तुझ को भुला ना पाऊँगा -3
एक दिन वो जब मायके आई तो अपने घर उसे 2-3 दिन रुकना था तो वो हमारे घर आ गई जब मेरी माँ रसोई में गई तो उसने बड़े शिकयती लहजे में कहा- मैंने कहा था ना कि मुझे भगा कर ले चलो, पर तुम माने नहीं। अब मुझे अपनी शक्ल भी नहीं दिखाते मेरा कसूर तो बता दो, क्या मांगती हूँ तुमसे, सिर्फ़ यही ना कि तुम्हारा चेहरा देख लूँ?
उसकी यह बात सुन कर मैं शर्मिंदा सा हो गया और सिर झुका कर कहा- नहीं, ऐसी बात नहीं है, तुम अब किसी और की हो चुकी हो, और मैं तुम्हारे जीवन में अब कोई दुख नहीं…
पर उसने मेरी बात काटते हुए कहा- मेरा मन पहले भी तुम्हारा था, अब भी तुम्हारा है। यह शादी मैंने मज़बूरी में करी है, वो सामाजिक तौर पर मेरा मलिक है पर मानसिक तौर पर नहीं!
‘और इसके ज़िम्मेदार तुम हो अमर!’ वो एक पल रुक कर बोली।
‘मैं अगले महीने यहाँ रहने आ रही हूँ 2 महीने के लिए!’
इतनी देर में मेरी माँ चाय बना कर ले आई तो वो चुप हो गई। चाय पीकर जब जाने लगी तो बोली- शाम को घर आना!
मैंने हाँ मे सिर हिलाया और गहरी सोच में पड़ गया।
शाम को मैं करीब 4:30 बजे उनके घर पहुँचा तो वो भाभी के घर बैठी थी, भाभी से बोली- भाभी, आप चाय बना लो और ज़रा आराम से बनाना टाइम लगा कर!
भाभी को सारी बात का पता तो था ही, वो उठीं और मुस्कुरा कर चली गईं।
भाभी के जाते ही वो उठ कर मेरे पास आ गई और मेरे चेहरे को अपने दोनो हाथों में पकड़ कर बोली- अमर, मेरी जान तुम नहीं जानते कि मेरे जीवन में तुम्हारी क्या जगह है? पर यह याद रखना कि मैं मर तो सकती हूँ पर तुम्हें नहीं भुला सकती और मैं जानती हूँ कि इस बात का तुम्हें भी पता है।
मैं कुछ देर तक उसके मुँह की तरफ देखता रहा और फिर मैंने बैठे बैठे ही अपनी बाहों में भर लिया और उसके कंधे पर सिर रख कर रोने लगा और वो मेरे कंधे पर सिर रख रोने लगी, अपनी दोनों बाहें मेरे गिर्द लपेट दीं, काफ़ी देर तक हम दोनों कुछ नहीं बोले और रोते रहे|
फिर एक झटके से मुझसे वो अलग हो गई और बोली- सुनो, जो मैं कहने जा रही हूँ, उसे गौर से सुनो!
मैं प्रश्नवाचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगा तो वो पुनः बोली- तुम्हें याद है, एक रात तुम मेरे पास रहे थे और मैंने उस रात तुम्हें कुछ भी नहीं करने दिया था?
मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया तो वो बोली- मैं अगले महीने यहाँ रहने आ रही हूँ, और वो भी पूरे 2 महीने के लिए, और तुम्हारी वो तमन्ना मैं उस वक्त पूरी करूँगी।