जन्म दिन का तोहफ़ा-3
दोस्तो, मैं अपनी क्लाइंट लिंडा के कहने पर मैं उसकी मित्र मीरा के जन्मदिन का तोहफ़ा बन शहर से दूर एक फार्म हाउस पर था। रात को मीरा को चांदनी रात में और अब कनिका को खुले में चोद चुका था।
जब मैं नंगी कनिका को उठा कर अन्दर ले गया तो अन्दर का माहौल देख कर मैं दंग रह गया।
अन्दर लिंडा और मीरा सिर्फ पेंटी पहने सिगरेट और शराब पीते हुए नाश्ता कर रही थी और वहाँ एक विदेशी मर्द भी था उसे देख कनिका तपाक से मेरी गोद से उतरी और भाग कर उस आदमी के गले लग गई और मीरा और उस मर्द के बीच वैसे ही खड़ी हो बतियाने लगी।
लिंडा को जरुरत तो नहीं थी फिर भी उसने बताया कि डेव दरसल उन तीनों के कॉलेज का मित्र था जो इंग्लैंड से मीरा को बर्थडे की बधाई देने आया था- ‘हम सब कॉलेज के न्यूडस् (नग्न) क्लब के सदस्य है और सदस्य गोआ पहुँच रहे हैं इसलिए हम सब गोआ निकल रहे हैं।’
“तो तुम अभी चुद कर आई हो?” डेविड ने कनिका के चूतड़ अपनी मुट्ठी में भींचते हुए पूछा।
हाँ में सर हिलाते हुए उसने झुक कर डेव को चुम्बन जड़ दिया। झुकते ही उसकी चूत और मेरा वीर्य निकालती गांड मीरा की ओर खुल गई। मीरा ने मौके का फायदा उठाते हुए कनिका की चूत और गांड चाट ली। सब उसकी इस हरकत पर हंस पड़े, सिवाए मेरे।
लिंडा मुझे अपने कमरे में ले गई और बोली, “डेव ने हमें सरप्राइज दिया है इसलिए प्रोग्राम में थोड़ा बदलाव है। हम तीनों डेव के साथ जा रही है। मेरी कार यहीं है तुम लेकर निकल जाओ। मुम्बई आकर जब मैं फ़ोन करूँ तब जहाँ बोलू, कार छोड़ देना और कहना कि तुम गैराज से आये हो कार ठीक करा के। और ये कुछ पैसे रख लो बाकी हिसाब मैं रिया से कर लूँगी।”
थोड़ी ही देर में तीनों देवियाँ डेविड उर्फ़ डेव के साथ फुर्र हो गई। मैं भी सामान लेने मुड़ा तो पीछे केअर टेकर की पत्नी को खड़ा पाया। उसका नाम कमली था, कमली ने कहा- आप तो खाना खाकर जाइए, क्योंकि मैंने सभी के लिये खाना बनाना शुरू कर दिया था।
“कोई बात नहीं तू और तेरा पति तो है?” मैंने कहा।
“ना वो तो अब रात को ही आएगा, दारु पीकर !” कमली रुँआसी होकर बोली।
“कोई ना, मैं हूँ ना तेरे मुर्गे खाने को !” मैंने उसके चूचों को घूरते हुए कहा।
कमली इशारा समझ गई और अपने वक्षों को देखते हुए बोली, “ये नहीं, वो मुर्गे जो तन्दूर में डाले हैं…”
“… वैसे साहब आपका मस्त है !” कमली ने बात पूरी की।
मेरी समझ में आ गया कि जब तक कमली मुझे साहब समझेगी, दूरी बनाये रखेगी। बात आगे बढ़ाने के लिए मैंने कहा, “साहब नहीं हूँ रे ! वो तो मेम लोगों की सेवा करवाने के लिए साथ ले आई।”
“वैसे कैसी सेवा, मैं सब जानती हूँ, कभी साहब किसी को लाते हैं, कभी मेमसाहब किसी को, यह तो यहाँ चलता ही रहता है, पैसे वालों के चोचले हैं।” कमली सहज होकर बोली।