महकती कविता-3
महकती कविता-1महकती कविता-2
कविता ने लण्ड को फिर से मसलना शुरू कर दिया। रोहण को फिर से तरावट आने लगी।
‘अरे चुद तो गई, अब क्या करना है…?’
‘तुम्हारा सारा दम निकालना है… आज मेरी सुहागरात समझो… कुछ ना छोड़ो… बस अपना माल निकालते रहो। देखूँ तो जरा कितना दम है?’
‘अरे नहीं, यह तो फिर से सख्त होने लगा है… प्लीज अब नहीं ना…!’
भैया, अपने लण्ड को तो देखो ना, बेचारे पर तुमने कितनी ही मुठ्ठ मारी होगी, अब तो उसे सही जगह पर घुसने दो…!’
कविता ने उठ कर रोहण का लण्ड अपने मुख में डाल लिया और उसे चूसने लगी। रोहण फिर से उबलने लगा।
‘रस पियोगे…? मेरी चूत भी रस छोड़ रही है।’
रोहण ने चूत चूसने की बात सुनी तो वो पागल सा हो उठा। उसने उठ कर जल्दी से उसकी चूत पर अपना मुख फ़िट कर लिया। कसक भरी मीठी गुदगुदी के कारण कविता चीखने लगी।
‘अरे मार डालोगे क्या…? बहुत गुदगुदी चल रही है। ओह्ह्ह्ह बस करो ना…’
वो खिलखिलाने लगी। कविता के आनन्द से रोहण को और जोश आ गया। वो भी उसका दाना होंठों से चूस कर उसे बेहाल करने लगा।
कविता ने एक झटके से अपनी चूत से उसका मुख अलग किया और हंसते हुये बोली- तुम तो मुझे यू ही झड़ा दोगे… पहले जरूरी काम तो कर लो!
फिर कविता ने अपनी चिकनी गाण्ड उसके लण्ड के सामने उभार दी।
‘देखो फिर गाण्ड चुद जायेगी, फिर ना कहना कि गाण्ड मार दी।’
‘तो मारो ना भैया… देर किस बात की है। मजे लेना है तो सबका लो…’
रोहण ने कविता की कमर में हाथ डाल कर उसे थाम लिया और लण्ड पर थूक लगा कर उसे कविता की गाण्ड से चिपका दिया।
‘मारो ना सैंया… ताजी अनछुई है…’
‘तेरी सैंया की ऐसी तैसी… चोद दूंगा साली को…’
कविता फिर से खिलखिला उठी। पर दूसरे ही क्षण उसके मुख से चीख निकल गई।
‘अरे, ढीली छोड़ो ना… इतना कस कर छेद रखोगी तो कैसे घुसेगा…?’
कविता ने अपनी गाण्ड ढीली की और उसका लण्ड उसमें प्रवेश कर गया। जैसे छेद ने लण्ड को धन्यवाद कहा हो। बहुत कसी हुई गाण्ड थी।
‘बस अब धीरे धीरे… है ना… मेरी गाण्ड कभी चुदी नहीं है… ताजा फ़्रेश माल है… तकलीफ़ होगी…’ कविता ने विनती करते हुये कहा।
‘चिन्ता ना करो… तकलीफ़ तुम्हे नहीं मुझे होनी है इस कसी हुई तंग गाण्ड से तो…’
उसने धीरे धीरे आधा लण्ड ही घुसाया… फिर अन्दर बाहर करने लगा। कविता की गाण्ड चुदने से उसे भी आनन्द आने लगा था। पर रोहण ने बड़ी सफ़ाई से उसकी गाण्ड चोदते हुये अपना लण्ड उसकी गाण्ड में पहले की ही तरह अपना लण्ड पूरा ही घुसा दिया था। पर चूंकि कविता को प्यार से चोदा था इसलिये उसे दर्द नहीं हुआ। वो भी समझ गई थी कि लण्ड पूरा समा चुका है। उसने अपने सर को धीरे से तकिये पर रख लिया और अपनी आँखें बन्द करके अपनी गाण्ड चुदाने में लगी थी।
कविता ने गाण्ड इतनी ऊँची कर रखी थी कि उसकी चूत तक भी स्पष्ट नजर आ रही थी।