लण्ड न माने रीत -7
अब तक आपने पढ़ा..
जब मैं उठ कर आने लगा तो भाभी जी बोलीं- कल मैं और आपके दोस्त मेरे मायके जा रहे हैं.. मेरे पिताजी का स्वर्गवास हो गया था। वो होली पर जाना पड़ता है ना.. आरती घर पर अकेली रहेगी। परसों इसकी ननद भी इसके ससुराल से आने वाली है। हो सके तो आप रात को यहीं रुक जाना.. जब तक हम लोग ना आयें.. और हाँ.. आप खाना भी यहीं पर खाना।
यह सुनकर मेरे मन में तो लड्डू फूटने लगे.. प्रत्यक्षतः मैंने कहा- ठीक है भाभी जी.. जैसी आपकी आज्ञा.. जब तक आप लोग नहीं आते.. मैं रात को यहीं रुकूँगा।
मैंने एक बार मुस्कुरा कर आरती की ओर देखा तो उसने नज़रें झुका लीं और मैं वहाँ से चला आया।
अब आगे..
मैं उस रात ठीक से सो नहीं पाया.. जब मैंने आरती का कौमार्य भंग किया था.. वो सारे नज़ारे एक-एक करके मेरी आँखों में नाचने लगे। उस बात को कई साल गुजर चुके थे.. पर ऐसा लग रहा था कि जैसे कल ही की बात हो..
मुझे लगा जैसे मेरा लिंग अभी भी उसकी खून से लथपथ उसकी योनि में धंसा हुआ है और वो मेरी बाँहों में सिसक रही है.. मैंने वो रात बेचैनी में जैसे-तैसे काटी।
अगले दिन जब आरती के मम्मी-पापा जा चुके थे.. मैं शाम को करीब साढ़े सात बजे उसके घर पहुँच गया। कुण्डी खटखटाने पर दरवाजा आरती ने ही खोला और मुस्कुरा कर मुझे भीतर आने को कहा और एक तरफ हट गई।
मेरे बैठने के बाद उसने दरवाजे की कुण्डी बंद की और मेरे सामने आकर बैठ गई।
उसने गुलाबी रंग की बिना बाँहों वाली सिल्क की नाइटी पहन रखी थी जो सामने से खुलती थी। गीले से बालों का जूड़ा बांध रखा था.. लगता था कि अभी नहाई थी.. नाइटी पारदर्शी तो नहीं थी लेकिन उसमें से उसके मम्मों के साथ साथ घुंडियों का उभार साफ़ दिख रहा था.. लगता था जैसे उसने नीचे कुछ नहीं पहन रखा था।
‘क्या देख रहे हो बड़े पापा..?’ वो बोली।
‘देख रहा हूँ कि तू पहले से और कितनी सुंदर हो गई है.. गुलाब की तरह खिल उठी है।’ मैं बोला।
‘खिलाया तो मुझे आप ही ने था बड़े पापा..’ वो बोली और हँस दी।
मैं भी हँस दिया और उसके पास जाकर बैठ गया। उसके बदन से भीनी-भीनी सी सुगन्ध उठ रही थी।
मेरा मन बेकाबू हो उठा और मैंने उसे अपने पास खींच लिया और चूमने लगा।
‘अरे रे.. यह क्या बड़े पापा.. यह सब नहीं करना है.. मम्मी बोल के गई थीं कि आपको खाना खिला कर सुला देना है।’
‘सुला देना नहीं.. सुला लेना..’ मैंने कहा।
‘धत्त.. अब कुछ नहीं.. अब मैं पराई हूँ..’ वो बोली।
‘तू तो हमेशा मेरी प्यारी-प्यारी गुड़िया थी और हमेशा रहेगी.. मुझसे पराई कभी नहीं हो सकती।’ कहकर मैंने उसके दोनों मम्मे पकड़ लिए और उसके गालों को चूमने लगा।
उसने ज्यादा विरोध नहीं किया और मुझे अपनी मनमानी करने दी।
‘अब हटो ना.. पहले खाना खा लो.. ये बातें करने को सारी रात पड़ी है।’ वो बोली।
‘अरे खा लेंगे.. जल्दी क्या है.. अभी तो आठ ही बजे हैं.. पहले इस बेचारे का कुछ करो..