दोस्ती में फुद्दी चुदाई-15
दोस्तो. बीच में इम्तिहान होने की वजह से कुछ देरी हो गई.. माफ़ी चाहता हूँ.. आइए आगे चलते हैं।
अब तक आपने पढ़ा कि मैं सोनम को चोद रहा था और सोनम के शरीर की अकड़न भी बता रही थी कि वो इस मिलन का इंतज़ार नहीं करेगी।
तभी सोनम की चूत ने पानी फेंक दिया जैसे ही मेरे लण्ड को चिकनाई का अहसास हुआ.. उसने भी अपना गुस्सा निकाल दिया और सोनम की पूरी चूत भर दी।
सोनम निढाल होकर मेरे सीने से लग गई.. पूरी संतुष्टि होने पर मैंने भी उसे गले से लगा लिया।
मैं और सोनम कपड़े पहन ही रहे थे कि मेरा फ़ोन बजा.. दिमाग में ख्याल आया इस वक़्त कौन मादरचोद है.. जो परेशान कर रहा है.. साला अब कपड़े भी ना पहनूं क्या।
मैं अपना पैंट अभी घुटनों तक ही चढ़ा पाया था कि फ़ोन की घंटी दुबारा बज उठी। झक मार के फ़ोन उठाना ही पड़ा।
‘कौन है बे.. चुतियापा फ़ैलाने को फ़ोन किया है गांडू?’
अंकिता- अरे..अरे.. सामने मिलते हो तो बड़ा प्यार दिखाते हो.. जब भी फ़ोन करो तो ऐसे बात करते हो जैसे मैं तुम्हारी कोई दुश्मन हूँ।
ऊप्स… यह तो अंकिता का फ़ोन था.. जिसकी चूत लेनी हो.. उससे थोड़ा प्यार ही दिखाते हैं.. लेकिन अंकिता के साथ ही हमेशा ऐसा क्यों हो जाता है.. मैं सकपका गया।
फिर थोड़ा दम साध कर बोला- ओह्ह अंकिता.. सॉरी अगेन यार.. फ़ोन देखा ही नहीं स्वीटी..
अंकिता- अच्छा जी.. हमेशा मेरे साथ ही ऐसा होता है.. ऐसा क्यूँ?
मैंने अपने सर पर हाथ घुमाया और बोला- पता नहीं यार.. सॉरी बोला ना.. वो सबकी रिंगटोन एक जैसी है ना.. तेरी रिंगटोन थोड़ी अलग करता हूँ आज.. ये जो बजती है वो तो दोस्तों वाली है ना.. तुम तो जानती हो..
अंकिता- जानती हूँ.. जानती हूँ बाबा.. रिलैक्स.. अच्छा सुनो.. कहाँ हो.. घर तो नहीं गए ना?
सोनम भी कपड़े पहन चुकी थी.. मेरी पैंट अब भी घुटनों तक ही थी कि सोनम आँखों में शरारत लिए मेरी तरफ आई..
मैं बोला- नहीं.. नहीं.. अभी तो.. कॉल..ले..ज्..ज्ज्ज्.. में.. ही हूँ.. डियर.. बता क्या हुआ।
मेरी आवाज एकदम से फंस सी गई क्योंकि जब तक मैं बात कर रहा था.. सोनम ने मेरा लंड पकड़ कर दबा दिया और मैं समझ ही नहीं पाया कि मेरा आधा खड़ा लण्ड किसके हाथों में आ गया।
अंकिता- अच्छा तब ठीक है.. सुनो मुझे पिक कर लोगे विजयनगर से.. यहाँ से आने का कुछ भी साधन मिल नहीं रहा है।
यहाँ सोनम खिलखिलाते हुए मेरा लण्ड रगड़ रही थी.. लेकिन उसकी हँसी की आवाज़ अंकिता को सुनाई ना दे जाए.. इसलिए मैंने उसका सर नीचे झुकाया और अपना लण्ड उसके मुँह में डाल दिया।
मैं फुसफुसाया, ‘चूस हरामजादी.. ठरक चढ़ी तुझे..’
वो गूँ..गूँ.. करके मेरा लौड़ा चूसने लगी।
अब मैं अंकिता से बोला- क्यूँ तेरा मंगेतर नहीं आया.. उसे बुला ना.. क्या नाम था उस विकलांग का.. हाँ नावेद.. उसे बुला ले।
अंकिता- ऐसे मत बोलो ना.. नावेद आया था.. लेकिन रूचि के पेट में दर्द हो रहा था तो मैंने उसे उसके संग भेज दिया। प्लीज़ आ जाओ ना..