अच्छे गुज़रे लेकिन एक दिन जब निशांत ने उसे अपने अलावा किसी और मर्द का भी बिस्तर गर्म करने के लिए कहा तो रूपा उसकी इस बात से भड़क गई। रूपा को भड़कते देख निशांत ने उसे ब्लैकमेल करने के लिए अपने मोबाइल में उसकी वो फोटो दिखाई जिसमें वो निर्वस्त्र हालत में थी। रूपा अपनी ऐसी फोटो देख कर सकते में आ गई और फिर मजबूर हो कर वो निशांत के कहने पर दूसरे मर्द का बिस्तर गर्म करने के लिए राज़ी हो गई। रूपा ने निशांत से तो कह दिया था कि वो दूसरे मर्द का बिस्तर गर्म करने के लिए तैयार है लेकिन वो भी जानती थी कि ऐसा करना उसके लिए संभव नहीं है। उसे समझ आ गया था कि निशांत के चक्कर में आ कर उसने बहुत बड़ी ग़लती की है। उसे अपने पति से इस तरह बेवफ़ाई नहीं करनी चाहिए थी। ये एहसास होते ही रूपा ने मन ही मन सोच लिया था कि अब वो सब कुछ ठीक करके रहेगी। उसी रात निशांत ने जब रूपा को अपने फ्लैट पर बुलाया तो रूपा अपने पति के सो जाने के बाद आधी रात को निशांत के फ्लैट पर बड़े ही ख़तरनाक इरादे के साथ ग‌ई। अपने घर से वो सब्जी काटने वाला चाकू भी छुपा कर ले गई थी। निशांत के फ्लैट पर पहुंच कर पहले तो उसने निशांत से अपनी उन गन्दी तस्वीरों को मोबाइल से डिलीट करने को कहा और जब निशान्त ने ऐसा करने से इंकार किया तो गुस्से में आ कर रूपा ने छुपा कर लाए हुए उस चाक़ू से निशांत की हत्या कर दी थी। रूपा ने गुस्से में हत्या तो कर दी थी लेकिन जब उसका गुस्सा शांत हुआ तब उसे समझ आया कि ये उसने क्या ग़ज़ब कर दिया है? अपने सामने निशांत को खून से नहाए मरा पड़ा देख वो बुरी तरह डर गई और फिर वो डर कर वहां से भागते हुए वापस घर आ गई थी।

जिस चाकू से उसने निशांत की हत्या की थी वो चाकू भी वो उसके फ्लैट में ही छोड़ आई थी। उस चाकू में उसकी उंगलियों के निशान छप चुके थे। ख़ैर वो उस हत्या से इतना डर गई थी कि उसे निशांत के मोबाइल से अपनी गन्दी तस्वीरों को डिलीट करने का ख़याल भी नहीं रहा था।

उसके बाद सुबह होगी और ज़ाहिर है कि किसी तरह पुलिस को पता चल ही जाएगा कि किसी ने निशांत नाम के आदमी की हत्या कर दी है। पुलिस निशांत के फ्लैट पर जाएगी और हत्या की जांच पड़ताल करेगी। पुलिस को जल्द ही पता चल जाएगा कि वो हत्या किसने की है। पुलिस अपने किसी न किसी माध्यम से सीधा मेरे घर आएगी और रूपा को निशांत की हत्या करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लेगी।

अदालत में बड़ी आसानी से साबित हो जाएगा कि निशांत सोलंकी की हत्या रूपा ने ही की है। निशांत के मोबाइल में उसकी नंगी तस्वीरें, हत्या के औज़ार पर उसके फिंगर प्रिंट्स और साथ ही उसके ख़ुद के मोबाइल में भी निशांत के साथ हुई उसकी बात चीत के मैसेजेस। इतना ही नहीं बल्कि निशांत के मोबाइल की लोकेशन भी पुलिस को बताएगी कि निशांत का मेरे घर आना जाना था। ये सब चीख चीख कर गवाही देंगे कि निशांत की हत्या रूपा ने ही की है। अदालत में पब्लिक प्रासीक्यूटर अपनी दलील में चीख चीख कर जज साहब को बताएगा कि रूपा एक बदचलन और पति से बेवफ़ाई करने वाली औरत है। निशांत सोलंकी से उसके नाजायज़ सम्बन्ध थे। जब निशांत ने उसे ब्लैकमेल करना शुरू किया तो रूपा के अक्ल के परदे खुल गए और उसे समझ आ गया कि उसने ऐसे ग़लत आदमी से सम्बन्ध बना कर अच्छा नहीं किया। उसे एहसास हुआ कि निशांत के ऐसा करने से उसके पति को उसके ऐसे सम्बन्ध का पता चल जाएगा और फिर ये भी सच ही है कि इससे उसकी शादी शुदा ज़िन्दगी ख़तरे में पड़ जाएगी। ये सब सोच कर रूपा ने पहले तो निशांत से अपनी वो गन्दी तस्वीरें उसके मोबाइल से डिलीट करने की मिन्नतें की होंगी और जब निशांत ने उसकी मिन्नतों को ठुकरा दिया तो उसके पास एक ही चारा रह गया और वो चारा था निशांत सोलंकी की बेरहमी से हत्या कर देना। इस बीच मैं ऐसी स्थिति में खुद को दिखाऊंगा जैसे इस सबसे मुझे कितनी तकलीफ़ हुई है। रूपा अगर मुझसे कुछ कहेगी या मुझसे किसी चीज़ के लिए कुछ कहने को कहेगी तो मैं उसकी ना तो कोई बात मानूंगा और ना ही ऐसी कोई बात कहूंगा जिससे उसकी कोई मदद हो सके। उधर एक तरफ कंपनी के मेरे वो साथी भी इस केस में अपने बयानों के द्वारा अंजाने में ही मेरा पक्ष मजबूत बना देंगे जो मुझे निर्दोष के साथ साथ मासूम बना देंगे।

मेरी थ्योरी के अनुसार अदालत में पब्लिक प्रासीक्यूटर आसानी से ये साबित कर देगा कि निशांत सोलंकी की हत्या रूपा त्रिपाठी ने ही की है। उसके बाद जज साहब अपने फैंसले में उसे फ़ांसी की अथवा उम्र क़ैद की सज़ा सुना देंगे। यही मेरा प्लान था और यही मेरा मंसूबा था रूपा से हमेशा के लिए छुटकारा पाने का।

Chapter - 01
[ Plan & Murder ]
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Update - 05
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दो तीन दिन से मैं हर रोज़ निशांत के मोबाइल से रूपा को मैसेजेस कर रहा था और रूपा उन मैसेजेस से बेहद परेशान सी नज़र आ रही थी। शुरू शुरू में उसने सोचा कि शायद किसी ने ग़लती से उसे मैसेज कर दिया होगा लेकिन जब हर रोज़ उसे उसी नंबर से मैसेजेस आने लगे तो वो एकदम से परेशान हो ग‌ई। उसे डर लगने लगा कि कहीं उसके मोबाइल के ऐसे मैसेजेस ग़लती से मेरी नज़र में न आ जाएं। आख़िर साढ़े चार सालों बाद उसकी तपस्या पूरी हुई थी और उसके पति ने उसे पत्नी के रूप में उसे अपनाया था।

इतना ही नहीं बल्कि अब उसे इतना प्यार भी कर रहा था। वो अपने पति और उसके प्यार से बेहद खुश रहने लगी थी। उसने साढ़े चार सालों का अपना सारा दुःख दर्द भुला दिया था लेकिन दो तीन दिन से आ रहे ऐसे मैसेजेस ने उसे गंभीर चिंता में डाल दिया था। हालांकि ऐसी सिचुएशन में उसे करना तो ये चाहिए था कि वो इस बात को फ़ौरन ही मुझे बता देती लेकिन उसने मुझे नहीं बताया। इसकी वजह शायद ये थी कि वो नहीं चाहती थी कि उसके और मेरे बीच इस तरह की कोई बात आए जिससे मेरे मन में एक पल के लिए भी ये ख़याल उभर आए कि कहीं मेरी बीवी का किसी से चक्कर तो नहीं है?

अपनी समझ में रूपा जो कर रही थी वो ठीक कर रही थी लेकिन इसके बावजूद उसके मन में ये ख़याल भी उभर आते थे कि किसी दिन इस सबकी वजह से उस पर कोई भारी मुसीबत न आ जाए। वो उन मैसेजेस से बेहद परेशान हो चुकी थी। मेरे सामने वो खुश रहने का दिखावा करती लेकिन अकेले में वो उन मैसेजेस के बारे में ही सोच कर अंदर ही अंदर परेशान रहती। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो इस गंभीर समस्या से कैसे छुटकारा पाए? इधर मैं भी मैसेजेस में उसे ऐसी ऐसी बातें लिख कर भेजता था जैसे वो मेरी माशूका हो। माशूका समझ कर मैं उसे वैसे ही मैसेजेस भेज रहा था जैसे आज कल के ठरकी नव जवान भेजते हैं।

ऐसे ही दो तीन दिन गुज़र गए। मैं जब घर पर रूपा के सामने होता तो ऐसा ज़ाहिर करता जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं है। वो ख़ुद भी ऐसा दिखावा कर रही थी जैसे उसे किसी बात की परेशानी नहीं है। मैं तो जानता ही था सब कुछ क्योंकि सब कुछ करने वाला मैं ही था। मैं चाहता था कि रूपा मेरे मैसेजेस का कोई न कोई जवाब ज़रूर दे और मेरी ये चाहत तीसरे दिन पूरी हुई। यानि दो दिनों तक रूपा मेरे ऐसे मैसेजेस को सिर्फ देखती ही रही थी और मैसेजेस पढ़ कर उन्हें डिलीट कर देती थी ताकि ग़लती से भी मेरी नज़र में न आएं।

तीसरे दिन मैं ऑफिस में था और वहीं से निशांत के मोबाइल से उसे मैसेजेस भेज रहा था। अपने मैसेजेस में मैं अब ऐसी बातें लिखने लगा था कि रूपा के लिए उनका जवाब देना मज़बूरी बन जानी थी। ख़ैर तीसरे दिन रूपा ने जवाब में लिखा कि तुम कौन हो और क्यों इस तरह के घटिया मैसेजेस भेजते हो मुझे? रूपा का जवाब के रूप में ऐसा सवाल देख कर मैं मुस्कुराया और उसे मैसेज में बोला कि वो मेरी जानेमन है और मैं उससे प्यार करता हूं और साथ ही मैं चाहता हूं कि वो मेरा प्यार एक्सेप्ट कर के मेरे पास आए, ताकि हम दोनों के जिस्म एक हो जाएं।

रूपा मेरा मैसेज पढ़ कर यकीनन बुरी तरह चौंकी रही होगी लेकिन जवाब में उसने यही लिखा कि अगर उसने मुझे फिर से इसी तरह मैसेजे किए तो इस बार वो पुलिस के पास जा कर मेरी शिक़ायत कर देगी।

मुझे रूपा के इस रिप्लाई पर थोड़ा झटका तो ज़रूर लगा था लेकिन मैं जानता था कि वो मुझे सिर्फ खोखली धमकी दे रही थी जबकि सच तो ये है कि ऐसा करने की उसमें हिम्मत ही नहीं हो सकती थी। मैंने भी उसकी हिम्मत को और भी ज़्यादा तोड़ने के इरादे से उसके जवाब में ये लिख कर भेजा कि अगर उसने मेरा कहा नहीं माना तो मैं उसके पति के पास उसकी ऐसी तस्वीर भेज दूंगा जिसमें वो पूरी तरह नंगी है। मेरा ये मैसेज पढ़ कर रूपा का जल्दी ही जवाब आया कि तुम झूठ बोल रहे हो, भला तुम्हारे पास मेरी ऐसी तस्वीर कहां से आ जाएगी। मैंने उसे बताया कि मैं उसके बारे में सब जानता हूं। मैंने उसे बताया कि उसका नाम रूपा है और उसके पति का नाम विशेष त्रिपाठी है।

रूपा मेरा ये मैसेज पढ़ कर यकीनन बुरी तरह चौंकी होगी। मैंने उसे कहा कि अगर उसने इसी वक़्त अपनी एक नंगी फोटो नहीं भेजी तो मैं उसके पति विशेष के पास उसकी वो नंगी फोटो भेज दूंगा। अपनी बात को साबित करने के लिए मैंने उसकी उस फोटो को एडिट कर के भेज दिया जो उस दिन मैंने होटल के कमरे में खींची थी। मैंने उसकी फोटो को एडिट कर दिया था ताकि उसके बैकग्राउंड से उसे पता न चल सके कि उसकी ऐसी फोटो कहां पर खींची गई होगी। ख़ैर अपनी फोटो देख कर यकीनन रूपा के होश उड़ गए रहे होंगे। काफी देर तक उसका कोई जवाब नहीं आया।

अचानक ही जब मेरे अपने मोबाइल पर उसका फ़ोन काल आ गया तो मैं एकदम से बौखला ही गया। मैं समझ गया कि वो इस सबके बाद बहुत बुरी तरह से घबरा गई है और अब शायद उसने सोच लिया था कि वो इस बारे में अपने पति को सब कुछ बता देगी। मैंने सोचा कि उससे बात कर लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि उसके ज़हन में ये ख़याल उभर आए कि कहीं उसका पति ही तो नहीं ये सब कर रहा है? बात भी सही थी क्योंकि वो सोच सकती थी कि इसके पहले उसका पति साढ़े चार सालों तक उसे त्यागे हुए था।

मैंने फ़ोन उठाया और इस तरह प्यार से उससे हेलो किया जैसे मुझे किसी बात का कुछ पता ही न हो। ज़ाहिर है इस वक़्त मैं उससे ये कैसे ज़ाहिर कर सकता था कि मैं ही वो शख़्स हूं जो उसे पिछले तीन दिनों से ऐसे मैसेजेस के द्वारा परेशान कर के रखा हुआ है? मैंने फ़ोन उठाया तो उसने हड़बड़ाए हुए लहजे में कहा कि उसे मुझको एक बहुत ही ज़रूरी बात बतानी है इस लिए मैं जितना जल्दी हो सके घर आ जाऊं। उसकी ये बात सुन कर मैंने उससे कहा कि इस वक़्त मैं नहीं आ सकता जान क्योंकि ऑफिस में मैं बहुत ही ज़रूरी काम में ब्यस्त हूं। शाम को जब मैं ऑफिस से घर आऊंगा तो हम दोनों बाहर ही किसी अच्छे रेस्टुरेंट में डिनर करेंगे। ये कह कर मैंने फ़ोन कट कर दिया। इस बीच मैं निशांत के मोबाइल से उसको ये मैसेज भेज चुका था कि अब तो तुम्हें यकीन हो गया न मेरी जान।

चलो अब जल्दी से इसी तरह की अपनी एक फोटो भेजो और अगर नहीं भेजा तो इसी वक़्त मैं उसकी यही फोटो उसके पति के मोबाइल में भेज दूंगा। उसके बाद क्या होगा ये बताने की ज़रूरत नहीं है।

रूपा बहुत ही बड़े संकट में खुद को घिरा हुआ महसूस कर रही थी, ये मैं अच्छी तरह समझ सकता था। उसकी आँखों के सामने यकीनन अँधेरा सा छा गया रहा होगा। वो अपने बनाने वाले को याद करते हुए उनसे बार बार यही पूछ रही होगी कि मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है कि तू मुझे इस तरह की सज़ा दे रहा है? वो ऊपर वाले से ये भी कहती रही होगी कि बड़ी मुश्किलों से तो मेरी ज़िन्दगी में खुशियों ने आ कर दस्तक दी है तो अब तुझसे मेरी ये खुशियां भी नहीं देखी जा रहीं?

उधर फ़ोन कट होने के कुछ देर बाद ही रूपा का मैसेज आ गया। उसने लिखा था कि मेरे साथ ऐसा जुलम मत करो। आख़िर मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा जो तुम मेरे साथ ऐसा कर रहे हो? रूपा के इस मैसेज पर भला मेरा दिल कैसे पसीज सकता था? मैंने उसे आख़िरी वार्निंग देते हुए लिख कर भेजा कि मैं दो मिनट तक इंतज़ार करुंगा। अगर दो मिनट में उसने अपनी नंगी फोटो नहीं भेजी तो मैं उसकी नंगी तस्वीर उसके पति विशेष को भेज दूंगा।

निशांत के रूप में मैंने रूपा को लास्ट वार्निंग का ऐसा मैसेज भेज तो दिया था लेकिन मैं ये सोच कर अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा भी उठा था कि कहीं ऐसा न हो कि मेरी इस धमकी से डर कर रूपा कोई ऐसा वैसा क़दम न उठा ले जो मेरी सारी मेहनत और मेरे सारे मंसूबों पर पानी फेर दे। यानि वो इस सबसे बुरी तरह घबरा कर आत्म हत्या करने का भी सोच सकती थी जो कि यकीनन अच्छा नहीं हो सकता था।

मैं अपने ऑफिस में साँसें रोके उसके मैसेज के आने का इंतज़ार कर रहा था। एक एक पल मेरे लिए सदियों जैसा भारी लग रहा था और साथ ही इस बात का डर भी मेरी जान लिए जा रहा था कि रूपा कहीं सच में न आत्म हत्या करने का सोच ले। मैं मन ही मन ऊपर वाले को याद कर रहा था कि रूपा ऐसा कुछ न सोचे। एक मिनट में ही मेरी बुरी हालत हो गई थी और आगे और भी बुरी हालत हो जाती अगर दो मिनट के अंदर ही रूपा का मैसेज न आ गया होता।

रूपा ने अपनी नंगी तस्वीर भेज दी थी किन्तु तस्वीर में उसका चेहरा नहीं दिख रहा था बल्कि उसकी गर्दन से नीचे का सारा जिस्म बेपर्दा दिख रहा था। मैं समझ सकता था कि इतना कुछ करने के लिए भी उसने बहुत हिम्मत दिखाई है। अभी मैं उसकी उस भयानक फोटो को देख ही रहा था कि तभी उसका एक मैसेज आया। उसने लिखा था कि मैंने ये फोटो बड़ी हिम्मत कर के तुम्हें भेजी है। मेरा दिल मेरी आत्मा तो चीख चीख कर कह रही थी कि मैं ऐसा न करूं, बल्कि ऐसी बदनामी से बचने के लिए मैं अपने जीवन को ही समाप्त कर लूं लेकिन मैंने ऐसा इस लिए नहीं किया क्योंकि वर्षों बाद मुझे अपने पति का प्यार और उनका साथ मिला है।

मैं हर सूरत में बस यही चाहती हूं कि मुझे इसी तरह मेरे पति का प्यार मिलता रहे। मेरी तुमसे यही विनती है कि अब इसके बाद मुझे ना तो कोई मैसेज करना और ना ही मुझसे किसी बात की डिमांड करना वरना मेरे पास फिर एक ही चारा बचेगा कि मैं अपनी जान दे दूं।

रूपा के इस मैसेज ने मुझे अंदर तक हिला दिया था। मेरे लिए यही बहुत बड़ी बात थी कि उसने आत्म हत्या नहीं कर ली थी। ख़ैर उसकी भावनाओं से तो मुझे वैसे भी कोई लेना देना नहीं था लेकिन उसके मैसेज की आख़िरी बात पढ़ कर मेरे ज़हन में ये ख़याल उभरा कि अगर ये सच में खुद ही आत्म हत्या कर ले तो ये भी शायद बुरा नहीं होगा। मैंने इस बारे में गहराई से सोचा लेकिन फिर एहसास हुआ कि नहीं अगर उसने आत्म हत्या कर ली तो इससे उसकी मौत में कहीं न कहीं मैं भी फंस सकता हूं।

मैंने रूपा को जवाब में लिखा की ठीक है अब से ऐसी डिमांड नहीं करुंगा लेकिन मैं चाहता हूं कि हम दोनों एक दोस्त की तरह कभी कभी एक दूसरे से बात कर लिया करें। रूपा ने इसके लिए साफ़ मना कर दिया। उसके बाद ना तो मैंने उसे कोई मैसेज किया और ना ही उसने कुछ लिख कर भेजा।

शाम को जब मैं घर पहुंचा तो रूपा मुझे देखते ही मुझसे किसी बेल लता की तरह लिपट गई। दिन भर से रोक रखे अपने गुबार को उसने अपने अंदर से निकाल दिया। उसकी हालत देख कर मैंने बुरी तरह हैरान होने का दिखावा किया और अंजान बनते हुए उससे पूछा कि वो रो क्यों रही है? आख़िर बात क्या है? ऐसे न जाने कितने ही सवाल मैंने उससे एक ही सांस में पूछ डाले। जवाब में उसने सिर्फ इतना ही कहा कि उसे मेरी बहुत ही ज़्यादा याद आ रही थी। मैं समझ गया कि मामला ठीक होने के बाद उसने यही फैसला लिया था कि उस मामले के निपट जाने के बाद अब उसका ज़िक्र क्यों अपने पति करे? वो नहीं चाहती थी कि उसका पति इस तरह की किसी भी बातों को उसके बारे में सुने। वो चाहती थी कि उसका पति सिर्फ यही समझे कि उसकी बीवी के मन में उसके अलावा कोई दूसरा ख़्वाब में भी नहीं आ सकता।

रात में डिनर करने के बाद हम दोनों अपने कमरे में आ ग‌ए। आज रूपा के चेहरे में सच मुच की ख़ुशी थी। मैं समझ सकता था कि जिस बात ने उसे इतने दिनों से परेशान कर रखा था उस बात के निपट जाने से अब वो थोड़ा चिंता मुक्त हो गई है। इधर मैंने भी सोचा कि चलो आज इस कुरूप औरत के साथ आख़िरी बार सो लिया जाए क्योंकि इसके बाद तो इससे हमेशा के लिए ही छुटकारा मिल जाएगा।

मैंने जैसा सोचा था बिल्कुल वैसा ही हुआ था। मेरा जो प्लान था उसके हिसाब से मेरा काम हो चुका था और अब प्लान के आख़िरी पड़ाव पर काम करने के लिए मैंने आगे बढ़ने का सोचा। शाम को ऑफिस से चलते समय मैं निशांत से मिला था और उसको बोला था कि उसके काम के लिए मैंने एक दूसरा शानदार तरीका सोचा है। निशांत मेरी बात सुन कर बुरी तरह चौंक पड़ा था।

"अब ये दूसरा तरीका क्यों भाई?" उसने हैरानी से पूछा था____"पहले वाले तरीके का क्या हुआ?"
"असल में बात ये है सर कि उस समय मेरे दिमाग़ में उसके लिए फिल्मों जैसा ही ख़याल आया था।" मैंने गंभीरता दिखाते हुए कहा____"और उस वक़्त मुझे वही तरीका जंचा था। उसके बाद मैं उस तरीके पर काम भी करने लगा था लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि अपनी ही बीवी को इस तरह ब्लैकमेल करना सही नहीं है।"

"हां बात तो तुम्हारी ठीक है विशेष।" निशांत ने सिर हिलाते हुए कहा था____"और सच कहूं तो मैं खुद भी तुम्हारे ऐसे तरीके से उस दिन हैरान हुआ था। ख़ैर तो अब नया तरीका कौन सा है तुम्हारा? वैसे कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुम मुझे गोली दे रहे हो? देखो, अगर ऐसा है तो तुम सोच भी नहीं सकते कि इसके लिए तुम्हें कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।"

"अरे! नहीं नहीं सर।" मैंने इस तरह कहा था जैसे मैं उससे डर गया होऊं____"ऐसी कोई बात नहीं है। मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता।"
"तो साफ़ साफ़ बताओ कि क्या सोचा है इस बारे में तुमने?" निशांत के चेहरे पर नाराज़गी थी।

निशांत के पूछने पर मैंने उसे बताया कि मेरा दूसरा तरीका क्या है। यानि मैं अपनी बीवी से कहूंगा कि मेरे एक दोस्त ने कल हम दोनों को लेट नाईट डिनर पर बुलाया है। मेरी बीवी क्योंकि मेरी कोई बात टालने का सोच ही नहीं सकती इस लिए कल वो मेरे साथ ज़रूर उसके यहाँ लेट नाईट डिनर पर आएगी। उसके बाद मैं उसे डिनर के दौरान बियर वग़ैरा पीने को कहूंगा। पहले तो वो ना नुकुर करेगी लेकिन जब मैं उसे ख़ुशी ख़ुशी प्यार से पीने को कहूंगा तो वो इंकार नहीं कर पाएगी। थोड़ा थोड़ा कर के हम उसे इतनी तो बियर पिला ही देंगे कि उसे नशा चढ़ जाए। बस उसके बाद नशे में जब उसे किसी बात का होश नहीं रहेगा तो फिर उसके साथ कुछ भी किया जा सकता है।

निशांत मेरी ये बातें सुन कर मुझे इस तरह देखने लगा था जैसे मैंने कोई ऐसी बात कह दी हो जिसकी उसने कभी कल्पना भी न की थी। मैंने निशांत को विश्वास दिलाया कि कल रात उसकी मुराद ज़रूर पूरी हो जाएगी। निशांत मेरी बात सुन कर खुशी से फूला नहीं समा रहा था। उसने तो आज रात ही डिनर वाला प्रोग्राम बना लेने पर ज़ोर दिया था लेकिन मैंने उसे कहा कि मैं अपनी बीवी को कल की रात ही उसके फ्लैट पर ले कर आऊंगा। मेरी बात सुन कर उसने कहा था कि चलो कल रात को ही सही।

निशांत के बारे में मैं जानता था कि वो हमेशा की तरह कल रात भी अपने फ्लैट में उस वक़्त शराब के नशे में ज़रूर होगा क्योंकि फ्लैट पर आने के बाद वो बिना पिए नहीं रहता था और क्योंकि उसकी समझ में मेरी बीवी उस रात उसे भोगने के लिए मिलने वाली है इस लिए वो इस ख़ुशी में कुछ ज़्यादा ही नशे में होगा।

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Chapter - 01
[ Plan & Murder ]
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Update - 06
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मैंने बड़ी सफाई से निशांत सोलंकी को शीशे में उतार लिया था।

मैंने उसे ज़रा भी इस बात की भनक नहीं लगने दी थी कि असल में मैं करना क्या चाहता था। उसका मोबाइल अभी भी मेरे पास ही था। शाम को मेरी बातें सुनने के बाद वो इतना खुश हो गया था कि उसे अपना मोबाइल वापस मुझसे मांगने का ख़याल ही नहीं आया था और यही तो मैं चाहता था कि उसका मोबाइल मेरे पास ही रहे क्योंकि आने वाले वक़्त में उसका ये मोबाइल और उसके मोबाइल की लोकेशन रूपा को उसके हत्या के केस में फंसाने के लिए अहम भूमिका अदा करती।

मैं डबल प्लान पर काम कर रहा था। एक तो अपने असली प्लान के लिए निशांत को जाल में फांस कर उसे रूपा का प्रेमी साबित करना चाहता था और दूसरे प्लान में निशांत की समझ में मैं उसके लिए अपनी बीवी को तैयार कर रहा था। वो सोच भी नहीं सकता था कि इतने दिनों तक उसका मोबाइल अपने पास रख कर मैं असल में क्या गुल खिला रहा था। वैसे, अगर मेरी बीवी रूपा सुन्दर होती तो मेरे लिए खुद उसे ब्लैकमेल करने की ज़रूरत ही नहीं होती क्योंकि तब मेरा काम सिर्फ इतना ही होता कि मैं उस दिन निशांत को अपने पर्श में किसी और की नहीं बल्कि अपनी बीवी की ही तस्वीर दिखा देता। उसके बाद निशांत वही करने का सोचता जो कि वो बाकी जूनियर्स की बीवियों के साथ कर चुका था लेकिन मेरे केस में ऐसा नहीं हो सकता था। इस लिए मुझे इतना कुछ करना पड़ा।

सबसे पहले मैंने अपनी बीवी और निशांत के सम्बन्धों को साबित करने के लिए निशांत से उसका मोबाइल ले कर वो खेल रचा और जब मेरा वो खेल फिट हो गया तो मैंने निशांत से बहाना बना कर ये कह दिया कि मुझे अब एहसास हो रहा है कि मुझे अपनी ही बीवी को इस तरह ब्लैकमेल नहीं करना चाहिए बल्कि उसको उसके पास लाने के लिए एक आसान सा तरीका भी है जो अब मेरे ज़हन में आया है। निशांत को भले ही मेरे इन क्रिया कलापों में किसी खेल की गंध न महसूस हुई हो या वो इसमें ऐसा वैसा कुछ भी न सोच सका हो लेकिन मेरी आत्मा और ऊपर वाला तो सब जानता ही है ना कि मैंने ऐसा क्यों किया था?

अपनी कुरूप बीवी से हमेशा के लिए छुटकारा पाने का मेरे ज़हन में बस यही एक तरीका आया था और फिर मैंने देर न करते हुए इस खेल को रचना शुरू कर दिया था। मेरा मंसूबा यही था कि निशांत जैसे बलि के बकरे की इस तरह से हत्या की जाए कि उसकी हत्या का इल्ज़ाम मेरी बीवी रूपा पर आ जाए। वो भी कुछ इस तरह से कि उसे अदालत में फ़ांसी की या फिर उम्र क़ैद की सज़ा हो जाए।

असल में तो निशांत की हत्या मैं ही करुंगा लेकिन इस तरीके से करुंगा कि पुलिस या कानून निशांत के हत्यारे के रूप में रूपा को ही गिरफ़्तार करे।

पुलिस के हाथ रूपा के खिलाफ़ ऐसे ऐसे सबूत लग जाएं कि अदालत में बड़ी आसानी से ये साबित हो जाए कि रूपा ने निशांत की हत्या इस लिए की क्योंकि निशांत से उसके नाजायज़ संबंध तो थे ही लेकिन वो उसे दूसरे मर्दों के साथ संबंध बनाने के लिए ब्लैकमेल भी कर रहा था।

निशांत के फ्लैट में ही निशांत की हत्या को अंजाम देना था और वहीं पर रूपा के खिलाफ़ निशांत की हत्या के सबूत भी प्राप्त करवाने थे। ऐसा तभी संभव था जब रूपा निशांत के फ्लैट पर जाए और जिस चाकू से निशांत की हत्या हो उस चाकू पर रूपा के फिंगर प्रिंट्स पाए जाएं। अब सवाल ये था कि रूपा निशांत के फ्लैट पर जाती कैसे और वहां पर उसके खिलाफ़ ऐसे सबूत पाए कैसे जाते? इसके लिए भी मैंने एक तरीका सोच रखा था।

मैंने निशांत को जो दूसरा तरीका बताया था उसमें भी डबल गेम वाला ही चक्कर था। मैंने निशांत को ये बताया था कि मैं अपनी बीवी को उसके पास ये कह कर लाऊंगा कि मेरे एक दोस्त ने हम दोनों को अपने घर डिनर पर बुलाया है। उसके बाद जब रूपा मेरे साथ निशांत के फ्लैट पर डिनर के लिए आएगी तो डिनर के दौरान निशांत हम दोनों को ही बियर पीने को कहेगा। मैं भी रूपा से बड़े प्यार से कहूंगा कि शहर में थोड़ा बहुत इसका भी आनंद लेना चाहिए। रूपा मेरे कहने पर थोड़ी ना नुकुर के बाद बियर पिएगी ही। मैं उसे थोड़ा और पीने को कहूंगा और वो इंकार नहीं कर सकेगी। इस सबसे होगा ये कि उस पर बियर का नशा चढ़ जाएगा। उसके बाद निशांत उसके साथ जो चाहे कर लेगा।

मैंने निशांत को यही तरीका समझाया था। निशांत मेरे इस तरीके से खुश हो गया था। वैसे भी उसे तो मेरी बीवी को भोगने से ही मतलब होना था। वो इसी बात से बेहद खुश होगा कि उसके एक और जूनियर की बीवी उसको भोगने के लिए मिल गई है। अब भला उसे क्या पता कि ऐसा कुछ भी होने वाला नहीं था क्योंकि असल में तो ये मेरे प्लान का एक हिस्सा था ताकि निशांत को यही लगे कि मैं प्रमोशन के लिए ही ये सब कर रहा हूं। जब की सच्चाई ये है कि मैं तो रूपा को उसके फ्लैट पर किसी और ही मकसद से ले जाने वाला था और वो मकसद यही था कि मैं उसकी हत्या कर के उस हत्या का इल्ज़ाम अपनी बीवी के सिर रख दूं।

रूपा जैसी कुरूप औरत से हमेशा के लिए मेरा पीछा छूट जाएगा। वो कुरूप औरत मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी पनौती बन गई थी जिसकी वजह से मेरी ज़िन्दगी का हर पल मेरे लिए अज़ाबों से भरा हुआ लगता था।

कल के दिन की रात मेरे लिए बेहद ही ख़ास और बेहद ही चुनौती भरी होनी है और इसका मुझे अच्छी तरह एहसास भी है। अगली रात दो लोगों की ज़िन्दिगियों का फ़ैसला होना है। एक की ज़िन्दगी की आख़िरी रात होनी है और एक की ज़िन्दगी का मनहूस साया हमेशा के लिए मेरी ज़िन्दगी से हट जाएगा।

रात में रूपा के सो जाने के बाद मैं चुपके से उठा और अपने सूटकेस से अपनी पर्सनल डायरी निकाली।

मेरे इस सूटकेस की चाभी हमेशा मेरे पास मेरे जनेऊ में ही रहती थी। ब्राह्मण हूं इस लिए जनेऊ धारण करता हूं और उसी जनेऊ में सूटकेस की चाभी बाँध के रखता हूं। ख़ैर डायरी निकाल कर मैंने उसमें आज की अपनी दिनचर्या के बारे में लिखा और उस बारे में भी लिखा जो मैंने कल के लिए सोचा था। ये डायरी मेरी ज़िन्दगी की खुली किताब की तरह थी जिसमें मेरी ज़िन्दगी का हर राज़ लिखा हुआ था। ये डायरी हमेशा मेरे साथ मेरे मरते दम तक रहेगी। रूपा को इस डायरी के बारे में कुछ पता नहीं है क्योंकि मैं हमेशा उसके सो जाने के बाद ही रात में अपने अफ़साने लिखता था।

डायरी को वापस सूटकेस में रख कर मैंने उसे अच्छी तरह लॉक कर दिया और फिर बेड पर आ कर रूपा के बगल से लेट गया। अपनी पलकों में कल के ख़्वाब सजाए मैं गहरी नींद में सो गया था।

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अदालत में डिफेंस लॉयर के चुप होते ही गहरा सन्नाटा छा गया था। उसके हाथ में एक डायरी थी जिसे वो न जाने कितनी ही देर से ऊँची आवाज़ में पढ़ कर जज साहब के साथ साथ सभी को सुना रहा था। अदालत कक्ष में बैठा हर शख़्स डिफेंस लॉयर के द्वारा डायरी में लिखी विशेष त्रिपाठी की इस कहानी को सुन कर आश्चर्य चकित था। इधर मुजरिम के कटघरे में रूपा खड़ी थी जो खुद भी अपने पति की इस राम कहानी को सुन कर चकित थी। दर्शक दीर्घा में कुछ ऐसे लोग भी बैठे हुए थे जो उसके पति विशेष त्रिपाठी के साथ कंपनी में काम करते थे। दूसरी तरफ की बेंच में रूपा के पिता चक्रधर पाण्डेय और उसका भाई अभिलाष पाण्डेय बैठा हुआ था।

बात आज से तीन दिन पहले की है। उस वक़्त सुबह के ग्यारह बज रहे थे जब अचानक ही घर के बाहर वाले दरवाज़े को ज़ोर ज़ोर से खटखटाया गया था। रूपा को लगा था कि शायद उसका पति होगा इस लिए उसने भागते हुए जा कर दरवाज़ा खोला था और दरवाज़े के बाहर जब उसने चार पुलिस वालों के साथ दो महिला पुलिस को भी देखा तो वो एकदम से हैरान रह गई थी। उसे समझ में नहीं आया था कि उसके दरवाज़े के बाहर पुलिस वाले किस लिए मौजूद हैं? ख़ैर अभी वो ये सोच ही रही थी कि तभी उन पुलिस वालों में से एक पुलिस वाले ने रूपा से जो कहा उसे सुन कर रूपा के पैरों के नीचे से ज़मीन ही ग़ायब हो गई थी।

"मिसेस रूपा, आपको आपके पति और निशांत सोलंकी की हत्या के जुर्म में गिरफ़्तार किया जाता है।" पुलिस के इंस्पेक्टर ने जब सपाट लहजे में ये कहा था तो रूपा को ऐसा लगा था जैसे उसके पैरों के नीचे से धरती ही सरक गई हो। उससे कुछ बोलते न बन पड़ा था जबकि इंस्पेक्टर के इशारे पर एक महिला पुलिस आगे बढ़ी थी और उसने रूपा के हाथों में हथकड़ी लगा दी थी।

उसके बाद उसे पुलिस जीप में बैठा कर पुलिस थाने ले जाया गया था।

रूपा उन सभी पुलिस वालों से बार बार कह रही थी कि उसे इस तरह क्यों पकड़ कर ले जा रहे हैं? उसने किसी की हत्या नहीं की है बल्कि वो तो ख़ुद ही सुबह से इस बात से चिंतित और परेशान थी कि उसका पति जाने कहां चला गया है।

पुलिस थाने में पुलिस ने जब रूपा को साफ़ शब्दों में बताया कि उसने क्या किया है तब रूपा ये जान कर फूट फूट कर रोने लगी थी कि जिस पति के लिए वो सुबह से परेशान थी उसकी हत्या हो गई है और इतना ही नहीं उसकी हत्या के जुर्म में पुलिस ने उसको ही गिरफ़्तार कर लिया है। थाने में महिला पुलिस ने जब उसके साथ शख़्ती दिखाते हुए ये पूछा कि उसने अपने पति की हत्या क्यों की है तो उसने रो रो के उस महिला पुलिस से कहा था कि उसने किसी की हत्या नहीं की है बल्कि उसे तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं था।

महिला पुलिस को रूपा ने बताया कि सुबह जब वो सो कर उठी थी तो उसका पति कमरे में नहीं था। पहले उसने यही सोचा था कि शायद वो सुबह जल्दी उठ गया होगा और अब बाथरूम में फ्रेश हो रहा होगा लेकिन जब काफी देर हो जाने के बाद भी उसका पति बाथरूम से बाहर न निकला था तो उसने उसे आवाज़ दी थी लेकिन उसकी आवाज़ पर भी जब बाथरूम से कोई आवाज़ न आई थी तो उसने बाथरूम में जा कर देखा। वो ये देख कर हैरान हुई थी कि बाथरूम में उसका पति है ही नहीं। उसके बाद उसने अपने पति को फ्लैट में हर जगह ढूंढ़ा लेकिन वो उसे कहीं न मिला था। फिर उसने अपने पति को फ़ोन लगाया तो पता चला कि उसके पति का फ़ोन कमरे में ही रखा हुआ है। इस सबसे वो बेहद चिंतित हो उठी थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर उसका पति इस तरह से कहां जा सकता है?

रूपा ने महिला पुलिस को बताया कि जब सुबह के दस बज जाने पर भी उसका पति वापस घर नहीं आया तो उसके मन में तरह तरह की आशंकाए जन्म लेने लगीं थी। वो इस शहर में किसी को जानती भी नहीं थी जिससे वो अपने पति के बारे में पता कर सके। हर गुज़रता हुआ पल उसकी हालत को और भी ज़्यादा ख़राब करता जा रहा था। उसके मन में तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे जिससे अब उसे रोना आने लगा था। फिर उसे एकदम से अपने माता पिता का ख़याल आया तो उसने अपने बाबू जी को फ़ोन लगा कर उन्हें सब कुछ बताया। उसकी बातें सुन कर उसके बाबू जी ने उसे दिलासा दिया था कि वो चिंता न करे उसका पति किसी ज़रूरी काम से कहीं गया होगा। अपने बाबू जी के दिलासा देने पर उसने किसी तरह खुद को शांत किया था और अपने पति के आने का फिर से इंतज़ार करने लगी थी। उसके कुछ समय बाद अचानक से किसी ने जब दरवाज़ा खटखटाया तो उसने दरवाज़ा खोला था। दरवाज़े के बाहर पुलिस को देख कर वो हैरान रह ग‌‌ई थी।

रूपा की बातें सुन कर महिला पुलिस ने उसकी सारी बातें पुलिस के इंस्पेक्टर को बताई थी। उधर विशेष के साथ निशांत सोलंकी की भी हत्या हुई थी।

इस लिए पुलिस ने जल्द ही उससे सम्बंधित लोगों से सम्बन्ध स्थापित करके हत्या की जांच पड़ताल शुरू कर दी थी। हालांकि रूपा को भी पुलिस ने सिर्फ इस आधार पर गिरफ़्तार किया था क्योंकि घटना स्थल पर जो मोबाइल फ़ोन मिले थे उनमें से एक मोबाइल पर रूपा की गन्दी तस्वीरें मिली थीं। पुलिस ने जब आगे की जांच पड़ताल की तो पता चला कि मरने वालों में से एक रूपा का पति था और दूसरा निशांत सोलंकी। दोनों में एक चीज़ कॉमन थी कि दोनों एक ही कंपनी में काम करते थे। पुलिस ने जब कंपनी में उनके बारे में पता किया तो कंपनी के कुछ लोगों ने पुलिस को ऐसी बातें बताई जिससे पुलिस को हत्या करने का मामला समझ में आया था। उसके बाद पुलिस फ़ौरन ही विशेष के घर पहुंची और रूपा को गिरफ़्तार कर लिया।

थाने में रूपा से बड़ी लम्बी पूछतांछ चली थी लेकिन रूपा ने पुलिस से बार बार यही कहा था कि उसे इस सबके बारे में कुछ भी पता नहीं है। उसके बाद जब पुलिस ने रूपा से ये कहा कि निशांत सोलंकी से उसका क्या सम्बन्ध था तो उसने कहा कि उसे उसके बारे में कुछ नहीं पता लेकिन हाँ कुछ दिन पहले कोई अंजान आदमी उसे गंदे गंदे मैसेजेस करते हुए परेशान ज़रूर कर रहा था और वो उसे धमकी भी दे रहा था कि अगर उसने उसका कहा नहीं माना तो वो उसकी गन्दी तस्वीरें उसके पति को भेज देगा।

उधर कम्पनी के कुछ लोगों ने पुलिस को बताया था कि निशांत और विशेष का कुछ समय से काफी मेल जोल था। उन्होंने निशांत के बारे में भी बताया कि वो कैसा ब्यक्ति था। पुलिस को ये तो समझ आया कि मामला ब्लैकमेलिंग का है लेकिन उसे ये समझ में नहीं आया था कि अगर निशांत ब्लैकमेलर था तो विशेष को इसके बारे में कैसे पता चला और वो उसके फ्लैट में उसके साथ ही कैसे मरा हुआ मिला? पुलिस को रूपा पर शक तो था लेकिन वो ये भी सोच रही थी कि एक औरत दो दो आदमियों को कैसे एक साथ मार सकती है और वो भी दो अलग अलग हथियारों से?

निशांत के घर वालों को पुलिस ने सूचित कर दिया था और इधर रूपा के घर वालों को भी पुलिस ने सूचित कर दिया था। दोनों पक्षों के लोग आ चुके थे और मामला अदालत तक भी पहुंच चुका था। शुरुआत में तो पब्लिक प्रासीक्यूटर ने बड़ी लम्बी लम्बी दलीलें दी थी और रूपा को हत्यारिन साबित करने की भी पूरी कोशिश की थी लेकिन हर बार बात यहाँ पर अटक जाती थी कि कोई भी हत्यारा दो आदमियों को एक ही समय पर दो अलग अलग हथियारों से क्यों मारेगा? डिफेंस लॉयर के पास भी कई सारे ऐसे सवाल थे जिनके जवाब पब्लिक प्रासीक्यूटर के पास नहीं थे।

इधर पुलिस को इस केस से सम्बंधित एक ऐसा सुराग़ मिला जिसने अदालत में इस केस को पूरी तरह साफ़ कर दिया था और वो सुराग़ था विशेष की डायरी। तलाशी में वो डायरी पुलिस को विशेष के सूटकेस से मिली थी।

डायरी मिलने के बाद और उसे पढ़ने के बाद सारा मामला तो समझ में आ गया लेकिन हर आदमी ये जान कर चकित भी रह गया था कि ये सब खुद मरने वाले का सोचा समझा एक प्लान था। असल मामला तो ये था कि रूपा का पति खुद ही निशांत की हत्या के जुर्म में अपनी बीवी को फंसाना चाहता था और अपनी बीवी से हमेशा के लिए छुटकारा पा लेना चाहता था लेकिन दुर्भाग्य से उसका ये मंसूबा पूरा नहीं हुआ।

"योर ऑनर!" उधर छा गए गहन सन्नाटे को भेदते हुए डिफेंस लॉयर ने जज की तरफ देखते हुए ऊँची आवाज़ में कहा____"मेरी मुवक्किल मिसेस रूपा त्रिपाठी के पति विशेष त्रिपाठी की इस डायरी ने इस केस को पूरी तरह से साफ़ कर दिया है। इनके पति ने इस डायरी में अपनी करतूतों का सारा काला चिट्ठा लिखा हुआ था। शुक्र हैं कि तलाशी में ये पुलिस के हाथ लगी जिससे हमें असलियत का पता चल गया। इस डायरी में लिखा हुआ एक एक शब्द खुद इस बात की गवाही देता है कि असल में माजरा क्या था। मिसेस रूपा जी के पति ने अपनी पत्नी को कभी दिल से अपनाया ही नहीं था। वो मज़बूरी में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर तो ले आए थे लेकिन हर पल वो अंदर ही अंदर इस बात से कुढ़ते रहे कि ऊपर वाले ने ऐसी बदसूरत औरत को उनकी पत्नी क्यों बनाया? जब वो किसी भी हाल में ये सब सहन नहीं कर सके तो उन्होंने सोच लिया कि वो अपनी ज़िन्दगी से ऐसी औरत को दूर कर देंगे जिसे वो देखना भी पसंद नहीं करते। इसके लिए उन्होंने एक ऐसा प्लान बनाया जिसके बारे में दूसरा कोई सोच भी नहीं सकता था।"

"माना कि इनके पति ने इन्हें अपनी ज़िन्दगी से दूर करने का ऐसा प्लान बनाया था योर ऑनर।" पब्लिक प्रासीक्यूटर ने डिफेंस लॉयर की बात को बीच में ही काटते हुए कहा____"लेकिन वो अपने प्लान में सफल कहां हुए? बल्कि वो तो ख़ुद उस आदमी के साथ ही उस फ्लैट में मरे हुए पाए गए जिस निशांत नाम के आदमी की हत्या के जुर्म वो अपनी पत्नी को फंसाना चाहते थे। मैं अब भी यही कहूंगा योर ऑनर कि मुजरिम के कटघरे में खड़ी इस औरत ने ही अपने पति के साथ साथ उस आदमी की भी हत्या की है। इन्हें पता चल गया था कि इनका पति इन्हें अपनी ज़िन्दगी से दूर करने के लिए किस तरह का षड़यंत्र रच रहा है। इन्हें अपने पति से ऐसे किसी षड़यंत्र की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी।

ये तो यही समझती थीं कि इनकी साढ़े चार सालों की तपस्या पूरी हो गई है और ऊपर वाले की दया से इनके पति ने इन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया है लेकिन, लेकिन योर ऑनर जब इन्हें ये पता चला कि इनके पति इनके लिए क्या मंसूबा बनाए हुए हैं तब इन्हें अपने पति पर भयंकर गुस्सा आया और फिर इन्होंने अपने पति के साथ साथ निशांत सोलंकी की भी इस तरह से हत्या की कि पुलिस या कानून को यही लगे कि एक पति को जब ये पता चला कि निशांत नाम का आदमी उसकी बीवी को ब्लैकमेल कर रहा है तो वो उसे धमकाने के लिए उसके फ्लैट पर जा पहुंचा। फ्लैट पर दोनों के बीच कहा सुनी हुई और बात इस हद तक बिगड़ गई कि एक ने दूसरे को चाकू मारा तो दूसरे ने पहले को गोली मार दी। कहने का मतलब ये कि दोनों ने एक दूसरे को ही जान से मार डाला।"

"वाह! क्या बात है।" डिफेंस लॉयर एकदम से ताली बजाते हुए बोल पड़ा____"कहानी तो आपने वाकई में बहुत अच्छी गढ़ी है प्रासीक्यूटर साहब लेकिन ये तो आप भी जानते हैं न कि अदालत में किसी भी चीज़ को साबित करने के लिए सबूत और गवाह की ज़रूरत पड़ती है। बिना किसी सबूत के अदालत किसी भी मन गढंत कहानी को सच नहीं मानती।" कहने के साथ ही डिफेंस लॉयर जज साहब की तरफ मुड़ा और फिर बोला____"योर ऑनर! प्रासीक्यूटर साहब के पास अपनी बात को साबित करने के लिए ना तो कोई सबूत है और ना ही कोई गवाह है, जबकि मैं अदालत के समक्ष ये साबित कर चुका हूं कि मेरी मुवक्किल का किसी की भी हत्या से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है। मैं अदालत से गुज़ारिश करता हूं कि मेरी मुवक्किल को हत्या के संगीन आरोपों से मुक्त कर के उन्हें बाइज्ज़त बरी किया जाए...दैट्स आल योर ऑनर।"

डिफेंस लॉयर के इस कथन पर एक बार फिर से अदालत कक्ष में कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। न्याय की कुर्सी पर बैठे जज ने गहरी सांस लेते हुए अदालत कक्ष में बैठे हर शख़्स की तरफ बारी बारी से देखा।

ये सच था कि पब्लिक प्रासीक्यूटर के पास अपनी बात को साबित करने के लिए कोई भी ठोस सबूत नहीं थे जिसके चलते उसकी दलील जज साहब के समक्ष महज एक मन गढंत कहानी ही लगनी थी। इधर रूपा के खिलाफ़ भी पुलिस को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था जिससे उसे अपने पति के साथ साथ निशांत सोलंकी की भी हत्या का दोषी माना जाए। ख़ैर डिफेंस लॉयर के कथन के बाद जज ने भी यही माना कि निशांत सोलंकी को विशेष त्रिपाठी की असलियत पता चल गई रही होगी जिससे दोनों की आपस में कहा सुनी हुई और बात इस हद तक बढ़ गई होगी कि दोनों ने एक दूसरे को जान से मारने का प्रयास किया और इस प्रयास में दोनों की ही जान चली गई। घटना स्थल से क्योंकि रूपा के खिलाफ़ कोई भी ऐसा सबूत नहीं मिला था जिससे ये कहा जा सके कि रूपा निशांत के फ्लैट पर मौजूद थी। इस लिए जज साहब ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए उसे बाइज्ज़त बरी कर दिया।

विषेश त्रिपाठी की डायरी ने केस में अपनी भूमिका निभाते हुए रूपा त्रिपाठी को बाइज्ज़्त बरी करवा दिया था।

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End of chapter - 01

Chapter - 02
[ Reality & Punishment ]
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Update - 07
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अदालत से बरी हो जाने के बाद रूपा अपने पिता और भाई के साथ वापस कमरे में आ गई थी। उसके चेहरे पर दुःख और तक़लीफ के भाव थे। उसके पिता और भाई पुलिस द्वारा सूचित करने पर फ़ौरन ही दूसरे दिन अपनी बेटी रूपा के पास पुलिस थाने आ गए थे। सारा मामला जानने समझने के बाद उन्हें भी बेहद दुःख हुआ था लेकिन अदालत में उस वक़्त वो दोनों भी बुरी तरह आश्चर्य चकित रह गए थे जब डिफेंस लॉयर ने विशेष त्रिपाठी की डायरी पढ़ कर पूरी अदालत को सुनाई थी। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि उनके दामाद ने अपनी पत्नी को अपनी ज़िन्दगी से दूर करने के लिए इतना ख़तरनाक मंसूबा बनाया हुआ था। वो तो यही सोच कर बेहद खुश थे कि उनके दामाद ने वर्षों बाद उनकी बेटी को अपनी पत्नी के रूप में अपना लिया था और अब उसे जी जान से प्यार भी करने लगा था। वो तो ये सोच भी नहीं सकते थे कि उनकी बेटी को अपनाना और उसे इतना प्यार देना उसका महज एक दिखावा था।

ख़ैर बुरे काम का बुरा नतीजा ही निकलता है। जो दूसरे के लिए गड्ढा खोदता है वो खुद ही अपने खोदे हुए गड्ढे पर गिर जाता है। यही उनके दामाद के साथ हुआ था लेकिन इतना कुछ होने के बाद उनके ज़हन में बार बार कुछ ऐसे सवाल उभर रहे थे कि क्या सच में उनके दामाद की मौत निशांत सोलंकी नाम के उस आदमी के साथ हुए आपसी झगड़े से हुई थी या उन दोनों की मौत की वजह कोई दूसरी थी? यानि क्या सच यही है कि उनका दामाद अपने प्लान के अनुसार जब निशांत के घर उसकी हत्या करने गया तो वहां कुछ ऐसे हालात बन गए कि दोनों में कहा सुनी होने लगी और फिर बात इतनी बिगड़ गई कि दोनों एक दूसरे को जान से मार देने पर उतारू हो गए? एक दूसरे को जान से मार देने की कोशिश में वो दोनों सच में ही अपनी अपनी जान से हाथ धो बैठे?

ऐसे न जाने कितने ही सवाल रूपा के पिता चक्रधर पाण्डेय के ज़हन में गूंजने लगते थे लेकिन उन्हें अपने किसी भी सवाल का जवाब नहीं मिलता था। ख़ैर पोस्ट मोर्टेम के बाद उनके दामाद की डेड बॉडी उन्हें मिल गई थी इस लिए वो एम्बुलेंस में अपने दामाद की डेड बॉडी ले कर गांव चले गए थे जबकि अपने बेटे अभिलाष को उन्होंने अपनी बेटी को ट्रेन से ले आने के लिए कह दिया था।

सब गांव पहुंच चुके थे। विशेष की मौत की ख़बर एक दो लोगों को हुई तो उनके द्वारा ये ख़बर जंगल की आग तरह पूरे गांव में फ़ैल गई। लोगों ने अपनी सोच के अनुसार इस बात को मिर्च मसाला लगा कर एक दूसरे से कहना शुरू कर दिया। विशेष के परिवार में बाकी और तो कोई नहीं था, लेकिन उसकी ननिहाल वाले ज़रूर थे इस लिए उन तक ख़बर भेजवा दी गई थी।

दूसरे दिन विशेष के ननिहाल वालों की सहमति से उसका दाह संस्कार कर दिया गया। रूपा जो पहले ही विधवा हो गई थी वो अब गांव आने के बाद गांव के नियमानुसार विधवा के लिबाश में आ चुकी थी। हर वक़्त उसकी आँखों में वीरानी सी छाई रहती थी। चेहरा पत्थर की तरह शख़्त रहता था। उसकी इस हालत को देख कर उसकी माँ रेणुका बेहद चिंतित और परेशान थी। वो जानती थी कि उसकी बेटी को ऊपर वाले ने जो दुःख दिया है वो अब कभी मिटने वाला नहीं है लेकिन जीवन में इस दुःख को ले कर बैठे भी तो नहीं रहा जा सकता था।

रूपा के पिता अपनी बेटी को अब अपने घर ही ले आए थे। वैसे भी अब उसकी ससुराल में ऐसा कोई नहीं बचा था जिसके सहारे उसे वहां पर छोड़ दिया जाता इस लिए चक्रधर जी उसे अपने घर ही ले आए थे और उसकी जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ले ली थी। अपनी बेटी के लिए वो भी दुखी थे लेकिन जीवन-मरण और सुख-दुःख तो सब ऊपर वाले के हाथ में था जिस पर उनका कोई ज़ोर नहीं चल सकता था। ख़ैर ऐसे ही कुछ दिन गुज़र गए। रूपा की ज़िन्दगी में ख़ामोशी छा गई थी और वैसी ही ख़ामोशी उसने अपने होठों पर भी सजा ली थी। उसकी माँ रेणुका उसे बहुत समझाती थी लेकिन उसके समझाने का जैसे उस पर कोई असर ही नहीं होता था। सबके सामने तो वो बस ख़ामोश ही रहती लेकिन अकेले कमरे में वो सिसक सिसक कर रोती थी।

एक दिन उसकी माँ ने अपनी क़सम दे कर उससे पूछ ही लिया कि आख़िर अब ऐसी कौन सी बात है जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही है? इतना तो वो भी समझती थी कि जो दुःख उनकी बेटी को ऊपर वाले ने दिया है वो अब किसी के भी मिटाए नहीं मिटेगा लेकिन फिर भी इंसान किसी न किसी तरह खुद को समझा कर तसल्ली देता ही है ताकि जीवन में आगे बढ़ सके। अपनी माँ की क़सम से मजबूर हो कर रूपा को अपनी ख़ामोशी तोड़नी ही पड़ी।

"अदालत में न्याय की कुर्सी पर बैठे हुए जज ने मुझे निर्दोष मानते हुए भले ही बाइज्ज़त बरी कर दिया है मां।" रूपा ने गंभीर भाव से कहा____"लेकिन ऊपर बैठा हम सबको बनाने वाला हर किसी की सच्चाई को भली-भांति जानता है। उससे किसी का कुछ भी छुपा हुआ नहीं है।"

"तू कहना क्या चाहती है बेटी?" रेणुका ने ना समझने वाले भाव से उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"आख़िर किस सच्चाई को जानने की बात कर रही है तू?"

"तुम्हें पता है मां।" कहते हुए रूपा की आँखों में आंसू भर आए, आवाज़ जैसे कांप गई, बोली____"अपने पति और तुम्हारे दामाद की हत्या मैंने की है, लेकिन अदालत में कोई ये साबित नहीं कर पाया कि मैंने ही अपने पति की हत्या की है, बल्कि साबित ये हुआ कि उन हत्याओं में मेरा कोई हाथ नहीं था। मेरे वकील ने अदालत में मुझे निर्दोष साबित कर दिया और न्याय की कुर्सी पर बैठे हुए जज को मुझे बाइज्ज़त बरी का देना पड़ा।"

"ये...ये तू क्या कह रही है रूपा???" रेणुका को जैसे ज़बरदस्त झटका लगा था।

आश्चर्य और अविश्वास से उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं थी।

"यही सच है मां।" कहने के साथ ही रूपा के चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता उभर आई, बोली____"ऊपर वाले का हर फ़ैसला मुझे मंजूर था लेकिन उस बेगैरत इंसान का वो फैसला मुझे हर्गिज़ मंजूर नहीं था जो उसने मेरे लिए किया था। मैंने उसको उसके किए की सज़ा दे कर अच्छा ही किया मां। यकीन मानो मुझे अपने किए पर ज़रा भी अफ़सोस नहीं है। साढ़े चार सालों से उसके सहारे के बिना ये ज़िन्दगी जी ही तो रही थी, अब बाकी की सारी ज़िन्दगी भी उसके सहारे के बिना ही जी लूंगी तो भला क्या फ़र्क पड़ जाएगा?"

"पता नहीं ये क्या अनाप शनाप बोले जा रही है तू??" रेणुका की बुद्धि ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया था, बोली____"मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा? आख़िर ये सब क्या है और तूने दामाद जी की हत्या क्यों की? आख़िर ऐसा उन्होंने क्या कर दिया था तेरे साथ? मुझे सब कुछ अच्छे से बता रूपा। मेरा दिल बहुत बुरी तरह घबराने लगा है।"

अपनी माँ रेणुका की ये बातें सुन कर रूपा कुछ देर तक जाने क्या सोचती रही और फिर जब उसकी माँ ने एक बार फिर उससे वही सब पूछा तो उसने उनकी तरफ देखते हुए एक गहरी सांस ली। रेणुका अपनी बेटी के साथ कमरे में रखी चारपाई पर ही बैठी हुई थी और वो इस वक़्त अपने चेहरे पर अजीब से भाव लिए रूपा को ही देखे जा रही थी। उधर सामने की दीवार को देखते हुए रूपा ने सब कुछ इस तरह से बताना शुरू कर दिया जैसे सामने की उस दीवार पर उसका गुज़रा हुआ कल एकदम से किसी चलचित्र की मानिन्द उसे दिखने लगा हो।

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ऊपर वाला जब मनुष्य की रचना कर के इस धरती पर भेजता है तो हर मनुष्य जन्म के समय एक जैसा ही होता है। हालांकि उनका रंग रूप ज़रूर भिन्न होता है, यानी कोई गोरा रंग ले कर पैदा होता तो कोई सांवला रंग ले कर, लेकिन दोनों रंग रूप के प्राणी में एक ही चीज़ सामान होती है कि वो जन्म के समय अबोध होता है। उसे दुनियां संसार की किसी भी अच्छाई या बुराई का ज्ञान नहीं होता। उसके बाद धीरे धीरे वो बड़ा होता है और माता पिता के साथ साथ बाकी लोगों के भी सहयोग से उसमें बुद्धि का विकास होने लगता है। कहते हैं कि अगर किसी बालक को उसके जन्म से ही अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा मिली होती है तो वो आगे चल कर एक अच्छा इंसान ही बनता है और फिर अपने अच्छे आचरण और अपने अच्छे कर्मों के द्वारा वो अपने माता पिता, कुल-खानदान के साथ साथ दूसरों को भी सुख की अनुभूति कराता है। अपने जीवन के अब तक के सफ़र में मैंने अक्सर ये सोचा है कि क्या लोगों की ये बातें वास्तव में सच होती हैं? यानि क्या सच में ऐसा कोई इंसान जिसे जन्म से ही अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा मिली होती है वो आगे चल कर एक अच्छा इंसान ही बनता है? मेरा ख़याल है कि ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं होता।

ये सच है कि एक अच्छे माता पिता की यही कोशिश रहती है कि वो अपने बालक को अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा दे कर उसे एक अच्छा इंसान बनाए और वो ऐसा करते भी हैं लेकिन अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा मिलने के बावजूद वो बालक एक दिन ऐसा इंसान भी बन जाता है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। यानि अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा वाला इंसान एक दिन बुरी सोच वाला बन जाता है और उस बुरी सोच के साथ वो बुरा कर्म करने लगता है।

ऊपर वाले ने मुझे अगर ऐसा रंग रूप दिया था तो इसमें मेरा क्या दोष था? क्या किसी ऐसे इंसान का इस धरती पर पैदा होना गुनाह है जिसका रंग रूप काला हो और दिखने में वो भद्दा नज़र आता हो? बचपन से ले कर जवानी तक मैं खुद भी अपने ऐसे रंग रूप के लिए ऊपर वाले को दोष दे कर उससे शिकायतें करती थी क्योंकि बचपन से मैंने अपने लिए लोगों के मुख से ऐसी बातें सुनी थी जिससे मेरा दिल दुखता था और अकेले में मैं रोया करती थी। कभी कभी दिल का दर्द जब हद से ज़्यादा बढ़ जाता था तो ज़हन में बस एक ही ख़याल आता था कि ऐसे जीवन को एक पल में समाप्त कर दूं लेकिन हमेशा ये सोच कर रुक जाती थी कि क्या हुआ अगर बाहर के लोग मुझे कुरूपा कहते हैं? मेरे अपने माता पिता और भाई तो मुझे बेहद प्यार करते हैं न। मेरे माता पिता ने तो कभी मेरे रंग रूप के लिए मुझे ताना नहीं मारा। यानि मेरे माता पिता और भाई के प्यार और स्नेह ने मुझे अपने जीवन को कभी समाप्त नहीं करने दिया।

दुनियां में ऐसा कौन है जिसके दिल में किसी तरह की कोई ख़्वाहिश नहीं होती? हर किसी की तरह मेरे भी दिल में ख़्वाहिशें थीं। मेरे भी दिल में अरमान थे और हर लड़की की तरह मैं भी सपने देखती थी। मुझे अच्छी तरह इस बात का एहसास था कि मेरा रंग रूप ऐसा है कि कोई भी सुन्दर लड़का मुझसे शादी करने का सोचेगा भी नहीं लेकिन इसके बावजूद मैं ऐसे ही लड़के के सपने देखती थी, क्योंकि इस पर मेरा कोई ज़ोर नहीं था।

विशेष जी के पिता और मेरे बाबू जी एक दूसरे को सालों से जानते थे। मेरे बाबू जी को भले ही अपनी बेटी इतनी प्यारी थी लेकिन इस यथार्थ सच्चाई का तो उन्हें भी एहसास था कि उनकी बेटी रंग रूप में ऐसी नहीं है जैसे कि हर लड़के को चाह होती है। जब मैं ब्याह के लायक हो गई तो उन्हें मेरे ब्याह की फ़िक्र होने लगी। उन्होंने अपनी तरफ से हर संभव कोशिश की कि कहीं पर मेरा रिश्ता तय हो जाए लेकिन इसे मेरा दुर्भाग्य कहें या कुदरत का षड़यंत्र कि कहीं पर भी मेरा रिश्ता तय नहीं हो पाया। मेरे बाबू जी इस बात से अंदर ही अंदर भले ही चिंतित और परेशान रहने लगे थे लेकिन मेरे सामने कभी वो अपने चेहरे पर चिंता के भाव नहीं लाते थे। शायद वो नहीं चाहते थे कि उनका उतरा हुआ चेहरा देख कर मुझे किसी तरह की तक़लीफ हो। इधर मैं भी इन बातों से अब अंदर ही अंदर दुखी रहने लगी थी।

मुझे अपना ब्याह न होने का दुःख नहीं था क्योंकि अपना ब्याह होने की तो मैंने पहले ही उम्मीद छोड़ दी थी, बल्कि मुझे दुःख तो इस बात का था कि मेरी वजह से मुझे इतना प्यार करने वाले मेरे बाबू जी कितना चिंतित और परेशान रहने लगे हैं। जहां एक तरफ मेरी किस्मत मुझे दुःख दे रही थी तो वहीं दूसरी तरफ मेरे माता पिता और मेरा छोटा भाई मुझे छोटी सी बच्ची समझ कर प्यार से समझाते रहते थे और मैं सिर्फ उनके लिए अपना दुःख दर्द और अपने आंसू पी कर मुस्कुरा उठती थी।

एक दिन मेरे बाबू जी घर आए तो वो बड़ा खुश दिख रहे थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि रूपा बिटिया का रिश्ता एक जगह तय हो गया है। मैं रसोई में शाम के लिए खाना बना रही थी और बाबू जी आँगन में चारपाई पर बैठे माँ से ख़ुशी ख़ुशी सारी बातें बता रहे थे। मैंने सुना कि पास के गांव में कोई सोभनाथ त्रिपाठी हैं जिनके बेटे विशेष से मेरा रिश्ता तय हो गया है। बाबू जी की बातें सुन कर मेरे अंदर किसी भी तरह के एहसास जागृत नहीं हुए थे। होते भी कैसे? मैं तो अब ऐसी मानसिकता में पहुंच चुकी थी जहां पर किसी बात से मुझे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था। माँ के पूछने पर ही बाबू जी से मैंने सुना कि उनका होने वाला दामाद काफी पढ़ा लिखा है और आज कल शहर में किसी नौकरी के लिए चक्कर लगाता रहता है। घर दुवार ज़मीन जायदाद सब ठीक ठाक है और समाज में उनकी अच्छी खासी इज्ज़त भी है। पहले तो माँ को बाबू जी की बातों पर यकीन ही नहीं हो रहा था लेकिन जब बाबू जी ने उन्हें बताया कि अगले महीने की उन्नीस तारीख़ को मेरा ब्याह तय हो गया है तो माँ को यकीन करना ही पड़ा। उसके बाद ब्याह की तैयारियां शुरू हो गईं थी।

देर से ही सही लेकिन अब इस ब्याह के तय हो जाने की बात से मेरे दिल की भी धड़कनें एक अलग ही एहसास के तहत धड़कने लगीं थी। मेरे अंदर के अरमान जो अंदर ही कहीं मर खप से गए थे वो एक बार फिर से अंगड़ाईया लेने लगे थे। मुरझाए हुए चेहरे पर जब खुशियों की बहार के झोंके का स्पर्श हुआ तो जैसे वो एकदम से खिल उठा। हर गुज़रते दिन के साथ मन में तरह तरह की बातें और तरह की कल्पनाएं उभरने लगीं थी। हर रोज़ रात में चारपाई पर लेटी मैं अपने होने वाले पति के बारे में न जाने कैसे कैसे सपने बुनने लगी थी और ये ख़्वाहिश जगाने लगी थी कि जब उनसे मेरा मिलन होगा तब क्या होगा? फिर एकदम से ये ख़याल मुझे बुरी तरह हिला कर रख देता कि क्या मेरे माता पिता और भाई की तरह वो भी मुझे प्यार और स्नेह देंगे? कहीं ऐसा तो नहीं हो जाएगा कि ग़ैरों की तरह वो भी मुझे देख कर मुझसे मुँह फेर लें? इन्हीं ख़यालों में सारी रात जागते हुए गुज़र जाती थी। घर में भले ही ख़ुशी का माहौल छाया हुआ था लेकिन मेरे मन में अब ये ख़याल कुछ ज़्यादा ही घर करने लगा था कि मेरा होने वाला पति कहीं मुझे देख कर मुझे अपनाने से इंकार न कर दे।

ये ख़याल मेरे दिलो दिमाग़ से जा ही नहीं रहा था, जिसकी वजह से कुछ दिन पहले जिस एहसास से मेरा चेहरा खिल उठा था वो फिर से किसी बेचारगी का शिकार होने लगा था। मंदिर में जा कर घंटों पूजा करती और सबसे यही विनती करती कि चाहे भले ही मेरा होने वाला पति मुझे प्यार न करे लेकिन मुझे देखने के बाद वो मुझसे मुँह न फेरे, बल्कि अपने दिल में मेरे लिए थोड़ी सी जगह बना कर मुझे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाए रखे।

Chapter - 02
[ Reality & Punishment ]
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Update - 08
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उस दिन एक तरफ मैं इस बात से खुश थी कि आज मेरा ब्याह होने वाला है तो वहीं दूसरी तरफ अब ये सोच सोच कर मुझे घबराहट सी होने लगी थी कि उस वक़्त क्या होगा जब सुहागरात को मेरा पति मेरा चेहरा देखेगा? अगर मुझे ये पता चल जाता कि दुनियां के किसी कोने में कोई ऐसा प्राणी मौजूद है जो एक पल में किसी को भी सुन्दर बना सकता है तो मैं एक पल की भी देरी किए बिना उस प्राणी के पास पहुंच जाने के लिए दौड़ लगा देती लेकिन, ये तो ऐसी बात थी जिसके बारे में सिर्फ कल्पना ही की जा सकती थी। सच तो ये है कि कुदरत एक बार जिसको जैसा बना के धरती पर भेज देती है वो मरते दम तक वैसा ही रहता है। हालांकि उम्र के साथ उसका जिस्म बूढ़ा होने लगता है लेकिन उसके रंग रूप में कोई बदलाव नहीं आता।

मैंने अक्सर सुना था कि जब किसी का ब्याह होता है तो लड़का लड़की के घर वाले एक दूसरे के घर जा कर लड़का या लड़की को देखते हैं और ये भी सुना था कि आज कल लड़का लड़की खुद भी एक दूसरे को ब्यक्तिगत तौर पर देखते हैं। ये बातें मेरे लिए डर जैसी बन चुकीं थी। हालांकि मेरे बाबू जी ने जहां मेरा रिश्ता तय किया था उन्होंने लड़की देखने या लड़का दिखाने से मना कर दिया था। विशेष के पिता जी को हर तरह से रिश्ता मंजूर था। मैं नहीं जानती थी कि उनका और मेरे बाबू जी के बीच क्या क़रार हुआ था और ना ही मैं ये जानती थी कि विशेष को इस ब्याह के बारे में पहले से उनके पिता जी ने नहीं बताया था। ख़ैर ब्याह हुआ और बड़े ही धूम धाम से हुआ। दुनियां में जो मुझे सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह करते थे उनसे विदा लेते वक़्त मैं दहाड़ें मार मार कर रोई थी। शायद इस एहसास ने मुझे और भी ज़्यादा रुलाया था कि अब शायद कोई भी मुझे मेरे माता पिता और भाई जितना प्यार नहीं देगा। कुदरत ने अगर मुझे सुन्दर रंग रूप से नवाजा होता तो संभव था कि आने वाले समय में मेरा पति मुझे इतना प्यार भी देता कि वो मुझे अपनी पलकों पर बैठा कर रख लेता लेकिन इस रंग रूप का उस पर कैसा असर होगा इसका मुझे बखूबी अंदाज़ा था।

अपने दिलो दिमाग़ में ख़ुशी से ज़्यादा डर घबराहट और दुविधा जैसे भावों को लिए मैं अपने ससुराल आ गई थी। हर पल ऊपर वाले से बस यही दुआ कर रही थी कि वो मुझे ऐसा पल न दिखाए जो मुझे और मेरी ज़िन्दगी को उस एक पल में ही बद से बदतर बना दे।

बड़ी मुश्किल से दिन गुज़रा और फिर रात हुई। आने वाला हर एक पल जैसे मुझे डर और घबराहट को एक नए रूप में पेश करने का आभास करा रहा था। एक लड़की के दिलो दिमाग़ में उस वक़्त जो खुशियां, जो उमंग और जो सपने होते हैं वो न जाने कहां गायब हो गए थे? बल्कि उन सबकी जगह पर सिर्फ एक ही चीज़ ने अपना कब्ज़ा सा जमा लिया था और वो एक चीज़ थी____'डर और घबराहट।'

कमरे में सुहाग सेज पर अपने पति के इंतज़ार में बैठी मैं मन ही मन ऊपर वाले को याद कर रही थी। उस वक़्त डर और घबराहट की वजह से मुझे ये तक ख़याल आ गया था कि मैं उस जगह से भाग कर अपने माता पिता के पास पहुंच जाऊं। क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि आने वाला वक़्त मुझे एक ऐसा दुःख दे दे जो उस वक़्त मेरे लिए असहनीय हो जाए। अब तक इतना कुछ मैंने सह लिया था कि उस हालत में अगर ऐसा वैसा कुछ हो जाता तो मैं बस एक ही ख़्वाहिश रखती कि ये धरती फट जाए और मैं उसमे समां जाऊं। मैं सोचने समझने की हालत में ही नहीं रह गई थी। अगर उस हालत में होती तो मैं ये ज़रूर सोच कर खुद को तसल्ली देती कि दुनियां में अच्छे इंसान भी पाए जाते हैं रूपा जो किसी के रंग रूप से नहीं बल्कि उसकी आत्मा की सुंदरता से प्यार करते हैं और तुझे तो पूरा यकीन है कि तेरी आत्मा बहुत सुन्दर है और तेरे अंदर कोई भी बुराई नहीं है।

उस रात जब विशेष जी कमरे में आए और जब मैंने उनके आने की आहट सुनी तो मेरा समूचा वजूद कांप गया। दिल की धड़कनें ये सोच कर बुरी तरह से धाड़ धाड़ कर के कनपटियों पर बजने लगीं कि अब क्या होगा? अगर उन्होंने मेरा चेहरा देख कर मुझे कुछ उल्टा सीधा कह दिया तो कैसे सहन कर पाऊंगी मैं? औरत लाख कुरूप सही लेकिन किसी के द्वारा अपने ही सामने वो अपनी बुराई या अपना अपमान सहन नहीं कर सकती। ख़ास कर उस वक़्त तो बिल्कुल भी नहीं जिस वक़्त उसकी और उसकी ज़िन्दगी की अहमियत बदल जानी वाली हो। मेरी जगह अगर कोई सुन्दर लड़की होती तो उस वक़्त उसका चेहरा ख़ुशी और उमंगों से भरा हुआ होता और उसके होठों पर शर्मो हया की मुस्कान खिली हुई होती लेकिन मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं था। मैं तो अपने बनाने वाले से बस यही फ़रियाद कर रही थी कि चाहे कुछ भी कर लेना लेकिन मेरी आत्मा को दुखी मत होने देना।

सुहाग सेज पर आँखें बंद किए मैं ऊपर वाले को याद करते हुए उससे फ़रियाद कर रही थी। मेरा घूंघट मेरे सीने तक ढलका हुआ था लेकिन सुर्ख और झीनी साड़ी से मेरा चेहरा साफ़ झलक रहा था। मैं बेड के बीचो बीच एकदम से सिकुड़ी हुई सी बैठी थी। मेरे अंदर की हालत ऐसी हो गई थी कि अगर कोई काटता तो मेरे जिस्म से ज़रा सा भी खून न निकलता।

एक ऐसी घड़ी आ गई थी जिसका हर लड़की को बड़ी शिद्दत से इंतज़ार होता है लेकिन मुझे नहीं था, बल्कि मैं तो यही चाहती थी कि ये घड़ी मेरी किस्मत की लकीरों से ही मिट जाए।

ऐसा इस लिए क्योंकि मैं उस घड़ी के बाद उस हालत में खुद को नहीं पहुंचा देना चाहती थी जिस हालत में मुझे दुनियां का ऐसा दुःख प्राप्त हो जाए जो मेरी अंतरात्मा तक को झकझोर डाले।

विशेष जी कमरे में आए और फिर पलट कर उन्होंने दरवाज़ा बंद कर के अंदर से उसकी कुण्डी लगा दी। उनके आने की आहट को सुन कर ही मेरी हालत बिगड़ने लगी थी। उधर वो अपने होठों पर मुस्कान सजाए और मेरी तरफ देखते हुए बेड की तरफ बढ़ रहे थे। कुछ ही देर में वो बेड के क़रीब आ गए और बेड के किनारे पर ही बैठ ग‌ए। वो मेरे बेहद क़रीब बैठ गए थे लेकिन अपनी पलकें उठा कर उन्हें देख लेने की मुझ में ज़रा भी हिम्मत नहीं हुई थी। बल्कि ये सोच कर मेरे अंदर डर और घबराहट में और भी ज़्यादा इज़ाफ़ा हो गया था कि अब बस कुछ ही पलों में मुझे ऐसा झटका लगेगा जिसे मैं सहन नहीं कर पाऊंगी। मन ही मन एक बार फिर से अपने बनाने वाले को याद किया मैंने और उससे कहा कि मेरी विनती मेरी फ़रियाद को ठुकरा न देना। बस ये समझ लीजिए कि मेरी ज़िन्दगी और मौत आपके ही हाथों में है।

मैं ऊपर वाले को याद करते हुए उनसे ये सब कह ही रही थी कि तभी विशेष जी ने अपने हाथों को बढ़ा कर मेरा घूंघट पकड़ा और उसे बहुत ही आहिस्ता से उठाते हुए कुछ ही पलों में मेरा चेहरा बेपर्दा कर दिया। जैसे ही मेरा चेहरा बेपर्दा हुआ तो मुझे ऐसा लगा जैसे संसार की हर चीज़ अपनी जगह पर रुक गई हो। मुझे एकदम से महसूस हुआ जैसे मेरे दिल की धड़कनों ने धड़कना ही बंद कर दिया हो। मेरा चेहरा झुका हुआ था और मेरी आँखें बंद थीं। मेरे अंदर उस वक़्त अगर कुछ चल रहा था तो वो सिर्फ अपने बनाने वाले को याद करना और उनसे इस पल के लिए ऐसी दुआ करना जो मेरे आत्मा को छलनी छलनी होने से बचा ले।

मैं उस वक़्त एकदम से चौंकी जब मेरा घूंघट वापस अपनी जगह पर पहुंच गया और विशेष जी एक झटके में बेड से उठ कर खड़े हो ग‌ए। मेरी जान जैसे मेरे हलक में ही आ कर फंस गई थी। मैंने बहुत हिम्मत कर के अपना सिर उठाया और बड़ी मुश्किल से अपनी पलकों को खोल कर उनकी तरफ देखा। उनके चेहरे पर उभरे हुए भावों को देख कर मुझे समझने में ज़रा भी देरी नहीं हुई कि मुझे बनाने वाले ने मेरी फ़रियादों को ठुकरा दिया है। मुझे समझते देर नहीं लगी कि उसने मुझ पर ज़रा भी रहम नहीं किया और फिर अगले कुछ ही पलों में जैसे मेरे ऊपर ही नहीं बल्कि मेरी अन्तरात्मा में भी आसमानी बिजलियां गिरती चली गईं।

"नहीं नहीं, ये नहीं हो सकता।" चेहरे पर नफ़रत और घृणा के भाव लिए विशेष जी अजीब सी आवाज़ में कह उठे____"तुम मेरी बीवी नहीं हो सकती। ऐसे रंग रूप की औरत मेरी बीवी हो ही नहीं सकती। मेरे साथ इतना बड़ा धोखा नहीं हो सकता और ना ही मुझसे जुड़ी हुई कोई चीज़ ऐसी हो सकती है।

"

कहने के साथ ही विशेष जी एक झटके से पलट कर कमरे के दरवाज़े की तरफ जाने ही लगे थे कि मैंने बड़ी मुश्किल से उन्हें रुक जाने के लिए जैसे विनती सी की और वो रुक भी गए लेकिन_____"अगर तुम मुझे किसी तरह की सफाई देने वाली हो या ये समझती हो कि मैं तुम्हें अपनी बीवी मान कर तुम्हारे साथ सुहागरात मनाऊंगा तो भूल जाओ। मैं अपने जीवन में तुम जैसी रंग रूप वाली बीवी को कुबूल ही नहीं कर सकता, तुम्हारे साथ जीवन में आगे बढ़ने की तो बात ही दूर है। मेरी एक बात कान खोल कर सुन लो। तुम इस घर की बहू तो हो सकती हो लेकिन मेरी बीवी कभी नहीं हो सकती।"

आख़िर वही हो गया था जिसके बारे में सोच सोच कर मैं इतने समय से डरती आ रही थी। जिसकी मैंने इतनी इबादत की थी और जिस बनाने वाले से मैंने इतनी मिन्नतें की थी उसने मेरी इबादत और मेरी फ़रियाद का ये सिला दिया था। उस वक़्त मेरे अंदर दुःख तक़लीफ और गुस्से का ऐसा ज्वालामुखी फट पड़ा था कि मन किया कि सारी दुनियां को आग लगा दूं और फिर खुद भी उसी आग में कूद कर खुद ख़ुशी कर लूं। विशेष जी ने जो कुछ कहा था उन बातों का इतना दुःख नहीं हुआ था जितना अपने बनाने वाले के द्वारा अपनी फ़रियाद ठुकरा देने का हुआ था। लोगों ने तो बचपन से ले कर अब तक मुझे अपनी बातों से न जाने कितने ही दुःख दिए थे। इतना तो मैं भी समझ चुकी थी कि इंसान कभी भी दूसरे इंसान के बारे में अच्छा नहीं सोचता लेकिन बनाने वाला??? उसने मेरे बारे में अच्छा क्यों नहीं सोचा? उस वक़्त से मेरे लिए जैसे मेरा बनाने वाला मर गया।

विशेष जी के जाने के बाद कमरे में मैं अकेली ही रह गई थी। सारी रात रोते कलपते हुए गुज़र ग‌ई। ज़हन में बचपन से ले कर अब तक की सारी बातें, सारे दृश्य गूँज जाते और मैं उनके बारे में सोच कर फिर से बिलख बिलख कर रोने लगती। रह रह कर माँ बाबू जी का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम जाता और फिर मन करता कि भाग कर उनके पास पहुंच जाऊं और उनके सीने से लिपट खूब रोऊं। मेरे दुःख का कोई पारावार नहीं था। रह रह कर बस एक ही ख़याल आता कि फ़ांसी लगा कर खुद ख़ुशी कर लूं लेकिन हाय री मेरी किस्मत कि वो भी नहीं कर सकी। रात ऐसे ही रोते कलपते हुए गुज़र ग‌ई। मेरी ज़िन्दगी का सूरज जैसे हमेशा के लिए ही डूब चुका था, जिसकी न तो कोई सहर थी और ना ही कोई ख़ासियत।

रात पता नहीं कब मेरी आँख लग गई थी लेकिन इतना ज़रूर एहसास हुआ था कि मुझे सोए हुए ज़्यादा समय नहीं हुआ था क्योंकि मेरी आँखों से बहे हुए आंसू ठीक से सूखे नहीं थे। मैं उस वक़्त अचानक से हड़बड़ा कर उठ बैठी थी जब मेरे कानों में बाहर से माँ जी और विशेष जी के चिल्लाने की आवाज़ें पड़ीं थी। मस्तिष्क जैसे ही जागृत हुआ तो मुझे पिछली रात का सब कुछ याद आता चला गया और उस सब को याद करते ही मेरे चेहरे पर जैसे ज़माने भर का दुःख दर्द आ कर ठहर गया।

कमरे के बाहर माँ बेटे ऊँची आवाज़ में चिल्ला चिल्ला कर जाने क्या क्या बोलते जा रहे थे। मुझ में ज़रा भी हिम्मत न हुई कि मैं बेड से उतर कर कमरे से बाहर जाऊं। समझ में ही नहीं आ रहा था कि अब कौन सा मुँह ले कर उस इंसान के सामने जाऊं जिसको मेरी कुरूपता को देख कर पलक झपकते ही मुझसे नफ़रत हो गई थी।

कमरे के बाहर हो रही माँ बेटे के बीच की बातों ने मुझे अजीब ही स्थिति में ला दिया था। माँ जी अपने बेटे को डांटते हुए कह रहीं थी कि उन्हें अपने पिता जी पर गुस्सा करने की या उन्हें बातें सुनाने का कोई हक़ नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपने बेटे साथ इतना भी ग़लत नहीं कर दिया है। माँ जी कहना था कि शादी ब्याह जीवन मरण सब ऊपर वाले के लिखे अनुसार ही होता है इस लिए जो हो गया है उसको ख़ुशी ख़ुशी अपना कर बहू के साथ अपने जीवन को आगे बढ़ाओ। बहू थोड़ी रंग रूप में सांवली ज़रूर है लेकिन उसमें उससे कहीं ज़्यादा गुण मौजूद हैं। माँ जी की इन बातों पर विशेष जी और भी ज़्यादा गुस्सा हो रहे थे। शायद पिता जी घर पर नहीं थे क्योंकि माँ जी के अनुसार विशेष जी इतना चिल्ला चिल्ला कर उनसे ऐसी बातें नहीं कर सकते थे। ख़ैर कुछ देर बाद शान्ति छा गई।

उस दिन जब पिता जी घर आए थे तो उन्होंने भी विशेष जी से यही कहा और उन्हें समझाया था कि विधि के विधान में यही होना लिखा था इस लिए अब इस पर इतना ज़्यादा नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं। पिता जी ने उन्हें धमकी देते हुए ये भी कहा था कि अगर उन्होंने मुझे अपनाने से इंकार किया तो वो उन्हें अपनी हर चीज़ से बेदखल कर देंगे। पिता जी की धमकी और उनके ख़ौफ की वजह से विशेष जी चुप तो हो गए थे लेकिन उन्होंने पिता जी की बात मान कर मुझसे सम्बन्ध रखना हर्गिज़ गवारा नहीं किया था। धीरे धीरे ऐसे ही दिन गुज़रने लगे। विशेष जी मुझसे कोई मतलब नहीं रखते थे और ना ही मेरी तरफ देखना पसंद करते थे। उनके इस रवैए से मैं दुखी तो थी लेकिन अपने मुख से कुछ कहने की मुझ में कोई हिम्मत नहीं होती थी। माँ जी और पिता जी हर रोज़ उन्हें डांटते धमकाते लेकिन वो चुप चाप सुनते और चले जाते थे।

शादी के बाद मैं बीस दिन ससुराल में रही थी उसके बाद मेरे बाबू जी मुझे लिवा ले गए थे। अपने माँ बाबू जी के घर आई तो मेरे अंदर जो इतने दिनों का गुबार भरा हुआ था वो फूट फूट कर आंसुओं के रास्ते निकलने लगा था। अपने माँ बाबू जी से लिपट कर मैं ऐसे रो रही थी कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी। पूछने पर मैंने उन्हें सारा हाल सुना दिया था।

मेरी बातें सुन कर उन्हें भी बेहद दुःख हुआ लेकिन कदाचित मेरे माँ बाबू जी को पहले से ही ये एहसास था कि ऐसा ही कुछ होगा लेकिन इस पर भला उनका ज़ोर कैसे चल सकता था?

जब तक ब्याह नहीं हुआ था तब तक तो ये सोच कर मैं किसी तरह खुद को दिलासा दे लेती थी कि चाहे लाख दुःख था मुझे लेकिन कम से कम अपने उन माँ बाबू जी के पास तो थी जो मुझे बेहद प्यार करते थे लेकिन अब तो ब्याह के बाद उनका साथ और उनका प्यार भी छूट गया था। जिसके साथ मुझे अपना पूरा जीवन गुज़ारना था उसने तो मुझे अपनी पत्नी मानने से ही इंकार कर दिया था, अपने साथ रखने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। मेरे दुःख दर्द में जैसे एक ये दुःख भी शामिल हो गया था। ज़िन्दगी बोझ सी बन गई थी जिसे मैं ज़बरदस्ती ढो रही थी, सिर्फ अपने माँ बाबू जी और अपने भाई के प्यार को देख कर।

मेरे माँ बाबू जी को अच्छी तरह एहसास था कि जो दुःख दर्द मेरे ज़िन्दगी में शामिल थे उनकी वजह से हो सकता है कि किसी दिन मैं तंग आ कर खुद को ही ना ख़त्म कर लूं इस लिए वो हमेशा मेरे पास ही रहते थे और घंटों मुझे समझाते रहते थे। उनका कहना था कि बेटा हर किसी के जीवन में दुःख दर्द का वक़्त आता है लेकिन ये दुःख दर्द हमेशा के लिए नहीं रहता। एक दिन दुःख दर्द के दिन भी चले जाते हैं और फिर इंसान के जीवन में खुशियों वाला समय आ जाता है। आज भले ही मेरे जीवन में ऐसे दुःख और ऐसी तक़लीफें हैं लेकिन एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब मेरा पति मुझे अपनी पत्नी भी मान लेगा और मुझे अपना भी लेगा।

मां बाबू जी की इन बातों से मेरे अंदर फिर से एक उम्मीद की किरण जाग उठी थी। वक़्त ऐसे ही गुज़रता रहा। कुछ समय बाद मैं फिर से ससुराल आई लेकिन इस बार ससुराल में मुझे विशेष जी नज़र नहीं आए। माँ जी से पता चला कि वो शहर चले गए हैं और वहीं रह कर नौकरी करते हैं। इस बात से मुझे थोड़ी तक़लीफ तो हुई लेकिन क्या कर सकती थी? घर में रहते हुए माँ पिता जी की सेवा करती और एक ऐसी बहू बनने की कोशिश करने लगी थी जिसमें किसी भी तरह का दोष न हो। अक्सर सोचती थी कि शायद बनाने वाला मेरे इस सेवा कर्म से प्रसन्न हो कर मेरे दुखों को समाप्त करने के बारे में सोच ले।

अपने कर्म में मैं इतना खो गई थी कि मुझे खुद ही कभी ये एहसास न हुआ था कि मैं चलती फिरती एक ऐसी मशीन बन गई थी जो बिना कुछ बोले सिर्फ काम ही करती रहती थी। माँ जी और पिता जी जो भी कह देते मैं बिना कुछ कहे और बिना कुछ सोचे वो करने लगती थी। इस बीच न जाने कितनी ही बार मेरे मायके से मेरे बाबू जी और मेरा भाई मुझे लेने आए किन्तु मैं उनसे मिल तो लेती थी लेकिन उनके साथ अपने मायके नहीं जाती थी। मैंने जैसे प्रण कर लिया था कि अब यही मेरा घर है, यही मेरी दुनियां है और यहीं पर मेरा सुख दुःख है जिसे भोगते हुए एक दिन मुझे इस दुनियां से चले जाना है।

सुबह पांच बजे से ले कर रात दस बजे तक मैं घर के कामों में लगी रहती और फिर बिस्तर पर एक ज़िंदा लाश की तरह लेट जाती। अगर कभी नींद ने आँखों पर रहम किया तो सो जाती वरना सारी रात ऐसे ही जागती रहती। ज़हन में सारी रात ऐसी ऐसी बातें चलती रहती थीं जिनका ना तो कोई मतलब होता था और ना ही उनसे कोई फ़र्क पड़ता था, किन्तु हां उन सबकी वजह से आंखों से आंसू ज़रूर छलक पड़ते थे। विशेष जी घर से एक बार शहर क्या गए वो तो सालों तक लौट कर घर ही नहीं आए लेकिन मेरे अंदर हमेशा उम्मीद बरक़रार रही।

दो साल ऐसे ही गुज़र गए। माँ जी और पिता जी मुझे अपनी बेटी की तरह चाहते थे। उन्हें भी मेरे दुखों का एहसास था लेकिन अपने बेटे पर उनका कोई ज़ोर नहीं रह गया था और ना ही मेरी किस्मत को बदल देने की उनमें क्षमता थी। इन दो सालों में हालात ऐसे हो गए थे कि अब वो भी मेरे लिए दुखी रहने लगे थे। गांव समाज में लोगों के बीच तरह तरह की बातें होने लगीं थी जिससे हम सबके जीवन में बुरा असर होने लगा था। विशेष जी को तो जैसे इन सब से कोई मतलब ही नहीं था। एक दिन इस सबकी वजह से तंग आ कर बाबू जी ने फ़ैसला किया कि अब वो अपने बेटे को शहर से वापस घर ले कर ही आएंगे और उन्हें इस बात के लिए मजबूर करेंगे कि वो मुझे अपनी पत्नी के रूप में अपना ले। बाबू जी गांव के ही अपने किसी जान पहचान वाले को ले कर शहर चले गए थे। आख़िर बड़ी मुश्किल से पता करते हुए वो विशेष जी के पास पहुंच ही गए और उन्हें ले कर घर आ गए थे।

विशेष जी दो साल बाद घर आए थे। उन्हें दूर से और छुप कर देख कर दिल को सुकून तो मिला था लेकिन उनसे कुछ कहने की मुझ में अब भी कोई हिम्मत नहीं थी और वैसे भी मैं खुद उनसे किसी बात की पहल कैसे कर सकती थी जिन्होंने खुद ही मुझे हर तरह से त्याग दिया था? उनके आने से घर में एक बार फिर से शोर शराबा होने लगा था। हर रोज़ पिता जी उनसे मुझे अपना लेने की बातें कहते, यहाँ तक कि उन्होंने ये भी कुबूल किया कि उनसे ये ग़लती हुई थी कि उन्होंने उनसे पूछ कर उनका रिश्ता तय नहीं किया था या धन के लालच में आ कर उन्होंने उनका ब्याह एक ऐसी लड़की से कर दिया था जो दिखने में सुन्दर नहीं थी। पिता जी की बातों से विशेष जी पर कोई असर नहीं पड़ा था। उन्होंने साफ़ कह दिया था कि उनका मुझसे कोई मतलब नहीं है। उनकी ये बातें किसी नस्तर की तरह मेरे दिल को चीर जाती थीं। मेरा रंग रूप जैसे मेरा सबसे बड़ा दुश्मन बना हुआ था जो मुझे एक पल की भी ख़ुशी नहीं दे सकता था।

अकेले में अक्सर सोचती थी कि एक बार विशेष जी से बात करूं और उनसे विनती करूं कि वो अपने जीवन में मेरे लिए थोड़ी सी जगह बना कर मुझे अपना लें लेकिन फिर ये ख़याल आ जाता कि अगर उन्होंने मुझे कुछ उल्टा सीधा कह दिया तो मैं कैसे सहन कर पाऊंगी? इससे अच्छा तो यही है कि मैं घुट घुट के ही इस दर्द रुपी ज़हर को पीते हुए पल पल मरती रहूं। ख़ैर विशेष जी घर में एक हप्ता रुके और फिर वो वापस शहर चले गए।

कभी कभी मेरे मन में ये ख़याल भी आ जाता था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्होंने शहर में किसी सुन्दर लड़की से ब्याह कर लिया हो और हम में से किसी को इस बात का पता ही न हो। ये ख़याल मन में आता तो दिल में एक टीस सी उभरती लेकिन इस पर भी तो मेरा कोई ज़ोर नहीं था। मेरी किस्मत में तो जैसे दुःख दर्द में मरना ही लिख गया था।

दर्द और तक़लीफ क्या होती है? किसी के लिए तिल तिल कर मरना क्या होता है? सब कुछ होते हुए भी कुछ भी न होने का एहसास कैसा होता है? ख़ामोशी किसे कहते हैं? जलती हुई ख़्वाहिशें कैसी होती हैं? टूटती हुई उम्मीदें और झुलसते हुए अरमान कैसे होते हैं? जैसे इन सबका एक उदाहरण या ये कहें कि इन सबका जवाब बन गई थी मैं।

मैं चाहती तो एक झटके में विशेष जी को इस सबके लिए कानूनन सज़ा दिलवा सकती थी या उन्हें इस बात के लिए मजबूर कर सकती थी कि वो मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें लेकिन इस बारे में मैंने कभी सोचा ही नहीं। वैसे भी कानून का सहारा ले कर मैं अगर उनकी पत्नी बन भी जाती या वो मुझे स्वीकार भी कर लेते तो उससे होता क्या? उस सूरत में भी तो वो मेरे न होते। जिसके दिल में मेरे प्रति नफ़रत के सिवा कोई जज़्बात ही नहीं थे उसको किसी बात से मजबूर करने का मैं सोच भी कैसे सकती थी? मैं अभागन तो इतने पर भी खुश हो जाने को तैयार थी कि एक बार वो सपने में ही मुझे अपनी पत्नी स्वीकार कर लें लेकिन फूटी किस्मत कि ऐसे सपने भी मेरी पलकों को नसीब नहीं थे।

कहने को तो इस सबको चार साल गुज़र गए थे लेकिन इन चार सालों में न जाने कितनी ही बार मर मर कर ज़िंदा हो चुकी थी मैं। मेरे लिए आज भी वक़्त वही था जो पहले था। मेरे दुःख दर्द आज भी वही थे और वैसे ही थे जो हमेशा से ही थे लेकिन हाँ इतना फ़र्क ज़रूर आ गया था कि अब इन तक़लीफों को सहने की मुझमें क्षमता बढ़ गई थी। मैं एक ऐसी मनोदशा में पहुंच गई थी जिसके अंदर भभकता हुआ ग़ुबार किसी भयंकर ज्वालामुखी जैसा रूप ले चुका था और वो ग़ुबार बड़ी ही शिद्दत से फट पड़ने को बेक़रार था।

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Chapter - 02
[ Reality & Punishment ]
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Update - 09
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वक़्त कभी भी एक जैसा नहीं रहता और ना ही वो किसी के रोके से रुक सकता है।

जो समझदार होते हैं वो वक़्त के साथ ही चलते हैं और जो अपनी अकड़ में रहते हैं या जो समय पर किसी चीज़ से समझौता नहीं करते उन्हें ये वक़्त या तो पीछे छोड़ देता है या फिर ऐसी ठोकर लगा देता है कि इंसान चाह कर भी सम्हल नहीं पाता। विशेष जी के ऐसे रवैये से इन चार सालों में बहुत कुछ बदल गया था। जिस पिता का गांव समाज में अच्छा ख़ासा रुतबा था वो पूरी तरह से खो गया था। जिनके बारे में पहले लोग दबी हुई जुबान में तरह तरह की बातें करते थे वो लोग गुज़रते समय के साथ उनके मुख पर ही करने लगे थे जिसका असर ये हुआ कि उनका गांव समाज में लोगों के बीच उठना बैठना मुश्किल पड़ गया। वो ये तो स्वीकार कर चुके थे कि धन के लालच में आ कर उन्होंने अपने बेटे का ब्याह एक ऐसी लड़की से कर दिया था जिसे दुनियां का कोई भी सुन्दर लड़का अपनी बीवी बनाने का सोच भी नहीं सकता था लेकिन ग़लती स्वीकार कर लेने के बाद भी अगर कोई उन्हें माफ़ न करे या उनके अंदर पैदा हो चुके दुखों के बारे में न सोचे वो तो हद दर्ज़े का ग़लत इंसान ही कहलाएगा।

मां और पिता जी इस सबकी वजह से बीमार पड़ गए थे। ज़ाहिर है कोई भी ऐसा ब्यक्ति बीमार ही पड़ जाएगा जो हर पल यही सोच सोच कर दुखी होता हो कि अब उसके वंश का क्या होगा और गांव समाज में जो इज्ज़त उन्होंने कमाई थी वो सब उनके बेटे की वजह से ख़ाक में मिल चुकी है। कोई भले ही जिस्म पर चार लाठियां मार ले उससे उतनी तक़लीफ नहीं होगी लेकिन लोगों की बातें ऐसी मार करती हैं जो सीधा इंसान की आत्मा को ही तक़लीफ देती हैं और उसका दर्द असहनीय होता है। ऐसी असहनीय तक़लीफ तो मुझे भी थी लेकिन मैंने अपनी तक़लीफ को जज़्ब करना जाने कब का सीख लिया था। लोग मेरे बारे में अक्सर यही कहते थे कि ये किस मिट्टी की बनी है जो इतना कुछ होने के बाद भी जीवित है? मेरी जगह कोई दूसरी औरत होती तो इतना अपमान और इतना दुःख सहन ही नहीं कर पाती और यकीनन एक दिन खुद ख़ुशी कर लेती लेकिन मैं इस सबके बावजूद ज़िंदा थी। कदाचित ये देखने के लिए कि मेरा बनाने वाला मेरे साहस और धैर्य की परीक्षा लेते हुए मुझे कितना दुःख देता है?

मैं पूरे मन से अपने सास ससुर की सेवा कर रही थी। यहाँ तक कि मैंने कभी उन्हें ये नहीं दिखाया कि मैं भी एक इंसान हूं और मुझे भी कभी कोई न कोई बिमारी हो सकती है। मैं हमेशा ख़ामोश ही रहती थी और मेरा ज़हन चौबीसों घंटे जैसे एक ज़िद किए हुए था कि चाहे जो हो जाए मुझे किसी भी चीज़ से हार नहीं मानना है। दुनियां की चाहे जैसी भी तक़लीफ मुझे दर्द देने आ जाए लेकिन मैं उसे ख़ुशी से स्वीकार कर के जज़्ब कर लूंगी।

मां पिता जी की तबीयत जब ज़्यादा ही ख़राब हो गई तो उनके एक पहचान वाले ने विशेष जी को ख़बर भेजवा कर उन्हें बता दिया कि उनके माता पिता की बहुत ज़्यादा तबीयत ख़राब है इस लिए अगर उनके दिल में ज़रा सा भी अपने माता पिता के प्रति लगाव बाकी है तो वो घर आ जाए। इस ख़बर के दूसरे दिन ही विशेष जी शहर से आ गए थे। वो माँ पिता जी का इलाज़ करवाने के लिए उन्हें जिले के अच्छे हॉस्पिटल में ले गए। मैं ये मानती हूं कि विशेष जी ने अपने माता पिता के इलाज़ में कोई कसर नहीं छोड़ी थी लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इसके बावजूद माँ और पिता जी की सेहत पर कोई सुधार नहीं हो रहा था। यहाँ तक कि एक दिन डॉक्टर ने विशेष जी से ये भी कह दिया कि वो माँ और पिता जी को घर ले जाएं।

कहते हैं कि जो भी इंसान इस धरती पर पैदा होता है वो अपनी एक निश्चित आयु ले कर ही इस धरती पर पैदा होता है। इंसान का जब इस धरती पर रहने का समय समाप्त हो जाता है तो दुनियां का कोई भी डॉक्टर या दुनियां की कोई भी दवा उसे बचा कर उसे जीवन नहीं दे सकती। माँ और पिता जी का आख़िरी वक़्त आ गया था। चार साल से जिनकी पूरे मन से सेवा करती आ रही थी वो भी अब मुझे छोड़ कर चले जाने को तैयार थे। इन चार सालों में मैं कभी अपने मायके अपने माँ बाबू जी के घर नहीं गई थी। मेरे लिए मेरे सास ससुर ही मेरे माँ बाबू जी थे और वो मुझे अपनी बेटी मान कर ही मुझे स्नेह और प्यार देते थे। उन्हें भले ही इस बात का रंज़ था कि उन्होंने अपने बेटे की शादी मुझसे कर के अच्छा नहीं किया था लेकिन उस रंज़ से ज़्यादा उन्हें इस बात की ख़ुशी थी कि उन्हें मेरे जैसी गुणवान बहू मिली थी जिसने इन चार सालों में कभी भी उन्हें अपनी तक़लीफें नहीं दिखाई बल्कि अपनी क्षमता से भी ज़्यादा उनकी सेवा करते हुए घर को सम्हाला था। वो अक्सर माँ जी से कहते थे कि इतनी अच्छी औरत को ऊपर वाला इतना दुःख कैसे दे सकता है? ये एक ऐसा सवाल था जो शायद गांव के हर प्राणी के ज़हन में गूंजता था।

अपने आख़िरी वक़्त में माँ और पिता जी ने मेरे सामने ही विशेष जी से कहा था कि उनके जाने के बाद मेरा इस दुनियां में कोई सहारा नहीं होगा इस लिए अगर उनके दिल में मेरे प्रति ज़रा सा भी रहम या दया भाव है तो वो मुझे अपना लें और जहां भी रहें मुझे अपने साथ ही रखें। उस दिन मैं फूट फूट कर रो रही थी। मेरे लिए वो दोनों प्राणी ऐसे थे जिन्होंने मेरे माँ बाबू जी और भाई के जैसा ही स्नेह और प्यार दिया था। माँ जी ने कभी भी मेरी कुरूपता को ले कर मुझे ताना नहीं मारा था बल्कि हमेशा मुझे बेटी कहते हुए मुझे खुश रखने का ही प्रयास किया था और सच तो ये है कि ये उन दोनों का स्नेह और प्यार ही था जिसके सहारे मैं अब तक जीवित थी।

मां और पिता जी दुनियां से चले गए। उनके जाते ही जैसे मेरी तरह वो घर भी खामोश हो गया था।

विशेष जी ने बड़े अच्छे तरीके से उनके जाने के बाद सारी क्रियाएं की थीं और फिर एक दिन उन्होंने मुझसे पहली बार बात करते हुए शहर चलने को कहा। मेरे अंदर उनसे कहने के लिए तो बहुत कुछ था लेकिन फिर ये सोच कर ज़्यादा कुछ नहीं कहा कि उस इंसान से कुछ कहने का क्या फ़ायदा जिसने कभी एक पल के लिए भी ये न सोचा हो कि इतने सालों से मैंने क्या कुछ सहा होगा और उनके इस तरह त्याग देने से मैं कैसे हर रोज़ हर पल तिल तिल कर मरती रही होऊंगी? ये मेरा गुनाह नहीं था कि मैं कुरूप थी, बल्कि ये बनाने वाले का गुनाह था कि उसने मुझे कुरूप बनाया था, वरना मेरे माता पिता और भाई तो सुन्दर ही थे। ख़ैर विशेष जी ने जब मुझसे शहर चलने के लिए कहा तो लाख रोकने के बावजूद मेरे अंदर का थोड़ा सा गुबार निकल ही गया। मैंने सपाट लहजे में उनसे कहा था कि मुझे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है। जब पिछले चार सालों से मैं उनके सहारे के बिना जीती आई थी तो आगे भी उनके सहारे के बिना अपना ये जीवन गुज़ार ही लूंगी। विशेष जी को शायद मुझसे ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी इस लिए कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे थे उसके बाद उन्होंने जैसे फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि अगले दिन की टिकट बनी हुई है इस लिए अपनी तैयारी कर लेना।

माना कि मुझ में इतनी क्षमता थी और इतना साहस था कि मैं उनके सहारे के बिना अपना बाकी का जीवन उस घर में गुज़ार सकती थी लेकिन दिल के किसी हिस्से में ये चाहत उस वक़्त भी मौजूद थी कि अपने इस जीवन में कम से कम एक बार मुझे अपने पति का साथ तो मिल ही जाए। फिर भले ही चाहे ऊपर वाला मेरे प्राण ले ले। अगले दिन विशेष जी के साथ मैं शहर जाने के लिए तैयार थी। मेरे बाबू जी और मेरा छोटा भाई उस दिन घर आये हुए थे। वो दोनों ये देख कर बड़ा खुश हुए थे कि आख़िर वो दिन आ ही गया जब मेरे पति ने मुझे अपना लिया था और अब वो मुझे अपने साथ शहर ले जा रहे थे। उन दोनों की आँखों से ख़ुशी के आंसू छलक पड़े थे। मेरे बाबू जी ने विशेष जी के सामने हाथ जोड़ कर बस इतना ही कहा था कि दामाद जी मेरी बेटी ने अब तक बहुत दुःख सहे हैं इस लिए अब इसे ऐसे दिन दुबारा न दिखाइएगा, बल्कि इसे इतना प्यार और इतनी ख़ुशी देना कि ये अपने अब तक के सारे दुःख दर्द भूल जाए।

उस दिन अपने बाबू जी और भाई से लिपट कर मैं इतना रो रही थी जैसे असल में मैं उस दिन ही ब्याह के बाद उनसे विदा हो रही थी। वो दोनों खुद भी रो रहे थे। उसके बाद ढेर सारा प्यार और ढेर साड़ी दुआएं ले कर मैं विशेष जी के साथ शहर चल पड़ी थी। मेरे अंदर जो सपने, जो ख़्वाहिशें और जो अरमान कहीं मर खप से गए थे वो एक बार फिर से जैसे ज़िंदा होने होने लगे थे। किसी उजड़े हुए चमन की तरह मेरा जो जीवन वीरान हुआ पड़ा था उसमें जैसे बहार की हवा लगती महसूस होने लगी थी।

भला मैं ये कैसे सोच सकती थी कि विशेष जी के साथ आगे का मेरा सफ़र मुझे कौन सी मंज़िल की तरफ ले जाने वाला था?

ट्रेन के सफ़र में हमारे बीच कोई बात नहीं हुई। हालांकि मैं यही उम्मीद कर रही थी कि शायद विशेष जी मुझसे कुछ कहेंगे लेकिन मेरी उम्मीद के विपरीत उन्होंने कुछ कहने की तो बात दूर बल्कि मेरी तरफ देखा तक नहीं था। ऐसा लगा था जैसे मुझे अपने साथ ले जाना उनकी मजबूरी थी। ख़ैर मैंने भी उनसे कुछ नहीं कहा, मेरे लिए तो यही काफी था कि वर्षों बाद आज मैं अपने पति के साथ जीवन का कोई सफ़र कर रही थी। दूसरे दिन हम शहर पहुंच गए। शहर की चकाचौंध देख कर एक बार को तो मैं भौचक्की सी रह गई थी लेकिन फिर जैसे मैंने किसी तरह खुद को सम्हाल लिया था।

शहर में विशेष जी मुझे ले कर अपने फ्लैट में आ गए थे। मेरे मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे। कुछ ऐसे भी ख़याल थे जो मेरे चेहरे को लाज और शर्म की वजह से सुर्ख कर देते थे। मैंने महसूस किया था कि मेरे अंदर अचानक से ही कुछ चीज़ें बड़ी तेज़ी से उछल कूद कर रहीं थी। ऐसा लगता था जैसे उन्हें किसी बात से बेहद ख़ुशी हो रही थी लेकिन, मेरे अंदर की हर चीज़ को उस वक़्त झटका लगा जब विशेष जी ने कहा कि वो मुझे शहर में ले कर ज़रूर आए हैं लेकिन मुझसे उनका अब भी कोई मतलब नहीं है। यानि वो आज भी मुझे अपनी बीवी नहीं मानते हैं। उस वक़्त दिल तो किया था कि खिड़की से कूद कर अपनी जान दे दूं लेकिन फिर अपने अंदर के इन ख़यालों को किसी तरह ये सोच कर दबा लिया था कि शायद साथ रहने से एक दिन वो वक़्त भी आ जाए जब उनके अंदर भी मेरे प्रति कोई एहसास जागृत हो जाए।

शहर में एक ही फ्लैट में दो अलग अलग कमरों में रहने से ज़िन्दगी बड़ी अजीब सी लगने लगी थी। कहने को तो हम दो इंसान उस घर में रहते थे लेकिन दोनों ही एक दूसरे के लिए अजनबी थे। उन्होंने शुरू में ही कह दिया था कि उन्हें मुझसे कोई मतलब नहीं है और वो चाहते हैं कि मैं भी उनसे कोई मतलब न रखूं। बाकी जीवन जीने के लिए जो ज़रूरी है उसमें वो कभी कोई कमी नहीं करेंगे और आगे चल कर ऐसा भी होने लगा था। एक झटके में वो उमंगें और वो ख़ुशी चकनाचूर हो गई थी जो शहर आते वक़्त रास्ते में जागृत हो गई थी। ऐसा लगा कि कुछ देर के लिए नींद आ गई थी और आँखों ने कुछ पल के लिए कुछ ऐसे ख़्वाब देख लिए थे जो उन्हें नहीं देखना चाहिए था। दिल में बड़ा तेज़ दर्द उठा और उसने एक बार फिर से मेरी अंतरात्मा तक को झकझोर कर रख दिया। अकेले कमरे में एक बार फिर से वही कहानी दोहराई जाने लगी जो पिछले चार सालों से गांव में दोहराई जा रही थी। ज़हन में अपने बनाने वाले से बस एक ही सवाल उभरता कि अभी और कितने दुःख दोगे मुझे?

विशेष जी के साथ शहर आए हुए मुझे छह महीने होने वाले थे। इन छह महीनों में मैंने एक बार फिर से खुद को ब्यवस्थित कर लिया था।

विशेष जी अपने कपड़े वग़ैरा खुद ही धो लेते थे। उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं उनके कपड़े धुल दूं। उनसे जितना हो सकता था वो अपने काम ख़ुद ही कर लेते थे लेकिन एक चीज़ अजीब थी कि वो मेरा बनाया हुआ खाना बिना कुछ कहे खा लेते थे। अगर हमें एक दूसरे कुछ कहना होता था तो हम एक दूसरे को कागज़ में लिख कर पर्ची छोड़ देते थे। पर्ची का ये नियम उन्होंने ही शुरू किया था। मैं ये तो मानती थी कि उन्हें मुझसे कोई मतलब नहीं था लेकिन ये भी समझती थी कि इस सबके बावजूद उनकी नज़र में मेरी कुछ तो अहमियत थी ही। अगर नहीं होती तो वो मेरे हाथ का बनाया हुआ खाना भी नहीं खाते। शायद यही वजह थी कि मेरे मन में अभी भी एक उम्मीद बनी हुई थी कि एक दिन वो वक़्त आएगा जब वो मुझे बाकी चीज़ो में भी अहमियत देंगे।

उस दिन भी मैं हर रोज़ की तरह अपने काम में ही लगी हुई थी। शाम हो चुकी थी और ऑफिस से विशेष जी के आने का समय हो रहा था। मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज की शाम मेरे लिए एक नई सौग़ात ले कर आने वाली है और वो सौग़ात ऐसी होगी जिससे मारे ख़ुशी के मेरा रोम रोम खिल उठेगा।

डोर बेल बजी तो मैंने जा कर दरवाज़ा खोला और चुप चाप पलट कर अंदर की तरफ आने ही लगी थी कि विशेष जी की आवाज़ सुन कर मेरे क़दम जैसे जाम से हो ग‌ए। पहले तो लगा कि शायद मेरे कान बज उठे थे लेकिन जब दुबारा विशेष जी की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी तो मेरा दिल जैसे धक् से रह गया।

"मैं जानता हूं कि मेरी वजह से अब तक तुम्हें न जाने कितनी ही तक़लीफें सहनी पड़ी हैं।" विशेष जी ने गंभीर भाव से कहा था____"और इसके लिए मैं तुम्हारी हर सज़ा को भुगतने के लिए तैयार हूं।"

ये सब कहने के पहले उन्होंने मेरा नाम ले कर मुझे दो बार पुकारा था और मेरे क़दम अपनी जगह पर जैसे जाम से हो गए थे। मेरा दिल बुरी तरह से धड़कने लगा था और जब विशेष जी ने ये सब कहा तो कानों को जैसे यकीन ही नहीं हुआ। बड़ी मुश्किल से मैंने हिम्मत दिखाई और पलट कर उनकी तरफ देखा।

"मैंने हमेशा ये ख़्वाहिश की थी कि मेरी हर चीज़ ख़ास हो।" मेरे पलटते ही उन्होंने आगे कहा____"मैं अपनी ज़िन्दगी में ऐसी कोई चीज़ बरदास्त नहीं करता था जो ख़ास न हो। पिता जी ने जब मुझे बताया कि मेरा ब्याह तय हो गया है तो मैं ये सोच कर थोड़ा घबरा सा गया था कि जिससे मेरा ब्याह तय हुआ है वो अगर ख़ास न हुई तो क्या होगा? फिर मैंने ये सोच कर खुद को तसल्ली दी थी कि मेरे माता पिता किसी ऐसी लड़की से मेरा ब्याह थोड़े न कर देंगे जिसमें कोई ख़ासियत ही न हो। हालांकि उस वक़्त मेरे ज़हन में ये ख़याल भी उभरा था कि एक बार अपनी आँखों से तुम्हें देख लूं लेकिन पिता जी के डर से मैं ऐसा नहीं कर सका था। ख़ैर उसके बाद ब्याह हुआ और उस रात सुहाग सेज पर जब मैंने तुम्हारा घूंघट उठा कर तुम्हें देखा था तो मेरे पैरों तले से ज़मीन ही खिसक गई थी।

पलक झपकते ही मेरे अंदर ये सोच कर गुस्सा भर गया था कि जब मेरी हर चीज़ ख़ास है तो मेरी बीवी बन कर मेरी ज़िन्दगी में आने वाली तुम ख़ास क्यों नहीं थी? बात अगर थोड़ी बहुत की होती तो मैं बरदास्त भी कर लेता या खुद को समझा भी लेता लेकिन तुम्हारे में थोड़ी बहुत जैसा सवाल ही नहीं था बल्कि मेरी नज़र में तो तुम दुनियां की सबसे बदसूरत औरत थी। मेरे दिलो दिमाग़ में तुम्हारे प्रति नफ़रत और घृणा इस क़दर भर गई थी कि मैंने गुस्से में तुम्हें वो सब कहा और फिर कभी तुमसे मतलब नहीं रखा। इन साढ़े चार सालों में ऐसा कोई दिन ऐसा कोई पल नहीं गुज़रा जब मैंने इस बारे में सोच कर खुद को समझाया न हो लेकिन मैं हमेशा इसी बात पर अड़ा रहा कि नहीं, मैं एक ऐसी औरत को अपनी बीवी नहीं स्वीकार कर सकता जो हद से ज़्यादा बदसूरत हो।"

विशेष जी ये सब कहने के बाद सांस लेने के लिए रुक गए थे या शायद वो ये देखना चाहते थे कि उनकी बातों का मुझ पर क्या असर हुआ है? मैंने उनसे तो कुछ नहीं कहा लेकिन उनकी बातों से मेरे अंदर भूचाल सा ज़रूर आ गया था जिसे मैं बड़ी मुश्किल से रोकने का प्रयास कर रही थी।

"समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता रूपा।" उन्होंने मेरा नाम लेते हुए कहा था____"हर चीज़ का एक दिन अंत हो ही जाता है। मेरे अंदर तुम्हारे प्रति भले ही इतना ज़हर भरा हुआ था लेकिन इन छह महीनों में मुझे एहसास हो गया है कि मैंने तुम्हें ठुकरा कर अच्छा नहीं किया था। अगर तुम छह महीनों से मेरे साथ यहाँ न होती और मैं तुम्हें इस तरह ख़ामोशी से सब कुछ करते हुए नहीं देखता तो शायद आगे भी मुझे ये एहसास न होता। तुम्हारे यहाँ आने के बाद से मैं अक्सर ये सोचता था कि आख़िर किस मिट्टी की बनी हुई हो तुम कि मेरी इतनी बेरुखी के बाद भी तुम उफ्फ तक नहीं करती? तुम्हारी जगह अगर कोई दूसरी औरत होती तो इतना कुछ होने के बाद यकीनन वो बहुत पहले ही आत्म हत्या कर चुकी होती। ख़ैर तुमने अपने हर कर्तब्य पूरे मन से निभाए और मेरी बेरुखी को भी ऊपर वाले का विधान समझ कर स्वीकार किया। ये सब चीज़ें ऐसी हैं जिनकी वजह से मुझे एहसास हुआ कि मैं अब तक कितना ग़लत था। मुझे अपनी हर चीज़ ख़ास की सूरत में ही चाहिए थी और तुम तो सच में ही ख़ास थी। ये अलग बात है कि मुझे कभी तुम्हारी खासियत का एहसास ही नहीं हुआ। मेरे जैसा बुरा इंसान शायद ही इस दुनियां में कही होगा रूपा। मैं तुम्हारा गुनहगार हूं। मुझे इसके लिए तुम जो चाहे सज़ा दे दो लेकिन आज की सच्चाई यही है कि मेरे दिल में तुम्हारे प्रति अब कोई ज़हर नहीं रहा बल्कि अब अगर कुछ है तो बस इज्ज़त और सम्मान की भावना है।"

विशेष जी बोलते जा रहे थे और मेरे अंदर जैसे विस्फोट से हो रहे थे। ऐसे विस्फोट जिनके धमाकों से मेरा समूचा वजूद हिल भी रहा था और ख़ुशी का एहसास भी करा रहा था।

आख़िर ऊपर वाले ने मेरी इतने सालों की तपस्या का फल देने का सोच ही लिया था। मेरा रोम रोम इस फल की ख़ुशी में खिलता जा रहा था। मन कर रहा था कि इस ख़ुशी में नाचने लगूं और सारी दुनियां के सामने चीख चीख कर कहूं कि____'देख लो दुनियां वालो, आज मेरे पति ने मुझे अपना लिया है। आज उन्होंने मुझे अपनी पत्नी मान लिया है। आज उनके दिल में मेरे प्रति नफ़रत और घृणा नहीं है बल्कि मेरे लिए इज्ज़त और सम्मान की भावना आ गई है।'

खुशियों का एहसास इतना भी प्रबल हो सकता है ये उस दिन पता चला था मुझे। लोग ख़ुशी में किस तरह नाचने लग जाते हैं ये उस दिन समझ आया था मुझे। लोग ख़ुशी में पागल कैसे हो जाते हैं ये उस दिन महसूस हुआ था मुझे। मैं तो अपने बनाने वाले से यही कहना चाहती थी कि वो मुझे उस ख़ुशी में पागल ही कर देता। मेरे अंदर मेरे जज़्बात मचल रहे थे और जब मैंने उन खुशियों को किसी तरह भी ब्यक्त न किया तो जैसे मेरी आँखों ने खुद ही उन्हें ज़ाहिर कर देने का फैसला कर लिया था। वो खुद ही मारे ख़ुशी के छलक पड़ीं थी और उस वक़्त तो मैं खुद भी अपने आपको सम्हाल नहीं पाई थी जब विशेष जी ने अपनी बाहें फैला कर मुझे गले लग जाने का इशारा किया था। एक पल की भी तो देरी नहीं की थी मैंने, बल्कि झपट कर मैं उनके सीने से जा लिपटी थी। उनके सीने से लगते ही ऐसा लगा जैसे वर्षों से जल रहे मेरे कलेजे को ठंडक मिल गई हो। अब अगर ऊपर वाला मेरे प्राण भी ले लेता तो मुझे उससे कोई शिकायत न होती। जाने कितनी ही देर तक मैं उनके सीने से लिपटी रोती बिलखती रही। बस रोए ही जा रही थी, मुख से कोई अलफ़ाज़ नहीं निकल रहे थे और वो मेरी पीठ पर इस अंदाज़ से अपने हाथ फेरते जा रहे थे जैसे मुझे दिलासा देते हुए कह रहे हों कि____'बस रूपा, अब से तुम्हें दुनियां का कोई भी दुख दर्द रुलाने नहीं आएगा।'

मेरी ज़िन्दगी में खुशियों का आगमन हो गया था और फिर तो जैसे ये खुशियां अपने नए नए रूपों में मुझे और भी ज़्यादा खुश रखने के करतब दिखाने लगीं थी। सब कुछ मेरी आँखों के सामने हक़ीक़त में होता हुआ नज़र आ रहा था लेकिन ऐसा लगता था जैसे मैं कोई ख़्वाब देख रही थी। मन में ख़याल आता कि अगर ये सब ख़्वाब ही है तो मैं जीवन भर बस ऐसे ही ख़्वाब देखना चाहती हूं। अगले ही पल अपने बनाने वाले से हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने लगती कि____'हे ऊपर वाले! जिस दिन इन ख़्वाबों का अंत हो उसी दिन मेरे प्राणों का भी अंत कर देना। क्योंकि इस सबके बाद मैं खुद भी जीने की ख़्वाहिश नहीं रखूंगी।'

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Chapter - 02
[ Reality & Punishment ]
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Update - 10
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मेरी ज़िन्दगी में खुशियों की बहार आ गई थी। साढ़े चार सालों से मैं जिस चीज़ के लिए तड़प रही थी वो चीज़ मुझे मिल गई थी।

मेरे पति ने मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार भी कर लिया था और मुझे हर वो ख़ुशी देने लगे थे जो उनकी पत्नी के रूप में मुझे मिलनी चाहिए थीं। इससे ज़्यादा किसी पत्नी को और भला क्या चाहिए था? रात दिन मैं इस सबके लिए ऊपर वाले का धन्यवाद करती थी। एक हप्ते में ही विशेष जी ने मुझे इतनी खुशियां दे थीं कि मैं अपने अब तक के सारे दुःख दर्द भूल गई थी। उनका प्यार दिखाना और हर चीज़ मेरी इच्छा के अनुसार ही करना मुझे इतना मनमोहक लगता था कि मेरे दिल में विशेष जी के लिए एक अलग ही ख़ास स्थान बनता जा रहा था। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मेरा वही पति मुझे इतना प्यार देगा जिसने सुहागरात में मुझे देखते ही मुझे त्याग दिया था और अपनी पत्नी मानने से इंकार कर दिया था।

इतना प्यार, इतनी खुशियां और अपने प्रति इतना ख़याल देख कर मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं कोई ख़्वाब देख रही हूं। मेरा मन हर पल ख़ुशी के मारे नाचने फुदकने को करता था और अकेले में मैं इस सबसे खुश हो कर नाचती भी थी। विशेष जी मुझे इतना प्यार और इतनी खुशियां दे रहे थे तो बदले में मैं भी पूरी कोशिश कर रही थी कि मैं भी उन्हें उतना ही प्यार दूं और उन्हें खुश रखूं। इस सच्चाई को खुद भी जानते हुए कि मेरा रंग रूप ऐसा नहीं है जो किसी मर्द को आकर्षित करे फिर भी विशेष जी के लिए सजती संवरती रहती थी। मेरे बस में नहीं था वरना मैं अपने रंग रूप को बेइंतेहा सुन्दर बनाने के लिए कुछ भी कर गुज़रती।

हप्ते दस दिन ऐसे ही गुज़र गए थे। इन दस दिनों में विशेष जी ने मुझे इतना प्यार और इतनी खुशियां दे दीं थी कि मैं उन सबको न तो सम्हाल पा रही थी और ना ही हजम कर पा रही थी। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि अचानक से मेरे दामन में इतनी खुशियां भर जाएंगी। मैं विशेष जी के साथ कुछ भी करने के लिए और कहीं भी जाने के लिए हर पल तैयार रहती थी। इन दस दिनों में उन्होंने एक अच्छे पति होने का सबूत दे दिया था या शायद उससे भी ज़्यादा। वो मुझे बाहर घूमाने ले जाते, सिनेमा में मेरी मनपसंद की फिल्म दिखाते और बड़े से शो रूम में ले जा कर मुझे शॉपिंग करवा कर एक अच्छे से होटल में खाना खिलाते। उन्हें देख कर ज़रा भी नहीं लगता था कि उन्हें मेरे जैसी कुरूप बीवी से अब कोई परेशानी थी या कोई मलाल था। मेरी ख़ुशी देख कर वो भी बेहद खुश दिखते थे।

दस दिन ऐसे ख़ुशी ख़ुशी में गुज़र गए थे लेकिन अभी हमने सुहागरात नहीं मनाई थी। हर रोज़ मेरे मन में ख़याल आता कि हमारी शादी को साढ़े चार साल गुज़र गए हैं लेकिन अब तक हमने सुहागरात नहीं मनाई। मुझे तो उनसे इस बारे में बात करने में शर्म आती थी इस लिए मैंने भी सोच लिया था कि जब वो ख़ुद इस बारे में कुछ कहेंगे तभी मैं उनका साथ देते हुए इसके लिए हाँ करुंगी।

सुहागरात के बारे में सोच कर ही मेरा रोम रोम पुलकित हो उठता था और फिर ये सोच कर खुद ही शर्मा जाती कि विशेष जी के सामने कैसे मैं अपने जिस्म से कपड़े उतारूंगी? पलक झपकते ही ये सब बातें मुझे सोचों में डाल देती थीं और मेरे दिल की धड़कनों को जैसे रोक देती थीं लेकिन मैं ये भी जानती थी कि किसी दिन ऐसा तो करना ही पड़ेगा और वैसे भी हर औरत की तरह मेरी भी तो यही ख़्वाहिश थी कि मेरी भी ज़िन्दगी में एक रोज़ ऐसा खूबसूरत पल आए और मेरा पति मुझे पूर्ण रूप से औरत बना दे।

एक दिन मज़ाक मज़ाक में ही विशेष जी ने हमारी सुहागरात की बात छेड़ दी तो मैं शर्म से उनकी तरफ देखती रह गई थी। उन्होंने मुझसे कहा था कि वो मेरे साथ सुहागरात तभी मनाएंगे जब इसके लिए मेरी भी मर्ज़ी होगी। उनका कहना था कि वो ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगे जिसमें मेरी मर्ज़ी न हो। विशेष जी की इन बातों से मैं बेहद खुश हो गई थी। वो मुझे इतना मान दे रहे थे तो मैं भला कैसे उनके लिए खुश न होती? अब क्योंकि मेरे मन में भी अपनी सुहागरात के प्रति ख़्वाहिश थी इस लिए मैंने शर्म से नज़रें झुका कर उनसे कह दिया था कि उनकी मर्ज़ी ही मेरी मर्ज़ी है।

दूसरे दिन विशेष जी मुझे अपने साथ मंदिर ले कर गए और वहां के पंडित जी से शुभ मुहूर्त निकलवाया। उनका कहना था कि हम पहले एक बार फिर से अपने घर में शादी करेंगे और उसके बाद ही सुहागरात मनाएंगे। विशेष जी की इस सोच से मैं बहुत ज़्यादा प्रभावित हो गई थी और खुश भी हुई थी। खैर पंडित जी के शुभ मुहूर्त के अनुसार हमने एक दिन घर में ही शादी की। हालांकि वो शादी बस कहने के लिए ही थी क्योंकि उसमें हम दोनों शादी वाले कपड़ों में एक दूसरे को जय माला पहनाया था और विशेष जी ने मेरी मांग में सिन्दूर लगाया था। उस दिन मैं बहुत ही ज़्यादा खुश थी और मन ही मन ये सोच कर रोमांचित भी हो रही थी कि रात में सुहागरात को सब कुछ कैसे होगा? विशेष जी मेरे साथ क्या क्या करेंगे और किस तरह से करेंगे? पता नहीं कैसे कैसे ख़याल बुनने लगती थी मैं।

आख़िर रात हुई और मैं कमरे में न‌ई नवेली दुल्हन की तरह सुहाग सेज पर सजी संवरी बैठी थी। मेरे मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे जिनकी वजह से कभी मैं बहुत ज़्यादा रोमांच से भर जाती तो कभी ये सोच कर थोड़ा परेशान भी हो जाती कि अगर सुहागरात में विशेष जी को मैं खुश न कर पाई तो क्या होगा? अब तक इतने दुःख दर्द सहे थे कि ज़रा सी बात पर मैं बुरी तरह चिंतित और परेशान हो जाती थी। मैंने मन ही मन ऊपर वाले को याद किया और उनसे कहा कि मुझे इतनी शक्ति और इतनी हिम्मत देना कि मैं अपने पति को हर तरह से खुश करने में कामयाब रहूं।

विशेष जी कमरे में आए तो उनकी आहट से ही मैं एकदम से सिकुड़ गई थी। मेरा दिल बुरी तरह धड़कनें लगा था। मन में एकदम से डर और घबराहट सी भर गई थी।

विशेष जी बेड के किनारे पर ही बैठ गए थे। मेरी आँखों के सामने अचानक से साढ़े चार साल पहले का वो दृश्य उजागर हो गया जब ऐसे ही सुहागरात को विशेष जी कमरे में आए थे और फिर बेड के किनारे पर बैठ कर उन्होंने मेरा घूंघट उठाया था। उसके बाद तो जैसे क़यामत ही गई थी मेरी ज़िन्दगी में। ये सब याद आते ही मेरे दिल की धड़कनें और भी ज़्यादा तेज़ी से चलने लगीं थी। पता नहीं क्यों पर मन में ये ख़याल भी उभर आया कि कहीं आज भी तो वैसा ही नहीं हो जाएगा? फिर एकदम से ख़याल आया कि नहीं नहीं आज ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि पहले में और आज में बहुत फ़र्क हो गया है। पहले विशेष जी मुझसे प्यार नहीं करते थे जबकि आज वो मुझे बहुत प्यार करते हैं।

विशेष जी ने मेरा घूंघट उठाया। मेरा चेहरा डर और घबराहट से भरा हुआ था। पलकें झुकी हुईं थी और चेहरा हल्का सा नीचे की तरफ झुका हुआ था। उन्होंने घूंघट उठाने के बाद हल्के से मेरी ठुड्ढी को पकड़ा और फिर ऊपर उठाया तो मेरा चेहरा सीधा उनकी नज़रों के सामने आ गया।

"तुम्हारे बारे में मैं हमेशा से ही ग़लत था रूपा।" विशेष जी की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी तो मैंने बड़ी मुश्किल से पलकें उठा कर उनकी तरफ देखा था, जबकि उन्होंने आगे कहा____"मैं ये कभी समझ ही नहीं पाया कि जिस खासियत की मैं चाह रखता था वो तो शुरू से ही तुम में थी। हाँ रूपा, तुम शुरू से ही ख़ास थी, बल्कि इतनी ख़ास कि तुमसे ज़्यादा मेरे पास मौजूद दूसरी कोई भी चीज़ ख़ास नहीं थी। आज मैं ये अच्छी तरह समझ चुका हूं कि दुनियां में किसी भी चीज़ की खासियत उसके रंग रूप से नहीं होती बल्कि उसके गुणों से होती है। तुम्हारी सबसे बड़ी खूबसूरती और सबसे बड़ी खासियत यही है कि तुम में गुणों की कोई कमी नहीं है। आज मैं सच में तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में पा कर बेहद खुश हूं।"

विशेष जी के द्वारा कहे गए एक एक शब्द जैसे मेरे दिलो दिमाग़ से उतर कर मेरी रूह को मीठा सा एहसास करा गए थे और मेरे रोम रोम को पुलकित कर गए थे। मेरे समूचे जिस्म में ख़ुशी की लहर दौड़ गई और मैं एक झटके से आगे बढ़ कर उनसे लिपट गई थी। उन्होंने खुद भी मुझे अपने सीने से ऐसे छुपका लिया था जैसे सच में मैं उनकी सबसे प्यारी और सबसे ख़ास चीज़ थी। मैं भला ये कैसे सोच सकती थी कि मेरे साथ उनके द्वारा किया गया हर कार्य महज एक छलावा था? एक ऐसा षड़यंत्र था जिसके बारे में मेरे जैसी औरत कल्पना भी नहीं कर सकती थी। ख़ैर उस रात विशेष जी ने मुझे हद से ज़्यादा प्यार दिया और मैं स्वीकार करती हूं कि उनके दिए हुए उस प्यार से मैं संतुष्ट भी हुई थी।

साढ़े चार सालों बाद मेरी ज़िन्दगी में खुशियां आईं थी और मैं उन खुशियों में इस तरह डूब चुकी थी कि मुझे बाकी किसी भी चीज़ के बारे में सोचने का ख़याल ही नहीं रह गया था।

विशेष जी सुबह आठ बजे ऑफिस जाते थे इस लिए मैं उनके लिए खाने का टिफिन तैयार कर देती थी। उनके ऑफिस जाने के बाद घर के सारे काम करती और फिर सारा दिन उनके इंतज़ार में बैठी रहती। उनके इंतज़ार में एक एक पल गुज़ारना जैसे भारी हो जाता था। मन करता था कि जल्दी से शाम हो और मैं अपने उस पति का चेहरा देखूं जो मुझे सबसे ज़्यादा प्यार करता था। मैं अपनी तरफ से हर वो कोशिश करती थी जिससे विशेष जी मुझसे खुश ही रहें और मेरे प्रति उनका ये प्यार कम न होने पाए। हालांकि उनके प्यार में मैंने कमी महसूस भी नहीं की थी बल्कि दिन पर दिन उनका प्यार बढ़ता ही जा रहा था और मैं उनके प्यार से मिलने वाली इस ख़ुशी को सम्हाल ही नहीं पा रही थी। कभी कभी मैं मन ही मन ऊपर वाले से कहने लगती कि इतना प्यार और इतनी खुशियों की तो मैंने कभी कल्पना ही नहीं की थी और ना ही मुझे इन खुशियों को सम्हालने का तज़ुर्बा है इस लिए ऐसा मत होने देना कि अगर मैं इन्हें सम्हाल न पाऊं तो ये खुशियां कम होने लगें।

कुछ दिन पहले कहां मैं ये सोचा करती थी कि ज़िन्दगी बड़ी ही कठोर और मेरी तरह ही बदसूरत होती है लेकिन इस सबकी वजह से मेरी सोच और मेरे ख़यालात बदल गए थे। अब मैं ये सोचने लगी थी कि ज़िन्दगी तो सच में बहुत खूबसूरत होती है। अगर किसी को इतना प्यार और इतनी खुशियां मिलने लगें तो वास्तव में ज़िन्दगी खूबसूरत ही कहलाएगी। विशेष जी ने मुझे तोहफे के रूप में एक टच स्क्रीन वाला मोबाइल खरीद कर दिया था। मैं उस मोबाइल से अपने माँ बाबू जी को फ़ोन लगाती और उनसे घंटों बातें करती रहती। मैं उन्हें बताती कि अब सब कुछ ठीक हो गया है और मेरे पति मुझे बहुत सारा प्यार दे रहे हैं जिसकी ख़ुशी में मैं हर पल डूबी रहती हूं। मेरे माँ बाबू जी मेरी इस बात से बेहद खुश थे। वो अक्सर कहते थे कि हम कहते थे न बेटी कि समय कभी भी एक जैसा नहीं रहता बल्कि वो बदलता रहता है। यानि दुःख के बादल एक दिन ज़रूर छंट जाते हैं और फिर जीवन में खुशियों का आगमन होता है।

खुशियां जब आती हैं तब इंसान उन खुशियों में इतना डूब जाता है कि उसे वक़्त के गुज़रने का एहसास ही नहीं हो पाता। यही हाल मेरा था। मेरी ज़िन्दगी में अचानक से इतनी खुशियां आ गईं थी कि मैं पूरी तरह उसमें डूब चुकी थी जिसकी वजह से मुझे ये पता ही नहीं चल पाया कि कितना वक़्त गुज़र गया?

एक रात अपनी समझ में मैं बेड पर विशेष जी के सीने से छुपकी चैन की नींद सो रही थी। मुझे नहीं पता था कि उस वक़्त रात का कौन सा पहर चल रहा था? अचानक से मेरी नींद टूट गई थी। नींद टूटने की वजह ये थी कि मुझे ज़ोरों का पेशाब आया हुआ था। सोने से पहले हम दोनों ने एक दूसरे को भरपूर प्यार किया था और फिर उसी हालत में सो गए थे। ख़ैर नींद टूटी तो मैंने आँखें खोल कर देखा।

कमरे में अँधेरा था लेकिन कमरे के एक कोने में टेबल लैंप जला हुआ नज़र आया मुझे। मैंने दिन के उजाले में क‌ई बार देखा था कि कमरे के उस कोने में एक कुर्सी टेबल रखी होती है जिसमें बैठ कर विशेष जी अक्सर अपने ऑफिस का काम करते थे।

टेबल लैंप को जलता देख मैं इतना तो समझ गई थी कि विशेष जी शायद अपने ऑफिस का कुछ काम कर रहे होंगे लेकिन मन में सवाल उभरा कि इतनी रात में उन्हें ऑफिस का काम करने की क्या ज़रूरत थी? मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि जा कर देखूं कि वो इतनी रात में अपने ऑफिस का कौन सा ऐसा काम कर रहे हैं लेकिन फिर मैंने ये सोच कर अपना इरादा बदल दिया कि मुझे बेवजह उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए। हो सकता है कि वो कोई ज़रूरी काम कर रहे हों और मेरे द्वारा डिस्टर्ब किए जाने पर उन्हें अच्छा न लगे। मैं भला ये कैसे चाह सकती थी कि मेरे द्वारा विशेष जी के किसी काम में अड़चन आए या वो मुझसे किसी वजह से नाराज़ हो जाएं? इस लिए मैं चुपके से उठ कर बेड पर बैठ गई। मुझे ज़ोर का पेशाब आया हुआ था इस लिए मैं बेड इस तरह उतरी कि कोई आवाज़ न हो। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी आहट से उनका अपने काम पर से ध्यान टूटे। मैं बेड से उतर कर बाथरूम में चली गई। थोड़ी देर बाद वापस आई तो देखा विशेष जी अभी भी अपने काम में लगे हुए थे। मैं ये सोच कर थोड़ा हैरान हुई कि क्या उन्हें बाथरूम में मेरे द्वारा टॉयलेट शीट पर पानी डालने की आवाज़ न सुनाई दी होगी? अगर उन्हें सुनाई दी होती तो वो ज़रूर मेरे आने के बाद मेरी तरफ देखते और कुछ न कुछ ज़रूर कहते। इसका मतलब वो अपने काम में इतना डूबे हुए थे कि उन्हें बाकी किसी चीज़ का आभास ही नहीं हुआ था। मेरे मन में ख़याल उभरा कि आख़िर वो ऐसे कौन से काम में इतना डूबे हुए थे कि उन्हें किसी बात का आभास तक नहीं हुआ?

मेरे मन में ये जानने की उत्सुकता जाग उठी थी लेकिन उनके क़रीब जा कर उनके काम को देखने की हिम्मत मैंने नहीं की, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं मेरे द्वारा ऐसा करने पर वो नाराज़ न हो जाएं। इस लिए मैं जिस ख़ामोशी से बेड से उतर कर बाथरूम गई थी उसी ख़ामोशी से मैं वापस आ कर बेड पर बैठ गई। मैंने मन ही मन सोचा कि मैं विशेष जी के काम पूरा हो जाने का इंतज़ार करती हूं और जब उनका काम पूरा हो जाएगा तो मैं उनसे इस बारे में पूछूंगी।

बेड पर उनकी तरफ ही करवट ले कर मैं लेट गई थी और देखने लगी थी कि वो कब तक अपने काम में लगे रहते हैं? लैंप की रौशनी में मुझे साफ़ नज़र आ रहा था कि वो किसी किताब में कुछ लिख रहे हैं। कभी वो लिखना बंद कर के कुछ सोचने लगते और सोचने के बाद वो फिर से लिखने लगते। मैं काफी देर तक उनका यही क्रिया कलाप देखती रही। क़रीब आधे घंटे बाद उन्होंने उस किताब को बंद किया और गर्दन घुमा कर एक बार मेरी तरफ देखा।

मेरी तरफ क्योंकि अँधेरा था इस लिए उन्हें मैं नज़र नहीं आ सकती थी और अगर आ भी रही होती तो वो ये नहीं देख सकते थे कि मेरी आँखें खुली हुई हैं या मैं सोई हुई हूं। मैं तो बस ये सोच कर खुश हो रही थी कि विशेष जी को मुझे प्यार और ख़ुशी देने के चक्कर में अपने निजी काम करने का भी वक़्त नहीं मिलता। तभी तो वो इतनी रात को चुप चाप अपना काम कर रहे थे।

अभी मैं ये सोच सोच कर खुश ही हो रही थी कि तभी मैंने देखा कि विशेष जी ने उस किताब को अपने बगल से रखे बैग में डाल दिया और फिर अपने जनेऊ में बंधी चाभी से उस बैग में ताला लगा दिया। मुझे उनके द्वारा ऐसा करना थोड़ा अजीब सा लगा। मेरे मन में ख़याल उभरा कि आख़िर वो उस किताब में ऐसा क्या लिख रहे थे जिसे लिखने के बाद उन्होंने उस किताब को उस बैग में रख कर उसमें ताला लगा दिया था? स्वाभाविक रूप से मेरे मन में ये जानने की उत्सुकता और भी बढ़ चुकी थी। ज़हन में एक बार फिर ये ख़याल उभरा कि क्या मुझे उनसे इस बारे में पूछना चाहिए लेकिन फिर मन में ही जवाब के रूप में दूसरा ख़याल उभरा कि मुझे उनके निजी कामों के बारे में इस तरह नहीं पूछना चाहिए। क्योंकि संभव है कि उन्हें इस बात से अच्छा न लगे।

मैंने देखा कि विशेष जी कुर्सी से उठे और उस बैग को ले कर मेरी तरफ आए। मैंने फ़ौरन ही अपनी आँखें बंद कर ली थी। कुछ ही देर में मुझे बेड के नीचे कुछ खिसकने की आवाज़ सुनाई दी। मैं समझ गई कि वो खिसकने की आवाज़ किस चीज़ की थी। ख़ैर उसके बाद विशेष जी वापस गए और टेबल लैंप को बुझाने के बाद वो बेड पर आ कर लेट ग‌ए। इधर मैं आँखें बंद किए इस इंतज़ार में पड़ी रही कि शायद वो मेरी तरफ मुड़ेंगे और मुझसे कुछ कहेंगे या फिर मेरे साथ छुपक कर सो जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो दूसरी तरफ करवट ले कर लेट गए थे। मैं काफी देर तक उनके द्वारा कुछ कहे जाने या कुछ किए जाने का इंतज़ार करती रही लेकिन मेरी उम्मीद के विपरीत कुछ भी न हुआ बल्कि कुछ ही देर में मुझे उनके खर्राटों की हल्की आवाज़ सुनाई देने लगी थी। जहां तक मुझे याद है वो मेरे साथ जब बेड पर सोते थे तो मुझे अपने से छुपका कर ही सोते थे लेकिन इस वक़्त ऐसा नहीं हो रहा था। ये देख कर मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी लेकिन फिर मैंने सोचा कि शायद वो थके रहे होंगे इस लिए वो सो गए थे। ख़ैर उसके बाद मैं भी मन में तरह तरह की बातें सोचते हुए सो गई थी।

दूसरे दिन हर रोज़ की तरह मैंने उनके लिए ब्रेकफास्ट रेडी किया और टिफिन सजा कर उन्हें दिया। रात वाली बात मेरे ज़हन से निकल चुकी थी। ख़ैर किसी तरह दिन गुज़रा और शाम हुई। विशेष जी घर आए और हमने रात में डिनर किया और प्यार करने के बाद सो गए। इत्तेफ़ाक़ से उस रात फिर से मेरी नींद पेशाब लगे होने की वजह से खुल गई थी और जब मैंने कमरे में इधर उधर नज़र घुमाई तो कमरे के एक कोने में टेबल लैंप की रौशनी दिखी।

मेरे मन में ख़याल उभरा कि आज विशेष जी फिर से अपने किसी काम में लगे हुए हैं। मैं बाथरूम गई और वहां से जब वापस आई तो देखा वो वैसे ही लिखने में लगे हुए थे। उस रात भी उन्हें मेरे आने जाने का आभास नहीं हुआ था। मेरे मन में सवाल तो बहुत सारे उभरने लगे थे लेकिन मैंने उनसे कुछ पूछना ठीक नहीं समझा। ख़ैर बेड पर लेट कर मैं उन्हें देखती रही। पिछली रात की तरह ही उन्होंने कुछ समय बाद उस किताब को बंद किया और उसे बैग में रख कर बैग में ताला लगा दिया। उसके बाद उस बैग को बेड के नीचे खिसका कर वो बेड पर दूसरी तरफ को करवट ले कर लेट ग‌ए।

मैं बार बार यही सोचती थी कि विशेष जी से इस बारे में पूछूं कि आख़िर वो इतनी रात में कौन सा काम करते हैं लेकिन हर बार मैं ये सोच कर अपना ख़याल बदल देती कि मुझे उनके निजी कामों के बारे में नहीं पूछना चाहिए। मुझे ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहिए जिसकी वजह से वर्षों बाद मिली मेरी इन खुशियों पर ग्रहण लग जाए। अपने अब तक के जीवन में मैंने सिर्फ और सिर्फ दुःख दर्द ही सहे थे इस लिए इन खुशियों के मिलने के बाद अब मैं ग़लती से भी ऐसा कुछ नहीं कर देना चाहती थी जिसकी वजह से फिर से पहले जैसे दुःख दर्द मेरे जीवन का हिस्सा बन जाएं।

अगले एक दो दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैंने भी सोचा कि मुझे इस बारे में इतना ज़्यादा नहीं सोचना चाहिए। अक्सर ऐसा होता है कि हम ग़लतफ़हमी का शिकार हो जाते हैं और अपने ही हाथों अपना सब कुछ बर्बाद कर लेते हैं। मेरे जीवन ने और मेरे दुःख दर्द ने इतना तो मुझे सिखा ही दिया था कि परिस्थितियों से कैसे समझौता करना चाहिए। मेरे लिए यही बहुत बड़ी बात थी कि मेरे जैसी कुरूप औरत को उसके पति ने अपनी पत्नी स्वीकार कर लिया था और उसे इतना प्यार तथा इतनी खुशियां दे रहा था। मुझे इससे ज़्यादा और भला क्या चाहिए था?

हर इंसान अपने हिसाब से और अपने बुद्धि विवेक से जीवन में आगे बढ़ता रहता है और साथ ही वो परिस्थितियों के अनुसार अपने मन में हसरतें पालता रहता है लेकिन होता वही है जो ऊपर वाला चाहता है। मेरे जीवन में खुशियों के बस चार दिन ही लिखे थे। उसके बाद फिर से वही दुःख दर्द का चक्कर शुरू हो जाना था।

एक रात फिर से मेरी नींद टूट गई और फिर से मैंने विशेष जी को वैसे ही टेबल लैंप की रौशनी में किताब पर कुछ लिखते हुए देखा और फिर उस किताब को बैग में रखने के बाद उस बैग को ताला लगाते देखा। किसी इंसान को एक दो बार वहम हो सकता है या उसके साथ ऐसा इत्तेफ़ाक़ हो सकता है लेकिन बार बार तो नहीं? हम कितना भी ख़ुद को समझाएं लेकिन हमारा मन तब तक आपको शान्ति से बैठने नहीं देता जब तक कि ख़ुद उसके अंदर शान्ति और सुकून न आ जाए।

मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि विशेष जी उस किताब में कौन सी इबारत लिखते थे।

मैं तो बस ये सोच कर एक बार उस किताब में लिखी इबारत को देख लेना चाहती थी कि आख़िर वो उसमें ऐसा क्या लिखते हैं जिसके लिए उन्हें और कोई वक़्त ही नहीं मिलता, सिर्फ आधी रात का ही वक़्त मिलता है? आख़िर ऐसा उस किताब में वो क्या लिखते हैं जिसके लिए उन्हें अपनी नींद ख़राब करनी पड़ती है? मेरे मन में विशेष जी के लिए बस एक फ़िक्र ही थी। भला मैं अपने इतना प्यार करने वाले पति को किसी तरह की चिंता या तक़लीफ में कैसे देख सकती थी? इस लिए मैंने फ़ैसला कर लिया था कि ग़लत ही सही लेकिन अब मैं ये जान कर ही रहूंगी।

उस रात जब विशेष जी सो गए तो मैं चुपके से उठ कर बेड से नीचे उतरी। बेड के नीचे से मैंने वो बैग निकाला और बैग को उठा कर उसके साथ ही ताले वाले हिस्से को बेड के उस हिस्से पर रखा जहां पर मेरे अंदाज़े के अनुसार विशेष जी के जनेऊ में उस ताले की चाभी हो सकती थी। उस वक़्त डर और घबराहट के मारे मेरा बुरा हाल तो था लेकिन मन में उनके प्रति फ़िक्र और उत्सुकता की वजह से मैं कुछ भी करने के लिए मजबूर हो चुकी थी। मैंने बड़ी ही सावधानी से विशेष जी के जनेऊ में बंधी चाभी पकड़ी और उससे बैग के ताले को खोला। मेरे दिल की धड़कनें धाड़ धाड़ कर के मेरी कनपटियों पर चोट कर रहीं थी। घबराहट के मारे मेरा चेहरा पसीने से भर गया था। ख़ैर ताला खुल गया तो मैंने ताले से चाभी निकाल दिया। ऐसा इस लिए क्योंकि अगर चाभी ताले में ही फंसी रह गई तो उससे वजन पैदा हो जाता और विशेष जी के द्वारा बेड पर इधर उधर करवट लेने से वो वजन उन्हें जगा भी सकता था।

बैग को बड़ी सावधानी से ले कर मैं टेबल के पास आई। अभी मैं टेबल लैंप को जलाने के लिए बटन दबाने ही वाली थी कि तभी मेरे मन में ख़याल उभरा कि अगर विशेष जी किसी वजह से जाग गए और उन्होंने टेबल लैंप को जलते हुए देखा तो गज़ब हो जाएगा। ये सोच कर मैंने मोबाइल की स्क्रीन के उजाले द्वारा बैग से वो किताब निकाली और फिर बैग को बेड के नीचे आहिस्ता से सरका दिया। उसके बाद मैं उस किताब को ले कर बाथरूम में घुस गई। बाथरूम के दरवाज़े को अंदर से बंद कर के मैंने मोबाइल की टार्च जला कर उस किताब को खोला। इस वक़्त मेरी हालत चोरों वाली हो गई थी। मन में एक डर सा समाया हुआ था कि अगर विशेष जी के द्वारा पकड़ी गई तो शायद अनर्थ ही हो जाए और फिर मेरा जीवन पहले की ही तरह नर्क जैसा बन जाए।

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Chapter - 02
[ Reality & Punishment ]
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Update - 11
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बाथरूम के अंदर अभी मैं उस किताब को खोलने ही वाली थी कि तभी बाहर से कुछ अजीब सी आवाज़ सुनाई दी मुझे। उस आवाज़ को सुन कर मेरा रोम रोम कांप गया। दिल की धड़कनें एकदम से थम गई सी महसूस हुईं मुझे। फिर एकदम से मन में ख़याल उभरा कि अगर ये आवाज़ विशेष जी के द्वारा पैदा हुई होगी तब तो ज़रूर वो जाग गए होंगे।

संभव है कि मेरी तरह उनकी भी पेशाब लगने की वजह से नींद खुल गई हो। ये सब सोचते ही एकदम से मैं बुरी तरह घबरा गई। पकड़े जाने का डर मुझ पर इस क़दर हावी हो गया कि लगा मुझे वहीं पर चक्कर आ जाएगा। किसी तरह मैंने ख़ुद को सम्हाला और मोबाइल की टार्च को बुझा कर बहुत ही धीमें से बाथरूम का दरवाज़ा खोला।

बिना कोई आवाज़ किए जब मैं कमरे में आई तो देखा कमरे में पहले की तरह ही अँधेरा था। कुछ देर अपनी जगह पर रुक कर मैंने किसी भी तरह की आवाज़ को सुनने की कोशिश की लेकिन ऐसी कोई आवाज़ मेरे कानों में न सुनाई दी जिससे मैं ये अंदाज़ा लगा सकूं कि वो आवाज़ विशेष जी के द्वारा पैदा हुई थी या किसी चूहे की वजह से। अब क्योंकि मेरे अंदर पकड़े जाने का डर भर गया था इस लिए मैंने इस वक़्त फिर से बाथरूम में जा कर उस किताब को देखना बिलकुल भी सही नहीं समझा। मैंने चुप चाप उस किताब को वैसे ही उस बैग में रख दिया जैसे निकाला था और फिर बैग को बेड के नीचे वैसे ही रख कर बेड पर आहिस्ता से लेट गई। मेरा दिल अभी भी मारे घबराहट के बुरी तरह धड़क रहा था। ज़हन में ख़याल उभरा कि बाल बाल बच गई आज।

अगले दो तीन दिन ऐसे ही गुज़र गए और मैंने भी उस किताब को देखने का ख़याल ज़हन से निकाल दिया था। असल में मैं विशेष जी के प्यार की वजह से मिल रही ख़ुशी को फीका नहीं करना चाहती थी।

उस दिन रविवार था और विशेष जी ने शनिवार की शाम को ही मुझे बता दिया था कि रविवार को वो मुझे बाहर घुमाने ले जाएंगे लेकिन इस बार वो बाहर ही किसी अच्छे से होटल में रुक कर मेरे साथ प्यार से भरी रात गुज़ारेंगे। विशेष जी की इस बात से मैं बेहद खुश हो गई थी। ख़ैर अगले दिन रविवार को मैं विशेष जी के साथ घूमने निकल पड़ी थी। सबसे पहले उन्होंने मुझे सिनेमा में ले जा कर फिल्म दिखाई और उसके बाद चिड़ियाघर घुमाने ले गए। इसी सब में काफी वक़्त गुज़र गया था और मैं थक भी गई थी इस लिए विशेष जी के साथ मैं होटल में पहुंच ग‌ई। वहां खा पी कर मैं बेड पर लेटते ही सो गई थी।

शाम को हम दोनों उठे और थोड़ा बाहर घूमने के बाद रात का खाना खाया। उसके बाद होटल के अपने कमरे में आ गए। रात अपनी ही थी इस लिए मेरे मन में तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे जिनकी वजह से मैं मन ही मन खुश हो रही थी। विशेष जी के प्यार की अब आदत सी पड़ गई थी मुझे और मैं चाहती थी कि मैं उनके उस प्यार में ही डूबी रहूं। ख़ैर विशेष जी ने मुझे भरपूर प्यार किया। मैं एकदम से तृप्त और निढाल हो गई थी। काफी देर बाद जब विशेष जी ने मुझे पुकारा तो मैं उठी और जैसे ही मैंने खुद के नंगेपन को देखा तो शर्म से दोहरी हो गई। मेरे सारे कपड़े बेड से दूर फर्श पर पड़े हुए थे।

दूसरे दिन हम दोनों सुबह सुबह ही घर आ गए थे। विशेष जी तो अपने ऑफिस चले गए थे लेकिन मैं सारा दिन अपनी बदली हुई ज़िन्दगी के बारे में जाने क्या क्या सोचती रही थी।

उस रात भी विशेष जी ने मुझे प्यार किया था और उसके बाद हम दोनों सो गए थे। इत्तेफ़ाक़ से फिर मेरी नींद पेशाब लगने की वजह से ही टूट गई। मैंने आँखें खोल कर इधर उधर देखा तो मैं ये देख कर चौंकी थी कि आज फिर विशेष जी टेबल लैंप को जला कर उस किताब में कुछ लिख रहे थे। ये देखते ही मेरे ज़हन में फिर से वो ख़याल उभर आए जिनके बारे में मैं भूल गई थी। मन में एक बार फिर से ये जानने की उत्सुकता भर गई कि आख़िर उस किताब में विशेष जी ऐसा क्या लिखते हैं? मैंने अपने ज़हन पर ज़ोर डाला तो मुझे याद आया कि मैंने उन्हें दिन में किसी दिन भी उस किताब में लिखते नहीं देखा था बल्कि उन्हें कुछ कागज़ों पर सिर खपाते हुए और लिखते हुए ही देखा था।

मेरे मन में एक बार फिर से इस सबके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ गई थी इस लिए मैंने फैसला किया कि विशेष जी के सो जाने के बाद आज मैं फिर से उस किताब को उनके बैग से निकाल कर देखूंगी। मैं जानती थी कि इस काम में ख़तरा तो था लेकिन अपने मन की शान्ति और तसल्ली के लिए मुझे ये ख़तरा मोल लेना जैसे मंजूर हो गया था।

मैंने काफी देर तक इंतज़ार किया और आख़िर मेरा इंतज़ार ख़त्म हुआ। विशेष जी ने उस किताब को बंद कर के बैग में रखा और उसमें ताला लगाया। उसके बाद उस बैग को बड़ी सावधानी से ला कर बेड के नीचे रख दिया। इधर मैं पलकों की झिरी से उन्हें ही देख रही थी। विशेष जी बेड पर आए और दूसरी तरफ करवट ले कर लेट ग‌ए। काफी देर बाद जब मैंने महसूस किया कि विशेष जी गहरी नींद में पहुंच गए हैं और उनके हल्के हल्के खर्राटे सुनाई देने लगे हैं तो मैं आहिस्ता से उठी और फिर से उसी तरह मैंने उस बैग से उनकी वो किताब निकाली जैसे उस दिन निकाला था। उसके बाद किताब ले कर मैं सीधा बाथरूम में घुस गई।

मेरे अंदर डर और घबराहट समाई हुई तो थी लेकिन इसके बावजूद मैं अब उस किताब के रहस्य को जानना चाहती थी। मैंने मोबाइल की टार्च जला कर मोबाइल को एक जगह रख दिया। मोबाइल वाली टार्च से इतनी तो रौशनी हो ही गई थी कि मैं उस किताब में लिखी बातें आराम से पढ़ सकती। मैंने किताब के मोटे से कवर को खोला तो मेरी नज़र दाएं तरफ सफ़ेद मोटे पन्ने पर लिखे शब्दों पर पड़ी। मोठे शब्दों में लिखा था____'पर्सनल डायरी।'

मेरे बाबू जी ने मुझे इतना पढ़ाया लिखाया तो था ही कि मैं पर्सनल डायरी का मतलब समझ सकूं। ख़ैर इतना तो मैं समझ गई थी कि वो किताब विशेष जी की पर्सनल डायरी थी और मैं ये भी समझती थी कि पर्सनल डायरी में कोई भी इंसान वही लिखता है जो वो अपने जीते जी किसी भी दूसरे को नहीं पढ़ने दे सकता। मुझे पता था कि किसी की ब्यक्तिगत चीज़ को बिना उसकी इजाज़त के हाथ भी नहीं लगाना चाहिए लेकिन उस वक़्त मैं उसे हाथ भी लगा रही थी और पढ़ने का इरादा भी रखे हुए थी।

मैं ये जानने के लिए मजबूर हो चुकी थी कि विशेष जी ने आख़िर उस किताब में लिखा क्या होगा?

ऊपर वाले को याद कर के मैंने उस किताब के पन्ने को पलटना शुरू किया तो जल्द ही मुझे एक पन्ने पर बहुत कुछ लिखा नज़र आया जिसे मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। उसमें शुरू से यही लिखा था कि_____'हीन भावना कभी कभी ऐसा भी रूप ले लेती है जिसका अंजाम ख़तरनाक भी हो सकता है......।'

शुरु में तो मुझे कुछ समझ न आया लेकिन जैसे जैसे मैं आगे पढ़ती गई वैसे वैसे मेरा दिलो दिमाग़ एक अजीब ही एहसास में डूबता चला गया। मैं किताब में लिखी बातों को पढ़ने में इतना खो गई कि मुझे किसी दूसरी चीज़ का होश ही नहीं रह गया था। विशेष जी ने उस किताब में जो कुछ लिखा था उसने मेरे होश गुम कर दिए थे। मेरे ज़हन ने तो जैसे काम करना ही बंद कर दिया था। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि विशेष जी मेरे बारे में ऐसी सोच रखते थे और इस तरह से मुझे अपनी ज़िन्दगी से दूर कर देना चाहते थे।

अपनी कुरूपता का मुझे भी हमेशा से दुःख था और उसके लिए जब लोग मेरा उपहास उड़ाते थे तो मन करता था कि उस दर्द को पी लेने से तो अच्छा है कि खुद ख़ुशी कर लूं लेकिन अपने माँ बाबू जी का प्यार देख कर हमेशा खुद को समझा लेती थी। अपने जीवन से और बुरे लोगों से भले ही मुझे नफ़रत थी लेकिन इस सबके बावजूद मेरे दिल के किसी कोने में ये हसरत मौजूद थी कि अपने जीवन में कम से कम एक बार तो खुश हो लूं। कम से कम एक बार तो मुझे भी पता चल जाए कि आख़िर ख़ुशी चीज़ क्या होती है? ख़ैर उसके बाद संजोग से जब ख़ुशी मिली तो लगा जैसे अब मुझे सब कुछ मिल गया है। अपने पति का साथ और उनका प्यार मिल गया था मुझे। उस ख़ुशी में मैं जैसे बावली ही हो गई थी। भला मैं ये कल्पना कैसे कर सकती थी कि जिन ख़ुशियों के चलते मैं अपने दुःख दर्द भूल चुकी थी और बावली हो गई थी वो खुशियां मुझे इस दुनियां में चंद दिनों का मेहमान बनाने के लिए मिल रहीं थी।

किताब में जितना कुछ विशेष जी ने लिखा था वो सब मैंने पढ़ लिया था और सच तो ये है कि उस सबको पढ़ने के बाद दिल तो ये कह रहा था कि ऐसे इंसान को सोते में ही उसका गला घोंट कर मार दूं लेकिन फिर मैंने किसी तरह अपने अंदर उमड़ते उन जज़्बातों को रोका। उस किताब में लिखी दास्तान को पढ़ने के बाद जैसे सब कुछ शून्य सा हो गया था। ऐसा लग रहा था जैसे अब इस दुनियां में कुछ है ही नहीं और अगर कुछ है भी तो वो है___हर इंसान से नफ़रत और घृणा। अगर मेरे बस में होता तो मैं इस दुनियां से पूरी मानव जाती को ही समाप्त कर देती।

अपने आपको बड़ी मुश्किल से मैंने सम्हाला और चुप चाप कमरे में आ कर उस किताब को उसी तरह बैग में रख दिया जैसे उसमें से निकाला था। बेड पर एक तरफ सोए पड़े विशेष जी पर जब मेरी नज़र पड़ी तो सहसा मेरे अंदर एक तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ।

मन किया कि उसी वक़्त उस इंसान को जगाऊं और उसका गिरेहबान पकड़ कर उससे पूछूं कि अगर उसे मुझसे इतनी ही नफ़रत थी तो मुझे ऐसी खुशियां क्यों दी थी? वो मुझसे एक बार कह देता कि मैं उसकी ज़िन्दगी से हमेशा के दूर हो जाऊं तो मैं ख़ुशी ख़ुशी उसकी ज़िन्दगी से दूर हो जाती। इसके पहले साढ़े चार सालों तक उससे दूर ही तो थी और उसके बिना जी ही तो रही थी तो बाकी सारी ज़िन्दगी भी उसके बिना ही जी लेती। कम से कम ये सब तो देखना न पड़ता और ना ही इस सबके दुःख में मेरा दिल बुरी तरह से दुःख जाता।

मन में गुस्सा और नफ़रत तो हद से ज़्यादा भर गई थी लेकिन उस वक़्त मैंने विशेष जी को जगा कर उनसे कुछ भी नहीं कहा था। मैं तो बस बेड पर लेटी उस सबके बारे में सोच सोच कर आंसू बहा रही थी। पता नहीं कब उसी हालत में मेरी आँख लग गई थी।

सुबह आँख खुली तो ज़हन में रात की सारी बातें उभर आईं जिसकी वजह से दिल में बड़ा तेज़ दर्द हुआ। मेरे मन में ख़याल उभरा कि मुझे अपने चेहरे से ऐसा ज़ाहिर नहीं होने देना चाहिए कि मुझे विशेष जी की असलियत पता चल गई है। आख़िर अब मैं भी तो देखूं कि वो बेगैरत इंसान मुझे अपनी ज़िन्दगी से दूर करने के लिए आगे और क्या क्या करता है? ये सोच कर मैंने खुद को सम्हाला और बाथरूम में घुस गई।

मैंने विशेष जी को ज़रा भी इस बात का शक नहीं होने दिया कि उनके मंसूबों के बारे में मुझे पता चल चुका है। मैं उनके सामने वैसा ही बर्ताव करती जैसा अब तक करती आई थी। मैं वैसे ही ख़ुशी में बावली बनी रही जैसे अब तक बनी हुई थी। अकेले में मैं ये सोच सोच कर दुखी होती कि आख़िर वो किस तरह इंसान है जिसके सीने में दिल तो है लेकिन उसमें किसी के लिए कोई जज़्बात नहीं हैं। कोई इंसान इतना कठोर कैसे हो सकता है कि किसी को अपने जीवन से हटाने के लिए इस हद तक गिर कर मंसूबा बना ले?

दूसरे दिन दोपहर को मैं कमरे में बेड पर लेटी हुई विशेष जी के बारे में ही सोच रही थी कि तभी मेरे मोबाइल पर मैसेज की रिंग बजी तो मैंने मोबाइल उठा कर मैसेज देखा। किसी अनजान नंबर से मैसेज आया हुआ था। मैंने उस मैसेज को खोल कर देखा तो बुरी तरह चौंक ग‌ई। भेजने वाले ने इस तरीके से मैसेज लिख कर भेजा था जैसे वो मेरा प्रेमी हो और मैं उसकी प्रेमिका। पहले तो मुझे कुछ समझ न आया कि ये कौन है जिसने इस तरह का मैसेज भेजा है मुझे। कुछ देर बाद फिर से उसका मैसेज आया और फिर एक के बाद आता ही रह। मैं उन संदेशों को पढ़ कर स्वाभाविक रूप से परेशान हो ग‌ई। मैंने उस अनजान ब्यक्ति के मैसेजेस का कोई जवाब नहीं दिया था। कुछ देर तक मैं मन ही मन सोचती रही कि ऐसा कौन कर सकता है? मेरा मोबाइल नंबर मेरे पति के अलावा सिर्फ मेरे माँ बाबू जी और मेरे भाई के ही पास था तो फिर ये अंजान आदमी कौन है और इस तरह के सन्देश क्यों भेज रहा है मुझे? सहसा मेरे दिमाग की बत्ती जली।

मुझे विशेष जी की डायरी में लिखी बातों का ख़याल आ गया। उसमें उन्होंने साफ़ लिखा था कि वो जिस कंपनी में काम करते हैं वहां पर निशांत सोलंकी नाम का कोई उनका सीनियर है जिसे वो अपने ऐसे ख़तरनाक प्लान में फ़साने का सोचे हुए हैं। उसी आदमी के साथ मेरे नाजायज़ सम्बन्ध बने हुए साबित करना चाहते थे।

मैं क्योंकि विशेष जी डायरी पढ़ चुकी थी इस लिए मैं समझ गई थी कि वो अंजान आदमी कोई और नहीं बल्कि मेरा पति ही है। अपनी समझ में वो निशांत सोलंकी बन कर मुझे ऐसे सन्देश भेज रहे थे। अपने प्लान के अनुसार वो अपना कार्य कर रहे थे इस लिए मैंने भी सोचा कि देखूं तो सही कि आख़िर वो ये सब किस तरह से करते हैं? मैंने भी सोच लिया कि मैं भी अब वैसा ही करुँगी जैसा वो चाहते हैं। दो दिन तक मैंने उनके संदेशों का कोई जवाब नहीं दिया था। आख़िर स्वाभाविक रूप से उन्हें ये तो लगना ही चाहिए था कि ऐसी परिस्थिति में मैं क्या करती? ख़ैर तीसरे दिन मैंने ये सोच कर जवाब दिया कि उन्हें यही लगे कि मैं उन संदेशों से बहुत परेशान हो गई हूं। जब मैंने जवाब दिया तो पहले तो वो मेरा प्रेमी बन कर मैसेज किए किन्तु फिर वो एकदम से मुझसे मेरी नंगी फोटो मांगने लगे और धमकी देते हुए कहा कि अगर मैंने अपनी नंगी फोटो उन्हें नहीं भेजी तो वो मेरी नंगी फोटो मेरे पति के पास भेज देंगे।

उनकी डायरी के द्वारा मैं जान चुकी थी कि उस दिन उन्होंने चोरी से होटल के कमरे में मेरी फोटो खींच ली थी इस लिए मैं ये समझ गई थी कि वो उन्हीं फोटो को भेज देने की मुझे धमकी दे रहे थे लेकिन मैंने मैसेज में यही लिखा कि उनके पास मेरी फोटो कैसे हो सकती है? मेरे पूछने पर उन्होंने सबूत के तौर पर मेरी फोटो भेज दी जिसे देख कर यकीनन मेरे होश उड़ गए थे। मैं ये सोच कर हैरान भी हुई थी कि वो आदमी अपने फ़ायदे के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। ख़ैर फोटो देख कर मैंने वैसा ही बर्ताव किया जैसा कि उस परिस्थिति में किसी भी साधारण घरेलू पत्नी को करना चाहिए था। उसके बाद उनके अनुसार जब मैं मजबूर हो गई तो मैंने बेबस और लाचार बन कर उन्हें अपनी फोटो भेज दी। शर्म तो मुझे बहुत आई थी लेकिन खुद को तसल्ली भी दी कि आख़िर मेरी फोटो गई तो मेरे पति के पास ही है ना और वैसे भी मैं तो ये देखना चाहती थी कि वो अपने मंसूबों को परवान कैसे चढ़ाते हैं?

शाम को विशेष जी जब घर आए तो मैं उनके सीने से वैसे ही लिपट गई जैसे ऐसी परिस्थिति में कोई भी बेबस और दुखी बीवी करती। आख़िर विशेष जी को भी तो ये लगना चाहिए था ना कि सब कुछ वैसा ही हो रहा है जैसा वो चाहते हैं या जैसा उन्होंने प्लान बनाया हुआ है। इतना तो मैं भी समझ गई थी कि वो मुझे बिल्कुल ही बेवकूफ और मूर्ख समझते थे।

उन्हें लगता था कि मैं गांव देहात की एक मामूली सी लड़की हूं जिसके ज़हन में ऐसी बातें आ ही नहीं सकतीं थी और शायद यही वजह थी कि वो कमरे में मेरी मौजूदगी के बावजूद मेरे सो जाने के बाद उस किताब में वो सब लिखते थे। इंसान जब ख़ुद को कुछ ज़्यादा ही होशियार और चालाक समझने लगता है तो फिर वो बाकी सबको मूर्ख ही समझता है। यही हाल विशेष जी का था।

इन्सान को जब पता चल जाए कि उसका कोई अपना उसके लिए किस तरह का षड़यंत्र रच रहा है और उसे खुद से हमेशा के लिए दूर कर देने के लिए किस हद तक गिर जाने वाला है तो भला ऐसे में उस इंसान को चैन की नींद कैसे आ सकती है? मेरा भी यही हाल था। वैसे तो मैं विशेष जी के सामने वैसा ही बर्ताव और वैसी ही ख़ुशी में बावली हो जाने का दिखावा कर रही थी लेकिन मन में चौबीसों घंटे यही ख़याल रहता था कि अब वो आगे क्या और कैसे करने वाले हैं? उस रात भी उन्होंने मुझे एक अच्छे पति की तरह प्यार दे कर खुश कर दिया था। उसके बाद जैसा कि हमेशा होता था मैं प्यार की मदहोशी में ही सो गई थी। हालांकि सच तो ये था कि उस रात मैं सोइ नहीं थी बल्कि सो जाने का नाटक किया था मैंने। मेरे मन में कहीं न कहीं ये बात ज़रूर थी कि मेरे सो जाने के बाद विशेष जी फिर से उस किताब में आगे का अपना प्लान लिखेंगे।

जब विशेष जी को पूरी तरह यकीन हो गया कि मैं गहरी नींद में जा चुकी हूं तो वो चुपके से उठे और अपने काम में लग गए। बेड पर लेटी मैं पलकों की झिरी से देख रही थी कि वो क्या कर रहे थे। कमरे में अँधेरा था लेकिन बहुत ही हल्की हल्की ऐसी आवाज़ सुनाई दे रही थी जैसे बेड के नीचे से कोई किसी चीज़ को सरका रहा है। मैं जानती थी कि वो चीज़ उनका वो बैग ही था जिसमें उनकी पर्सनल डायरी थी।

थोड़ी ही देर में मैंने देखा कि कमरे के एक कोने में टेबल लैंप जला और विशेष जी उस किताब को ले कर कुर्सी पर बैठ ग‌ए। मेरे दिल की धड़कनें ये सोच कर थोड़ा तेज़ हो गईं थी कि आज वो अपनी डायरी में अपने प्लान का आख़िरी हिस्सा लिखने वाले हैं। यानी वो लिखने वाले हैं कि किस तरह वो मुझे निशांत सोलंकी के फ्लैट पर ले जाएंगे और फिर वहां पर मेरे साथ क्या क्या होगा? उनकी डायरी में मैंने जहां तक पढ़ा था वहां तक यही लिखा था उन्होंने कि वो निशांत सोलंकी की हत्या के जुर्म में मुझे फंसा देना चाहते हैं लेकिन ऐसा वो करेंगे कैसे ये उन्होंने नहीं लिखा था। मेरे मन में भी यही जानने की उत्सुकता थी कि आख़िर वो ऐसा किस तरह से करेंगे कि मैं निशांत सोलंकी की हत्या के जुर्म में फंस जाऊं और फिर अदालत में मुझे फांसी की या उम्र क़ैद की सज़ा हो जाएगी?

वक़्त बड़ी मुश्किल से गुज़रा। विशेष जी ने उस किताब को बैग में रख कर ताला लगाया और बैग को बेड के नीचे बहुत ही आहिस्ता से सरका दिया। उसके बाद टेबल लैंप बुझा कर वो बेड पर आ कर लेट ग‌ए।

इसके पहले जहां वो मेरे सो जाने का इंतज़ार कर रहे थे वहीं अब मैं उनके सो जाने का इंतज़ार करने लगी थी। आधे घंटे बाद मुझे उनकी तरफ से हल्के खर्राटों की आवाज़ सुनाई देने लगी तो मैं समझ गई कि मेरा पति अब घोड़े बेंच कर चैन की नींद सो चुका है। कुछ देर मैंने और परखा और फिर बहुत ही आहिस्ता से बेड से उतर कर उनके बैग से उसी तरह वो डायरी निकाली जैसे पहले दो बार निकाल चुकी थी। डायरी ले कर मैं सीधा बाथरूम में घुस गई।

बाथरूम में आ कर मैंने जल्दी से मोबाइल की टोर्च जलाई और उसकी रौशनी में उस डायरी को खोल कर उसी जगह से आगे पढ़ना शुरू किया जहां पर विशेष जी ने उस रात डायरी में आगे लिखा था। मैं साँसें रोके पढ़ती ही चली जा रही थी। मेरे चेहरे पर हैरत के साथ साथ दुःख तक़लीफ के भाव भी उभरते जा रहे थे।

डायरी में मैंने उनका लिखा हुआ बाकी सब कुछ तो पढ़ लिया लेकिन मुझे ये देख कर बहुत ज़्यादा दुःख हुआ कि कहीं पर भी उन्होंने ये नहीं लिखा था कि मेरे प्रति उनके दिल में ज़रा से भी जज़्बात थे। एक मैं थी कि उनका प्यार देख कर ख़ुशी से बावली हो गई थी और एक वो थे कि पत्थर के पत्थर ही बने रहे। दिलो दिमाग़ में आग सी सुलग उठी थी। एक ऐसा तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था जो अब मेरे रोकने पर भी रुकने वाला नहीं था। जिसने मुझे ऐसा रंग रूप दिया था उसको याद कर के एक बार फिर उससे कहा कि मेरी इतनी इबादत करने के बावजूद तुमने मेरे पति के दिल में मेरे प्रति प्रेम के जज़्बात पैदा नहीं किए। मेरे जज़्बात जैसे बगावत करने पर उतारू हो गए थे। गुस्सा नफ़रत और घृणा इस क़दर भर गई थी कि अब बस यही लगने लगा था कि सब कुछ तहस नहस कर दूं।

अपने पति की डायरी को चुप चाप बैग में डाल कर उसे बेड के नीचे रख दिया और फिर बेड पर आ कर लेट गई। ह्रदय जल रहा था, रूह विलाप कर रही थी और आँखों से गर्म नीर बह रहा था जो किसी तेज़ाब से कम नहीं था। ऐसी हालत में भला मुझे नींद कैसे आ सकती थी इस लिए सारी रात अपने और अपने जीवन के बारे में सोचती रही। आख़िर में मैंने एक ऐसा फैसला किया जिसके बारे में उसके पहले मैं खुद भी कभी कल्पना नहीं कर सकती थी। जिस इंसान के लिए मैंने अपना मायका तक त्याग दिया था और ये सोच कर साढ़े चार सालों से अपने सास ससुर की सेवा करती रही थी कि शायद एक दिन उस इंसान को मुझ में मेरी कुरूपता के अलावा भी कुछ दिख जाए और वो मुझे अपना ले, लेकिन वो इंसान तो हमेशा पत्थर दिल ही बना रहा। अगर वो उसी तरह सारी ज़िन्दगी भी पत्थर दिल बना रहता तो मुझे इतना दुःख न होता लेकिन उसने झूठे प्यार का दिखावा कर के मुझे छला और मेरे जज़्बातों के साथ खेला। इतना ही नहीं बल्कि किसी पराए इंसान के साथ मेरा सम्बन्ध जोड़ कर मेरे चरित्र पर कीचड़ उछालने का भी सोच लिया।

क्या ऐसे इंसान को इस सबके बावजूद इस दुनियां में जीने का हक़ हो सकता था? मेरी नज़र में तो हर्गिज़ नहीं, बल्कि उसे तो उसी के खोदे हुए उस गढ्ढे में गिरा कर दफ़न कर देना चाहिए था जो गड्ढा वो मेरे लिए खोद चुका था।

डायरी के अनुसार अगले दिन की रात वो दो ज़िन्दिगियों का फ़ैसला करने वाला था और इसके लिए वो क्या करने वाला था ये मैं उसकी डायरी के द्वारा जान चुकी थी। इस लिए मैंने भी मन ही मन सोच लिया था कि अब मुझे क्या करना है।

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Chapter - 02
[ Reality & Punishment ]
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Update - 12
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दूसरे दिन सब कुछ वैसा ही शुरू हुआ जैसा कि हमेशा ही होता था। न विशेष जी ने अपने चेहरे से कुछ ज़ाहिर किया और ना ही मैंने। वो अपने मंसूबों की तरफ बढ़ रहे थे और मैं ये सोच रही थी कि जिस इंसान के दिल में मेरे प्रति ज़रा सा भी दया या प्रेम भाव नहीं है उस इंसान को उसकी करनी की सज़ा कैसे दूं? अपने पति को सज़ा देने का तो मैंने पूरी तरह फ़ैसला कर लिया था। इसके लिए अब मैं किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहती थी लेकिन मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल ये था कि मैं उस इंसान को सज़ा दूं तो दूं कैसे? मुझे अपने जीवन का अब कोई मोह नहीं रह गया था। मैं चाहती तो उसी रात सोते में चाक़ू से उसका गाला घोंट कर उसको जान से मार देती लेकिन मेरे मन में ख़याल उभरा था कि ऐसे आदमी को भी उसी तरीके से मारा जाए जिस तरीके से इसने मुझे अपनी ज़िन्दगी से दूर करने का मंसूबा बनाया था।

विशेष जी ऑफिस चले गए थे। मैं जानती थी कि आज शाम जब वो आएंगे तो मुझसे कहेंगे कि उनके एक दोस्त ने हम दोनों को अपने यहाँ डिनर पर बुलाया है। उनके ऐसा कहने पर एक अच्छी पत्नी होने का सबूत देते हुए मुझे उनके साथ जाना ही पड़ेगा। उनका यही तो प्लान था और मैं भी उनके प्लान के अनुसार ही चलना चाहती थी। ख़ैर बड़ी मुश्किल से दिन गुज़रा और शाम हुई। जैसे जैसे वक़्त क़रीब आ रहा था मेरी धड़कनें कभी तेज़ होने लगतीं तो कभी थम सी जाती थीं।

शाम को विशेष जी ऑफिस से आए तो मैंने देखा था कि वो बड़ा खुश लग रहे थे। ज़ाहिर है कि वो ख़ुशी इसी बात की थी कि सब कुछ वैसा ही हो रहा है जैसा उन्होंने प्लान बनाया था। आते ही उन्होंने पहले तो मुझे ख़ुशी से अपने गले लगाया और फिर मुझसे कहा कि जल्दी से तैयार हो जाओ जान क्योंकि हम दोनों को मेरे एक दोस्त ने अपने यहाँ डिनर पर बुलाया है। उनकी बात सुन कर मैंने स्वाभाविक रूप से कुछ सवाल किए और अपने रंग रूप की बात कर के उनसे ये भी कहा कि मुझे अपने साथ ले जाने से उनका दोस्त क्या सोचेगा उनके बारे में? मेरी इस बात पर उन्होंने कहा कि उन्हें किसी के कुछ भी सोचने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता जान क्योंकि अब तुम मेरी जान हो और मेरे लिए सबसे ख़ास हो। मैं भला कैसे उनके प्लान को ख़राब कर सकती थी इस लिए मैंने ख़ुशी से उन्हें हाँ कह दिया था।

घर से क़रीब साढ़े आठ बजे हम दोनों निकले थे। विशेष जी के कहने पर मैंने शलवार शूट पहन रखा था और उसके साथ मेरे हाथ में मेरा एक छोटा सा पर्श था। सड़क पर आ कर मैंने विशेष जी से पूछा कि हम उनके दोस्त के यहाँ तक क्या किसी टैक्सी या ऑटो में जाएंगे तो उन्होंने कहा कि उनके दोस्त का घर ज़्यादा दूर नहीं है इस लिए हम दोनों पैदल ही चलते हैं। कम से कम इसी बहाने थोड़ा टहलना भी हो जाएगा। उनकी बात सुन कर मुझे थोड़ा अटपटा सा तो लगा पर फिर मुझे ये ख़याल आया कि हो सकता है कि वो किसी ऑटो या टैक्सी से इस लिए न जाना चाहते होंगे ताकि बाद में कोई ऑटो या टैक्सी वाला सबूत या गवाह न बन जाए पुलिस के लिए। मुझे अपना ये ख़याल पूरी तरह ठीक लगा, और इस ख़याल के साथ ही मैंने ये सोचा कि मेरे पति ने काफी कुछ सोच कर प्लान बनाया हुआ था। अगर मैंने उनकी डायरी न पढ़ी होती तो यकीनन मैं इस सबके बारे में कल्पना भी नहीं कर सकती थी।

निशांत सोलंकी जिस जगह रहता था वहां पर न‌ई न‌ई इमारतें बन रहीं थी। सब एक ही तरह की इमारतें थी। निशांत वाली इमारत भी न‌ई ही थी किन्तु इसका काम आधा हो चुका था। तीन फ्लोर में से एक फ्लोर उसका था और बाकी के फ्लोर अभी खाली पड़े थे। इस तरफ का पूरा एरिया मुख्य सड़क से दाईं तरफ मुड़ने के बाद थोड़ा अंदर की तरफ पड़ता था। हालांकि मुख्य सड़क से यहाँ की इमारतें साफ़ दिखाई पड़ती थीं। सड़क के दूसरी तरफ भी वैसी ही इमारतें थी जिनमें कई इमारतों पर लोगों की रिहाइश हो गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि विशेष जी का दोस्त ऐसी जगह पर क्यों रहता होगा? एक पल के लिए तो मेरे ज़हन में ये ख़याल भी आ गया था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि विशेष जी इस सुनसान एरिया में मुझे जान से मारने ही ले आए हों और उन्होंने अपना पहले वाला प्लान रद्द कर दिया हो? ख़ैर मेरे पूछने पर विशेष जी ने बताया कि निशांत सोलंकी कंपनी के काम के अलावा भी कुछ ऐसे काम करता है जिनमें उसकी अच्छी कमाई होती थी। इस जगह पर रहने की यही वजह है। विशेष जी ने मुझे निशांत की असलियत खुल कर नहीं बताई थी, जबकि मैं उनकी डायरी के द्वारा जान चुकी थी कि निशांत एक औरतबाज़ आदमी था और उसके लिए ऐसी जगह पर रहना बिलकुल ठीक ही था क्योंकि यहाँ रह कर वो अपने तरीके से कुछ भी कर सकता था।

विशेष जी अपनी डायरी में साफ़ लिख चुके थे कि वो निशांत के साथ दोहरा खेल खेल रहे थे। यानि एक तरफ तो वो उससे कह चुके थे कि वो अपनी बीवी को डिनर का बहाना करके उसके फ्लैट पर ले आएंगे और फिर बियर पिला कर उसको नशे में चूर कर देंगे। जब वो नशे में चूर हो जाएगी तो उसके साथ फिर कुछ भी किया जा सकता है। निशांत सोलंकी भी यही समझ रहा था लेकिन विशेष जी का असल मकसद तो कुछ और ही था।

क्योंकि वो भी जानते थे कि निशांत जब मुझ कुरूप औरत को देखेगा तो ज़ाहिर है कि वो कितना भी औरतबाज़ हो लेकिन मेरे साथ कुछ भी करने का नहीं सोचेगा। यही सब सोच कर विशेष जी ने अपने असल मकसद को अंजाम देने के लिए कुछ और ही सोचा होगा। डायरी में उन्होंने ये नहीं लिखा था कि वो निशांत की हत्या कैसे करेंगे और कैसे उसकी हत्या में मुझे फंसाएँगे? शायद वो ये सब तब लिखने वाले थे जब वो सब कुछ करने के बाद निशांत की हत्या में मुझे फंसा देते। वो हत्या कैसे करेंगे और कैसे उस हत्या में मुझे फसाएँगे अगर इसके बारे में उन्होंने अपनी डायरी में लिखा होता तो मुझे भी समझने में आसानी हो जाती कि मुझे इसके आगे क्या करना चाहिए था अपने बचाव के लिए या उन्हें सज़ा देने के लिए। ख़ैर मन में तो हज़ारों तरह के ख़याल उभर रहे थे लेकिन मैं विशेष जी के अगले क़दम का इंतज़ार कर रही थी।

मैं और विशेष जी सीढ़ियों के द्वारा निशांत के फ्लैट की तरफ बढ़ चले। मैं उनके चेहरे को कनखियों से देख लेती थी और उस वक़्त मुझे उनके चेहरे पर सोचो के हल्के भाव और हल्का पसीना उभरा हुआ महसूस हो रहा था। मैं समझ सकती थी कि कहने और करने में बहुत फ़र्क होता है। अब तक उन्होंने जो कुछ किया था वो भले ही उनके लिए आसान रहा था लेकिन किसी की हत्या करना आसान काम नहीं हो सकता था। उन्होंने कोट पहना हुआ था और अपनी कोट की जेब में ही उन्होंने वो चाक़ू छुपा रखा था जिसे वो किचन से उठा कर लाए थे और ये मैंने खुद अपनी आँखों से देखा था। ख़ैर फ्लैट के दरवाज़े पर पहुंच कर विशेष जी रुके और मुझसे बोले कि निशांत को शराब पीने की आदत है इस लिए पहले वो अंदर जाएंगे और अंदर जा कर देखेंगे कि निशांत इस वक़्त किस कंडीशन में है? अगर वो नशे में हुआ तो वो मुझे अंदर नहीं ले जाएंगे क्योंकि उनके अनुसार निशांत नशे में बहुत गन्दी गन्दी बातें करता है और वो नहीं चाहते कि मेरी मौजूदगी में वो कोई गन्दी बातें करे।

विशेष जी की बातें सुन कर पता नहीं क्यों मेरे ज़हन में बिजली की तरह ये ख़याल उभरा कि वो ख़ुद पहले जाने की बात इसी लिए कर रहे हैं तांकि वो अकेले अंदर जाएं और निशांत की उस चाक़ू से हत्या कर दें। उसके बाद वो मुझे अंदर बुलाएँगे और जब मैं अंदर जाऊंगी तो वो चुपके से बाहर निकल कर दरवाज़े को या तो बाहर से बंद कर देंगे या फिर यहाँ से भाग जाएंगे। उसके बाद ज़ाहिर है कि हत्या का इल्ज़ाम मेरे ऊपर ही आएगा। इसके लिए संभव है कि वो पुलिस को इस हत्या की सुचना दे दें। इस ख़याल के आते ही मैं अंदर ही अंदर बुरी तरह कांप गई थी। दिल ज़ोरों से धड़कनें लगा था। फिर एकदम से मेरे ज़हन में ख़याल आया कि क्यों न उनके जाने के बाद मैं भी चुपके से अंदर जाऊं और देखूं कि वो क्या करते हैं?

मैंने विशेष जी की बातें सुन कर हाँ में सिर हिलाया तो वो दरवाज़ा खोल कर अंदर दाखिल हो गए।

मैं ये देख कर थोड़ा चौंक गई थी कि दरवाज़ा पहले से ही खुला हुआ था। इसका मतलब उन्होंने निशांत से पहले ही बोल दिया रहा होगा कि वो दरवाज़ा खुला ही रखें। वैसे भी निशांत के अलावा इस इमारत में कोई रहता तो था नहीं। ख़ैर विशेष जी अंदर दाखिल हुए और दरवाज़े को ऐसे ही भिड़ा कर अंदर की तरफ चले गए। उनके ज़हन में दूर दूर तक ये बात नहीं थी कि मैं उनकी असलियत के बारे में सब जानती हूं और उनके पीछे अंदर भी आ सकती हूं। उनके जाते ही मैं भी अंदर दाखिल हो ग‌ई।

अंदर एक मध्यम साइज़ का ड्राइंग रूम था जहां पर कुछ सोफे रखे हुए थे। उसके बगल से एक कमरा था। दूसरी तरफ एक और कमरा था जो कि उस वक़्त बंद था। ड्राइंग रूम में बाएं तरफ थोड़ी दूरी पर एक और छोटा सा हॉल था जहां पर एक आयताकार टेबल थी और उसके चारो तरफ कुर्सियां रखी हुईं थी। बाहर वाले दरवाज़े से अंदर आने के बाद क़रीब चार फिट चौड़ी गैलरी पड़ती थी जिसकी लम्बाई मुश्किल से दस मीटर रही होगी। यानि अगर बाहर से कोई दबे पाँव अंदर आए तो अंदर वाले को न तो दिखेगा और ना ही उसे पता चल सकेगा।

उस गैलरी से चल कर जब मैं अंदर की तरफ दबे पाँव आई तो मेरे कानों में बहुत ही धीमी आवाज़ सुनाई पड़ी जो कि निशांत की थी। वो विशेष जी से कह रहा था कि वो अकेला क्यों आया है, बल्कि भाभी जी को साथ में क्यों नहीं ले आया? उसके सवाल पर विशेष जी ने उसे बताया कि वो मुझे ले कर ही आए हैं और मैं इस वक़्त बाहर ही हूं। मैंने थोड़ा सा उस तरफ झाँक कर देखा तो मेरी नज़र टेबल के पास ही खड़े विशेष जी पर पड़ी। उनका एक हाथ कोट की जेब में था और वो कुर्सी पर बैठे निशांत को ही देख कर बातें कर रहे थे। मेरी तरफ निशांत की पीठ थी जबकि विशेष जी मुझे बगल से दिख रहे थे। मेरा दिल बड़े ज़ोरों से धड़क रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे वक़्त में मुझे क्या करना चाहिए? मैं अच्छी तरह जानती थी कि विशेष जी अपने उस सीनियर की हत्या करने वाले थे और फिर उसकी हत्या में मुझे फंसा देने वाले थे।

सहसा मेरी नज़र बाएं तरफ पड़ी। उस तरफ एक कमरा था, जबकि दूसरा कमरा उस तरफ था जहां पर वो लोग मौजूद थे। मुझे समझ में तो कुछ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं और क्या न करूं लेकिन मैं यूं ही उस कमरे की तरफ बड़ी सावधानी से खिसक चली थी। कुछ ही पलों में मैं उस कमरे में थी। कमरे में आई तो देखा बड़े से कमरे में एक तरफ बेड बिछा हुआ था और एक तरफ एक आलमारी रखी हुई थी। आलमारी के बगल से एक टेबल था जिसमें कई सारे खंधे थे। कमरे में पूरी तरह प्रकाश फैला हुआ था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उस कमरे में आख़िर मैं आई किस लिए थी, जबकि मैं ये अच्छी तरह जानती थी कि दूसरी तरफ मेरा पति निशांत सोलंकी की हत्या कर के मुझे फंसा देने वाला था।

उस वक़्त पता नहीं मेरे ज़हन में क्या आया था कि मैं टेबल के पास गई और एक एक कर के सभी खंधों को खोल कर देखने लगी। मैं खुद नहीं जानती थी कि मैं उस वक़्त उन खंधों में क्या खोज रही थी, लेकिन उस वक़्त मेरे हड़बड़ाए हुए ज़हन में जो आ रहा था मैं वही करती जा रही थी। इतनी सावधानी ज़रूर बरत रही थी कि कोई आवाज़ न हो क्योंकि आवाज़ होने से मेरे लिए ही ख़तरा हो जाना था। टेबल में दाएं से बाएं और ऊपर से नीचे तीन तीन करके खंधे थे। दाएं तरफ के सभी खंधे खोल कर देखने के बाद जैसे ही मैंने बीच वाली लाइन के ऊपर वाले खंधे को खोला तो मैं एकदम से जाम सी हो गई। मेरी नज़र उस खंधे में रखे पिस्तौल को देख कर ठहर गई थी और मेरी सारी हरकतों को जैसे एक ही पल में ब्रेक सा लग गया था।

पिस्तौल देख कर कुछ देर तक तो मैं भौचक्की सी खड़ी ही रह गई थी, फिर जैसे ज़हन सक्रिय हुआ तो एकदम से मेरे दिमाग़ में ख़याल आया कि इस पिस्तौल से मैं अपने पति को सज़ा दे सकती हूं। ख़याल अच्छा भी था और बेहद ख़तरनाक भी। मेरा दिल ज़ोरों से धड़के जा रहा था लेकिन मेरे अंदर डर और घबराहट जैसी बात नहीं आई थी। ऐसा शायद इस लिए कि अब मुझे न तो अपने जीवन की परवाह थी और ना ही किसी और के। दिलो दिमाग़ में तो बस एक ही हसरत रह गई थी कि उस इंसान को ख़त्म कर दूं जिसने प्यार के नाम पर मेरे जज़्बातों से खेला था और जिसके लिए मैंने इतना कुछ किया था। उसके दिल में मेरे प्रति ज़रा सा भी कहीं कोई एहसास नहीं था। अरे! एहसास को छोड़ो, उसने तो मुझ पर ज़रा सा तरस भी नहीं खाया था।

पिस्तौल को देख कर और ये सब सोच सोच कर मेरे अंदर के जज़्बात एक बार फिर से बुरी तरह मचल उठे थे। मैंने टेबल के उस खंधे से पिस्तौल को हाथ में लिया। ठंडी पिस्तौल हाथ में आते ही मेरे जिस्म का रोयां रोयां एक अजीब से एहसास से कंपकंपा गया। मैंने आँखें बंद कर के दो तीन बार गहरी गहरी साँसें ली और चुपके से कमरे के दरवाज़े की तरफ चल पड़ी।

कमरे के दरवाज़े से झाँक कर मैंने उन दोनों की तरफ देखा तो इस बार चौंक ग‌ई थी मैं, क्योंकि इस बार विशेष जी के हाथ में चाक़ू था और उन्होंने उस चाक़ू वाले हाथ को अपने पीछे किया हुआ था। मैं समझ गई कि अब वो निशांत की हत्या करने का मन बना चुके हैं। इससे पहले कि वो गर्दन घुमा कर इस तरफ देखते मैं जल्दी से निकल कर गैलरी में आ कर छुप ग‌ई। मेरी धड़कनें बुरी तरह धड़कते हुए मेरी कनपटियों पर चोट कर रहीं थी। मैं अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को अभी काबू ही कर रही थी कि तभी किसी के आने की पदचाप मेरे कानों में पड़ी तो मैं थोड़ा और पीछे खिसक कर छुप ग‌ई। कुछ ही पलों में मैंने देखा विशेष जी चाकू वाला हाथ अपनी कोट में डाले उसी कमरे की तरफ बढ़ गए जिस कमरे से अभी मैं निकली थी।

मुझे समझ न आया कि वो उस कमरे में क्यों गए थे? अभी मैं ये सोच ही रही थी कि तभी विशेष जी की आवाज़ मेरे कानो में पड़ी। वो निशांत को आवाज़ दे कर कमरे में आने को कह रहे थे। उनके आवाज़ देने पर निशांत की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। वो बोल रहा था अब क्या है यार? अपनी बीवी को आख़िर कब मेरे पास ले कर आओगे तुम? मेरा सारा नशा उतर जाएगा तब ले कर आओगे क्या? निशांत की इस बात पर विशेष जी ने कहा कि मेरी बीवी तो आपके कमरे में ही है सर। असल में मैंने उसे सब कुछ साफ़ साफ़ बता दिया था। जब मैंने उससे ये कहा कि उस सबके बदले मेरा प्रमोशन हो जाएगा और उसके साथ साथ ज़्यादा सैलरी, नया फ़्लैट और एक कार भी मिल जाएगी आने जाने के लिए तो वो बेहद खुश हो गई थी। मैंने उसे समझाते हुए कहा था कि बस एक ही बार की तो बात है जान उसके बाद तो हमारी ज़िन्दगी ऐशो आराम वाली हो जाएगी। मेरी बात सुन कर वो भी ख़ुशी से इस सबके लिए राज़ी हो गई थी। विशेष जी की ये बातें सुन कर निशांत बोला कि तो तुमने अब तक मुझे धोखे में क्यों रखा हुआ था भाई? निशांत की इस बात पर विशेष जी ने उससे कहा कि वो उसे सर्प्राइज़ देना चाहते थे।

निशांत सोलंकी ख़ुशी से झूम उठा था इस लिए बिना कुछ सोचे समझे वो शराब के नशे में झूमते हुए फ़ौरन ही अपने कमरे की तरफ भागता हुआ आया था। इधर मेरी धड़कनें और भी बुरी तरह से ये सोच कर बढ़ गईं थी कि मेरा पति उसकी हत्या उसी के कमरे में ये सोच कर करना चाहता है ताकि बाद में सबको यही लगे कि मैं उसके कमरे में थी और वहीं पर मैंने उसकी हत्या की थी।

निशांत जैसे ही मेरी आँखों के सामने से गुज़रा तो मैं भी जल्दी से आगे बढ़ चली। हलांकि उस वक़्त मैं चाहती तो वहां से चुप चाप अपने फ़्लैट पर लौट जाती और निशांत की हत्या के बाद अगर उसकी हत्या का इल्ज़ाम मेरे ऊपर आता तो मैं पुलिस को साफ़ साफ़ बता देती कि असली हत्यारा मेरा पति ही है और इसका सबूत उसके बैग में मौजूद उसी की लिखी डायरी है। डायरी मिलने के बाद पुलिस को सब कुछ समझ में आ जाता और मेरे ऊपर कोई इल्ज़ाम नहीं लगता लेकिन मैं जान बूझ कर ऐसा नहीं करना चाहती थी। मैं उस जैसे इंसान का अपने हाथों से खून करना चाहती थी। उस बेगैरत इंसान को अपने हाथों से उसके किए की सज़ा देना चाहती थी। उसके लिए अगर मुझे अदालत में मौत की सज़ा भी सुना दी जाती तो मुझे कोई ग़म नहीं होता।

मैं अभी कमरे के थोड़ा ही पास पहुंची थी कि तभी मेरे कानों में एक अजीब सी चीख़ सुनाई पड़ी। ऐसा लगा जैसे किसी ने किसी का गला घोंट दिया हो। दरवाज़े पर जैसे ही मैं पहुंची तो मैंने देखा कि विशेष जी की पीठ मेरी तरफ थी और वो निशांत के पेट में चाक़ू का वार किए हुए थे। ये देख कर पहले तो मैं एकदम से घबरा ही गई थी लेकिन फिर जल्दी ही खुद को सम्हाला। एक बेक़सूर की हत्या कर के उस हत्या में वो इंसान मुझे फ़साने वाला था।

मारे गुस्से के मेरा जिस्म कांपने लगा था। निशांत को चाकू मारने के बाद वो उसी की तरफ देखते हुए पीछे दरवाज़े की तरफ उल्टे क़दमों से खिसकने लगा था। मैंने पिस्तौल वाला हाथ ऊपर उठाया और उस पर गोली चला दी। दो बार तेज़ आवाज़ हुई और दो गोलियां विशेष नाम के उस इंसान की पीठ पर घुस गईं। उसके जिस्म से खून बहने लगा था। मेरा निशाना ठीक तो नहीं था लेकिन फिर भी गोलियां उसकी पीठ के अलग अलग हिस्से में ज़रूर जा लगीं थी।

दर्द से कराहते हुए विशेष पीछे की तरफ पलटा और मुझ पर नज़र पड़ते ही उसकी आँखें फ़ैल ग‌ईं। जैसे उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं उस वक़्त वहां हो सकती हूं और उसे इस तरह गोली मार सकती हूं। वो लड़खड़ाते क़दमों से मेरी तरफ बढ़ने लगा। ये देख कर मैं थोड़ा घबरा गई। हालांकि मेरी हवा तो पहले ही शंट हो चुकी थी और मेरे हाथ पाँव कांपने लगे थे। अभी वो दरवाज़े के पास ही पंहुचा था कि वो बुरी तरह लड़खड़ा कर वहीं पर गिर गया। पेट के बल ज़मीन पर गिरे हुए उसने अपना एक हाथ उठा कर मेरी तरफ देखा। कुछ कहने के लिए उसने कोशिश की लेकिन आवाज़ ठीक से नहीं निकल रही थी।

"तेरे जैसे नीच इंसान को अपने हाथों सज़ा दे कर मेरी रूह को बड़ा सुकून मिला है।" मैं उसकी तरफ देखते हुए सहसा गुर्राते हुए बोल उठी थी____"वास्तव में ख़ुशी क्या होती है ये अब जाना है मैंने। जो प्यार और जो खुशियां तूने मुझे दी थीं वो सब इस ख़ुशी के आगे फीकी पड़ ग‌ईं हैं। जानता है क्यों? क्योंकि जो प्यार और जो खुशियां तू मुझे दे रहा था उनमें दुनिया भर का फ़रेब शामिल था। ख़ैर अब तू मरने के बाद भी ये सोचता रहेगा कि आख़िर तेरे साथ ऐसा कैसे हो गया?"

मेरी बातें सुन कर उस बेगैरत इंसान ने कुछ कहने की कोशिश तो की लेकिन उसके होठों से साफ़ साफ़ कोई शब्द नहीं निकल सके और फिर कुछ ही पलों में उसने वहीं पर दम तोड़ दिया। उसके मर जाने के बाद मैंने कमरे के अंदर टेबल के पास गिरे निशांत सोलंकी की तरफ देखा। खून से लथपथ था वो लेकिन जान अभी भी बाकी थी उसमें। मैं हिम्मत कर के आगे बढ़ी तो उसने अपना हाथ मेरी तरफ उठा कर कुछ कहा लेकिन उसकी आवाज़ मेरे कानों में ठीक से नहीं पड़ी।

✧✧✧​

Chapter - 02
[ Reality & Punishment ]
____________________________

Update - 13
____________________

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निशांत सोलंकी के पेट में दो बार चाक़ू मारा था मेरे पति ने जिसकी वजह से अब तक वो अपने ही खून में नहा चुका था। कमरे में जो टेबल रखा था उसी में वो पीठ टिका कर और अपने पैरों को लम्बा कर के बैठा हुआ था। मेरी तरफ देखते हुए वो अपना एक हाथ उठा कर बार बार कुछ कहने की कोशिश कर रहा था लेकिन मुझे ठीक से कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैं उस सबकी वजह से डर तो रही थी लेकिन मैं जानना चाहती थी कि आख़िर वो कह क्या रहा है? इस लिए हिम्मत कर के थोड़ा और उसकी तरफ बढ़ी।

"ये...सब...

क्या था?" निशांत ने अटकते हुए और दर्द से कराहते हुए मुझसे कहा____"कौन हो तुम और विशेष को क्यों मारा तुमने?"

मैं समझ गई थी कि वो उस सबके बारे में मुझसे पूछ रहा था। शायद वो इसके पहले समझने की कोशिश कर रहा था कि अचानक से वो सब क्यों हो गया था? उसके पूछने पर मैंने उसे बताया कि विशेष मेरा पति था और मैंने उसको इस लिए मारा क्योंकि वो उसकी हत्या के इल्ज़ाम में मुझे फंसा देना चाहता था। कहने का मतलब ये कि संक्षेप में मैंने निशांत को सारी बातें बता दी थी। मेरी बातें सुनने के बाद निशांत आश्चर्य से मेरी तरफ देखने लगा था। उसकी साँसें उखड़ रहीं थी। ज़ाहिर था कि उसके जीवन का आख़िरी वक़्त आ चुका था। उसने बड़ी मुश्किल से अटकते हुए मुझसे कहा कि उसने अपने जीवन में अपने फ़ायदे के लिए जाने कितनी ही लड़कियों और औरतों के साथ बुरा किया है, इस लिए अब वो अपने आख़िरी वक़्त में एक अच्छा काम करना चाहता है।

मुझे निशांत की बात समझ नहीं आई थी लेकिन जब उसने मुझसे पिस्तौल मांगते हुए कहा कि मैं उसके फ्लैट से अपने सारे सबूत मिटा कर चली जाऊं तो मैं बुरी तरह चौंक पड़ी थी। एक अंजान ब्यक्ति मुझसे ऐसा कैसे कह सकता था? भला वो ये क्यों चाहता था कि मैं उसके फ़्लैट से अपने सारे सबूत मिटा कर चली जाऊं? जब कुछ देर तक मैं उसकी तरफ हैरानी से देखती ही रही तो उसने अटकते हुए फिर से मुझसे वही सब कहा। मैंने अपने दिलो दिमाग़ को बड़ी मुश्किल से शांत किया और उसे पिस्तौल देने का सोचा ही था कि सहसा मेरे ज़हन में ख़याल आया कि कहीं वो मुझसे पिस्तौल ले कर मुझे गोली ही न मार दे? अपनी इस शंका को जब मैंने उससे ज़ाहिर किया तो उसके होठों पर बड़ी ही फीकी मुस्कान उभरी थी। उसने कहा कि अब ऐसे वक़्त में मुझे गोली मार देने से भला उसे क्या हासिल हो जाएगा? सच तो ये है कि जिसने गुनाह किया था उसे सज़ा मिल चुकी है और जिसने अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ दुःख ही सहे हैं उसे क्यों किसी की हत्या के लिए जेल जाना पड़े?

निशांत की बातें सुन कर मुझे एहसास हुआ कि वो यकीनन सच कह रहा है। यानि वो मुझे सच में चले जाने को कह रहा था और चाहता था कि दो दो लोगों की हत्या का इल्ज़ाम मेरे सिर पर न आए। उसने मुझसे कहा कि मैं अपने दुपट्टे से पिस्तौल पर से अपने निशान मिटाऊं और फिर दुपट्टे से ही पकड़ कर उस पिस्तौल को उसके पास रख दूं। उसके बाद मैं उसके फ्लैट में जहां जहां गई थी और जिस जिस चीज़ को मैंने छुआ था उन सब पर से अपने निशान उसी दुपट्टे से मिटा दूं। यहाँ तक कि अपने निशान मिटाते मिटाते ही मैं उसके फ्लैट से बाहर चली जाऊं।

अपने जीवन में मैंने पहली बार इतना संगीन और इतना ख़तरनाक काम किया था। जीने की चाह तो नहीं थी लेकिन निशांत के कहने पर मज़बूरी में मुझे वो सब करना ही पड़ा।

मैंने दुपट्टे से साफ़ कर के पिस्तौल को निशांत के पास रख दिया था जिसे उसने हाथ बढ़ा कर उठा लिया था। पिस्तौल ले कर उसने मेरी तरफ देखा और फिर दरवाज़े के पास पेट के बल मृत पड़े मेरे पति को। कुछ पलों तक मैं उसे देखती रही और जब वो मेरे पति की तरफ अपलक देखता ही रह गया तो मैं समझ गई कि अब उसके अंदर से उसके प्राण निकल चुके हैं।

उसके बाद मैंने हर जगह से अपने निशान मिटाने शुरू कर दिए थे। मैं याद करती जा रही थी कि कहां कहां मैं गई थी और किन किन चीज़ों को मैंने छुआ था? मैंने उस टेबल और उसके सभी खन्धों से भी अपने निशान मिटाए। हालांकि उसी टेबल में निशांत पीठ के बल टिका हुआ था, इस लिए उस पर से अपने निशान मिटाने में मुझे बड़ी सावधानी से काम लेना पड़ा था। उसके बाद मैं दुपट्टे से ही अपने पैरों के निशान मिटाते हुए गैलरी में आई और गैलरी से निशान मिटाते हुए बाहर आ ग‌ई। सीढ़ियों के पास पहुंच कर मैं ठहर गई। मैंने इस बात को अच्छी तरह याद रखा था कि मेरे निशान कहीं पर छूटने न पाएं। हालांकि निशान मिटाने के चक्कर में संभव था कि विशेष के निशान भी गैलरी और सीढ़ियों पर से मिट गए होंगे लेकिन निशांत के फ्लैट में बाकी जगहों पर तो उसके निशाने मौजूद ही रहने थे।

निशांत के फ्लैट से मैं पैदल ही अपने घर तक आई थी। अपने घर आ कर मैं सीधा बाथरूम में घुस गई थी। बाथरूम में जा कर नहाई और अपने कपड़ों को धो कर फैला दिया। उसके बाद मैं कमरे में आ कर चुप चाप बेड पर लेट गई थी। बेड पर लेटी तो पीठ पर मुझे कुछ चुभा, मैंने उठ कर देखा। वो मेरा मोबाइल था जो बेड पर ही पड़ा हुआ था। मोबाइल को देख कर मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि अच्छा हुआ कि मैं अपना मोबाइल घर में ही भूल गई थी, वरना अगर वो मेरे साथ ही रहता तो पुलिस को उसकी लोकेशन से पता चल जाता कि मैं निशांत के फ्लैट पर उस वक़्त थी जब निशांत और मेरे पति की हत्या हुई थी। मैंने मन ही मन इसके लिए ऊपर वाले का धन्यवाद दिया। कभी कभी किसी चीज़ की ग़लती या भूल भी हमारे लिए फायदेमंद ही साबित होती है और इसका सबसे बड़ा सबूत मेरा अपना मोबाइल था। अपने पति के साथ जाते वक़्त जल्दी जल्दी में मैं अपना मोबाइल ले जाना भूल गई थी। उसकी डायरी ने मुझे इतना ज्ञान तो दे ही दिया था कि ऐसे मामलों में मोबाइल की क्या अहमियत होती है।

उस रात मैं उसी सब के बारे में सोचती रही थी। मेरी आँखों में नींद का नामो निशान तक नहीं था। इतना कुछ होने के बाद भला मुझे नींद भी कैसे आ सकती थी? दुनियां जहान की बातें मेरे मन में चल रहीं थी। दिल को एक सुकून सा था, हालांकि वो सुकून भी उस दुःख दर्द के आगे बहुत ही छोटा था लेकिन कहीं न कहीं इस बात का एहसास कर के मैं खुद को तसल्ली दे रही थी कि गुनहगार को अपने हाथों से सज़ा दे कर मैंने कोई पाप नहीं किया है।

निशांत के कहने पर मैंने भले ही अपने सारे सबूत मिटा दिए थे लेकिन अगर इसके बावजूद पुलिस या कानून मुझे उस सबके लिए दोषी मान कर सज़ा दे देता तो मुझे उसका कोई ग़म नहीं होता।

अब दिल में जीने की कोई हसरत नहीं रह गई थी। रह रह कर आँखों से आंसू बहने लगते और फिर माँ बाबू जी का चेहरा मेरी आँखों के सामने उजागर हो जाता। दिल में एक हूक सी उठती और मेरी अंतरात्मा तक को हिला देती।

रात में जाने कौन से पहर मेरी आँख लग गई थी। दुबारा जब आँखें खुलीं तो दिन चढ़ गया था। पिछली रात की सारी बातों का ख़याल आते ही मैं एकदम से गुमसुम सी हो गई। कुछ देर तक उसी सब के बारे में सोचती रही उसके बाद मैंने सोचा कि पुलिस को देर सवेर उन दोनों की हत्या की ख़बर मिल ही जाएगी और वो किसी न किसी तरह मेरे घर भी पहुंच जाएगी, इस लिए मुझे उसके लिए ख़ुद को तैयार रखना होगा।

सुबह के दस बज रहे थे। मैंने अपने बाबू जी को फ़ोन लगाया और उन्हें बताया कि उनके दामाद पता नहीं कहां चले गए हैं। मैंने उस वक़्त बाबू जी को सच बताना सही नहीं समझा था। मेरे ज़हन में बार बार निशांत की बातें उभर आतीं थी। वो मुझे उन हत्याओं से बचाना चाहता था। मैंने सोचा अगर ऐसा संभव है तो चलो ये भी देख लेती हूं। इतना तो मैं भी समझती थी कि मेरे पति की डायरी अपने आप में ही इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि वो सब क्यों और किसने किया होगा?

जैसा कि मुझे उम्मीद थी, एक घंटे बाद पुलिस मेरे घर आ धमकी थी। उसने मुझे विशेष और निशांत की हत्या के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिया था। पुलिस थाने में उनके पूछने पर मैंने बार बार यही कहा कि मैंने किसी की हत्या नहीं की है बल्कि मुझे तो ख़ुद ही उनके द्वारा इस सबका पता चला है।

पता नहीं कौन सा भूत सवार हो गया था मुझ पर कि मैं भी अब वैसा ही करना चाहती थी जैसा मेरा पति मेरे साथ कर रहा था। मुझसे महिला पुलिस ने बड़ी शख़्ती से बार बार पूछा था लेकिन मैंने जुर्म कबूल नहीं किया। यहाँ तक कि मैंने पुलिस को अपने पति की डायरी के बारे में भी नहीं बताया था। असल में मैं चाहती थी कि पुलिस उस डायरी तक ख़ुद ही पहुंचे। पुलिस को लगना चाहिए था कि अगर मुझे किसी चीज़ का पता होता या मेरे मन में ऐसी वैसी कोई बात होती तो मैं ख़ुद ही उनसे उस डायरी का ज़िक्र करती।

पुलिस ने मुझसे नंबर ले कर मेरे बाबू जी को भी फ़ोन कर के इस सबके बारे में सूचित कर दिया था। मेरे बाबू जी मेरे भाई को ले कर दूसरे दिन ही पुलिस थाने पहुंच गए थे। मुझे सलाखों में बंद देख कर मेरे बाबू जी और मेरा छोटा भाई बेहद दुखी हो गए थे। वो बार बार पुलिस वालों से कह रहे थे कि उनकी बेटी ने कुछ नहीं किया है। ख़ैर लम्बी पूछतांछ के बाद मुझे तीसरे दिन अदालत में पेश किया गया। अदालत में दोनों पक्षों के वकील जज के सामने अपनी अपनी तरफ से दलीले देने लगे थे।

पब्लिक प्रासीक्यूटर अपनी दलील में यही कह रहा था कि मेरा निशांत के साथ नाजायज़ सम्बन्ध था और जब उसने मुझे ब्लैकमेल करना शुरू किया तो मैंने उसकी ये सोच कर हत्या कर दी कि ऐसे संबंधों की वजह से कहीं मेरी ज़िन्दगी बर्बाद न हो जाए। दूसरी दलील में उसका कहना था कि मैंने अपने पति की हत्या इस लिए की क्योंकि मेरे पति को मेरे और निशांत के सम्बन्धों का पता चल गया था, और जब मुझे उस सबकी वजह से कुछ और ना सूझा तो मैंने अपने पति को भी जान से मार डाला। जबकि मेरा वकील ये कह रहा था कि एक औरत भला दो हट्टे कट्टे मर्द की हत्या एक साथ अलग अलग हथियारों से कैसे कर सकती है? अदालत में फॉरेंसिक रिपोर्ट पेश कर दी गई थी और उस रिपोर्ट में साफ़ लिखा था कि दोनों ब्यक्तियों के जिस्म पर कुछ ही मिनटों के अंतर में घाव हुए थे। विशेष को क्योंकि गोली लगी थी इस लिए वो जल्दी ही मर गया था जबकि निशांत चाक़ू लगने के बावजूद कुछ देर तक ज़िंदा रहा था लेकिन दोनों पर जब वार किया गया था तो उसमें बस कुछ ही समय का अंतर था। चाक़ू पर विशेष के और पिस्तौल पर निशांत की उंगलियों के निशान पाए गए थे। कहने का मतलब ये कि फॉरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार भी मुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं लग रहा था।

पुलिस को निशांत के फ्लैट में कहीं पर भी मेरे निशान नहीं मिले थे इस लिए मेरे वकील का पक्ष मजबूत था। सिर्फ शक के आधार पर फ़ैसला नहीं सुनाया जा सकता था। लंच के बाद जब अदालत दुबारा शुरू हुई तो पुलिस ने अदालत के सामने एक ऐसा सबूत पेश किया जिसका मुझे बड़ी शिद्दत से इंतज़ार था और वो सबूत मेरे पति की डायरी थी। जज साहब की अनुमति से मेरे वकील ने उस डायरी को खोला और उसमें जो कुछ लिखा था उसे ऊँची आवाज़ में सबको सुनाना शुरू कर दिया। जब तक वकील उस डायरी को पढ़ता रहा तब तक अदालत में पैना सन्नाटा छाया रहा। यहाँ तक कि मेरा वकील जब उस डायरी को पढ़ कर चुप हुआ तब भी कुछ देर तक सन्नाटा ही छाया रहा। हर कोई डायरी में लिखी इबारत को सुन कर आश्चर्य चकित था।

मेरे पति की डायरी ने अदालत के सामने सब कुछ साफ़ कर दिया था। हालांकि डायरी में लिखी बातों के बाद पब्लिक प्रासीक्यूटर ने फिर से दलील दी कि मुझे किसी तरह अपने पति की डायरी से पता चल गया था कि मेरा पति असल में मेरे साथ क्या करने वाला था इस लिए मैंने उसी के प्लान पर अपना गेम खेल कर उन दोनों की हत्या कर दी। पब्लिक प्रासीक्यूटर अदालत में बस हवा में ही तीर चला रहा था। अपनी बात को साबित करने के लिए उसके पास ना तो कोई गवाह था और ना ही कोई सबूत। पुलिस ने अदालत में मेरे मोबाइल फ़ोन की लोकेशन और उसके कॉल रिकॉर्ड की सूची भी पेश की थी। उसमें ये ज़रूर दर्ज़ था कि मेरे और निशांत के मोबाइल के द्वारा एक दूसरे को सन्देश भेजे जाते रहे थे लेकिन कॉल पर कभी कोई बात नहीं की गई थी।

मेरे मोबाइल की लोकेशन भी यही कहती थी कि मैं कभी भी निशांत के फ़्लैट पर नहीं गई थी। ये सारी चीज़ें मेरी बेगुनाही के सबूत थे और इस बात के भी कि सब कुछ मेरे पति के द्वारा ही किया गया था। इस लिए अदालत ने मुझे बेगुनाह मान कर रिहा कर दिया था।

✧✧✧

रूपा के चुप होते ही कमरे में ख़ामोशी छा गई थी। उसकी माँ अभी भी जैसे अपनी बेटी की कहानी में ही खोई हुई थी। तभी कमरे में रूपा का छोटा भाई अभिलाष दाखिल हुआ। वो रूपा से तीन साल छोटा था। कमरे के दरवाज़े पर खड़ा वो चुप चाप अपनी बहन की बातें सुन रहा था। सारी बातें सुनने के बाद वो भी बुरी तरह अचंभित हुआ था और जब रूपा चुप हो गई तो वो कमरे में दाखिल हो कर उन दोनों के पास आ गया था। अपने भाई को देख कर पहले तो रूपा चौंकी लेकिन फिर सामान्य हो गई थी।

"माफ़ करना दीदी।" अभिलाष ने रूपा के सामने खड़े हो कर कहा____"मैंने छुप कर आपकी सारी बातें सुन ली हैं लेकिन मुझे इस बात की ख़ुशी है कि आपने अपने हाथों से ऐसे घटिया आदमी को सज़ा दी जिसने आपके बारे में कभी ज़रा सा भी नहीं सोचा।"

"सुन तो लिया है तुमने।" रूपा की माँ ने अभिलाष से कहा____"लेकिन ये बातें बाहर किसी को कभी भी मत बताना।"

"मैं बच्चा नहीं हूं माँ जो ऐसी बातें सबको बताता फिरुंगा।" अभिलाष ने कहा____"मुझे भी पता है कि ऐसी बातें किसी को भी नहीं बताई जातीं। यहाँ तक कि ऐसी बातें अपने घर में अपने सामने भी नहीं करनी चाहिए। मेरी दीदी ने जो किया वो सही किया है मां। ऐसे इंसान को ऐसी ही सज़ा मिलनी चाहिए थी। उस समय कितना खुश हुआ था मैं कि मेरी दीदी की ज़िन्दगी से दुःख दर्द के दिन अब हट गए हैं। सच तो आज पता चला कि वो सब उस नीच आदमी का एक घिनौना षड़यंत्र था। अच्छा हुआ कि उसके ग़लत कर्मों की सज़ा दीदी के द्वारा मिल गई उसे।"

"चल अब तू जा यहाँ से।" रूपा की माँ ने उससे कहा____"और अपनी दीदी को आराम करने दे।"
"हां जाता हूं मां।" अभिलाष ने कहा____"लेकिन अपनी दीदी से कुछ पूछना चाहता हूं।"

"मुझसे क्या पूछना चाहता है मेरा भाई?" रूपा ने अभिलाष की तरफ देखते हुए फीकी सी मुस्कान के साथ कहा।

"मैंने पढ़ा है कि पुलिस और फॉरेंसिक वाले ऐसे मामलों में बड़ी बारीकी से जांच पड़ताल करते हैं।" अभिलाष ने कहा____"मेरा मतलब है कि वो लोग हर एंगल से देखते हैं कि गोली चलाने वाले ने किस एंगल से गोली चलाई और जिस पर चलाई उस पर किस तरह की प्रतिक्रिया हुई? आपने बताया कि विशेष को आपने कमरे के बाहर से गोली मारी थी जबकि पुलिस को वो पिस्तौल निशांत के हाथ में मिला था और उसने यही माना कि उसी ने विशेष पर गोली चलाई थी। अब सवाल है कि आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है कि पुलिस या फॉरेंसिक को असल एंगल का पता ही न चल पाया हो?"

"तू सही कह रहा है भाई।

" रूपा ने कहा____"सच जानने के बाद हर आदमी इसी तरह से सोचेगा लेकिन अदालत में रिपोर्ट के अनुसार यही साबित हुआ था कि गोली निशांत ने ही चलाई थी। हालांकि उस रिपोर्ट के बारे में जान कर मैं भी ये सोच कर मन ही मन हैरान हुई थी कि ऐसा कैसे हुआ होगा? क्योंकि असल में तो गोली मैंने ही उस कमीने इंसान को मारी थी। अदालत में पब्लिक प्रासीक्यूटर ने जब पुलिस से एंगल और हाइट के बारे में सवाल किया था तो उसने अपनी तहक़ीकात में निकले निष्कर्ष के अनुसार यही बताया था कि विशेष निशान्त को चाक़ू मारने के बाद पलट कर कमरे से जाने लगा था। उसकी समझ में उसने निशांत का काम तमाम कर दिया था लेकिन निशांत उस वक़्त मरा नहीं था, बल्कि जीवित ही था। अपने क़ातिल को इस तरह जाते देख निशांत ने अपने पीछे ही रखे टेबल के खंधे से पिस्तौल निकाला और विशेष पर पीछे से गोली चला दी। विशेष को शायद इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था कि निशांत के पास पिस्तौल भी हो सकती है और वो उस पिस्तौल से उसको गोली मार देगा। ख़ैर दो दो गोली लगते ही विशेष दरवाज़े के पास ही पेट के बल जा गिरा था। अब क्योंकि पुलिस को निशांत के हाथ से ही वो पिस्तौल बरामद हुआ था इस लिए पब्लिक प्रासीक्यूटर ज़्यादा कुछ कह नहीं पाया था, जिसके चलते अदालत ने पुलिस की थ्योरी को ही सच माना। कहीं न कहीं प्रासीक्यूटर भी ये समझता रहा था कि एक अकेली औरत के लिए दो दो हट्टे कट्टे आदमियों का अलग अलग हथियारों से खून करना संभव नहीं हो सकता था। ख़ैर अदालत ने इसी बात को सच मान कर फ़ैसला सुनाया कि विशेष अपनी कुरूप पत्नी को अपनी ज़िन्दगी से दूर करने के लिए निशांत की हत्या करने उसके फ़्लैट पर गया लेकिन किसी वजह से बात बिगड़ गई जिसके चलते दोनों के बीच बात विवाद इतना बढ़ गया कि एक ने दूसरे को चाकू मारा तो दूसरे ने पीछे से पहले वाले को गोली मार दी। निशांत के फ़्लैट पर मेरे होने के कोई सबूत नहीं पाए गए इस लिए मेरा उन दोनों की हत्या में कोई हाथ नहीं था। अब भला किसी को ये कैसे पता हो सकता था कि उस रात असल में वो दोनों खून कैसे हुए थे?"

"इसका मतलब।" अभिलाष ने कहा_____"ये संयोग ही हुआ कि जब आपने विशेष पर गोली चलाई थी तो वो उस वक़्त निशांत की तरफ देखते हुए ही दरवाज़े की तरफ उल्टे पैर खिसकता जा रहा था। उसे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि आप उसके पीछे हो सकती हैं और उसको इस तरह से गोली मार सकती हैं? ख़ैर, गोली क्योंकि उसकी पीठ पर लगी थी और वो पिस्तौल निशांत के हाथ में था इस लिए पुलिस ने यही अंदाज़ा लगाया कि विशेष पर गोली चलाने वाली आप नहीं बल्कि निशांत था। रही सही कसर उस दोगले इंसान की उस डायरी ने पूरी कर दी। उसके बाद तो कोई कुछ और सोच ही नहीं सकता था।"

"हां अब तो मुझे भी यही लग रहा है।" रूपा ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"तू सही कह रहा है मेरे भाई।

ये संयोग ही था कि वो कमीना गोली लगने के बाद मेरी तरफ पलटा था और फिर उसी हालत में लड़खड़ा कर गिर गया था।"

"वो आपकी तरफ शायद इस लिए पलटा था ताकि देख सके कि अचानक से उस पर गोली किसने चला दी?" अभिलाष ने कहा____"उसकी समझ में तो उसके साथ ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला था बल्कि निशांत की हत्या करने के बाद उसकी हत्या के जुर्म में किसी तरह आपको फंसा देना था। ये तो उसका दुर्भाग्य था जो उसकी उम्मीदों के विपरीत ऐसा हो गया। ऊपर वाला भी ऐसे वक़्त में आपके साथ था जिसने कुछ ऐसा किया कि आप पर कोई बात ही न आए। वैसे एक बात और भी है दीदी, और वो ये कि विशेष ने अपनी डायरी में लिखा था कि वो आपको निशांत के फ़्लैट पर ये कह कर लें जाएगा कि उसने आप दोनों को अपने यहां डिनर पर बुलाया है, जबकि उन दोनों की हत्या के बाद वहां पर पुलिस को आपके होने का कोई सबूत नहीं मिला। अब सवाल ये है कि क्या अदालत में प्रासीक्यूटर ने इस बारे में कोई सवाल नहीं उठाया?"

"हां ये सवाल भी उठाया था उसने।" रूपा ने कहा____"लेकिन मेरे पक्ष वाले वकील ने ये तर्क़ दिया था कि हो सकता है कि विशेष ने आख़िरी समय में अपने प्लान पर कोई बदलाव किया रहा हो। अगर ऐसा न होता तो वो मुझे अपने साथ निशांत के फ़्लैट पर ज़रूर ले जाता और वहां पर मेरे होने के पुलिस को सबूत भी मिलते। अब जबकि पुलिस को निशांत के फ़्लैट पर मेरे होने के कोई सबूत ही नहीं मिले थे तो ज़ाहिर है कि मैं वहां ग‌ई ही नहीं थी। इससे ये भी साबित हो जाता है कि मेरा उन दोनों की हत्या में कोई हाथ नहीं था, बल्कि सच यही हो सकता है कि विशेष ने यक़ीनन आख़िरी समय में अपने प्लान में कोई बदलाव किया था।"

"अगर ये मान लें कि उसने सचमुच अपने प्लान में कोई बदलाव किया था।" अभिलाष ने कहा____"तो सोचने वाली बात है कि फिर वो निशांत की हत्या के जुर्म में आपको फंसाता कैसे?"

"इस सवाल के जवाब में।" रूपा ने कहा____"मेरे पक्ष वाले वकील ने बस यही कहा था कि इसका जवाब तो खुद विशेष ही दे सकता था कि वो निशांत की हत्या के जुर्म में मुझे किस तरह फंसाता? कहने का मतलब ये कि एक तरह से ये सवाल बाकी सबके लिए रहस्य ही बन कर रह गया है।"

"हां सही कहा आपने।" अभिलाष के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई____"बाकी सबके लिए तो अब ये रहस्य ही बना रहेगा लेकिन एक बात अच्छी हुई कि निशांत ने अपने जीवन के आख़िरी पलों में एक अच्छा काम करके उन संगीन अपराधों की सज़ा मिलने से आपको बचा लिया। अगर उस वक़्त वो वैसा न करता तो यकीनन आपको कोई नहीं बचा सकता था। उसी ने आपको बताया कि वो पिस्तौल उसे दे कर आपको किस तरह उसके फ़्लैट से चले जाना चाहिए था।"

"मुझे अपने अंजाम की कोई परवाह नहीं थी मेरे भाई।" रूपा ने गहरी साँस लेकर कहा____"इतना कुछ होने के बाद सच में जीने की कोई हसरत नहीं रह गई थी।

अगर उन दोनों की हत्याओं से अदालत में मुझे फांसी की सज़ा भी सुना दी जाती तो मैं खुशी खुशी फांसी पर झूल जाती।"

"ऐसा मत कहिए दीदी।" अभिलाष ने अधीर होकर रूपा की तरफ देखा____"आप हम सबको छोड़ कर ऐसे कैसे जा सकती थीं? क्या हम सबका प्यार आपके लिए कोई मायने नहीं रखता?"
"नहीं मेरे भाई।" रूपा ने अभिलाष के चेहरे को बड़े स्नेह से सहला कर कहा____"ये तुम सबका प्यार और स्नेह ही तो था जिसकी वजह से मैं वैसा कर ही नहीं पाई।"

"मैं तो ये सोच सोच कर अभी भी हैरान हूं कि वो आदमी मेरी मासूम सी बेटी के साथ कितना बड़ा छल कर रहा था।" रूपा की माँ ने गंभीर भाव से किन्तु कहीं खोए हुए से कहा____"आख़िर किस मिट्टी का बना हुआ था वो जिसके दिल में मेरी बेटी के लिए ज़रा सा भी दया भाव नहीं था? उसने एक बार भी ये नहीं सोचा कि मेरी बेटी ने साढ़े चार सालों में क्या कुछ सहा होगा और किस तरह से उसने अपने दिन रैन गुज़ारे होंगे? आज सच जानने के बाद मैं भी यही कहूंगी कि तूने उसको उसके किए की सज़ा दे कर ठीक ही किया है बेटी। जिसके दिल में किसी के लिए कोई जज़्बात न हों और जो सिर्फ अपने ही बारे में सोचता हो ऐसे इंसान के साथ अपने जीवन के सपने देखना बेकार ही था।"

"मैं अपनी दीदी के लिए कोई ऐसा लड़का खोजूंगा मां।" अभिलाष ने रूपा के गुमसुम से चेहरे की तरफ देखते हुए कहा____"जिसके दिल में सिर्फ और सिर्फ मेरी दीदी के लिए प्यार हो और बिना किसी छल कपट के वो मेरी दीदी को खुशियां दे।"

"नहीं मेरे भाई।" रूपा की आँखों से आंसू छलक पड़े____"अब तेरी इस दीदी को किसी और का प्यार अथवा किसी और से कोई खुशियां नहीं चाहिए। वो तो अब जीवन भर अपने माँ बाबू जी और तेरे जैसे प्यारे से भाई के पास ही रहना चाहती है। तेरी दीदी को तुम लोगों के सिवा दुनियां का कोई भी इंसान प्यार और ख़ुशी नहीं दे सकता मेरे भाई।"

रूपा की बातें सुन कर जहां उसकी माँ की आँखों से आंसू छलक पड़े वहीं अभिलाष ने दुखी हो कर उसे ख़ुद से छुपका लिया था। कमरे के दरवाज़े के बाहर खड़े रूपा के पिता चक्रधर पांडेय अपनी बेटी की बातें सुन कर गमछे से अपनी आँखों में भर आए आंसुओं को पोंछा और फिर पलट कर चुप चाप बाहर निकल ग‌ए।

✧✧✧ The End ✧✧✧​

Categories Hindi
Tags Completed
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