अग्निपरीक्षा
फ़ुलवा
ऍम बी ए करके सुरेखा को अच्छी नौकरी मिल गई।
छोटे से शहर की रहने वाली सुरेखा सरल स्वभाव की थी, अतः नौकरी के लिए मायानगरी मुम्बई भेजते समय माता-पिता का मन भी चिंताओं से भरा था परन्तु अपने एक बुजुर्ग मित्र के पास बेटी के रहने की व्यवस्था हो जाने से उनको कुछ राहत सी मिली।
बहुत सारी हिदायतों के साथ बेटी को अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए भेज दिया उन्होंने। कम्पनी की बस से ऑफिस आने जाने की तथा रहने की व्यवस्था हो जाने के कारण अधिक समस्या नहीं हुई सुरेखा को मुम्बई में। घर और यातायात प्रमुख समस्या हैं महानगरों की।
ऑफिस में अपने सहयोगियों से अच्छी पटती थी सुरेखा की। आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी, मृदुभाषिणी, सदा सबके साथ सहयोग करने वाली सुरेखा थी ही ऐसी, जो मिलता प्रभावित हो जाता।
सुदीप, उसके सहकर्मी ने ऑफिस के काम में उनकी बहुत सहायता की। सुरेखा के हृदय में कृतज्ञता की भावना थी सुदीप के प्रति।
प्रायः लौटते समय काम निबटा कर साथ साथ ही निकल जाते थे दोनों।
कभी काफी, स्नैक्स आदि लेकर सुरेखा ऑफिस बस के स्थान पर ऑटो या लोकल ट्रेन पकड़ कर घर पहुँच जाती थी। आत्मीयतापूर्ण व्यवहार मिलने से दोनों एक-दूसरे के साथ अपनी परेशानियाँ भी साझा कर लेते। सुरेखा विश्वास भी करने लगी थी सुदीप का।
अचानक ही एक दिन सुदीप ने उनके समक्ष शादी का प्रस्ताव रख दिया। सुरेखा को बुरा नहीं लगा क्योंकि उसको भी सुदीप का साथ अच्छा लगने लगा था।
अपने माता-पिता से भी उसने कुछ सकुचाते हुए सुदीप के प्रस्ताव के विषय में बताया।
भिन्न जाति, रहन-सहन का पता चलने पर माता-पिता को कुछ असहज लग रहा था, परन्तु सगे सम्बन्धियों और मुम्बई वासी मित्र से बात करके उन्होंने सुदीप के विषय में जानकारी करने को कहा।
सब कुछ सामान्य देख कर और सुदीप से प्रभावित हो कर मित्र ऩे सुरेखा के पिता को तैयार कर लिया।
सुदीप के माता-पिता तो किसी सड़क दुर्घटना का शिकार हो स्वर्ग सिधार चुके थे, हाँ एक छोटा अविवाहित भाई अवश्य था जो विदेश में रहता था।
सुरेखा के माता-पिता ऩे मुम्बई आकर सुदीप से स्वयं भी मिलकर दोनों का विवाह सादगी से सम्पन्न करा दिया। सुदीप के कोई दूर के सम्बन्धी और भाई तथा ऑफिस के साथी, मित्र उपस्थित रहे, कुछ समय वहीँ रूककर वो लोग अपने शहर लौट आये।
सुदीप और सुरेखा ऩे अपना अलग घर ले लिया था। घूमने फिरने में कब समय पंख लगाकर उड़ गया पता ही नहीं चला।
घर, ऑफिस, घूमना-फिरना यही दिनचर्या रहती थी दोनों की।
दोनों की जोड़ी लोगों के लिए चर्चा व कुछ के लिए ईर्ष्या का विषय थी। सुरेखा का साथ पाकर सुदीप भी स्वयं को धन्य ही मानते थे।
एक दिन दोनों फिल्म देखकर लौट रहे थे, बाईक पर सवार सुदीप और सुरेखा को चारों तरफ से कुछ मवाली छाप गुंडों ने घेर लिया।