नए ऑफिसर के साथ गांड मारने मराने का खेल
मुझे और मेरे एक दोस्त को रेलवे की नौकरी मिल गयी थी. एक दिन मेरे दोस्त ने मुझे एक नए आये अफसर से मिलवाया. उसके साथ हमारा गांडूपाना कैसे चला?
मेरी पिछली गे सेक्स कहानीनसीब से गांड की दम पर नौकरी मिली
के आगे की इस सेक्स कहानी को पेश कर रहा हूँ.
पिछली सेक्स कहानी में मैं 24 साल का था व मेरा दोस्त प्रभात बीस-इक्कीस का था. मैं और मेरा दोस्त प्रभात बम्बई रेलवे की प्रवेश परीक्षा देने गए थे.
वहां मैं अपने गांव के परिचित और मुझसे तीन चार साल बड़े एक गबरू सजीले नौजवान नसीम भाई मिल गए थे. नसीम भाई रेलवे में ही कर्मचारी थे.
हम दोनों रात को उनके कमरे में ठहरे. मेरे साथी प्रभात की नसीम भाई ने गांड मार दी. दूसरी रात को प्रभात को अपार्टमेंट के बगल के कमरे में रहने वाले भाई साहब ले गए उन्होंने भी उसकी रगड़ कर मार दी.
इधर दूसरे दिन नसीम भाई ने अपने कमरे में मेरी गांड मार दी थी. फिर न जाने क्यों खुद नसीम भाई ने मेरे लंड से अपनी गांड भी मरवा ली.
फिर कड़ियां जुड़ती चली गईं और हम दोनों सिलेक्ट होकर नौकरी करने लगे.
तीन साल बाद एक दिन प्रभात अपनी शादी का निमंत्रण देने आया व मेरे जोरदार चुम्बन ले डाले.
अब आगे:
उपरोक्त घटना के छह महीने के बाद की बात है. रेलवे का एनलाइनमेंट का कार्यक्रम चल रहा था. वे लोग झांसी से नाप-जोख करते चले आ रहे थे. दुनिया भर का तामझाम साथ था.
फील्ड की पूरी टीम थी. उसी में मेरा दोस्त प्रभात भी था. वह टेक्निकल एक्सपर्ट था. कुछ लेबर का काम करने वाले लोग साथ थे. एक दो और सहयोगी थे.
हां जो इन्चार्ज थे, वो साहब एक बिल्कुल नौजवान थे … उनका नाम सुधीर जी था.
प्रभात उन्हें मेरे पास मिलाने को लाया.
वे उम्र में प्रभात से भी छोटे थे, यही कोई बीस इक्कीस साल के रहे होंगे. मैंने उन्हें बिठाया, चाय मंगवाई.
फिर मैंने पूछा- आपने कब ज्वाइन किया?
वे बोले- अभी छह माह पहले. मैं अभी एप्रेन्टिस ऑफिसर हूँ.
इस बात पर प्रभात न जाने क्यों हंस पड़ा, फिर एकदम से बोला- ये अभी लौंडे अफसर हैं.
मैं चुप रहा.
मगर प्रभात बोला- सब चलता है, सुधीर मेरे दोस्त बन गए हैं.
मैं समझ गया कि प्रभात से कैसी दोस्ती हो गई है.
मैंने कहा- आप बहुत हैंडसम हैं … स्मार्ट हैं.
इस पर सुधीर खुद ही बोला- सर नमकीन कहिये, नमकीन लौंडा … यही तो आप प्रभात को कहते हैं न. मैं उससे किसी भी तरह से कम नहीं हूँ.
सारी बात खुल गई तो मैं झेंप गया- अरे वह मेरा पुराना दोस्त है.
सुधीर- तो आज से मुझे भी अपना दोस्त समझें, सीरयिसनेस से जंगल में जिंदगी कटती ही नहीं है.
मैं -जैसी आपकी मर्जी. आपकी कम्पनी अच्छी रहेगी, कोई सहयोग मेरी तरफ से चाहिए हो, तो जरूर कहें.
अब सुधीर जी जब तब झांसी जाते तो थे, पर रोज नहीं जा पाते थे. वो कभी बहुत थक जाते … कभी देर हो जाती. जिस वजह से जाने का मतलब ही नहीं रहता था.
उनकी इस विवशता को देख कर मैंने अपना निवास का एक कमरा उन्हें दे दिया. उसमें एक कूलर भी लग गया. सीलिंग फैन तो थे ही.
मात्र दो कमरे थे. एक स्टाफ का व्यक्ति उन्हें खाना बना देता, दो लोग ही थे. लेबर अपना बना लेते या सहयोग कर लेते. एक पलंग लग गया … रेलवे के गद्दे थे.
प्रभात भी कभी झांसी जाता, कभी यहीं रूक जाता.
मैंने एक दिन उससे पूछा- दुल्हन कैसी है?
उसने बताया- हमारे पास पैसा नहीं था. मां, बहन की शादी पढ़े लिखे नौकर पेशा से करना चाहती थी. उन्होंने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था. परिवार की शान व सम्मान से जोड़ लिया था. बहन सुन्दर थी, इन्टर पास भी थी. शादी में तो दहेज चाहिए नहीं था. अतः एक लड़के से शादी कर दी. तो उसकी भाभी की बहन से मुझे शादी करना पड़ी. यह एक समझौते वाली शादी है. इसमें लड़के की पसंद का कोई मतलब नहीं होता है. ठीक है … सब चलता है. लड़की एवरेज है, कोई खास नहीं है.
मैं- अरे यार … मेरे हीरो को ऐसा जोड़ा?
प्रभात- तभी तो सर … उस दिन पिता जी सकपका गए थे. लड़की औसत से भी कम है … देखने में भी खास नहीं पढ़ी भी नहीं … शादी के लिए नकली सर्टीफिकेट बनवा रखा था. बाद में सब कलई खुल गई. वो गांव की है, कल्चर्ड भी नहीं है. ससुराल वालों की स्थिति ये है कि अब वो मुझ पर उल्टे चढ़े रहते है.
उसके मुँह से ऐसी बातें सुन कर मेरा भी दिमाग़ खराब हो गया.
एक दिन मैं वहीं क्वार्टर में लंच टाईम पर बैठा था. गाड़ियां निकल गई थीं. मेरे साथी ड्यूटी पर थे. सुधीर जी उस दिन यहीं सोए थे.
मैं उनसे बोला- आईए, मेरे साथ लंच करें.
वे बोले- आाप मेरे लिए कितना करते हैं, कुछ रिर्टन भी नहीं लेते.
मैंने खुलते हुए कहा- तुम कहो तो एक क़िश्त अभी वसूल लूं.
मेरी बात से वे हतप्रभ हो गए- अभी कितना?
मैं- बस थोड़ी सी, जो प्रभात देता है … तुम भी दे दो.
वे मुस्कुरा कर बोले- ठीक है. मैं अभी दे देता हूं.
वे अपने पैंट की जेब से पर्स निकालने लगे.
मैं- अभी उसे वहीं रखा रहने दो. मैं खुद लिए लेता हूं.
मैंने उनके गले में हाथ डाला, तब वे थोड़ा समझे … फिर मैंने उनका जोरदार चुम्बन ले डाला.
वे जोर से हंसे और अपने हाथ के उल्टे पंजे से होंठ पौंछने लगे.
मैंने कहा- चलो छोटी वाली किश्त निपट गई … अब खाना खाएं!
वे बैठ कर लंच लेने लगे.
एक दो दिन वे शांत रहे.
फिर एक दिन मैंने उनसे कहा- क़िश्त?
वे हंस दिए, तो इस बार मैंने उनका लम्बा किस ले लिया.
वे बोले- एक और क़िश्त.
मैंने एक और ले ली.
एक दिन वो बोले- आज बड़ी क़िश्त?
मैं- वह भी ले लूंगा.
वे चेहरा सवालिया बना कर देखने लगे.
तो मैंने कहा- प्रभात से पूछ लेना … या बिना पूछे ही दोगे.
वे बोले- हां जरूर, इसमें क्या पूछना. जो आप कहें, उसमें मैं राजी.
मैंने कहा- चलिए, मूड बनने दीजिए.
दो दिन बाद मैंने ड्यूटी से आकर क्वार्टर पर पहुंचा. मैं टिफिन लाया था उसे रखा. और कहा कि टिफिन रखे जा रहा हूं, लंच टाईम पर आऊंगा.
सुधीर जी अभी सो कर उठे थे. मैं पलंग पर बैठ गया. वे लेट्रिन से निकले थे, अंडरवियर में थे … हाथ धोकर आए थे.
मेरे सामने पीठ करके तौलिया से हाथ पौंछ रहे थे. मेरे चेहरे के सामने उनके चूतड़ थे. मैं उन्हें सहलाने लगा.
मैंने कहा- आपका चेहरा ही नमकीन नहीं है, चूतड़ भी मस्त हैं. प्रभात पर तो जवानी फूट पड़ी है … पर आप भी कम नहीं हैं.
मैं सुधीर के कूल्हे सहला रहा था.
वे बोले- ढंग से करो न.. डर डर के क्यों कर रहे हो, अच्छी तरह से लो.
मैं खुलकर उनकी गांड मसलने लगा.
अब वे मुस्करा दिए- आप वाकई शौक रखते हैं!
मैंने उनसे उत्साह मिलने पर अपना मुँह उनके चूतड़ों से लगा दिया. और दोनों चूतड़ बारी बारी से चूम लिए.
वे हंसे बोले- अरे गांड का चूमा तो लंड से लिया जाता है, ऐसे तो अनाड़ी लेते हैं.
अब मैंने अपनी बांह उनकी कमर के चारों ओर लपेट कर उन्हें अपनी गोदी में खींच लिया और होंठों के दो तीन चूमा ले लिए. फिर मैं खड़ा हो गया और उनको पलंग पर झुका दिया.
वे बोले- मैं मजाक कर रहा था.
पर इतनी देर में तो मैंने उनका अंडरवियर नीचे खिसका दिया. वे ‘न … न ..’ तो कर रहे थे, पर गांड मराने के लिए झुक गए.
अब मैंने लंड में थूक लगा कर गांड पर टिका दिया और उनकी कमर पकड़ कर कसके धक्का दे दिया. मेरा सुपारा अन्दर घुस गया था.
वो दर्द से आह करने लगे.