धोबी घाट पर माँ और मैं -17
माँ के मजे में बाधा होने पर उसने अपनी अधखुली आँखे पूरी खोल दी और मेरी ओर देखते हुए बोली, ‘रुक क्यों गया चूतिये? जल्दी जल्दी चाट ना अपने मालपुए को।
मैंने मुस्कुराते हुए माँ की ओर देखा और बोला- क्या माँ, तुम भी ना? तुम्हें ध्यान है तुमने अभी अभी मुझे कितनी गालियाँ दी हैं? मैं जब याद दिलाता हूँ तो तुम कहती हो कि दी ही नहीं। अभी पता नहीं कितनी गालियाँ दे दी।
इस पर मेरी माँ हंसने लगी और मुझे अपनी तरफ खींचा तो मैं उठ कर फिर से उसके बगल में जाकर लेट गया।
माँ ने मेरे गाल पर अपने हाथों से एक प्यार भरी थपकी दे कर पूछा- चल मान लिया मैंने गाली दी, तुझे बुरा लगा क्या?
मैंने मुँह बना लिया था।
माँ मुझे बाहों में भरते हुए बोली- अरे मेरे चोदू बेटे, माँ की गालियाँ क्या तुझे इतनी बुरी लगती है कि तू बुरा मान कर रुठ गया?
‘नहीं माँ, बुरी लगने की बात तो नहीं है, लेकिन तुम्हारे मुँह से गालियाँ सुन कर काफ़ी अजीब सा लगा।’
‘क्यों अजीब लग रहा है, क्या मैं गालियाँ नहीं दे सकती?’
‘दे सकती हो, उसका उदाहरण तो तुमने मुझे दिखा ही दिया है। मगर अजीब इसलिये लग रहा है क्योंकि आज से पहले तुमको कभी गाली देते हुए नहीं सुना है।’
‘आज से पहले तुमने कभी मुझे नंगी भी तो नहीं देखा था ना? ना ही आज से पहले कभी मेरी चूत और चूची चूस कर मेरा पानी निकाला था। सब कुछ तो आज पहली बार हो रहा है इसलिए गालियाँ भी आज पहली बार सुन रहा है।’
कह कर माँ हंसने लगी और मेरे लंड को अपने हाथों से मरोड़ने लगी।
‘ओह माँ, क्या कर रही हो दुखता है ना? फिर भी तुम मुझे एक बात बताओ कि तुमने गालियाँ क्यों दी?’
‘अरे उल्लू, जोश में ऐसा हो जाता है। जब औरत और मर्द ज्यादा उत्तेजित हो जाते है ना तो अनाप-शनाप बोलने लगते हैं। उसी दौरान मुँह से गालियाँ भी निकल जाती हैं, इसमे कोई नई बात नहीं है, फिर तू इतना घबरा क्यों रहा है? तू भी गाली निकाल के देख, तुझे कितना मजा आयेगा?’
‘नहीं माँ, मेरे मुँह से तो गालियाँ नहीं निकलती।’
‘क्यों, अपने दोस्तों के बीच गालियाँ नहीं बकता क्या, जो नखरे कर रहा है?’
‘अरे माँ, दोस्तों के बीच और बात है पर तुम्हारे सामने मेरे मुँह से गालियाँ नहीं निकलती हैं।’
‘वाह रे मेरे शरीफ बेटे, माँ को घूर घूर कर देखेगा, माँ को नंगी कर देगा और उसकी चुदाई और चुसाई करेगा, मगर उसके सामने गाली नहीं देगा। बड़ी कमाल की शराफत है तेरी तो?’
‘क्या माँ, इस बात को गालियों से क्यों जोड़ के देखती हो?’
‘अरे क्यों ना देखूँ, जब हमारे बीच शर्म की सारी दीवारें टूट गई हैं और हम एक दूसरे के नंगे अंगों से खेल रहे हैं, तब यह शराफत का ढोंग करने का क्या फायदा, देख गालियाँ जब हम होश में हो तब देना या बोलना गुनाह है।