नमस्ते मित्रों,
यहाँ हिंदी में ये मेरा पहला कहानी है.
अपनी तरफ़ से कुछ अलग लिखने और उसे आपको लोगों के सामने रखने की कोशिश की है.
पढ़ कर अपना वक्तव्य/टिप्पणियाँ ज़रूर दीजियेगा.
व्याकरण अशुद्धि यदि हो तो उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ.
धन्यवाद.
नदी का रहस्य
१)
घर के मुख्य दरवाज़े पर ‘ठक ठक ठक ठक’ की आवाज़ हुई ... और इसी के साथ आवाज़ आया....
“हाँ..... मैडम जी.... दूध ले लीजिए...!!”
अभी ये आवाज़ ठीक से ख़त्म हुई भी नहीं कि घर के ऊपर तल्ले से एक जनानी की खनकती सी आवाज़ गूँज उठी,
“बिट्टू... ए बिट्टू... देख बेटा ... दूधवाला आया है.. जा के दूध ले ले ज़रा...”
लेकिन बिट्टू की ओर से कोई आवाज़ नहीं आया...
जब और दो तीन बार आवाज़ देने के बाद भी बिट्टू ने कोई उत्तर नहीं दिया तब उसी जनानी की आवाज़ गूँजी... झुँझलाहट भरी,
“ओफ्फ़.. इस लड़के को तो सिर्फ़ खाना और सोना है... और सोना भी ऐसा कि चिल्लाते रह जाओ .... या फ़िर, बगल से रेलगाड़ी ही क्यों न गुज़रे... मजाल इसके कानों में जूँ तक भी रेंग जाए.... |”
इसके एक मिनट बाद ही कमरे से वही खनकती आवाज़ की मालकिन निकली...
रुना...
रुना मुखर्जी नाम है इनका...
गौर और गेहूँअन के बीच की वर्ण की है ... सुन्दर गोल मुख... भरा बदन ... धनुषाकार भौहें (भवें) और उतने ही सुंदर बड़ी आँखें ... दोनों हाथों में पाँच पाँच लाल रंग की मोटी चूड़ियाँ जिन पर सोने की अति सुन्दर नक्काशी की हुई हैं ... |
सीढ़ियों पर से जल्दी उतरती हुई नीचे सीधे रसोई घर में घुसी और एक बड़ा सा बर्तन लेकर तेज़ कदमों से चलते हुए घर के मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ी...
दरवाज़ा खोली...
और,
बर्तन आगे बढ़ाते हुए बोली,
“लीजिए भैया... जल्दी भर दीजिए... मुझे देर हो रही है.”
दूध वाला बर्तन लेने के लिए हाथ बढ़ाते हुए एक नज़र रुना की ओर डालता है ... और ऐसा करते ही उसके हाथ और आँखें दोनों जम जाती हैं..
रुना एक तो है ही रूपवती ... और उसपे भी इस समय दूधवाले के सामने ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी है.
38C के उन्नत उभारों के कारण ब्लाउज में बने सुंदर उठाव ध्यान तो खींच ही रहे हैं... साथ ही V शेप से बाहर झाँकता ४ इंच लम्बा क्लीवेज तो बस मुग्ध ही किये दे रहा है.
देबू ने रुना को देखा तो है कई बार... पर कभी इस तरह... ऐसे कपड़ों में नहीं देखा.
देबू को यूँ अपनी ओर अपलक आश्चर्य और एक अव्यक्त आनंद से देखता हुआ देखी तो रुना का भी ध्यान अपनी ओर गया .... और खुद की अवस्था का बोध जैसे ही हुआ; तो हड़बड़ी के कारण हुई अपनी इस नादान गलती से वह बुरी तरह अफ़सोस करते हुए लगभग उछल पड़ी..
खुद को जल्दी से दरवाज़े के पीछे करती हुई आँखें बड़ी बड़ी करके बोली,
“ए चल... जल्दी कर... कहा न मुझे देर हो रही है.”
देबू मुस्कराया... बर्तन लिया और दूध भर कर वापस रुना की ओर बढ़ाया.. पर जानबूझ कर इतनी दूरी रखा कि रुना को बर्तन लेने के लिए हाथ तनिक और बढ़ाना पड़े ...
अब चाहे इस क्रम में उसे थोड़ा झुक कर आगे बढ़ना पड़े या फ़िर कुछ और करना पड़े.
देबू की इस करतूत को रुना समझ नहीं पाई. एक तो उसे देर हो रही थी और दूजे, जल्दबाजी में ऐसे अर्धनग्न अवस्था में एक पराए लड़के के सामने खड़े रहते हुए शर्म से ज़मीन में गड़ी जा रही थी.
देबू को ठीक से हाथ आगे न बढ़ा कर देते हुए देख कर रुना झुँझलाते हुए अपना बायाँ हाथ आगे बढ़ाई.. पर बर्तन अभी भी कुछ इंच दूर है.. वो देबू को कुछ बोले उससे पहले ही देबू बोल पड़ा,
“जल्दी कीजिए मालकिन... मेरे को अभी दस जगह और जाना है.”
जो बात वो देबू को फ़िर से बोलना चाह रही थी; वही बात देबू ने उसे कह दी..
कुछ और सोच समझ न पाई वो..
दरवाज़े के पीछे से थोड़ा आगे आई... एक कदम आगे बढ़ाई, थोड़ा सामने की ओर झुकी और हाथ बढ़ाकर बर्तन पकड़ ली.
पर तुरंत ही बर्तन को ले न सकी क्योंकि देबू ने छोड़ा ही नहीं... वो फ़िर से आँखें बड़ी कर घोर अविश्वास से रुना की ओर देखने लगा था. रुना की स्त्री सुलभ प्रवृति ने तुरंत ही ताड़ लिया कि देबू क्या देख रहा है.
देबू को डाँटने के लिए मुँह खोली... पर एकदम से कुछ बोल न पाई.
उसका कामातुर स्त्री - मन इस दृश्य का ... एक मौन प्रशंसा का आनंद लेने के लिए व्याकुल हो उठा.
जवानी में तो बहुत देखे और सुने हैं... पर अब उम्र के इस पड़ाव पर उसकी देहयष्टि किसी पर क्या प्रभाव डाल सकते हैं और कोई प्रभाव डाल भी सकते हैं या नहीं इसी बात को जानने की एक उत्कंठा घर कर गई उसके मन में.
करीब दो मिनट तक ऐसे ही खड़ी रही वह.. केवल ब्लाउज पेटीकोट में... आगे की ओर झुकी हुई... देबू की लालसा युक्त तीव्र दृष्टि के तीरों के चुभन अपने वक्षों पर साफ़ महसूस करने लगी और साथ ही उसके खुद के झुके होने के कारण अपने ब्लाउज कप्स पर पड़ते दबाव का भी स्पष्ट अनुभव होने लगा उसे.
इधर देबू का भी हालत ख़राब होता जा रहा है. गाँव में बहुत सी छोरियों को देखा है उसने; और सुंदर भाभियों को भी. उनमें से एक है ये रुना मुख़र्जी. दूध पहुँचाने के सिलसिले में कई बार रुना के घर आता जाता रहा है और इसी वजह कई बार भेंट भी हुई है उसकी रुना से, कई बार बातें भी हुईं, और बातों के दौरान ही कई बार देबू ने अच्छे से रुना को ताड़ा भी; पर साड़ी से अच्छे से ढके होने के कारण उसकी उभार एवं चर्बीयुक्त सुगठित देह के ऐसे कटाव को कभी समझ न सका था.
हमेशा अच्छे कपड़ों में रहने वाली रुना दिखने में हमेशा से ही प्यारी और सुसंस्कृत लगी है उसे; पर वास्तव में वह प्यारी होने के साथ साथ इतनी सुपर हॉट हो सकती है ये देबू ने कभी नहीं सोचा था |
और फ़िलहाल तो उसकी नज़रें निर्बाध टिकी हुई थी ब्लाउज कप्स से झाँकते रुना के दूधिया चूचियों के ऊपरी अंशों पर एवं झुके होने के कारण ४ से ६ इंच हो चुकी उस मस्त कर देने वाले क्लीवेज और क्लीवेज के ठीक सामने, गले से लटकता पानी चढ़ा सोने की चेन पर जो कदाचित उसका मंगलसूत्र भी है.
रुना ने हाथ से बर्तन को ज़रा सा झटका दिया और तब जा कर देबू की तंद्रा टूटी. वह बेचारा चोरी पकड़े जाने के डर से नर्वसा गया. आँखें नीची कर के जल्दी से अपने कैन को बंद किया और झट से उठ गया. रुना भी अब तक दुबारा दरवाज़े के पीछे आ गयी थी. देबू अपने दूध के बड़े से कनिस्तर को उठा कर जाने के लिए आगे बढ़ा ही था कि रुना बोली,
“सुनो, कल भी लगभग इसी समय आना... पर थोड़ा जल्दी करना.”
देबू ने रुना की ओर देखा नहीं पर सहमति में सिर हिलाया.
रुना मुस्करा पड़ी.
देबू तब तक दो कदम आगे बढ़ चुका था.. पर नज़रें उसकी तिरछी ही थीं... रुना के उस अनुपम रूप को जाते जाते अंतिम बार अपने आँखों में कैद कर लेना चाहता था.
और इसलिए रुना जब मुस्कराई तो वह नज़ारा भी देबू की आँखों कैद हो गई. ‘उफ्फ्फ़ क्या मुस्कान है... क्या मुस्कराती है यार! एक तो ऐसी अवस्था में, ऊपर से ऐसी कातिल मुस्कान...’ देबू पूरे रास्ते रुना के बारे में सोचता ही रहा. और सिर्फ़ रास्ता ही क्या, वह पूरा दिन रुना के बारे में सोचते हुए बीता दिया और रात में रुना के उस अनुपम सुगठित देह के बारे में सोच सोच कर स्वयं को तीन बार संतुष्ट करके सो गया.
२)
नबीन बाबू सुबह आठ बजे ही घर से निकल जाते हैं... नदी के तट तक पहुँचने में पन्द्रह मिनट तो लगना तय है. फ़िर थोड़ी देर किसी नाव का इंतज़ार करते हैं. अक्सर ही कई नाव नदी किनारे ही मिल जाते हैं पर कई बार ऐसा भी होता है कि सवारियों की तादाद अनुमान से अधिक हो जाने पर नावों में भी तिल भर की जगह नहीं बचती और फ़िर सवार हो चुके सवारियों को नदी के दूसरी ओर छोड़ने के अलावा नाविकों के पास और कोई चारा नहीं रहता... और यही तो इन नाविकों का काम है... रोज़ी रोटी है.
हमेशा की तरह नबीन बाबू पहुंचे तो थे तट पर समय से; परन्तु आज तट पर एक भी नाव नहीं है.. कदाचित आज नदी के उस पार जाने वालों की संख्या बहुत अधिक रही होगी. कुल पन्द्रह नाव हैं जिनमें से ३ नाव मरम्मत के काम के कारण तीन दिन पानी में नहीं उतरेंगे. अब बाकी बचे बारह नाव में से एक भी नाव अभी यहाँ नहीं हैं. ‘उफ्फ्फ़... एक भी नाव नहीं है... पता नहीं कब तक वापस आएगी.. कहीं आज देर न हो जाए.’ नबीन बाबू ने सोचा.
नदी के उस पार से इस पार आने में पन्द्रह से बीस मिनट लगते हैं और फ़िर वापस उस ओर जाने में भी उतना ही समय लगता है. यानि की करीब तीस से चालीस मिनट यूँ ही निकल जाते हैं इधर से उधर होने में.
नबीन बाबू ने अपने पैंट के जेब में रखे एक छोटा सा बंडल निकाला. बीड़ी का बंडल. एक निकाला और लाइटर जला कर सुलगाने ही वाले थे कि पीछे से किसी की पदचाप सुनाई दी.
जल्दी से पीछे देखा नबीन बाबू ने.
हरिपद चला आ रहा है.
हाथ में एक थैली लिए..
हरिपद जब तक पास आ कर खड़ा होता.. उतनी देर में नबीन बाबू ने बीड़ी सुलगा लिया.
हरिपद पास आ कर कुशल क्षेम पूछता हुआ एक मतलबी मुस्कान मुस्कराया. नबीन बाबू इस मुस्कान का मतलब बहुत अच्छी तरह जानते थे.. जाने भी क्यों न.. आखिर हरिपद के साथ उनका कोई आज का तो जान पहचान नहीं है. बचपन में साथ खेलते और पढ़ते थे.. कितनी ही शरारतें दोनों ने मिल कर की है. गाँव के लोग दोनों की जोड़ी को अटूट बोलते थें... पर जैसा की सबके साथ होता है.. समय कभी एक सा नहीं रहता.. हरिपद का परिवार नबीन बाबू की तरह साधन संपन्न नहीं था.. वैसे कुछ खास तो नबीन बाबू का भी परिवार नहीं था पर हरिपद के परिवार से थोड़ी बेहतर स्थिति में था.
आठवीं तक आते आते हरिपद के पिताजी ने साफ़ कह दिया की अब उनसे अकेले काम नहीं संभाला जाता.. बेहतर होगा अगर हरिपद भी उनके काम में हाथ बंटाए. ‘स्कूल से आने के बाद थोड़ी देर काम करेगा.. फ़िर स्कूल की पढ़ाई भी कर लेगा.’ ऐसा कहा था हरिपद के पिताजी ने. पर हरिपद और उनकी माता जी; दोनों जानते थे कि दोनों काम साथ कर पाना ज़्यादा दिन संभव नहीं होगा. शायद उनके पिताजी भी इस बात को समझते थे.. पर क्या करे... हरिपद और उसके तीन छोटे भाई बहन और माँ बाप... छह लोगों का परिवार एक अकेले के कमाई से तो नहीं चल सकता न..
परिवार की अवस्था और पिताजी के कहा को सिर माथे ले हरिपद भी जुट गए थे काम पर. हमेशा कुछ न कुछ करते रहते. जहाँ से भी हो, जितना भी हो; काम ज़रूर करते और जितना भी मिलता वो सब घर आ कर अपनी माताजी के हाथ रख देते. शुरू के कुछ महीने तो किसी तरह स्कूल और काम दोनों को अच्छे से संभाला पर जल्द ही उन्हें इस बात का अच्छे से आभास हो गया कि दोनों नावों पर दोनों पैर रख कर अधिक दिन सवारी नहीं हो सकती और अगर किसी तरह हो जाए तो वह अपने आप में एक बेईमानी होगी, मिथ्याचार होगा. पर काम तो छोड़ा नहीं जा सकता... अगर छोड़ दिया तो जो भी थोड़े बहुत पैसे अधिक आ रहे हैं वो तो छूटेगा ही... साथ ही स्थिति के और अधिक ख़राब होने में अधिक समय नहीं लगेगा.
अतः पढ़ाई छोड़ना ही एकमात्र उपाय सूझा.
सो हरिपद ने किया भी.
पन्द्रह साल गुज़र गए.... आज इनके खुद के पास रोज़मर्रा की ज़रूरतों वाली एक छोटी सी दुकान और दो नावें हैं.
दुकान पर कभी हरिपद स्वयं तो कभी उनकी धर्मपत्नी बैठती हैं और दोनों नाव सवारियों को नदी को पार करने के काम में आती हैं.
उन नावों के लिए गाँव के ही दो लड़कों को नाविक रखा हुआ है हरिपद ने.
कुल मिलाकर हरिपद के कर्मठता और सूझबूझ के कारण कमाई अच्छी होती है और घर की स्थिति भी काफ़ी सुधर गई है. पर एक बात जो आज तक हरिपद में नहीं बदला है वो है उसका हर बात में ज़रुरत से ज़्यादा जिज्ञासु होना. जब तक किसी बात के तह तक न पहुँच जाए तब तक उसे शांति नहीं होती, चैन नहीं मिलता.
हरिपद के इसी आदत की कुछ लोग प्रशंसा करते तो कई लोग बुराई करते नहीं थकते. कारण था, अपनी इसी जिज्ञासु प्रवृति के कारण कई बार हरिपद का दूसरों की निजी ज़िंदगी और मामलों में व्यर्थ का टांग अड़ा देना.
बचपन का यार होने के नाते नबीन बाबू हरिपद के इस आदत से बहुत भली प्रकार से परिचित थे... अतः वो हरिपद से ऐसी किसी भी विषय पर बात करने से कतराते थे जो कहीं न कहीं आगे जा कर उनके व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन को लेकर हरिपद के मन में संशय का बीज बो जाए और वो भी अपने प्रश्नों की प्यास के तृप्त न होने तक इधर उधर हाथ पाँव मारता रहे.
हरिपद के मतलबी मुस्कान को समझने में क्षण भर की भी देर न लगी नबीन बाबू को. पॉकेट से बंडल को दुबारा निकाल कर एक बीड़ी निकाली और हरिपद के हवाले कर दिया.
हरिपद की मुस्कान और भी बड़ी हो गई.
सुबह सुबह ही किसी से मुफ्त का कुछ मिल जाए तो कदाचित हर किसी का मन प्रफुल्लित हो ही जाता है एवं मानव स्वभाव से ऐसा होना स्वाभाविक ही है.
अपने कुरते के जेब से एक छोटी माचिस की डिबिया निकालते हुए बीड़ी को होंठों के एक कोने में दबाए रख हरिपद दबी आवाज़ में बोला,
“और... भई नबीन बाबू... सब कुशल मंगल?”
नदी की ओर देखते हुए नबीन बाबू बेफ़िक्री में धुआँ उड़ाते हुए बोले,
“हाँ हरु... ऊपरवाले की दया से सब कुशल मंगल है.. अपनी सुनाओ... कैसी कट रही है ज़िंदगी..?”
बीड़ी सुलगाने के साथ ही एक अच्छे खासे परिमाण में धुआँ छोड़ता हुआ हरिपद बोला,
“ज़िंदगी का क्या है नबीन... कैसी भी हो काटनी - गुजारनी तो पड़ती ही है. खैर, मेरे मामले में भी कह सकते हो कि ऊपरवाले की कृपा है.”
नबीन बाबू एक आत्मीयता वाली हल्की सी मुस्कान लिए बोले,
“बढ़िया... बहुत बढ़िया.”
“बार बार नदी की ओर क्या देख रहे हो नबीन... उस ओर जाना है क्या?... ओह, समझा समझा.. ऑफिस के लिए निकले हो.”
“हाँ. रोज़ इसी समय आता हूँ तट पर... हमेशा एक न एक नाव मिल ही जाती है... पर आज देखो... खड़े खड़े ही दस से पन्द्रह मिनट हो गए पर नाव एक भी नहीं दिखी.”
“अरे होता है ऐसा कभी कभी. थोड़ा और रुको.. आ जाएगी एक न एक. (थोड़ा रुक कर) ... तुम्हारा ऑफिस का समय थोड़ा और पहले होता तो मैं अपने नाव से ही तुम्हें नदी पार करवा देता... रोज़.
”
एक दीर्घ श्वास छोड़ते हुए नबीन बाबू ने धीरे से कहा,
“आधे घंटे के बाद मेरी घरवाली भी इधर से ही जाएगी.”
नबीन बाबू के मुँह से ‘घरवाली’ शब्द सुनते ही हरिपद पल भर के लिए बीड़ी पीना ही भूल गया. आँखों के सामने नबीन बाबू की ख़ूबसूरत लुगाई का खूबसूरत चेहरा और उसके समतल पेट की गोल नाभि छा गए.
सत्रह साल पहले जिस दिन नबीन बाबू की शादी हुई थी... हरिपद भी कई बारातियों में से एक था... और उस दिन गाँव के कई बड़े बुजुर्गों को यह कहते सुना था कि ‘नबीन की जैसी लुगाई बहुत किस्मत वालों को ही मिलती है.’
उस दिन तो हरिपद ने ऐसी बातों को नार्मल समझ कर एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दिया था.. पर ‘बोउ भात’ अर्थात् रिसेप्शन के दिन नबीन के पारिवारिक नियमों के अंतर्गत जब सभी अतिथियों को उनके थाली में घर की नववधू थोड़ा थोड़ा कर भोजन परोस रही थी तब हरिपद ने उस सुन्दर से मुख को देखा था बहुत पास से... एक तो पहले से ही इतनी सुंदर और ऊपर से मेकअप ने नबीन की दुल्हन को पूनम की चाँद से भी कहीं अधिक सुंदर बना दिया था. और फ़िर जब हवा के झोंके से दुल्हन का साड़ी पेट पर से थोड़ा हट गया था तब उस समतल, चिकने सपाट पेट पर वो सुंदर गोल गहरी नाभि तो बस; जैसे हरिपद का साँस ही रुकवा दिया था.
किसी की नाभि तक भी इतनी सुंदर, नयनाभिराम हो सकती है ये उस दिन हरिपद को पता चला था.
सबको थोड़ा थोड़ा कर परोसते हुए जब दुल्हन हरिपद के सामने आई तब नबीन ने ख़ुशी ख़ुशी अपनी दुल्हन का हरिपद के साथ परिचय करवाया था... हरिपद को अपने पति का बचपन का दोस्त जान कर दुल्हन ने होंठों पर एक बड़ी सी मुस्कान लिए हाथ जोड़ कर हरिपद का अभिवादन की. हरिपद ने भी हाथ जोड़ कर प्रत्युत्तर दिया. ऐसा करते समय उसका ध्यान दुल्हन के होंठों की ओर गया.. ‘आह!’ कर उठा उसका मन... होंठों के बीच से झाँकते दुल्हन के सफ़ेद दांत सफ़ेद मोतियों के भांति लग रहे थे.
उस दिन हरिपद को इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ था कि केवल यौनांग नहीं; अपितु कई और अंग भी ऐसे होते हैं जो अलग प्रकार के अथवा यौन सुख जैसा ही सुख दे सकते हैं.
“अरे वो देखो... एक नाव आ रही है!”
इस आवाज़ से हरिपद का ध्यान टूटा.. नबीन बाबू की लुगाई के बारे में सोचते सोचते हरिपद ऐसा खो गया था कि १-२ मिनट उसे लग गए अपने वास्तविक स्थिति को समझने में.
अपने बगल में नबीन बाबू को न पा कर जल्दी नज़रें दौड़ाई उसने.
देखा की नबीन बाबू ‘नाव आई नाव आई’ कहते हुए ख़ुशी से नदी की ओर भागे जा रहे हैं.
नाव में बैठना नबीन को बचपन से ही बहुत अच्छा लगता रहा है. नाव देखते ही नबीन बाबू ख़ुशी से उछलने नाचने लगते थे और आज भी यही कर रहे हैं.
नबीन की इस हरकत को देख कर हरिपद मुस्कराया.
पर तभी, क्षण भर में ही हरिपद के होंठों पर से मुस्कान गायब हो गई...
‘अरे ये क्या... नबीन तो दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है! उस दिशा में...तो... उफ्फ्फ़...
’
ज़्यादा न सोचा गया हरिपद से.. ‘नबीन...ओ नबीन....’ चिल्लाते हुए नबीन बाबू के पीछे दौड़ पड़े हरिपद.
३)
आज दिन भर स्कूल में बहुत व्यस्त रही रुना. कक्षा ३ से ६ तक के बच्चों का वीकली टेस्ट था. सभी कक्षाओं में हिंदी, अंग्रेज़ी और पर्यावरण विज्ञान पढ़ाती है वो. छोटे बच्चों को पढ़ाने में बहुत दक्ष है एवं कड़ी अनुशासन में भी रखना जानती है. लगातार पाँच घंटे से टेस्ट लेते लेते थक गई है बेचारी इसलिए कक्षा ३ में कुर्सी पर बैठ कर सुस्ता भी रही है और टेबल पर रजिस्टर रख कर बच्चों की उपस्थिति का अवलोकन कर रही है... बच्चे चुपचाप रुना द्वारा दिए गए टास्क को बनाने में लगे हैं...
रजिस्टर चेक करते करते अचानक से रुना को आज सुबह घटी घटना याद आ गई..
सुबह जिस तरह से उसका देबू दूधवाले से आमना सामना हुआ, उसकी देह को देख कर देबू जिस तरह से मोहित हो गया था एवं उसके चेहरे के जो हाव भाव हो गए थे... सब याद आते ही रुना के दिल में एक गुदगुदी हो गई.
वो मन ही मन मुस्करा उठी.
मुस्कराने का एक कारण ये भी था कि देबू की नज़रों ने उसके देह और मन में कामोत्तेजना की एक धीमी आँच प्रज्ज्वलित कर दी थी... जैसे जैसे देबू की नज़रें रुना के बदन पर जमते जा रहे थे वैसे वैसे शर्मो ह्या के साथ साथ थोड़ी थोड़ी कर के काम वासना का भी संचार होने लग रहा था रुना में. ब्रा विहीन ब्लाउज के अंदर उसके निप्पल्स धीरे धीरे सख्त हो उठे थे जिस वजह से ब्लाउज पर उनकी छाप से बनने लगी थी और यह चीज़ देबू की नज़रों से छुपी न रह सकी थी.
उसके ब्लाउज पर निप्पल्स वाले स्थान को देख आकर जिस तरह से देबू ने अविश्वास के साथ ज़ोर से थूक निगला था उससे तो रुना लगभग हँस ही पड़ी थी.
देबू के चले जाने के बाद रुना दूध के बर्तन को रसोई में सही जगह रखने के बाद सीधे अपने कमरे में गई और जा कर खड़ी हो गई थी ड्रेसिंग टेबल के सामने. आदमकद दर्पण के सामने खड़ी हो कर अपने जिस्म को स्वयं ही बड़े मनमोहक ढंग से निहारने लगी थी. देबू की दृष्टि ने जो आँच लगाया था रुना के अंदर; उसे अब धीरे धीरे कई महीनों की यौन तृष्णा हवा देने लगी थी.
रुना की बढ़ी हुई धड़कन बीच बीच में एक बार के लिए धौंकनी की तरह तेज़ हो जाती और फ़िर कम होती जाती.
‘टन टन टन टन टन!!!’
स्कूल की घंटी बजी...
और इसी के साथ रंगीले मनोरम सपनों से एक झटके में बाहर आ जाना पड़ा उसे.
बच्चों को विदा कर, साथी शिक्षक-शिक्षिकाओं से विदा ले कर रुना चल पड़ी अपने घर की ओर... अर्थात् नदी की ओर... मतलब यह कि घर पहुँचने के लिए उसे पहले नदी को पार करना पड़ेगा और फ़िर यही कोई पन्द्रह बीस मिनट चलने के बाद ही सीधे अपने घर पहुँचेगी.
नदी तट पर पहुँचने के साथ ही उसे नाव भी मिल गई.
नाव में ही उसे अपने घर के पास ही रहने वाली एक औरत मिल गई.. मीना.. मीना नाम है उसका. रुना के घर से दो घर आगे रहती है.
कई दिनों से एक ही रट लगाए रखी है की उसे भी कहीं छोटी मोटी सी नौकरी करनी है और स्कूल से बढ़िया जगह और कौन हो सकती है... इसलिए रुना के पीछे पड़ी रहती है हमेशा... ताकि वो अपने स्कूल में बात करके मीना के लिए कुछ कर दे.
नाव में दोनों साथ ही बैठी इधर उधर की बातें कर रही हैं...
नाव नदी के दूसरे तट के पास पहुँचने के बहुत पहले ही अचानक से धीरे हो गई और धीरे धीरे ही जिस रास्ते चल रही थी उससे परे हट गई.
इस बात पे रुना का ध्यान गया..
हालाँकि ऐसा वो अपने शादी हो कर यहाँ आने के बाद से ही ऐसा होता हुआ देख रही है पर कभी इस विषय पर बात नहीं कर पाई. जिस किसी से भी बात करना चाही; उसने या तो बात को जल्दी से रफ़ा दफ़ा कर दिया या फ़िर आधा अधूरा ही बताया.
रुना के मन में अचानक से एक बेचैनी सी होने लगी.
उसे ऐसा लगने लगा की आज उसे ये बात जानना ही होगा कि सच क्या है...? क्या बातें होती हैं नदी को लेकर...? लोग क्यों भयभीत होते हैं इस नदी के दक्षिण दिशा को लेकर?
वो इधर उधर देखी..
बगल में ही मीना एक पत्रिका पढ़ने में मग्न थी.
रुना को मीना से बढ़िया कोई और न सूझा जो इस विषय पर उससे बात करे.
कोहनी से ज़रा सा धक्का दे कर मीना से पूछी,
“ए.. क्या पढ़ रही है?”
“कुछ नहीं दीदी.. बस यह फ़िल्मी पत्रिका पढ़ रही हूँ... घर में बैठे बैठे बोर हो जाती हूँ न.. इसलिए आज घर से ये सोच कर ही निकली थी कि शहर वाले मार्किट से तीन – चार किताबें खरीदनी ही खरीदनी है... कुल पाँच खरीद ली.. ही ही...”
बोल कर शरारत से खिलखिला उठी मीना.
रुना भी बिना मुस्कराए न रह पाई.
मीना की यही एक बात उसे बहुत भाती है. शादी हुए कितने साल हो गए पर बचपना अब तक नहीं गया उसका. पता नहीं पति से चुदती समय क्या करती होगी..!!
‘चुदती’ शब्द मन में आते ही रुना शर्मा गई.
‘हाय... ये कैसे कैसे शब्द आ रहे हैं दिमाग में... छी...’ मन ही मन सोची.
“क्यों दीदी.. तुम्हें भी पढ़ना है क्या.. पढ़ना है तो बोलो... अभी एक देती हूँ.”
रुना को चुप देख मीना पूछी.
मीना के सवाल से रुना अपने विचारों से बाहर आई..
“नहीं मीना.. पढ़ना नहीं है.. कुछ पूछना है..”
“हाँ पूछो.”
“वादा कर मैं जो भी पूछूँगी वो तू ज़रूर बताओगी...?”
“बिल्कुल दीदी... बिल्कुल बताऊँगी... पक्का.. वादा..”
“और किसी को बताओगी नहीं कि मैंने तुमसे कभी कुछ पूछा और तुमने मुझे उसका जवाब दिया था... यहाँ तक की मेरे पति को भी नहीं.”
रुना के इस बात पे मीना सशंकित हो गई.
थोड़ा रुक कर सोची...
कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी उसकी नज़र नदी के दक्षिण दिशा की ओर चली गई..
और मानो उसे अपने आप ही जवाब मिल गया की रुना उससे क्या पूछना चाहती है...
उसने तुरंत ही अपना निर्णय सुना दिया,
“देखो दी, अगर और कुछ पूछना चाहती हो तो ठीक है.. पर अगर इस दक्षिण दिशा के बारे में कुछ पूछना है तो पहले ही बता देती हूँ की मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है.. माफ़ करो.
”
कह कर दूसरी तरफ़ थोड़ा सा घूम कर पत्रिका को दुबारा पढ़ने लगी.
रुना को मीना के इस तरह मना कर देने पर बुरा लगा. कुछ पल सोच कर उसने भी अपना निर्णय सुना दिया,
“ठीक है... मैं तुमसे कुछ पूछना और जानना चाहती थी इस भरोसे के साथ कि तुम ही एकमात्र मेरी वो करीबी हो जो सब खुल कर बताओगी.. पर नहीं.. तुमसे इतना सा भी नहीं हुआ.. कोई बात नहीं... तुम इतना छोटा सा काम नहीं कर सकती तो मैं भी भला स्कूल में तुम्हारी नौकरी की बात करने जैसी भारी काम कैसे कर पाऊँगी... ना बाबा.. माफ़ करो.”
कह कर रुना भी मुँह फूला कर दिखावटी गुस्सा करते हुए दूसरी तरफ़ घूम कर बैठ गई.
रुना के इस बात पे तो जैसे मीना को काठ मार गया.
‘हे भगवान... ये मैं क्या सुन रही हूँ... रुना दी मेरा काम नहीं कर देगी.. बस इतनी सी बात के लिए कि मैं उन्हें नदी के दक्षिण दिशा के बारे में बताने से मना कर दिया... उफ्फ्फ़... क्या करूँ.. वैसे बात तो सही है... ये पूछेंगी... और मैं बताऊँगी... छोटा सा ही तो काम है.. और वैसे भी दीदी कितनी हेल्पफूल है... मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए.’
ऐसा सोच कर मीना रुना की बायीं बाँह हल्के से पकड़ कर बोली,
“सॉरी दी.. दरअसल ये बात ही ऐसी है की बोलना तो छोड़ो... सोच कर ही जी घबराने लगता है.. तुम पूछो दी.. क्या क्या पूछना है?”
रुना पलट कर मीना को देखी...
मुस्कराई..
बोली,
“ज़्यादा कुछ नहीं.. बस, इस नदी और इसके दक्षिण दिशा को लेकर यहाँ के लोगों के मन में जो आतंक है.. उसके बारे में जानना है.”
मीना धीरे से बोली,
“ठीक है दी.. पर मेरी भी एक शर्त है...”
“क्या?”
“वादा करो की तुम किसी को भी नहीं बताओगी कि मैंने तुम्हें इस नदी और इसके दक्षिण दिशा के बारे में कुछ भी बताया है.”
“ठीक है.. वादा करती हूँ की कभी किसी को नहीं बताऊँगी... और वैसे भी, तू ही सोच.. किसी को ये बता कर मुझे किसी झमेले में फँसना है क्या?” रुना होंठों पर विजयी मुस्कान लिए बोली.
मीना एक गहरी साँस ले कर बोलना शुरू की,
“दीदी, बात है तो छोटी सी... पर है खतरनाक.. कई साल पुरानी बात है. तब हमारा ये गाँव था तो सही पर.. उस समय ये गाँव कम और जंगल का एक विशाल टापू सा लगता था. आज ही की तरह उस समय भी गाँव के लोग काफ़ी मिलनसार और एक दूसरे की मदद को हमेशा तैयार रहने वाले थे. पैसे वाले हो या गरीब, बहुत अच्छी सद्भावना थी लोगों में. बहुत ही अच्छा वातावरण हुआ करता था. इसी गाँव का एक लड़का इसी गाँव की ही एक लड़की के प्यार में पड़ गया. लड़की पैसे वाली थी... लड़का गरीब तो न था पर लड़की जैसा पैसा वाला भी नहीं था. खैर, इधर लड़की भी उसको चाहने लगी थी. दोनों अक्सर चोरी छिपे मिला करते थे. धीरे धीरे दोनों एक दूसरे के बहुत घनिष्ठ हो गए. बहुत करीबी हो गए एक दूसरे के. एक दिन गाँव वालों ने दोनों को रंगे हाथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ लिया.
पंचायत बैठी.
गाँव के वरिष्ठ और गणमान्य लोग भी थे सभा में.
लड़के और लड़की को बहुत खरी खोटी सुनाई गई.
दोनों को ही गाँव और उनके परिवारों के संस्कार आदि की घुट्टी पिलाई गई. चूँकि इस तरह की ये पहली घटना थी गाँव के इतिहास में; इसलिए इस बात पे की आज के बाद दोनों एक दूसरे से कभी नहीं मिलेंगे, एक दूसरे की शक्ल तक नहीं देखेंगे... दोनों को छोड़ दिया गया. साथ में ये भी घोषणा कर दी गई भरी सभा में की यदि भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति होती है तो चाहे वो कोई भी हो... उसे कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी. दया और माफ़ी की कोई गुंजाइश नहीं होगी.”
“फ़िर?” मीना को एक क्षण के लिए चुप होती देख रुना व्यग्रता से पूछ उठी.
“फ़िर काफ़ी दिनों तक दोनों ने एक दूसरे को देखा तक नहीं.. दोनों के आपस में मिलने, भेंट करने वाली जैसी कोई बात गाँव वालों के नज़रों में नहीं आई. धीरे धीरे गाँव वाले इस बात को भूल गए. उन्होंने यही सोचा होगा कि शायद दोनों सुधर गए होंगे. पर वास्तविकता कुछ और थी. वह लड़का उस लड़की से मिलता रह रहा था. कैसे... यह किसी को पता नहीं चला. एक दिन अचानक लड़की के घर में कोहराम मच गया. सुबह से लड़की घर से गायब थी... लड़की को अहले सुबह सबसे पहले उठ जाने की आदत थी. उस दिन जब काफ़ी देर बाद भी अपने कमरे से नहीं निकली तो उसकी माँ ने लड़की को जगाने के लिए उसके कमरे के दरवाज़े पर कई बार दस्तक दी थी... पर जब काफ़ी देर तक दस्तक और आवाज़ देने के बाद भी अंदर से कोई जवाब जब न आया तब उसकी माँ ने शोर मचाया. घर के मर्द जब दरवाज़ा तोड़ कर अंदर घुसे तब कमरे से लड़की नदारद थी.
बात फैलते देर नहीं लगी.
लड़की की खोज शुरू हो गई. उस लड़की से संबंधित हर उस स्थान को तलाशा गया जहाँ उसके होने की सम्भावना हो सकती थी. जब काफ़ी खोजबीन के बाद भी लड़की का पता न चला तब लड़की के घर वाले एवं गाँव वालों ने लड़के से पूछना ज़रूरी समझा. हालाँकि लड़की के गायब होते ही लड़के के घर में छापा पड़ चुका था... लड़का भी घर से गायब था. लड़की के माँ बाप से कड़ाई से पूछताछ करने पर पता चला था कि लड़का अहले सुबह ही पास के गाँव अपने दोस्त के यहाँ गया था... उसके साथ मिलकर फसलों की देख रेख करने.
गाँव वाले उस बगल वाले गाँव जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक हल्ला हुआ की कुछ ही देर पहले इसी गाँव के ही मंदिर में से लड़का लड़की को निकलते हुए देखा गया है. संभवतः दोनों ने शादी कर ली है.
शादी कर लेने वाली बात सुन कर लड़की के घर वाले गुस्से से तमतमा गए और गाँव वालों को साथ ले कर चल दिए मंदिर की ओर. पुजारी से तो कुछ खास पता न चल सका पर मंदिर से दस कदम दूर स्थित एक चाय दुकान के आदमी ने बताया की एक लड़का और लड़की को मंदिर की ही कच्ची सड़क से नीचे उतर कर दक्षिण की ओर जाते देखा था. लड़की दुल्हन के जोड़े में थी.
तुरंत ही उस जगह का पता लग गया जहाँ वे दोनों उपस्थित थे.
एक पुराना घर था. वर्षों से वहाँ किसी का आना जाना नहीं था.
सबने बाहर से देखा की उसी घर के एक कमरे में मद्धिम बत्ती जल रही है.. रोशनी बस इतनी सी ही थी की उस कमरे में मौजूद आदमी किसी तरह अपने आस पास देख सके. लड़की के घर वालों ने गाँव वालों को बाहर ही रहने का इशारा किया और खुद चुपचाप उस कमरे की ओर बढ़े.
दरवाज़े के पास पहुँच कर एक साथ मिलकर दरवाज़े पर ज़ोर लगाया और तोड़ दिया.. वर्षों पुराना बुरी तरह जर्ज़र हो चुका दरवाज़ा दो ही लात में टूट गया.
अंदर वाकई में वे ही दोनों उपस्थित थे.... और.... बेहद आपत्तिजनक अवस्था में थे...
दोनों को ऐसी हालत में देख कर लड़की के घर वालों का पारा चढ़ गया और वहीँ लड़के को पटक पटक कर पीटने लगे. लड़की विरोध करना चाही पर चाह कर भी कर न पाई. वो बेचारी खुद अपनी वर्तमान स्थिति के कारण शर्मसार थी. घर की महिलाओं ने भी उस लड़की को वहीँ जमकर खरी खोटी सुनाना शुरू कर दिया और साथ ही पाँच – छह हाथ भी जमा दिए. अब तक गाँव वाले भी वहाँ आ चुके थे और लड़की के घर वालों के साथ मिलकर उस लड़के को कूटने लगे. इस पूरे हो - हंगामे के बीच लड़की को किसी तरह से मौका मिला और मौके का फ़ायदा उठाते हुए टूटी हुई खिड़की से छलांग लगा कर भाग निकली. लड़की को अँधेरे में बाहर भागते देख घर वालों के होश उड़ गए और वो भी उस लड़की के पीछे चीखते चिल्लाते हुए भागने लगे. कुछ मिनटों के लिए सबका ध्यान लड़की की ओर गया और इसी बात का फ़ायदा उठा कर लड़का भी किसी तरह वहाँ से निकल भागा.
दोनों दो विपरीत दिशा में भाग रहे थे.
इसलिए कुछ गाँव वाले लड़की के घर वालों के साथ हो लिए और बाकी उस लड़के को पकड़ने उसके पीछे भागे.”
इतना कह कर मीना चुप हुई..
अपने हैण्ड बैग से पानी की बोतल निकाली और इधर उधर देखते हुए थोड़ा थोड़ा कर पीने लगी.
रुना से ज़रा सी देरी सही न गई और व्यग्रता से पूछने लगी,
“अरे आगे बोल न... आगे क्या हुआ..? दोनों पकड़े गए? पकड़ कर क्या किया गया उन दोनों के साथ?”
बोतल को वापस बैग में भरते हुए मीना बोली,
“नहीं दी, पकड़े नहीं गए... कहते हैं कि गाँव वालों के प्रचंड गुस्से से बुरी तरह डर कर अपने होशोहवास खो कर बेतहाशा इधर उधर भागता हुआ वह लड़का अपनी जान बचाने के लिए नदी में कूद गया... काफ़ी दूर तक हाथ पाँव मारते हुए तैरते हुए निकल गया... इधर गाँव वाले भी कुछ कम न थे.. जल्द से जल्द पास ही लगी कुछ नावों को लिया और उनपे सवार हो कर लड़के के पीछे लग गए. अपने को घिरता देख कर लड़का नदी के दक्षिण दिशा की ओर बढ़ गया. उन दिनों पिछले एक सप्ताह से काफ़ी बारिश हो रही थी. सावन का महीना हो या भारी वर्षा वाले दिन... इस नदी का दक्षिण दिशा हमेशा से ही कुछ अधिक ही गहरा हो जाता है.. ऐसा और कहीं होता है की नहीं ये पता नहीं दी, पर यहाँ... इस नदी में ऐसा ही होता आ रहा है न जाने कब से... लड़का दक्षिण दिशा में थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि गहराई ने उसे अपने में समेट लिया. लड़का चीखता चिल्लाता रहा... हाथ जोड़ता रहा...
गाँव वालों की ओर ... की उसे बचा ले... लेकिन गाँव वाले तो खुद ही दूर थे उससे... जब तक उस क्षेत्र विशेष तक पहुँचते... लड़का गहराई में समा गया था... हमेशा के लिए.”
“और लड़की का क्या हुआ?”
“उस दिन अँधेरे का लाभ उठा कर वह कहाँ चली गई थी किसी को पता नहीं चला था.. हालाँकि खोजना बदस्तूर जारी था... दो दिन बाद पास ही के एक जंगल में; एक पेड़ की ऊँची डाली पर से लड़की का शव बरामद हुआ था... फाँसी लगा ली थी... बेचारी... न घर की रही थी न घाट की...”
“ओह!”
पूरी कहानी को सुन कर रुना का मन उदास हो गया.
दोनों लड़के लड़की की मौत जिस प्रकार हुई... उसे जान कर रुना का मन रुआंसा हो गया...
उसके कान और कुछ सुनना नहीं चाहते थे.. पर मन जानता था कि अभी कुछ और जानना शेष रह गया है...
“पर.. दक्षिण दिशा से डरने का कारण क्या हुआ मीना... यही की वो लड़का उस दिन वहाँ डूब कर मर गया था...? इसलिए लोग उस तरफ़ से नहीं जाते की कहीं उनकी भी हालत उस लड़के जैसी न हो जाए.. अंधविश्वास?”
रुना के इस सवाल पर मीना ने उसे पैनी नज़रों से देखा... मानो समझ नहीं पाई की रुना केवल प्रश्न कर रही है या प्रश्न के आड़ में कटाक्ष...?
कुछ क्षण चुप रह कर बोली,
“नहीं दी.. अंधविश्वास नहीं.. वास्तविकता है.”
“क्या वास्तविकता है?”
“जिस दिन वो लड़का उस दिशा में उस विशेष जगह डूबा था.. उसके सप्ताह भर बाद से ही उस दिशा में उसी विशेष जगह और उसके आस पास निरंतर दुर्घटनाओं का एक सिलसिला शुरू हो गया... नावें डूबने लगीं... लोग मरने लगे... कई के शव मिलते तो कई के नहीं... उस हादसे वाले दिन के बाद अगले लगातार दो महीने में पचास से ज़्यादा लोगों की या तो मृत्यु हो गई... या फ़िर... गायब ही हो गए... जो गायब हो गए.. उनका कभी कुछ पता नहीं चला..”
नाव अब तक किनारे पर लग चुकी थी;
इसलिए अपनी बात को अधूरी छोड़ते हुए मीना उठ गई... मीना और रुना के साथ साथ नाव में जितने लोग सवार थे वे सब भी उतर गए.. वैसे कुछ खास नहीं थे.. उन दोनों और नाविक को मिला कर कुल सात जन थे नाव पर... चूँकि दोनों काफ़ी धीमे स्वर में बात कर रही थीं इसलिए और कोई उन दोनों के बीच हो रही बातों को सुन नहीं पाया..
घर की ओर चलते हुए रास्ते में मीना ने कहा,
“एक और बात है दी; नाव में चाहे एक ही महिला क्यों न हो... नाव उस दिशा से और भी अधिक दूरी बना कर अपने गन्तव्य की ओर जाते हैं... महिलाओं को विशेष रूप से उस दिशा से दूर रखा जाता है.”
रुना अचरज भरे स्वर में पूछी,
“ऐसा क्यों?”
“क्योंकि आज तक जितनी भी महिलाओं की उस दिशा में उस जगह में डूबने से मृत्यु हुई है... उनके शव तो अवश्य मिले हैं... पर जब डॉक्टरी जाँच की गई तो पता चला है कि उस महिला से जी भर कर दरिंदगी की गई है... जम कर शोषण किया गया है उसका... ऐसा समझो की बिना चबाए उस महिला के जिस्म को हर जगह से खा लिया गया है.”
भय से रुना का चेहरा फक पड़ गया...
धीरे से बोली,
“तुम्हारा मतलब...र...
रेप?”
“हाँ दी.”
मीना ने छोटा सा जवाब दिया.
फ़िर पूरे रास्ते चलते हुए दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे से कुछ नहीं कहा.
लेकिन इधर दोनों को ही पता नहीं था कि नदी से लेकर किनारे तक और फ़िर किनारे से लेकर उनके घर तक कोई उन्हें लगातार देख रहा था..!
४)
एक दिन सुबह उठते ही रुना को अपना शरीर भारी और हल्का; दोनों ही लगने लगा. ऐसा पहले कभी हुआ नहीं था उसके साथ. बिस्तर पर उठ बैठी. आँखें खोलना चाही पर नींद तो जैसे जम कर पलकों पर बैठ गई हो. फ़िर भी कोशिश करते करते किसी तरह आँख खोल पाई. संयोग ऐसा हुआ की आँख खोलते ही अपने बदन पर ही सबसे पहले उसकी नज़र गई.
और इसी के साथ बुरी तरह चौंक उठी वह.
सीने पर उसके तो ब्लाउज है ही नहीं..!
सिर्फ़ ब्रा में है और उसमें भी नब्बे प्रतिशत चूचियाँ ब्रा कप से ऊपर उठ कर बाहर की ओर झलक रही हैं... और ऐसा हो भी क्यों न... ब्रा तो खुद भी अधखुली सी है... एक स्ट्रेप कंधे पर से उतरी हुई है. साड़ी तो जैसे हो कर भी नहीं है बदन पर.. ज़रा सा हिस्सा ही कमर पर किसी तरह लिपटा हुआ है ...वो भी सिर्फ़ जांघों तक ही.!
आशंकित सी हो पलट कर बिस्तर पर अपने बगल में देखी.
पति पेट के बल लेटे मुँह दूसरी ओर किए अभी भी गहरी नींद में सो रहा है.
रुना जल्दी से पलंग से उतरी.. और कमरे में ही मौजूद अटैच्ड बाथरूम में घुस गई.
कपड़ों को ठीक करने के बाद ब्रश वगैरह की.
मुँह अच्छे से धोकर बाथरूम से निकलने के बाद रुना को अच्छा तो लग रहा था पर बदन अब भी टूट रहा था. आँखों पर इतना पानी देने, इतना धोने साफ़ करने के बाद भी नींद तो जैसे अंगद के पाँव की तरह आँखों पर जम गई थीं.. पति को ऑफिस के लिए देर न हो जाए ये सोच कर वो अपने वर्तमान शारीरिक अनुभूतियों को छोड़ नीचे उतर कर सीधे रसोई में घुसी.
कुछ देर में पति के लिए टिफ़िन तैयार कर के उन्हें जगाने ऊपर अपने कमरे में गई. सुबह का नाश्ता के साथ साथ अपने और अपने पति के लिए टिफ़िन जल्दी बन जाने के कारण रुना थोड़ा खुश थी. दो दिन हुआ बिट्टू अपने नाना नानी के पास (मामार बाड़ी) चला गया है. इसलिए चाहे नाश्ता हो, टिफ़िन हो या फ़िर दोपहर और रात का खाना; रुना को थोड़ा कम ही मेहनत करनी पड़ रही है पिछले दो दिन से.
कमरे में पहुँच कर पलंग पर अभी भी बेख्याली से सोये अपने पति को देख कर मुस्कराई.
पति को तीन चार बार आवाज़ दी ... उठने को बोली... पर पति ने कोई जवाब नहीं दिया.
अचरज हो जैसे ही पति के पास जा कर उन्हें हाथ लगा कर उठाने को हुई; अचानक से उसे अपना सिर फ़िर भारी सा लगने लगा. झुकी हुई स्थिति से तुरंत सीधी हो कर खड़ी हो गई. ध्यान दी, सिर सच में भारी हो गया है. नींद ठीक से न हो पाने को कारण मानते हुए वह तुरंत बाथरूम में घुसी और वॉशबेसिन का नल चला कर आँखों और मुँह पर ज़ोर ज़ोर से पानी लेने लगी.
पूरे दो मिनट तक वो जम कर अपने चेहरे, आँखों पर पानी लेती रही.
इस क्रम में उसकी साड़ी का ऊपरी हिस्सा और ब्लाउज भी बहुत भीग गए. करीब 70% तक ब्लाउज बुरी तरह भीग कर उसके बदन से चिपक गया. भीगे कपड़ों में खड़े रहने पर जैसा आभास होता है ठीक वैसा ही अब रुना को होने लगा.
नल बंद की..
वॉशबेसिन के ऊपर लगे आईने में खुद को देखने के लिए चेहरा ऊपर उठाई...
पलकों पर अभी भी बहुत पानी होने के कारण तुरंत आँख खोल कर देख नहीं पाई.
और जब आँखें खोल पाई, तब आईने में जो देखी... जो दिखा उसे... उसे बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ. कुछ क्षण अपलक देखती रही वो आईने में. कुछ पल आईने में देखते हुए उसे ऐसा लगने लगा मानो उसे बहुत नींद आ रही है... उसकी आँखें बंद होने लगीं... उसे उसी समय बिस्तर पर जा कर लेट जाने का मन करने लगा. उसकी धड़कने धीरे धीरे तेज़ होने लगी.
वॉशबेसिन के दोनों साइड को अपने हाथों से कस कर पकड़ कर खुद को खड़ा रखने की कोशिश करने लगी. आईने में जो कुछ दिखा उसे; उसे कन्फर्म करने के लिए दुबारा देखने की कोशिश की.. पर आँखें अब बंद हो आई थीं... जो उसके लाख चाहने के बावजूद खुलने को राज़ी नहीं हो रहे थे.
खुद को सम्भालने के लिए कुछ सोचती; कि तभी वो चिहुंक उठी...
और ऐसा करने को विवश किया दो मर्दाना हाथों ने जो उसके पेट को पीछे से दोनों साइड से सहलाते हुए अपने आगोश में ले लिया था. दो गर्म हथेलियों का स्पर्श अपने पेट की नर्म त्वचा पर पाते ही रुना पहले डर ज़रूर गई थी पर जल्द ही उसका सारा डर उन हाथों की कोमल सहलाहट ने दूर कर दिया.
उन दोनों हाथों ने नर्म और कोमल तरीके से रुना के पेट, नाभि और कमर का मसाज करना शुरू कर दिया. इतने प्यार से कि कुछ ही पलों में रुना ने खुद को, अपने सिर दर्द को, अपने टूटते बदन की पीड़ा को उन हाथों के स्पर्श से हो रही चमत्कारिक सुख के हवाले कर दिया. किसी के भी हाथों के स्पर्श से ऐसी सुख की कभी आशा नहीं की थी रुना ने.
अब तक आँचल भी सीने पर ढीला हो कर कंधे से सरक कर बाएँ हाथ पर किसी तरह फँस कर रह गया था.
पर रुना को तो अब इसकी भी सुध नहीं थी...
उसे तो ये तक पता नहीं चला कि उन हाथों ने उसकी साड़ी को पेटीकोट सहित कमर व नाभि से नीचे.... बहुत नीचे कर दिया था. मतलब इतना नीचे कि शायद अगली एक और कोशिश में रुना की गांड की दरार और सामने से झांटें दिख जाए.
कुछ देर बड़े प्यार से चर्बीयुक्त कमर को मसलने के बाद वे हाथ धीरे धीरे ऊपर उठने लगे... बिल्कुल मेरुदंड की सीध में... उठते उठते ब्लाउज के बॉर्डर के पास जा रुके... फ़िर उस पूरे जगह को दोनों अँगूठों की मदद से थोड़े दबाव से मसाज किया जाने लगा.
रुना की सांसे गहरी और लंबी होने लगी.
इधर दोनों हाथ अब ब्लाउज के बॉर्डर को थोड़ा ऊपर कर अंदर घुस चुके थे... एक साथ दोनों हाथों को न संभाल पाने के कारण पीठ के तरफ़ से ही ब्लाउज का सिलाई दो साइड से खुल गया जिससे अब तक बदन पर फ़िट बैठता ब्लाउज अब अपेक्षाकृत ढीला हो गया.
दोनों हाथ अब बहुत सरलता से ब्लाउज के अंदर रहते हुए पूरे मांसल पीठ पर घूमने लगे.
भरे पीठ को अच्छे से मसलते हुए वे दोनों हाथ बहुत बेहतरीन मसाज दे रहे थे.
मदहोशी में होने के बावजूद कुछ अटपटा सा ज़रूर लग रहा था रुना को पर वो इस मसाज वाले शारीरिक सुख को अभी तुरंत न तो रोक सकती है और ना ही रोकना चाहती है. जिस तरह इन हाथों ने उसके चर्बीयुक्त कमर, पेट और यहाँ तक की नाभि को रगड़ रगड़ कर आराम दिया है; ऐसा आराम वो अपने पूरे बदन पर पाने को इच्छुक हो गई. उसका रोम रोम इस मर्दाना छुअन से पुलकित हुआ जा रहा था. मन के किसी कोने में एक तमन्ना ऐसी जगने लगी थी कि काश ये हाथ अब उसके स्तनों पर जाए और जिस प्रकार अभी तक उसके शरीर के दूसरे अंगों को आराम मिला ठीक वैसा ही आराम ये हाथ उसके स्तनों का बेरहमी से मर्दन कर के दे.
अचानक उसे लगा जैसे पीठ पर पड़ने वाला दबाव कम हो गया... कम ही नहीं बल्कि दबाव एकदम से ही हट गया. पर.. पर... दोनों हाथ तो अब भी वहीँ हैं... उसके पीठ पर ... उसके भरी हुई पीठ का आनंद लेते हुए उसे आनंद देने का काम करते... तो फ़िर..?
क्षण भर बाद ही उसे उसका उत्तर मिल गया... और ऐसा होते ही स्त्री सुलभ एक मोहक लाज उसके सुंदर मुखरे पर बिखर गई.
उन दो हथेलियों के अलावा जो चीज़ रुना के पीठ पर दबाव बना रहा था और जो अभी अभी एकदम से हट गया; वो था उसकी ब्रा की हुक. उन हथेलियों की करामाती अँगुलियों ने बड़े ही सरलता से उसके हुक को खोल दिए जिसका पता खुद रुना को कम से कम दो तीन मिनट बाद लगा.
अब तो वे हथेलियाँ और भी स्वतंत्र रूप से पूरे पीठ का भ्रमण करने लगे... जहाँ मन करे वहीँ रम जाए ... और फ़िर बड़े अच्छे तरीके से बिना तेल के ही मर्दन करने लग जाए.
काम पीड़ित होती जा रही रुना उन हथेलियों का स्पर्श अपने यौनक्षुद्रात स्तनों पर पाने की कामना में इतनी ही विभोर हो गई थी कि उसे अपने बदन के दूसरी जगह पर होते छेड़छाड़ का रत्ती भर भी पता न चला. पता ही कब और कैसे उसकी साड़ी पेटीकोट सहित उसके भरे गोल पिछवाड़े पर से और नीचे सरक गई थी और अब तो किसी प्रकार इस तरह ऊपरी जांघों के इर्द – गिर्द इस तरह लिपटी – अटकी हुई थी की अब गिरे तो तब गिरे!
और अब एक और मर्दाना अंग अपने काम पर लग चुका था.
जोकि बड़े प्रेम और समर्पित भाव से रुना के गांड के दरार पर ऊपर नीचे हो रहा था. एक बार ऊपर से नीचे आता.. फ़िर नीचे से ऊपर.... फ़िर ऊपर से नीचे... पर अब की बार बीच में ही रुक कर कुछेक क्षणों के लिए दरार पर हल्का दबाव डालता... और फ़िर नीचे जाता... और फ़िर वही काम शुरू से शुरू होता.
ऐसी लगातार हरकतों ने रुना को गर्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
चरम यौनेतेज्जना में ‘म्मम्म....आह्ह्ह..’ करने लगी..
उस गर्म अंग का यूँ बार बार ऊपर नीचे हो कर उसकी तृष्णा को बढ़ा कर छोड़ देना; ये उससे सहन नहीं हो रहा था.
वो उस अंग को जल्द से जल्द अपने में समाहित करना चाहती थी. इसलिए धीरे धीरे अपनी गांड को पीछे करने लगी... उसके ऐसा करने के बावजूद वह अंग अपने पूर्व की हरकत से तनिक भी नहीं डिगा और पहले की तरह ही दरार पर ऊपर नीचे होता रहा.
रुना के बर्दाश्त के बाहर होने लगा ये सब अब. उसके अतृप्त मन ने ठान लिया की अब चाहे जो हो, जैसे भी हो, जितना भी हो.. वो उस गर्म फड़कते अंग को अपने अंदर ले कर रहेगी. ये सोचने के साथ ही उसने अपनी गांड को आगे पीछे करना शुरू किया. तीन से चार बार ऐसा की ही थी कि कानों से एक आवाज़ टकराई,
“रुना....ओ रुना...”
पर उसने ध्यान नहीं दिया... वो तो बस अपने अतृप्त मन की अधीन हो अपने जिस्म के एक एक रोएँ को आराम... सुख देना चाहती थी.
आवाज़ फ़िर गूँजी..
और साथ ही किसी ने उसके बाँह को पकड़ कर झकझोड़ा,
“अरे रुना... उठो... क्या कर रही हो??”
रुना अचानक से हड़बड़ा कर उठी,
और इसी के साथ वर्तमान स्थिति को देख कर हतप्रभ रह गई...
सीने पर आँचल अनुपस्थित है.. ब्लाउज के सारे बटन खुले हुए हैं... ब्रा भी गैर हाजिर... पेटीकोट कमर तक उठा हुआ और खुद उसका हाथ... बायीं हाथ की मध्यमा और अनामिका ऊँगली उसकी चूत में अंदर तक प्रविष्ट हैं जो खुद भी गीली है!
रुना अविश्वास से अपने आस पास देखी...
बगल में ही उसके पति श्री नबीन मुख़र्जी, अर्थात् “नबीन बाबू” बड़े आश्चर्य से आँखें फाड़े उसे देख रहे थे...
बोले,
“रुना.. ये क्या कर रही हो... सुबह सुबह ही... छी: ... कोई और समय होता तो और बात होती... क्या हुआ है तुम्हें..?”
सेक्स को लेकर नबीन बाबू आज भी उतने ही अपरिचित हैं जितना की सत्रह साल पहले अपने शादी के समय थे.. सफलता बस इतनी ही रही की किसी तरह अपने खड़े अंग को किसी तरह रुना के ताज़ी योनि में डाल पाए और समय समय पर थोड़ा बहुत कर के एक संतानोपत्ति कर पाए.
ऐसा नहीं की सेक्स के मामले में एकदम भोंदू हैं नबीन बाबू... फ़िर भी सेक्स किसी रॉकेट साइंस की ही तरह रहा है हमेशा से उनके लिए.
“ज..जी... वो....म”
“चलो चलो... जल्दी उठो... मुझे देर हो रही है.. आठ बजने को आया है.”
“आप नहा लिए?”
“हाँ.”
“ओह.. ठीक है. नाश्ता टेबल पर है. खा लीजिए.” खुद को सम्भालते हुए बोली रुना.
नबीन बाबू कुछ बोले नहीं.. आश्चर्य से देखते रहे रुना को.
रुना को अजीब लगा.. बोली,
“क्या हुआ... क्या देख रहे हैं?”
“देख रहा हूँ की ये तुम क्या अनाप शनाप बक रही हो... तुम सुबह से एक बार भी उठी ही कब थी? मैंने तुम्हें उठाया... अभी... जब उठी ही नहीं तब नाश्ता कैसे बना ली?”
“ओह्हो... मैं बना चुकी हूँ... टेबल पर है... चलिए .. दिखाती हूँ.”
रुना नबीन को लेकर नीचे वाले कमरे में आई...
“देखिए... टेबल प...”
डाइनिंग टेबल की ओर इशारा करते करते रुना के हाथ और होंठ थम गए.
टेबल पर कुछ नहीं था!
रुना आश्चर्य से दोहरी हो गई.
उसे अपने सामने खाली टेबल को देख कर खुद पे विश्वास नहीं हो रहा था.
कहाँ गया सारा नाश्ता...??
कुछ देर पहले ही तो रखी थी....
नबीन बाबू कुछ बोले नहीं.. काम के प्रेशर का नतीजा बता कर उसे स्कूल से छुट्टी लेकर आज घर पर ही रहने को कहा.
नबीन का बिना कुछ खाए ही ऑफिस के लिए निकल जाते देख रुना को बहुत दुःख हुआ.
पर दुखी होने से भी ज़्यादा अपने साथ सुबह से हो रही घटनाओं को लेकर परेशान हो रही थी.
बिस्तर पर लेटी हुई पूरे घटनाक्रम के बारे में सोच ही रही थी कि मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई.
साथ ही एक आवाज़ भी आई,
“मैडम जी, दूध ले लीजिए...”
इच्छा तो नहीं थी उठने की... फ़िर भी उठी....
रसोई में गई, बर्तन ली और जा कर दरवाज़ा खोल कर बर्तन आगे बढ़ा दी.
“नमस्ते मैडम जी.”
“हम्म.. नमस्ते.”
अनमने भाव से रुना प्रत्युत्तर देते हुए देबू की ओर देखी.. और एक बार फ़िर बुरी तरह चौंक उठी,
“अरे...ये क्या.... ये तो बिल्कुल सुबह जैसे.... उफ़..!!”
५)
एक दिन तुपी काका के घर के सामने बहुत भीड़ लग गई. ऐसी भीड़ की लगे मानो सारा गाँव उठ कर तुपी काका के घर आ गया हो. जवान हो, या बच्चा या बूढ़ा या फ़िर महिलाएँ... सबके मुँह में केवल यही बातें हो रही हैं कि ‘हाय राम.. ये कैसे हो गया?’, ‘न जाने बूढ़े माँ बाप का क्या होगा?’, ‘अभी तो जवान हो ही रहा था.. इतनी जल्दी... न जाने कैसे हो गया....?’ इत्यादि.
तभी ‘जगह दीजिए...’ ‘आगे जाने दीजिए.’ ‘हटिए हटिए’ ‘साइड होइए’ कहते हुए सात पुलिसियों वाला एक दल उस ठसाठस भीड़ में से खुद के लिए जगह बनाते हुए काका के घर के मुख्य दरवाज़े तक पहुंची.
दल को लीड करने वाला एक मोटा तोंदू सा पुलिस वाला आगे बढ़ा और घर के ही एक सदस्य से पूछा,
“घटना कहाँ घटी है...? तुपी काका कौन हैं?”
उस सदस्य के मुँह से बोली नहीं फूट रही थी. चेहरे पर ऐसी हवाईयाँ उड़ रही थी मानो कुछ ऐसा देखा है उसने जो इस जीवन में कभी देखने या सुनने की उम्मीद बिल्कुल नहीं की होगी.. कभी नहीं की होगी.
काँपते हाथ से घर के एक तरफ़ इशारा किया उसने.
उस पुलिस वाले ने आँखों से इशारा कर के उसे आगे चलने को कहा. वो जाना बिल्कुल नहीं चाह रहा था पर पुलिस वाले की रोब झलकाती आँखों को देख कर और भी डर गया. मान गया.
चुपचाप आगे आगे चलने लगा.
चार सिपाहियों को वहाँ भीड़ संभालने की जिम्मेदारी दे कर वह तोंदू पुलिस वाला अपने साथ दो पुलिस वाले को लेकर उस सदस्य के पीछे पीछे चलने लगा.
कच्चे मार्ग से आगे बढ़ कर दाएँ मुड़ना पड़ा और फ़िर दस कदम चलने के बाद एक छोटा सा खटाल/गोशाला में पहुंचे सब. यहाँ तीन गाय और दो भैंसे बंधी हैं.. साफ़ सुथरा ही है सब.
“ये किसका है?” उस मोटे पुलिसिये ने पूछा.
“तुपी जी का ही है.” उस सदस्य ने कहा.
“आप कौन लगते हैं उनके??”
“जी, मैं उनका भांजा हूँ. चार दिनों के लिए घूमने आया था.”
“ह्म्म्म... तो आज कितने दिन हुए?”
“जी दो ही दिन हुए.”
“तुपी जी कहाँ हैं?”
“सुबह जब से वह भयावह काण्ड देखा है...
मानो सुध बुध ही खो चुके हैं. वहीं उसी जगह बैठे हुए हैं.”
“ले चलिए हमें वहाँ.”
आदेश दिया पुलिसिए ने.
तुरन्त पालन हुआ आदेश का.
उन सब को ले कर थोड़ा और आगे बढ़ा वो युवक. खटाल से सटा हुआ एक छोटे से कमरे के पास पहुँचा.
उस कमरे के पास पहुँचने पर सबने देखा की आस पास फर्श पर खून ही खून है जो कि अंदर कमरे से बह कर बाहर निकल रही है. सभी तुरन्त अंदर घुसे... और घुस कर अंदर का जो दृश्य देखा उससे तो सबका दिमाग ही घूम गया. दिल दहल गया. उल्टी होने को आई. सामने जो दृश्य था ऐसा कभी कुछ उन लोगों को जीवन में कभी देखना भी होगा ये अपने सबसे बुरे सपने में भी नहीं सोचा था किसी ने.
सामने फर्श पर पाँच कदम आगे एक नवयुवक का शव पड़ा हुआ था. शरीर तो सामने की ओर था पर सिर पूरी तरह पीछे घूमा हुआ था. साथ ही पूरे शरीर में जगह जगह से माँस नोचा हुआ था. सबसे भयावह था उस शरीर का सीने वाला हिस्सा जहाँ बहुत बड़ा सा गड्ढा बना हुआ था...
वो मोटा पुलिस वाला आगे बढ़ कर शव को तनिक ध्यान से देखने पर पाया कि सीने से तो दिल ही गायब है!
“हे भगवान! इतनी क्रूरता!”
बरबस ही निकला उसके मुँह से.
बगल में ही, शव से चार हाथ दूर फर्श पर ही एक प्रौढ़ आदमी बैठा हुआ था. अत्यंत उदास... बदहवास... आँखों से अविरल आँसू बहाता हुआ.
उस आदमी की हालत देख कर मोटा पुलिसिया को भी थोड़ा बुरा लगा पर क्या करे... पुलिस जो ठहरा... ये समय संवेदना जताने से अधिक ड्यूटी बजाने का है.
गला खंखार कर उस आदमी से पूछा,
“सुनिए...आप ही तुपी काका हैं क्या?”
वह आदमी कुछ बोला नहीं.. अभी भी कहीं खोया हुआ अपलक उस शव को निहारे जा रहा था. उसे तो शायद इस बात का भी भान न हुआ होगा कि कोई उस कमरे में घुस कर उनके सामने खड़ा भी हुआ है.
पुलिस वाला साथ आए युवक को इशारे से पास बुलाया और धीमे स्वर में पूछा,
“तुपी काका यही हैं न?”
युवक पूरे आत्मविश्वास के साथ सिर हिलाता हुआ बोला,
“हाँ साहब.”
“ह्म्म्म... और ये मृत युवक कौन है? क्या लगता है इनका?”
“ये इस घर में काम करता था. नौकर जैसा ही था पर चूँकि बहुत ही कम उम्र से ही इस घर में रहता आ रहा था इसलिए घर के सदस्य जैसा ही हो गया था. यहाँ तक कि तुपी काका और सीमा काकी ने भी सभी को कह दिया था कि कोई इसे नौकर न समझे और हमेशा अच्छे से नाम ले कर ही बुलाया करे.”
“नाम क्या है इसका?”
“नाम तो कुछ और था... पर सीमा काकी प्यार से मिथुन कह कर बुलाती थी... धीरे धीरे घर में सभी और गाँव वाले भी इसे मिथुन नाम से ही बुलाने लगे थे.”
उस युवक का वाक्य खत्म होते ही तपाक से पुलिस वाले ने पूछा,
“ये सीमा काकी कौन हैं?”
“इनकी (तुपी काका की ओर इशारा करते हुए) पत्नी है साहब.”
“हम्म.. और तुम्हारा नाम?”
“गोबिन्दो दास, साहब... घर और बाहर सब प्यार से बिल्टू कह कर बुलाते हैं.”
“बिल्टू... हम्म.. अच्छा नाम है.. मैं भी इसी नाम से बुलाऊँगा तुझे..
कोई दिक्कत?”
खैनी और गुटखा से पीले पड़ चुके दांतों को एक बड़ी सी मुस्कान से दिखाते हुए चापलूसी वाले अंदाज़ में हाथ जोड़ते हुए बिल्टू बोला,
“आप माई बाप हो सरकार... जो जी में आए...कह सकते हैं.”
पुलिस वाला पैनी नज़रों से एकबार उस युवक की आँखों में अच्छे से देखा; फ़िर तुपी काका की ओर इशारा करते हुए धीमे पर गंभीर आवाज़ में बोला,
“इन्हें पानी दो... सम्भालो.”
युवक जल्दी से एक बड़े से ग्लास में पानी ले आया और हथेली में थोड़ा पानी ले तुपी काका के चेहरे पर छींट दिया.
वास्तविकता में लौटने में एक-दो मिनट और लग गए तुपी काका को.
सामने पुलिस वाला को अचानक से देख सहम गए. प्रश्नसूचक नेत्रों से बिल्टू की ओर देखा. बिल्टू ने शव की ओर इशारा कर के पुलिस के आने का आशय समझा दिया काका को.
तुपी काका उठे और हाथ जोड़ कर पुलिस वाले के सामने जा कर खड़े हो गए.
“तुपी काका आप ही हैं न?” उत्तर जानते हुए भी पुलिस वाले ने पूछा.
काका ने सिर हिलाते हुए जवाब दिया,
“जी मालिक.”
“आपका पूरा नाम...बढ़िया नाम?”
“तपन सुनील पाल, मालिक.”
“हम्म.. पिताजी का नाम सुनील पाल?”
“जी मालिक.”
“हैं?”
“नहीं मालिक... चार साल हो गए उनके गुज़रे हुए.”
“ओह.. सॉरी.”
एक पल चुप रह कर पुलिसिए ने फ़िर कहा,
“मेरा नाम बिशम्बर रॉय है. इंस्पेक्टर बिशम्बर रॉय. थाना इंचार्ज.”
प्रत्युत्तर में तुपी काका ने केवल हाथ जोड़ कर अभिवादन जताया.
“ये युवक आपका कौन था?”
“बेटा था मालिक.” कहते हुए तुपी काका फफक पड़े.
“जी?!”
इंस्पेक्टर चौंक कर उछल पड़े.
“मतलब मालिक... कम उम्र से ही मेरे यहाँ काम कर रहा है न मालिक... इसलिए घर का सदस्य और मेरे बेटे जैसा हो गया था. बहुत अच्छा लड़का था... कर्मठ, आज्ञाकारी, विनोदी....”
और भी बहुत कुछ कहना चाह रहे थे तुपी काका... पर गला भर आया था उनका... फ़िर से रोने लगे.
इंस्पेक्टर रॉय से भी तुपी काका की हालत देखी नहीं जा रही थी. उन्होंने बगल में खड़े हवलदार को बुलाया.. आगे की पूछताछ और कुछेक कार्यवाही का निर्देश दिया और वहाँ से निकल गए.
जा कर भीड़ हटाते हुए अपनी जीप में बैठ गए.
सीट पर ही रखा पानी का बोतल उठा कर पीने लगे.
पानी पीते पीते ही उनकी नज़र गई तुपी काका के घर के दूसरी मंजिल की खिड़की पर.
खिड़की से लगे पर्दे के ओट से एक महिला नीचे भीड़ को देख रही थी. महिला गुमसुम सी थी... बहुत उदास... इंस्पेक्टर समझ गए की हो न हो यही सीमा जी हैं... तुपी काका की धर्मपत्नी.
इंस्पेक्टर रॉय को कुछ अलग लगा सीमा में. उसके चेहरे में, चेहरे के कसावट में, बालों में....
इंस्पेक्टर ने गौर किया... सीमा जी की नज़रें उस भीड़ पर एकदम स्थिर है... लगातार एक ही ओर देखे जा रही है... कदाचित उस भीड़ में से किसी एक ही व्यक्ति को देख रही है... इंस्पेक्टर ने उस ओर देखने का प्रयास किया.
भीड़ में सबकुछ स्पष्ट तो नहीं था पर इतना ज़रूर दिख गया की सीमा जी जिसे लगातार अपलक देखे जा रही है वो एक महिला है.
इंस्पेक्टर के दिमाग ने शक उपजाऊ प्रश्न करना शुरू कर दिया,
‘सीमा जी उस महिला को ऐसे क्यों देख रही हैं? क्या सीमा जी कुछ जानती हैं इस हत्या के बारे में? जिसे वो देख रही हैं क्या उस महिला का इस हत्या से कोई सम्बन्ध है?’
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थाने में,
टेबल पर गरमागर्म चाय रखा हुआ है पर इंस्पेक्टर रॉय दोनों हाथों को सिर के पीछे रख आँखें बंद किए किसी गहन सोच में डूबा हुआ है. तभी हवलदार वहाँ आया और सलाम कर के खड़ा हो गया.
इंस्पेक्टर रॉय ने आँख खोला, सामने हवलदार को देख कर मुस्कराया और कुर्सी पर ठीक से बैठते हुए पूछा,
“और... क्या ख़बर लाए हो?”
“ख़बर तो है सर, पर बहुत अटपटी सी.”
“क्या अटपटी है.. ज़रा हम भी तो सुने.”
“सर, आपके आ जाने के बाद मैंने और दूसरे सिपाहियों ने घटना से संबंधित पूछताछ की ग्रामीणों से... अधिकतर तो कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं थे... पर कुछेक ऐसे भी मिले जिनसे जो कुछ जानने को मिला.. उस पे विश्वास कर पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा है.”
“हुंम.”
“सर, एक ग्रामीण का कहना था कि वैसे तो मिथुन अर्थात् मृत युवक का गाँव के सभी लोगों के साथ उठाना बैठना था और काफ़ी व्यवहार कुशल भी था... पर सप्ताह – दस दिन से बहुत गुमसुम चुपचाप सा रहने लगा था. पहले किसी को देखते ही बोल पड़ता था पर कुछ दिनों से ऐसा हो गया था कि कुछ पूछने पर ही जवाब देता था... कड़े मेहनत से कड़ा हुआ उसका शरीर पिछले दिनों से काफ़ी सूख सा गया था. चेहरा निस्तेज हो गया था.”
“ओह.. ये बात थोड़ा अलग तो है... पर अजीब तो नहीं.”
“एक अजीब बात तुपी काका ने बताया सर.”
“तुपी काका ने? कैसे है वो अभी...??”
“आपके जाने के पन्द्रह बीस मिनट बाद तक रोते रहे वो... धीरे धीरे शांत हुए... शांत होने के बाद ही उन्होंने बताया की पिछले कुछ समय से मिथुन प्रायः अपने आप से ही बातें करता रहता और पहले की तुलना में थोड़ा आलसी भी हो गया था. लगातार तीन रात उन्होंने मिथुन को मध्यरात्रि में आँगन में चहलकदमी करता और बात करता हुआ देखा था... देख कर लग रहा था कि अपने आप से बातें नहीं कर वो मानो किसी और के साथ बातें कर रहा था. हँस रहा था.. मुस्करा रहा था.”
“हुमम्म... ये बातें तो कुछ और ही इशारा कर रही हैं... मैं तो सोच रहा था की कोई षड्यंत्रकारी होगा... हत्यारा होगा... हत्या का कोई मोटिव होगा... पर यहाँ तो... कुछ और ही खिचड़ी पक रही है.”
“जी सर.”
“अच्छा श्याम... वो लड़का.. क्या नाम...”
“मिथुन.”
“हाँ.. मिथुन!.. वो दिमागी तौर पर कैसा था?”
“ठीक था सर. कोई बीमारी नहीं.”
“और तुपी काका ने कुछ देखा था क्या... उस रात... जब मिथुन आँगन में किसी से बातें कर रहा था..? कोई था वहाँ?”
“नहीं सर ... कोई नहीं था.. मिथुन अकेला था... मैंने बहुत अच्छे से पूछा है तुपी काका से.
”
“तुम तो उसी गाँव से हो न?”
“यस सर.”
“तब तो तुपी काका को बहुत पहले से और शायद अच्छे से जानते होगे?”
“यस सर.”
“उनके बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?”
“अच्छे इंसान हैं... गाय और भैंस पालते हैं. उन्हीं के दूध बेच कर उनका गुज़ारा चलता है. पुश्तैनी धंधा है. बाप दादा परदादा.. सब यही व्यापार करते आए हैं. दूध बेचने में कभी कोई घपला घोटाला नहीं हुआ है उनकी तरफ़ से. बाप सुनील पाल भी बहुत अच्छे थे. इतना दूध बेचते आए हैं कि दूध बेच कर जमा किए पैसो से एक बहुत अच्छा दो मंजिला घर बना लिया तुपी काका ने.”
“ओह... ओके.”
इंस्पेक्टर थोड़ा चिंतित स्वर में बोला.
ऐसी भयावह हत्या का दृश्य बार बार उनके आँखों के सामने तैर रहा था.
हवलदार इंस्पेक्टर को चिंतित देख कर बोला,
“क्या बात है सर... परेशान लग रहे हैं?”
“हाँ... एक बात समझ में नहीं आ रही... वहाँ से आने से पहले मैंने दूसरी मंजिल की खिड़की पे एक महिला को देखा था.. सीमा जी ही होंगी... वो वहाँ चुपचाप खड़ी नीचे घर के सामने जमा भीड़ की ओर देख रही थी. पता नहीं मुझे बार बार उनका चेहरा, रंगत आदि सब अलग सा क्यों लग रहा था?”
हवलदार दो पल चुप रहा... फ़िर बोला,
“सर, अलग लग सकती है... क्योंकि उनकी आयु बहुत कम है. करीब १२ साल छोटी हैं तुपी काका से. दरअसल काका शादी करने के खिलाफ़ थे.. आजीवन अकेले रहना चाहते थे और अपने वृद्ध हो चले माँ बाप की सेवा करना चाहते थे.. सब ठीकठाक चल रहा था. एक दिन अचानक उनकी माँ को दिल का दौरा पड़ा और गुज़र गईं. तब उनके पिताजी ने ही ज़िद कर के उनकी शादी करवाई कि माँ तो बहु नहीं देख पाई.. कम से कम वो मतलब पिताजी ही देख ले. साथ ही, वृद्धावस्था में कोई साथी हो होगा पास में. तुपी काका की जो उम्र हो रही थी उस वक़्त उतनी उम्र की दुल्हन मिलना बड़ा दुष्कर कार्य था. तब बहुत खोजने पर एक गरीब परिवार की लड़की मिली. सीमा. उसी के साथ काका की शादी हो गई.”
“ओह.. ये बात है. बच्चे हैं इनके?”
“पता नहीं सर. मैंने उतना खोज ख़बर लिया नहीं. पर जहाँ तक लगता है.... शायद नहीं है.”
“ह्म्म्म.. अच्छा ठीक है.. तुम जाओ अभी.”
“जी सर.”
सलाम ठोक कर हवलदार श्याम वहाँ से चला गया और इधर इंस्पेक्टर रॉय फ़िर किसी सोच में डूब गया.
६)
संध्या समय...
छ: बज रहे होंगे.
रुना और नबीन गाँव में ही एक परिचित के यहाँ से लौट रहे थे...
एक चाय दुकान में कालू, देबू और शुभो चाय पीते हुए आपस में हंसी मजाक कर रहे थे. तभी रुना और नबीन उस दुकान के सामने से गुज़रे और साथ ही साथ चाय पीते तीनों दोस्तों की नजर भी उन दोनों पर गई.
कालू तुरन्त खड़ा हो गया और सधे कदमों से उन दोनों की ओर बढ़ कर हाथ जोड़ कर ‘नमस्ते’ किया...
नबीन और रुना ने भी मुस्करा कर नमस्ते का उत्तर दिया. कालू को कुछ कहने जा रही थी रुना की तभी उसकी नज़र गई देबू पर. उसे वहाँ देख कर रुना डर से सहम कर चुप हो गई.
उसकी ये प्रतिक्रिया नबीन और कालू; दोनों ने नहीं देखा.
नबीन और कालू में कोई और ही बातें शुरू हो चुकी थीं.
नबीन हँसते हुए बोले,
“अरे कालू! कैसे हो?”
“बढ़िया हूँ भैया... आप कैसे हैं... और भाभीजी?”
“अच्छे हैं..” “बढ़िया हैं.” नबीन और रुना ने एक साथ जवाब दिया.
“आपसे एक बात पूछनी है भैया.”
“हाँ कालू .. बोलो.”
“आप तो पोस्ट ऑफिस में काम करते हैं न?”
“हाँ.”
“मुझे एक टी. डी. करवानी है.”
“टी. डी. ?? किसके लिए?”
“जी, अपने लिए ही... नॉमिनेशन के लिए मम्मी का नाम दे दूँगा.”
“एक बात बोलूँ ... कालू?”
“जी भैया.. बिल्कुल.”
“तुम टी. डी. करवाने से बेहतर, आर. डी खोलवा लो.”
“क्यों भैया...??”
“अम्म्म... देखो... ये सब थोड़ा विस्तार से बताना पड़ता है. एक काम करो... तुम कल मिलना मुझसे... यहीं... चाय पीते हुए हम आगे की बात करेंगे. ठीक है?”
“ठीक है भैया. मुझे कोई दिक्कत नहीं.”
“ठीक है.. आज चलता हूँ.”
एक बार फ़िर हाथ जोड़ कर दोनों को नमस्ते कर के कालू वापस दुकान में आ गया और एक चाय का ऑर्डर दे कर बेंच पर अच्छे से बैठ गया.
शुभो हँसते हुए बोला,
“क्यों बे... अचानक ये टी. डी. खोलवाने की क्या ज़रुरत आन पड़ी है तुझे?”
“अबे नहीं बे... कोई टी. डी. वी. डी. नहीं खोलवाना मुझे.”
“तो फ़िर?”
“भाभी को देखने गया था.”
“क्या? रुना भाभी को..?? साले... तूने पहले कभी बताया नहीं कि रुना भाभी पर तेरा दिल आ गया है?” शुभो मज़े लेता हुआ बोला.
लेकिन कालू सीरियस था,
बोला,
“यार... जो तू समझ रहा है... वो बात नहीं है... बिल्कुल नहीं है.”
“तो असल बात ही समझा ना साले.” देबू ने चिढ़ते हुए कहा.
“यार... मिथुन के साथ हुए हादसे की ख़बर है न तुझे?”
“हाँ भाई.. बिल्कुल है.. हमारा गाँव है ही कितना बड़ा जो ऐसी बातों की ख़बर देर से हो या बिल्कुल ही न हो.”
“लेकिन ऐसी एक बात है जो बहुत ही अजीब है और वो सिर्फ़ मुझे पता है.. तुम लोगो को नहीं... किसी को नहीं.”
“भाई...क्या सस्पेंस पे सस्पेंस दे रहा है... सीधे असल बात बता ना.” शुभो ने कहा.
“मिथुन के मृत्यु वाले दिन से कुछ रोज़ पहले तक मैंने खुद अपनी इन्हीं आँखों से रुना भाभी और मिथुन को एक साथ देखा था. कई बार.”
“क्या बात कर रहा है बे?” देबू और शुभो दोनों चौंक उठे.
“सच कह रहा हूँ.”
देबू कुछ सोचते हुए बोला,
“एक मिनट यार... तुमने रुना भाभी को मिथुन के साथ देखा.. शायद किसी काम से कहीं जाते वक़्त दोनों रास्ते में मिल गए हों और साथ चल पड़े हों? या फ़िर शायद रुना भाभी को ही कोई काम आन पड़ा हो जिसके लिए उन्हें मिथुन की सहायता लेने की ज़रुरत पड़ी हो??”
“हो सकता है... ये सही है की मैंने दोनों को साथ जाते हुए तो मैंने देखा था... पर बाद में जो देखा......”
कहते हुए कालू बीच में ही चुप हो गया.
देख के ऐसा लगने लगा मानो किसी और ही दुनिया में खो गया है.
शुभो ने उसके कंधे को पकड़ कर हिलाते हुए पूछा,
“बाद में क्या देखा था भाई; बता तो सही?”
कालू तुरंत कुछ बोलना नहीं चाह रहा था पर देबू और शुभो की ओर से लगातार पड़ते दबाव ने उसको अपना विचार बदलने को मजबूर किया.
चाय की अंतिम चुस्की लेकर कप को बेंच के नीचे रखा.. शर्ट के पॉकेट से एक मुड़ा हुआ पेपर निकाल कर उसमें से एक बीड़ी निकाल कर अपने दांतों के बीच दबाया और माचिस से सुलगाते हुए बोला,
“दरअसल बात है ही ऐसी जिसपे मैं आज भी यकीं नहीं कर पा रहा हूँ... और शायद तुम लोग भी नहीं कर पाओगे... पहले दिन दोनों को साथ जब सब्जी दुकानों की ओर जाते देखा तो मुझे कुछ अजीब नहीं लगा. दूसरे दिन भी मैंने दोनों को शम्भू जी के घर की ओर जाते देखा.. मुझे तब भी कुछ भी अजीब नहीं लगा. इसी तरह तीसरे दिन भी उन दोनों को मैंने देखा... साथ में... दोनों आपस में हँसते मुस्कराते हुए बातें करते जा रहे थे. तभी मेरा दिमाग ठनका... याद आया कि पिछले दो दिन भी ये दोनों इसी तरह आपस में हँसते मुस्कराते बातें करते हुए जा रहे थे. मेरा बदमाश मन ज़ोरों से मचलने लगा. मन अनजाने में ही गवाही देने लगा की कुछ तो गड़बड़ झाला है. उनसे थोड़ी दूरी बनाते हुए मैं भी उनके पीछे हो लिया. कुछ दूर चलने पर पाया की दोनों तो जंगल की ओर जा रहे हैं! उस भयावह भूतिया जंगल में! जहाँ शायद परिंदा भी मुश्किल से पर मारता होगा.. दिल बैठने लगा मेरा.. सोचा, अब आगे नहीं जाऊँ. पर दोनों क्या गुल खिलने वाले हैं ये जानने के लिए मन भी बहुत बेचैन हो रहा था.
अपने अंदर चल रही इस उथल पुथल को शांत करने के लिए मैंने एक बीड़ी निकाल लिया. दो तीन धुआं छोड़ने के बाद निश्चय किया कि आगे ज़रूर जाऊँगा. जब तक कुछ देखूँगा नहीं... तब तक मन शांत नहीं होगा मेरा.
अपने सामने देखा तो चौंक गया.. कुछ देर पहले जहाँ दोनों मेरे सामने ही थोड़ी दूरी पर आगे आगे चल रहे थे; अभी अचानक से इतनी ही देर में दोनों न जाने कहाँ गायब हो गए? मैं तुरंत दौड़ कर आगे गया और उन दोनों को ढूँढने लगा. पर दोनों मुझे कहीं नहीं मिले. मैं ऐसे ही हार मानने वालों में नहीं.. खोजबीन जारी रखा. मुझे लगता है करीब एक घंटे तक उन दोनों को ढूँढता रहा था मैं... अपने आस पास गौर किया तो डर गया. मैं घने जंगल में था! पता नहीं उन दोनों को ढूँढने के चक्कर में कब उस घने भूतिया जंगल के एकदम अंदर घुस गया था.. थक हार कर और अंदर ही अंदर डर से काँपता हुआ मैं एक आम के पेड़ के नीचे बैठ गया. अपनी मूर्खता पर बड़ा क्रोध आ रहा था.. जहाँ मैं बैठा था; उससे कुछ दूरी पर सामने एक पुआल घर था.. ऊपर नीचे, आगे पीछे, पुआल ही पुआल... और स्थिति भी ऐसी कि उसे भी देख कर एक बार के लिए कोई भी डर जाए. अब भला ऐसे घने जंगल में पुआल से भरा और बना वीरान घर देख कर कौन न डरे...? घर नहीं बोल कर कुटिया कहना भी गलत नहीं होगा.
अनमने भाव से ही गुस्से में एक पत्थर उठाया और सामने की ओर ज़ोर से फेंक दिया.
पत्थर सीधे पुआल के ढेर में जा गिरा.
और तभी एक हलचल हुई.
पुआलों के ढेर से मिथुन उठ बैठा और इधर उधर देखने लगा. मैं जल्दी से उस पेड़ के ओट में आ गया. मिथुन पत्थर फेंकने वाले को देखने की कोशिश कर ही रहा था कि एक जनाना हाथ उसका हाथ पकड़ के नीचे की ओर खींचा और मिथुन वापस उन ढेरों पर जा गिरा. फ़िर से मुझे उस ओर चलने वाली गतिविधियाँ दिखनी बंद हो गई थी इसलिए मैं पेड़ पर चढ़ गया ये सोच कर की शायद ऊँचाई से कुछ दिख जाए.
पेड़ पर चढ़ कर मैंने उस ओर देखा... और जो देखा उस पे विश्वास नहीं हुआ.
मिथुन पुआल के ढेरों पर लेटा हुआ है और रुना भाभी उसके कमर पर बैठी हुई ऊपर नीचे हो रही है. साड़ी पेटीकोट जांघ तक उठा हुआ था. आँचल भी शायद नीचे गिरा हुआ था.
मिथुन के होंठों पर मुस्कान और चेहरे पर तृप्ति के भाव थे.
थोड़ा और अच्छे से देखने के लिए मैं एक डाली पर आगे बढ़ कर पैर रखा ही था की वह डाली टूट गई. टूटने से जो आवाज़ हुई वो उन दोनों के कानों तक तो नहीं पहुँचना चाहिए था पर एक क्षण के लिए भाभी रुक ज़रूर गई थी और बैठे बैठे ही, ऊपर नीचे होते होते मेरी दिशा की ओर देखी... बड़ी अजीब ढंग से देख रही थी... हाँ, नज़र उनका कहीं और था... पेड़ पर नहीं. बस एक ही बार इधर उधर देख लेने के बाद भाभी फ़िर मिथुन की ओर मुड़ गई.
मुझे वहाँ से निकल जाने लायक यही सही समय उचित जान पड़ा और मैंने वही किया भी.
चुपचाप पेड़ से उतरा और सरपट गाँव की ओर जाने वाले रास्ते की ओर दौड़ पड़ा. भूल कर भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.”
पूरी बात कहने के बाद कालू चुप हुआ. एक गहरी साँस लिया और एक और चाय मँगवाया.
देबू और शुभो को काटो तो खून नहीं.
डर तो नहीं पर घोर अविश्वसनीय लगा ये घटना उन दोनों को. ऐसा कुछ पहली बार सुना था देबू और शुभो ने इसलिए आगे क्या कहे दोनों को समझ में नहीं आ रहा था. दोनों ही भाभी को बहुत मानते थे. एक अच्छी संस्कारी बहु और शिक्षिका के रूप में काफ़ी अच्छी पहचान और सम्मान है रुना भाभी का इस गाँव में. ऐसी चरित्रहीनता वाली चीज़ें करना तो दूर शायद सोचती तक नहीं होंगी वो.
देबू ने दबे स्वर में पूछा,
“भाई.. तू बिल्कुल पक्का है न... कि वो रुना भाभी ही थी?”
“अरे हाँ भाई हाँ... उनके पीछे उस दिन करीब २ घंटे बीत गए थे मेरे... उन दो घंटे तक मुझे ये पता नहीं चलेगा क्या की मैं किसे देख रहा हूँ और किसे नहीं?” कालू ने बीड़ी बुझाते हुए कहा.
इस पे देबू शांत रहा. शायद कुछ और ही सोचने लगा वो.
शुभो ने चिंतित स्वर में कहा,
“यार कालू, क्या मिथुन की मृत्यु में रुना भाभी का कोई सम्बन्ध .... हो सकता है?”
“लगता तो नहीं पर....”
“पर क्या?”
“जो कुछ अविश्वसनीय सा देखा... उसके बाद किसी तरह की बात या घटना पे विश्वास करना या संदेह होना कोई बड़ी बात नहीं.
इसलिए मैंने सोचा है कि जब तक मिथुन की मृत्यु की गुत्थी सुलझ नहीं जाती तब तक मैं भाभी पे नज़र रखूँगा. अकेले.”
ये सुनकर देबू और शुभो चौंक गए.
एक साथ ही बोले,
“अबे क्या बात कर रहा है? पागल हो गया है क्या? भाभी के पीछे लगेगा? किसी ने देख लिया तो? मान ले भाभी को ही पता चल गया तो? क्या सोचेगी वो? शोर मचा कर तुझे पकड़वा देगी और फ़िर गाँव वालों के हाथों भरपेट मार खिलवाएगी.”
कालू हँसा...
बोला,
“अबे निश्चिन्त रहो बे अक्ल के अंधों... मेरा नाम कालू है कालू... कालीचरण घोष उर्फ़ कालू... हर काम पर्फेक्ट्ली करता हूँ. टेंशन न लो. समझे?”
कोई कुछ न बोला.
दुकान के मालिक घोष काका को शायद कालू के अंतिम तीन चार वाक्य सुनाई दे गए थे. उन तीनों की ओर मुड़ कर कुछ बोलने के लिए मुँह खोला ही था कि चार ग्राहक और आ गए. काका उसी तरफ़ व्यस्त हो गए और पल भर में ही कालू की बातों को भूल गए.
इधर कुछ देर शांत बैठे रहने के बाद तीनों दूसरे विषयों पर बात करते हुए हंसी मजाक में रम गए.
चाय पर चाय चलता रहा.
परन्तु तीनों को ही ये नहीं पता था की उनसे कुछ दूरी पर ज़मीन से दो फूट ऊँची.. हवा में स्थिर एक काला साया उन तीनों की बातें सुन रही थी ... चेहरे पर निष्ठुरता... होंठों पर मुस्कान और आँखें चमकती हुईं!
७)
सुबह जब कालू सो के उठा तो उसे अपने सीने पर हल्का चुभता हुआ दर्द महसूस हुआ. एक टीस सी... जलन महसूस हो रही थी.
अपने सीने की ओर देखते ही वो चौंका. वहाँ तीन लकीर सी खरोंचें थीं जो सीने के दाएँ ओर से शुरू हो कर सीने के बाएँ तरफ़ तक गई थी. कालू बुरी तरह डर गया. वो जल्दी से एक छोटा आइना लेकर अपने सीने पर हुए उस घाव को देखने लगा.
सीने के जिस जगह वो तीन खरोंचें थीं.. उसके आस पास के जगह में सूजन आ गई थी.
कालू को बहुत आश्चर्य हुआ.
आश्चर्य होना स्वाभाविक भी है क्योंकि रात को सोते समय तो ऐसा कुछ नहीं था उसके सीने पर... और फ़िर सीना ही क्या पूरे शरीर में इस तरह का कोई दाग कोई निशान नहीं था.
सीने पर उभर आईं उन तीन खरोंचों के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक से उसे पिछली शाम उस चाय दुकान में शुभो और देबू के साथ हुई अपनी दीर्घ वार्तालाप याद आ गई.
और साथ ही याद आई उस वार्तालाप का प्रमुख विषय... ‘रुना और मिथुन!’...
हालाँकि और भी कई सारी बातें हुईं थीं उन तीन दोस्तों में पर जैसे ही ‘रुना भाभी और मिथुन की मृत्यु’ से संबंधित हुई वार्तालाप वाला अंश उसे याद आया; पता नहीं क्यों कालू के पूरे शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ गई.
अनायास ही उसे एक अपरिचित से भय का अनुभव होने लगा.
उसका मन इस संदेह का गवाही देने लगा की हो न हो, इन खरोंचों का सम्बन्ध कहीं न कहीं मिथुन की मृत्यु से हो सकती है...
या फ़िर शायद साँझ के समय ऐसी विषयों पर बात करने के फलस्वरुप कोई बुरी शक्ति उन लोगों के तरफ़ आकर्षित हो गई होगी और उचित समय मिलते ही चोट पहुँचा दी.
कालू अब बहुत बुरी तरह घबराने लगा.
घरवालों से अपनी घबराहट किसी प्रकार छुपाते हुए नित्य क्रिया कर्म से फ़ौरन निवृत हो, नहा धो कर तैयार हो, चाय नाश्ता खत्म करके दुकान खोलने के नाम पर जल्दी से घर से निकल गया.
तेज़ कदमों से चलता हुआ कालू शुभो के घर पहुँचा..
शुभो हमेशा से ही सूरज उगने के पहले ही उठ जाने का आदि था और इसलिए जब कालू उसके घर पहुँचा तो वो उसे जगा हुआ ही मिला.
कालू ने अपने साथ हुई घटना को बताया और प्रमाण हेतु अपना टी शर्ट उतार कर खरोंचों को दिखाया. शुभो को भी विश्वास नहीं हुआ... आम तौर पर इस तरह के खरोंच गिरने से या किसी नुकीली चीज़ के शरीर पर रगड़ जाने से नहीं बनते हैं. सीने पर दाएँ से बाएँ तक बनी ये खरोंच देखने में ही अजीब सी हैं और इनमें तो अब सूजन भी है. शुभो को एकदम से कुछ समझ में नहीं आया की वो बोले तो क्या बोले. पर कालू के मन में बहुत सारी जिज्ञासाओं का जन्म होने लगा था... और ये जिज्ञासाएँ कालू से ही शांत हो जाए ऐसा अकेले उसके बस की बात नहीं.
इसलिए प्रश्न करने की पहल उसी ने करने की सोची,
“शुभो... क्या लगता है यार?”
शुभो अब भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था... वो तो हतप्रभ सा बस उन्हीं खरोंचों को देखे जा रहा था. कालू के दोबारा पूछने पर कहा,
“पता नहीं यार. मुझे ठीक से कुछ समझ में नहीं आ रहा है.”
“बिल्कुल भी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है?”
“नहीं!”
“पर मैं कुछ कुछ समझ रहा हूँ.”
कहते हुए कालू का चेहरा डरा हुआ सा हो गया.. आँखें भी उसकी भय से पथराई सी लगने लगी. कालू की ये स्थिति देख कर शुभो उत्सुकता और जिज्ञासा से भर गया.
कुछ क्षण उसकी तरफ़ अपलक देखता रहा और जब रहा नहीं गया तब बोल उठा,
“अबे बोल न.. क्या समझ में आ रहा है तेरे को?”
कालू तुरंत कुछ न बोला.
बेचारा बुरी तरह डरा और घबराया हुआ था. थूक निगला.. आस पास देखा... सामने टेबल पर पानी का बोतल रखा हुआ था. लपक कर बोतल उठा लिया और गटागट पूरा पानी पी गया. शुभो इसे गंभीर मामला मानते हुए जल्दी से उसे अपने गद्देदार बिस्तर पर बिठाया और स्टोव पर रखी केतली को हल्के आंच में गर्म कर एक कप में चाय परोस कर कालू की ओर बढ़ाया.
लेने से पहले कालू एक क्षण ठिठका.. फ़िर हाथ बढ़ा कर कप ले कर थोड़ा थोड़ा फूँक कर पीने लगा. इतने देर में शुभो ने दो बिस्कुट भी बढ़ा दिया था कालू की तरफ़.
पाँच मिनट बाद,
“हाँ भई, अब बोल... तू क्या कह रहा था उस समय... क्या समझ रहा था तू?”
कालू को अब थोड़ा नार्मल देख कर शुभो ने पूछने में समय नहीं गँवाया.
कालू ने शुभो की तरफ़ देखा, एक गहरी साँस लिया और बोलने लगा,
“यार क्या बताऊँ.. तुझे याद है न .. कल शाम हम तीन, मैं, तू और देबू; चाय दुकान में थे...
और कई सारी बातें हो रही थी हमारे बीच. बहुत सी बातों के बीच हमने; खास कर मैंने रुना भाभी को लेकर कुछ बातें की थीं?”
“हाँ भाई, याद है.. ऐसी कुछ बातें हुई तो थी हमारे बीच... क्यों... क्या हुआ?”
“यार... रुना भाभी और मिथुन के जंगल वाली घटना को बताने के बाद से ही न जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा था कि हम तीनों की बातों को हमारे अलावा कोई और भी सुन रहा था...या... या शायद ..... खैर, पहले तो मुझे लगा कि दुकान मालिक घोष काका हमारी बातें सुन रहे हैं पर मैंने गौर किया... ऐसा नहीं था.. वो ग्राहकों के साथ व्यस्त थे.. फ़िर पता नहीं.. क्यों मुझे लगने लगा की जो हमारी बातें सुन रहा है.. वो शायद सामने नहीं आना चाहता... या दिख नहीं सकता... या उसे मैं चाह कर भी नहीं देख सकता.... म.. मैं....”
“अबे... रुक ...रुक भाई ..रुक.. क्या अनाप शनाप बक रहा है...? सामने आ नहीं सकता.. दिख नहीं सकता... तू देख नहीं सकता.... साले मुझे गधा समझा है क्या... या एकदम भोर में एक बोतल चढ़ा लिया?”
“अरे नहीं यार... मैं... मैं.. पता.. नहीं कैसे समझाऊँ.. यार... म....”
शुभो ने फ़िर कालू की बात को बीच में काटते हुए बोला,
“सुन भाई... तू अभी ठीक से सोच नहीं रहा है.. तू अंदर से डरा और हिला हुआ है... घर जा.. दवाई लगा... आराम कर.. आज दुकान मत जा... समझा? मुझे देर हो रही है.. समय से पहले दुकान खोलना होता है मेरे को... नहीं तो न जाने कितने ग्राहक लौट जाएँगे... शाम को मिल.. चाय दुकान पे.. वहीँ बात करते हैं.. ठीक है?”
कालू बेचारा और क्या बोले...
शुभो तैयार हुआ.. कालू उसी के साथ घर से निकल गया.
कोई बीस – पच्चीस कदम आगे चल कर शुभो को दाएँ मुड़ जाना था जबकि कालू को वहीँ से बाएँ मुड़ कर अपने घर की ओर जाना था. इसलिए थोड़ी दूर तक दोनों साथ साथ चले. जब तक साथ चले; शुभो कालू को हिम्मत देता रहा, मन बहलाता रहा. कालू को भी थोड़ा अच्छा लग रहा था. मोड़ के पास पहुँच कर शुभो कालू से विदा लिया और चल दिया अपने गन्तव्य की ओर.
कालू भी सोचता विचारता अपने घर की ओर जाने लगा. सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि शुभो के बहुत तरह से समझाने के कारण कालू के मन से डर बहुत हद तक दूर हो गया था. वो अब नार्मल फ़ील करने लगा था.
लेकिन सीने पर लगे खरोंचों के निशान अभी भी दर्द कर रहे थे. शुभो के साथ होती बातों के बीच कालू तो इस दर्द को लगभग भूल ही चुका था पर अब अकेला होते ही दर्द ने अपनी ओर उसका ध्यान खींचना आरंभ कर दिया.
डर तो निकल चुका था उसके दिल और दिमाग से पर ये खरोंच लगे कैसे यही सोचता हुआ कालू तनिक तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा था. वैसे भी शुभो के घर जा कर कुछ देर ठहरने और अब आते आते बहुत समय निकल गया है. अतः अपनी चाल में तेज़ी लाना तो स्वाभाविक ही है.
अचानक वो किसी से ज़ोर से टकराया.
एक महिला की ‘आआऊऊऊ...’ आवाज़ से कालू अपनी विचारों के दुनिया से बाहर आया. हालाँकि इतना वो समझ चुका था कि वो अभी अभी जिससे टकराया है वो..
और कालू खुद एक दूसरे के विपरीत दिशा में गिर चुके हैं.
कालू झटपट उठ कर इधर उधर देखा.
दूर से आती एक रिक्शा के अलावा आस पास कोई नहीं था.
कालू अब नीचे गिर पड़े व्यक्ति की ओर देखा....
अरे ये क्या?!
ये तो रुना भाभी हैं..!!
रुना अब तक उठ कर बैठ चुकी थी.. अपने हाथों और कोहनियों को झाड़ रही थी. वाकई काफ़ी धूल लग गया था उनके कपड़ों और हाथों पर. बाएँ कोहनी के पास तो थोड़ा छिल भी गया है.
खीझ भरे स्वर में डांटते हुए बोली,
“आँखें क्या केवल लोगों को दिखाने के लिए है? देख कर नहीं चल सकते क्या? कम से कम सही जगह तो नज़र होनी चाहिए! रास्ते केवल खुद के चलने के लिए नहीं होते.”
इसी तरह न जाने और कितना ही कुछ कहती चली गई रुना.
पर कालू का ध्यान अब तक उठ बैठी रुना भाभी द्वारा उनके थैली से गिर पड़े सामानों को एक एक कर के डालते समय आगे की ओर थोड़ा झुके होने के कारण वक्षों के उभार पर थी.
सामान थैले में डालने के उपक्रम में ही रुना का आँचल थोड़ा और साइड हुआ और अब आसमानी रंग के शार्ट स्लीव ब्लाउज के बड़े गले से झाँकते बाहर आने को तत्पर उनका दायाँ स्तन किसी भरे हुए बड़े से गोल फल की तरह लग रहा था और गले की सोने की पानी चढ़ी चेन तो जैसे उस लंबी क्लीवेज की गहराईयों में कहीं फँस गई थी शायद.
कालू तो जैसे पलक झपकाना ही भूल गया.
जीवन में ऐसा दृश्य आज से पहले कभी नहीं देखा था उसने. एक स्त्री का अर्ध नग्न स्तन इस तरह से किसी का मन भ्रमित कर सकता है, मोह सकता है ये आज उसने पहली बार अनुभव किया. ब्लाउज कप से फूल कर उठे हुए स्तन ही नहीं अपितु बाहर निकल आई करीब पाँच इंच लंबी क्लीवेज भी रह रह कर कालू की दिल की धड़कन को किसी हाई स्पीड ट्रेन की तरह दौड़ा दे रही थी.
कालू को पहली बार नारी देह की महत्ता का पता चला. नारी देह की शक्ति, क्षमता, सामर्थ्य और सुन्दरता, उसकी वैभवता... मानो ईश्वर ने सभी सर्ववांछित गुण एक देह में ही डाल दिया है.
सभी सामान थैले में डाल लेने के बाद रुना भाभी उठी..
उठ कर कालू को कुछ कहने जा रही थी कि ठिठक गई... कालू की नज़रें अब भी रुना भाभी की वक्षों की ओर था... सुध बुध खोया हुआ सा रुना के शारीरिक कटावों और सौन्दर्य को देखे जा रहा था... रुना दो मिनट के लिए रुक गई... सोची, ‘देखूँ ज़रा.. कब तक.. कहाँ कहाँ ... और क्या क्या देखता है...?’ पर वो जानती थी कि हर किसी के तरह ही कालू भी उसके पूरे शरीर पे केवल एक ही जगह पूरा ध्यान केन्द्रित करेगा और वाकई में ऐसा हुआ भी.
हाथों और कोहनियों पर लगे चोट को भूल रुना अपने चेहरे पर गर्वीली मुस्कान की एक आभा लिए कालू को उसके इस प्रकार के व्यवहार और रास्ते में यूँ ऐसे चलने पर थोड़ा झिड़की और अब तक पास आ चुकी रिक्शा वाले को रुकवा कर उसपे सवार हो कर अपने गन्तव्य की ओर बढ़ गई.
पीछे कालू अब भी रास्ते पर उसी जगह खड़ा हो कर धीरे धीरे दूर होती जा रही रिक्शे पर बैठी रुना को देख रहा था.
पूरे दिन बेचारे कालू का ज़रा भी मन न लगा कहीं.
घर लौटने के थोड़ी ही देर बाद दुकान पर गया तो ज़रूर.. पर दिमाग अब भी रुना के क्लीवेज पर अटका पड़ा था. आज पहली बार एक महिला, एक भाभी के यौवन रस को एक ज़रा चखने का मन कर रहा था उसका. रह रह कर उसके आँखों के सामने रुना का गुब्बारे जैसा फूल कर ऊपर उठे हुए दाएँ चूची का नज़ारा छा जाता. दिन भर बीच बीच में मन करने पर दुकान से बाहर निकल कर पीछे झाड़ियों की ओर जाता और झाड़ियों में ही थोड़ा अंदर घुस कर अपना पैंट उतार कर काले लंड को बाहर निकाल कर बेरहमी के साथ मसल मसल कर हस्तमैथुन करता.
शाम को अपने दोस्तों से मिलने घोष काका के चाय दुकान पर भी नहीं गया.
मन बेचैन था.. रह रह कर मन में एक हुक सी लगती... कुछ पाने की चाह उसके कोमल हृदय पर एक ज़ोर का प्रहार करती... पर वो अपने मन को समझाते हुए अपना काम करता रहा.
मन ही मन सोच लिया था कि आज उसे हर हाल में रिमी के पास जाना ही होगा.
रिमी गाँव की ही एक मनचली लड़की थी जिसपे कालू का दिल आ गया था.
पिछले कई महीनों से नैन मटक्का के बाद कुछ ही दिन पहले दोनों पहली बार एक दूसरे के करीब... बहुत करीब आये थे. हालाँकि सेक्स होते होते रह गया था.. पर उस दिन ऊपर ही ऊपर जो आनंद मिला था कालू को उसे वो भूले से भी भूल नहीं पाया था. दोनों ने एक दूसरे से वादा भी किया था कि जल्द ही एक दिन दोनों सब कुछ नज़रअंदाज़ कर के एक सुखद समागम करेंगे. अपने पहले संसर्ग को कुछ ऐसा करेंगे की वह ताउम्र यादगार बन जाए.
जल्दी से काम निपटा कर कालू दुकान बढ़ाया (बंद किया) और रिमी की घर के रास्ते चल पड़ा. सुबह रुना को देखने के बाद से ही उसके दिमाग में सेक्स के कीड़े उछल कूद कर रहे थे. इसलिए उसका इस बात पे जल्दी ध्यान नहीं गया कि आज उसे लौटने में काफ़ी देर हो गई है. और दिनों में संध्या सात होते होते दुकान बढ़ा दिया करता है और कभी कभी तो छह बजने से पहले ही दुकान बढ़ा कर दोस्तों के साथ चाय दुकान में गप्पे शप्पे हांका करता.. और फ़िर घर लौटते लौटते नौ बज जाते.
पर आज तो साढ़े आठ यहीं बज गए.
वह तेज़ क़दमों से रिमी के घर की ओर बढ़ा जा रहा था. चाहे कुछ भी हो जाए... चाहे सेक्स न हो... पर थोड़ी शांति तो आज उसे चाहिए ही. रिमी का कमरा घर के पीछे तरफ़ था जहाँ वो आराम से जा सकता है और उतने ही आराम से रिमी के कमरे में घुस सकता है. उसके माँ बाप और बूढ़ी दादी उसके कमरे में जल्दी नहीं आते. कुछ कहना होता तो बाहर से आवाज़ देते या दरवाज़ा खटखटाते. इसलिए सेक्स के संभावना तो बनती ही बनती है.. और कुछ नहीं तो ऊपर ऊपर से ही मज़े ले लेगा. वो भी तो कितना तरसती है उसके आलिंगन के लिए. होंठों पर भी चुम्मा लिया जाता है ये तो उसे पता ही नहीं था. ये भी रिमी ने ही उसे कर के दिखाया था.
‘आहा! सच में. कितना मज़ा आता है न... खास कर संतरे जैसे कोमल नर्म ताज़े उगे चूचियों को कस कर मुट्ठियों में भींच कर गोल गोल घूमाते हुए मसलने में तो एक अलग ही आनंद है.’ मन ही मन ऐसा सोचता चहकता हुआ कालू बढ़ा चला जा रहा था रिमी के घर.
अभी मुश्किल से कोई आधा किलोमीटर दूर होगा वो रिमी के घर से कि अचानक उसे लगा की उसने कुछ सुना.
वो फ़ौरन पलट कर पीछे घूम कर देखा.
रात के अँधेरे में जहाँ तक और जितना स्पष्ट देखा जा सकता है... देखा.
नहीं... कहीं कुछ नहीं.
‘तो फ़िर... वो आवाज़... कहीं भ्रम तो नहीं? शायद सुनने में गलती हुई है.’
कुछ कदम और चलने पर फिर वैसी ही एक आवाज़.
कालू फिर रुका...
इधर उधर देखा..
पीछे मुड़ कर भी देखा.
पर कहीं कुछ नहीं दिखा. दूर दूर तक कोई इन्सान तो छोड़िये; परिंदा तक नहीं था.
सन्नाटा गहरा रहा था.
इस गाँव में आठ बजते बजते सब अपना अपना दुकानदारी वगैरह निपटा कर अपने घरों की ओर प्रस्थान करने के लिए प्रस्तुत होने लगते हैं. साढ़े आठ या पौने नौ होते होते अधिकांश घरों के दरवाज़े बंद हो जाते हैं और कई के घरों के तो लालटेन, मोमबत्ती, बल्ब इत्यादि बुझ जाते हैं. कुछ आवारा मवाली टाइप लड़के और पियक्कड़ प्रौढ़ ही जगह जगह रास्तों में मिल जाते हैं. वो भी हर रात नहीं.
आज की रात भी शायद ऐसी ही एक रात है.
कालू आगे बढ़ने के लिए जैसे ही अपना दायाँ कदम उठाया; वही आवाज़ फिर सुनाई दी.
वो सिहर उठा. रिमी से मिलने के रोमांच के जगह अब धीरे धीरे डर अपना घर करने लगा उसके मन में.
अब भला रात के ऐसे माहौल में किसे डर न लगे.
डरते डरते किसी तरह कदम आगे बढ़ाया.. अब कोई आवाज़ नहीं... वो अब पहले से थोड़ा तेज़ गति में चलने लगा. पर रह रह कर उसके टांग काँप उठते. वो लड़खड़ा जाता. खुद को स्थिर करने के लिए उसने अपने कमीज़ की पॉकेट से माचिस और एक बीड़ी निकाल लिया. जलाने लगा. पर तीली जली नहीं. फिर कोशिश किया.. फिर नाकाम रहा. उसने गौर किया; उसके हाथ कांप रहे हैं.
दो बार और कोशिश किया उसने. तीसरी बार में सफल रहा.
बीड़ी फूँकते हुए कुछ कदम आगे बढ़ा कि फिर वही आवाज़. पर इस बार वो आवाज़ को पहचान गया. पायल की आवाज़ थी!
और इस बार तुरंत ही एक और आवाज़ भी सुनाई दिया जो स्पष्टतः एक महिला की थी.
कालू एक झटके में पीछे घूमा... और पीछे जिसे देखा उसे अभी इस समय देखने की उसने कल्पना तक नहीं की थी.
घोर आश्चर्य में बरबस ही उसके मुँह से निकला,
“अरे भाभी जी... आप??!!”
रुना ही खड़ी थी..!
बड़ी ही अदा से मुस्कराई. आँखें तो ऐसी लग रही थी मानो पूरा एक बोतल गटक कर आई हो... नशा ही नशा छाया था उन आँखों में. करीने से काजल लगा हुआ. होंठों पर बड़ी खूबसूरती से लगी लाल लिपस्टिक. पहले कभी गौर किया नहीं पर आज देखा की निचले होंठ के बायीं तरफ एक बहुत ही छोटा सा तिल भी है. बालों को भी बिल्कुल अलग ही अंदाज़ में कंघी की हुई है उसने.
खोपा में एक छोटा सा लाल गुलाब खोंसा हुआ. सामने चेहरे पर दोनों साइड से दो लटें लटकी हुईं.
कालू की नज़रें अब नीचे फिसली.
लाल रंग की शोर्ट स्लीव ब्लाउज.. लाल साड़ी जिसे बहुत कस कर लपेटा गया है बदन पर... आँचल दाएँ वक्ष पर से हट कर पूरी तरह से बाएँ पर है. इससे उस टाइट ब्लाउज में उसके भरे स्तन और भी फूल कर ऊपर को उठे हुए दिख रहे हैं. सोने की चेन बिना रौशनी पाए ही चमचम कर रही है... और सुबह की ही तरह ब्लाउज से ऊपर निकल आए उस लम्बे क्लीवेज के अंदर घुसी हुई है. ब्लाउज के पहले दो हुक आपस में ऐसे लगे हुए हैं मानो थोड़ा और दबाव पड़ते ही टूट जाएँगे. दोनों हाथों में लाल चूड़ियाँ और बंगाली औरतों के हाथों में पहनी जाने वाली सफ़ेद शाखा चूड़ी भी है.
साड़ी कमर पे पीछे से अच्छे से लिपटी हुई पर आगे आते आते नीचे की ओर झुक गई है. इससे नाभि स्पष्ट दिख रही है. कमर पर भी एक सोने की कमरबंद है जोकि गले की चेन की ही तरह बिना किसी रौशनी के चमक रही है.
कालू को तो रत्ती भर का विश्वास नहीं हो रहा कि जिसे पूरा गाँव एक शालीन वधू और सुशिक्षित शिक्षिका के रूप में जानता है; वो आज, अभी उसके सामने एक खेली खिलाई औरत की भांति इतराते हुए खड़ी है!
बहुत मुश्किल कालू के मुँह से शब्द निकले,
“भाभी.. आप.. इस...इस समय... यहाँ.... क्यों?”
रुना हँसी... उसकी वो हँसी वहां गूँजती हुई सी प्रतीत हुई,
“हाहाहा... क्यों कालू... मैं आ नहीं सकती क्या?”
कहते हुए अपना मुँह एक रुआँसे बच्चे के जैसे बना ली.
कालू के मुँह से शब्दों ने जैसे न निकलने की ठान ली हो. डर तो उसे ज़रूर लग रहा था और अब भी लग रहा है पर अब डर के साथ साथ कामोत्तेजना भी हावी होने लगी है.
कालू की नज़रें एक बार फिर रुना की काजल लगी आँखों से होते धीरे धीरे उसके लाल होंठ और फिर वहाँ से सीधे ब्लाउज कप्स में समाने से मना करते ऊपर की ओर निकल आए स्तनों और उनके बीच की गहरी घाटी में जा कर रुक गई. कुछ क्षण अच्छे से देखने के बाद उसने जल्दी से एक नज़र रुना की गोल गहरी नाभि और थोड़ा नीचे बंधे कमर के कटाव की महत्ता बढ़ाती कमरबंद पर डाली.
बेचारा बुरी तरह कंफ्यूज होने लगा कि जी भर कर क्या देखे....
रसीले, फूले हुए स्तनों और बीच की घाटी को.... या फिर गहरी नाभि और कमर को?
रुना इठलाती, मुस्कराती हुई तीन कदम चल कर कालू के और पास आई. उसकी आँखों में देखते हुए खनकती आवाज़ में बोली,
“सुनो.. मेरा एक बहुत ज़रूरी काम है.... कर दोगे?”
रुना के ये शब्द कालू के कानों में कोयल की मधुर आवाज़ सी सुनाई दी. कालू मन ही मन एक बार फिर ऐसा ही कुछ सुनने को मतवाला होने लगा. वो अपनी इस आदरणीय आकर्षणीय भाभी से ऐसी ही खनकती आवाज़ को फिर से सुनाने के लिए विनती करने की सोचने लगा. पर बेचारा सोच भी कहाँ पा रहा था... रुना उसके इतने करीब आ गई थी कि उसकी नज़र तो अब सीधे रुना के चेहरे और वक्षों पर ही जा कर रुक रही थीं.
कालू को कुछ न बोलते देख रुना मुस्कराते हुए अपना दायाँ हाथ कालू के सीने के बाएँ तरफ उसके दिल के ठीक ऊपर रखती हुई बोली,
“कालू.... तुम मेरा काम कर दोगे न?”
बात ख़त्म करते करते रुना हौले हौले कालू के दिल के ऊपर रखे अपने हाथ को गोल गोल घूमाने लगी.
“हाँ भाभी... करूँगा.”
कालू बोला तो सही; पर उसे खुद नहीं पता की उसने क्या बोला और किस बात पे बोला.
पर शायद रुना को इस बात से कोई मतलब नहीं था.
एक बार फिर एक बहुत ही खूबसूरत मुस्कान होंठों पर लाई, अँगुलियों के एक छोटी सी करतब से कालू के शर्ट के एक बटन को खोल कर उसके सीने पर नए नए उगे बालों पर एक ऊँगली फिरा कर बोली,
“तो फिर आओ मेरे साथ....”
“क...क...हाँ... भाभी...”
“अरे आओ तो सही... आओगे तो खुद पता चल जाएगा... है न?”
“ज....जी भा...भाभी.”
रुना एक बार फिर हँसी... वही खनकदार... मीठी... कोयल से स्वर में.
हँस कर वो एक तरफ चल दी. आगे आगे वो.. पीछे पीछे कालू उसके मटकते पिछवाड़े को देखता हुआ चला जा रहा था.
इस पूरे घटनाक्रम को दो जोड़ी आँखें देख रही थीं.
एक तो अपने घर के पीछे वाले कमरे की खिड़की से खुद रिमी और दूसरा एक मताल पियक्कड़... जो दो बोतल खाली करने के बाद बेहोश होने के कगार पर था. वो शराबी न तो ठीक से कुछ देख सका और न ही अधिक देर तक होश में रह पाया; पर रिमी... जिसका घर अपेक्षाकृत थोड़ा नजदीक था और जिसकी खिड़की से कालू जहाँ खड़ा था; रास्ते के उस हिस्से को आसानी से देखा जा सकता है; वो भी ठीक से कुछ देख न पाई. एक तो वैसे ही स्ट्रीट लाइट की कोई व्यवस्था नहीं है और दूसरे, थोड़ा ही सही पर कालू दूर तो था ही...
रिमी को सिर्फ इतना ही दिखा की एक कोई मर्द खड़ा है और एक औरत. दोनों में कुछ बातें हो रही हैं और फिर औरत के पीछे पीछे मर्द एक ओर चल देता है. दोनों ही कुछ कदम चले होते हैं कि अचानक कोहरा सा एक धुंध सामने प्रकट हो जाता है और कुछ क्षण बाद जब धुंध हटता है तो वो आदमी और औरत कहीं दिखाई नहीं देते.
ऐसा दृश्य चूँकि रिमी ने आज पहली बार देखा इसलिए बेचारी बहुत डर गई और झट से खिड़की बंद कर के अंदर चली गई.
इधर,
कालू रुना के पीछे चलते चलते एक वीरान मैदानी जगह के बीचोंबीच पहुँच गया... अब जहाँ वो और रुना थे उससे यही कोई दस बारह क़दमों की दूरी पर चारों तरफ खंडहर नुमा घरों के बचे खुचे अवशेष उन्हें घेरे हुए थे.
कालू कहाँ पहुँच गया... क्यों आया... और सबसे बड़ी बात कि किसके साथ आया... ये सब कुछ भी उसे नहीं पता... किसी भी बात का होश नहीं.
वो तो बस अपने सामने उसकी तरफ पलट कर खड़ी स्वर्ग से भी सुन्दर अप्सरा को अप्रतिम कामेच्छा से निहार रहा था... उसे आमंत्रित करते रुना के लाल होंठों की मुस्कान, पुष्ट वक्ष और कटावदार कमर बस जैसे उसी के लिए बने थे.
कालू की आँखें धीरे धीरे बोझिल हो आई थीं.
धीरे धीरे सुध बुध खोता जा रहा था..
पूरी तरह से आँखें बंद होने के पहले का जो अंतिम दृश्य उसने देखा वो उसके अंदर की कामोत्तेजना में कई गुणा वृद्धि कर गई. अपनी लगभग बंद हो आई आँखों से उसने रुना के कंधे से आँचल के सरकने और क्षण भर बाद ही उस टाइट लाल ब्लाउज को रुना के बदन से अलग होते देखा.....
८)
रह रह कर कालू के आँखों के सामने कुछ दृश्य उभर आते और उसी के साथ कालू का सिर दुखने लगता. इसी दर्द से कालू बिस्तर पर पड़े पड़े छटपटाने लगता.
बंद आँखों से सजग रहते हुए ही उन दृश्यों को समझने का प्रयत्न करता; पर जैसे ही दिमाग पर जरा सा ज़ोर क्या लगाता सिर फिर से दुखने लगता. कुछ टूटे बिखरे से रंगीन दृश्य; जो यदि जरा सा थम जाए या धीमे हो जाए तो तब शायद कुछ समझ पाए कालू... पर.... पर... दृश्य तो जैसे सब खिचड़ी से आते जाते.
बस इतना ही समझ पाया था कालू कि इन दृश्यों का उससे अवश्य कोई सम्बन्ध है अन्यथा वो स्वयं को इन दृश्यों में नहीं पाता.
पर... पर... ये दूसरा व्यक्ति कौन है?
जिन दृश्यों को अपने बंद आँखों से देख रहा है... जिन्हें वो सपना समझ रहा है.... उन सपनों में उसके अलावा कोई और भी है जिसे वो महसूस तो कर पा रहा है पर स्पष्ट देख नहीं पा रहा.
तभी किसी ने उसे ज़ोर से हिलाया, झकझोरा...
एक झटके से उठ बैठा वो.
देखा, उसके आस पास उसे घेरे हुए बहुत लोग हैं; दोस्त हैं, सम्बन्धी हैं, गाँव के कुछ लोग हैं, पड़ोसी हैं, पिताजी बिस्तर पर उसके पास बैठे हुए हैं, माताजी सिरहाने बैठी उसे हाथ वाले पंखे से हवा कर दे रही हैं.
कालू अपनी आँखें मलता हुआ चारों ओर और अच्छे से देखा तो पाया कि वो इस समय अपने कमरे में ही है.
कालू हैरानी से सबको देखने लगा. खास कर माँ की आँखों में आँसू और पिताजी के चेहरे पर गहरी चिंता देख कर उसे बहुत ज्यादा हैरानी हुई. शुभो और देबू थोड़ा पास आ कर उसकी ओर झुक कर पूछे,
“कालू... यार... कैसा है तू... क्या हुआ था तुझे?”
उनका ये पूछने भर की देरी थी कि जितने भी लोग वहाँ उपस्थित थे, सब के सब यही प्रश्न एक साथ करने लगे.
गहरी नींद से उठा कालू बेचारा कुछ समझ ही नहीं पा रहा था की देबू और शुभो ने उससे क्या पूछा और उसके परिवार जनों के साथ साथ बाकी के लोग भी आखिर उससे क्या जानना चाहते हैं. उसने असमंजस भरी निगाहों से अपने माँ बाबूजी की ओर देखा. दोनों को देख कर ये साफ़ महसूस किया उसने की दोनों अभी अभी किसी गहरी दुष्चिन्ता से बाहर निकले हैं.
उसे घेर कर खड़े लोगों ने फिर से प्रश्नोत्तर का पहला चरण शुरू कर दिया और इसी में पूरा दिन पार हो गया.
शाम को वो घर पर ही रहा.
लोगों के प्रश्नों के बारे में सोचता रहा.
सबके प्रश्न उसे बहुत अटपटे और मजाकिया लग रहे थे.
“तुम्हें क्या हुआ था... कहाँ चले गए थे... ऐसा क्यों हुआ... और कौन था साथ में....” इत्यादि इत्यादि प्रश्न.
इन सबके अलावा जो चीज़ उसे सबसे अजीब लग रही थी वो ये कि उसे कुछ भी याद क्यों नहीं है. यहाँ तक की उसे शुभो के घर जाने के बारे में भी कुछ याद नहीं. वो तो शुभो ने उससे जब पूछा की उसके घर से जाने के बाद वो कहाँ गया था और शाम को मिलने क्यों नहीं आया था.. तब कालू को पता चला की वो शुभो के घर गया था और शाम को मिला भी नहीं अपने दोस्तों से.
कालू ने शर्ट के बटन खोल कर अपने सीने पर अभी भी ताज़ा लग रहे उन तीन खरोंचों को देखा.
आश्चर्य..
इनके बारे में भी कुछ याद नहीं उसे.
बस यही समझ पाया की इनमें अब सूजन और दर्द नहीं है.
अगले दिन सुबह आठ बजे शुभो उसके घर आया.
जल्दी ही आया क्योंकि उसे फिर जा कर अपनी दुकान भी खोलनी थी.
कालू अपने कमरे में ही बैठा चाय पी रहा था. दोस्त को आया देख बहुत खुश हुआ और बैठा कर उसे भी चाय बिस्कुट दिया. थोड़ी देर के कुशल क्षेम और इधर उधर की बातचीत के बाद कालू गम्भीर होता हुआ बोला,
“यार, कुछ पूछना है तेरे से... पूछूँ?”
गर्म चाय की एक सिप लेता हुआ शुभो बोला,
“हाँ ... पूछ.”
“यार.... हुआ क्या था?”
होंठों तक चाय के कप को लाते हुए शुभो रुक गया और शंकित लहजे में कालू से पूछा,
“मतलब?”
“मतलब, मेरे साथ क्या हुआ था... मुझे कुछ भी याद क्यों नहीं है? आधे से ज्यादा गाँव वाले, दोस्त, रिश्तेदार, माँ बाबूजी.. सब के सब मुझे घेर कर क्यों खड़े थे? मामला क्या है?”
चाय खत्म कर कप को एक साइड रखते हुए पॉकेट से बीड़ी निकाल कर होंठों के बीच दबाते हुए शुभो पूछा,
“यार एक बात तो मुझे समझ नहीं आ रही और वो यह कि तू सच बोल रहा है या झूठ ... की तुझे कुछ भी याद नहीं. वैसे तू जिस हालत में मिला था, उससे तो तेरी इस बात पे की तुझे कुछ पता नहीं या कुछ भी याद नहीं; पर विश्वास किया जा सकता है.”
“हालत? कैसी हालत?”
कालू उत्सुक हो उठा.
बीड़ी सुलगाते हुए शुभो बोला,
“नंगा!”
कालू समझा नहीं... इसलिए दोबारा पूछा,
“क्या? क्या बोला तू?”
कालू की ओर देख कर शुभो फिर अपनी बात को दोहराया; पर इस बार थोड़ा अच्छे से बोला,
“अबे तू नंगा था... नंगा ! एकदम निर्वस्त्र!... नंगी हालत में गाँव के ताल मैदान में मिला था तू. नंगा तो था ही... साथ ही बुखार से तड़प रहा था... और...”
“और?”
“और धीमे आवाज़ में एक ही बात को बार बार दोहरा रहा था... ‘और चाहिए... और चाहिए’... सबने सुना पर किसी को कुछ भी समझ में नहीं आया. अब ये ‘और क्या चाहिए’ ये तो तू ही बता सकता है. है न?”
व्यंग्य करता हुआ शुभो कालू को तीक्ष्ण दृष्टि से देखा.
कालू तो शुभो की बात सुनकर ही हैरान परेशान हो गया. अभी अभी शुभो ने उसे जो कुछ भी बताया; उनसे वो कुछ भी नहीं समझा... पर कालू के चेहरे पर उमड़ते चिंता के बादल से इतना तो तय है कि कालू वाकई में कुछ नहीं जानता है.
शुभो सामने दीवार घड़ी पर नज़र डाला.
अब उसके उठने का समय हो आया है अतः बीड़ी को जल्दी खत्म कर के उठता हुआ बोला,
“देख भाई, सही गलत, याद आना या नहीं आना बाद की बात है. सबसे पहले तो तू कुछ दिन और आराम कर... चंगा हो जा, हम लोग के साथ चाय दुकान पर बैठना शुरू कर, पहली वाली दिनचर्या शुरू होने दे.. फिर इस बारे में कभी सोचेंगे. ठीक है? अब चलना चाहिए मेरे को. समय हो रहा है.”
कहते हुए शुभो कालू के कंधे पर सहानुभूति से हाथ रखा, फिर पलट कर जाने लगा.
दरवाज़े तक पहुँचा ही था कि कालू ने पीछे से पूछा,
“यार... देबू नहीं आया?”
ठीक दरवाज़े के पास जा कर ठिठक कर रुका शुभो; कालू की ओर पीछे मुड़ा और एक मुस्कान लिए बोला,
“वो तो अभी नहीं आ सकता न... सुबह सुबह सबको दूध पहुँचाता है... पर कह रहा था कि तुझसे ज़रूर मिलेगा. उसे भी तेरी बहुत चिंता हो रही थी.”
इतना कह कर शुभो कमरे से निकल गया.
इस समय कालू शुभो का चेहरा नहीं देखा पाया; अन्यथा बड़ी आसानी से बता देता की शुभो ने उससे झूठ बोला.
इधर कालू के घर से निकल कर शुभो अपनी दुकान की ओर साइकिल चलाता कालू के बारे में सोचता हुआ जा रहा था.
अभी कुछ दूर गया ही होगा कि तभी उसे दूर से देबू आता दिखा. वो भी अपनी साइकिल पर दूध के बड़े बड़े तीन कैन लिए मस्ती में झूमता हुआ सा चला आ रहा था. सुबह सुबह अपने एक और जिगरी यार को देख कर शुभो बहुत खुश हुआ और साइकिल तेज़ चलाता हुआ आगे बढ़ा.
पर उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा जब उसने देखा की देबू न सिर्फ अपनी धुन में उस के आगे आया, अपितु उसके बगल से ऐसे निकल गया मानो शुभो वहाँ है ही नहीं. शुभो की ओर नज़र फेर कर भी नहीं देखा.
शुभो के बिल्कुल बगल से निकल जाने के बाद भी देबू के साइकिल के स्पीड में कोई कमी नहीं आई. पहले की ही भांति अपनी ही दुनिया में मग्न वह चला जा रहा था. शुभो पीछे मुड़ कर देबू को आवाज़ लगाया ये सोच कर कि अगर देबू ने उसे वाकई में नहीं देखा होगा तो कम से कम आवाज़ सुन कर रुक जाएगा.
पर ऐसा हुआ नहीं.
उल्टे ऐसा लगा मानो देबू ने अपना स्पीड बढ़ा दिया है.
शुभो को कुछ ठीक नहीं लगा. देबू उसे ऐसे नज़रंदाज़ भला क्यों करे? शुभो को ये बात अजीब लगा. उसने साइकिल घूमाया और चल पड़ा देबू के पीछे. पर जान बूझ कर देबू से दूरी बनाए रखा.
देबू सीधे नबीन बाबू के घर जा कर रुका.
सीटी बजाते हुए साइकिल का स्टैंड लगाया, कैन उतारा और दरवाज़ा खटखटाया. अंदर से शायद किसी ने पूछा होगा कि ‘कौन है?’ तभी तो देबू ने बाहर से आवाज़ लगाया,
“मैं हूँ भाभी जी. दूध ले लीजिए.”
दो मिनट बाद दरवाज़ा खुला और अंदर से रुना भाभी मुस्कराती हुई बाहर निकली. लाल साड़ी-ब्लाउज में एक लंबी वक्षरेखा दिखाती रुना इतनी सुंदर लग रही थी कि उसे देखने के बाद शुभो तो क्या; गाँव का अस्सी – नब्बे साल का बूढ़ा भी उसके प्रेम में पड़ जाए.
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दोनों में थोड़ी सी बातचीत हुई और फिर रुना भाभी अंदर चली गई.
देबू भी एक मिनट बाद अपने चारों ओर अच्छे से देखने के बाद अंदर घुसा और दरवाज़ा बंद कर दिया.
शुभो पहले तो कुछ समझा नहीं. और फिर जो कुछ भी वो समझा, उसे मानने के लिए वो कतई तैयार नहीं हुआ. देबू एक अच्छा लड़का है और उसका दोस्त भी. वहीँ रुना भाभी भी एक सुशिक्षित और अच्छे आचार विचार वाली महिला हैं. ऐसे कैसे वो कुछ भी समझ और मान ले.
करीब दस मिनट तक वो अपनी जगह पर ही खड़ा देबू के निकलने की प्रतीक्षा करने लगा.
जब देबू दस मिनट बाद भी नहीं निकला तब उसका सब्र का बाँध टूट गया. साइकिल बगल की झाड़ियों के अंदर खड़ी कर के शुभो घर के मुख्य दरवाज़े तक आया. हाथ बढ़ा कर दस्तक देने ही वाला था कि रुक गया. सोचा, ‘ये ठीक नहीं होगा. कुछ और करना चाहिए.’ कुछ पल सोचा और फिर कुछ निश्चय कर दरवाज़े से हट गया. बाहर से खड़े खड़े ही पूरे घर को अच्छे से निहारा और घूम कर घर के पिछवाड़े की ओर चल दिया.
घर के पीछे एक छोटा सा मैदान जैसा ज़मीन था जिसे देख कर साफ पता चलता है की एक समय यहाँ एक सुंदर बगीचा हुआ करता था. अभी भी कुछ छोटे छोटे पौधे लगे हुए थे. खास कर गेंदे के पौधे... कुछ सूखे हुए तो कुछ हरे भरे. कुछेक बांस को काट कर उन्हीं से बाउंड्री बनाया गया था कभी पर आज अधिकांश हिस्सा टूटा हुआ है.
शुभो आगे कुछ सोचता कि तभी उसे ऊपर के कमरे से हँसने की आवाज़ आई. अब वो और देर नहीं करना चाहता. जल्दी अपने चारों ओर देखा. थोड़ी ही दूर पर एक बड़ा सा पेड़ दिखा. दौड़ता हुआ गया और जितनी जल्दी हो सके पेड़ पर चढ़ने लगा. थोड़े से प्रयास के बाद शुभो पेड़ के सबसे ऊँची डाली पर पहुँच गया. खुद को अच्छे से डालियों पर जमा लेने के बाद वो रुना के घर की तरफ बड़े ध्यान से देखने लगा. खास कर उस कमरे की ओर जहाँ से कुछ मिनट पहले उसने हँसी की आवाजें सुनी थी.
वहीँ एक डाली पर बैठे बैठे एक अनजाना तीव्र कौतुहल के साथ साथ भय भी घर किए जा रहा था शुभो के मन में,
‘क्या हो अगर किसी ने उसे इस तरह पेड़ पर बैठे देख लिया? क्या होगा अगर वो रुना भाभी के कमरों की ताक – झाँक करते हुए पकड़ा गया?? अपने इस उद्द्दंड शरारत का क्या स्पष्टीकरण देगा वो???’
इस तरह के अनगिनत भयावह परिस्थितियाँ और प्रश्नों के घेरे में खुद को संभावित तौर पर फँसता देखने में व्यस्त शुभो शायद थोड़ी ही देर बाद उतर जाने का निर्णय ले लेता कि तभी....
तभी उसे उसी कमरे में एक हलचल होती दिखाई दी.
सामने की तीन कमरों में एक कमरे में एक स्त्री दिखाई दे रही है.
रुना भाभी ही है वो.
मस्त अल्हड़ जवानी लिए किसी के साथ मदमस्त हो झूम रही है. शायद जिसके साथ वो है; उसकी बाँहों में आने से बचने की कोशिश कर रही है. और जिससे बचने की कोशिश कर रही है.. वो और कोई नहीं, देबू है.
रुना के चेहरे पर एक बहुत ही अलग तरह की रौनक है... और... देबू भी कितना खुश लग रहा है. अजीब, अलग सी ख़ुशी.
जैसे बहुत जिद, मिन्नत, विनती और एक लंबी प्रतीक्षा के बाद एक बच्चे को उसका मनपसंद कोई सामान.. कोई खिलौना मिलता है तो वो कैसे खुश होता है... बिल्कुल वैसे ही.
पेड़ की ऊँची डाली पर बैठा शुभो देख रहा था कि कैसे देबू ने अंततः रुना भाभी को अपनी बाँहों में ले लिया और फिर एक दीवार से भाभी की पीठ को लगा कर उनकी आँखों, गालों और होंठों को बेतहाशा चूमने लगा. रुना कुछ पलों के लिए चुपचाप बुत सी खड़ी रही... फिर... धीरे धीरे... अपने दोनों हाथों को देबू के पीछे, उसके पीठ पर ले जाकर अच्छे से पकड़ ली.
देबू रुके नहीं रुक रहा था. या शायद खुद को रोकना ही नहीं चाह रहा था. गालों और होंठों को चूमते हुए वह थोड़ा नीचे आया और रुना के चेहरे को थोड़ा ऊपर उठा कर, उनकी गर्दन को चूमने और चूसने लगा. जैसे ही देबू ने भाभी की गर्दन को चूसना शुरू किया ठीक तभी उनकी होंठों पर एक मुस्कान तैर गई और ये मुस्कान साफ़ बता रही थी कि भाभी को न सिर्फ इस क्रिया से एक अपरिचित सुख मिल रहा है अपितु उन्होंने तो शायद ऐसे किसी क्रिया और उससे मिलने वाली सुख के बारे में कभी कल्पना भी नहीं की होगी.
देबू कभी उनकी जीभ को चूसता तो कभी गालों को. रह रह कर रुना की पूरी गर्दन को चुम्बनों से भर देता. इस पूरे काम क्रिया के दौरान रुना हँसती रही और देबू के पीठ और सिर के बालों को सहलाती रही.
इधर देबू के हाथ भी हरकत में आ रहे थे. धीरे धीरे उसने रुना के ब्लाउज के सभी हुक खोल दिया. ब्लाउज के खुले दोनों पल्लों को साइड कर वो रुना के गदराई दुधिया स्तनों का ब्रा के ऊपर से ही हस्त मर्दन करने लगा. उसके हाथों का स्पर्श पाते ही रुना ऐसे चिहुंक उठी मानो बरसों की तड़प पर आज किसी ने पानी डाल कर शांत किया हो.
वो और कस कर जकड़ ली देबू को.
देबू भी तो यही चाह रहा था. दरअसल वो हमेशा से ही ऐसी गदराई महिलाओं का दीवाना रहा है जिनका नैन नक्श अच्छा हो, बड़े स्तनों के साथ गदराया बदन हो, अपेक्षाकृत पतली कमर हो और सहवास के समय जो अपने साथी को अपने बदन से जम के जकड़ ले.
यौन उन्माद की अतिरेकता में देबू ने ब्रा उतारने का झंझट न ले कर ब्रा कप्स को एक झटके में नीचे कर दिया. कठोर मर्दन के कारण दुधिया रंग से सुर्ख गुलाबी हो चुके दोनों स्तन एकदम से कूद कर बाहर आ गए. दोनों स्तनों के बस बाहर आने की ही देर थी; देबू ने उन्हें लपकने में क्षण भर का भी समय नहीं गँवाया. कॉटन से भी अधिक मुलायम दोनों स्तनों के स्पर्श का आनंद अपने हथेलियों द्वारा लेते हुए सुध बुध खोया सा देबू ने अपना मुँह दोनों स्तनों के बीच में घुसा कर दोनों तरफ से मुलायम दुदुओं का दबाव अनुभव करने लगा.
बहुत ही भिन्न और दिमाग के सभी बत्तियों को गुल कर देने वाली एक मीठी सुगंध आ रही थी रुना के शरीर से... विशेषतः उसके स्तन वाले क्षेत्र से.
और इसी मीठी सुगंध से पागल सा हुआ जा रहा था देबू.
जीवन में अभी तक शायद ही कभी ऐसी सुगंध से वास्ता हुआ होगा. जैसे एक मतवाला हाथी हरे भरे खेत में बेलगाम घुस कर सभी फ़सल को ध्वस्त कर देता है; ठीक वैसे ही देबू भी मतवाला हो चुका था और बेलगाम हो कर उस हसीन तरीन गदराई स्त्री देह को रौंद देना चाहता था.
इधर,
दो जवान सख्त हाथों के द्वारा अपने सुकोमल नग्न स्तनों पर पड़ते दबाव से बुरी तरह तड़पते हुए कसमसा रही थी रुना. पुरुषों की एक प्राकृतिक एवं स्वाभाविक लालसा होती है स्त्री देह पर ... विशेष कर उसके वक्षों के प्रति... ऐसा अपनी जवानी के पहले पायदान पर कदम रखते ही सुना था रुना ने. पर फूले, गदराए वक्षों के प्रति ऐसा दीवानापन होता है इन मर्दों का ये कदाचित इतने लंबे समय बाद अनुभव कर रही थी वो. निःसंदेह विवाह के पश्चात अपने पति के हाथों अपना कौमार्य भंग करवाते हुए यौन सुख भोगी थी... पर... पर आज तो एक पराए मर्द... नहीं.. एक पराए लड़के के द्वारा....
‘आह्ह!’
एक हल्की सिसकारी ले उठी वह.
उन्माद में देबू ने कुछ ज्यादा ही ज़ोर से उसका स्तन दबा दिया था.
प्यार भरे शब्दों से रुना ने देबू को डांटना चाहा... ये कहना चाहा की अभी बहुत समय है.. आराम से करे... उसे पीड़ा होती है.
पर, जिस अनुपम कलात्मक ढंग से देबू के हाथ और उसकी अंगुलियाँ दोनों स्तनों के क्षेत्रफल पर गोल गोल घूमते हुए उसके दोनों निप्पल से छेड़छाड़ कर रहे थे और जिस दीवानगी से देबू उन सुंदर अंगों पर अपने चुम्बनों की वर्षा करते हुए चाटे जा रहा था; उससे रुना के मन में अपने लिए गर्व और देबू के लिए ढेर सारा प्यार उमड़ पड़ा. इसलिए कुछ कहे बिना बचे हुए लाज को ताक पर रख कर अधखुली आँखों से देबू के कामक्रियाओं को देखने लगी.
इधर पेड़ की डाल पर खुद को किसी तरह से बिठा कर कमरे के अंदर का पूरा दृश्य को देख कर चरम उत्तेजना से भरा हुआ शुभो वहीं हस्तमैथुन करने लगा था. थोड़ी ही देर में उसका वीर्य निकलने वाला था कि अचानक उसे ऐसा लगा मानो उस कमरे से देबू से प्यार पाती और उसे प्यार करती रुना की नज़रें सीधे उस पर यानि शुभो पर टिकी हुई हैं... वो... वो... शायद शुभो को ही देख रही थी...
‘पर...पर ये कैसे संभव है?!’
मन ही मन सोचा शुभो.
‘मैं तो अच्छे से एक ऐसे डाल पर बैठा हुआ हूँ जिसके आगे पत्तों का झुरमुठ है. इतनी सरलता से मुझे देख पाना; वो भी इस दूरी से... असंभव हो न हो, एक कठिन दुष्कर कार्य तो ज़रूर है. उफ़.. क्या करूँ... पकड़े जाने का खतरा मैं नहीं ले सकता. गाँव वाले पूछेंगे की मैं क्या कर रहा था... या.. क्यों बैठा हुआ था एक डाली पर... वो भी रुना भाभी के कमरे की ओर मुँह कर के... तो मैं क्या उत्तर दूँगा..?? न भाभी की इज्ज़त को दांव पर लगा सकता हूँ और न खुद की. उफ़... नहीं.. अब और नहीं.. बहुत देर बैठ लिया.. अब मुझे जाना चाहिए. ज्यादा दिमाग लगाना ठीक नहीं होगा.
’
शुभो बिना आवाज़ किए; आहिस्ते से पेड़ से उतरा, अपने कपड़े झाड़ा और दबे पाँव लंबे डग भरते हुए वहाँ से निकल गया.
देखा जाए तो ये भी अच्छा ही हुआ शुभो के लिए क्योंकि कुछ ही क्षणों बाद रुना देबू को अपने गद्देदार बिस्तर पर ले गई जोकि खिड़की से काफ़ी परे हट कर था. तो शुभो अगर बैठा भी रहता डाली पर तब भी उसे कुछ दिखने वाला नहीं था.
अपनी साइकिल उठा कर जल्दी जल्दी पैडल मारते हुए शुभो अपने दुकान पहुँचा. करीब बीस मिनट की देरी हो गई थी. दो – तीन ग्राहक आ चुके थे. जल्दी से दुकान खोल कर, हाथ धो कर भगवान श्री गणेश एवं माता लक्ष्मी जी की छोटी मूर्तियों को अगरबत्ती दिखा कर दुकानदारी शुरू कर दी.
पूरा दिन दुकानदारी में अच्छे से दिमाग लगाया. हालाँकि बीच बीच में बेकाबू हो जा रहा था पर जैसी तैसे मन को समझाया.
संध्या में यथासमय दुकान को बढ़ा कर (बंद कर) कालू को साथ ले एक अन्य चाय दुकान में ले गया.
कुछ देर एक दूसरे का कुशल क्षेम पूछने के बाद चाय पीते पीते शुभो ने कालू को दिन की सारी घटना विस्तार से कह सुनाया. कालू को विश्वास तो नहीं हो रहा था पर चूँकि शुभो फालतू के लंबे लंबे गप्पे हांकने का शौक़ीन नहीं था और ना ही आज से पहले इस तरह की बातें जो की झूठ साबित हो जाए; कभी किया था इसलिए उसकी बातों को मानने के अलावा फिलहाल कालू के पास और कोई चारा न था.
जब पूरी घटना सुनाने के बाद शुभो चुप हुआ तब थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच शांति छा गई.
एक कुल्हड़ चाय मँगाते हुए कालू ने कहा,
“यार.. अपनी दृष्टि से देखें तो पूरी बात बहुत संदेहास्पद है. पर.. ये दो लोगों के बीच का मामला है... भाभी को नहीं तो क्या देबू से इस बारे में बात किया जा सकता है?”
बहुत गम्भीर हो कर कुछ सोचता हुआ शुभो बोला,
“यार कालू, हमें देबू से ही बात करनी होगी.”
“देबू से ही बात करनी होगी...?! क्यों भई?”
“कालू... ये जो पूरी घटना है... ये केवल संदेहास्पद ही नहीं अपितु भयावह भी है.”
“वो कैसे?”
“यार, पेड़ की डाली पर बैठा जब मैं उस घर के ऊपरी तल्ले के कमरे में भाभी और देबू के काम क्रीड़ा को देख रहा था और जब अचानक से मुझे ऐसा लगा कि भाभी मेरी ही ओर देख रही है; तब मैंने एक बात पर गौर किया.”
“किस बात पर?”
“भाभी की आँखें... उ..उन.. की आँखें.....”
“भाभी की आँखें का क्या शुभो?” एक तीव्र कौतुक जाग उठा कालू के मन में.
“यार, भाभी की आँखें पूरी तरह से काली थीं!”
“क्या?! क्या मतलब??”
“मतलब की, हमारी आँखों में जो सफ़ेद अंश होता है... वो.. वो भाभी की आँखों में नहीं था! पूरी आँखें काली थीं!!”
बोलते हुए शुभो का गला काँप उठा.
और कालू के हाथ से भी कुल्हड़ छूट कर जमीन पर धड़ाम से गिरा....
९)
धीरे धीरे दस दिन बीत गए.
हर रोज़ नबीन बाबू के ऑफिस के लिए निकल जाने के बाद देबू दूध देने आता और बहुत सा समय रुना के साथ बिताता.
और इन्हीं दस दिनों में शुभो ने भी कम से कम सात दिन देबू का रुना के घर तक पीछा किया, पेड़ पर चढ़ा, उस कमरे की खिड़की की ओर टकटकी बाँधे बैठा रहता किसी एक डाली पर और तब तक बैठा रहता जब तक उस खिड़की से रुना भाभी और देबू के कामक्रियाओं का कुछ दृश्य दिखाई न दे देता.
जब कुछ भी दिखना बंद हो जाता तब भारी मन से पेड़ से उतर कर अपने दुकान जाता और सारा दिन खोया खोया सा रहते हुए काम करता.
इसमें कोई संदेह नहीं है की शुभो को रुना भाभी अच्छी नहीं लगती थी.. वो तो उसे बहुत अच्छी... हद से भी अधिक अच्छी लगती थी.. पर सिर्फ़ गाँव की एक शिक्षित और सुसंस्कृत महिला के रूप में. पर जब से रुना को देबू के साथ काम लीला में रत देखना शुरू किया है तब से सिर्फ़ और सिर्फ़ रुना को एक कामदेवी के रूप में देखने लगा है.
पर इससे भी बड़ी बात ये है कि वासना से भी अधिक जो अब शुभो के दिलो दिमाग पर छा गया है वो है ‘डर’.
जब पहली बार उसने खिड़की से देबू और रुना को आपस में प्रेम प्रणय करते देखा था उसी दिन उसने कभी न भूलने वाली एक बात और देखा था.
रुना की काली आँखें!
हो सकता है की शायद ये शुभो के मन का वहम हो परन्तु शुभो तो जैसे ये मान ही बैठा था कि उसी दिन रुना ने शुभो को पेड़ की डाली पर बैठ पत्तों के झुरमुठ से उस कमरे की खिड़की में ताक झाँक करते हुए देख लिया था...
और यही वो समय था जब शुभो ने रुना की काली... पूरी तरह से काली हो चुकी आँखों को देखा था.
हालाँकि उस दिन के बाद से शुभो इतना डर गया था कि हस्तमैथुन भी करे तो डर के कारण वीर्य के स्थान पर मूत निकल जाए; फिर भी वो इन बीते दस में से सात दिन खुद को रोक न सका और नबीन बाबू के घर के पीछे जा उसी पेड़ की डाली पर बैठ रुना और देबू के शारीरिक आह्लाद वाली खेल को बड़े चाव से देखा.
एक बात जो उसे अच्छी लगी; वो ये कि इन सात दिनों में एक बार भी ऐसा नहीं लगा की रुना दोबारा उसकी तरफ देखी हो.
लेकिन एक बार जो वो भय उसके मन में घर कर गया... वो अब निकाले न निकले.
अपने डर के अनुभव को तो वो कालू के साथ बाँट ही चुका था.. सिर्फ़ देबू ही रह गया था.
पर शुभो को तब बहुत आश्चर्य हुआ जब उसके ये पूछने पर कि देबू और रुना के बीच क्या चक्कर है तो देबू ऐसी किसी भी बात से साफ़ मुकर गया. शुभो ने जब दोस्ती खातिर देबू पर दबाव डाला तब देबू ने साफ़ कह दिया,
“देख भाई, तू पिछले कुछ दिनों से बड़ा अजीब तरह से बर्ताव कर रहा है. इतनी उल्टी सीधी और बहकी बहकी बातें कर रहा है कि कभी कभी तो लगता है तुझे शहर ले जा कर डॉक्टर से दिखाना पड़ेगा. सुन, ये सब न कालू के सामने किया कर... वो भरोसा करता है ऐसी बातों पे और जल्दी मान भी जाता है. यार, तुझे शर्म आनी चाहिए जो तूने रुना भाभी जैसी एक संभ्रांत परिवार की महिला पर इस तरह का ऐसा घिनौना संदेह किया, उनके चरित्र पर अँगुली उठाया.
और उससे भी बड़ी दुःख की बात ये की तूने अपने इस जिगरी यार पर भी संदेह करता हुआ ऐसा बेहूदा आरोप लगाया. तेरे से ऐसी अपेक्षा नहीं थी. धिक्कार है ऐसी मित्रता पर.”
आँखों में आँसू लिए देबू वहाँ से चला गया.
और शुभो को एक अलग ही द्वंद्व में डाल दिया.
अपने और रुना भाभी के बीच के अमान्य सम्बन्ध को स्वीकार करने से साफ़ मना करने और ऐसी नीच बात सोचने और देबू पर झूठे आरोप लगाने की बात बोलकर उल्टे शुभो को ही देबू ने बहुत भला बुरा कह दिया और इसी के साथ ही दोनों की दोस्ती में दरार पड़ गई.
अपने सीने पर लगे खरोंच, कुछ दिन पहले हुई कुछ अनजानी बातों और अब शुभो के मुँह से रुना भाभी के बारे में सुनने के बाद से ही कालू और अधिक डर गया था और अब अपने घर से दुकान और दुकान से सीधे घर पहुँचता. कहीं किसी से कोई बेकार की बातें करना या समय बर्बाद करना; ये सब आदत उसकी रातों रात छूट गई.
चाय दुकान पर भी यदि शुभो से मिलता भी तो बस दस से पन्द्रह मिनट के लिए... फिर तेज़ क़दमों से चल कर सीधे घर पहुँचता.
देबू ने साथ उठना बैठना छोड़ दिया था.
शुभो और कालू ने उसे समझाने और मनाने की कोशिश की पर... सब व्यर्थ हुआ.
दिन किसी तरह कटते रहे...
अब बहुत कुछ पहले जैसा नहीं रहा.
एक दिन सुबह नींद से जागते ही शुभो को सीने पर दर्द होने लगा. कुछ चुभता हुआ सा लगा.
जल्दी से अपना टी शर्ट उतार कर देखा तो वो दंग रह गया.
उसके सीने पर ठीक वैसे खरोंचों के निशान थे जो आज से कुछ दिन पहले कालू ने अपने सीने पर दिखाया था. गहरे, टीस देते, सूजे हुए. आँखों पर से आश्चर्य के बादल हटते ही शुभो को असीमित भय के आवरण ने घेर लिया. उसके मन – मस्तिष्क में केवल भय ही भय बैठ गया. वह जल्दी से बिस्तर से उठा और कालू से मिलने के लिए तैयार होने लगा. पर तैयार होते होते ही उसे याद आया कि जब तक वो नहा धो कर, नाश्ता नहीं कर लेता तब तक घर के बाहर कदम नहीं रख सकता. ये एक ऐसा नियम था जो उसके परदादा के भी परदादा के ज़माने से चला आ रहा था और आज भी उसके दादाजी के साथ साथ उसके माता – पिता भी पूरे निष्ठा के साथ इस नियम का पालन करते हैं.
अतः तैयार होना छोड़ कर शुभो झट से बाथरूम में घुसा और नहाने लगा. मग से जब सिर पर पानी डालता और जब वह पानी बहते हुए सीने पर लगे घाव पे जा लगता तो घोर वेदना से शुभो सिहर उठता. अब तक उसे अंदाजन इतना तो समझ में आ ही गया था कि ये कोई मामूली खरोंच के दाग नहीं हैं अपितु कोई पराभौतिक मामला है.
नहा धो कर अपने कमरे में आया और जल्दी जल्दी कपड़े पहनने लगा. इसी दौरान उसने बिस्तर पर कुछ ऐसा देखा जो उसे थोड़ा अजीब लगा. बिस्तर पर उसके तकिये पर एक बाल था. चूँकि तकिया का कवर सफ़ेद रंग का था इसलिए अनायास ही उसकी नज़र तकिये पर चली गई थी. शुभो अपेक्षाकृत छोटे बाल रखता है और यहाँ ये बाल थोड़ा बड़ा था.
उत्सुकता ने शुभो को तकिये पास जा कर खड़ा कर दिया. शुभो थोड़ा झुका और अंगूठे और तर्जनी अँगुली की मदद से उस बाल को तकिये पर उठा कर अपने आँखों के बहुत पास ला कर देखा.
बाल सिर्फ़ बड़ा ही नहीं, वरन बहुत बड़ा था और निःसंदेह किसी स्त्री का था aurऔर साथ ही बाल का रंग पूरी तरह से काला न हो कर लाइट ब्राउन था.
एक के बाद एक दो बड़ी बातों ने शुभो के दिमाग का काम करना बंद कर दिया. पहले तो सीने पर खरोंच और अब तकिये पर एक स्त्री का बाल. पहला सुलझा नहीं की दूसरे ने और उलझा दिया.
मन ही मन सोचा,
‘किसी और से तो बात हो नहीं सकती इस बारे में. देबू तो सुनने वाला नहीं. बचा अब ये कालू. इस बाल के बारे में कुछ बता पाए या न बता पाए... इन खरोंचों के बारे में कुछ तो बता ही सकता है.’
जल्दी से नाश्ता खत्म कर वह कालू से मिलने उसके घर के लिए रवाना हो गया.
साइकिल से ज्यादा टाइम नहीं लगा कालू के घर तक पहुँचने में. उसके घर के बाहर उसकी छोटी बहन अपनी दो सहेलियों के साथ बैठी थी. शुभो को देखते ही खुश हो गई. दौड़ कर उसके पास गई और बोली,
“नमस्ते भैया... आप भैया से मिलने आए हैं?”
“हाँ छोटी... क्या कर रहे हैं तुम्हारे भैया? सो रहे हैं?”
“नहीं जाग रहे हैं. भैया, आप मेरे लिए लाए हैं?”
कहते हुए अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ा दी छोटी.
जीभ काटते हुए शुभो उदास चेहरा बनाते हुए बोला,
“सॉरी छोटी. आज जल्दी में था इसलिए भूल गया. कल पक्का ला दूँगा. ठीक है?”
सुन कर छोटी निराश हो गई. दिल छोटा हो गया उसका. एक शुभो ही था जो अक्सर ही उसे टॉफ़ी ला कर देता था. घर में सब उसे ज्यादा टॉफ़ी खाने से मना करते थे. पर छोटी जैसी कम आयु की लड़की क्या जाने टॉफ़ी खाने के फायदे या नुकसान.. अक्सर ही ज़िद करती रहती. कभी कभार कालू उसे दे देता था पर ये शुभो ही था जो छोटी को बहन से भी ज्यादा प्यार देते हुए उसे अक्सर ही तरह तरह के फ्लेवर वाले टॉफ़ी ला कर देता था.
अभी शुभो के मुँह से ‘ना’ सुनकर उसका दिल तो छोटा हो गया पर वो जानती है कि शुभो बाद में उसे ज़रूर टॉफ़ी देगा. इसलिए तुरंत ही मुस्करा कर बोली,
“अच्छा तो बाद में देंगे न?”
“बिल्कुल!”
“पक्का प्रॉमिस?”
“पक्का प्रॉमिस!”
“ओके. थैंक्यू!”
“अच्छा, चल अब बता... तेरे भैया अगर जाग रहे हैं तो किधर हैं?”
“घर के पीछे... पुआल घर में.”
“क्या? पुआल घर में..?? क्या बात है.. सुबह सुबह ही ग्राहक आ गए?”
“ग्राहक नहीं भैया... मैडम आईं है.”
“मैडम? कौन मैडम?”
“मैडम मतलब नहीं समझे? रुना मैडम आईं हैं!”
“क्या??”
शुभो के तो होश ही उड़ गए.
ऐसा कुछ सुनने की तो उसने कोई आशा ही नहीं की थी. सीने पर उभर आए घाव के साथ साथ जिस व्यक्ति विशेष के बारे में कालू से थोड़ा चर्चा करना चाहता था वो स्वयं ही यहाँ आ पहुंची है! पर क्यों? क्या वाकई उन्हें कुछ लेना – खरीदना है? या फ़िर....
??
छोटी को बाय बोल कर अपनी साईकिल वहीँ खड़ी कर के वो आहिस्ते क़दमों से चलता हुआ घर के पीछे पहुँचा. घर के सामने से पीछे तक पहुँचने में उसे कुल बाईस कदम चलने पड़े और घर के पीछे पहुँचने पर उसने देखा की पुआल घर थोड़ा और पीछे हट कर स्थित है जहाँ तक पहुँचने में अंदाजन उसे पंद्रह से सोलह कदम चलने पड़ेंगे.
उसने एक लंबी साँस ली, मानसिक तौर पर खुद को तैयार किया ताकि वहाँ पहुँचने पर अगर उसे कोई ऐसी वैसी भयावह दृश्य देखने को मिले तो वो घबराए न, ज़ोर पकड़ती धड़कनों की स्पीड को संयत करने का प्रयास किया और मन ही मन अपने ईश्वर को याद कर के आगे बढ़ा. उसका दायाँ हाथ उसके गले में पतले धागे से बंधे उसके कुलदेवता के एक छोटी सी ताबीज नुमा फ़ोटो पर थी. अपने कुलदेवता से अपनी रक्षा का और कोई अनुचित या अवांछित दृश्य न दिखने का प्रार्थना करता हुआ सधे पर धीमे कदमो से आगे बढ़ता रहा.
जैसे ही पुआल घर के एकदम पास पहुँचा; उसे दबी आवाज़ में किसी की हँसी सुनाई दी.
किसी भयावह दृश्य से सामना होने की परिकल्पना अब तक अपने मन मस्तिष्क में संजोए शुभो के लिए हँसी की आवाज़ बहुत ही अप्रत्याशित थी. एक तरह से झटका लगा उसे.
चारों तरफ पुआल ही पुआल. बगल में ही पुआलों के ढेर में उसे कुछ हलचल होती दिखी. शुभो तुरंत उस ओर बढ़ा.
और उस ओर जाने पर उसे जो दिखा; उसके बारे में भी उसने नहीं सोचा था.
पुआलों के ढेर पर रुना अधनंगी लेटी हुई थी और उसके बगल में कालू लेटा हुआ उसे प्यार किए जा रहा था.
इस दृश्य को देखते ही शुभो को फ़ौरन दो मिनट खुद को सँभालने में लग गए.
आँखों को हल्के से मसल कर वो दोबारा उस तरफ देखा.
सच में! रुना और कालू पुआल के ढेर में लेटे हुए आपस में प्यार करते हुए अपनी रंगीन दुनिया में खोए हुए हैं. कालू के हाथ रुना के आधे अधूरे कपड़ों के ऊपर से ही उसके पूरे बदन पर घूम रहे हैं और कालू खुद भी रुना के उभारों और गहराईयों की मस्ती में खोया हुआ उसे चूमे और प्यार किए जा रहा है.
दोनों को एक साथ ऐसी अवस्था में देख कर शुभो घोर अविश्वास से दोहरा हो गया. दिमाग सांय सांय करने लगा. उसके आँखों के सामने ही वे दोनों धीरे धीरे प्यार के सागर की गहराईयों में डूबते जा रहे थे.
“क्या कर रहा है बे?!”
शुभो ज़ोर से चिल्ला पड़ा.
अचानक ऐसी आवाज़ सुन कर रुना और कालू; दोनों ही बहुत बुरी तरह से डर कर हड़बड़ा गए. शुभो को देख कर दोनों एक झटके में उठ बैठे और जल्दी जल्दी अपने कपड़ों को ठीक करने लगे.
“रुको!”
शुभो फ़िर चिल्लाया.
दोनों हतप्रभ हो उसे देखने लगे. दोनों के चेहरों के रंग सफ़ेद पड़ चुके थे और चोरी पकड़े जाने के कारण भयभीत थे.
शुभो दो कदम आगे बढ़ कर फ़िर गुर्राया,
“अब अगर तुम दोनों में से किसी की भी एक ऊँगली तक हिली तो मैं चिल्ला चिल्ला कर सबको यहाँ इकट्टा कर लूँगा.
”
ये वाक्य ख़त्म होते ही पहले से बुरी तरह डरे कालू और रुना को जैसे साँप सूंघ गया. दोनों जड़वत वहीं बैठ गए.
“साले... कुत्ते.... तेरे को न जाने कितनी बार समझाया था पहले की चाहे जो भी हो जाए... इस चुड़ैल से दूर रहना. इसका कोई भरोसा नहीं. विवाहिता होते हुए भी अपने दूधवाले को अपने रूपजाल में फँसा चुकी है और अब तेरे पे डोरे डाल रही है. अबे पागल... तू ये तक भूल गया कि तूने ही सबसे पहले मुझे और देबू को बताया था उस दिन कि मिथुन के साथ तूने रुना को कई बार देखा है और जिस दिन वो मरा उसके पहले वाले दिन भी उसे इसी के साथ देखा था. आज खुद ही देख ले; तुझे और देबू को अधिकतर बातें याद नहीं रहती. देबू तो हम दोनों से दोस्ती तक तोड़ चुका है.. क्यों? कब हुआ ऐसा? जब से इसके प्रेमजाल में फँसा है तब से. मैंने बताया था तुझे इसकी काली आँखों के बारे में... फ़िर भी तू.... कैसे यार?!!”
शुभो एक साँस में बोलता चला गया. जो कुछ उसके मन में था सब कुछ बोलता चला गया. और वे दोनों चुपचाप सुनते रहे. यहाँ एक बात कालू और शुभो में से किसी ने गौर नहीं किया कि जब शुभो ने रुना और मिथुन के साथ वाले घटना का ज़िक्र किया तब रुना चौंक गई थी और तिरछी नज़रों से गौर से कालू को देखने लगी थी.
“देख यार शुभो, तू जो सोच रहा है .....”
कालू के बात को बीच में ही काटते हुए शुभो बोल पड़ा,
“हाँ... ये अच्छा है.. जब तक चोरी पकड़ी नहीं गई, तब तक सब ठीक है... पर जैसे ही पकड़ में आ जाओ तो कहो की जो दूसरे सोच रहे हैं वैसा कुछ नहीं है... हम्म... साले.. क्या कहना चाहता है तू....आं.. कि तू यहाँ रुना भाभी को लेटा कर उनकी मसाज कर दे रहा था.. या कपड़ों की फिटिंग देख रहा था ताकि नए कपड़े दिलवा सको? अबे इतना बेवकूफ़, नासमझ और लापरवाह कैसे हो सकता है तू? ये एक ख़तरनाक औरत है... तू नहीं जानता क्या? पहले तो बड़ा शक किया करता था... अब क्या हुआ?”
“यार... सुन..”
“अबे चुप... क्या सुनूँ मैं तेरी... और क्यों सुनूँ...? हाँ..?”
कहते कहते अचानक से शुभो की नज़र इतनी देर बाद दोबारा रुना पर गई जो अभी साड़ी के थोड़े से भाग से अपने बड़े वक्षस्थलों को ढकने का असफल प्रयास कर रही थी... और इसी में उसकी लंबी गहराई वाली वक्षरेखा बहुत कामुक रूप से दृश्यमान हो रही थी.. वह दृश्य इतना नयनाभिराम था कि कुछ पलों के लिए शुभो भी अपने पलकें झपकाने भूल गया.
पर तुरंत ही खुद को सम्भाला और ये सोच कर की कहीं उसकी ये हरकत इन दोनों ने न देख ली हो इसलिए वो अब रुना भाभी पर भी बुरी तरह बरस पड़ा. वो
भाभी जिसे वो बहुत सम्मान किया करता था. जिसे सोच कर ही उसका सिर स्वयमेव ही श्रद्धा से झुक जाया करता था.
“ये... इसी ने तेरा, मेरा, देबू का और न जाने कितनों का दिमाग ख़राब कर रखा है. विवाहिता होते हुए भी कितने ही परायों से सम्बन्ध बनाए घूमती रहती है. काम भी क्या करती है... शिक्षिका... हम्म... शिक्षिका हैं ये देवी जी...
जब शिक्षिका ही ऐसी हैं तो पता नहीं स्कूलों, विद्यालयों में पढ़ने वाले देश के भविष्यों का क्या भविष्य होगा...छि.. शर्म नहीं आती तुम्हें..??!”
रुना भाभी के लिए ‘आप’ से सीधे ‘तुम’ पर आ गया.
अनर्गल बातें बोलता हुआ शुभो को अपने द्वारा कही गई बातों का होश ही नहीं रह गया था और अत्यधिक भावना में बहते हुए गुस्से में रुना की ओर थूक भी दिया. हालाँकि थूक रुना के जगह से बहुत पहले ही गिर गई पर शुभो के इस कृत्य ने सहसा रुना के अंदर प्रतिरोध करने की शक्ति उत्पन्न कर दी.
शांत, मर्यादित, आहत भाव से बोली,
“शुभो... जो और जितना कह रहे हो; कहो... पर इसमें अपनी सीमा और मर्यादा को मत भूलो. चाहे मुझसे कैसी भी गलती हुई हो... मेरा दोष कैसा भी हो... तुम्हें इस तरह से मेरे साथ ऐसा बर्ताव करने का कोई अधिकार नहीं है!”
हर दक्ष शिक्षक और शिक्षिका में प्रतिवाद की एक अनूठी कला होती है और यह इस समय रुना के स्वर में स्पष्ट परिलक्षित हुई.
यहाँ तक की शुभो भी अपने कृत्य पर बुरी तरह शर्मिंदा हो गया.
परन्तु वो किसी भी हाल में इस समय रुना और कालू के सामने अपने बर्ताव के लिए क्षमा माँग कर खुद को उनके बराबर या उनसे छोटा करने के मूड में बिल्कुल नहीं था.
अतः मामले को थोड़ा सम्भालने का प्रयास करता हुआ बोला,
“मुझे आपसे किसी तरह का ज्ञान नहीं चाहिए मैडमजी. और तू (कालू की ओर ऊँगली से इशारा करता हुआ) ... तेरी भलाई इसी में होगी कि तू इस चरित्रहीन औरत का साथ आज से ही छोड़ दे. नहीं तो मैं तुम दोनों की करतूतों की खबर हर किसी को कर दूँगा. ख़ास कर आप (रुना की ओर इशारा करते हुए), अगर आपने भी अपना ये त्रिया चरित्र वाला खेल बंद नहीं किया न.. तो आपकी पोल खोलने में मैं रत्ती भर का समय नहीं गवाऊँगा. नबीन भैया को खुद जा कर बताऊँगा और अगर ज़रुरत हुआ तो प्रमाण भी दिखा दूँगा.”
नबीन बाबू को बता देने की धमकी को सुन रुना भय से काँप उठी. क्षण भर को तो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ पर शुभो के गुस्से से भरे चेहरे को देख कर ही समझ गई कि ये कोई कोरी धमकी नहीं है और ऐसा करने के लिए शुभो शत प्रतिशत दृढ़ प्रतिज्ञ है.
घृणा भरी नज़रों से दोनों को देख कर शुभो पीछे मुड़ा और वहाँ से जाने लगा. जब वो मुड़ रहा था तब रुना की नज़र उसके गले में बंधे ताबीज पर गई. उसकी भवें आगे की ओर सिकुड़ गई पर अगले ही क्षण नार्मल हो गई और साथ ही होंठों के कोने में एक हल्की मुस्कराहट उभर आई.
कुछ कदम चलने के बाद अचानक से शुभो को अपने पैरों में तेज़ दर्द महसूस हुआ और लड़खड़ा कर पास की झाड़ियों पर गिर पड़ा. बदन पर कुछ कांटे चुभ गए जिस कारण शुभो को असहनीय पीड़ा हुई.
कालू अपने दोस्त को ऐसे गिर कर दर्द से कराहते देख कर सहायता के लिए आगे बढ़ना चाहा पर अभी कुछ देर पहले हुई तकरार को याद कर के रुक गया.
कालू का आगे बढ़ना और तुरंत रुक जाना देख कर शुभो को भी बुरा लगा. वो कोई सहायता तो नहीं चाह रहा था पर मन के किसी कोने में एक क्षण के लिए आशा की दीप जल उठी थी कि शायद कालू हमदर्दी दिखाए.
पर कालू का यूँ रुक जाना शुभो के मन में अनचाहे ही विषैली भावनाओं की एक नयी पौधरोपण कर गई. साथ ही उसे इस बात की अनुभूति भी हुई कि अवश्य ही उसने ताव में आकर बहुत कुछ ऐसा कह दिया है जिससे उनकी मित्रता कहीं न कहीं थोड़ी दरक चुकी है.
ख़ुद को सम्भालते हुए शुभो उठा और वहाँ से चला गया.
क्रमशः ........
जारी.....)
कालू के घर से ले कर अपने दुकान तक और फ़िर अपने दुकान से लेकर देर शाम अपने घर तक हर पल शुभो को ऐसा लगता रहा की वो अकेला नहीं है. कोई न कोई हर पल उसके साथ है. उस पूरे दिन उसके दिमाग में एक साथ इतनी बातें चल रही थी कि वो किसी भी काम पे ध्यान नहीं दे पाया. हरेक काम में कोई न कोई गलती होती रही उससे. यहाँ तक की अपने सीने पर उभर आए उन तीन खरोंचों के निशान तक को भी भूल गया.
देर शाम जब वो किसी दूसरे चाय दुकान में एक छोटी बेंच पर बैठा चाय पी रहा था तब हरिपद के साथ भेंट हुई. दरअसल हरिपद अपने अधीनस्थ दोनों नाविकों को उस दिन का खर्चा दे कर बचे हुए पैसे लेकर घर की ओर ही जा रहे थे कि अचानक से तेज़ बारिश होने लगी. ये चाय दुकान बगल में ही था तो बचने के लिए तुरंत वहीं घुस गए.
गाँव के चाय दुकान वाले हो या दैनिक बिक्री वाले दूसरे दुकानदार.. हमेशा बड़े और खुले जगह पर दुकान खोला करते हैं. दुकान ऐसा रखते हैं की एक साथ दस आदमी अंदर आराम से बैठ जाए.
उस समय शुभो और चाय वाले जिष्णु काका को लेकर कुल चार लोग थे. अब हरिपद भी शामिल हो गए. हरिपद और जिष्णु काका अच्छे दोस्त थे. उनमें बातें शुरू हो गई. शुभो अपने ख्यालों में खोया हुआ चाय - बीड़ी ले रहा था. बारिश अभी और तेज़ हुई ही थी कि दौड़ता हुआ बिल्टू भी घुस आया दुकान में. वो भी घर की ओर जा रहा था. अचानक बेमौसम बरसात का किसी को अंदाज़ा नहीं था. इसलिए सब बिना छाता के थे.
बिल्टू तो भीग भी गया था. जल्दी से एक आमलेट, चार बॉयल्ड अंडे और एक चाय का आर्डर दे बैठा.
शुभो को देख चहकते हुए पूछा,
“और दोस्त... कैसे हो?”
शुभो ने एक नज़र बिल्टू की ओर देखा और फिर बीड़ी का एक कश लगाते हुए बोला,
“ठीक हूँ... अपनी सुनाओ.”
“बस यार... सब ठीक चल रहा है जगदम्बे की कृपा से.”
“हम्म.”
बिल्टू के उत्तर पर बहुत छोटा सा ‘हम्म’ कर के शुभो दोबारा अपने ख्यालों में खो गया.
“क्या बात है यार? मन उदास है क्या?”
“नहीं यार. ऐसी बात नहीं?”
“क्या ऐसी बात नहीं.. अभी मुझे आए दस मिनट भी नहीं हुए हैं कि तुमने इतने ही देर में दो बीड़ी खत्म कर के तीसरी जला ली. कोई तो बात है. कोई प्यार व्यार का चक्कर है क्या?”
“नहीं.. वो भी नहीं.”
“तो फिर क्या बात है... बताओ भाई.
”
बिल्टू के ज़ोर देने पर शुभो ने उसे रुना भाभी के बारे में बताने का सोचा. कहने ही जा रहा था कि उसकी नज़र गई पाँच कदम दूर बैठे हरिपद पर. एक हाथ में चाय की ग्लास और दूसरे में बेकरी वाला मोटा बिस्कुट लिए जिष्णु काका के साथ गप्पे लड़ाने में व्यस्त हैं.
हरिपद जिष्णु काका से कह रहे हैं,
“भाई.. सुना तुमने... परसों नदी के उस पार के तट पर फ़िर एक शव मिला... एक बत्तीस वर्षीया महिला का.”
“हाँ भई, सुना मैंने... बहुत बुरा. ये भी सुना की अभी चार साल ही हुए थे उसकी शादी को. पता नहीं अब उसके बच्चे का क्या होगा?”
कहते हुए जिष्णु काका अफ़सोस करने लगे.
उन दोनों की बातें सुनकर शुभो के मन में कुछ खटका. उसने ऐसी ही कोई बात करने की सोची बिल्टू के साथ...पर सीधे नहीं, घूमा कर,
धीरे से बोला,
“यार बिल्टू, एक बात पूछूँगा.. सही सही बताना.”
“हाँ बोल न.” सहमति जताने में बिल्टू ने देर नहीं की.
थोड़ा रुक कर शुभो पूछा,
“यार... तेरे को.. ये.. अम... ये... रु..रुना भाभी कैसी लगती है?”
प्रश्न सुनते ही बिल्टू आँखें बड़ी बड़ी कर के शुभो को देखने लगा. पूछा,
“क्यों बे? अचानक भाभियों में कब से तेरी रूचि जाग गई? और वो भी कोई ऐसी वैसी नहीं.. रुना भाभी!”
“अबे तू जो समझ रहा है वैसी कोई बात नहीं है. पर मैं जो कहना चाहता हूँ उसी से जुड़ा हुआ है.” शुभो ने उसे समझाते हुए कहा.
“हम्म.. देख भई, वैसे तो बड़ी मस्त लगती है. रस से भरपूर. पर मैं उन्हें गलत नज़र से नहीं देखता. बहुत सम्मानीय महिला हैं.” कहते हुए बिल्टू आँख मारी.
शुभो भी मन ही मन हँस पड़ा.
“सम्मानीय! हा हा हा”
फिर बोला,
“और?”
“और क्या?”
“पिछले कुछ दिनों से तुझे उनमें कोई परिवर्तन नहीं दिखा?”
“नहीं. और वैसे भी उतना देखना का समय कहाँ? सबको ताड़ता फिरूँगा तो काम कब करूँगा.. और जब काम नहीं कर पाऊँगा तब खाऊँगा क्या?”
तभी काका एक प्लेट आमलेट, चार बॉयल्ड अंडे और एक ग्लास चाय दे गए और बिल्टू चटकारे ले ले कर खाने लगा. उसे खाते देख शुभो को भी भूख लग गई और उसने भी आमलेट और चार अंडे आर्डर कर दिया.
उसने अभी आमलेट का एक टुकड़ा मुँह में रखा ही था कि अचानक उसे लगा जैसे किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा है. वो डर कर पीछे पलटा.
उसे यूँ पलटते देख कर बिल्टू पूछा,
“क्या हुआ?”
“क.. कु.. कुछ नहीं... बस ऐसे ही.”
शुभो ने खाने को निगलते और डरते हुए कहा.
पीछे कोई नहीं था.
मन का वहम समझ कर वो फिर खाने पर ध्यान दिया. इस बार फिर किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा. हाथ इसबार कंधे पर नहीं रुका. वो धीरे धीरे फिसलते हुए उसके पीठ पर से होते हुए उसके कमर पर आ कर रुक गया, जैसे उसके पीठ को सहला रहा हो.
शुभो ने तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया. उसने गौर किया... ये हाथ मरदाना हाथ जैसा सख्त नहीं अपितु बहुत कोमल है. तभी उसे अपने पीठ के निचले हिस्से पर कुछ चुभता हुआ सा प्रतीत हुआ.
वो लगभग उछल पड़ा.
उसके ऐसा करने से बिल्टू भी थोड़ा डर गया.
“अबे क्या हुआ?”
“क... कुछ...नहीं... म.. मच्छर!”
“तो कोई ऐसे उछलता है क्या... साला पूरा मूड ख़राब कर दिया.” बिल्टू गुस्सा करते हुए बोला.
अब तक वहाँ उपस्थित बाकी लोगों का भी ध्यान उन दोनों पर आ गया था.
शुभो फटाफट अपना खाना खत्म कर हाथ धो कर काका के पास गया बिल देने. जब पैसे देने लगा तब एक और घटना घटी. दो हाथों की चूड़ियाँ उसके ठीक कानों के पास खनक उठी. शुभो हड़बड़ा कर इधर उधर देखने लगा. इस बार भय से उसके होंठ सूख गए. सांसे तेज़ हो गई. उसकी ऐसी स्थिति देख कर जिष्णु काका और हरिपद काका को भी बहुत अचरज हुआ.
वो कुछ पूछे इसके पहले ही शुभो पैसे दे कर वहाँ से चलता बना.
साइकिल चलाते हुए अपने घर को जाता शुभो को रास्ते भर ऐसा लगता रहा कि कोई उसके साइकिल पर... पीछे बैठा ... या.. बैठी हुई है. बार बार लगता रहा कि कोई उसके कमर को पकड़ी हुई है और रह रह कर उसके पुरुषांग को छू रही है.
रात को खाते समय भी उसका दिमाग इसी उधेड़बुन में था कि आखिर कालू कैसे रुना भाभी के चक्कर में फंस गया? एक तो भाभी पहले से ही विवाहिता हैं.. दूसरे, उन्होंने देबू को फँसा रखा है... तो फ़िर अब कालू के साथ क्यों? क्या भाभी सच में इतनी बुरी हैं? क्या उनका एक से मन नहीं भरता? क्या यही है एक पढ़ी लिखी सम्भ्रांत भाभी का असली चेहरा?
खाना खत्म कर के अपने कमरे में सोने गया. एक पुरानी कहानी की किताब ले कर पढ़ने बैठ गया. देर तक रात तक बीड़ी फूँकता हुआ कहानी पढ़ता रहा और अपने साथ घट रही घटनाओं के बारे में सोचता रहा. उस कहानी के नायक को हमेशा कुछ न कुछ लिखने का शौक था और हमेशा ही थोड़ा सा समय निकाल कर एक मोटी डायरी में लिखता रहता था. शुभो के भी दिमाग में कुछ लिखने का आईडिया आया और ऐसा ख्याल दिमाग में आते ही एकदम से उठ बैठा और एक मोटी कॉपी ले कर शुरू के कुछ पन्ने छोड़ कर उसमें कुछ लिखने लगा.
करीब चालीस मिनट तक लिखने के बाद उसे अच्छे से अपने सिरहाने बिस्तर के गद्दे के नीचे रख दिया और सो गया.
उसे सोए घंटे भर से ज्यादा का टाइम बीता होगा कि कमरे में हो रही कुछ खटपट की आवाज़ों से उसकी नींद टूट गई.
उसने जैसे ही उठने का कोशिश किया; आश्चर्य का ठिकाना न रहा.
वो तो हिल भी नहीं पा रहा है!
उसने फिर प्रयत्न किया... वही नतीजा!
घबराहट में वो छटपटाने लगा. पर सिवाय अपने सिर को दाएँ बाएँ घूमाने के और कुछ न कर सका. शुभो ऐसा लड़का है जो ऐसी परिस्थितियों के कल्पना मात्र से ही बुरी तरह सिहर उठता है.. लेकिन आज.. अभी... ऐसा ही कुछ साक्षात् घटित हो रहा है उसके साथ. वो बुरी तरह हांफने और कांपने लगा. साँसें इतनी तेज़ हो गई कि साँस ठीक से लेना भी एक चुनौती बन गई.
और तभी!
कमरे में पायल की रुनझुन सुनाई दी ! बहुत मीठी आवाज़!
लेकिन ऐसी परिस्थितियों में ऐसी आवाजें डर को बढ़ा देती है..
सुकून नहीं देती.
अपनी साँस पर नियंत्रण पाने की व्यर्थ चेष्टा करता शुभो दरवाज़े के पास एक हिलती परछाई देख कर और भी ज्यादा डर गया. बगल के कमरे में सो रहे अपने माँ बाबूजी को आवाज़ लगाना चाहा.. पर ये क्या? उसकी तो आवाज़ भी नहीं निकल रही. रात के सन्नाटे में ज़ोरों से चलती धड़कन उसे अपने सीने पर हथौड़े से पड़ते मालूम होने लगे. पूरे बदन पर पसीने की बूँदे छलक आईं. इतने देर बाद उसने गौर किया... उसके बदन पर से उसकी सैंडो गंजी (बनियान) गायब है!
‘मैं तो पहन कर ही सोया था...त... तो...’ इसके आगे सोचने से पहले ही उसकी नज़र उसी काली परछाई पर चली गई जो अब उसके बहुत पास आ गई थी.
‘ये.. ये... तो... कोई.... स्त्री.... है...’
डरते हुए शुभो ने धीरे से पूछा,
“क.. कौन हैं... आप?”
“श्श्शश्श्श...”
उस स्त्री के होंठों से एक शीत लहरी जैसी धीमी आवाज़ निकली. उसकी दायीं हाथ की तर्जनी ऊँगली उठी और धीरे धीरे आगे बढ़ती हुई शुभो के होंठों पर जा कर रुकी. फिर धीरे से नीचे उतरते हुए उसके सीने पर लगे खरोंचों तक पहुंची और उन घावों पर ऊँगली गोल गोल घूमने लगी.
और एकदम अचानक से तीन ऊँगलियों के नाखून उन घावों में धंस गए. अत्यधिक पीड़ा से बेचारा शुभो तड़प उठा. मारे उस दर्द के वो ज़ोरों से चीखना चाहा पर आवाज़ तब भी न निकली.
अब वो औरत धीरे से अपने नाखूनों को उसके सीने के घावों में से निकाली और अपने होंठों पर रख दी. इस अंधकार में भी शुभो कैसे उस औरत के अधिकांश हिस्सों को देख पा रहा है ये भी एक बहुत बड़ा आश्चर्य था उसके लिए.
नाखूनों पर लगे खून को अपने लंबे लाल जीभ से चाटने लगी वो. स्वाद लेने का तरीका ही बता रहा था कि उसे वो खून बहुत स्वादिष्ट लगा है. इधर शुभो के सीने पर से खून की एक धारा बह निकली जो अब धीरे धीरे बिस्तर पर बिछे चादर पर लग कर फैलने लगी.
पीड़ा और भय के मिले जुले भाव चेहरे पर लिए शुभो अब उस औरत के अगले कदम के बारे में सोचने लगा. अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. वो औरत उसके पास से उठ कर उसके पैरों के तरफ गई. बिस्तर पर नहीं बैठ कर शुभो के नज़रों के एकदम सीध में ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ कर शुभो के पैरों के तलवों को अपने नाखूनों से सहलाने लगी. सहलाते सहलाते वो ऊपर उठी और धीरे धीरे उसके जाँघों तक आई और एक झटके में उसके हाफ पैंट को दोनों साइड से पकड़ कर नीचे खींच दी.
अब शुभो का नग्न पुरुषांग उन दोनों के ही सामने था.
उस औरत ने दाएँ हाथ की अंजुली बना कर बड़े प्यार से उसके अंग (लंड) को हाथ में ली और अंगूठे के हल्के स्पर्श से मसलने लगी. तभी बादलों से ढके आसमान में एक ज़ोरदार गर्जन हुई और बिजली चमकी.
बाहर भयानक तूफ़ान शुरू हो गया था...
बिजली के चमकने से कमरे में थोड़ी रौशनी हुई और उसी रौशनी में शुभो ने गौर किया कि इस औरत के कपड़े बिल्कुल वैसे ही हैं जैसा सुबह रुना भाभी के बदन पर देखा था!
दुर्भाग्य से चेहरा न देख सका उस औरत का.
बीच बीच में उस औरत की हँसी सुनाई दे रही थी. दबी हुई हँसी. मानो लाख चाह कर भी अपना हँसी नहीं रोक पा रही है वो औरत.
उस औरत के हाथ के स्पर्श से ही शुभो का पुरुषांग धीरे धीरे फूलने लगा और कुछ ही क्षणों पश्चात् अपने पूरे रौद्र रूप में आ गया. उस औरत का हाथ उसके पूरे अंग पर फिसलने लगा और पतली उँगलियाँ मानो उस अंग की मोटाई और लम्बाई माप रही हो. और मापने का भी क्या अंदाज़ है.... चरम उत्तेजना में पहुँचा दे रही है.
तभी फिर बिजली चमकी.
और इस बार जो देखा शुभो ने वह देख उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ... भय से रोम रोम उसका खड़ा हो गया. कुछ देर पहले तन मन में छाई यौन उत्तेजना अब क्षण भर में गायब हो गई.
उस औरत की आँखें पूरी तरह से काली थीं और आँखों के कोनों से खून की पतली धारा बह रही थी. आँचल कई फोल्ड लिए बाएँ वक्ष के ऊपर थी. दायाँ स्तन ब्लाउज कप के ऊपर से ऐसे फूल कर उठी हुई थी मानो अभी फट पड़ेगी. गले पर चमकती एक मोटी चेन उसके लंबे गहरे वक्षरेखा में घुसी हुई थी. दोनों हाथों में सोने की मोटी मोटी चूड़ियाँ... कानों में सोने के चमकते झुमके. दोनों भवों के बीचोंबीच एक लम्बा पतला तिलक... शायद काले रंग का है...
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“आ...आप....?!”
बस इतनी सी ही आवाज़ निकली शुभो की. उसके बाद तो शब्दों ने जैसे साफ़ मना कर दिया बाहर आने से.
होंठों के कोने में दुष्टता वाली मुस्कान लिए एकटक शुभो को कुछ देर तक देखने के बाद धीरे धीरे झुकते चली गई... और तभी शुभो को अपने जननांग पर कुछ गीला सा लगा. सिर उठा कर देखा... तो... वह औरत उसके पुनः खड़े हो चुके अंग को अपने मुँह में भर ली थी और किसी छोटे बच्चे के मानिंद आँखें बंद कर बड़े चाव और सुख से उसे चूसने लगी थी.
झुके होने के कारण स्त्री के दोनों वक्षों के अनावृत अंश रह रह कर उसके जाँघों पर रगड़ खा रहे थे जोकि शुभो के बदन में एक सनसनाहट पैदा कर रही थी.
सारा डर भूल कर शुभो आँखें बंद कर अब सिर्फ़ मुखमैथुन का आनंद लेने लगा.
मन ही मन कहने लगा,
“प्लीज़... मत रुकना... रुकना... मत...”
पल प्रति पल जैसे जैसे उस स्त्री का चूसने का गति बढ़ता गया वैसे वैसे शुभो चरम सुख से आत्मविभोर हो पागल सा होता गया. शहर जा कर कुछेक बाजारू लड़कियों से यौन सुख प्राप्त किया अवश्य था पर किसी के इस तरह चूसने से भी ऐसी चरम सुख वाली अवस्था प्राप्त होती है यह आज उसे पहली बार पता चला.
वो औरत बड़ी ही दक्षता से उसके पुरुषांग के मशरूम से लेकर जड़ तक और फिर जड़ से लेकर मशरूम सिर तक जीभ से भिगाती हुई चूम और चूस रही थी. ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर तक...
हरेक इंच को छूती, हर शिराओं का अहसास करती और कराती वो औरत शुभो को यौनोंमांद में पागल किए दे रही थी.
ऐसा कुछ भी आज से पहले उसने कभी अनुभव नहीं किया था.
इसलिए ज्यादा देर तक मैदान में न टिक सका.
कुछ ही समय बाद उसका वीर्यपात हो गया. लेकिन वो औरत फ़िर भी नहीं रुकी... चूसते रही. चूसते ही रही.
उसके वीर्य के एक बूँद तक को व्यर्थ नहीं जाने दी... सब निगल गई. एक क्षण के लिए रुक कर बड़े कामुक अंदाज़ में अपने होंठों पर जीभ फ़िरा कर सम्भावित बचे हुए वीर्य की बूँदों को चाट ली और फ़िर उसके जनेन्द्रिय को पूरे अधिकार से अपनी मुट्ठी की गिरफ्त में ले कर चूसना प्रारंभ कर दी.
शुभो को वाकई बहुत मज़ा आया लेकिन वीर्यपात होने के साथ ही वो आहिस्ते आहिस्ते चेतनाशून्य हो गया.
कुछ और समय बीता....
बाहर उठा तूफ़ान अब शांत हो चुका था...
और इधर धीरे धीरे शुभो का शरीर भी ठंडा होता चला गया.....
.....निष्प्राण.
१०)
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इंस्पेक्टर रॉय बहुत पास से निरीक्षण कर रहे थे. अपने चौदह वर्ष के पुलिसिया जीवन में ऐसा केस आज से पहले कभी नहीं देखा उन्होंने. इसलिए सिर्फ़ बाहरी मुआयने से ये पता कर पाना बेहद मुश्किल है की जो वो देख रहे हैं वो एक्चुअली है क्या?
सामने एक मृत देह है.
तो ये स्वाभाविक है की मृत्यु ही हुई है.
पर हुई कैसे?
क्या सीने पर थोड़े सूखे थोड़े गहरे ये तीन खरोंच इसकी मृत्यु के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं?
इसका बनियान इसके उल्टे दिशा में पैरों के पास पड़ा है.
साधारणतः ऐसा होता नहीं है कि किसी ने बनियान उतारा और उसे पैरों के पास फेंक दिया हो.
अच्छा चलो मान लेते हैं की इसी ने ऐसा किया... पर प्रश्न अभी भी ये रह जाता है कि.....
“सर, कमरे में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला.”
रॉय के आगे और कुछ सोचने से पहले हवलदार श्याम ने उसे अपनी रिपोर्ट दी.
रॉय जरा से पलट कर हवलदार को देखा और एक गम्भीर और दीर्घ ‘ह्म्म्मम्म’ करते हुए दोबारा सामने बिस्तर पर पड़े उस शव को देखने लगा. श्याम भी बगल में आ कर खड़ा हो गया.
“क्या लगता है श्याम.. किसने और कैसे मारा होगा इसे?”
“मेरे को तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है सर. दरवाज़े और खिड़की से जबरन अंदर घुसने का कोई प्रमाण नहीं मिला. और ऐसा होना तो इसी बात की ओर संकेत करता है कि अगर कोई आया था तो ये लड़का उसे अवश्य जानता होगा और इसी ने उसे कमरे में आने दिया होगा. पर एक सवाल फ़िर भी रह जाता है.”
“कैसा सवाल?”
“यही की अगर कोई आया ही था तो फ़िर घरवालों को इस बात की कोई खबर क्यों नहीं है? किसी के आने से साफ इंकार कर दे रहे हैं. इनका कहना है की कल उतनी तेज़ बारिश और आँधी में कोई कैसे अपने घर से निकल कर किसी ओर के घर जा सकता है.”
“गुड. वैरी गुड श्याम. नाईस क्वेश्चन. तुमने अपना काम बहुत अच्छे से किया है.
रहा सवाल इन घर के सदस्यों का तो अगर वाकई कल कोई आया था और ये बताने से इंकार कर रहे हैं तो निश्चित ही ये लोग झूठ बोल रहे हैं... और यदि ये लोग सच कह रहे हैं तो इसका मतलब ये हुआ की कोई आया तो अवश्य ही था पर शायद किसी दूसरे रास्ते से.”
कहते हुए रॉय कमरे की दो खिड़कियों में से एक की ओर घूम गया और धीरे क़दमों से, सावधानी से चलते हुए उस खिड़की के पास जा खड़ा हुआ और उसके पल्लों / पलड़ों को बहुत गौर से देखने लगा.
तभी श्याम को एक सिपाही आ कर कान में कुछ कहता है जिसे सुनकर श्याम बड़ी तत्परता से रॉय की ओर देखते हुए बोला,
“सर, मेडिकल टीम आ गई.”
रॉय ने अपना रिस्टवाच देखा, अफ़सोस में थोड़ा सिर हिलाया और धीरे से बोला,
“आज फ़िर आधा घंटा लेट.”
खिड़की से हट कर रॉय दोबारा उस शव के पास आ कर खड़ा हो गया और उसके आस पास के चीज़ों को सावधानी से देखने लगा.
पाँच मिनट के अंदर ही मेडिकल टीम कमरे में आ गई. उनके कमरे में दाखिल होते ही रॉय टीम के हेड की ओर मुस्कराते हुए आगे बढ़ा और अपना हाथ आगे करता हुआ बोला,
“आइए आइए, पार्थो दा. आप ही का इंतज़ार हो रहा था.”
“अरे अब मत पूछिए सर. आ तो कब का गया होता... पर सुबह सुबह आँख कमबख्त जल्दी खुलती भी तो नहीं.”
“क्यों दादा, रात में बहुत देर तक काम करते हैं क्या?”
“नहीं... काम होता ही कहाँ है आजकल ज्यादा करने को.”
“तो फ़िर? घर में सब ठीक तो है न?”
“अरे नहीं भाई.. सब कहाँ ठीक है?!”
पार्थो दा बहुत ड्रामेटिक स्टाइल में रोनी सूरत बनाते हुए बोले.
उनकी शक्ल देख कर रॉय तनिक चिंतित होता हुआ पूछा,
“क्या हुआ दादा, ऐसे क्यों बोले रहे हैं..? क्या हुआ घर में? लेट क्यों हुआ आपको??”
रॉय की ओर देखते हुए पार्थो दा एक आँख बंद करते हुए बोले,
“तुम्हारी बोउदी (भाभी) को हर रात चाहिए होता है. वो एक नहीं, तीन तीन बार! क्या करूँ.. विवाहित हूँ न... मना भी तो नहीं कर सकता. दायित्व का निर्वहन करना पड़ता है. इसी कारण देर से सोता हूँ और सुबह देर से आँख खुलती है.”
रॉय तुरंत समझा नहीं. पर जैसे ही समझा; दोनों हो हो कर के हँस पड़े.
आस पास खड़े मेडिकल टीम के दूसरे सदस्य और पुलिस के सिपाही कुछ समझे तो नहीं कि ये क्यों हँस रहे हैं पर उन्हें इस प्रकार हँसता देख कर वे लोग भी अपनी मुस्कराहट को रोक नहीं सके.
उस समय कमरे में ही उपस्थित घर के दो सदस्यों ने इस प्रकार के इंसेंसिटिव बर्ताव के लिए आपत्ति जताना चाहा पर हवलदार श्याम जल्दी से उनको साइड में ले जा कर बोला,
“देखिए, आप लोग कृप्या शांत रहें. मैं जानता हूँ की आप लोग को इनका ये व्यवहार काफ़ी आपत्तिजनक लग रहा है. विश्वास कीजिए... ये ऐसा आदतन नहीं कर रहे.. दरअसल अधिकतर ऐसे केस पिछले कई महीनों से विभिन्न गाँवों से आ रहे हैं और पिछले तीन महीने से आपके गाँव से आना जारी है... कभी नदी के तट पर तो कभी गाँव में.
इस प्रकार हमेशा मृत देह देखना और देख कर स्वयं को संतुलित रख पाना सरल नहीं होता. इसलिए काम के शुरुआत में ही या बीच बीच में कुछेक शब्द ऐसे बोल लेते हैं जिनसे इनका मानसिक स्थिति ठीक रहे और ये सकुशल अपना निर्धारित कार्य कर सकें. आप लोग हमारी परेशानी को भी कृप्या समझने का प्रयास करें. हम पुलिस वाले आप ही की तरह जीता जागता मानव हैं और आपकी और समाज की सहायता के लिए ही सदैव तत्पर रहते हैं. इसलिए करबद्ध निवेदन है आपसे की कृप्या मामले को गम्भीरता से न लें, शांत रहें और सहयोग करें.”
इतना कह कर हवलदार ने परिवार जनों के सामने हाथ जोड़ा और अपनी स्थिति समझाने का भरसक प्रयास किया. उसका ये प्रयास तत्काल अपना रंग भी दिखाया और सब ने हवलदार की बात को मान लिया.
इधर रॉय और पार्थो दा ने भी जब देखा की उनकी इन हरकतों से दूसरों में रोष हो रहा है तो उन दोनों ने भी जल्दी से अपना अपना पोजीशन सम्भाला और काम करने लगे.
इंस्पेक्टर रॉय की ही तरह पार्थो दा को भी इस शव ने कुछ पलों के लिए विस्मित कर दिया.
रॉय से एक दो सवाल और करने के बाद पार्थो दा अपने कलीग को कुछ निर्देश देने लगे और खुद भी बारीकी से शव का मुआयना करने में जुट गए. तब तक रॉय भी हवलदार श्याम और दूसरे सिपाहियों के साथ जाँच संबंधी दूसरे दिशा निर्देशों को ले कर जानकारी देने लगे.
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चार दिन बाद,
इंस्पेक्टर रॉय थाने में अपने कमरे में बैठा दूसरे कई फाइलों में खोया हुआ था कि तभी हवलदार श्याम आया,
“सर!”
श्याम को देखते ही रॉय ने तुरंत उसे आने का निर्देश दिया,
“हाँ श्याम, अंदर आओ.”
बड़ी तत्परता से श्याम अंदर आ कर सैल्यूट मार कर सावधान के मुद्रा में खड़ा हुआ. रॉय टेबल पर रखे चाय के ग्लास को उठा कर होंठों से लगाते हुए पूछा,
“कहो श्याम ... क्या रिपोर्ट लाए हो? और सुनो.. प्लीज कोई अच्छी बात सुनाना. ऐसे केस ने सुबह से ही सिर दर्द दे रखा है.”
हाथ में थामे हुए फाइल को रॉय की ओर बढ़ाते हुए श्याम ने कहा,
“कुछ खबर तो है पर अच्छी या बुरी ये नहीं जानता....”
“ओके.. आगे बोलो.” ग्लास को रख फाइल के पन्नो को पलटते हुए रॉय ने कहा.
“सर, पार्थो सर ने ये फाइल देते हुए मुझे आपसे पाँच बातें कहने को कहा था,
पहला, इस लड़के, मतलब की शुभोजीत बनर्जी उर्फ़ शुभो को सडन माइल्ड हार्ट अटैक हुआ था.
दूसरा, इस लड़के को एकाएक खून की कमी हुई थी.. अब ये कमी हार्ट अटैक से ठीक पहले हुई थी या बाद में इस पर पार्थो सर अभी और जाँच करेंगे.
तीसरा, इस बात की पूरी सम्भावना है कि मरने से ठीक पहले ये लड़का सेक्सुअल एक्टिविटी में लिप्त था.
चौथा, उस बिस्तर से एक लम्बा बाल पाया गया है जो लाइट ब्राउन रंग का है और सम्भवतः किसी महिला की है. और ये महिला अंदाजन तीस से चालीस के बीच की आयु की होगी.
और पाँचवा....
”
बोलते हुए कुछेक सेकंड्स के लिए हवलदार श्याम रुक गया. लगा जैसे वो खुद पशोपेश में है.
“और पाँचवा क्या श्याम? आगे बोलो.”
उसे बोलते हुए चुप होता देख रॉय की भी उत्सुकता एकाएक बढ़ गई.
“सर, पार्थो सर ने पाँचवीं बात ये कहा है कि आज तक उस गाँव में जितने भी शव बरामद हुए हैं; उन सबके पास से ऐसे ही एक लम्बा बाल पाया गया है और पिछले दो सालों में ये इक्कीसवीं बार है.”
“ओह! ये तो बहुत बुरी बात है. दो साल में इक्कीस शव?! ये तो बहुत चिंतनीय विषय है.... ह्म्म्म.... (कुछ सेकंड्स चुप रहने के बाद).... पर इसी में एक काम की खबर भी है. एक कॉमन बात जो अब तक के सभी शवों के पास से पाया गया है.”
एक विजयी मुस्कान से रॉय श्याम की ओर देखते हुए बोला.
“आप उन लंबे बालों की बात तो नहीं कर रहे हैं सर?” श्याम ने प्रश्न के रूप में अपना मत प्रकट करने का प्रयास किया.
“हाँ.. श्याम. बिल्कुल. मैं इसी कॉमन चीज़ की बात कर रहा हूँ. यही एक ऐसा क्लू बन सकता है हमारे लिए जो अब तक के हुए सभी हत्याओं का......” ख़ुशी से चहकते रॉय का चेहरा एकदम से फक्क पड़ गया.
पैकेट से निकला सिगरेट दोबारा पैकेट में आधा घुस गया.
रॉय की अचानक से ऐसी प्रतिक्रिया को देख कर आश्चर्य करता हुआ श्याम उससे कारण पूछा.
चिंतित रॉय तुरंत कुछ न बोला.
फिर टेबल के नीचे रखे बोतल को उठा कर पानी पीने के बाद एक दीर्घ श्वास लेता हुआ बोला,
“बात वहीँ अटक गई श्याम.”
“कैसे सर?”
उत्सुकता ने श्याम को अधिक देर न करने दिया प्रश्न करने के लिए.
सिग्रेट जलाते हुए रॉय बोला,
“अब मुझे भी याद आ रहा है श्याम, जितने भी लंबे बाल मिलने वाले केस हुए हैं वो सब या तो गाँव में या गाँव से सटे हुए उस जंगल में हुए हैं... और सब के सब पुरुषों के शव थे... लड़कों के थे. उन केसेस को अगर ले लें तो शायद इक्कीस हुए होंगे लेकिन उस नदी का क्या? कुछेक अपवाद छोड़ दें तो वहाँ से तो हमेशा स्त्रियों के ही शव मिलते आए हैं आज तक. उस नदी के दक्षिण दिशा से सम्बन्धित अब तक हुए मृत्यु के कुल योग का क्या? क्या वहाँ के शवों से हमें लंबे बाल मिले हैं? बोलो श्याम.”
श्याम एकदम से चुप हो गया.
इंस्पेक्टर रॉय ने ये बहुत ही अच्छा और पते का प्रश्न किया था. लंबे बाल मिलने की आंशिक सफ़लता की ख़ुशी में हवलदार श्याम खुद इस पॉइंट को भूल गया था कि ये लंबे बालों वाला केस तो सिर्फ़ गाँव और उससे जुड़े जंगल से से हैं. आखिर नदी के दक्षिणी तट से मिलने वाले शवों के दोषी के बारे में भी तो पता लगाना है.
अधिकांश शव उस गाँव की ही किसी महिला या फ़िर कम आयु की अविवाहित लड़कियों की थी और उन सभी शवों पर इतनी बुरी तरह से दुष्कर्म करने के संकेत मिले थे कि कोई भी सभ्य सम्भ्रांत मनुष्य उन शवों को देख कर ही या तो तुरंत दृष्टि फेर ले या उल्टी करना शुरू कर दे.
कुछ देर तक इंस्पेक्टर रॉय और हवलदार श्याम यूँ ही सोचते रहे. जब कुछ समझ में नहीं आया तो रॉय ने ही बात शुरू की,
“गाँव वालों से पूछताछ हुई?”
“जी सर, हुई. गाँव के ही जिष्णु चाय वाला, हरिपद नौका वाला और बिल्टू दूधवाला, इन तीनों का कहना है कि जिस रात शुभो का देहांत हुआ उसी शाम को वो काफ़ी भटका और बहका हुआ सा लग रहा था. उसके बर्ताव से उसके अलावा उसके साथ किसी और के होने का आभास हो रहा था. बिल्टू दूध वाले का कहना है कि वो पहले हरिपद और जिष्णु काका के बीच होने वाले नदी में हुए एक दुर्घटना की बातें सुनता रहा और फिर अचानक से उससे, यानि बिल्टू से रुना भाभी के बारे में पूछने लगा.....”
“एक मिनट... ये रुना भाभी कौन है?”
“सर, रुना भाभी अर्थात् रुना मुखर्जी इसी गाँव में ही रहती हैं और एक शिक्षिका हैं. उनके पति श्री नबीन मुखर्जी पोस्ट ऑफिस में हेड क्लर्क के पद पर कार्यरत हैं. शिक्षिका होने के कारण उनका बहुत मान - सम्मान है इस गाँव में. गाँव का हर छोटा – बड़ा उनके प्रति आदर व श्रद्धा का भाव रखता है. पहले स्कूल से लौटने के बाद घर में ही छोटे बच्चों को मुफ्त का पढ़ाती भी थी पर अब घर के काम बढ़ जाने के कारण नहीं पढ़ाती हैं.”
“और ये बिल्टू.... ये तो वही....”
“जी सर, ये उसी तुपी काका का भांजा है. तुपी दूध वाले का. जिनका नौकर, जिसे वे अपना बेटा समान मानते थे; ‘मिथुन’ की मृत्यु हुई थी करीब महीने भर पहले.”
“हम्म....”
रॉय कुछ पल सोचता रहा और फ़िर अपने टेबल के सबसे ऊपर के दराज से एक मोटा सा कॉपी निकाल कर उसके पन्ने पलटने लगा. ये वही कॉपी है जिसमें उस रात शुभो ने कुछ बातें लिखी थीं. बॉडी को मेडिकल टीम के ले जाने के बाद रॉय ने बिस्तर को चेक किया था और गद्दे के नीचे से यह कॉपी बरामद हुई थी.
सात में से तीन पन्नों को पढ़ने के बाद रॉय ने एक लम्बा कश लगा कर सिगरेट ऐशट्रे में डाल कर बुझाया और बड़े गम्भीर और चिंतित मुद्रा में कहा,
“बड़ा पेंच है इस पूरे मामले में. श्याम, एक काम करो, कल ठीक दस बजे... नबीन, रुना, तुपी काका, उनकी बीवी सीमा, भांजा बिल्टू, हरिपद, जिष्णु और शुभो के दोनों दोस्त देबू और कालू को यहाँ हाजिर करो. कल दस बजे का मतलब बिल्कुल दस बजे ही... मुझे ये सब यहाँ चाहिए... इज़ दैट क्लियर?”
पूरी सतर्कता और जोश में श्याम बोला,
“यस सर!”
११)
अगले दिन सुबह ठीक दस बजे थाने के बाहर पुलिस की जीप आ कर रुकी.
इंस्पेक्टर रॉय उतरा और थाने की सीढ़ियाँ चढ़ा.
दरवाज़े के दोनों तरफ दो सिपाही अपनी अपनी राइफलें ले कर सतर्क बैठे थे... रॉय को देखते ही झट से खड़े हो कर सैल्यूट किया. रॉय ने हाथ उठा कर उनके सैल्यूट का उत्तर दिया.
अंदर अपने टेबल के सामने हवलदार कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था. उसने भी रॉय को देख कर खड़े हो कर सैल्यूट किया. रॉय ने भी पहले जैसे ही उत्तर दिया.
हवलदार के बैठने के स्थान के ठीक बगल में; दाएँ साइड रॉय का कमरा है.
कमरे में घुसने से पहले रॉय ठिठक गया. सिर घूमा कर देखा; आज और दिन के मुकाबले कुछ ज्यादा ही लोग आए हैं. उसने प्रश्नसूचक दृष्टि डाली श्याम पर. श्याम ने तुरंत आँखों के इशारे से ही कुछ कहा रॉय को जिसे रॉय एक क्षण में ही समझ गया.
बेंच और चेयरों पर बैठे लोगों की ओर एक नज़र देख कर श्याम को बोला,
“तुम पाँच मिनट बाद अंदर आना.”
“यस सर!”
अपने कमरे में जाने के बाद सबसे पहले रॉय ने टेबल पर पहले से रखे ग्लास से पानी पिया, फिर अपने पॉकेट से अपने भगवान की फ़ोटो निकाल कर उन्हें प्रणाम किया और फिर अपने गुरुदेव के फ़ोटो को.
फ़िर आराम से अपनी कुर्सी पर बैठा.
सामने कुछ फाइलें रखी थीं.
उनमें से दो – तीन फाइल के पन्ने पलट कर देखा, दूसरे पॉकेट से सिगरेट का पैकेट निकाला, सिगरेट सुलगाया और ऊपर चलते पंखे की ओर देखते हुए मन ही मन कुछ बातों को क्रमवार सजाने लगा.
ठीक पाँच मिनट बाद ही दरवाज़े पर श्याम आया और विनम्र स्वर में बोला,
“आपने बुलाया था सर?”
श्याम के आवाज़ से विचारों के उधेड़बुन से बाहर आया रॉय ने पहले श्याम की ओर देखा और फ़िर उसपर से नज़रें हटा कर सामने रखे आधे खाली ग्लास की ओर देखते हुए बोला,
“हाँ... सुनो.”
श्याम अंदर आया और सैल्यूट मार कर सावधान की पोजीशन में खड़ा हो गया.
“श्याम... सब आ गए हैं?”
“जी सर!”
“किसी ने भी नखरे दिखाए... ना नुकुर किया?”
“दो – तीन ने किया सर.”
“दो – तीन?! कौन कौन?”
“नबीन, उनकी पत्नी रुना और जिष्णु चायवाला.”
“बाकी सब तैयार हो गए थे?”
“सभी कुछ न कुछ कहना चाहते थे शायद... पर पुलिस के डर के कारण शायद कुछ बोला नहीं गया इनसे, सर.”
“हम्म... और कोई नयी बात?”
“नहीं सर, फिलहाल नहीं. पर इतना ही की नबीन और दूसरे जन बोल रहे हैं कि उन्हें जल्दी छोड़ दिया ताकि तुरंत अपने काम पर जा सके.”
“हाँ.. हाँ.. ऐसा ही होगा... अब तुम जाओ और अगले दस मिनट बाद एक एक कर के सब को भेजना. जब कोई एक आए तो तुम भी यहाँ रहोगे? ओके?... और बद्री को बोलो बाहर तुम्हारे काम को तब तक वो सम्भाले.”
“यस सर.”
“और ये लो... ये लिस्ट है.. जिसका जिस नम्बर पर नाम है उसे वैसे ही अंदर भेजना.”
“यस सर.”
कह कर श्याम सैल्यूट दे कर कमरे से निकल गया.
इधर, उसके बाहर निकलते ही रॉय जल्दी से आँखें बंद कर अपने उन्हीं विचारों पर फिर से ध्यान केन्द्रित कर दिया.
ठीक दस मिनट बाद हवलदार श्याम अंदर आया और रॉय से अनुमति लेने के बाद एक एक कर सबको बुलाने लगा.
सबसे पहले हरिपद को बुलाया गया.
रॉय ने उसे टेबल के विपरीत अपने सामने वाले चेयर पर बैठने को कहा.
उसके बैठते ही रॉय ने अपने दाएँ हाथ की ऊँगलियों से कुछ इशारा किया श्याम को जिसे सिर्फ़ श्याम ही समझ सकता था. हरिपद का ध्यान तो इस तरफ गया ही नहीं.
उस बेचारे का तो डर से ही हालत ख़राब हुए जा रहा था कि न जाने क्या क्या पूछा जायेगा और अगर किन्ही प्रश्नों का उत्तर अगर वो न दे सका तो कहीं उस जेल में न डाल दे.
पुलिस और उनसे जुड़े कुछ अफवाहों को हरिपद ने इतना सुन रखा था बचपन से की आज जैसे उसकी आँखों के सामने वे सभी अफवाहें किसी चलचित्र की भांति एक एक कर के चलने लगी हो.
रॉय ने उसे पहले पानी पीने को कहा.
हरिपद ने उसके लिए सामने रखे ग्लास को उठाया और गटागट पूरा ग्लास खाली कर दिया.
उसकी हालत देख कर रॉय और श्याम दोनों एक दूसरे की ओर देख कर मुस्कराए.
“ठीक हो हरिपद?”
“जी, साहब.”
“कुछ सवाल करूँगा... सही जवाब दोगे?”
“पूरी कोशिश करूँगा माई बाप.”
हरिपद हाथ जोड़कर मिमियाते हुए बोला.
रॉय हल्का सा मुस्कराया. सीधा बैठा. श्याम को इशारा कर के हरिपद से एक हाथ दूर खड़े रहने को कहा.
और फ़िर शुरू हुआ प्रश्नकाल.
किसी प्रश्न का हरिपद बड़ी सहजता के साथ उत्तर दे गया तो किसी प्रश्न में बुरी तरह गड़बड़ा गया.
एक एक कर उससे कुल बारह प्रश्न किए गए. सभी प्रश्नों के उत्तर देते हरिपद के हरेक गतिविधि को बहुत सूक्ष्मता से देख रहा था रॉय.
इधर, बाहर बैठी रुना को धीरे धीरे बेचैनी होने लगी थी.
उसे ऐसा लगने लगा मानो उसके अंदर... उसके सीने में किसी ने दहकता आग का गोला रख दिया हो.
वो सामने श्याम के स्थान पर बैठे बद्री को पानी के लिए बोली. बद्री ने दूसरे सिपाही को पानी के लिए बोला. दूसरा सिपाही एक नया भर्ती हुआ बाईस वर्षीय लड़का था जो निर्देश मिलते ही जल्दी से एक ग्लास पानी ला कर रुना को दिया. रुना ने जरा सा नज़र उसकी ओर करके कृतज्ञता पूर्ण स्वर में धन्यवाद कहा और पानी पीने लगी.
वो लड़का वापस जाने से पहले दो मिनट वहीं खड़ा रहा.
दरअसल उसे रुना की सुन्दरता भा गई थी. अत्यधिक टेंशन के कारण पीठ पर से साड़ी को हटाने के फलस्वरूप रुना के डीप बैक स्क्वायर कट ब्लाउज से पर्याप्त अंश में बाहर दिखती उसकी स्वच्छ, निर्मल, बेदाग़ पीठ और उसपे भी टाइट ब्लाउज के कारण मांसल गदराई पीठ पर बनती हल्की सी क्लीवेज ने तो बस उसे पल भर में ही रुना का दीवाना बना लिया.
काजल लगी आँखें, होंठों पर लाल लिपस्टिक ऐसा मानो अभी अभी ताज़े रक्त में भीगी हुई हो, एक सुंदर पतली चेन जो आंचल के नीचे वक्षस्थल में कहीं समाई हो, दोनों में लाल चूड़ियों के साथ एक एक सफ़ेद शाखा चूड़ी. आंचल सीने पर अच्छे से लिए होने के बावजूद भी उस लड़के को रुना के वक्षों के आकार का अनुमान करने में कोई असुविधा नहीं हुई.
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इतना कुछ देखने के बाद वो लड़का अपने धड़कनों पर नियंत्रण नहीं रख पाया.
उसका दिल धाड़ धाड़ से ज़ोरों से धड़कने लगा. सूख गए होंठों पर बार बार जीभ फिरा कर उन्हें भिगाने की कोशिश करने लगा. इतना तो फिर भी ठीक था..
असल मुश्किल तो तब हुई जब उसे अपने चड्डी के अंदर बेलगाम हलचल होने का आभास हुआ.
बिन हड्डी वाला मांसल अंग अपने दूसरे रूप में आ चुका था जिस कारण पैंट के अंदर से बनी तम्बू के कारण उस लड़के को अपने आप से लज्जा होने लगी. वह तुरंत वहाँ से चला गया.
पानी पीने के बाद बेचैनी तो पूरी तरह से गई नहीं रुना की पर थोड़ा आराम ज़रूर मिला उसे. कुर्सी के बैकरेस्ट से पीठ टिका कर आराम से बैठ गई और अंदर ही अंदर खुद को पुलिस इंटेरोगेशन के लिए दोबारा तैयार करने लगी.
इधर तुपी काका की पत्नी सीमा रुना को खा जाने वाली निगाहों से देख रही थी.
दरअसल जब से वो थाने में आई है और रुना को अपने सामने देखी है तब से ही उसे उसी खा जाने वाली नज़रों से देखे जा रही थी. आँखों में गज़ब का गुस्सा झलक रहा था. तुपी काका, नबीन बाबू, कालू और यहाँ तक की रुना ने भी सीमा के इस बर्ताव को देखा. पर सिवाए तुपी काका और नबीन बाबू के रुना को रत्ती भर का आश्चर्य नहीं हुआ.
सच कहा जाए तो कहीं न कहीं दोनों स्त्रियों में बहुत पहले से कुछ ख़ास नहीं बनती थी. रुना सीमा को पसंद ही नहीं करती थी और सीमा को भी रुना के रूप लावण्य से सदैव ईर्ष्या रही.
रुना अपने आप में अलग थी ज़रूर और इसी कारण विवाहिता होते हुए भी गाँव के कई पुरुषों के रातों की, उनके सपनों की रानी भी थी; पर कहीं न कहीं सीमा रुना को टक्कर देती जान पड़ती थी और कभी कभी यही बात रुना को भी तनिक असुरक्षा का बोध करा देती थी.
थोड़ी ही देर बाद हरिपद कमरे से निकला और चुपचाप एक खाली कुर्सी पर जा के बैठ गया.
फ़िर एक एक कर के सबको बुलाया गया.
सबसे औसतन करीब पन्द्रह मिनट तक सवाल जवाब होते रहे.
सिवाय रुना और सीमा के.
इन दोनों को दो दो बार सवाल जवाब के लिए बुलाया गया और आधे - आधे घंटे तक प्रश्न सत्र चलता रहा.
इन दोनों को बार बार बुलाए जाने से इन दोनों के पति, नबीन बाबू और तुपी काका भी काफ़ी परेशान रहे पर क्या करते... पुलिस के काम में रुकावट डालने का जोखिम भला कौन ले?
जब सब बाहर अपने जगह पर बैठे थे तब रॉय और श्याम अलग से १५ मिनट तक आपस में बातें करते रहे.
फ़िर एकाएक अपने कमरे से निकले.
रॉय ने सबको एकबार अच्छे से देखा और कहा,
“आप लोगों ने काफ़ी अच्छा सहयोग किया. इसके लिए बहुत धन्यवाद. आज के लिए इतना ही. आगे अगर ज़रूरत पड़ी तो फ़िर से आप लोगों थाने बुलाया जाएगा.”
देबू और बिल्टू ने गला खँखार कर धीरे से कहा,
“साहब, फ़िर से आना पड़ेगा? साहब... हम लोगों का काम....”
उनका वाक्य ख़त्म होने से पहले ही रॉय गुस्सा करता हुआ बोला,
“तुम्हें क्या लगता है... आज यहाँ पार्टी करने के लिए बुलाया था क्या? हँसी मसखरी होती है यहाँ? इन सवाल जवाबों में हमारा भी समय जाता है... कई काम हमारे धरे के धरे रह जाते हैं. जो कहा जा रहा है.. सुनो और करो.”
इतना कह कर रॉय गुस्से से अंदर चला गया.
हवलदार श्याम ने सबको इशारे से जाने को कहा... रॉय के गुस्से को देख कर किसी को किसी से कुछ कहने पूछने का हिम्मत नहीं हुआ. सब चुपचाप अपने अपने जगह से उठे और बाहर जाने लगे.
तभी अंदर से रॉय ने आवाज़ दिया,
“श्याम... इधर सुनना.”
“यस सर.”
श्याम तुरंत अंदर आया.
“श्याम... सब गए या नहीं?”
“जी सर, जा ही रहे हैं.”
“ह्म्म्म.. सबके बातों को नोट किया?”
“जी सर... सबने जो भी कहा... उसमें जो कुछ भी महत्वपूर्ण लगा; मैंने वो सब नोट कर लिया.”
“गुड. वैरी गुड. अब एक और बात बताओ...”
“जी सर...”
“सबसे सवाल जवाब होते समय तुम यहीं थे... पूरे समय... तुमने हर किसी के जवाबों को सुना... नोट किया.... सबकी बातों को सुनने के बाद तुम्हें प्रथमदृष्ट्या क्या लगता है... कौन अपराधी हो सकता है... किसपे संदेह सबसे अधिक हुआ है?”
“सर, मुझे तो लगता है कि..........”
श्याम ने जैसे ही बोलना शुरू किया बाहर से चीख पुकार की आवाज़ आने लगी.
बहुत ज़ोरों से आवाजें आ रही थीं... आदमी और औरत... दोनों के.
रॉय और श्याम पहले तो कुछ समझ नहीं पाए. पहले पाँच सेकंड तक एक दूसरे को देखते रहे... फ़िर एक साथ लगभग दौड़ते हुए कमरे से बाहर निकले. दोनों ने देखा की थाने के सिपाही सब भी थाने के बाहर खड़े हैं और किन्हीं को छुड़ाने का असफल प्रयास कर रहे हैं.
रॉय और श्याम दोनों जल्दी से थाने के मेन दरवाज़े तक आए.
बाहर आ कर जो देखा उससे दोनों ही स्तब्ध रह गए.
बाहर सीमा और रुना दोनों एक दूसरे से भीड़ी हुई थीं. दोनों ही एक दूसरे को थप्पड़ों से मार रही थी और जितना ज़ोर से हो सके उतना मारने का प्रयास कर रही थी. खास कर सीमा... उसके गुस्से का कोई पार नहीं दिख रहा था.
वो तो ऐसे कर रही थी जैसे की अभी के अभी रुना के कई टुकड़े कर के उसे कच्चा ही चबा जाएगी. रुना भी पलट कर उसके थप्पड़ों का जवाब दे रही थी पर मारने से कहीं ज्यादा वो खुद को बचाने का प्रयास कर रही थी.
सीमा रह रह के बार बार एक ही बात दोहरा रही थी,
“तू...तूने ही खाया है मिथुन... तूने ही छीना है हमसे... मेरे मिथुन को... उस बेचारे ... भोले लड़के को तूने ही निगला है. बता... बोल न.. क्यों की ऐसा... कमीनी...”
दोनों के पति और वहाँ उपस्थित बाकी सभी लोग दोनों को छुड़ाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन थोड़ा छूटने के तुरंत बाद सीमा फिर से रुना पर टूट पड़ती. धीरे धीरे वहाँ बहुत भीड़ जमा हो गई.
थाने के सामने इस तरह का एक तमाशा होता देख कर रॉय बुरी तरह गुस्से में भर गया और बहुत ज़ोर से चीखते हुए गरज उठा,
“बस करो... क्या लगा रखा है यहाँ? कोई बाज़ार है?? या गाँव का अखाड़ा है??? जो करना है अपने गाँव में... अपने घर में करो... जाओ... अब अगर एक शब्द भी तुम लोगों में से किसी के भी मुँह से सुना तो अभी के अभी बिना किसी कंप्लेंट के तुम सबको पूरे एक महीने के लिए अंदर डाल दूँगा... समझे..
! जाओ यहाँ से!!”
रॉय के इस धमकी ने तुरंत वहाँ जमा हुए लोगों पर अपना असर दिखाया और सब हड़बड़ा कर वहाँ से भाग खड़े हुए. सीमा और रुना ने भी अब तक एक दूसरे को छोड़ दिया था और आगे बढ़ गई थी.
सीमा अब भी गुस्से से बीच बीच में रुना को देख रही थी पर कुछ कह नहीं पा रही थी क्योंकि वो तो खुद अब रॉय के गुस्से से डर गई थी.
और भला एक गुस्सैल पुलिस वाला को कौन उकसाए?
यही सोच कर उसने फ़िलहाल अपने गुस्से को काबू करने का पूरजोर कोशिश कर रही थी.
सबके चले जाने के करीब आधे घंटे बाद थाने के अंदर की गतिविधि भी थोड़ी शांत हुई और जब दैनिक कामकाज पटरी पर आई तब रॉय ने बद्री को बुला कर चाय लाने को कहा और साथ ही श्याम को भी बुलवा भेजा.
श्याम ने आते ही सैल्यूट मारा और कहा,
“आपने बुलाया सर?”
“अं.. हाँ... पहले बैठो... कुछ बात करनी है.”
श्याम तुरंत आदेश का पालन करता हुआ रॉय के सामने चेयर पर बैठ गया.
“तुमने तो सब देखा... सुना... और तो और थाने के ठीक बाहर हुए तमाशे के समय भी तुम वहाँ मेरे साथ ही थे...क्या लगता है... कौन है असली अपराधी?”
उत्तर देने से पहले श्याम दो क्षण सोचा और बड़े विचारणीय ढंग से बोला,
“सर... मुझे लगता है इन सब में ये.... रुना... रुना जी का हाथ है.”
“ऐसा क्यों?”
“सर, वो जब प्रश्नों के उत्तर दे रही थी तब काफ़ी अटक जा रही थी.. लग रहा था मानो वो बोलना चाह कर भी नहीं बोलना चाहती.. या फ़िर सही बात किसी भी हाल में न निकले इसका भरसक प्रयास कर रही थी.”
“यस, राईट! रुना मुखर्जी कुछ जानती ज़रूर है पर कहना नहीं चाहती. और कुछ?”
श्याम सोचते हुए बोला,
“सर, और कुछ तो अभी याद नहीं आ रहा. मैंने जो सबके स्टेटमेंट्स नोट किया है; एकबार उनको अच्छे से स्टडी करना पड़ेगा. थोड़ा टाइम लगेगा सर.”
“हाँ... थोड़ा टाइम तो ज़रूर लगेगा. लेकिन कोशिश करना पड़ेगा की टाइम थोड़ा ही लगे... ज्यादा न हो जाए. ओके?”
“यस सर.”
“हम्म.. और कोई नयी बात? अच्छा....वो नया लड़का कैसा काम कर रहा है?”
“काम तो ठीक ही कर लेता है सर... पर आज थोड़ी सी गलती हो गई उससे... अभी जब मैं यहाँ आया तो देखा बद्री उसे समझा रहा था.”
“गलती!! कैसी गलती?”
“व..वो...सर...”
“ओह.. कम ऑन श्याम. जल्दी बोलो.”
“स...सर...वो... बाहर कुर्सी पर जब रुना और लोगों के साथ बैठी हुई थी तब उसे प्यास लगी थी... बद्री को बोलने पर उसने उस लड़के को पानी देने को कहा. लड़का जब पानी दिया तो रुना के बहुत पास था... अ...औ...”
“और??” रॉय की उत्सुकता बढ़ने लगी.
“और व.. वो... रुना जी.. पर .... मोहित हो गया.”
“हैं?!!”
“जी सर.”
रॉय ने श्याम को गौर से देखा.
श्याम सच बोल रहा था. ये बात समझते ही रॉय खिलखिला कर हँस पड़ा. उसे हँसता देख कर श्याम भी हँसी रोक नहीं सका और हँस पड़ा.
“ओके.. जो हुआ सो हुआ... अब काम की बात.. मैं अभी पुराने कुछ केसेस को लेकर व्यस्त रहूँगा.. उनको स्टडी करूँगा; तो ध्यान रहे कोई मुझे डिस्टर्ब न करे.
बहुत ज़रूरी होने पर ही मेरे पास किसी को आने देना. समझे?”
“यस सर.”
“ओके. यू मे गो नाउ.”
अनुमति मिलते ही श्याम वहाँ से चला गया.
श्याम के जाते ही रॉय ने बगल में रखी एक फाइल को उठा कर उसके नीचे दबी कुछ पासपोर्ट साइज़ के फ़ोटो निकाले. ये वो फ़ोटो थे जिन्हें उसने आज सवाल जवाब के समय नबीन बाबू, रुना और अन्य लोगों को लाने को कहा था.
दो सफ़ेद पेपर लिया, उनमें से एक पर उसने सभी पुरुषों के फ़ोटो रख दिया और दूसरे पर दोनों महिला, अर्थात् सीमा और रुना का फ़ोटो रखा और पेपर पर ही एक जगह पेन से पासपोर्ट साइज़ का एक चतुर्भुज बनाया. अब दोनों फ़ोटो और वो चतुर्भुज ऐसे बने और रखे थे कि अगर तीनों को रेखाओं से जोड़ा जाए तो एक त्रिकोण बन जाए.
रॉय ने अब एक सिगरेट सुलगाया, तीन – चार कश लगाया और अपने आप से ही कहा,
“पता नहीं श्याम ने इस बात को नोटिस किया या नहीं... ये दो औरतें... सीमा और रुना... शुरू से ही संदेह के घेरे में हैं. दोनों के लंबे बाल हैं... दोनों के ही बालों का रंग लाइट ब्राउन है, दोनों ने ही अपने नाखूनों को थोड़ा बढ़ाया हुआ है, नाखूनों पर नेलपॉलिश लगी है, दोनों ने ही मैनीक्योर किया है. रुना मुखर्जी तो है ही सुन्दर... लेकिन सीमा को भी इस मामले में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. दोनों ने ही शायद परफ्यूम भी शायद एक सा लगाया था.... या शायद.... म्मम्म....खैर...”
रॉय ने अब दो कागज और लिया; और उन दोनों कागज़ों में से एक पर नबीन बाबू, हरिपद और तुपी काका के फ़ोटो उसी त्रिकोण तरीके से रखा और दूसरे पर देबू, कालू और शुभो के.
इसके बाद रॉय ने टेबल का ही एक और दराज खोला, हेडफ़ोन निकाला और उसे उसी दराज में रखे एक छोटे से टेप रिकॉर्डर से कनेक्ट कर के कुछ सुनने लगा. ज्यों ज्यों सुनता गया... त्यों त्यों उसके चेहरे के भाव कई बार बदलते गए.
इधर,
गाँव में...
एक बड़े घने छाँवदार वृक्ष के नीचे गाँव के कुछ प्रबुद्ध और वरिष्ठ लोग एकत्र हुए थे. सबके ही मुख मंडल पर घोर चिंता के घनघोर बादल छाए हुए थे. सभी किसी सोच में एक साथ डूबे हुए थे. सब के सब बिल्कुल चुप.
बड़ी देर बाद गाँव के सबसे वरिष्ठ सज्जन श्री सुमलय बिस्वास ने गला साफ़ करते हुए कहा,
“नहीं मेरे मित्रों... व्यक्तिगत रूप से मेरा यही मानना है कि इस समस्या का समाधान हमारे खुद के हाथों में नहीं है. पुलिस चाहे कुछ भी कहे या करे; मेरा स्वयं का मानना है की ये सभी घटनाएँ किसी बहुत ताकतवर ऊपरी बला का काम है... और इसका मुकाबला करने के लिए हमें भी ऐसे ही किसी ताकत की सहायता लेनी होगी.”
एक वृद्ध सज्जन बोल पड़े,
“वो तो हम सब समझ ही रहें हैं बिस्वास जी... पर असल प्रश्न तो यही है कि क्या आप या इस गाँव में कोई भी ऐसी किसी शक्ति को जानता है जो हमारी सहायता करने के लिए तैयार हो?”
इस प्रश्न पर सभी चुपचाप एक दूसरे का मुँह ताकने लगे...
और जब उत्तर नहीं मिला तो परे देखने लगे... सिवाय बिस्वास जी के.
उन्होंने कांपते लहजे में कहा,
“हाँ... मैं जानता हूँ ऐसे किसी को.”
उनका ये कहना था कि सभी आश्चर्य से बिस्वास जी की ओर देखने लगे. लेकिन बिस्वास जी के चेहरे पर दृढ़ता के साथ साथ एक अनिश्चितता का भी भाव था. एक घबराहट थी उनमें.
उन्हें ऐसा देख कर एक दूसरा सज्जन उनके पास आया और पूछा,
“कौन? किसकी बात कर रहे हैं आप?”
होंठों पर जीभ फेर कर खुद को नार्मल दिखाने की कोशिश करते हुए बिस्वास जी बोले,
“कापालिक!”
१२)
दस दिन बीत गए.
इसी बीच एक और लड़के की मृत्यु हुई.
गाँव में कुछ लोगों को अब सीमा और रुना पर संदेह तो होने लगा था पर उस संदेह को बल देने योग्य पर्याप्त कारण नहीं था उनके पास.
पंद्रहवें दिन खबर लगी की बगल के गाँव में एक सिद्ध बाबा आए हुए हैं और इस गाँव के कुछ लोग उन्हें लाने गए हैं. सिद्ध बाबा के दर्शन के लिए गाँव के भोले और सीधे लोगों में एक उत्तेजना, एक उद्वेग, एक उल्लास घर कर गया और सब के सब जल्द से जल्द बाबा के अपने गाँव में पाने की इच्छा करने लगे.
यहाँ तक की रुना ने भी उस बाबा के खाने के लिए तीन – चार स्वादिष्ट पकवान बनाए और अपने पति, बेटे और अपना भविष्य जानने पूछने के लिए मन ही मन भिन्न भिन्न प्रश्न सजाने बुनने लगी.
ऐसा ही कुछ सीमा भी करने लगी थी.
उसने भी कुछेक पकवान बनाए और बाबा से पूछने के लिए कुछ प्रश्न तैयार कर ली थी.
गाँव में हर जगह, हर कोने में सिर्फ़ उस बाबा के ही चर्चे थे.
बाबा ये हैं, बाबा ऐसे हैं, बाबा वैसे हैं.... बाबा ऐसा कर सकते हैं, बाबा वैसा कर सकते हैं... इत्यादि इत्यादि.
आखिरकार वो दिन भी आ गया. सब नदी के तट पर जा कर खड़े हो गए. थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद जैसे ही बाबा का नाव दूर से आता दिखा; सब अति प्रसन्नता से बाबा का जयकारा लगाने लगे.
बाबा ने जैसे ही नाव से उतर कर नदी तट पर अपने कदम रखे, गाँव वालों में धक्कामुक्की शुरू हो गई उनका चरण छूने के लिए. हर कोई बाबा के चरण छू कर अपना भाग्य बदलना चाहता था. गाँव वालों की ख़ुशी देखते ही बनती थी. उन्हें इस तरह इतना प्रसन्न और अपने प्रति इतना स्नेह, प्रेम और भक्ति देख कर बाबा गदगद हो गए. उनके तेजयुक्त मुखमंडल पर भी प्रसन्नता नाचने लगी. पर उनकी आँखों और भृकुटियों के उतार चढ़ाव कुछ और ही कहानी कह रही थी.
उनके साथ उनके दो चेले भी चल रहे थे. दोनों बाबा के अगल बगल थे.
बाबा अपनी चाल थोड़ा धीरे करते हुए अपने दाएँ चल रहे चेले के कान में कुछ कहा.
चेला बहुत गम्भीरतापूर्वक सारी बात सुना और सिर हिला कर आज्ञा माना.
सभी गाँव वाले पूरी श्रद्धा से उन्हें एक बहुत ही साफ़ सुथरे और सुगंधी लगे पालकी में बैठा कर गाँव से थोड़ा हट कर एक सुनसान जगह में उनके लिए बनी एक कुटिया में ले गए.
इधर वह चेला, जिसका नाम गोपू था, वो बिस्वास जी को एक किनारे ले गया और पूछने लगा,
“बिस्वास जी, आपने जिस कारण गुरूजी जो यहाँ बुलाया है क्या वो एकबार फ़िर से दोहराएँगे? .... विस्तार से.”
बिस्वास जी तनिक चकित को कर पूछे,
“क्यों श्रीमन, गुरूजी को कोई असुविधा हो गई है क्या? यदि किसी भी प्रकार की असुविधा हुई है तो मैं पूरे गाँव वालों की ओर से उनसे एवं आपसे क्षमा माँगता हूँ.”
कहते हुए बिस्वास जी रुआंसा होते हुए हाथ जोड़ लिए.
चेले को दया आई. उसने तुरंत बिस्वास जी के हाथों को पकड़ कर नीचे करता हुआ बोला,
“अरे बिस्वास जी... ये आप क्या कर रहे हैं? ऐसी कोई बात नहीं है. हमें किसी भी तरह की कोई असुविधा नहीं हुई है. बल्कि मैं, चांदू और गुरूजी .... सब के सब आप लोगों के स्नेह और विश्वास को देख कर आश्चर्य और प्रसन्नता से भरे जा रहे हैं. पर मैं जो पूछ रहा हूँ आपसे उसका सीधा कारण आप ही लोगों की परेशानी से जुड़ा हुआ है. अतः बिना विलम्ब किए कृप्या सब कुछ दोबारा मुझे कह सुनाइए.”
“सीधा....कारण....ह..हम..लोगों....से ज...जुड़ा.... क्यों.... आप को... ल... लग..लगता है एस... ऐसा...?”
“गुरूजी को लगता हैं.”
गोपू ने सीधा सपाट और संक्षिप्त उत्तर दिया.
स्पष्ट था कि वह शीघ्र से शीघ्र बिस्वास जी से अपना वाँछित उत्तर पाने की अपेक्षा कर रहा था.
बिस्वास जी ने थूक गटका... चेहरा पोछा, चश्मा ठीक किया और फ़िर बोले,
“दरअसल ये कहानी आज से कई वर्ष पहले की है.. इसी गाँव की........”
कहते हुए बिस्वास जी ने वही कहानी सुना दी जो कुछ महीने पहले मीना ने रुना को सुनाई थी.
गोपू सब कुछ पूरे धैर्य से सुनता रहा.
चेहरा पढ़ने वाला कोई पारखी आदमी आसानी से बता सकता था कि इस समय कहानी सुनते हुए गोपू बहुत कुछ सोच रहा था, विश्लेषण कर रहा था और शायद कोई तोड़ ढूँढने की कोशिश कर रहा था.
पूरी घटना सुनाने के बाद बिस्वास जी थोड़ा रुक कर पूछे,
“श्रीमन, कोई विशेष बात है क्या? आपने दोबारा पूरा विवरण क्यों जानना चाहा? गुरूजी ने आपको ऐसा करने को क्यों कहा?”
गोपू से तुरंत कुछ बोला नहीं गया.
परन्तु उसका चेहरा देख कर ये स्पष्ट समझा जा सकता था कि उसका मन शांत नहीं है. बिस्वास जी से सब कुछ सुन तो लिया पर शायद कहीं कुछ जमता हुआ सा नहीं लगा रहा था उसे....या फ़िर शायद कोई ऐसी बात थी जो उसे पल भर में ही विचलित कर दिया था.
उसने बिस्वास जी को इशारा कर के पास में ही एक पेड़ के नीचे चलने को कहा.
दोनों अभी जा कर वहाँ खड़े ही हुए थे कि बिस्वास जी को कुछ सूझा और गोपू को वहाँ बैठने को बोल कर बगल के एक दुकान में चले गए.
थोड़ी ही देर में चाय लेकर उपस्थित हुए.
एक गोपू को दिया; पूरे श्रद्धा भाव से और दूसरा स्वयं लिया.
चाय पीते हुए पूछ बैठे,
“श्रीमन, कृप्या बताइए की आप वास्तव में क्या जानना चाहते हैं? क्या उलझन है? क्या गुरूजी ने किसी संकट की ओर संकेत किया है? क्या समस्या बहुत भयावह है?”
गोपू शांत रहा.
चाय खत्म कर कुल्हड़ एक ओर रखते हुए कहा,
“समस्या है तो सही... क्या है ये तो आपको और पूरे गाँव वालों को पता है... पर...”
“पर क्या श्रीमन?”
अधीर होते हुए कहा बिस्वास जी ने.
“गुरूजी को लगता है की इस पूरे समस्या का मूल कहीं और छुपा हुआ है.”
“मूल?”
“हम्म.”
“गुरूजी ने ऐसा कहा?”
“हाँ... गुरूजी ने ऐसा ही कहा है और पूरे विश्वास के साथ उनका यही मानना भी है.”
“तो क्या समस्या वो नहीं है जो इतने दिनों से हम सोचते और समझते आ रहे थे?”
“नहीं... समस्या तो है वही जो आप समझ रहे हैं... यहाँ ध्यान दीजिए की मैंने आपको क्या कहा है?”
“क्या कहा है?”
“यही की समस्या का मूल कहीं और है.”
“ओह हाँ... तो क्या.... म.. मतलब... समस्या का... स.. स...समाधान होगा न?”
“हाँ होगा... अवश्य होगा..”
गोपू ने पूरे विश्वास के साथ कहते हुए अपने जांघ पर एक थपकी दी.
उसका ऐसा विश्वास देख कर बिस्वास जी के मन को भी बल मिला.
कुछ देर वहीँ बैठ यहाँ वहाँ की बातें करने के बाद दोनों उठ खड़े हुए और उस कुटिया की ओर चल पड़े जहाँ बाबा ठहरे हुए हैं और अभी भी गाँव वालों का तांता लगा हुआ है.
धीरे धीरे ही सही पर अंत में सभी गाँव वाले अपने अपने घरों को लौट गए.
बिस्वास जी के अलावा वहाँ अन्य किसी को बैठने नहीं दिया गया.
अब उस कुटिया में चार लोग थे.
स्वयं बाबा जी, उनके दो चेले / शिष्य; गोपू और चांदू, और बिस्वास जी.
दोपहर के दो बजे रहे थे.
गाँव वालों के ही लाए गए पकवानों में से कुछ बिस्वास जी को खाने को दे कर बाबा जी स्वयं थोड़ा भोग खाने लगे.
उनका खत्म होते ही उन्होंने शिष्यों को तुरंत खा लेने को कहा जिसका उन दोनों ने अक्षरशः पालन किया और खाने बैठ गए. अब तक बिस्वास जी ने भी खाना समाप्त कर लिया था.
हाथ मुँह धो कर वापस आ कर बाबा अपने आसन पर बैठ गए.
बिस्वास जी भी उनके आगे हाथ जोड़ कर बैठ गए.
“वत्स...”
मधुर वाणी में बिस्वास जी को सम्बोधित किया बाबा ने.
“ज...जी... गुरूजी.”
“गोपू ने तुमसे कुछ पूछा होगा?”
“जी गुरूजी. नदी के बारे.....”
बाबा ने हाथ उठा कर बिस्वास जी को रुकने का संकेत किया. बिस्वास जी तुरंत चुप हो गए.
“हम जानते हैं गोपू ने तुमसे क्या पूछा होगा. हमने ही उसे ऐसा करने को कहा था.”
“ओह... जी गुरूजी.. समझा.”
बाबा एकाएक शांत हो गए. जो प्रसन्नचित्त चेहरा अब तक दमक रहा था वो अचानक से बेहद गम्भीर हो गया. बड़े शुष्क स्वर में बोले,
“वत्स बिस्वास.. जिस समस्या के समाधान हेतु मैं यहाँ आया हूँ; वो तो मैं कर के ही जाऊँगा. परन्तु मेरे विचार से एक बात पहले से ही तुम लोगों को... विशेष कर तुम्हें बता देना मैं उचित समझता हूँ.
देखो वत्स, ऐसे मामलों में... मेरा मतलब ऐसे नदी, तालाब या पोखर जैसे मामलों में; मामला उतना पेचीदा नहीं होता जितना की दिखता है अपितु इससे कहीं अधिक जटिल होता है.
क्योंकि जहाँ भी पानी की अधिकता या प्रचुरता होती है; जैसे की नदी, तालाब या पोखर जैसे जगह; वहाँ का वातावरण और उस वातावरण में पाए जाने वाले अन्य वस्तुओं में उपस्थित कुछ ऐसे तत्व होते हैं जिनसे नकारात्मक शक्तियों को बहुत बल मिलता है. ऐसे जगहों के तापमान में सदैव ही एक भारीपन रहता है जिसे साधारण जन झेल नहीं पाते क्योंकि इस तरह के भारीपन को वो झेलने योग्य नहीं बने होते.
अब जैसा की तुम्हें गोपू से पता चल ही गया होगा कि वास्तविक समस्या ये नहीं है वरन, समस्या का मूल तो कहीं और ही है. अब ये मूल क्या है और कहाँ का है, क्यों है इत्यादि बातों का तो मुझे स्वयम ही पता लगाना पड़ेगा.
मैं जानता हूँ कि तुम्हारे मन में बार बार यही एक प्रश्न उठ रहा है की आखिर मैं समस्या के किस मूल की बात कर रहा हूँ. यह तो अभी के लिए मेरे लिए भी एक पहेली है. लेकिन एक सच बताता हूँ. इसे अपने तक ही रखना; गाँव वालों को बताया तो वे लोग बहुत डर जाएँगे.... जब तुम लोग नाव से मुझे और मेरे शिष्यों को बैठा कर ला रहे थे तब तुम्हारे गाँव से कुछ दूर रहते समय ही मैंने जाग्रत सिद्धि मन्त्र पढ़ कर स्वयं की ही आँखों पर फूँक मारी और दक्षिण दिशा की ओर देखा.
उस ओर देखते ही मैंने देखा कि एक सिर पानी से थोड़ा ऊपर उठा हुआ है. मतलब केवल आँखों तक का हिस्सा ही पानी से ऊपर उठा हुआ है. उसकी आँखों में एक अजीब सी बात थी. कुछ कह रही थी उसकी आँखें.... शायद शिकायत कर रही हो... या शायद गुस्सा कर रही या फिर शायद गाँव जाने से मना कर रही हो. ऐसा लग रहा था मानो उसे मेरे यहाँ आने का उद्देश्य का पहले से ही ज्ञात हो गया हो.
इतना तो निश्चित है कि वो सिर किसी युवक का था और यदि अनुमान के बल पर कहा जाए तो कदाचित उसी युवक का होगा जो आज से कई, कई वर्ष पहले उसी नदी के दक्षिण दिशा में डूब कर अपना प्राण गँवा बैठा था.
कई प्रचलित मान्यताओं, कथाओं, लोक कथाओं, दंतकथाओं इत्यादि में दक्षिण दिशा को वर्षों से यमलोक का द्वार कहा व माना जाता है... और उस नवयुवक की मृत्यु भी वहीँ हुई है... अप्राकृतिक मृत्यु ! स्वाभाविक रूप से उस दिवंगत आत्मा में रोष व प्रतिशोध की भावना कहीं अधिक होगी और ये भी एक अच्छा कारण हो सकता है उस आत्मा का शक्तिवान होने का.
परन्तु.....”
बोलते हुए चुप हुए बाबा और उनके चुप होते ही उत्सुकता के मारे बिस्वास जी बोल पड़े,
“परन्तु क्या गुरूजी?”
“परन्तु उस युवक की आँखों को देख कर मैं उन्हें उस कम समय में जितना पढ़ पाया उसके अनुसार उस आत्मा में इतनी शक्ति होना कोई बच्चों का खेल नहीं. और तो और, इतनी शक्ति उसकी स्वयं की भी नहीं है. ये शक्ति उसे कहीं और से मिल रही है.
”
बाबा के इस कथन से अब तक भोग समाप्त कर हाथ मुँह धो कर उनके पास बैठे गोपू और चांदू भी आश्चर्य के सागर में गोते लगाने से खुद को नहीं रोक सके.
बिस्वास जी का मुँह भी खुला का खुला रह गया.
उन तीनों ने लगभग एक साथ ही पूछा,
“अर्थात्??!!”
“अर्थात्... मम्म... कदाचित वो लड़की... जो... उस वन में मृत पाई गई थी.. वही इस लड़के को शक्ति दे रही है... और आवश्यकता होने पर लड़के की आत्मा भी उस लड़की की आत्मा को शक्ति प्रदान करती है. अगर ऐसा है तो भी......”
बाबा फ़िर चुप हो गए.
उनके मुखमंडल पर उभर आए चिंता की रेखाएँ ये चुगलियाँ करने लगी थीं कि बाबा ने अब तक जो कुछ भी कहा है उस लड़के और लड़की की आत्मा और उनकी शक्ति के बारे में; अगर वो सब सच भी हों तो भी कहीं कुछ ऐसा है जो इस पूरे परिदृश्य में फिट नहीं बैठ रहा. कुछ ऐसा है जो सामने हो कर भी नहीं दिख रहा... कहीं कुछ छूट रहा है.
काफ़ी देर तक कोई किसी से कुछ नहीं बोला.
अंत में बाबा ने ही वहाँ छाई शान्ति को भंग करते हुए बिस्वास जी से समय पूछा. बिस्वास जी ने समय बताया.
तीन बज चुके थे.
बाबा खिड़की से बाहर देखा और बिस्वास जी को घर जाने को कहा.
बिस्वास जी भी चुपचाप मान गए और बाबा को प्रणाम कर के वहाँ से चले गए.
दोनों शिष्यों ने देखा, बाबा को चैन नहीं है. बड़े गहन सोच में डूबे हुए हैं. अपने में ही कोई जोड़ - तोड़ कर रहे हैं.
अभी शायद आधा घंटा ही बीता था कि अचानक बाबा की भृकुटियाँ तन गयीं. दायाँ हाथ काँप उठा. ये दो लक्षण बाबा को ठीक नहीं लगे. उन्होंने चांदू को जल्दी से उनकी पोटली लाने को कहा.
पोटली हाथ में आते ही बाबा ने जल्दी से पोटली के अंदर से एक निम्बू निकाला और मन्त्र पढ़ते हुए उसे अपने सामने थोड़ी दूरी बना कर रख दिया. केवल क्षण भर उस स्थान पर रहने के फौरन बाद वो निम्बू वहाँ से लुढ़क कर उस स्थान पर चला गया जहाँ कुछ देर पहले बिस्वास जी बैठे हुए थे.
उस स्थान पर जा कर निम्बू रुक गया और बहुत तेज़ी से अपने स्थान पर घूम गया. और फ़िर, धीरे धीरे लाल होते हुए उसका रंग काला पड़ने लगा.
ये देखते ही बाबा की त्योरियां चढ़ गयी. गोपू की ओर देखा और कहा,
“गोपू... अतिशीघ्र बिस्वास के पास जाओ. जाओ.”
इतना कह कर बाबा ने एक संकेत करते हुए उसे एक और निम्बू दिया. गोपू बाबा का आशय समझ गया. तुरंत अपने स्थान से उठा, अपना एक पोटली उठाया और लपकते हुए कुटिया से बाहर निकल गया.
इधर बाबा ने चांदू को अपने पास बिठा कर उसे कुछ जाप करने को कहा और स्वयं भी जाप करने लगे.
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इधर ज़मीन पर पड़ा वो पहला वाला निम्बू धीरे धीरे काला होता जा रहा था....
१३)
बिस्वास जी अपने कदम जल्दी चला रहे थे.
उनको जल्दी अपने घर पहुँचना था क्योंकि दोपहर को अगर एकाध घंटे की नींद न ले तो उनको बदहजमी होने लगती है... तबियत खराब होने लगता है.
अभी कुछ दूर, यही कोई आधा किलोमीटर चले होंगे कि उन्हें अचानक से एक अंजाना भय सताने लगा. लोग बाग़ तो फ़िलहाल अभी भी सड़कों पर हैं पर संख्या बहुत कम है.
और जितने भी हैं; सब के सब कहीं न कहीं जल्द से जल्द जाने की होड़ में हैं. बात भी सही है.
भला कौन इस सूरज चढ़े दोपहरी में बाहर सड़कों पर खुला घूमे.
मन ही मन खुद को इतना विलम्ब होने का कारण मानते व कोसते हुए बिस्वास जी तेज़ कदमों में और तेज़ी लाते हुए आगे बढ़ते रहे.
चलते चलते वो एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जो सुनसान या वीरान तो नहीं है पर दिन और देर शाम को अक्सर वो स्थान मनुष्य अथवा जीव जंतुओं से रहित हो जाया करता है.
बिस्वास जी डरते हुए आगे बढ़ने लगे.
डरने का कोई विशेष कारण नहीं था और न ही इससे पहले कभी उनको डर लगा था पर न जाने क्यों आज डर के मारे उनका पूरा शरीर ऐसे काँप रहा था जैसे घनघोर आँधी में कोई सूखा पत्ता.
उनके तेज़ कदम अब धीरे हो गए.
धीरे क्या हुए... अचानक से उठाना ही बंद हो गए. बहुत कठिनाई से उनको एक एक पग आगे रखना पड़ रहा था.
चार पग ही आगे बढ़ पाए थे बिस्वास जी कि तभी उन्हें आस पास के झाड़ियों में और पेड़ों के नीचे गिरे सूखे पत्तों की चरमराहट सुनाई दी. पलट कर आवाज़ वाली दिशा की ओर देखा.
जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी... वहाँ तक देखा... पर संदेहास्पद कुछ भी दिखाई नहीं दिया.
निश्चित हुए ज़रूर पर धड़कनें तेज़ हो गयीं. कुछ अनिष्ट होने का भय एक बार फिर से उनके मन मस्तिष्क में छाने लगा.
फिर आगे बढ़ना शुरू किया उन्होंने...
एक एक पग सावधानी और आहिस्ते से रखते हुए. बिल्कुल ऐसे जैसे की वो धरती माता को कोई कष्ट नहीं देना चाहते हैं.
ऐसे ही चलते हुए उन्होंने यही कोई १० – १२ कदम चल लिया. धड़कनें अब भी तेज़ थी. सिर के दोनों ओर से पसीना बहते हुए दोनों कान के साइड से नीचे चला गया.
पहले भी कई बार उन्होंने इस तरह का वातावरण झेला है... पर इस तरह से छक्के छुड़ा देने वाली स्थिति पहले कभी नहीं आई थी उनके सामने. दो पग और आगे बढ़ते ही उन्हें फिर वैसी ही एक सरसराने की आवाज़ सुनाई दी.
बिस्वास जी तुरंत सिर उठा कर ऊपर पेड़ों की ओर देखा.
पेड़ थे तो सही... पर बहुत अधिक संख्या में नहीं... लेकिन जितने भी थे; ऐसे वातावरण में भय में कई गुणा वृद्धि कर देने वाले थे.
कुछेक पेड़ तो ऐसे भी थे जिनकी टहनियाँ पत्तों सहित इस तरह से फैले हुए थे मानो वो सूरज की रौशनी को नीचे धरती पर आने ही नहीं देना चाहती हो. अन्य समय में ये पथिकों के लिए; यहाँ तक की कई बार बिस्वास जी के लिए भी गर्मी के दिनों में घनघोर छाया प्रदान कर वरदान साबित हुई है लेकिन आज यही ऐसे पेड़ बिस्वास जी को भयावह और प्राणघातक लग रहे हैं.
पेड़ों के झुरमुठों का निरीक्षण करते हुए आगे बढ़ते बिस्वास जी को किसी के पदचाप सुनाई दिए.
और केवल पदचाप ही नहीं; कुछ और भी सुनाई दिया उनको पर वो पूरी तरह से निश्चित नहीं थे.
अपने आसपास और ऊपर की ओर ध्यान रखते हुए बिस्वास जी आगे बढ़ने के लिए जैसे ही फिर एक पग आगे रखा तभी उन्हें फिर वही आवाज़ सुनाई दी.
अब बिस्वास जी निश्चित थे... पदचाप तो है ही... साथ ही घुँघरूओं की भी आवाज़ है!
कोई और समय होता तो शायद यही ध्वनि उन्हें अत्यंत कर्णप्रिय लगी होती... या आयु के जिस पड़ाव पर वो हैं कदाचित ऐसे ध्वनियों पर ध्यान ही नहीं देते... परन्तु आज का ये वातावरण, निर्जन पथ, अकेले वो और उस पर भी आस पास से ऐसे आवाजों का आना; निश्चित ही किसी के भी मन को भयाक्रांत करने के लिए पर्याप्त हैं.
ऐसा तीन से चार बार हुआ.
बिस्वास जी चार पग आगे बढ़ते... वही पदचाप सुनाई देती... वही घुँघरूओं की आवाज़ सुनाई देती... और साथ ही पत्तियों की चरमराहट और हवाओं में सरसराहट.
डरते हुए ही सही पर अंततः बिस्वास जी ने धीमे स्वर में बोलना प्रारंभ किया,
“मैं नहीं डरता... मेरा भगवान मेरे साथ है..... मैं नहीं डरता... मेरे गुरु मेरे साथ है.... मैं नहीं डरता... मुझे नहीं डरना....”
दो ही बार उन्होंने ऐसा कहा था कि अचानक से एक तेज़ हवा चली और साथ में धूल का एक आँधी से चला. दो मिनट में ही आँधी शांत भी हो गई.
अपनी आँखों को मलते हुए बिस्वास जी आगे अपना रास्ता देखने की कोशिश कर ही रहे कि तभी उनके कानों से एक आवाज़ आ टकराई,
“बिsssस्वाsssसssssss..!!”
बेहद ठंड अंदाज़ में ये स्वर बिस्वास के कानों से टकराई.
बिस्वास जी हड़बड़ा गए.
अपना नाम ऐसे अंदाज़ में सुनना उनको वाकई हजम नहीं हुआ और अब उनका डर अपने सभी सीमा को पार कर चुका था.
अपने गुरु अर्थात् बाबा जी का नाम लिया उन्होंने और बहुत मुश्किल से अपना एक पैर आगे बढ़ाया.
ऐसा करते ही एक बार फिर वही धूल भरी आँधी उड़ी और बिस्वास जी को कुछ भी देखना असंभव हो गया.
आँधी जब थमी तब बिस्वास जी ने बहुत धीरे से आँखें खोला.
सामने दूर दूर तक धूल ही धूल उड़ रही थी. जब धूल थोड़ी कम हुई तब बिस्वास जी ने सामने जो देखा उसे देख कर उन्हें बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने तुरंत अपना चश्मा उतार कर उसे अच्छे से पोंछा और फिर आँखों पर चढ़ा कर सामने की ओर बहुत ध्यान से देखा.
उनसे थोड़ी दूर पर, एक बड़े से छायादार पेड़ के नीचे एक अतिसुन्दर रमणी खड़ी थी.
अपने समय के बड़े रसिक श्रेणी के व्यक्ति रह चुके बिस्वास जी ने इतनी दूरी से भी उस नवयौवना के शारीरिक ढांचे को बखूबी देख लिया. गौर व बादामी वर्ण मिश्रित शरीर, हिरणी जैसी बड़ी बड़ी आँखें... पके पपीते समान तने हुए और पुष्ट स्तन द्वय, लम्बे अधखुले बाल जो कदाचित कमर तक आ रही थी, कोमल कंधे, हाथ और पैर.
सच में बहुत सांचे में ढला बदन था उसका...
उन्नत वक्षस्थल, पतली कमर और इन दोनों से अपेक्षाकृत थोड़ा अधिक फैला हुआ नितम्ब....
रह रह कर बिस्वास जी के मन मस्तिष्क में यौन प्रेम जगाने लगी.
बिस्वास जी का गला सूखने लगा. आयु के बहत्तरवें पड़ाव पर ऐसे एक दिन में, ऐसे समय में ऐसा कुछ देखने को मिलेगा; यह तो उन्होंने भूल से भी कभी नहीं सोचा था.
हाँ, अपने जवानी के दिनों में कई गुलछर्रे उड़ाए थे उन्होंने, बहुत मस्ती की थी. हर तरह की मस्ती. लेकिन जैसे जैसे आयु बढ़ती गई, वैसे वैसे वो स्वतः इन चीज़ों से दूर होते गए. मन में बीच बीच में कभी कोई आशा उठी भी होगी तो अपनी समझदारी, समाज और घर परिवार का दायित्व निर्वहन के चक्कर में अपनी ऐसी उत्तेजक इच्छाओं का गला घोंट देना पड़ा था उनको जिसे उन्होंने सहर्ष किया भी क्योंकि जितनी इच्छा उनको अपनी इन यौन इच्छाओं को पूरी करने की होती उससे कहीं अधिक अपने घर परिवार और समाज में अपनी बढ़ती सम्मान, प्रतिष्ठा और दायित्वों के प्रति जागरूकता का बोध रहता.
और साठ के बसंत पर पहुँचने के साथ ही ऐसी इच्छाओं के पूर्ण होने की आशा को भी त्यागना पड़ा.
लेकिन... लेकिन...
जिन इच्छाओं और अल्हड़पन को बहुत पहले ही वो छोड़ और भूल चुके थे... वो इस तरह आज उनके सामने किसी भोज पात्र के भांति सामने खड़ा है. दृष्टि हट नहीं रही, मन कहीं और जाने का नाम नहीं ले रहा, सोया, मुरझाया जननांग जो अब केवल मूत्र त्यागने का एक साधन मात्र रह गया था उसमें भी न जाने कहाँ से प्राण का संचार होने लगा.
अनुमति लिए बिना ही दिमाग किसी रणनीतिज्ञ की भांति सोचने लगा.
‘उस ओर जाना चाहिए? ... नहीं.. नहीं... नहीं जाना ही श्रेयकर होगा... परन्तु... क्या अतिशय सुन्दरता की ऐसी अनुपम मूर्ति को अनदेखा करना उचित होगा? जल से लबालब भरा और सुगन्धित फूलों से युक्त एक ऐसा नयनाभिराम सरोवर जो स्वयं आज मेरे सामने आ खड़ा हुआ है... इसमें डूबकी न सही... क्या हाथ की एक अंजुलि मात्र जल से अपने कंठ को तर कर लेने में भी पाप लगेगा? दोष है इसमें?’
स्वयं से ही ऐसे तार्किक प्रश्न करते हुए किसी अनिष्ठ की आशंका को ह्रदय के एक कोने में दबा कर मन में रह रह कर हिलोरें मारता, जन्म लेता वर्षों की लालसा को सम्भालने का अथक प्रयास करते हुए बिस्वास जी छोटे पर एक एक पग बड़ी सावधानी से रखते हुए आगे बढ़ते रहे.
अपनी ओर बढ़े आ रहे इस पुरुष को अपने मन में उठ रहे संशयों, संदेहों व नाना प्रकार के प्रश्नों से जूझता समझ कर वो सुन्दरी लाज से भरे अपने मुख पर एक मीठी सी मुस्कान बिखेर दी. पूरी तरह आश्वस्त. इस बात से कि चाहे लाख रोकना चाहे खुद को कोई पर उसके इस लावण्यमयी मृदु मुस्कान के आघात से बचना किसी के लिए भी असंभव है.
बिस्वास जी उस युवती के सौन्दर्यमन्त्र में वशीभूत हो कर उसकी ओर बढ़ते ही रहे और तभी रुके जब उस युवती के पास, बहुत पास आ गए थे.
अपलक उसके संगमरमर से पूरे बदन को देखते हुए बस किसी तरह इतना ही पूछ पाए,
“कौन हो तुम?”
“लड़की.
” कहते हुए हल्के से हँस दी वो. उसकी वो क्षण भर की हँसी मानो कई सौ मन (वजन) शहद घोल दिया बिस्वास जी के कानों में.
“वो...त... तो देख ही रहा... हूँ...न.. ना..नाम क्या है?”
“लाडली.”
इस बार फिर शरमाई वो. गालों पर पलक झपकते ही लाज की लालिमा छा गई.
तभी बिस्वास जी को ऐसा कुछ दिखा जिसे स्पष्ट देख कर भी बिस्वास जी के लिए विश्वास कर पाना बहुत बहुत ही कठिन था. युवती से दो बातें करने के बाद पहली बार बिस्वास जी की आँखें युवती के शरीर के उस स्थान पर गई जो हरेक पुरुष और यहाँ तक की अन्य स्त्रियों के आकर्षण का प्राकृतिक केंद्रबिंदु होता है... वक्ष !
उसके वक्षस्थलों की ओर दृष्टि जाते ही बिस्वास जी को दुनिया का सबसे बड़े आश्चर्य का एक जबरदस्त झटका लगा. वो युवती अपने शरीर के ऊपरी भाग को केवल एक पतली साड़ी से ही ढक कर रखी थी. उसके पुष्ट, बड़े और भरे हुए स्तन पतली साड़ी के अंदर से सामने की ओर किसी भाले की तरह तने हुए थे और निप्पल तो जैसे उस भाले की नोक हों.
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“आहा... सुंदर नाम है... लाडली...”
कहते हुए बिस्वास जी उस युवती के और निकट आ गए. उसके जिस्म से आती सुंदर सुगंध मानो तन मन को भिगो दे रही थी और बिस्वास जी जितना सम्भव हो सके उस सुगंध में खुद को सराबोर कर लेना चाह रहे थे.
युवती अब आँखें थोड़ा तिरछी रखते हुए बिस्वास जी की ओर देखी. बिस्वास जी की दृष्टि उस समय उसके बड़े वक्षों की ओर ही थी.... और रह रह कर उसके पतले कमर पर फिसल जाती. इसके साथ उनके मन में यौन क्रियाओं की भावना जाग जाती,
‘आहा! नाभि भी दिख रही है... कितना सुंदर और गोल है! जी चाह रहा है कि अभी इसे दबोच कर इसके कमर को सहलाऊं और फिर जी भर कर इसके इस सुंदर नाभि को चूमूँ और जीभ घुसा घुसा कर खूब अच्छे से चाटूं!’
पता नहीं अचानक से ऐसा क्या हुआ जो बिस्वास जी स्वयं को रोक नहीं सके और एकदम से हाथ बढ़ा कर उसके कमर को हल्के से सहलाते हुए अपनी मध्यमा ऊँगली उसकी नाभि में डाल दिया.
युवती एकदम से एक हल्की पर तेज़ सीत्कार ले उठी...
चेहरे के भावों से साफ़ कर दिया की उसे बिस्वास जी की इस हरकत का मज़ा ही मिला है.
मतलब, बिस्वास जी इतना में ही नहीं रुक कर अगर इससे भी आगे बढ़ना चाहें तो उसे कोई शिकायत नहीं होगी.
प्रफुल्लित मन से युवती की नाभि में ऊँगली को गोल गोल घूमा कर हल्का दबाव दे कर उसकी काम प्रतिक्रिया देखने में बिस्वास जी को बहुत आनंद आने लगा था. रह रह कर उसके पूरे कमर को सहलाते और फिर नाभि के पास आ कर उसके चारों ओर अँगुली के पोर से सहलाते हुए नाभि में अँगुली डालते और फिर वहाँ भी गोल गोल घूमाने लगते.
लाडली, अर्थात वो युवती काँपने – थरथराने लगी. खुद को खड़े रखने के लिए उसने नीचे झुकी हुई पेड़ की एक डाली को थाम लिया.
धड़कने तेज़ हो गई उसकी और इसी के साथ उसके स्तन द्वय का ऊपर नीचे होने की गति भी बढ़ गई जोकि निःसंदेह सभी पुरुषों की भांति बिस्वास जी के भी दृष्टि आकर्षण का केंद्र बन गई फिर से.
लाडली के देह से निकलने वाली सुगंध ने धीरे धीरे अपने और बिस्वास जी के चारों ओर एक अदृश्य घेरा सा बना लिया था अब तक और बिस्वास जी उसी में सुध बुध खो कर इस अनुपम सुन्दरी नवयौवना के सुंदर शरीर रूपी सरोवर में अब डूबकी लगाने के लिए छटपटाने लगे थे. हिम्मत कर के अपने बूढ़े, शुष्क होंठों को लाडली के होंठों से सटा बैठे....लाडली रोकी नहीं.. पीछे नहीं हटी... वरन, अपना बायाँ हाथ बढ़ा कर बिस्वास जी के दाएँ हाथ को थाम ली और दूसरे हाथ को उनके पेट पर बहुत हल्के से रखी.
उसके होंठों के नर्म छुअन ने बिस्वास जी के अंदर के कामाग्नि के लिए घी का काम किया.
बिस्वास अब इतने निकट आ गए कि अब लाडली के स्तनों के निप्पल उनके सीने पे गड़ते हुए से प्रतीत होने लगे.
‘आह! अब और नहीं.’
ऐसा सोच कर बिस्वास जी लाडली को पकड़ कर बगल में ही एक झाड़ी के पीछे ले गए और कस कर उसका आलिंगन करके उसे बेतरतीब चूमने लगे. क्या गला, गाल, होंठ, नाक... कुछ भी बाकी नहीं छोड़ना चाहते थे बिस्वास जी. लाडली अभी भी पहले की ही तरह बिस्वास जी का दायाँ हाथ पकड़े थी और दूसरा हाथ जो कि अभी तक उनके पेट पर था; अब धीरे धीरे ऊपर उठ कर सीने पर आ गया था.
कुछ ही क्षणों बाद बिस्वास जी को अचानक से एक हुक सी लगी अपने सीने के अंदर.
ऐसा लगा मानो किसी ने एक छोटी पिन चुभो दिया हो उनके दिल में.
थोड़ा तड़पे ज़रूर, पर इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे इसलिए इसे अनदेखा करते हुए पुनः काम क्रीड़ा में रत होने का प्रयास करने लगे.
झाड़ी के पास ही एक ठूंठ से सटा कर लाडली को खड़ी कर के उसके आंचल को गिरा कर ऊपर के पूरे बदन को बेतहाशा चूमने लगे बिस्वास जी. मन ही मन एक दृढ़ संकल्प ले लिया था उन्होंने कि आज या तो वो इस कमलनयना के साथ सम्भोग करेंगे ही करेंगे या फिर घर बार छोड़ हमेशा के लिए सन्यास ले लेंगे.
यूँ तो लाडली के गदराए देह का हरेक इंच प्रेम पाने के योग्य था परन्तु दृष्टि व लालसा का केंद्र अब भी उसके उन्नत स्तन ही बने हुए थे.
उसके स्तनों के साथ जिस प्रकार से भी सम्भव हो; बिस्वास जी पूरा मन लगा कर खेलने लगे. चूमना, चाटना, दबाना, चूसना, दोनों स्तनों के मध्य अपना मुँह घुसा कर रगड़ते हुए स्तनों की रेशमी छूअन को अपने चेहरे के दोनों साइड से महसूस करना... निप्पलों को दो ऊँगलियों से निर्ममतापूर्वक दबाना, नाखूनों को हल्के से गड़ाना इत्यादि...
कुछ भी बाकी न छोड़ा उन्होंने.
कमर के नीचे धोती में तम्बू तो बहुत पहले ही बन चुका था.... पर इतने देर तक कपड़ों के अंदर रह कर खड़े रहने से उनका जननांग अब दर्द करने लगा था.
वो भी चाहने लगे कि कई साल बाद आज पहली बार इस तरह मूसल की भांति अकड़ कर खड़े अपने इस अंग को शीघ्र से शीघ्र आराम पहुँचाया जाए और आराम पहुँचाने का फिलहाल जो एकमात्र उपाय किया जा सकता है वो उनके सामने स्वयं को बिना किसी मान मनुहार के समर्पित कर चुकी इस लाडली नाम की लड़की के पास है.
अपने छाती पर रखे लाडली के हाथ को उन्होंने पकड़ कर अपने जननांग पर ले जाना चाहा पर लाडली नहीं मानी. वो अपने इस हाथ को उनके ह्रदय के पास से हटाना नहीं चाही.
बिस्वास जी को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी देर से न जाने उन्होंने इस युवती के जिस्म के साथ क्या कुछ नहीं किया... केवल सम्भोग छोड़ कर के; पर ये पहली बार किसी चीज़ को मना की.
‘लगता है इसे शर्म आ रही है.. पगली... ही ही ही.. एकबार तेरे अंदर प्रवेश कर जाऊं... फिर देखता हूँ कैसे और क्या क्या रोकेगी.... ही ही ही... फिर तो खुद ही उछल उछल कर लेगी तू. हाहाहा....’
ऐसा सोच कर प्रसन्न होते हुए बिस्वास जी ने लाडली के बाएँ स्तन का निप्पल सहित करीब दो चौथाई हिस्सा अपने मुँह में भर लिया और फिर ‘चुक चुक’ की आवाज़ कर के चूसते हुए उसकी साड़ी को पैरों पर से उठाते हुए घुटनों के ऊपर तक ले आए. इस दौरान पूरी तल्लीनता के साथ एक ओर स्तन को चूसते रहे तो दूसरी ओर साड़ी को उठाते हुए पैरों और घुटनों के ठीक ऊपर के थोड़े से हिस्से को बड़े प्यार से सहलाते रहे.
इधर उस लाडली की आँखें बंद हो आई थीं.
अपने बाएँ हाथ को बिस्वास जी गर्दन के पीछे से ले जा कर उनको कस कर पकड़ी और दाएँ हाथ की हथेली को उनके सीने पर अच्छे से जमा दी. उत्तेजना के मारे बिस्वास जी का हालत खराब होने लगा. सांसें फूलने लगीं उनकी. सीने पर दिल वाले जगह पर फिर से हल्का हल्का दर्द होने लगा.
बिस्वास जी ने देर न करते हुए उसके स्तनों पर मुँह लगा दिया.
और सिसकारी लेते हुए चूसने लगे.
पर उनको इस बात का तनिक भी भान नहीं हुआ कि जिस युवती के साथ वो काम क्रीड़ा में लिप्त हो रहे हैं; उसी में धीरे धीरे एक परिवर्तन आने लगा है. जिस हाथ को वो बिस्वास जी के सीने पर रखी थी उसके नाखून अचानक से बढ़ने लगे.
बढ़ते बढ़ते एक बड़े आकार के सुई की लम्बाई जितनी लंबी हो गए नाखून अब बहुत आहिस्ते से बिस्वास जी के सीने में गड़ने लगे.
पीड़ा कुछ अधिक होती पा कर बिस्वास जी मुलायम स्तन पर से मुँह हटा कर के सीने की ओर देखना चाहा पर लाडली ने तुरंत ही उनका सिर पकड़ कर दोबारा अपने स्तन पर रख दी.
बिस्वास जी इसे लाडली का उनके लिए प्यार और तड़प समझ कर मन ही मन गदगद होते हुए पूरे मनोयोग से उसके तड़प को शांत करना अपना कर्तव्य समझ कर बड़े प्यार से स्तनपान करने लगे.
लेकिन कुछ ही देर बाद उनके हृदय में एक ऐसा भयानक दर्द शुरू हुआ कि उन्हें अपने सीने पर दोनों हाथों से दबाव बनाते हुए वहीँ गिर जाना पड़ा.
इस भयानक पीड़ा से तड़पते हुए ही उनका ध्यान गया लाडली की बढ़े हुए नाखूनों पर जिनके सिरों पर खून लगे हुए थे.
होंठों पर एक ऐसी मुस्कान लिए जिससे ये लगे कि उसे अपनी सफ़लता पर गर्व और बिस्वास जी के बेवकूफी पर बड़ा तरस और हँसी आ रही है; वह अपनी जीभ निकाल कर नाखूनों पर लगे खून को चाटने लगी.
बिस्वास जी ने गौर किया कि वो पसीने से ऊपर से नीचे तक भीग चुके थे.... पीड़ा बढ़ते ही जा रही थी.
और तभी बिस्वास जी की दृष्टि एकबार फिर लाडली की ओर गई जो खून चाटने में व्यस्त थी... और जो देखा उससे उनके आँखों के आगे अत्यधिक डर के मारे अँधेरा छाने लगा.
लाडली बड़े आराम से सभी नाखूनों को अच्छे से चाटने के बाद धीरे धीरे बड़े प्यार से मटकते हुए बेहोश प्राय हो चुके बिस्वास जी की ओर बढ़ने लगी.
परन्तु ज्यादा आगे न बढ़ पाई.
एक छोटी सी गेंद जैसी कोई चीज़ कहीं से उछल कर आई और सीधे उसके और बिस्वास जी के बीच आ कर रुक गई. अपने स्थान पर खड़ी लाडली हतप्रभ हो उस चीज़ को देख कर समझने का प्रयत्न करने लगी कि ये आखिर है क्या?
लाडली आगे की ओर झुक कर जैसे ही उस चीज़ को हाथ में लेना चाही तभी वह गोल सी चीज़ ‘भप्प’ की एक धीमी ध्वनि से फट पड़ी.
इसी के साथ उसमें से एक हरा रंग का धुआँ निकल कर चारों ओर बड़ी तेज़ी से फैलने लगा और लाडली के कुछ समझ पाने के पहले ही बेहोश बिस्वास जी को ऐसे घेर लिया मानो उनकी रक्षा कर रही हो!
उस धुएँ को देख कर कुछ पल के लिए लाडली डर गई. पर जल्द ही खुद को सम्भालते हुए उठ खड़ी हुई और अपने चारों ओर देखने लगी. दो पल बाद ही उसे सामने से एक तेजस्वी युवक आता दिखाई दिया.
लाडली गुस्से से पूछी,
“कौन हो तुम?”
“एक महान गुरु का शिष्य और इस समय इनका (बिस्वास जी की ओर ऊँगली से संकेत करते हुए) रक्षक... नाम, गोपू.”
“क्यों आए हो यहाँ?”
“अभी अभी तो कहा, इनकी रक्षा करने हेतु.”
“भाग जा.... नहीं तो बेमौत मारा जाएगा.”
लाडली की आँखें गुस्से से लाल हो चुकी थीं. लग रहा था मानो अभी ही गोपू को चीर फाड़ देगी.
गोपू हँस पड़ा,
बोला,
“नहीं... भागने के लिए नहीं आया हूँ. पर तुझ महा पापिन को एक अवसर अवश्य दूँगा... भाग जाने के लिए.”
यह सुनकर तो लाडली के क्रोध का कोई पार ही नहीं रहा.
पूर्णतः लाल हो आई आँखों से गोपू को कुछ क्षण देखती रही.
गोपू राह का रोड़ा था, ये तो स्पष्ट था!
और उसके दिलेरी से लाडली को ये स्पष्ट हो गया था कि उसके रहते बिस्वास जी को मारना तो क्या; एक मामूली खरोंच तक दे पाना सम्भव नहीं है.
इतनी ही देर में गोपू ने भी लाडली के भाव भंगिमाओं का अवलोकन – विश्लेषण कर लिया था. कम से कम इतना तो समझ ही गया था कि यह कोई साधारण युवती नहीं है.
"चला जा! जा यहाँ से" लाडली ने फिर हुंकार भरी.
“नहीं.” गोपू ने कहा.
"नहीं समझा मेरी बात?"
"समझ गया, तभी तो बोला, नहीं जाऊँगा.
"
" बहुत सुन ली मैंने, व्यर्थ के तर्क न कर और इस आदमी को मेरे लिए छोड़ कर चला जा." वो बोली
"और मैंने भी तेरा बहुत सम्मान करते हुए चेतावनी दे चुका.” गोपू ने पलट कर जवाब दिया.
"प्राण से जाएगा" वो बोली.
"देखा जाएगा."
"देख युवक, मान जा मेरी बात, ये आदमी तुझसे सम्बंधित नहीं है."
"इसका कोई अहित न हो; मेरे गुरु का ऐसा आदेश है और उनका आदेश ही मेरे लिए सर्वोपरि है."
“यानि गुरु के लिए मरना स्वीकार है तुझे?”
“हाँ.”
गोपू को टस से मस न होते देख लाडली ने उसपर एक के बाद एक कई ख़तरनाक तंत्र वाले हमला किया. गोपू ने जल्दी से पहले अपने गुरुमंत्र से स्वयं को और बिस्वास जी को पोषित किया और प्राण रक्षा मन्त्र से दोनों की ही प्राणों की रक्षा करते हुए लाडली के सभी हमलों का मुँह तोड़ जवाब दिया. कोई और समय होता या गोपू यदि अकेला होता तो लाडली से और भी अच्छे से लड़ता पर इस समय उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण था बिस्वास जी की रक्षा करना.
अतः गोपू ने और विलम्ब न करते हुए व्योम-विनाशिनी का आह्वान किया.
आह्वान मंत्र सुनते ही लाडली का चेहरा तो जैसे एकदम सफ़ेद हो गया और क्षण भर में ही वहाँ से लोप हो गई!
गोपू ने जल्दी से बिस्वास जी को सहारा दे कर उठाया और वैसे ही कुछ दूर तक ले गया. फिर एक रिक्शा पकड़ कर बिस्वास जी को उनके घर तक छोड़ आया.
कुटिया में पहुँच कर थोड़ी देर के विश्राम के पश्चात बाबा जी के सामने उपस्थित हो कर सब बातें कह सुनाया.
सब कुछ धैर्यपूर्वक सुनने के बाद बाबा गंभीर रूप से ही मुस्कराते हुए कहा,
“जो और जितना सोचा था पूरा मामला उससे भी कहीं अधिक खतरनाक है. अच्छा हुआ जो तुमने काफ़ी बुद्धिमानी से उसके हरेक प्रहार का उत्तर दिया और सबसे बढ़िया ये हुआ कि वह तुम्हारे व्योम – विनाशिनी के आह्वान मात्र से ही भाग गई.”
“यही तो आश्चर्य की बात है गुरूदेव... अगर वो कोई साधिका या तांत्रिका थी तो और मुकाबला क्यों नहीं की?”
बाबा जी प्रश्न सुनकर हँस पड़े.
बोले,
“वो कोई साधिका – तांत्रिका नहीं थी और सबसे बड़ी बात तो यह कि वो तो मनुष्य तक नहीं थी!”
“क्या?!!”
दोनों ही शिष्य बहुत बुरी तरह चौंक उठे. अपने कानों पर उन्हें ज़रा भी विश्वास नहीं हुआ.
बाबा बोले,
“कल किसी को भेज कर बिस्वास को बुलवा भेजना. कल उसी के सामने कई और रहस्योद्घाटन करूँगा.... और अब की बार सब कुछ ठीक कर दूँगा.”
“जी गुरु जी.”
दोनों शिष्य हामी भर कर बेसब्री से आने वाले कल की प्रतीक्षा करने लगे.
प्रतीक्षा तो अब बाबा जी तो भी थी.
१४)
“सब सच सच बताओ बिस्वास...”
“म..मम.. मैं...क्या बताऊँ गुरूदेव?”
“वही जो मैं जानना चाहता हूँ.
बिस्वास चुप.. कोई आवाज़ नहीं.. कोई शब्द नहीं. नज़रें झुका कर इधर उधर देखने लगते हैं.
परन्तु बाबा जी के चेहरे के भावों पर कोई अंतर नहीं दिखा.
अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से वो बिस्वास के चेहरे रुपी दुर्ग पर कड़ा प्रहार कर रहे थे. उनका तेज़ सह पाना उच्च स्तरीय ज्ञानी और सिद्ध पुरुष के लिए भी सरल नहीं था तो बिस्वास तो मात्र एक साधारण मनुष्य है.
थूक निगलते हुए उन्होंने अपने गुरूजी की ओर देखा.
समझने में अब कोई परेशानी नहीं रही कि गुरूजी बिना सत्य जाने नहीं मानने वाले. गुरूजी एक बहुत ही उच्च स्तर के सिद्ध पुरुष हैं ये तो बिस्वास जी जानते ही थें परन्तु वो भूतकाल का भी आंकलन कर सकते हैं ये कभी नहीं सोचा था.
फिर भी बात को टालने के लिए एक और प्रयास ... अंतिम प्रयास करने का सोचा उन्होंने.
नासमझ व भोला बनने का प्रयत्न करते हुए एक बार फिर बाबा के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा,
“गुरूदेव... मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूँ. किस सत्य को बताने को कह रहे हैं आप? कब की बात है? कौन सी बात है? म.. मैं....”
बिस्वास जी और कुछ कहे उसके पहले ही बाबा ने हाथ उठा कर उसे चुप हो जाने का संकेत किया.
विचार और कथन में पूरी स्थिरता और चेहरे पर गम्भीरता लिए बाबा ने कहा,
“देखो बिस्वास... मैं और तुम... दोनों ही जानते हैं कि जो सत्य अब तक सबसे छुपा हुआ है उसे अब सामने आना चाहिए और मुझसे कोई भी सत्य छिप नहीं सकता. जानते हो न इस बात को?”
बिस्वास जी आँखें नीची करते हुए सहमति में सिर हिलाया.
बाबा बोले,
“तो जब तुम जानते ही हो इस बात को तो फिर क्यों कुछ छुपाने का प्रयास कर रहे हो? जो भी सत्य है; चाहे वो कितना भी कड़वा क्यों न हो... आखिर सत्य ही है. देर सवेर हमें सत्य को अपनाना ही पड़ता है. सत्य की यही एक सबसे बड़ी गुण होती है कि वो सदैव स्वयं को सामने प्रकट करने के लिए तत्पर रहता है. जैसे कितना भी घनघोर वर्षा क्यों न हो... कितनी भी काली घटा क्यों न छाई रहे.. सूर्य निकलता ही निकलता है... ठीक वैसे ही, सत्य चाहे कैसा भी क्यों न हो; सत्य आखिर में सत्य ही होता है.”
अपनी बात को कहते कहते बाबा बिस्वास जी के हाव भाव पर गौर कर रहे थे.
बाबा द्वारा कही गई बातों से बिस्वास के मन में जमी कोई बर्फ पिघल रही है... उसे कुछ अपराधबोध हो रहा है... ये बात बाबा के अनुभवी आँखों ने तुरंत ही ताड़ लिया.
“कहो बिस्वास. डरो नहीं... यदि उस सत्य में तुम्हारी किसी तरह की भूमिका हो भी तो यदि तुम स्वीकार कर लो तो तुम पर से बोझ उतर जाएगा. यदि कोई अपराधबोध हो...तो वो भी पल भर में समाप्त हो जाएगा.”
बिस्वास जी के मन में अब तक जो संदेह था... वो अब विश्वास में बदल गया. वो भली भांति समझ गए कि बाबा जी यूँ ही उनसे पूछ रहे हैं; सत्य क्या है ये उनको पहले ही ज्ञात हो गया है.
कुछ देर की चुप्पी के बाद बिस्वास जी अचानक बाबा के पैरों पर गिर पड़े.
रोने लगे...
क्षमा याचना करने लगे.
“गुरूदेव... मुझे क्षमा कीजिए गुरूदेव... मेरी रक्षा कीजिए...
!”
बिस्वास जी की अचानक ऐसी अप्रत्याशित प्रतिक्रिया देख कर कुछ क्षणों के लिए तो बाबा भी चकित से हो गए.
उन्होंने गौर किया..
बिस्वास जी वाकई रो रहे थे...
बिलख रहे थे.
बिलख बिलख कर क्षमा याचना कर रहे थे और स्वयं की रक्षार्थ हेतु प्रार्थना – निवेदन भी कर रहे थे.
बाबा तो पहले से जान रहे थे कि सत्य क्या है... अतः उन्हें बिस्वास जी के ऐसे व्यवहार पर अधिक आश्चर्य न हुआ. अपितु प्रसन्न ही हुए कि वो सत्य को कहने का साहस करते हुए गुरु चरणों में क्षमा की भी याचना कर रहे हैं.
मुस्कराते हुए अपने पैरों पर रखे बिस्वास जी के सिर पर हाथ रखते हुए बाबा इतना ही बोले,
“शांत वत्स... शांत.”
बाबा के हाथ का स्पर्श अपने सिर पर पा कर बिस्वास जी फूले न समाए और अत्यधिक उद्गार से उनकी और भी अधिक रुलाई फूट पड़ी.
बाबा के स्नेह वचन और आशीर्वाद स्वरूप हाथ को सिर पर पा कर बिस्वास जी न केवल प्रसन्न हुए अपितु उनके अंदर एक नए साहस और विश्वास का संचार भी होने लगा.
बाबा के पैरों पर से सिर तो उठा लिया अपना पर अभी भी बाबा से नज़रें मिलाने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे.
बाबा अभी भी गम्भीर रूप में ही थे.. फिर भी होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी..
चांदू की ओर देखा...
और आँखों के संकेत से बिस्वास जी को पानी पिलाने के लिए कहा.
चांदू ने शीघ्र ही एक बड़े से तांबे के ग्लास में शीतल जल भर कर बिस्वास जी को दिया.
बिस्वास जी ने ग्लास तो ले लिया पर पीना तभी शुरू किए जब बाबा ने उन्हें दोबारा आदेश दिया.
पानी पी कर कुछ देर में रोने के कारण अपनी उखड़ती सांसों पर नियंत्रण पा कर बिस्वास जी शांत हुए पर अब भी कुछ बोले नहीं.
थोड़ी देर तक प्रतीक्षा करने के बाद जब बाबा ने देखा कि बिस्वास जी के कंठ से बोल नहीं फूटे तब उन्होंने ही एक धमाका करने का सोचा और एक हल्की सी मुस्कान लिए, परन्तु पूरी गम्भीरता से; पैरों के पास नीचे बैठे बिस्वास जी की ओर तनिक झुकते हुए कहा,
“वत्स, उस दिन तुम भी उन लोगों के साथ थे न?”
कहीं खोए हुए बिस्वास जी ने अनमने भाव से बाबा की ओर बिना देखे ही उत्तर दिया,
“कहाँ... कब ... किसके साथ?”
“उस दिन... जब उन दोनों युवक युवती को पूरा गाँव ढूँढ रहा था... उन लोगों में से एक तुम भी थे न?”
बाबा के इस प्रश्न ने वाकई एक धमाका किया बिस्वास जी के कानों में. पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई.
अपने स्थान पर बैठे बैठे ही लगभग उछलते हुए बाबा को शंकित नज़रों से देखा... मानो ये निश्चित करना चाहते हों कि अभी अभी उन्होंने जो सुना वो बाबा के ही श्रीमुख से निकली है.
बाबा एकटक बिस्वास जी की ओर देखते रहे... चश्मे के पीछे से झाँकती बिस्वास जी के विस्फारित नेत्रों पर टिकी थी बाबा की आँखें.
बिस्वास जी को अब भी कुछ बोलता न देख कर बाबा फिर बोले,
“उनमें से एक की मृत्यु का कारण स्वयं को मानते हो न?”
ये वाला प्रश्न पर्याप्त था बिस्वास जी को ये विश्वास दिलाने के लिए कि अब तो वो लाख चाह कर भी सच्चाई को अपने भले के लिए अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर पेश भी नहीं कर सकता क्योंकि निश्चित ही ये भी बाबा के हाथों पकड़ी ही जाएगी.
झूठ बोलने का अब तो कोई मतलब ही नहीं रह गया था.
बिस्वास जी ने गले में जम गए थूक को निगला और निगलते हुए ही सिर हिला कर सहमति जताया.
बाबा के हाव भाव में कोई परिवर्तन नहीं आया.
जिससे ये स्पष्ट हो गया कि वे ऐसे ही किसी उत्तर की अपेक्षा कर रहे थे.
“किसकी?”
धीर गम्भीर स्वर में उन्होंने अगला प्रश्न किया.
बड़ी कठिनाई से उत्तर निकला परन्तु बहुत ही धीमा,
“शौमक”
“ज़ोर से बोलो, बिस्वास.”
“श...शौमक.!”
हकलाते हुए अब भी कठिनाई से ही बोले बिस्वास जी.
“ह्म्म्म.” बाबा इतना ही बोले.
कदाचित अब दृष्टि फेरने की बारी बाबा की थी.
बिस्वास जी के मुँह से नाम सुनने के बाद बाबा तुरंत कुछ न बोलकर कमरे की खिड़की से बाहर देखने लगे. बाबा की चुप्पी ने तीनों; चांदू, गोपू और बिस्वास जी को सस्पेंस में डाल दिया.
थोड़ी देर बाद बाबा बिस्वास जी की ओर देखते हुए फिर पूछे,
“बिस्वास... अब जो पूछूँगा उसका उत्तर एकदम स्पष्ट शब्दों में देना... ठीक?”
मुखमंडल पर चिंता की आभा लिए बिस्वास जी सहमति जताते हुए ‘ठीक है गुरूदेव’ कहा.
“बिस्वास.... शौमक की मृत्यु हत्या थी या दुर्घटना?... स्मरण रहे... मैंने तुम्हें सब सच बताने के लिए कहा है.”
“ज...जी...!”
बाबा के इस प्रश्न ने तो निःसंदेह बिस्वास जी को अब भारी दबाव में ला दिया. हाथ में थामा हुआ ग्लास अब काँपने लगा. साँसें उखड़ने लगी. ललाट पर पसीने की कई बूँदें एक साथ छलक आईं.
स्वयं को संयत करने के लिए दोबारा होंठों को ग्लास से लगाया.
दो लंबे घूँट लगाए.
फिर बाबा की ओर देखा.
बाबा उत्तर की प्रतीक्षा में उन्हीं की ओर देख रहे थे.
“बाबा.. थी तो वो... दुर्घटना ही..”
“पर वास्तविकता में वो एक हत्या थी... यही न?”
बाबा ने बिस्वास जी के वाक्य को पूरा किया. जैसे ही बाबा ने इस वाक्य को कहा; वैसे ही तुरंत गोपू और चांदू की आँखें अविश्वास से बड़ी बड़ी हो गई.
बिस्वास जी ने सिर हिला कर धीमे स्वर में ‘जी’ कहा.
“कौन कौन सम्मिलित थे इस पाप कार्य में ?”
“लगभग सभी.”
“क्यों मारना चाहते थे सब उसे?”
“अ..अम.... व.. वो... काला जादू.... करता था... हानि करता था गाँव वालों का.... गुरूदेव.”
इस वाक्य को बिस्वास जी ने ऐसे कहा मानो वो अपने साथ साथ पूरे गाँव वालों की रक्षा करना चाहते हों.
बाबा धीरे से हँस दिए...
बोले,
“तुम्हें कैसे पता वो काला जादू करता था?”
“ग..गाँव वालों.....”
“झूठ!”
बिस्वास जी के वाक्य को पूरा करने के पहले ही बाबा गरज उठे..
डांटते हुए उन्हें चुप कर दिया.
बाबा के क्रोध से बिस्वास जी सकपका गए.
कोई बहाना दे कर अपनी बात को सही ठहराने का साहस न किया.
“बिस्वास.. मैं बार बार कह रहा हूँ... सच बोलो. यदि तुम अपने साथ साथ समस्त गाँव वालों की रक्षा करना चाहते हो तो सत्य कहो. कल गोपू ने तुम्हें बचा लिया था.. परन्तु हर बार... हमेशा तुम्हें बचाने के लिए नहीं रहने वाला. यदि पूर्ण सत्य नहीं बताओगे तो मैं भी तुम्हारी यथोचित रक्षा नहीं कर पाऊंगा और वो युवती जो कल तुम्हें लगभग मार ही चुकी थी; वो ज्यादा दिनों तक चुप नहीं बैठेगी. वो फिर हमला करेगी और कदाचित अगले हमले में वो वाकई में तुम्हें एक हौलनाक मृत्यु दे दे!”
बाबा के इस चेतावनी में भय का ऐसा पुट था कि बिस्वास जी के सिट्टी पिट्टी गुम हो गए.
हाथ जोड़ लिया...
फिर से क्षमा माँगी..
कहा,
“गुरूदेव... ग...गुरूदेव.... म..मैं....”
कहते हुए रो ही पड़े.
बाबा ने उनके सिर पर हाथ रख कर उन्हें सांत्वना दिया और चुप कराते हुए उनसे बगैर लाग लपेट के पूरी बात सच सच कह सुनाने को कहा.
“गुरूदेव... व.. वो... एक प्रकार से हत्या ही थी गुरूदेव... वह युवक बच सकता था... पर... पर... किसी ने सहायता नहीं की. उसका उस नदी तक पीछा करना... खास कर दक्षिण दिशा की ओर... वहाँ तक उसे दौड़ाते ... उसका पीछा करते हुए जाना .... सब.. कुछ... कुल मिलाकर एक प्रकार से उसकी हत्या ही है गुरूदेव.”
कहते हुए अब तो और भी बुरी तरह से बिलखने लगे थे बिस्वास जी. नदी की बात क्या करना; स्वयं उनकी आँखों से ही अश्रुओं की नदी बहने लगी. स्पष्ट था कि इस बात को... जोकि स्वयं एक प्रकार से रहस्य ही था आज तक; कहने में उन्हें बहुत कष्ट हुई है. सहज नहीं था इस रहस्य को स्वीकार कर पाना.
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बिस्वास जी के इस प्रकार बिलखने से बाबा को बुरा तो लगा पर वो जानते हैं कि बिस्वास जी का ये पूर्ण स्वीकारोक्ति नहीं है! सत्य तो ये है कि बाबा को उनके योगबल से ही संपूर्ण सत्य का पता चल गया था परंतु वे बिस्वास जी के मुँह से सत्य जानना चाहते थे.
इसलिए धीरे से व बड़े प्यार से पूछे,
“और?”
बिस्वास जी तुरंत न बोले पर इस बार बाबा को भी अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी.
कुछ क्षण बाद बिस्वास जी स्वयं ही बोले,
“अ... व... व... उ.. उस हत्या... में मैं स्वयं भी भागीदार था.”
“वो कैसे?”
“म... मैंने...नहीं... म... .मैं चाहता था... वो... मरे..”
“क्यों?”
“क... क्योंकि.. मैं अवनी... अवनी... स...”
“हाँ... वत्स... आगे बोलो...”
“क्योंकि मैं अवनी से .... प्यार करता ... था... उस...उससे स... श.. शादी कर.. करना चाहता था.”
“और... ये अवनी कौन है वत्स?”
“अ.. अवनी है नहीं गुरूदेव... थी..”
“थी??”
“ज..जी गुरूदेव... व.. वो उस रात.. के दो दिन बाद मर गई.”
“कहाँ मरी थी वो?”
“जंगल.. जंगल में... फाँसी लगा कर.”
“ओह!”
“ज..जी गुरूदेव.”
अब धीरे धीरे पूरी विषयवस्तु बाबा के सामने स्पष्ट होती जा रही थी.
थोड़ा रुक कर बाबा फिर पूछे,
“फाँसी लगाने के लिए फंदा कहाँ से मिला होगा उसे...?”
“उसे फंदे के लिए अलग से किसी रस्सी वगैरह की क्या आवश्यकता थी गुरूदेव. व.. वो तो... स.. साड़ी को ही फंदा बना कर झूल गई.”
“ओह्ह... बहुत बुरा हुआ! ... अच्छा, तुम तो अवनी से प्रेम करते थे... है न?”
“जी.”
“उसे बताया नहीं कभी?”
“बताया था.. पर उसका कहना था कि वो पहले से ही किसी ओर से प्रेम करती है और जिससे प्रेम करती है; उसके प्रेम के सिवा अब किसी और का प्रेम नहीं चाहिए उसे.”
“तो तुमने क्या किया?”
“क..कई बार उसे मनाने का प्रयास किया.. पर सफल नहीं रहा.. वो उस शौमक के प्रेम में पूरी तरह अंधी थी... उस.. उस आवारा के पास था ही क्या...? एक टूटी फूटी झोंपड़ी... एक बूढ़ी माँ.. वही किसी तरह अपना और अपने उस निकम्मे बेटे का पेट पाल रही थी. क्या मिलता अवनी को ऐसे लड़के से शादी करके... उल्टे उस लड़के के ही वारे न्यारे होते अगर उसकी शादी अवनी से होती.. अगर अवनी उसकी पत्नी हो जाती... क्योंकि अवनी का परिवार काफ़ी धनी जो था.”
“लेकिन जब तुम देख ही रहे थे कि वह लड़की शौमक के अलावा किसी और के साथ शादी नहीं करना चाहती तो तुम्हें उसे छोड़ देना चाहिए था. उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए था.”
“व..वही तो नहीं हो पा रहा था मुझसे.. गुरूदेव.. मेरे तो जैसे मन में ही बैठ गया था कि मुझे अगर शादी करनी है तो इसी से करनी है.. नहीं तो.. नहीं तो..”
“नहीं तो क्या वत्स?”
अब तक ग्लास ज़मीन पर एक ओर रख चुके बिस्वास जी बाबा के इस प्रश्न पर उत्तर देने के स्थान पर अपना सिर दोनों हाथों से पकड़ कर बैठ गए और बहुत धीमे स्वर में कहा,
“पता नहीं.. गुरूदेव... उस समय मुझे जो सूझता... मैं तब वही करता.”
“तो क्या इसलिए शौमक की सहायता नहीं की तुमने?”
“जी गुरूदेव. वो निकम्मा कामचोर... कोई माने या न माने गुरूदेव.. पर मैं और गाँव के और भी कई लोग ये जानते थे कि शौमक जादू टोना सीखता – करता था... और... आखिर में अवनी से शादी कर ही ली उसने. शादी की पहली रात भी मनाने वाला था. अवनी की शादी किसी ओर से होता देख मैं सहन तो नहीं कर पाता लेकिन फिर भी खुद को मना लेता. पर... पर... शौमक की उससे शादी की खबर सुन कर मैं तो बुरी तरह से गुस्से से पागल हो गया था. स्वयं पर इतना सा भी नियंत्रण न रख पाया. उसे मारना मेरा उद्देश्य नहीं था.. केवल प्रताड़ित करना चाहता था.. डराना चाहता था.. दंड देना चाहता था. जब देखा की वह नदी के उस दक्षिण दिशा के उस खास जगह में डूब रहा था तो यही सोच कर उसकी सहायता नहीं किया की चलो अब कम से कम अवनी को पाने का मार्ग कुछ तो सरल हुआ. पर... ”
बिस्वास जी के वाक्य को अब बाबा ने पूरा किया,
“पर कौन जानता था की नियति को कुछ और ही स्वीकार था... यही न!”
बिस्वास जी केवल सिर हिला कर सहमति जता पाए. उनकी आँखों से फिर अश्रुधारा बहने लगी.
बाबा ने कुछ कहा नहीं.
बिस्वास जी को थोड़ी देर रो लेने का समय दिया ताकि उनका मन कुछ हल्का हो जाए.
बिस्वास जी जब शांत हुए तब,
“बिस्वास... बस एक अंतिम प्रश्न रह गया है पूछने को. आशा है की उसका भी तुम बिल्कुल सही उत्तर दोगे.”
“जी गुरूदेव.. अवश्य.. वैसे भी अब छुपाने को रह ही क्या गया है. आप पूछिए.”
“क्या हरिपद भी इन सब में बराबर का भागीदार था?”
एक क्षण के लिए बिस्वास जी चौंक पड़े.. लेकिन तुरंत ही सामान्य हो गए.
ये प्रश्न ऐसा अवश्य था जिसकी अभी बिस्वास जी ने कल्पना नहीं की थी पर अब जब बाबा ने पूछ ही लिया है तो बिस्वास जी को भली भांति पता है कि क्या उत्तर देना है.
“जी गुरूदेव. वो इन सब में भागीदार भी था और मेरा साझीदार भी था. उसे मेरी मंशा का पूरा पूरा भान था.”
दृढ़ स्वर में उत्तर दिया उन्होंने.
उनके उत्तर देने के दौरान बाबा उनके मुखमंडल को ऐसे देख रहे थे मानो कुछ पढ़ने – ताड़ने का प्रयास कर रहे हों.
कुछ और इधर उधर के प्रश्न करने के बाद बाबा ने बिस्वास जी को विदा किया. विदा करने से पहले एक मन्त्र सिद्ध माला भी दिया ताकि कोई बुरी शक्ति उनका हानि लाख चाह कर भी न कर पाए.
बिस्वास जी के जाने के बाद गोपू बड़े असमंजस भाव से बोल उठा,
“गुरु देव.. मैं जिसे अब तक सबसे अच्छा समझ रहा था; अंततः वही बुरा निकला?!”
बाबा मुस्कराए और बोले,
“तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूँ. तुम्हारा प्रश्न सर्वथा उचित ही है. इस संसार में अक्सर ही ऐसा होता है वत्स.. किसी को कुछ समझो तो वो कुछ और ही समझा जाता है.”
अब चांदू बोला,
“तो इसका ये मतलब हुआ क्या गुरूदेव कि ये पूरा गाँव... सभी गाँव वाले दोषी हैं?”
“नहीं वत्स.. गाँव वाले तो अवनी के घर वालों के साथ मिल कर बस उन दोनों को पकड़ना चाहते थे.. पकड़ कर उचित दंड भी देते.. लेकिन हत्या जैसा जघन्य अपराध नहीं करते.. पर ये जो कुछ भी हुआ है.. इसका दोषी तो बिस्वास, हरिपद और उनके कुछ साथी हैं जो इस पूरे घटनाक्रम को अपने लाभ हेतु दुरूपयोग करते हुए इसे दूसरा ही रूप दे दिया.”
“परन्तु गुरूदेव... लोग जो इस तरह मर रहे हैं... इसका कारण?”
“वत्स, कारण या तो बिस्वास की कही गई घटना से जुड़ी हो सकती है या फ़िर इस कारण के पीछे कोई और कारण हो सकता है.”
“आप ऐसा क्यों कह रहे हैं गुरूदेव?”
चांदू ने ऐसे प्रश्न किया मानो उसे अब भी बाबा के बातों में कुछ अजीब होने की आशंका हो रही है.
“ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ऐसा ही कुछ होने का आभास हो रहा है मुझे. दक्षिण दिशा में नदी में डूब कर प्राण गँवाने वाले शौमक का क्रोध, उसकी प्रतिशोध की भावना तो समझ में आ रही है.. पर.. जंगल में होने वाले मृत्यु के कारण मुझे फ़िलहाल समझ में नहीं आ रहा है.”
“आपका अर्थ समझ में नहीं आया गुरूदेव.. क्या नदी में जितनी भी मृत्यु हुई है..
सब शौमक की आत्मा ने किया है?”
“हाँ वत्स, नदी के उस भाग में आज तक जितनी भी मृत्यु हुई है; उन सब के पीछे शौमक की आत्मा का ही हाथ है. सभी मरने वाले या तो विवाहिता या फिर नवयौवनाएँ थीं. इसका यही अर्थ हो सकता है कि विवाह के तुरंत बाद वाली क्रिया पूर्ण न हो पाने के कारण ही वो औरतों और युवतियों को दक्षिण भाग के भंवर में फँसा कर पहले अपनी तुष्टि करता है; फ़िर निर्दयता के साथ मार देता है.. किन्तु... जंगल में होने वाले मृत्यु के कारण समझ में नहीं आ रहे हैं. शौमक मरता नहीं यदि पूरे परिदृश्य की संरचना वैसी नहीं होती जैसा की बिस्वास ने कुछ देर पहले हमें बताया था. लेकिन अवनी ने तो जंगल में आत्महत्या की थी. उसके घर वाले तो उसे ले जाने गए थे.. सकुशल.. तो फिर... आत्महत्या क्यों की? क्या वो भी विवाह की पहली रात न मना पाने के कारण दुखी थी? क्या ये दुःख इतना बड़ा था कि आत्महत्या कर ली जाए?”
बाबा के इस प्रश्न का उत्तर दोनों शिष्यों में से किसी के पास भी नहीं था और स्वयं बाबा के पास भी नहीं.
सभी कुछ देर तक चुप रहते हुए कुछ न कुछ; अंदर ही अंदर सोच रहे थे कि बाबा फिर बोल पड़े,
“सच कहूँ तो शौमक और अवनी से संबंधित प्रश्न मुझे उतना दुविधा में नहीं डाल रहे जितना की उस युवती का उद्देश्य जो उस दिन बिस्वास को प्रायः मार ही चुकी थी...”
सुनते ही गोपू तपाक से बोल उठा,
“कौन? वो... अ... क्या नाम... हाँ... लाडली??”
“हाँ.. लाडली. वो वहाँ क्यों थी... वो भला बिस्वास को क्यों मारना चाहेगी.. और तो और... उसे भेजने.. उससे कार्य करवाने की क्षमता भला किस में है?”
“क्यों गुरूदेव.. आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”
“क्योंकि वो कोई साधारण मनुष्य नहीं थी.. अरे साधारण तो क्या.. वो तो कोई मनुष्य ही नहीं थी. ये बात तो मैं पहले भी बता चुका हूँ तुम लोगों को.”
“जी गुरूदेव. परन्तु कृप्या ये बताइए कि आप उस लाडली को लेकर बारम्बार चिंतित क्यों हुए जा रहे हैं? क्या वो ही अवनी नहीं थी? क्या आप उसे जानते हैं?”
“नहीं. वो अवनी नहीं थी. गोपू के माध्यम से गोपू के साथ साथ मैंने भी उसके शरीर की ऊर्जा अनुभव किया है.. और अनुभव करते ही मैं जान गया था कि वो कौन है. इसलिए मैं चिंतित हूँ कि उससे अपना कार्यसिद्ध करवाने की क्षमता रखने वाला कौन है.. कौन है वो जिसने इस लाडली को भेजा था क्योंकि जिसने भी लाडली को भेजा था वह निःसंदेह काफ़ी क्षमतावान सिद्धहस्त है... क्योंकि ये लाडली तो स्वयं अपने आप में बहुत.. बहुत ही शक्तिशाली चीज़ है.”
गोपू और चांदू ने एक दूसरे को देखा.. फिर एक साथ ही पूछा,
“व.. वो.. कौन थी, गुरूदेव?”
बाबा का चेहरा बहुत ही गम्भीर हो गया.
शरीर एक ऐसे भाव में आ गया मानो तुरंत ही किसी अदृश्य सुरक्षा कवच से स्वयं के साथ साथ अपने शिष्यों को भी घेर लिया हो.
चेहरे के भाव उनके हृदय की अवस्था की स्पष्ट चुगली करने लगे की बाबा चिंतित तो हैं लेकिन दृढ़ संकल्पित भी हैं.
बाबा को चुप देख गोपू और चांदू ने फिर एक दूसरे को देखा.
फिर बाबा को देखा.
अपने स्थान से थोड़ा आगे बढ़ कर बाबा के थोड़ा निकट आए दोनों.
और दोबारा अपना प्रश्न किया,
“वो कौन थी गुरूदेव?”
प्रश्न के समाप्त होते ही बाबा बोल पड़े; एकदम सर्द... भाव रहित अंदाज़ में,
१५)
चंडूलिका
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दो दिन बाद एक शुभ मुहूर्त देख कर बाबा ने एक विशेष अनुष्ठान का शुभारंभ किया.
करना तो वो एक विशेष प्रकार का यज्ञ चाहते थे लेकिन कुछ सोच कर उन्होंने अपने इस अनुष्ठान को एक भिन्न रूप से करने का निश्चय किया.
जप करने के लिए चांदू को साथ बिठाया और स्वयं भी कुछ जपते हुए ध्यान में लीन हो गए.
किसी भी प्रकार की विघ्न – बाधा; विशेषतः यदि वो आसुरिक, तांत्रिक, मांत्रिक या अज्ञात अदृश्य कोई आक्रमण हो तो उनसे लड़ने और उनके उद्देश्यों पर पानी फेरने के लिए बाबा ने गोपू को पहरे पर बिठा दिया.
बाबा और गोपू ने मिलकर कुटिया को चारों ओर से मंत्रों से पोषित कर दिया था और कुटिया के बाहर बिस्वास जी समेत दस और लोगों को पहरे पर लगा रखा था ताकि कोई आदमी, औरत या जानवर इत्यादि कुटिया के आस पास या बाबा से मिलने की बात कह कर अनुष्ठान में विघ्न न डाले.
और कहीं बिस्वास जी और अन्य साथियों पर कोई ऊपरी शक्ति हावी हो कर किसी प्रकार का हानि न पहुँचाए इसके लिए भी बाबा ने पर्याप्त व्यवस्था कर रखा था.
अनुष्ठान आरम्भ हुआ.
मंत्र जाप भी आरम्भ हुआ.
कुटिया के अंदर बाबा और चांदू से थोड़ी दूरी पर बैठा गोपू चौकन्ना हो गया.
कुटिया के बाहर उपस्थित बिस्वास जी और अन्य लोग भी सतर्क और सावधान हो गए.
किसी ऊपरी बला के आ कर उन लोगों को नुकसान पहुँचाए; इस बात का डर तो था उन लोगों में परन्तु बाबा की शक्तियों पर भी उन्हें अगाध विश्वास और श्रद्धा थी.
गोपू भी बहुत सतर्क था लेकिन बाहर उपस्थित लोगों के जैसे भयभीत नहीं था.
कई प्रकार की ऊपरी बाधा और शक्तियों से वो पहले भी निपट चुका था. स्वभाव से तो वीर था ही; बाबा के मार्गदर्शन में वह तंत्र - मंत्र विद्या में महारत प्राप्त कर चुका था.
बाबा के सामने पाँच फल रखे हुए थे.
पाँचों ही बिल्कुल ताज़े.
कुछ देर पहले ही पानी से अच्छे से धोया गया थे इन्हें.
जप करते करते बाबा ने ‘हुम’ कर के एक गम्भीर नाद किया.
चांदू के लिए ये एक संकेत था. उसने अपना मंत्रजाप वहीँ रोका और आँखें खोल कर पहले बाबा की ओर देखा जो अब भी आँखें बंद किए जाप किए जा रहे थे. उसने तुरंत सामने रखे फलों में से एक फल उठा लिया और तुरंत उसे चाक़ू से काटा.
फल अंदर से भी ताज़ा ही निकला.
चांदू तनिक निराश हुआ. गोपू की ओर देखा.
वो भी निराश हुआ सा लगा.
चांदू को सफ़लता मिलने का पूरा भरोसा था..
पर ऐसा हुआ नहीं.
लेकिन वो भी एकदम निराश नहीं हुआ था. बाबा पर पूरा भरोसा था उसे.
इसलिए तुरंत ही अपने आसन पर पूर्ववत् बैठ गया और मंत्रजाप शुरू कर दिया.
इधर गोपू ने भी अपने नेत्रों को मन्त्र से सिंचित कर खिड़की से बाहर की ओर देखा. कहीं कुछ पारलौकिक नज़र नहीं आया.
बिस्वास जी और अन्य लोग किसी भी प्रकार के दुर्घटना या चुनौती के लिए पूरी तरह तत्पर दिख रहे थे.
उस खिड़की से गोपू को जितने भी लोग नज़र आए; उन सबको बारी बारी से बहुत अच्छे से देखा.
किसी में भी कुछ भी संदिग्ध नज़र नहीं आया.
किसी बात का संदेह तो बारम्बार हो रहा था गोपू को किन्तु जब कहीं कोई ऐसी बात न दिखी जो उसके संदेह को बल देती तब वो स्वयं ही निश्चिन्त हो गया.
इधर बाबा का अनुष्ठान चलता रहा.
तीन से चार घंटे बीत गए.
बाबा और चांदू मंत्रों का जाप करते रहे.
बीच बीच में बाबा के ‘हुम’ करके संकेत करने पर चांदू एक एक कर के फल काटता रहा; लेकिन हरेक फल अंदर से ताज़ा ही निकला.
अंततः बाबा को भी एक निश्चित समय बाद अपना मन्त्र जाप बंद करना पड़ा.
मन्त्र जाप और अनुष्ठान तो पूरा हुआ पर जिस उद्देश्य के लिए किया गया था वो पूरा नहीं हुआ. सभी कटे फलों को बिस्वास जी और उनके अन्य साथियों के बीच बाँट दिया गया.
बिस्वास जी ने बहुत पूछा लेकिन उनको केवल इतना ही बताया गया कि अनुष्ठान पूरा हुआ और कम से कम दो - तीन दिनों के लिए कोई संकट नहीं है इस गाँव पर.
सभी को विदा करने से पहले बाबा ने कुछ आवश्यक दिशा निर्देश दिया और उन दिशा निर्देशों को पूरी सजगता के साथ पालन करने को कहा.
बाबा के दिशा निर्देशों को अपना आदेश मान कर सबने बाबा को प्रणाम किया और अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए.
इधर बाबा अपने स्थान पर विश्राम हेतु बैठे लेकिन बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे.
गोपू ने आगे बढ़ कर हाथ जोड़ते हुए बाबा से कहा,
“गुरूदेव?”
“हम्म..”
“कुछ पूछने को जी चाह रहा है.. आपकी आज्ञा हो तो पूछूँ?”
“वैसे तो हमें अनुमान है कि तुम क्या पूछना चाह रहे हो वत्स.. फिर भी हम तुम्ही से सुनना चाहेंगे. पूछो.. क्या पूछना है?”
एक बार फिर बाबा को प्रणाम कर किया गोपू ने और फिर पूछा,
“गुरूदेव, क्या आज का अनुष्ठान सच में पूरा हुआ?”
“हाँ.. हुआ. और.. नहीं भी.”
“अर्थात् गुरूदेव?”
“आज के इस अनुष्ठान के दो उद्देश्य थे. एक, अपनी सिद्धियों को पोषित करना. दो, किसी को यहाँ बुलाना.”
“किसे बुलाना चाहते थे आप गुरूदेव?”
“शौमक और अवनी को.”
एक क्षण रुक कर कुछ सोचते हुए पूछा गोपू ने,
“तो.. वो.....”
उसका प्रश्न पूरा होने से पहले ही गुरूदेव ने उत्तर दे दिया,
“नहीं आए, वत्स.”
कहते हुए बाबा थोड़ा निराश दिखे. कदाचित उन्होंने इसमें सफ़लता मिलने की ही आशा की थी.
बाबा के चेहरे पर उभर आए निराशा को देख गोपू से रहा नहीं गया, पूछा,
“तो क्या इसका और कोई उपाय नहीं है गुरूदेव?”
“हम्म.. है... अवश्य है. परन्तु अभी हम वो उपाय करेंगे नहीं.”
“क्यों गुरूदेव?”
“क्योंकि इन दोनों या इनमें से किसी एक को भी बुलाना इतना सरल सहज नहीं होगा. आज के अनुष्ठान के दो उद्देश्यों में से एक उद्देश्य शौमक और अवनी या इन में से कोई एक को अपने पास बुला कर उनसे वार्तालाप करना, प्रश्नोत्तर करना था. पर ऐसा हुआ नहीं... और ऐसा न होने का केवल एक ही कारण है.”
“वो क्या गुरूदेव?”
तनिक रुक कर बाबा बोले,
“कारण ये कि कोई इनको यहाँ मेरे पास आने से रोक रहा है !”
“क्या?!”
“हाँ वत्स, कोई है ऐसा जिनके सामने इनकी एक नहीं चल रही है. वो जो कोई भी है इनसे कई गुणा अधिक शक्तिशाली है और बड़ी सरलता से मेरा इनके साथ किसी भी प्रकार का कोई भी सम्पर्क होने से रोक रहा है.”
“वो कौन है गुरूदेव?”
“अभी इसका पता नहीं चला है वत्स. पता कर सकता था यदि मैं इस बात के लिए भी तैयार रहता. परन्तु ऐसा कुछ होगा इसका तो मुझे रत्ती भर का आभास नहीं था.”
ये सुनकर गोपू को बहुत निराशा हुई. चांदू को भी.
बाबा ने और कुछ नहीं कहा क्योंकि उनके मन में भी कई विचार एक साथ उमड़ घुमड़ कर रहे थे.
कुछ समय और बीता.
अचानक चांदू को कुछ याद आया और तुरंत बाबा के पास आकर पूछा,
“गुरूदेव.. मुझे भी कुछ पूछना है.”
“पूछो वत्स.”
“गुरूदेव.. ये चंडूलिका कौन है?”
प्रश्न सुनते ही गोपू भी बाबा के सामने चांदू के पास आ कर बैठ गया.
दोनों का कौतुक देख बाबा मुस्कराए.
बोले,
“बहुत शक्तिशाली होती है ये चंडूलिका.. इनसे पार पाना हर किसी के बस की बात नहीं. इनसे या तो बहुत ही उच्च कोटि का सिद्ध पुरुष या सिद्ध साधक ही जीत सकता है या फिर ईश्वर का कोई विशेष कृपा प्राप्त व्यक्ति.”
“ओह.. ऐसा?! ये तो इसी से पता चलता है कि ये कितनी खतरनाक है.”
“ह्म्म्म.”
“पर गुरूदेव... ये आखिर है कौन?”
बाबा मुस्कराए.. पर स्वेच्छा से नहीं... ये इस बात का संकेत था कि अब बाबा जो बोलने जा रहे हैं वो अप्रत्याशित होगा. क्षणमात्र में उनका चेहरा पहले से भी अधिक गम्भीर हो गया.
गम्भीर आवाज़ में ही बोले,
“रानी चुड़ैल!”
सुनते ही दोनों शिष्य अपने स्थान पर बैठे बैठे ही उछल पड़े.
बाबा का ये उत्तर वाकई काफ़ी अप्रत्याशित था.
दोनों को ही अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि उन्होंने अभी अभी जो सुना.. वो क्या सच में सुना या फिर अत्यधिक उत्तेजना व उत्सुकता में उन्हें कोई भ्रम हुआ?
लगभग एक साथ ही दोनों का मुँह खुला,
“क्या?? कौन??!!”
इधर पुलिस स्टेशन में,
“जी सर.. श्योर सर. बिल्कुल होगा. सर, मैं उसी काम में लगा हुआ हूँ.”
इसी तरह कुछ और बातें करने के बाद इंस्पेक्टर रॉय ने फ़ोन क्रेडल पर रखा.
एक लंबी साँस छोड़ते हुए कुर्सी पर बैठ गया.
पास रखी ग्लास से पानी पिया. दो कागजों पर साईन किया. थोड़ा ठहर कर बेल बजाया.
बेल के बजते ही हवलदार श्याम तुरंत कमरे में आया,
“यस सर.”
“काम कैसा चल रहा है श्याम?”
“अ.. सब ठीक है सर.”
“हम्म.. अच्छा, मैं पूछ रहा था कि गाँव के केस का क्या हुआ?”
“गाँव...?”
“अरे वही मिथुन, तुपी काका इत्यादि वाला मामला... क्या हुआ उसका?”
“अम..स..सर... जाँच तो अभी चल ही रही है.”
“क्या... अभी भी...? श्याम... करीब डेढ़ महीना खत्म होने को आया और तुम कह रहे हो जाँच अभी भी चल रही है?”
श्याम ने सिर झुका लिया. वाकई लज्जित था वो.
सीरियस होते हुए रॉय ने पूछा,
“बात क्या है श्याम... जाँच अगर अभी भी चल रही है तो फिर उसका कोई प्रोग्रेस रिपोर्ट ही दे दो.”
“ज..जी सर... प्रोग्रेस तो है. व..”
“हम्म.. क्या प्रोग्रेस है बोलो?”
“सर, अभी तक के जाँच में इतना स्पष्ट हो गया है कि मिथुन की हत्या में किसी मर्द का हाथ नहीं है; मतलब, हमने जिन लोगों पर संदेह किया था, उनमें जितने भी पुरुष थे सब के सब निर्दोष प्रतीत हो रहे हैं.”
“हम्म.. तो क्या ये फाइनल है?”
“सर, फाइनल के बारे में अभी कहना थोड़ा जल्दबाजी होगा. परन्तु प्रथम दृष्ट्या तो ऐसा ही लगता है.”
“ओके.. तो इसका मतलब हुआ की महिलाओं; रुना और सीमा, ये दोनों संदेह के घेरे में अब भी हैं?”
“यस सर.”
“ओके.. तो फिर देर किस बात की. दोनों को फिर बुलाओ थाने. कड़ाई से पूछताछ करो. खुद ही सब उगल देंगी.”
“सर..”
“क्या?”
“यहीं पर एक छोटा सा प्रॉब्लम आ गया है.”
“प्रॉब्लम?!! कैसी प्रॉब्लम?”
“सर.. हमारे खबरी के अनुसार, हरिपद की बीवी सुनीता के भी लाल बाल हैं.. थोड़ा शेड लिए हुए.”
“मेहँदी?”
“जी सर.”
“तो? बालों को तो रंगा ही जा सकता है. गैर कानूनी नहीं है.”
“जी सर. गैर कानूनी नहीं है.”
“तो फिर?”
“सर, खबरी के अनुसार, वारदातों वाले स्थानों के आस पास उसे भी देखा गया है.”
“व्हाट?!!”
“जी सर.”
“त... तो क्या वो भी.....”
“सर, यहीं एक और पेंच है. सुनीता को उन स्थानों पर देखा तो गया है पर उसकी उपस्थिति के समय से वारदात के समय से ठीक मेल नहीं खा रहे हैं.”
अब इस बात ने रॉय का दिमाग और भी घूमा दिया. श्याम की ओर एकटक देखते हुए पूछा,
“आर यू श्योर?”
श्याम ने भी उतनी ही तत्परता से उत्तर दिया,
“यस सर.”
“ओह.. खबरी ने ठीक से पता किया है सब?”
“जी सर. खबरी अभी भी इसी काम में लगा हुआ है.”
“ओके. ओके... और कोई नयी बात?”
“हाँ सर. गाँव में कोई बाबा आया है. गाँव वालों ने ही बुलाया है. उन लोगों का मानना है कि गाँव में ये सब जो कुछ हो रहा है; किसी ऊपरी बला का काम है और इन सब से कोई अत्यंत सिद्ध साधक ही उन लोगों का व इस गाँव का उद्धार कर सकता है.”
रॉय धीरे से हल्का हँसा.. बोला,
“गाँव वालों की तो बात ही अलग है.
क्या लगता है तुम्हें, कैसा है ये बाबा? ढोंगी? या सच में कोई चमत्कार दिखा सकता है??”
“सर, मैंने पूछा था खबरी से इस बारे में, उसके अनुसार बाबा वाकई बड़ा सिद्धहस्त ज्ञात होता है. स्वभाव भी काफी अच्छा है. सबसे बड़ी आत्मीयता से बात करते हैं. गाँव आए उनको यही कुछ पंद्रह दिन के आस पास हो गए और इतने ही दिनों में कईयों के दुःख दर्द को दूर किया है उन्होंने.”
“हम्म.. तुम्हारी बातों से लगता है तुम भी उन पर विश्वास करते हो.”
रॉय ने हँसते हुए व्यंग्य किया.
उत्तर में श्याम चुप रहा.
मुस्करा कर सिर नीचे कर लिया.
रॉय को और भी कई काम करने थे इसलिए श्याम को जाने को कहा ये निर्देश देते हुए कि जाँच के काम में तेज़ी लाए और जल्द से जल्द प्रोग्रेस की हर खबर उन तक पहुँचाए.
श्याम के जाते ही रॉय दोबारा सामने पड़ी फाइल को उठा कर देखने लगा.
दूसरी ओर,
बाबा अपने दोनों शिष्यों को समझा रहे थे..
“हाँ वत्स.. ये जो शक्ति है ये बहुत ही शक्तिशाली होती है. साफ़ शब्दों में कहा जाए तो महाशक्तिशाली होती है ये. इनसे टक्कर ले पाना या लेना आत्मघात के समान होता है. दुष्ट व काली शक्तियों की प्रधान देवियों में से एक होती है ये चंडूलिका. हर कोई इनकी साधना नहीं करता है... क्योंकि हर कोई इनकी साधना कर ही नहीं सकता. इन्हें प्रसन्न करने का मार्ग व उपाय बड़ा विषम और दुष्कर है... और यदि इन्हें प्रसन्न कर लिया गया तो समझो आधी से अधिक काली शक्तियाँ तुम्हारे इशारों पर नाचने के लिए तत्पर रहेंगी सदा. उन शक्तियों से कोई भी साधक – साधिका दुनिया की कोई भी कार्य कर और करवा सकती है. चंडूलिका सिद्ध साधक – साधिका अजेय तो नहीं पर कम से कम इतना दम ज़रूर रखते हैं की कोई भी उन्हें सरलता से नहीं हरा पाए.”
बाबा के मुँह से ऐसी बातें सुन कर गोपू और चांदू का तो जैसे मन ही मर गया.
अभी कुछ देर पहले तक दोनों यही सोच रहे थे कि अपराधी को शीघ्र से शीघ्र पकड़ कर गाँव को आंतक व विपदा से मुक्त कर लेंगे परन्तु यहाँ तो मामला ही कुछ टेढ़ी खीर वाला निकला.
दोनों शिष्यों के मनोभावों को समझने में बाबा को देर न लगी.
मुस्करा कर बोले,
“चिंता न करो वत्स.. मन छोटा न करो....”
चांदू अधीरता के कारण बीच में ही बोल पड़ा,
“चिंता कैसे न करें गुरूदेव. आपने बात ही ऐसी कह दी. एक तो ऐसे साधक और शक्ति अजेय होती हैं और ऊपर से यदि इनसे टकराते समय आपको कुछ हो गया तो?”
“हा हा हा. तुम्हारी ये चिंता अच्छी लगी चांदू और ये उचित भी है. पर लगता है अत्यधिक चिंता में तुमने मेरे अंतिम वाक्य पे गौर नहीं किया.”
चांदू असमंजस वाली दृष्टि से बाबा को देखने लगा.
बाबा ने कहा,
“वत्स, मैंने कहा की ‘चंडूलिका सिद्ध साधक – साधिका अजेय तो नहीं पर कम से कम इतना दम ज़रूर रखते हैं की कोई भी उन्हें सरलता से नहीं हरा पाए’ इसका अर्थ ये हुआ कि इन्हें हराया जा सकता है. इन्हें हराने के लिए विशेष मंत्र तंत्र की आवश्यकता होती है जो हर कोई नहीं जानता है और न ही अधिकांश लोग जानने का ही प्रयास करते हैं.”
“अर्थात् आप इन्हें हरा सकते हैं?”
“बिल्कुल.”
“अर्थात् आप इन्हें हराने का उपाय जानते हैं?”
चांदू की इस बात पर बाबा ज़ोर से हँस पड़े,
“हा हा हा हा हा हा... वत्स.. अगर नहीं जानता तो ये कहता ही क्यों की मैं इन्हें हरा सकता हूँ. हा हा हा.”
चांदू अपने इस बेवकूफी वाले प्रश्न पर स्वयं बड़ा लज्जित हुआ.
गोपू भी चांदू के इस तरह के व्यवहार पर हँसने से स्वयं को रोक न सका.
कुटिया में वातावरण इसी बहाने थोड़ा हल्का हो गया.
बाबा भी हँस-मुस्करा रहे थे... पर अंदर ही अंदर इस बात से भी चिंतित थे कि चंडूलिका शांत नहीं बैठी होगी. शौमक और अवनी के आत्माओं के संग अपने अगले शिकार की तलाश में होगी!
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१६)
चार दिन बाद,
एक दिन श्याम सुबह सुबह... रॉय के थाने आते ही उसके सामने जा कर उपस्थित हो गया.
चेयर पर आराम से बैठते हुए रॉय ने बड़े इत्मीनान से पूछा,
“क्या बात है श्याम? कुछ विशेष है??”
“जी सर... ए..एक टिप मिली है.”
“टिप.. कैसी टिप?”
“मिथुन मर्डर केस में, सर.”
“खबरी से??”
“जी सर.”
“पक्की है न?”
रॉय ने सीरियस होते हुए पूछा.
श्याम ने भी उतनी ही तत्परता से उत्तर दिया,
“जी सर... और अगर खबर पूरी तरह से गलत न भी हुआ तो भी हमें इससे बहुत इम्पोर्टेन्ट लीड मिल सकती है.”
“हम्म.. दैट्स वैरी गुड.”
“थैंक्यू सर.”
“तो.. क्या कहते हो.. चलना है अभी?”
“सर, अगर आप अभी फ्री हों तो...”
“हम्म... मैं भी वही सोच रहा था. अच्छा, एक बात बताओ.. जा कर जाँच पड़ताल करनी है या उठा कर लाना है.”
“सर, मैं तो सोच रहा था की सीधे उठा कर ही ले आएँ. लेकिन ऐसा होना....”
“क्यों नहीं हो सकता... एक काम करो, तुम जाओ... साथ में ५-६ साथियों को ले जाओ. और जिसको लाना है, ले आओ... पूछताछ के नाम पर. वैसे कोई कुछ कहेगा नहीं पर अगर कोई पूछे तो कहना ऊपर से आर्डर आया है... समझे?”
“यस सर.”
“गुड.. अब जाओ. गुड लक.”
“थैंक्यू सर.”
सैल्यूट मार कर श्याम ख़ुशी ख़ुशी कमरे से निकल गया.
करीब दो घंटे बाद श्याम लौटा... अपने पाँच अन्य साथियों के साथ.
और साथ में थे तुपी काका, उनकी पत्नी सीमा और भांजा बिल्टू.
थाने में लौटने के साथ ही श्याम, रॉय के पास गया और खबर सुनाई.
रॉय खुश हुआ पर जैसे ही कमरे से निकला; उन तीनों को देख कर हटप्रभ हो गया.
उसकी तो बुद्धि ही चकरा गई.
प्रश्नसूचक दृष्टि लिए श्याम की ओर देखा.
श्याम ने पास आ कर कहा,
“सर, खबर मिली है की मिथुन मर्डर केस में सीमा किसी तरह संलिप्त है और इस केस में और अधिक प्रकाश डालने के लिए इसके पति और भांजे को भी साथ ले आएँ हैं.”
“वैरी गुड. गुड जॉब.”
श्याम की चतुराई देख कर रॉय खुश होता हुआ उसे शाबाशी दिया.
अपने सीनियर से शाबाशी मिलने से श्याम भी काफ़ी गदगद हो उठा.
परन्तु क्षण भर बाद ही चेहरे पर चिंता लिए बोला,
“लेकिन सर... एक छोटी सी दुविधा है..”
“वो क्या?”
“इन तीनों को ले तो आया.. पर अब इनसे असल बात कैसे उगलवाया जाए ये एक समस्या है.”
“समस्या की क्या बात है श्याम. एक काम करते हैं, पहले एक एक कर तीनों को अलग अलग बैठा कर सवाल जवाब करेंगे... अगर इस प्रक्रिया से हमारा काम हो जाता है तो ठीक है.. नहीं तो ज़रुरत पड़ने पर तीनों को साथ बैठा कर क्रॉस क्वेश्चन करेंगे.”
रॉय के इस आईडिया से श्याम बहुत खुश हो गया,
“ओके सर.”
कह कर आगे की कार्रवाई को ले कर व्यस्त हो गया.
इधर,
बाबा की कुटिया में,
गोपू और चांदू बाबा के विशेष दिशा निर्देश के अंतर्गत कुछ विशेष तैयारियों में लगे हुए थे. दोनों के ही हाथ काफ़ी तेज़ी से चल रहे थे और कई सामानों को इकठ्ठा करने में व्यस्त थे.
कई पवित्र और दैव सम्बन्धी वस्तुओं को अच्छी तरह से देखा परखा जा रहा था.
काफ़ी देर तक यही चलता रहा.
जब सभी तैयारी पूरी हुई तब तीनों ही आराम करने लगे. सुस्ताते हुए चांदू पूछा,
“गुरूदेव, इतने से हो जाएगा न?”
“हाँ वत्स.”
“और कार्य?”
“हाहाहा... क्यों.. गुरु पर विश्वास नहीं?”
“क्षमा करें गुरूदेव.. मेरा ये अभिप्राय नहीं था. दरअसल, जब से चंडूलिका के बारे में सुना है.. मन हमेशा ही भयग्रस्त व संदेहग्रस्त रहता है.”
“अपनी क्षमताओं को लेकर इतना संशययुक्त रहना क्या शोभा देता है वत्स?”
“नहीं गुरूदेव... म..”
उसे बीच में ही रोकते हुए बाबा बोले,
“वत्स.. सदैव स्मरण रखना.. चाहे कुछ भी हो.. अपने क्षमताओं पर कभी भी संदेह नहीं करना चाहिए. इस व्यक्ति विशेष की योग्यता का ही ह्रास होता है. स्वयं पर विश्वास नहीं रहता इससे कार्य विशेष को लेकर मन में भय रहता है और अरुचि भी जाग जाती है.”
चांदू सिर झुका लिया,
बोला,
“जी गुरूदेव.”
बाबा ने मुस्करा कर चांदू के सिर पर हाथ फेरा और दोनों को ही सम्बोधित करते हुए बोले,
“मेरी चिंता अपनी योग्यता, क्षमता या कार्य के पूरा होने या न होने को लेकर नहीं है.. मेरी चिंता है गाँव वासियों को लेकर.”
दोनों ने प्रश्नसूचक दृष्टि से बाबा की ओर देखा...
बाबा कहते गए,
“पता नहीं.. न जाने क्यों मेरा मन कह रहा है कि आने वाले सात दिनों के अंदर अंदर कुछेक गाँव वासियों पर इसी चंडूलिका का या फिर शौमक और अवनी का कोप होने वाला है.”
“तो क्या हुआ.. आप उन्हें बचा तो सकते ही हैं गुरूदेव.”
“नहीं वत्स, आखिर मैं भी एक मनुष्य हूँ..
मेरी अपनी भी कुछ सीमाएँ हैं. मैं बहुत कुछ तो कर सकता हूँ.. पर सब कुछ नहीं.”
“तो फिर उन लोगों को बचाने का और कोई मार्ग शेष नहीं है?”
“है वत्स.. है... मैंने इन लोगों को जो दिशा निर्देश दिया है अगर उसका पालन पूरी निष्ठा से किया जाए तो अवश्य ही सबके प्राण सुरक्षित रहेंगे.. अन्यथा दुर्घटना होने की पूरी सम्भावना है.”
“अर्थात् गुरूदेव.. आपको ये संदेह है कि कदाचित सभी आपके निर्देशों का पालन नहीं करेंगे?”
“संदेह नहीं वत्स... विश्वास!... विश्वास है इस बात का.”
“क..क्यों... गुरूदेव...?”
बाबा ने उत्तर में कुछ नहीं कहा.
वो चुप रहे और खिड़की से बाहर आसमान की ओर देखने लगे.
गोपू और चांदू इस संकेत को समझ गए. बाबा ने कुछ देर पहले खुद ही कहा था कि वे बहुत कुछ कर सकते हैं... लेकिन सब कुछ नहीं. सब कुछ उनके हाथ में नहीं है. पता नहीं आने वाले सात दिनों में गाँव में क्या क्या होगा...
दोनों अत्यंत चिंतित हो उठे.
उधर,
थाने में इंटेरोगेशन शुरू हो चुका था.
शुरुआत तुपी काका से ही हुआ...
पर तब इंस्पेक्टर रॉय और हवलदार श्याम का आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब इंटेरोगेशन को शुरू हुए दस मिनट ही मुश्किल से हुए थे कि तुपी काका बिलख बिलख कर रोने लगे और हाथ जोड़ कर पुलिस वालों से एक ही बात बार बार दोहराने लगे कि,
“दया कीजिए साब, मुझसे मेरी बीवी के बारे में मत पूछो; मैं नहीं बोल पाऊंगा... साब... मत पूछो साब... कृपा करो साब.”
“क्यों.. क्यों कुछ नहीं बोल पाओगे?”
रॉय ने थोड़ा सख्ती से पूछा.
तुपी काका रोते हुए ही बोले,
“साब, जीवन में आज तक अपने आचार, विचार, व्यवहार और व्यापर से बहुत नाम कमाया. बहुत सम्मान मिला पूरे गाँव में... पूरे समाज से. मेरी तो विवाह की भी इच्छा नहीं थी.. माँ के गुजर जाने के बाद बाबूजी की जिद्द कहिये या उनकी इच्छा; देर से ही सही... मैंने शादी कर ली. संतान नहीं हुआ.. इसे भी भाग्य समझ कर समझौता कर लिया. ल...ले.. लेकिन य.. ये थाना.. प... पुलिस... सवाल... ज...जवाब... मुझसे न.. नहीं होगा साब... नहीं होगा.”
बच्चों की तरह रोते बिलखते तुपी काका झुक कर लगभग रॉय के पांव ही पड़ गए...
रॉय तुरंत पीछे हट गया.
तुपी काका का रोना धोना देख कर श्याम तो बिल्कुल किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो गया. उससे कुछ बोलते नहीं बना. वैसे भी, जब उसके सीनियर वहाँ पर उपस्थित हैं तो फिर वो क्यों बोले.
कुछ पलों के लिए रॉय का दिमाग भी एकदम से ब्लैंक हो गया था पर था वो एक बहुत ही स्मार्ट ऑफिसर. खुद को सम्भालने में कम समय लगा उसे. तुरंत ही समझ गया कि तुपी काका ऐसा कुछ अवश्य ही जानते हैं जो इस केस में बहुत सहायक हो सकता है पर साथ ही कदाचित तुपी काका और उनके परिवार के सम्मान को चोट पहुँचा सकता है.
इसलिए उस समय तो तुपी काका को वहाँ से उठ कर बाहर जा कर बैठने बोल दिया पर ये दृढ़ निश्चय भी कर लिया की थोड़ी देर बाद तुपी काका के अंतर्मन को फिर से खोदेगा.
रॉय ने बिल्टू को बुलवाया.
बिल्टू अंदर आया ...
घबराया..
बैठा.. उसे पहले पानी दिया गया...
रॉय ने उसे पाँच मिनट का टाइम दिया.
बिल्टू का घबराहट धीरे धीरे कुछ कम हुआ.
रॉय अब उसके ठीक सामने चेयर पर बैठा... उसकी ओर देखते हुए..
पूछा,
“बिल्टू... अब कैसा लग रहा है..?”
“ज..जी.. ठ.. ठीक हूँ ...स... साब..”
“और पानी चाहिए?”
“न..नहीं साब..”
“हम्म.. तो अब हम जो कुछ पूछेंगे उसका तुम सही सही जवाब देना... ठीक है?”
“ज..ज..जी...साहब... ब.. बिल्कुल..”
“ह्म्म्म.. तो बिल्टू.. ये बताओ... तुम्हारा अच्छा नाम क्या है...तुम यहाँ कब से रहते हो.. क्यों रहते हो... तुम्हारे माता पिता कहाँ हैं.. इत्यादि..”
“ज.. जी साब.. बचपन में माता पिता के देहांत के बाद से ही मामा के पास यहाँ रहने लगा था. मामा मामी से बहुत प्यार मिला है. बिल्कुल उनके अपने बेटे जैसा. उनकी अपनी कोई संतान नहीं है न... इसलिए देखा जाए तो एक तरह से... उन लोगों ने मुझे अपना लिया... था... म.. मेरा न.. नाम भी मामा जी ने ही र..रखा था ... गोबिन्दो दास... पर चूँकि सिर पर असल माँ बाप का ही छाँव नहीं था इसलिए अपना ही बेटा मानते हुए... म.. मामा न..ने मेरा नाम गोबिन्दो पाल रखना ही अ..अच्छा समझा.”
“ओके.. मामा और मामी के साथ तुम्हारे संबंध कैसे हैं?”
“बहुत अ.. अच्छे ह..हैं साब.”
“मामा और मामी के बीच के संबंध कैसे हैं?”
“ब.. बा.. बहुत बढ़िया है साब.”
“उनका अपना कोई सन्तान नहीं है.. इस बात को लेकर दोनों के बीच कभी कोई खटपट नहीं हुई?”
“स.. साब.. म.. मैं तो बचपन से ही इनके साथ रहता हूँ.. न..नहीं साब, कभी कोई खटपट नहीं हुई है.”
“सच कह रहे हो?”
“ज.. जी.. साब...”
“दोनों की आयु में बहुत अंतर है.. कम से कम पंद्रह साल का. विवाह करने में इतनी देर क्यों की तुपी काका ने?”
“नहीं पता साब... भ.. भला मुझे कैसे पता होगा?”
“इस आयु अंतर के कारण भी कभी कोई खिटपिट हुई है दोनों में?”
“अम... ज..जहाँ तक मुझे मालूम है साब... ऐसा तो कभी क..कुछ हुआ नहीं दोनों में.”
“पक्का?”
“जी साब.”
“हम्म.. और मिथुन...?’
“म.. मिथुन का क्या साब..?”
“ये मिथुन का क्या किस्सा है? उसके बारे में कुछ बताओ.”
“मिथुन भी बहुत कम आयु से ही हमारे यहाँ रहते आया है साब.. दरअसल, उसके माँ बाप बहुत गरीब थे.. बच्चे कुल सात थे.. समुचित पालन पोषण में बहुत ही असमर्थ थे दोनों इसलिए तुपी मामा के यहाँ मिथुन को छोड़ गए थे. काम भी करेगा.. रहना खाना होगा.. और बड़ा भी हो जाएगा..”
“क्यों.. तुम्हारे तुपी मामा के यहाँ ही क्यों छोड़ा मिथुन को?”
“जी.. व.. वो क्या है कि... मिथुन के पिताजी को भी उनके पिताजी ने तुपी मामा के पिताजी स्वर्गीय सुनील पाल जी के यहाँ छोड़ गए थे. वो भी हमारे यहाँ ही बड़े हुए थे..
परिवार के सदस्य की भांति रहते खाते पीते और .. बदले में घर से सम्बन्धित काम कर देते.... चाहे घर में हो या बाहर का काम हो.”
“बाहर का काम...?”
“जी.. जैसे पुआल ले आना, सब्जी ले आना.. कहीं कुछ पहुँचा कर आना.. इत्यादि.. सब.”
“ओह्ह.. ओके..ओके..”
“ज.जी साब.”
“बिल्टू... तुम्हें याद होगा शायद.. जिस दिन हम तुम्हारे घर गए थे.. मिथुन की बॉडी देखने... उस दिन तुमने हमें बताया था कि तुम्हारे मामा मामी; विशेषतः तुम्हारी मामी मिथुन को सगे बेटे से भी अधिक मानती थी... ऐसा क्यों? तुम तो थे ही बेटे के रूप में.. फिर कोई और क्यों?”
“न.. नहीं साब.. वो मुझे ही अधिक मानती हैं.”
“क्या मानती हैं?”
इस प्रश्न पर बिल्टू एकदम सुन्न सा हो गया. उसने कल्पना ही नहीं किया था कि इस तरह से भी प्रश्न कर सकते हैं पुलिस वाले.
थूक निगलते हुए तनिक मुश्किल से बोला,
“ब.. बेटा मानती है.. साब.”
“पक्का..??”
“जी साब.”
“तो फिर मिथुन को सगा बेटा जैसा मानने का कारण??”
“पता नहीं सर.”
कह कर बिल्टू ने नज़रें फेर लिया. घबराहट के लक्षण फिर से दिखाई देने लगे थे. रॉय ने कुछ सोचा और बिल्टू को जाने दिया.
अब बारी सीमा की थी.
१७)
“ठास!!”
एक ज़ोर का आवाज़ गूँजा.. एक थप्पड़ की आवाज़.
और इसी के साथ एक और आवाज़ निकली,
“र..रुक जाइए.. म.. मैं.. ब.. ब...बताती...ह.. हूँ...”
और ये आवाज़ थी सीमा की.
सीमा, अर्थात् तुपी काका की बीवी.. सीमा पाल.
गाल पर रसीदे गए उस ज़ोरदार थप्पड़ ने अपनी छाप तो छोड़ी ही; साथ में सीमा की सारी हेकड़ी भी निकाल दी जो अब से कुछ मिनटों पहले रॉय, श्याम और तीसरे पुलिस वाले को दिखा रही थी.
हालाँकि जब सीमा को इंटेरोगेशन रूम में बुलाया गया तब वहाँ दो लेडी पुलिस वाली भी थी... पर सीमा ने मानो कुछ न बोलने की कसम खा रखी थी.. एक तो कुछ बोलना नहीं चाह रही थी; दूसरा, कुछ बोले भी तो इतना कम की समझ में ही न आए की बात का मतलब क्या हुआ..
थोड़ी देर बाद ही रॉय के दिमाग ने उसे एक उत्तम विचार दिया और उसने तुपी काका और बिल्टू; दोनों को अंदर बुलवा लिया. सीमा से फिर दो चार सवाल किए गए लेकिन जब उसने फिर कोई जवाब न दिया और अपने उसी रवैये पर अड़ी रही तब मजबूरन रॉय को अपने सिपाहियों को एक खास इशारा करना पड़ा उन लोगों ने भी तुरंत सांकेतिक आदेश का पालन करते हुए तुपी काका और बिल्टू को डंडों से अच्छे से कूटने लगे.
मुश्किल से दस से बारह डंडे ही पड़े होंगे कि सीमा प्रश्नों के उत्तर देने को तैयार हो गई.
शुरू के चार पाँच प्रश्नों के उत्तर उसने सही दिए भी पर फ़िर धीरे धीरे अपने उसी पुराने रवैये में लौटने लगी और अपने उत्तरों को सीमित करने लगी.
वार्निंग भी दी गई उसे...
कुल छह वार्निंग...
पर नहीं मानी..
तब फ़िर से मजबूरन रॉय को दोनों महिला पुलिस कर्मियों को वही विशेष संकेत देना पड़ा..
और इस बार निशाना सीमा थी.
शुरू के सात आठ थप्पड़ खाने के बाद भी उसने थोड़ी प्रतिरोध करने की और स्वयं को निर्दोष बताने की पूरी कोशिश की लेकिन उन दोनों हट्टे कट्टे महिला कर्मियों के ज़ोरदार बरसते थप्पड़ों के सामने शीघ्र ही हथियार डाल दी.
रॉय ने गौर से देखा सीमा को...
मार और भय से अब वो थरथर काँप रही थी.
अभी ही सही समय है; ऐसा जान कर रॉय ने दोबारा प्रश्नोत्तर का भार संभाला.
सीमा के बिल्कुल सामने बैठा.
बोतल दिया पानी पीने को.
सीमा ने कांपते हाथों से बोतल थामा और रॉय से किसी इशारे की प्रतीक्षा किए बगैर ही गटागट पानी पीने लगी.
पानी पी कर तीन मिनट सुस्ताने के बाद,
“तो सीमा जी.. अब आप सब कुछ सच सच कहने के लिए तैयार हैं?”
“ज..जी.. साब.”
“ठीक है.. तो शुरू करते हैं प्रश्नोत्तर काल. और ध्यान रहे, इस बार सब सीधे सीधे ही बताइयेगा.. होशियारी जहाँ की... ये दोनों छोड़ेंगी नहीं आपको.. और मैं भी इन्हें रुकने नहीं कहूँगा.”
सीमा की आँखों में देखते हुए रॉय ने बेहद गंभीर स्वर में कहा.
सीमा ने डरते हुए कनखियों से अपने अगल बगल खड़े दोनों महिला कर्मियों को देखी और फिर रॉय की ओर देखते हुए हाँ में सिर हिलाई. साथ ही धीरे से बोली,
“स..साब.. मैं इनके सामने नहीं ब...बो.. बोल पाऊँगी..”
कह कर उसने याचना भरी दृष्टि से रॉय को देखा.
रॉय खुश हुआ. उसने सिपाहियों को इशारा कर के तुपी काका और बिल्टू को वहाँ से ले जाने को कहा.
उनके वहाँ से जाते ही उसने बड़े प्यार से प्रश्न करना शुरू किया,
“सीमा जी, ये बताइए.. तुपी जी के साथ आपके संबंध कैसे थे?”
“अ..अच्छे ... थ.. थे...स..साब..”
“कितने अच्छे?”
“ब.. बहुत अच्छे..”
“बिल्टू के साथ आपके सम्बन्ध कैसे हैं?”
“अच्छे हैं.”
“क्या सम्बन्ध है?”
“हम हैं तो मामी और भांजा.. लेकिन माँ बेटे का भी सम्बन्ध मान कर चलते हैं.”
इस उत्तर पर रॉय थोड़ा ठिठक गया और दो सेकंड के लिए सीमा की ओर देखा.
फिर तुरंत ही यथावत प्रश्न करना शुरू किया,
“ओके सीमा जी; अगर आप दोनों के बीच माँ बेटे वाला सम्बन्ध है तो फिर कहने वाले ये क्यों कह रहे हैं कि आप दोनों के बीच कोई और सम्बन्ध भी है?”
“ज..जी?!!”
सीमा ऐसी प्रतिक्रिया दी मानो रॉय का प्रश्न सुन कर उसे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा हो.
रॉय बिल्कुल शांत बैठा रहा... सीमा की ओर एकटक देखता हुआ.
बड़े आराम से बोला,
“जी, आपने सही सुना.. लोग ऐसा ही कहते हैं... और यदि ऐसा कहते हैं तो अवश्य ही कोई विशेष आधार होगा ऐसी बातों का...या... फ़िर कोई विशेष प्रयोजन!”
“अ.. आधार? ... प्रयोजन??”
“जी बिल्कुल.”
“नहीं.. ऐसा कुछ नह..”
सीमा की बात पूरी होने से पहले ही रॉय बोल पड़ा,
“हमारे सूत्रों से हमें ऐसी ही खबर मिली है.. और हमारे सूत्र ऐसी बातों में इस तरह की गलतियाँ नहीं करते. व्यर्थ लांछन लगने – लगाने वाले कार्य नहीं करते. चलिए.. अब सब सच सच बताइए... नहीं तो ....
”
कहते हुए रॉय ने सीमा को दोनों महिला पुलिस कर्मियों की ओर संकेत कर के दिखाया.
सीमा अब और भी अधिक सहम गई.
पानी की तरह अब स्पष्ट था कि सीमा वाकई ऐसा कुछ जानती है जो वो चाह कर भी बता नहीं सकती; लेकिन रॉय के पास भी अब अधिक समय नहीं था. उसे शीघ्र से शीघ्र परिणाम तक पहुँचना था.
अतः वो चेयर से उठ खड़ा हुआ और पीछे हटते हुए बोला,
“ये अब भी नहीं बोलेंगी.. सुनो, कुछेक और लगाओ तो इसे.”
इतना सुनना था कि सीमा विद्युत् की तेज़ी को भी मात देती हुई हड़बड़ा कर बोल उठी,
“न.. नहीं.. नहीं... सुनिए..”
आगे बढ़ती दोनों महिला कर्मी रुक गयीं.
रॉय पलट कर सीमा की ओर देखा...
सीमा अत्यंत भयभीत होते हुए बोली,
“स..सुनिए... म.. मैं स..सब बताऊँगी...”
“यही तो आपने कुछ देर पहले भी कहा था... फ़िर भी कुछ नहीं बोल रही थीं... अब भी यही कह रही हैं.. क्या अब आप सच में सब सच सच बोलेंगी? यदि नहीं.. या कोई भी चालाकी हुई.. तो फिर इन दोनों को मैं नहीं रोकूंगा... ठीक??”
“ज.. जी.. ब... बिल्कुल ठीक..”
सीमा अपने चेहरे से पसीना पोंछते हुए बोली.
रॉय दोबारा सीमा के ठीक सामने रखे अपने चेयर पर जा कर बैठ गया.
“चलिए सीमा जी.. कहना शुरू कीजिए.”
सीमा ने बोतल उठा कर पानी पी, एक गहरी साँस ली और कहना शुरू की,
“आपके सूत्रों ने खबर तो सही दी पर थोड़ी गलत भी है. जिस तरह की सम्बन्ध की बात आप कर रहे हैं वो बिल्टू के साथ नहीं अपितु मिथुन के साथ था. मेरे स्वर्गीय ससुर ने जब मिथुन को अपने घर में स्थान दिया था तब वो बहुत छोटा था और मैं भी उस समय यहाँ नहीं थी... मतलब.. ब्याह नहीं हुआ था उस समय मेरा. मैं तो बहुत बाद में आई थी. तब तक मिथुन भी बड़ा हो गया था. काफ़ी घुल मिल कर रहने वालों में से एक था वो. हँसमुख था, युवा था, बहुत सम्मान करता था और हमेशा ही भाभी भाभी करता रहता था.
मेरे यहाँ आने के बाद शुरू के कुछ महीने ऐसे ही हँसी ख़ुशी बीते.
पर, धीरे धीरे मैंने गौर करना शुरू किया कि मिथुन सदैव ही एक अलग ही दृष्टि से मुझे देखता है. भाभी भाभी कर के तो वो तब भी बोलता रहता था और बड़े आदर से सन्मुख आता था. जितनी देर बात करनी होती; बड़े हँसमुख तरीके से करता था लेकिन जो मैंने गौर किया वो ये था कि अवसर मिलते ही वो मेरे शरीर के कटावों को बड़े लोलुप तरीके से देखने लगता था... और ऐसा कोई भी अवसर वो व्यर्थ नहीं जाने देता था जिसमें वो मेरे शरीर के अंगों को न देख पाए.
(तभी रॉय अपने चेयर से उठा और उन दोनों महिला कर्मियों को एक संकेत कर के अपने साथ श्याम और एक और सिपाही को ले कर उस सेल से बाहर चला गया. रॉय के बाहर जाते ही एक महिला कर्मी सीमा के सामने रॉय वाले कुर्सी पर बैठ गई और दूसरी ने भी पास ही रखे एक चेयर पर बैठ गई. सीमा ने अनवरत बोलना चालू रखा था.
)
शुरू में तो मैंने यही सोचा की कदाचित मेरे स्त्री सुलभ प्रवृति के कारण ही ऐसा लग रहा है और मैं नाहक ही इस बेचारे पर संदेह कर रही हूँ; लेकिन शीघ्र ही मुझे आभास हुआ कि मेरी स्त्री प्रवृति ऐसी गलती नहीं कर सकती.
कोई तो कारण होगा जो मेरी इंद्रियाँ मुझे इस प्रकार के संकेत दे रही हैं.
पहले तो मैं ध्यान नहीं दी... सच कहूँ तो ध्यान नहीं देना चाही पर जल्द ही मैंने अपनी स्त्री प्रवृति और इन्द्रियों पर भरोसा कर के मिथुन के गतिविधियों पर नज़र रखने लगी.
और बहुत शीघ्र ही उसे भोला व मासूम समझने की मेरी भूल का मुझे पता चल गया.
वो वाकई अक्सर मुझसे नज़रें चुराकर मेरे जिस्म के कटावों को लालसा भरी नज़रों से देखता था. छोटा सा अवसर मिलते ही छूने की कोशिश करता था. कई बार किसी न किसी बहाने से मेरे कमर व स्तनों को छूने में वो सफल रहा.
कुछ दिन तो केवल मुझे देखने और मुझे कहीं कहीं से छूने तक सीमित रहा... और धीरे धीरे ही सही... उसका दुस्साहस बढ़ता गया...
कभी मेरे नहाने के समय आ आकर बाथरूम का दरवाज़ा खटखटाता और खोलने पर कुछ भी इधर उधर की छोटी मोटी बात पूछता.. और आँखें उसकी मेरे अर्धनग्न शरीर पर होती.
कभी मैं कपड़े बदल रही होती तो अचानक से कहीं से आ टपकता और वासना से मुझे घूरने लगता.
मैंने कई बार कोशिश की उससे दूर रहने की, अपने पति को उसके बारे में बताने की पर असफल रही. बिल्टू को कुछ इसलिए नहीं बोली कभी क्योंकि क्या भरोसा वो शायद कुछ कर बैठता और फिर गाँव भर में हमारे परिवार के चर्चे होते... जोकि अपने आप में ही बदनामी है.
एक ओर जहाँ मैं मिथुन के बढ़ते दुस्साहसों से परेशान और चिंतित होती जा रही थी वहीँ दूसरी ओर अपने पति की उपेक्षा से भी काफी निराश, हताश व उदास थी.
विवाह के छह साल होने को आ रहे थे... लेकिन न ही हमारी अपनी कोई संतान थी और न ही हम दोनों में पति-पत्नी वाला सम्बन्ध. कहते हैं कि विवाह के आठ दस सालों बाद वैसे भी अधिकतर पति पत्नी के बीच पति पत्नी वाला संबंध न हो कर भाई बहन वाला संबंध हो जाता है. और यहाँ हम दोनों में तो पहले से ही भाई बहन वाला रिश्ता होने को आ रहा था. केवल कहने के लिए ही हम दोनों पति-पत्नी थे.
हर रात को ये खाना खा कर सो जाते थे और मैं करवट बदलते रह जाती थी. कुछेक बार मैंने खुद से पहल भी किया, लेकिन इनकी आँखें ही नहीं खुलती.. इन्होंने भी कुछेक बार प्रयास किया लेकिन काम शुरू होते ही इनका काम ख़त्म हो जाता था.
कई दिन, महीने और साल मैंने ऐसे ही गुजार दिए... मान मर्यादाओं में रहते हुए.
लेकिन ये क्षुधा ऐसी है कि बस बढ़ती ही जाए... बढ़ती ही जाए.
और इधर मिथुन भी अपनी गतिविधियों में धीरे धीरे उन्मुक्त होता जा रहा था.
मिथुन रोज़ सुबह उठ कर घर के पीछे, जहाँ तबेला है और उसके बगल में ही वो कमरा जहाँ वो रहता है; वहीँ खुले में व्यायाम किया करता था.
एक दिन अचानक ही मेरी नज़र उस पर गई. उसके युवा होते शरीर में गठित होते सुपुष्ट मांसपेशियों को देख कर मेरा मन मचलने – बहकने लगता. मैं चाहती तो नहीं थी.. बिल्कुल भी नहीं... पर न जाने क्यों रह रह कर उसकी ओर मेरा मन खींचता चला जाने लगा. चाहे मैं कोई काम कर रही हूँ या फिर आराम; रह रह कर उसका कसरती बदन मेरी आँखों के सामने छा जाता.
तब अचानक एक दिन मेरे मन में ये विचार आया कि मैं अपने अंदर ये बोझ क्यों ढोती फिरूँ.. मन तो पति से भरना चाहिए था.. लेकिन अगर पति से नहीं हो रहा.. तब क्यों न किसी और से करूँ.
और अगले ही दिन से मैंने भी मिथुन को इशारे देना शुरू कर दिया.
उसके युवा होते मन को मेरे इशारे समझते देर न लगी और....”
कहते हुए सीमा चुप हो गई.
दोनों महिला पुलिसकर्मियों ने अगले पाँच मिनट तक की प्रतीक्षा की कि सीमा अब कुछ बोलेगी.
लेकिन जब सीमा कुछ न बोली तब सामने बैठी महिला कर्मी ने अपनी नज़रें पैनी करते हुए उससे पूछी,
“और??”
एक पल रुक कर सीमा होंठ खोली,
“और फिर उसके बाद से हम दोनों के बीच एक संबंध बन गया.”
“कैसा संबंध... और ‘हम दोनों’ मतलब किन दोनों के बीच?”
“अ...अ..व.....”
“जल्दी बोलो!!”
महिला कर्मी ने ज़ोर से डांटा.
सीमा और अधिक डर से सहम गई.
फ़ौरन बोली,
“अ..अव..अ...अवैध संबंध..”
“किनके बीच??”
“म...म...मेरे..अ...और.. र....और... मिथुन के बीच..”
“ह्म्म्म... ठीक... अब ये बता कि उसे मारी क्यों...??”
“क..किसे?”
“मिथुन को!”
सुनते ही सीमा का चेहरा फक्क से सफ़ेद पड़ गया..
आँखों से अविश्वास व्यक्त करती हुई बोली,
“य..ये..अ..आप क्या कह रही हैं...? भला म.. मैं.. मिथुन की ह.. हत्या क्यों करुँगी??”
“तूने नहीं किया?”
“न.. नहीं.”
“नहीं किया?”
“नहीं.”
“सच में?”
“ज..जी.”
“सच कह रही है तू?”
“ज..जी.. सच कह रही हूँ.”
“सुन, तूने मिथुन को नहीं मारा.. ये बात बिल्कुल अच्छे से सोच समझ कर ही बोल रही है न?”
“जी, ब.. बिल्कुल..”
“पक्का??”
“जी.....”
सीमा आगे भी कुछ कहने जा रही थी कि तभी उसके कान के पास एक तेज़ धमाका सा हुआ और इसी के साथ अत्यधिक पीड़ा से सीमा दोहरी होती चली गई.
अपने बाएँ गाल पर हाथ रख कर वो सिर झुका ली.. आँखों के आगे अँधेरा छा गया.
अगले कुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोली.
कुछ और समय बीतने के बाद जब सीमा धीरे धीरे सामान्य हुई तब उसके सामने बैठी महिला पुलिस कर्मी ने चेहरे पर बिना कोई अतिरिक्त भाव लिए एक एक शब्द पर ज़ोर देते हुए बड़े शांत स्वर में पूछी,
“अब बोलो, तुमने मिथुन को क्यों मारा?”
पीड़ा की अधिकता के कारण सीमा की आँखों में आँसू आ गए थे..
तुरंत कुछ कहते नहीं बना उससे..
जब बगल में बैठी दूसरी महिला कर्मी ने सख्ती से दोबारा उससे प्रश्न किया तब फफक कर उत्तर दिया सीमा ने,
“ज..जी...म..म..मैं.. मैंने.... मारा है...था...उ..उसे..”
“हम्म..
हालाँकि मेरा प्रश्न ये नहीं था कि तुमने उसे मारा है या नहीं या फिर उसे किसने मारा है... लेकिन ठीक है.. तुमने इसका उत्तर स्वयं ही दे दिया.. तो अब ये बताओ मोहतरमा कि तुमने उसे मारा क्यों?? असल प्रश्न यही है और मैं अपने इसी प्रश्न को फिर से तुमसे पूछ रही हूँ.”
सीमा अब भी अपने गाल को सहला रही थी...
गाल उसका टमाटर से भी अधिक लाल हो गया था..
बोलने का प्रयास कर के भी उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे... आँसू झर झर गिर रहे थे..
उसकी स्थिति देख सामने बैठी महिला कर्मी ने पानी वाला बोतल उसकी ओर बढ़ाया,
“चल.. पी ले ये... उसके बाद फटाफट एकदम धरल्ले से कहना शुरू करना.”
सीमा बिना कोई ना नुकुर किए बोतल ले ली और पानी पीने लगी.
पानी पीने के बाद कुछ क्षण रुक कर बोलना शुरू की,
“पहले के कुछ महीने तो अच्छे से बीते लेकिन फिर मिथुन की सीमाएँ धीरे धीरे बढ़ने लगी थीं. वो खुद को मेरा मालिक समझने लगा था. अधिकार तो ऐसे जताने लगा था मानो अगर मुझे नहाने भी जाना पड़े तो उससे पूछ के जाऊं. जब भी मेरे साथ होता; मेरे पति और भांजे को गंदी गंदी गालियाँ देता. शुरू के कुछ महीने तो वो बिस्तर में भी मुझे किसी देवी की तरह पूजता था.. लेकिन उसके बाद धीरे धीरे ही सही.. उसके बातों और व्यवहार में बहुत परिवर्तन आने लगा. मुझसे; विशेष कर संसर्ग के समय किसी बाजारू औरत से भी कहीं अधिक तिरस्कृत करता हुआ पेश आता. पूछे जाने पर कहता कि ऐसा करके उसे एक विशेष.. एक अलग प्रकार का सुख व आनंद मिलता है. ऐसी बातें वो सिर्फ़ कहने के लिए कहता है.. उसे गलत न समझा जाए. उसका और कोई मतलब नहीं होता. बहुत समय तक ऐसा चलता रहा.. न चाहते हुए भी मैंने हालात के साथ समझौता कर लिया था. परन्तु जैसे सूरज अधिक समय तक बादलों के पीछे नहीं छुप सकता ठीक वैसे ही हमारे संबंध भी किसी से छुपे न रह सके. हम पकड़े ही गए. हम दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में पहले मेरे पति और बाद में भांजे बिल्टू ने देख लिया था.
पति के साथ तो मेरी काफ़ी कहा – सुनी हुई ही थी.. बिल्टू ने भी कड़ी आपत्ति जताया था.
कुछ दिन शांत रहने के बाद हम दोनों में फिर से संबंध बनने लगा. पिछली बार तो मिथुन को कुछ नहीं कहा गया था सिवाय थोड़े से डांट के.. वो भी मेरे पति के द्वारा.. लेकिन इस बार हम फिर पकड़े गए और वो भी मेरे भांजे बिल्टू के हाथों.
उसने मुझे और मिथुन को काफ़ी कुछ सुनाया. मुझे सुनाया... मैं सुनती रही.. पर जब मिथुन को सुनाने लगा तब मिथुन को गुस्सा आ गया और वो भी बहुत उल्टा सीधा बोलने लगा.
और उस क्षण तो मैं डर ही गई जब मिथुन ने मेरे पति और बिल्टू को जान से मार देने की धमकी दी.
सिर्फ़ उसी एक दिन नहीं बल्कि अक्सर कई बार अकेले में या मेरे साथ होने पर भी वह मेरे पति और भांजे को मार देने की कसमें खाता था.
ब.. बस....इसी क.. कारण.......”
“इसी कारण क्या?”
“इसी कारण मैंने उसे... मार दिया.
”
“कब?”
“रात में...”
“ठीक से बताओ.”
“उसे मारने के पहले पिछले दो महीने से मैं अक्सर उसे रात में कुछ अलग बना कर खिलाने लगी. कभी गाजर का हलवा, कभी खीर, कभी कुछ तो कभी कुछ. और इसी तरह एकदिन खीर के दूध में ही अच्छे से ज़हर मिला कर उसे दे दी. काफ़ी तेज़ और धीरे असर करने वाला ज़हर था. उसे खाने के कोई दो घंटे बाद ही मिथुन मर गया होगा.”
“उसके बाद वो घृणित काम क्यों किया?”
“क.. कौन सा घृणित क... काम?”
“तुझे अच्छे से पता है कि हम किस घृणित काम की बात कर रहे हैं... हमारे खोजी कुत्तों को मिथुन के कमरे से पंद्रह कदम दूर ज़मीन के चार हाथ नीचे वो मिली है... ऐसा तो वही कर सकता या सकती है जिसके दिल में हद से अधिक घृणा भरी हुई हो.”
सामने बैठी महिला कर्मी की बात सुन कर होंठों पर एक हल्की मुस्कान लाते हुए सीमा थोड़ा सा सिर झुका कर बोली,
“जैसा की अ.. अभी अभी आपने ब.. बताया... कि ‘ऐसा तो वही कर सकता या सकती है जिसके दिल में हद से अधिक घृणा भरी हुई हो’... मेरे दिल में भी उसके प्रति घृणा कूट कूट कर भरी हुई थी... अ.. और.. सच कहूँ ..त.. तो घृणा के साथ साथ उससे भी अधिक दिल में डर अपना डेरा डाले हुए था....”
सीमा की बात खत्म होने से पहले ही बगल में बैठी दूसरी महिला कर्मी अपना कौतुहल न छिपा पाने के कारण पूछ बैठी.
सीमा अबकी बिना झिझक बोली,
“घृणा इसलिए क्योंकि वो मुझे एक बाजारू औरत से भी कहीं अधिक अपमानित करता रहता था. सड़क की कुतिया से भी अधिक नीचे गिरा हुआ होने का अहसास दिलाते रहता था... दिनोंदिन इतने अपमान से मैं थक चुकी थी... (कहते हुए सीमा फिर रोने लगती है).... और डर इसलिए क्योंकि उसने मेरे पति और भांजे को मार डालने की धमकी दी थी.. एक बार नहीं.. कई कई बार.. जब भी वो मेरे साथ होता था... संबंध बनाते समय हमेशा ही कहता था कि वो मेरे पति और भांजे को इस दुनिया से अलविदा करवा कर पूरे घर के साथ साथ मुझ पर भी अधिकार कर लेगा और धन – ऐश्वर्य भोगते हुए मुझे अपनी रखैल बना कर मुझे भी जब चाहे तब भोगेगा... जिसके साथ बाँटना चाहे .. बाँटेगा...
जब मुझे लगा की अब बात हद से अधिक बढ़ने लगा है तो मुझे ही कोई उपाय करना सूझा. अपने पति और भांजे से तो सहायता माँग नहीं सकती थी.. जो कुछ करना था मुझे अकेले ही करना था. सो उसे ज़हर दे दी. दिल में कई सौ गुणा घृणा भरा हुआ था... इसलिए......”
सीमा ने अपनी बात खत्म की.
उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद दोनों महिला कर्मी कुछ देर तक चुपचाप बैठे रहे.
दोनों की ही सूरत ये साफ़ साफ़ बता रही थी कि सीमा की आपबीती पर वो विश्वास करे या अंत में मिथुन के मरने के बाद जो दरिंदगी की उसने उस पर अविश्वास करे.
खैर, सीमा अब सब कुछ बोल चुकी थी इसलिए उससे कुछ और पूछने का कोई मतलब नहीं था; खास कर ऐसी कोई भी बात जो पुलिस वालों को पहले से ही पता हो.
और जो बातें पता नहीं थीं... वो भी अब पता चल चुकी थी.
सीमा को वहीँ छोड़ कर दोनों महिला कर्मी सेल से बाहर आईं और रॉय के कमरे में जा कर उसे रिपोर्ट किया. पूरी कहानी संक्षेप में सुनाई और एक पॉकेट साइज़ रिकॉर्डर उसे सौंप दिया. इसमें सीमा की पूर्ण स्वीकारोक्ति रिकॉर्ड हो गयी थी.
दोनों को आभार और शाबाशी दिया रॉय ने. वो भी दिल खोल कर. सीनियर से प्रशंसा पा कर वो दोनों भी बहुत खुश हुई.
थोड़ी देर बाद जब दोनों चली गई तब रॉय ने रिकॉर्डर ऑन कर के उसे पूरा सुना; पूरे ध्यान से. फिर श्याम को बुलाया;
दोनों ने साथ में रिकॉर्डिंग सुना.
सुनने के बाद,
“क्या लगता है श्याम?”
“सर?”
“सीमा की स्वीकारोक्ति के बारे में?”
“जैसी घटनाएँ उसने सुनाई उससे तो मुझे ये सही लगती है.”
“सही लगती है?!!”
“जी सर.”
“तुम्हारे कहने का मतलब ये हुआ कि उसने जो कुछ भी किया वो सब सही था? अंत में हुई दरिंदगी भी??”
“ओ.. न.. नहीं नहीं सर... मेरा मतलब था कि सीमा की स्वीकारोक्ति मुझे सही लगी.”
“पक्का...? यही मतलब था न तुम्हारा??”
“ज..जी सर.”
श्याम सकपका गया था बेचारा. बोलने में हुई एक छोटी सी गलती उसे ही गलत ठहराने लगी थी.
“तो अब आगे का क्या लगता है? क्या होना चाहिए?”
“स..सर.. मेरे हिसाब से तो... अब इसकी इस स्वीकारोक्ति को रजिस्टर में कलमबद्ध कर के इसे जेल में डाल देना चाहिए.”
सुन कर रॉय फुसफुसाते हुए बोला,
“जेल में तो समझो ये ऑलरेडी है.”
“स..सर.. आपने कुछ कहा?”
“अम.. नहीं.. कुछ नहीं..”
फिर थोड़ा रुक कर,
“जेल में डालने के बाद?”
“सर, जेल में डाल देने के बाद तो और कुछ रह नहीं जाता. केस तो क्लोज़ हो गया न?”
“हम्म.. राईट! तुम्हारे दृष्टिकोण से सीमा वाला मामला तो क्लोज़ हो गया.... पर गाँव वाले मामले का क्या?”
“स..सर... ग.. गाँव व..वाला मामला?”
“हाँ.. गाँव वाला मामला.”
“स.. सॉरी सर.. मैं स..समझा नहीं.”
“श्याम!!... ये भूलने की बीमारी तुम्हें कब से लगी? हाँ?!”
श्याम सहम कर सिर नीचे झुका लिया.
रॉय ने फिर समझाया,
“मिथुन को तो सीमा ने मारा है ये मामला सुलझ गया. पर गाँव में और भी जो हत्याएँ हो रही हैं? जो मर्डर्स हो रहे हैं? उनका क्या?”
“ओह. यस सर.. जी सर... वो सब तो अभी भी बाकी हैं.”
“इसलिए मैं कह रहा था कि सीमा वाले इस केस के बाद अपना सारा फोकस रुना, मीना और सुनीता की ओर कर दो. ध्यान रहे श्याम, गाँव में अब भी मौतें हो रही हैं और रुना अब भी संदिग्ध है. रुना के साथ साथ उसकी सहेली मीना पर भी नज़र रखना. दोनों काफ़ी अच्छी सहेली हैं. अगर गाँव में हो रही मौतों के साथ इनका किसी भी तरह का संबंध है तो एक पर नज़र रखने से दूसरे की भी कोई न कोई खबर निकल ही आएगी. और साथ में खबर रखना सुनीता का भी. वो भी मुख्य संदिग्ध है. कोई न कोई खबर ज़रूर मिलेगी उसके बारे में. मत भूलना कि उसे अक्सर ही वारदात वाले स्थानों के आस पास वारदात के पहले देखा गया है कई बार.”
“जी सर. समझ गया.
आप निश्चिन्त रहें सर. मैं कड़ी से कड़ी निगरानी करवाऊंगा.”
“गुड. अब तुम जा सकते हो श्याम.”
श्याम कुर्सी से उठ कर रॉय को सलाम ठोका और कमरे से निकल गया.
उसके जाते ही रॉय ने एक सिगरेट सुलगाया और उस रिकॉर्डिंग को फिर से सुनने लगा.
१८)
इधर,
बाबा की कुटिया में,
“घेतांक?!! ये घेतांक कौन है गुरूदेव?”
बाबा का ध्यान समाप्त होते ही उनके मुँह से यह नाम निकला जिसे सुनकर उनके पास अब तक उनके साथ ही ध्यानमुद्रा में बैठे गोपू और चांदू चौंक गए और तुरंत ही प्रश्न कर बैठे.
बाबा के चिंतित मुँह से स्वतः ही उत्तर निकला,
“एक तांत्रिक.. यहीं.. इसी गाँव का रहने वाला... आज से कुछ वर्ष पहले तक रहता था... अब इस गाँव को छोड़ चुका है.. कुछ दिन पहले ही छोड़ कर गया है.. कई तरह की तांत्रिक क्रियाओं में सिद्धहस्त एवं बुरी शक्तियों का स्वामी.”
“ग...गुरूदेव.. तो फिर... ये तांत्रिक......”
गोपू का प्रश्न पूरा होने से पहले ही बाबा बोल पड़े,
“ये सब... सब कुछ... उसी का किया धरा है.”
“अर्थात्.. गुरूदेव?”
“अर्थात् इस गाँव में जो कुछ भी हो रहा है; इन सब के मूल में यही दुष्ट तांत्रिक है.”
“ये दुष्ट तांत्रिक ही वास्तविक मूल है इन सब दुर्घटनाओं एवं हत्याओं के पीछे?”
“हाँ वत्स.”
“परन्तु... गुरूदेव.. आपने तो कहा था कि कोई चंडूलिका है इन सबके पीछे?”
“चंडूलिका इन सबके पीछे अवश्य है वत्स.. उसका हाथ भी है इन सब घटनाओं में.. परन्तु वास्तविक मूल तो यही घेतांक नामक तांत्रिक है. वो चंडूलिका सिद्ध तांत्रिक है. उसी ने चंडूलिका को इन सब में लगाया है.”
हरेक शब्द के साथ बाबा की चिंता की गहराईयाँ बढ़ती जा रही थीं.
इस बात को दोनों शिष्य भली भांति समझ रहे थे पर बाबा से अधिक प्रश्नोत्तर करना भी नहीं चाह रहे थे.. क्योंकि दोनों ही इस बात को बहुत अच्छे से समझ रहे थे की बाबा दिन-ब-दिन गाँव और गाँव वासियों के सुरक्षा को लेकर बहुत अधिक चिंतित होते जा रहे हैं.
“आपको क्या लगता है गुरूदेव; तांत्रिक के जाने के बाद भी ये चंडूलिका क्या स्वेच्छा से लोगों का शिकार कर रही है या तांत्रिक ने ही इसे इसी काम में लगा कर गाँव छोड़ कर चला गया है?”
“उस तांत्रिक घेतांक ने ही इसे इस घृणित कार्य में लगा छोड़ा है वत्स.. और ये मेरा अनुमान नहीं है.. मैं जानता हूँ की ऐसा ही हुआ है.”
“और ये शौमक और अवनी; गुरूदेव?”
“जीवन के अंतिम क्षणों में वे दोनों अत्यंत भयभीत, दुखी एवं आकांक्षी थे... जीवन जीने की इच्छा बहुत बलवती थी उस समय; पर जी न सके. इसलिए मरणोपरांत इनकी आत्माएँ प्रतिशोध की भावना से भरी हुई है.. और यही कारण है की ये दूसरी आम आत्माओं से अधिक बलवान भी हैं.. लेकिन फिर भी चंडूलिका जैसी एक बड़ी शक्ति के सामने दोनों ही नतमस्तक हैं.
चूँकि ये दोनों ही गाँव वालों से प्रतिशोध लेना चाहते थे इसलिए चंडूलिका ने इन्हें अपने अधीन रख लिया और इन्हीं के माध्यम से गाँव वालों को लुभा कर या किसी और तरह से फँसा कर मार रही है.”
“इस सबसे चंडूलिका को क्या लाभ है, गुरूदेव?”
“मानव रक्त पी कर एवं स्तरीय स्तरीय आत्माओं को अपने अधीन कर वो और अधिक बलवती होना चाहती है. स्मरण रहे वत्स, चंडूलिका एक रानी चुड़ैल है. एक ऐसी शक्ति जिसे या तो भगवान या फिर कोई अत्यंत उच्च कोटि का सिद्ध पुरुष ही समाप्त या रोक सकता है.”
“आप भी तो एक अत्यंत ही उच्च कोटि के सिद्ध महात्मा हैं गुरूदेव; आप भी तो समाप्त कर सकते हैं इसे.”
“अवश्य ही कर सकता हूँ वत्स... (थोड़ा रुक कर)... लेकिन......”
“लेकिन क्या गुरूदेव?”
“गाँव में कुछेक और अनिष्ट होने की सम्भावना दिख रही है मुझे. ये मेरी कोरा आशंका नहीं अपितु विश्वास है क्योंकि गाँव के सभी लोग मेरा कहा, मेरा निर्देश नहीं मानेंगे... दुर्भाग्य है ऐसी जनता का, ऐसे लोगों का जो अपने हित की बातों को समय पर ना तो सुनते हैं और ना ही मानते हैं. जब भी थोड़ी पाबंदी लगाईं जाती है तो ये सोचते हैं की मानो उनका जीवन ही उनसे छीन लिया जा रहा है. इसी कारण छोटी सी लगने वाली संकट एक बड़ी भारी विपदा बन जाती है. और यही वो कारण है वत्स, जिससे की मैं आश्वस्त हूँ कि सभी मेरा निर्देश नहीं मानेंगे... और इसलिए कुछ अनिष्ट अवश्य होगा.”
कहते हुए बाबा का चेहरा इतनी दृढ़ता से सख्त हो गया था की गोपू और चांदू को आगे कुछ और कहने-पूछने का साहस नहीं हुआ. इस बात को लेकर दोनों ही दृढ़ निश्चित थे कि अगर गुरूदेव ने कुछ अनिष्ट होने की बात कही है तो वो अवश्य ही होगा.
उसी दिन....
रात नौ बजे के आस पास जब सारा गाँव हमेशा की तरह शांत हो गया था...
अँधेरे में कालू मस्ती में डूबा अपने घर की ओर जा रहा था.
रोज़ की तरह आज भी अपना दुकान बढ़ा कर (बंद कर) के वो आजकल अपने नए ठिकाने; केष्टो दादा के दुकान में जाने लगा था.. सिर्फ़ चाय-ब्रेड-बिस्कुट ही नहीं अपितु, दारू और अंडा भी उपलब्ध रहता था वहाँ. अब हाई ब्रांड या विदेशी किस्म के दारू तो मिलने से रहे... इसलिए या तो सस्ते वाला लोकल दारू ही मिलता था वहाँ या फिर ताड़ी (एक पेय पदार्थ जिसे नशे के लिए पिया जाता है).
दुकान से निकल कर काफ़ी दूर तक निकल आने के बाद एक जगह अचानक से कालू के साइकिल का ब्रेक अपनेआप लग गया.
नशे में धुत कालू को कुछ समझ नहीं आया.
वो तो साइकिल पर ही थोड़ी देर खड़ा रह कर झूमता रहा.. जब थोड़ा होश हुआ तब पेडल मारा.. साइकिल आगे चल पड़ी.
मुश्किल से दस कदम चला होगा कि फिर ब्रेक लगा.. अपने आप.
कालू को अब भी कोई होश नहीं था. नशे में उसे तो यही लग रहा था की वो साइकिल तो चला रहा है पर शायद स्पीड थोड़ी कम है.
जब करीब पन्द्रह मिनट के बाद भी सामने दिख रहा आम का पेड़ पीछे नहीं हुआ तब कालू को थोड़ा होश हुआ... जितना भी होश हुआ उसमें उसे इतना महसूस हो गया कि उसके साइकिल में कुछ गड़बड़ है.
वो बैठे बैठे ही थोड़ा नीचे झुक कर ब्रेक और चेन को चेक किया.
दोनों को ठीक पाने पर वो फिर पेडल पर दबाव डाला...
साइकिल आगे बढ़ी.
फिर रुकी...
इस बार कालू बुरी तरह से झुंझला उठा.
कई गंदी गालियाँ देता हुआ वह साइकिल से नीचे उतरा और ब्रेक व चेन चेक करने लगा. सब ठीक था.
नशे में उसे होश तो नहीं था.. पर घर समय पर पहुँचने के लिए उसे होश में आना और रहना बहुत ज़रूरी था. और अब जिस तरह की दिक्कतें हो रही हैं इससे तो वह ऐसे घर पहुँचने से रहा.
अभी वो अपने इस ताज़े समस्या के बारे में सोच ही रहा था कि तभी उसका एक और साथी वहाँ साइकिल चलाता हुआ आ पहुँचा. ये सुधीर था. वैसे तो बड़ा व्यवहार-कुशल था; पर चरित्र से एक नंबर का ठरकी लड़का था. पहले शहर में टिकट ब्लैक किया करता था.. अब किसी कारणवश शहर छोड़ कर गाँव में ही रहते हुए कोई न कोई काम किया करता था.
कुछ देर पहले इसने भी कालू के साथ ही दारू पिया था. अंडे अलग से.
कालू को बीच रास्ते; जोकि वास्तव में एक पतली पगडंडी है; में खड़ा देख कर उसने भी साइकिल कालू के पास आ कर रोक दिया. कालू की आँखें ठीक से खुल नहीं रही थी. खड़े खड़े ही झूम रहा था. उसकी ये हालत देख कर सुधीर हँस दिया... कारण, सुधीर ने कालू से ज्यादा पिया था लेकिन होश अभी भी दुरुस्त था.
बड़े बदतमीजी से हँसते हुए पूछा,
“क्या हुआ हीरो? ऐसे अँधेरे में बीच रास्ते में क्या कर रहा है?”
“क..कुछ न..नहीं.. चेन उ..उतर गई है.”
“किसकी?”
“किसकी म... मतलब... साला, साइकिल की उतरी ह.. है.”
“अच्छा.. तो चढ़ा नहीं पा रहा है क्या?”
“ह्म्म्म.. अ... अगर.. चढ़ा ल.. लेता तो अ...अभी तक... ग.. घ... घर नहीं चला जाता.”
कालू को सुधीर के बेतुके प्रश्नों पर बड़ा गुस्सा आ रहा था; और कोई समय होता और वो अगर नशे में नहीं होता तो शायद अच्छे से निपट लेता सुधीर से. पर करे भी क्या, उसे तो पता ही था कि सुधीर कैसा लड़का है. भले ही मज़े ले रहा है अभी... पर अगर सहायता की बात आई तो यही लड़का सबसे पहले आगे बढ़ कर आएगा.
सुधीर अगले दो मिनट तक कालू को देखता रहा.
समझ गया की अगर इसकी सहायता नहीं की गई अभी तो शायद रात भर यहीं रह जाएगा.
इसलिए वो अपने साइकिल से उतरा और कालू को एक ओर होने को बोल कर खुद उसके साइकिल की चेन चेक करने लगा. चेन देखते ही बोला,
“अबे बोकाचोदा, चेन तो बिल्कुल ठीक है. तुझे कहाँ से ये उतरा हुआ लग रहा है बे?”
कहते हुए वो उठ गया और साइकिल के दूसरे हिस्सों को देखने लगा किसी सम्भावित गड़बड़ी को देखने के लिए. कालू तब तक अपने बायीं ओर थोड़ी दूर पर स्थित एक पेड़ के पीछे मूतने चला गया था.
और इधर सुधीर कालू की साइकिल की जाँच परख कर रहा था.
पर ऐसा कुछ मिला नहीं.
अभी वो आगे कुछ सोचे या बोले; तभी उसे पायल की आवाज़ सुनाई दी. वो जल्दी पलट कर अपने पीछे देखा; जहाँ से वो और कालू आये थे.
पीछे देखते ही उसकी आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयीं.
कुछ क्षणों के लिए उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि वो जो देख रहा है वो वास्तविक है या फिर उसे भी थोड़ी थोड़ी कर के चढ़नी शुरू हो गई है.
पीछे से एक बहुत ही सुन्दर महिला धीमे क़दमों से चलती हुई आ रही थी.
हालाँकि उसने घूंघट किया हुआ था परन्तु घूंघट पूरी तरह से चेहरे को ढक नहीं रही थी. बदन पर साड़ी बहुत ही अच्छे से फिट बैठ रही थी लेकिन सुधीर जैसे लड़के फिगर का अंदाज़ा किसी न किसी तरह से कर ही लेते हैं.
और सुधीर को वह वाकई भा गई.
बिना चेहरा देखे केवल शरीर पर कस कर फिट बैठते कपड़ों से फिगर का अनुमान लगा कर ही उसका दिमाग ख़राब होने लगा था और कमर के नीचे वाले हिस्से में हलचल होने लगी.
उस महिला ने एक बार बस एक क्षण के लिए नज़रें फेरा कर सुधीर की ओर देखी और फिर आगे चल पड़ी. जैसे ही वो सुधीर के बगल से गुजरी; सुधीर को एक बहुत ही मदमस्त कर देने वाला बहुत प्यारी सी सुगंध का आभास हुआ. आज से पहले कभी इतनी अच्छी सुगंध उसके नाक से कभी नहीं टकराई थी.
वो बरबस ही उसकी ओर आकर्षित होने लगा.
जब महिला थोड़ा ओर आगे बढ़ तब सुधीर को होश आया और तुरंत अपनी साइकिल लेकर उस महिला के पीछे चल दिया.
महिला के पास पहुँच कर अपनी साइकिल को धीरे करते हुए बोला,
“आप इसी गाँव की हैं?”
उसके इस प्रश्न पर महिला की ओर से कोई उत्तर न आया.
सुधीर ने फिर पूछा.
महिला फिर भी कुछ न बोली; केवल अपने सिर को थोड़ा नीचे कर ली.
तीसरी बार पूछे जाने पर धीमे और शरमाई स्वर में बोली,
“जी.”
उसकी आवाज़ शहद सी मीठी थी.
सुधीर को इतनी अच्छी लगी कि वो उससे और बातें करने की सोचने लगा.
इधर पेड़ के पीछे से कालू सुधीर की इन हरकतों को देख रहा था.. और नशे में ही मन ही मन हँसते हुए उसे गाली दे रहा था कि जहाँ नारी दिखी वहीँ जोगाड़ लगाना शुरू कर दिया कमीने ने.
कालू ने देखा की सुधीर और वो महिला कुछ कदम आपस में कुछ बातें करते हुए चले.. फिर रुक गए... कुछ और बातें हुईं... और अचानक से वो महिला सड़क की दूसरी ओर बेतरतीब उगी हुई झाड़ियों के पीछे चली गई.
सुधीर पीछे मुड़ कर देखा.. कालू अभी भी पेड़ के पीछे ही था. सुधीर को बस उसकी बीच पगडंडी पर खड़ी साइकिल दिखी. कुछ क्षण कालू की साइकिल को देख कर कुछ सोचता रहा.. फिर उन झाड़ियों की ओर देखा जिधर वो महिला अभी अभी गई.
कुछ पल और सोचने के बाद सुधीर भी अपनी साइकिल को उसी ओर ले कर बढ़ गया जिधर वो महिला गई थी.
करीब पाँच मिनट बीत गए.
सुधीर नहीं लौटा.
नशे में भी कालू को थोड़ी चिंता हुई.
जब पाँच मिनट और बीत गए और सुधीर फिर भी नहीं लौटा तब कालू ने जा कर देखने का सोचा की आखिर बात क्या है.
अगर इन्हीं कुछ पलों में सुधीर ने उस महिला को पटा लिया है तो फिर ठीक है... नहीं तो मामला गड़बड़ है.
साइकिल बिना लिए ही कालू आगे बढ़ने लगा... धीमे चाल से.
झाड़ियों के पास जा कर उसने बहुत आहिस्ते से इधर उधर देखना शुरू किया. हालाँकि नशे में होने के कारण उसके द्वारा ये सब करना थोड़ा मुश्किल हो रहा था परन्तु इन सब में उसे एक अलग ही मज़ा आने लगा था अब तक.
जल्द ही उसे झाड़ियों की ही झुरमुठ में एक ओर कुछ हलचल होती दिखी. दूर के एक स्ट्रीट लाइट की धुंधली रौशनी में उस ओर देखने में थोड़ी आसानी हुई.
उन झाड़ियों से वो मुश्किल से ३ – ४ फीट की दूरी पर होगा की अचानक ही उसे एक मरदाना स्वर में ‘आर्र्ग्घघघघघर्घ’ सुनाई दिया.
ध्यान से ओर जब कालू ने देखा तो उसे वाकई बहुत ज़ोर की हैरानी हुई. इसलिए नहीं की उसने कुछ अलग देखा... बल्कि इसलिए की वो जो संदेह कर रहा था; वही सच हो गया.
उसने देखा कि सुधीर और वो महिला परस्पर आलिंगनबद्ध थे... दोनों कामातुर हो कर एक दूसरे का चुम्बन लिए जा रहे थे... इस बात से पूरी तरह बेखबर की अभी इस समय भी कोई आ कर शायद उन्हें देख सकता है.
सिर्फ़ यही नहीं... इतनी ही देर में सुधीर ने अपना जननांग उस महिला की योनि में प्रविष्ट करा चुका था तथा धीरे और लम्बे धक्के लगा रहा था. उस धुंधलके रौशनी में भी उस महिला के सुधीर के कमर के पास से ऊपर की ओर उठे उसके दोनों गोरे पैर बहुत अच्छे से दिख रहे थे.
महिला स्वयं भी पागलों की तरह सुधीर के चेहरे, गले और कंधे पे चुम्बन पर चुम्बन लिए जा रही थी और अपने हाथों को सुधीर के पूरे नंगे पीठ पर चला रही थी और रह रह के अपने लाल रंग के नेलपॉलिश से रंगे नाखूनों को उसके पीठ पर जहाँ तहां गड़ा देती.
सुधीर का भी इधर हालत ख़राब भी था और पागल भी. उस महिला का ब्लाउज तो उसने खोल दिया था पर शरीर से अलग नहीं किया. धक्के लगाते समय रह रह के वो भी कस कर उस महिला को अपने बाँहों में भर लेता था. उसने अपने हाथों को ब्लाउज के ऊपर से उसकी नंगी पीठ पर रगड़ना जारी रखा.
उसका मुँह उस महिला की क्लीवेज पर चला जाता और स्वतः ही उसके काँपते होंठ उसके क्लीवेज और स्तनों की मुलायम गोरी त्वचा से जा मिलते. उस मुलायम त्वचा से होंठों का स्पर्श होते ही दोनों ही लगभग एक साथ एक गहरी सिसकारी लेते और फिर सुधीर तुरंत ही उस पूरे अंश को चूमने – चाटने लग जाता.
काफ़ी देर तक ऐसा ही चलता रहा...
अचानक उस महिला ने एक ख़ास करवट ली और सुधीर के कानों में कुछ बोली.
जवाब में सुधीर मुस्कराते हुए धक्के लगाना छोड़ कर उठ बैठा और उसके ऐसा करते ही महिला उसके सामने उसके गोद में आ बैठी.
अब दोनों एक दूसरे की ओर सीधे देख सकते थे... महिला बिल्कुल सुधीर के कमर के ठीक नीचे बैठ गई थी... उसके जननांग के ठीक ऊपर.
कुछ क्षण एक दूसरे को काम दृष्टि से देखने के बाद झट से दोनों फिर से पागलों की तरह एक दूसरे को चूमने लगे. थोड़ी देर इसी तरह चूमते रहने के बाद वो महिला रुकी; पीछे की ओर झुक गई, लेकिन सुधीर ने उसे कमर से कस कर पकड़े रखा.
किसी हिंसक भूखे जानवर की मानिंद सुधीर आवाज़ निकालता हुआ फिर से झपट पड़ा सामने मुस्तैदी से खड़े – निमंत्रण देते दोनों गौर वर्ण चूचियों पर टूट पड़ा और एक एक को चूस चूस कर लाल करते हुए दूसरे चूची को बड़ी निर्दयता से मसलने लगता.
कालू ने जैसे ही उन गोरे स्तनद्वय पर गौर किया; उसका तो कंठ ही सूखने को आ गया. महिला की दोनों सफेद स्तनों को आज से पहले कभी उसने इतने उचित आकार के हल्के भूरे रंग के निपल्स के साथ नहीं देखा था.
इतने भरे, इतने पुष्ट इतने सुंदर आकार से बड़े बड़े.... उफ्फ्फ...!!
वो महिला बड़े आराम से, समय लेते हुए सुधीर के उस लौह अंग के ऊपर नीचे हो रही थी... और इधर सुधीर ने अपना मुंह उसके गोरे स्तनों पर रख करजीभ से ही उसे सहलाना शुरू कर दिया.
लेकिन जैसा की स्पष्ट था कि इतने सुंदर चूचियाँ मिलने पर कोई भी सिर्फ़ सहलाने तक ही सीमित नहीं रहने वाला... वही हुआ भी... सुधीर दोनों चूचियों के निप्पल को मुँह में भर कर ज़ोरों से आवाज़ करते हुए चूसने लगा और दोबारा उतनी ही निर्दयता से उन्हें मसलने लगा.
इसी तरह यह दृश्य अगले करीब आधे घंटे तक चलता रहा.
एक समय पर सुधीर अपने चरम पर पहुँच कर झड़ने ही वाला था कि उस औरत ने उसे रोक दिया..
सुधीर की गोद से उठ गई.
उसकी इस हरकत पर कालू और सुधीर दोनों ही बड़े आश्चर्यचकित हो गए.
क्या बात है? क्या करने वाली है ये?
अगले ही पल जो हुआ... उसके बारे में दोनों ने ही कोई कल्पना नहीं की थी.
औरत थोड़ा पीछे हट कर दोबारा बैठी... और बैठे बैठे ही पीछे होते हुए घोड़ी बन गई... और फिर कामातुर नेत्रों से सुधीर की ओर देखते हुए उसके जननांग को अपनी दायीं हाथ की हथेली में अच्छे से मुट्ठी बना कर पकड़ी और फिर एक भूखी शेरनी की तरह उस लौह अंग को लालसा भरी आँखों से देखने लगी. सुधीर की ओर क्षण भर देख कर; एक शैतानी मुस्कान होंठों पर लाते हुए वो उस अंग के मुंड पर हलके से अपनी जीभ फिराई.
उसकी वो लंबी जीभ देख कर कालू का दिमाग घूम गया.. कम से कम एक हथेली बराबर होगी वो जीभ!
वह जीभ बड़े प्यार से, धीरे धीरे सहलाते हुए बार बार उस जननांग के मुंड को छू रही थी और उसके प्रत्येक छूअन से सुधीर के पूरे शरीर में... अंग अंग में... एक कंपकंपी दौड़ जाती.
वो तो बेचारा समस्त तेज़... पूरा का पूरा वीर्य उस कोमल, गर्म योनि में उड़ेल देना चाहता था.. पर इस कमबख्त महिला ... ख़ूबसूरत महिला ने उसे ऐसा करने से मना करने के बाद अब उसके गुप्त अंग से इस प्रकार प्रेम जता रही थी मानो वर्षों से प्यासी रही हो.
उस औरत का प्रेम उस अंग पर धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा था.
उसने सुधीर के जननांग की ऊपरी चमड़े से शुरू कर अंदरूनी त्वचा को चाटना शुरू कर दिया. उसके ऐसा करते ही सुधीर की एक तेज़ सिसकारी निकल गई. उसके इस कृत्य ने उसे असीम आनंद दिया.
सुधीर ज़मीन पर उगी बड़ी बड़ी घासों को कस कर पकड़ा और सिर ऊपर आसमान की ओर कर दिया.
जी भर के चाटने के बाद अब जी भर कर चूसने का दौर शुरू हुआ. पहले मुंड को १०-१२ मिनट तक कामाग्नि में जलती किसी नवयौवना की भांति चूसती रही.. और फिर उस पूरे के पूरे अंग को अपने मुँह में गायब करती चली गई.
जैसे जैसे जननांग उसके मुँह में घुसता जाता; सुधीर तो सुख के मारे तड़प उठता ही.. कालू को भी पता नहीं क्यों ऐसा सुख मिलता जैसे सुधीर को भी मिल रहा है.
हर बार महिला अपने जीभ के अग्र भाग से जननांग के नीचे से ऊपर तक अत्यधिक प्रेम में डूबे भावुक – कामुक कामसुख प्यासी प्रेयसी की भांति चाटती हुई आती और मुंड पर आते ही एक प्यारी सी चुम्बन दे कर पूरे अंग को मुँह में गायब कर लेती.
और फिर वो क्षण भी जल्दी ही आया जब सुधीर का मांसल अंग उस महिला की मुँह की गहराईयों में बहुत अंदर तक जाने लगा. उसके गले पर उभर आती नसें और आगे की ओर उबल पड़ती आँखें साफ बता देती कि ये महिला न सिर्फ़ सुधीर को डीप थ्रोट मुखमैथुन दे रही है; वरन इस क्रीड़ा में काफ़ी खेली – खिलाई खिलाड़ी है.
उस औरत की एक ओर कृत्य ने सुधीर के सुख की सीमाओं को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया. वो औरत उसके अंग को पूरी तरह से अपने मुँह में तो भर ही रही थी... अब मुँह में घुसाने के साथ ही साथ जीभ से जननांग के निचले भाग को बड़े कामुक तरीके से सहला दे रही थी.
इस कृत्य ने चरम आनंद से सुधीर के शरीर के समस्त रोम रोम को खड़ा करने लगी. सुधीर के मुँह से आनंद की अधिकता के कारण ‘आह आह’ निकलने लगी.
इस रोमहर्षक आनंद ने सुधीर को अधिक देर तक मैदान ए जंग में टिकने न दिया...
वीर्यपात हुआ...
महिला के मुँह में ही...
दोनों ने ही सोचा की शायद वो गुस्सा करेगी, बिफर कर कुछ बोलेगी... पर नहीं...
ऐसा कुछ नहीं हुआ...
वरन, जो हुआ वो बिल्कुल उलट हुआ..
वो बड़े प्रेम से स्वाद ले ले कर समस्त वीर्य को पी गई... यहाँ तक की होंठों और जननांग से बह कर नीचे गिरते वीर्य को कुछ अंश और बूँदों तक को चाट गई.
उसके इस रूप को देख कर सुधीर और कालू; दोनों को ही आश्चर्य का ठिकाना न रहा. कोई औरत ऐसी भी हो सकती है... इस तरह से स्वाद ले कर कामसुख दे सकती है ये कभी नहीं सोचा था उन्होंने... सोचना क्या... इस तरह के विचार आधुनिक दुनियादारी से बेखबर दूर गाँव में बसने वाले इन युवकों के मन में कैसे व कहाँ से आयेंगे?
शरारती नज़रों से देखते हुए बड़े कामुक स्वर में सुधीर को बोली,
“कैसा लगा?”
सुधीर उसकी ओर मन्त्रमुग्ध सा देखता हुआ बोला,
“बहुत अच्छा...
”
“बस, बहुत अच्छा?”
“सच कहूँ तो मुझे पता ही नहीं की इस अप्रतिम सुख का मैं किन सठीक शब्दों में विवरण दूँ.... तुम्हारी काम कुशलता का किन शब्दों में प्रशंसा करूँ?!”
सुधीर की इन बातों को सुन कर औरत खिलखिला कर हँस पड़ी. उसकी हँसी वातावरण में ऐसी गूंजी की मानो शरीर की कुल्फी ही जमा देगी.
हँसते हुए बोली,
“प्रशंसा के शब्दों के मोती आप अपने पास रखिए... मुझे तो बस वो दीजिए जिसका आपने कुछ देर पहले वादा किया था! याद है न आपको कि आपने क्या वादा किया था??”
“बिल्कुल.. मैंने जब आपसे ये सब के लिए कहा तब आप इस शर्त पर राज़ी हुई थी की ये सब करने के बाद आप मुझसे जो माँगेगी वो मुझे आपको देना होगा.”
ये सुनने के बाद वो औरत किसी भोली मासूम लड़की की तरह बोलने लगी,
“तो क्या आप तैयार हैं देने के लिए?”
“बिल्कुल!”
“पक्का?”
“हाँ.”
“सहमति दे रहे हैं न आप?”
“हाँ.. पर ये तो बताइए की आपको चाहिए क्या?”
“आपके प्राण!”
सुनते ही सुधीर सकबका गया.
“क.. क्या...??”
सुधीर को सकपका कर उसके चेहरे के रंग बदलते देख वो औरत एकबार फिर खिलखिला कर हँस पड़ी...
उसकी हँसी में एक खिंचाव तो था..पर खून जमा देने वाला भी था!
अचानक कालू ने जो देखा उससे तो उसका सारा नशा ही एक झटके में उड़ गया.
उसने देखा की उस धुंधले रौशनी में भी उस औरत की आँखें बहुत भयावह तरीके से चमकने लगी है. उसके आँखों की काली मोती धीरे धीरे सुर्ख लाल में बदलते हुए मानो जल रहे हैं... साथ ही आँखों का सफ़ेद अंश काला पड़ता जा रहा है.
सुधीर का तो डर के मारे गला ही सूख गया.. वो हड़बड़ा कर उठ कर भागने को मुश्किल से उठा ही था कि उस महिला ने सुधीर का एक पैर पकड़ कर एक ज़ोर का झटका देते हुए सुधीर को उसके उसी स्थान पर यथावत गिरा दिया.
उस महिला के हाथों के नाखून एकदम से बहुत बढ़ गए... और उतने ही तेज़ और नुकीले भी.
एक क्षण भी व्यर्थ न गंवाते हुए उसने दाएँ हाथ की तर्जनी ऊँगली की नाखून का एक ज़ोरदार वार करते हुए सुधीर के गले के बाएँ ओर से घुसा कर दाएँ ओर से निकाल दी.
सुधीर की आँखें गोल और बड़ी हो कर आगे की ओर उबल आने को हो पड़ी.
तर तर कर के रक्त बहने लगा.
पीड़ा से विह्वल सुधीर बेचारा कराह भी नहीं पा रहा था.
और वो औरत उसकी ये तड़प देख बहुत खुश हो गई.. होंठों पर एक बड़ी सी शैतानी मुस्कराहट आ गई. इस बड़ी मुस्कराहट के कारण उसके सामने के कुछ दांत दिखाई दिए जो बड़े भयावह रूप से बड़े और अद्भुत सफेदी लिए चमक रहे थे.
और तभी!!
एक तेज़ झटके से वो अपने नख सुधीर के गले से सामने की ओर निकाल ली और उसके इस कृत्य से सुधीर का गला सामने से बुरी तरह से फट गया. सुधीर अपने फटे गले को दोनों हाथों से पकड़ कर तड़पते हुए लेट गया और कुछ देर बिन पानी मछली की भांति तड़पते हुए ही मर गया.
वो औरत अब और भी भयानक रूप से हँसते हुए सुधीर के गले से बहते रक्त को अपने दोनों हथेलियों में भर कर रक्तपान करने लगी. बहुत देर तक रक्तपान करने के बाद वो बड़े आराम और कामुक ढंग से अंगड़ाई लेते हुए उठी और अपने कपड़ों को ठीक कर के झाड़ियों से निकल कर पगडंडी पर आगे की ओर बढ़ गई.
झाड़ियों से निकलते समय दूर स्ट्रीट लाइट और ऊपर चंद्रमा की धुंधली रौशनी उस औरत के चेहरे से टकरा कर जब उसके मुखरे को थोड़ा स्पष्ट किया तब उसे देख कर कालू को जो घोर आश्चर्य हुआ वो हज़ारों शब्दों में भी बता पाने योग्य नहीं था. चाहे जितने भी शब्द उठा कर कालू को दे दिए जाते; कालू फिर भी अपने जीवन के इस क्षण और इस आश्चर्य का वर्णन नहीं कर पाता.
बस एक ही शब्द ने ज़ोरों से धड़कते उसके ह्रदय के किसी कोने में किसी तरह से साँस लिया,
“रूना भाभी!!”
१९)
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“गुरूदेव... मुझे बचा लीजिए गुरूदेव... मैं जीना चाहता हूँ गुरूदेव.”
“शांत... शांत हो जाओ वत्स.. पहले शांत हो कर बैठो तो सही.”
बाबा जी ने डर से काँपते कालू के सिर पर हाथ रखते हुए कहा. कालू बहुत डरा हुआ था. बुरी तरह काँप रहा था. होश उड़े हुए थे उसके. चेहरा सफ़ेद सा पड़ चुका था और पसीने से तर था.
सिर पर बाबा के हाथ का स्नेहमयी स्पर्श पा कर शांत होने का व्यर्थ प्रयास करने लगा कालू पर भय में रत्ती भर की भी कमी न आई.
पहले की अपेक्षा उसे अब थोड़ा शांत होता देख बाबा ने बहुत स्नेह से पूछा,
“वत्स.. अब बोलो.. क्या बात है?”
“ग..ग...ग...गुरु...गुरूदे... गुरूदेव... व..व..वो.. म..म..मार... मार देगी... मार डालेगी... म...मु..मुझे भी..”
“कौन मार देगी?”
बाबा ने स्नेहिल ढंग से ही पूछा परन्तु अब स्वयं को कालू की बातों में थोड़ा केन्द्रित भी कर लिया,
कालू पूर्ववत् काँपते हुए ही उत्तर दिया,
“न..नाम... न...नहीं बताऊंगा...”
“क्यों?”
“क...क्योंकि....क...क्यों...कि...”
“आगे बोलो वत्स... क्योंकि....??”
“क्योंकि... व.. वो... म..मुझे... म.. म.. मा... मार डा.. डालेगी... गुरूदेव.... म..मुझे बचा... ल...लीजिए... ग..गुरूदेव...”
अब की बार तो लगभग रो ही पड़ा कालू.
उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा ने बड़े अपनेपन से कहा,
“देखो वत्स.. अगर तुम नाम नहीं भी बताओगे... तो भी वो तुम्हें मार देगी... हैं न... क्योंकि उसका तो कदाचित लक्ष्य तो तुम अब बन ही गए हो... यदि नाम बता दोगे तो कदाचित मैं तुम्हारी कोई सहायता कर पाऊं. बोलो वत्स... कौन है वो जिसे तुम्हारे प्राण चाहिए?”
“भ.. भा... भाभी.”
“भाभी? कौन भाभी?”
“र..र.....”
“बोलो वत्स.. कौन भाभी?”
“र...रुना भाभी.”
“रुना भाभी??”
“ह... हा.. हाँ ग..ग.. गुरूदेव....”
“रुना भाभी.. अर्थात् गाँव की शिक्षिका?”
“ज.. जी.. गुरूदेव.. पहले ग... गाँव में पढ़ाती थ.. थी...”
“अब नहीं पढ़ाती?”
“पढ़ाती ह.. है.”
“अभी तो तुमने कहा कि वो पहले पढ़ाती थी?”
“अ.. अब.. शहर में... छ... छोटे ब...ब... बच्चों के स्कूल में...”
“ओह.. अच्छा..!”
“ज.. जी..
ग.. गुरूदेव.”
एक क्षण रुक कर बाबा जी ने फिर पूछा,
“हम्म... अच्छा वत्स.. तुमने ये तो बता दिया की तुम्हें कौन मारना चाहती है.. अब ये तो बताओ की वो तुम्हें क्यों मारना चाहती है?”
“क....क.. क्यों... क्योंकि......”
“हाँ वत्स, बोलो... डरो नहीं.”
“क.. क्यों...कि... म.. मैंने उ...उसे मारते उ... उन्हें दे देख लिया थ.. था.”
“किसे मारते किसे देख लिया?”
“र.. रुना भाभी को दे.. देखा... स.. सुधीर को....मारते हुए.. अ... और.... ब.. बब्लू को भी.”
“बब्लू?”
“ज... जी.. स...सुधीर को मारने के अगले तीन र.. रात बाद बब्लू को भी मार दिया उन्होंने.”
“किसने? रुना भाभी ने?”
“जी गुरूदेव.”
“ओह्ह.”
कह कर बाबा जी चुप हो गए.
पूरा मामला तो उन्हें बहुत हद तक बहुत स्पष्ट तो था ही... बस ये नया काण्ड उन्हें थोड़ा परेशान कर दिया.
अगले कुछ मिनटों तक बाबा जी को कुछ न बोलते देख कर कालू ने रोते हुए उनके पैर पकड़ लिया,
“गुरूदेव.. गुरूदेव... मुझे बचा लीजिए गुरूदेव.. म.. मैं न... नहीं मरना... चाहता.. गुरूदेव.”
रोते बिलखते कालू के सिर पर हाथ रखते हुए बाबा जी अत्यंत शांत व धीर-गम्भीर स्वर में बोले,
“अब जब हमारे पास आए हो तो हम तुम ऐसे ही कुछ नहीं होने देंगे. शांत हो जाओ.. रोना बंद करो.”
बाबा जी के कहने पर कालू ने धीरे धीरे रोना तो बंद किया पर सिसकियाँ अब भी चालू थीं.
इधर बाबा जी भी चुपचाप बैठे हुए थे...
उन्हें चिंतामग्न देख चांदू से न रहा गया. समीप आ कर पूछा,
“क्या बात है गुरूदेव? आपको किस चिंता ने इतना चिंतित कर दिया है?”
“अंह?!... ओह.. कुछ नहीं.” बाबा जी जैसे गहरी चिंता से बाहर आए.
कालू की ओर देखते हुए पूछा,
“तुम्हें रुना ने कब देखा था? सुधीर को मारते समय या बब्लू को?”
“सुधीर को म... मारते समय शायद... उन..उनको स.. संदेह... रहा ह... होगा की कोई उन्हें द.. दे.... देख र.. रहा है... पर बब्लू को म.. मारते समय... म.. मु... मुझे.... म.. मे... मेरी ओर देखते हुए ही उ.. उसे... मारी.”
“बब्लू को कैसे मारा उसने?”
“ग.. गर्दन... स... से रक्त... च..चूसते ह...हुए.”
“और?”
“और....??”
“मतलब फिर क्या किया उसने?”
“म.. मे...मेरी ओ.. ओर दे.. देख कर मुस्कराई अ... और चेहरा पोंछते हुए चली गई. उसकी वो मुस्कान और भयानक रूप... म.. मुझसे भ... भूले... नहीं भूलती... गुरूदेव.”
“क्या बब्लू को मारने से पहले... अ.. अच्छा छोड़ो... (गोपू की ओर देख कर बाबा ने एक विशेष संकेत किया जिसपे गोपू ने भी हाँ में सिर हिला कर स्वीकृति दिया)... ये बताओ कि क्या उसने तुम्हें कुछ कहा था जाने से पहले?”
“नहीं गुरूदेव.”
“अच्छे से याद है?”
“ज.. जी गुरूदेव.”
“ह्म्म्म.. कोई अनोखी बात... कोई भी ऐसी बात जो तुम्हें उसमें बिल्कुल ही अलग दिखा या लगा हो?”
“ग.. गुरु... देव.. रुना भाभी हत्याएँ कर रही हैं.... र.. रक्त पी रही हैं... इससे ब... बड़ा अलग और अ.. अविश्वसनीय बात और क्या होगा मेरे लिए.. या.. किसी के लिए भी.”
कालू का उत्तर सुन कर बाबा जी चुप हो गए.
सत्य भी है, जिसे समस्त ग्रामवासी हमेशा से एक सुसंस्कृत, शिक्षित व समाज को एक नूतन दिशा – पथ दिखाने वाली जानता – मानता आया हो; उनके लिए रुना का यह रूप वास्तव में ही बहुत ही अविश्वसनीय होगा.
कुछ सोच कर बाबा जी कालू को बोले,
“सुनो कालू, क्या तुमने इन घटनाओं की चर्चा किसी से की है अभी तक?”
“न.. नहीं गुरूदेव.”
“हम्म.. वाह! बहुत अच्छा. करना भी नहीं.”
“क.. क्यों गुरूदेव?”
“किसी से इस घटना की चर्चा जब तक तुम नहीं करोगे.. तब तक तुम सुरक्षित रहोगे.”
“सच में.. गुरूदेव?”
“बिल्कुल.”
“प.. पर.. वो मेरी... ओर....”
“अब और कोई प्रश्न नहीं वत्स, जाओ.. बहुत समय व्यतीत हो गया. अब लौट जाओ. और निश्चिन्त रहो.. जब तक तुम इन घटनाओं की चर्चा किसी से नहीं करोगे तब तक तुम पूरी तरह से सुरक्षित रहोगे. समझे?”
“ज.. जी.. गुरूदेव... आपकी जय हो...”
बोलते हुए कालू बाबा जी के चरणों में लोट गया. बाबा जी ने उसे अच्छे से सान्तवना और आशीष दिया.
उसके जाने से पहले बोले,
“पूजा-पाठ करते हो?”
“न... नहीं गुरूदेव.. कुछ विशेष नहीं करता.”
“ओह.. तब तो शरीर पर कोई कवच आदि भी धारण नहीं किए होगे?”
“क.. कवच.. गुरूदेव?”
“समझा. नहीं धारण किए हो.”
“न.. नहीं गुरूदेव... मैंने य... ये पहना है.”
“क्या.. दिखाओ.”
कालू ने गले में पहना एक छोटा सा ताबीज नुमा लॉकेट दिखाया बाबा जी को.
बाबा जी ने कुछ क्षण अच्छे से देखने के बाद बोले,
“कहाँ से मिला तुम्हें ये?”
“मिला??”
“हाँ.. मिला... ये तुम्हें मिला है कहीं से. तुम्हें किसी ने दिया नहीं है... है न?”
कालू लज्जा से सिर झुकाता हुआ बोला,
“जी गुरूदेव.”
“तो बताओ फिर.. कहाँ से मिला तुम्हें ये?”
“घर के पीछे.. हमारा जो पुआल घर है.. गायों का चारा जहाँ रखते हैं... वहीँ से.”
“वहाँ से?”
“जी गुरूदेव..”
“अच्छा... ठीक है.. इसे सदैव ही पहने रहना. अब तुम जाओ... तुम्हारा कल्याण हो.”
कालू ने एक बार फिर बाबा जी को प्रणाम किया और बाहर चला गया. उसके जाते ही बाबा जी ने गोपू को संकेत दिया. गोपू लपक कर कालू के पीछे पीछे गया.
कालू को पीछे से टोकते हुए गोपू बोला,
“कालू... सुनो..”
“कहिए.”
“एक और प्रश्न है जिसे गुरूदेव स्वयं नहीं पूछ सकते इसलिए मुझे कहा है तुमसे पूछने के लिए.”
“पूछिए... क्या पूछना चाहते हैं आप?”
“जिस दिन.. जिस समय बब्लू को रुना भाभी ने मारा था... तुम वहीँ थे?”
“जी.. था.”
“बहुत पहले से?”
“जी.”
“बब्लू को मारने से पहले रुना भाभी ने कुछ किया उसके साथ?”
इस प्रश्न पर कालू से तुरंत उत्तर देते नहीं बना. हिचक और संकोच से गोपू की ओर देखते हुए सिर हाँ में हिलाया.
“क्या किया था रुना भाभी ने?”
कालू चुप रहा. बेचारे को समझ में नहीं आ रहा था कि बोले तो आखिर कैसे बोले?
गोपू के द्वारा फिर से प्रश्न किए जाने और ज़ोर देने पर झिझकते हुए कहा,
“हाँ... उन दोनों में.....
”
कालू की बात को काटते हुए गोपू बोला,
“सम्भोग हुआ था?”
“न.. न.. नहीं... स.. सम्भोग नहीं.. पर.. वैसा ही... कुछ... अ... अर्थात्... दो... दोनों अर्धनग्न अवश्य हो गए थे... परन्तु.... सम्भोग.... नहीं हुआ.... था.”
“ये सच बोल रहे हो न?”
कालू की ओर दृष्टि तीक्ष्ण करता हुआ गोपू बोला.
कालू थोड़ा सहम कर पर दृढ़ता से बोला,
“ज..जी.. बिल्कुल...”
“ह्म्म्म.. ठीक है... अब तुम जाओ.”
कालू अपनी साइकिल सम्भाला और जल्दी से वहाँ से विदा हो लिया.
कुटिया में घुसने के साथ ही गोपू बोल पड़ा,
“गुरूदेव... क्रीड़ा हुआ भी ... और नहीं भी.”
सुनकर बाबा जी गम्भीर स्वर में ‘ह्म्म्म’ कर के चुप रहे.
चांदू और गोपू; दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर बाबा जी को देखते हुए उनके पास आ कर चरणों के समीप बैठ गए.
बाबा बोले,
“ये रुना नहीं है...”
“क्या?!!”
चांदू और गोपू अचम्भित से होते हुए बोल पड़े.
बाबा जी बोलते रहे,
“यदि ये रुना होती तो सदैव ही इस बात का बड़ी भली भांति ध्यान रखती की उसे कोई देख न ले. वो पकड़ी न जाए. पर यहाँ हो रहा है उल्टा. कोई उसे किसी को मारने से पहले प्रणय क्रीड़ा करते हुए देख रहा है इस बात से बहुत आनंदित होती है वो. कालू को मारने के बजाए उसकी ओर देख कर मुस्कराते हुए अपने आखेट का रक्त पीना... (थोड़ा रुक कर सिर हिलाते हुए)... नहीं... मैं निश्चित हूँ. ये रुना नहीं है.”
“तो क्या इसलिए आपने कालू को इस बात का चर्चा किसी से करने से मना किया गुरूदेव?”
“हाँ वत्स.. जब वो घटना का वर्णन कर रहा था.. तभी मुझे ये बात स्पष्ट हो गया था..”
“व.. वो कैसे गुरूदेव...?”
चांदू ने यह प्रश्न बड़े भोलेपन से किया.
बाबा जी दोनों शिष्यों की ओर देखते हुए मुस्कराए और फिर बोले,
“वो ऐसे की आज से करीब पाँच दिन पहले जब मैं ध्यानमग्न था तब मुझे अवनी की आत्मा से कुछ क्षणों के लिए साक्षात्कार होने का अवसर प्राप्त हुआ. मैंने उसे उसका मानव रूप दिखाने का निवेदन किया जिसे वो तुरंत ही मान गई और मुझे तभी की तभी अपना मानव रूप दिखाई. उसके जीवित रहते उसका जो मानव... नारी रूप था उसे देख कर मैं अचंभित रह गया. मुझे ये जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ की इस चेहरे को मैंने पहले भी इसी गाँव में कहीं देखा है. अपना मानव नारी रूप दिखाने के तुरंत बाद ही अवनी चली गई. मैं उसे दोबारा बुला सकता था पर उसका यूँ ऐसे चले जाना इस बात का संकेत था कि उसे अभी कहीं और आवश्यक रूप से होना है.....”
चांदू बाबा जी के वाक्य का पूरा होने तक प्रतीक्षा नहीं कर सका और बड़ी अधीरता से पूछा बैठा,
“कहीं और..? कहाँ गुरूदेव..? क्या किसी और के पास होना चाहिए था उसे?”
चांदू के बालसुलभ व्यवहार को देख बाबा जी हँसते हुए बोले,
“हाँ वत्स.. उसके ऐसे व्यवहार से तो ऐसा ही लगा था.”
“तो क्या आप जानते हैं कि उसे कहाँ होना चाहिए था?”
“हाँ वत्स.”
“कहाँ गुरूदेव.. कृप्या बताईए.
”
“चंडूलिका के पास!”
चंडूलिका का नाम सुन कर दोनों शिष्य एक क्षण के लिए सहम गए. सच कहा जाए तो दोनों को ही समझ में नहीं आया की इस बात पे क्या प्रतिक्रिया दी जाए.
कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद गोपू ने धीरे से कहा,
“गुरूदेव.. आप कह रहे थे की आपने अवनी के मानव नारी रूप को इसी गाँव में कहीं देखा है. क्या आपको इसका भी उत्तर मिल गया?”
“हाँ वत्स, मैंने इसी गाँव में देखा था उसे.”
गोपू ये पूछना चाह रहा कि ‘किसे देखा है आपने’.. पर गुरूदेव से एक के बाद एक इतने प्रश्न करना वो अपने सभ्य आचरण के प्रतिकूल मान कर न चाहते हुए भी चुप रहा. लेकिन उसकी ये उत्कंठा उसकी आँखों में जिज्ञासा लिए गुरूदेव की ओर बराबर बनी रही.
गुरु तो आखिर गुरु होते हैं. शिष्य के मनोभाव उन्होंने तुरंत ताड़ लिया.
बोले,
“इसी गाँव की शिक्षिका रह चुकी.... रुना!”
असीमित आश्चर्य का गुबार एकाएक दोनों के कंठों से विस्मित स्वरों के रूप में फूट पड़ा,
“क्या?!! रुना भाभी?!!”
“हाँ.. वही.”
“वही जिनके विषय में अभी कुछ देर पहले कालू बता रहा था??” गोपू पूछा.
बाबा जी ने उसे ऐसे देखा मानो उसी से कोई प्रश्न करने लगे हों.
गोपू को पलक झपकते ही अपनी भूल का आभास हुआ एवं सहमते हुए धीरे से कहा,
“नहीं... नहीं... कालू वाली रुना भाभी कोई और है.”
गोपू के चुप होते ही चांदू बोल पड़ा,
“परन्तु गुरूदेव.... ये अवनी और रुना भाभी...??”
“ह्म्म्म.. वत्स, इसे विधि का विधान कहो... या नियति का कोई चक्कर... आज से वर्षों पहले जो अवनी थी... ठीक वैसी ही रुना भी दिखने – सुनने में है. यहाँ तक की दोनों की कुंडली में कई तरह योग एवं गणना तक एक समान है. अपने योगबल से मैं जितना जान पाया.. उस अनुसार दोनों के न केवल चेहरे अपितु लंबाई और शरीर भी एक समान ही है... अंतर इतना है कि रुना का शरीर.... अं......”
गुरूदेव को वाक्य पूरा करने थोड़ी झिझक होते देख चांदू स्वयं ही बोल पड़ा,
“रुना जी का शरीर अवनी के शरीर के अपेक्षाकृत अधिक भरा हुआ है?”
“हाँ... यही बात. वैसे भी विवाह और संतानोत्पत्ति के इतने वर्ष बाद ऐसे परिवर्तन आना सामान्य बात है.”
“तो....??”
“तो अब यही वत्स की अब पूरा माजरा हमें या तो शौमक और अवनी दोनों बताएँगे या फिर चंडूलिका स्वयं!”
“चंडूलिका?”
“हाँ.. परन्तु लगता नहीं है की उसके साथ मेरा कोई सामना होगा... क्योंकि यदि ये सब कुछ... अर्थात् गाँव में जो कुछ भी हो रहा है... इन सबमें यदि चंडूलिका प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती तो अभी तक ये गाँव आधा श्मशान बन चुका होता... अब रही बात तांत्रिक घेतांक की तो अब इस गाँव में नहीं है.. वो कहाँ है ये मैंने जानने का प्रयास नहीं किया... वो अब इस दुनिया में है भी या नहीं.. ये जानने में भी मेरी कोई रूचि नहीं है.
रुचिकर एवं करने योग्य कार्य अभी के लिए यही है की इन ग्रामवासियों को कैसे बचाया जाए और शौमक और अवनी का कैसे उद्धार किया जाए.”
“अ... और गुरूदेव... आप कालू से कुछ कवच इत्यादि के बारे में पूछ रहे थे??” गोपू ने पूछा.
“हाँ वत्स.. तुमने कालू के गले में वो माला, बेहतर है उसे लॉकेट या ताबीज बोल दो; तो देखा ही होगा. वो उसका नहीं है. वो लॉकेट एक सिद्ध महात्मा का है जो कदाचित इस लॉकेट के वास्तविक धारक का गुरूदेव रहे होंगे. यदि ये लॉकेट कालू का ही होता तो रुना भाभी...या वो जो कोई भी है... उसके साथ कालू का यूँ आमना सामना नहीं होता. पर आमना सामना हुआ... इसका अर्थ ये हुआ की लॉकेट वास्तविक रूप से किसी ओर का है... जो कि अब कालू के पास है.. उसके गले में शोभायमान है... परन्तु शक्ति अभी भी वैसी की वैसी ही है. इसलिए वह नकारात्मक शक्ति कालू के आस पास नहीं फटक पा रही है.”
कहते हुए बाबा जी ने अपने दोनों शिष्यों की ओर देखा.
दोनों को ही तनिक उलझन में देख कर बोले,
“याद करो... कालू ने क्या क्या कहा था.. जब वो मूत्र त्यागने सुधीर से कुछ क़दमों से दूर हुआ, तभी वो रहस्यमयी महिला आई. फिर बब्लू के साथ भी वो था.. कुछ कदम चल कर उससे दूर हुआ नहीं की वो शक्ति बब्लू के पास आ पहुँची.”
“अर्थात्... गुरूदेव.. जब तक कालू उस लॉकेट को पहना हुआ है तब तक कोई भी नकारात्मक शक्ति न तो कालू के पास आ सकती है और न ही कालू जिनके साथ है; उनके पास.”
“बिल्कुल.”
“लेकिन... गुरूदेव... ये लॉकेट... कालू के घर के पीछे...?”
“जब शुभो की मृत्यु हुई तब मैंने तुम्हें उसके घर और आस पास जानकारी इकठ्ठा करने भेजा था... याद है?”
“ज..जी गुरूदेव.”
“उस दिन तुम लौट कर आए थे और कहा था कि मृत्यु वाले दिन ही सुबह सुबह शुभो कालू से मिलने उसके घर गया था... और उस समय कालू अपने घर के पीछे पुआल घर में था?”
“जी गुरूदेव.”
“तो बस... हो सकता है वहाँ उन दोनों में कोई कहा सुनी हुई हो... या हाथापाई... या किसी और तरीके से वह लॉकेट शुभो के गले से निकल गया और फलस्वरूप रात में वो मारा गया.”
“अर्थात्, उस शक्ति को पता चल चुका था की शुभो के गले में अब वो लॉकेट नहीं है?!” गोपू कुछ सोचता हुआ बोला.
“हाँ... यही संभव होता प्रतीत होता है... कदाचित वो उस पर दृष्टि जमाए हुए थी बहुत पहले से या... फिर... ये सब संयोग मात्र है.”
थोड़ी देर चुप रह कर बाबा जी फिर बोले,
“गोपू, अमावस्या कब है?”
दो क्षणों की गणना के तुरंत बाद ही गोपू बोला,
“आज से १२ दिन बाद गुरूदेव.”
बाबा जी ने हाथ बढ़ा कर पत्रिका माँगा. चांदू के द्वारा पत्रिका देते ही बाबा जी उसमें किसी चीज़ का बहुत ध्यानपूर्वक आंकलन एवं विश्लेषण करने लगे. फिर पत्रिका को एक ओर रखते हुए एक दीर्घ, गहरी साँस छोड़ते हुए बोले,
“ये अमावस्या ही उपयुक्त रहेगा.
”
“वो क्या गुरूदेव?”
“वैसे तो अमावस्या वाले रात ऐसे कुछ योग बनते हैं की कुछ विशेष प्रकार के नकारात्मक शक्तियों को विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है. परन्तु ये अमावस्या कुछ ऐसी है जिस दिन... पूरे २४ घंटे के लिए कुछ योग ऐसे बन रहे हैं जिसके कारण ऐसी ही विशेष प्रकार की शक्तियाँ अपेक्षाकृत थोड़ी सरलता से वश में आ सकती हैं. यद्यपि शक्तिशाली तो ये तब भी होंगी एवं कड़ा प्रतिरोध भी होगा इनकी ओर से... पर अब करना तो पड़ेगा ही... इसी विशेष दिन की प्रतीक्षा कर रहा था मैं इतने दिनों से.”
“किस बात की प्रतीक्षा गुरूदेव?” चांदू ने पूछा.
बाबा जी जप के लिए आसन बिछाते हुए दृढ़ गंभीर स्वर में बोले,
“एक निर्णायक लड़ाई की..! तुम दोनों तैयारियाँ शुरू कर दो.”
२०)
अंतिम भाग
अ)
घोर अँधेरी रात....
हाथ को हाथ न सूझे...
घोर निस्तब्धता...
साथ चलते सह यात्री का आहट तो सुनाई दे पर स्वयं वो सह-यात्री ही दिखाई न दे...
तारे भी कुछ इस तरह टिमटिमा रहे थे मानो एक हल्के से संकेत की प्रतीक्षा कर रहे हों; संकेत का ‘स’ हुआ नहीं की तुरंत कहीं छुप जाए सारे के सारे.
रात्रि के इस भयावहता को बढ़ाने में सहायता के लिए रह रह कर पेड़ों से उल्लूओं के बोल और विभिन्न कीड़ों के बजबजाते स्वर चारों ओर से सुनाई दे रहे थे.
कुछ रात्रि अपने साथ ऐसे स्याहपन ले कर आते हैं जिसे साधारण जन सोचना तक पसंद नहीं करते हैं.
ऐसी ही एक रात्रि होती है अमावस्या की.
एक ऐसी रात्रि जिसके विषय में लोग व समाज न तो बातें करना पसंद करते हैं और न ही इसके बारे में ज्यादा कुछ जानते हैं. निःसंदेह ऐसे विषयों पर स्वयं की जानकारी से कहीं अधिक वर्षों से चली आ रही सुनी सुनाई बातों पर साधारण जन को अधिक विश्वास होता है.. और यदि सुनी सुनाई बातें केवल सुनने में ही हद से अधिक भयावह हो तो फ़िर आम लोगों का क्या दृष्टिकोण हो सकता है ये तो अपने आप में ही जगजाहिर हैं.
ऐसी ही रात्रियों में कुछ विरले रात्रि ऐसी भी होती है जोकि शुरू होते ही अपने साथ कई प्रकार की विशेषताएँ ले आती हैं.
विशेषताएँ इसलिए क्योंकि ये स्वयं ही होती हैं इस रात्रि की और इस रात्रि से संबंध रखने वालों की... इस तरह की रात्रियों की प्रतीक्षा करने वालों की... उन प्रतीक्षारत लोगों की भी जो
गाँव की यदि बात की जाए तो यहाँ के लोग तो बहुत समय पहले से ही शीघ्र सो जाने के आदि थे पर अब जो पिछले कुछ समय से गाँव में जिस प्रकार की घटनाएँ हो रही हैं; उस कारण संध्या काल में ही दुकान बढ़ा कर (बंद कर) सब के सब सात से साढ़े सात बजे तक अपने अपने घरों में घुस जाते हैं.
और जिस दिन अमावस्या हो.. उसपे भी ऐसी विशेष तिथि, ग्रह – नक्षत्र वाली अमावस्या... उस दिन तो सुबह से ही लोगों के मन मस्तिष्क में एक अलग ही आतंक होना तो बहुत सामान्य सी बात है.
आज ऐसी ही एक रात्रि है.
आठ बजते बजते ही सब खा पी कर सो गए.
पूरे गाँव में सन्नाटा पसर गया.
रात्रि के इसी भयावह वाले पलों में गाँव से निकल कर उससे सटे वन की ओर पाँच जोड़ी पैर तेज़ी और सावधानी से बढ़े जा रहे थे.
तीन तो अपने ही बाबा जी और उनके दो शिष्य चांदू और गोपू हैं.. और बाकी दो बाबा जी के वरिष्ठ सहयोगी हैं जो आज ही के दिन बाहर से आए थे. ये दोनों भी कई प्रकार की सिद्धियाँ रखते हैं जोकि आज की रात काफ़ी काम देने वाली है.
आज की रात एक ऐसे काम के लिए... एक ऐसी प्रक्रिया के लिए... जिसकी भयावहता का न तो कोई सीमा है और न ही कोई अनुमान.
सभी के कदम तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं.
एक निर्दिष्ट स्थान के लिए.
सभी के चेहरे दृढ़ संकल्पता का साक्ष्य लिए थे.
सबसे आगे गोपू और चांदू हाथों में मशाल लिए चल रहे थे.
बीच में बाबा जी मंत्रजाप करते हुए चल रहे थे और पीछे पूरी सतर्कता के साथ मंत्रजाप करते हुए हाथ में मशाल थामे कदम बढ़ाए जा रहे थे बाबा जी के दोनों नए सहयोगी.
ये एक संकरा सा रास्ता था! दोनों तरफ नागफनी ने विकराल रूप धारण कर रखा था, लेकिन उसके खिलते हुए लाल और पीले फूलों ने उसकी कर्कशता को भी हर लिया था! बहुत सुन्दर फूल थे, बड़े बड़े! अमरबेल आदि ने पेड़ों पर अपनी सत्ता कायम कर रखी थी! मकड़ियों ने भी अपने स्वर्ग को क्या खूब सजाया था अपने जालों से! ऊंचाई पर लगे बड़े बड़े जाले!
शीघ्र ही वे पाँचों एक संकरा सा पथ से होते हुए उस निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच गए. हालाँकि उस पथ को पार करने में भी बहुत कठिनाई आई. दोनों ओर से नागफनियों ने विकराल रूप धारण कर रखा था.. आवागमन के मार्ग पर झुक आए दोनों ओर से कई पेड़ों के टहनियों से बचते बचाते, जंगली बड़ी बड़ी मकड़ियों के सुंदर व विशाल जालों से स्वयं को दूर रखते हुए सब आगे बढ़ते गए.
आगे... ठीक उसी स्थान पर पहुँचे सब के सब जहाँ उन्हें पहुँचना था.
एक विशाल पेड़.. डाल, टहनियाँ उसकी दूर दूर तक फैली हुईं हैं. पत्तों के आकार भी एक सामान्य मनुष्य के हथेली से भी बड़े.
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पेड़ के जात को जान पाना रात के इस अँधेरे में, भले ही हाथों में जलते मशालें हों; दुष्कर कार्य प्रतीत हो रहा था. वैसे भी अभी इस पेड़ के सामने पहुँचे ये पाँच आगंतुक इस पेड़ के जात - प्रजाति, प्रकार, इत्यादि जानने के इच्छुक तो बिल्कुल नहीं थे.
कुछ सफ़ेद फूल भी निकले थे वहाँ, जो निश्चय ही दिन के उजाले में एक अलग ही खूबसूरती दिखा रहे होते!
सभी ने बहुत अच्छे से उस वातावरण को देखते समझते हुए मन ही मन उसका एक बढ़िया अवलोकन व आंकलन किया. आसपास कुछ दूरी पर कई तरह के वृक्षों के जमावड़े थे. जैसे की, आम, पपीते, अमरुद, बेल, बेर, आंवले, बरगद इत्यादि सभी थे वहाँ.
मशालों से उठती लपटों में नज़र आती बरगद और बेलों ने क्या खूब यौवन धारण किया था!
अद्भुत!
बाबा जी ने मन ही मन वहाँ के वातावरण की प्रशंसा करते हुए अपने सामने सर उठा कर तन कर खड़े उस पेड़ को देखते हुए सोचा,
‘यदि इस पेड़ के साथ वो दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना न जुड़ी होती तो कदाचित प्रायः दिन के उजाले में गाँव के बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ अवश्य ही इस स्थान पर आ कर हर्षित – आनंदित होते.
इस घोर अन्धकार रात्रि में, मशालों से होती रौशनी में यदि ये पूरा परिदृश्य इतना सुंदर लग सकता है तो फिर सूर्यदेवता की रेश्मी किरणों की उपस्थिति में कैसा दिखता होगा.’
“गुरूदेव... अब??”
साथ आए नए सहयोगी में से एक ने दबे स्वर में पूछा.
परिदृश्य में खोए बाबा जी की तंद्रा टूटी..
आगे बढ़ कर अच्छे से एकबार फिर पूरे स्थान को देखा.
ऊँगलियों पर कुछ गणना की...
उसी निर्दिष्ट पेड़ के सामने पहुँचे.
फिर चारों दिशाओं की ओर मुँह करके कुछ क्षणों तक हाथ जोड़ कर मंत्रपाठ करते हुए प्रार्थना करते रहे.
उसके बाद चांदू की ओर देख कर एक संकेत दिया...
चांदू शीघ्रता दिखाते हुए अपने कंधे पर लटकते झोले में से एक मुड़ा हुआ कपड़ा निकाला और उस कपड़े के अंदर रखे एक आसन को निकाल कर बाबा जी की ओर बढ़ा.
बाबा जी ने गोपू को भी एक संकेत किया.
गोपू उनके पास पहुँचा.
बाबा जी ने शांत ढंग से पूछा,
“सुबह यहीं इसी स्थान को साफ़ किया था ना?”
गोपू ने हाँ में सिर हिलाया.
बाबा जी ने उसे एकबार और उस स्थान को झाड़ देने का आदेश दिया.
गोपू ने तुरंत उन मशालों की रौशनी में बाबा जी के दिखाए उस स्थान को ऊपर – ऊपर से हल्के से साफ़ किया.
तत्पश्चात बाबा ने उस स्थान पर चांदू से आसन ले कर बिछा दिया और एक कमंडल में से हथेली में जल ले कर उस आसन से तीन फीट की दूरी माप कर आसन के चारों ओर एक गोल घेरा बनाते हुए मंत्रजाप करते हुए जल डाला.
कुछ क्षण हाथ जोड़ कर प्रार्थना किया और फिर बैठ गए आसन पर.
कुछ क्षण और उन्होंने मंत्रजाप किया.
इतना कर के उन्होंने अपने शिष्यों की ओर देखा.
दोनों शिष्य जल्दी जल्दी बाबा जी के पूर्व निर्देशानुसार अपने साथ लाए झोलों में से भिन्न भिन्न प्रकार के तंत्र – मंत्र – यंत्र के सभी सामान निकाल निकाल कर रखने व सजाने लगे.
एक सीधी, आमने सामने की तेज़ टक्कर के लिए ये बहुत आवश्यक होता है कि आप अपनी पूरी तैयारी के साथ हों. इसलिए बाबा जी भी पूरी सजगता के साथ अपने शिष्यों द्वारा की जा रही तैयारी पर एक तीक्ष्ण दृष्टि जमाए हुए थे.
ये तैयारी थी एक गूढ़ अनुष्ठान के लिए... जो दैवीय भी होगा और घातक भी.
अनुष्ठान का शुभ मुहूर्त अब से कुछ देर बाद शुरू होने वाला था.
दोनों नए सहयोगियों ने बाबा जी की ही तरह जल से गोल घेरा बना कर अपने अपने लिए आसन बिछाए और उसपे बैठते ही मंत्रजाप प्रारंभ कर दिया.
दोनों शिष्यों ने भी प्राण रक्षा कवच का स्तोत्र पाठ करते हुए बाबा जी के स्थान से थोड़ा पीछे अपने लिए आसन बिछा कर उसपे बैठ गए. मशालों को पहले ही साथ लाए चार बांस के साथ बाँध कर उन्हें चार कोनों पर गड्ढे खोद कर गाड़ दिए गए थे.
दो लालटेनों को भी हल्के आंच पर जलता रख दिया था गोपू ने.
कुछ ही देर में वहाँ उस स्थान पर, उस वातावरण में केवल उन पाँचों के मुख से एक लय में निकलते मंत्रोच्चारण ही गूँज रहे थे... धीमे आवाज़ में.
कुछ समय ऐसे ही बीता.
मंत्रोच्चारण के स्वर धीरे धीरे अपनी गति पकड़ते हुए अब तक थोड़ी तेज़ हो चुकी बहती हवा के कारण उस निर्जन वातावरण में गूँजते हुए दूर दूर तक फैलने लगे.
कुछ समय बीतने के पश्चात गोपू और चांदू ने मंत्रोच्चारण के साथ साथ अपने साथ लाए एक विशेष कटोरे नुमा पीतल मिश्रित किसी अन्य धातु से बने उस बर्तन को वाद्ययंत्र की भांति बजाने लगे.
समय बीतने के साथ साथ मंत्रोच्चारण और वाद्ययंत्रों से निकलने वाली ध्वनियाँ तेज़ होती हवा के साथ दूर का सफ़र तय करते हुए नदी के तट तक पहुँच गए.
ध्वनियों का नदी के लहरों से टकराते ही एक भिन्न हलचल होने लगी उनमें; विशेष कर नदी के दक्षिणी दिशा में. कुछ ऐसा मानो कोई सोया हुआ अपने आसपास होती गतिविधियों के कारण धीरे धीरे नींद से जाग रहा हो.
बाबा जी, उनके शिष्यों और सहयोगियों के मंत्रपाठ में भी शनैः शनैः तीक्ष्णता बढ़ती जा रही थी. हर मंत्र का हरेक शब्द... यहाँ तक की उन शब्दों में प्रयुक्त होने वाले मात्रा तक थोड़ा थोड़ा करके एक भीषण अलौकिक व दैवीय ऊर्जा को जन्म दे रही थी.
नदी के लहरों में हलचल बढ़ने के साथ साथ बाबा जी के सामने स्थित पेड़ में भी; विशेष कर उसके पत्तियों में हलचल होने लगी. सूखी पत्तियाँ एक एक कर के नीचे गिरने लगीं.
मानो रात्रि के इस पहर में गहरी निद्रा में अब तक सोया हुआ वह पेड़ भी अंगड़ाईयाँ लेते हुए जाग रहा हो... और सूखी पत्तियाँ अंदर होते इसी करवट के परिणामस्वरूप डालियों से अलग हो कर नीचे गिर रही हैं.
बीच बीच में एक अजीब सी हल्की... दबी सी आवाज़ आ रही थी दूर कहीं से... हवाओं के साथ बहते हुए...
आवाज़ केवल बाबा जी की ही कानों से टकराई...
प्रश्न स्वयमेव ही कौंधा उनके मन में,
‘अरे... एक आवाज़ आ रही है न?! ये आवाज़.... किसकी....’
प्रश्न उनका पूरा होने से पहले ही दोबारा सुनाई दी वही आवाज़...
‘अरे... ये तो.... नहीं.. नहीं.... ये एक नहीं... वरन दो आवाजें हैं..!!’
बाबा जी ने अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किया उस आवाज़ पर...
ऐसा करते ही अगले ही क्षण चौंक उठे;
क्योंकि आवाज़ एक नहीं.... वाकई दो आवाजें थीं... एक मर्दाना.. दूसरा जनाना..
मर्द दुःख, तड़प और पीड़ा की मार से मानो रो रहा हो... और.. जनाना; असीम आनंद की हँसी हँस रही हो... परन्तु इस जनाना की आवाज़ बहुत ही भिन्न है... अलग हट कर... बात क्या है...
‘कौन हो सकते हैं इन दो आवाजों के स्वामी?’
मन मस्तिष्क में चिंता लिए बाबा जी ने अपना कार्य जारी रखा...
और इधर,
लगभग एक साथ ही, अपने अपने घरों में, अपने अपने कमरों में गहरी नींद सोए देबू और रुना की आँखें एक साथ खुल गयीं.....
यदि कोई उस समय इनके पास खड़ा इन्हें देख रहा होता तो शायद इनके आँखें खुलते ही डर से मर गया होता.
क्योंकि दोनों की ही आँखों की पुतलियों के रंग एकदम से बदले हुए थे!
देबू की पुतलियाँ हल्की पीली – लाल मिश्रित रंग की जबकि रुना की हल्की नीली मिश्रित हरी...!
एक झटके से रुना अपने बिस्तर पर उठ बैठी...
आँखें घोर आश्चर्य से बड़ी बड़ी और गोल हो गयी थी... उसने पलट कर बगल में सोए अपने पति की ओर देखी...
नबीन बाबू घोड़े बेच कर सोने में व्यस्त थे..
रुना अपनी उन्हीं जलती आँखों से नबीन बाबू को देखती हुई उन्हें बिना छूए उनके सिर के ऊपर एक बार हाथ फिराई और फ़िर बिस्तर से उठ कर अपने कमरे से बाहर निकल गयी.....
ब)
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उधर देबू भी अपने बिस्तर से उठ चुका था..
दरअसल देबू और रुना दोनों ही अपने घरों से निकल गए थे..
दोनों जैसे किसी एक जगह जल्द से जल्द पहुँचना चाह रहे थे.. दोनों के ही चेहरे और आँखों में चिंता व परेशानी साफ झलक रही थी..
पर यहाँ सबसे आश्चर्य वाली बात जो थी वो यह कि देबू और रुना; दोनों के ही पैर ज़मीन को नहीं छू रहे थे ! दोनों के ही शरीर धरती से कुछ इंच ऊपर हवा में थे और मानो इसी तरह हवा में ही उड़ते हुए अपने अपने गंतव्य की ओर बढ़े जा रहे थे.
कुछ क्षणों में ही जिस मार्ग से वे दोनों अपने अपने गंतव्य की ओर अग्रसर थे; वो मार्ग और उनका गंतव्य... दोनों स्पष्ट हो गए.
वे दोनों गाँव की एक संकरी जंगली पगडंडी से होते हुए उसी वन की ओर बढ़े जा रहे थे जहाँ इस समय बाबा जी अपने सहयोगियों व शिष्यों के साथ एक गुप्त अनुष्ठान में रत थे.
दरअसल अब तक बाबा जी ने एक हवन आरम्भ कर दिया था... उस हवन से उठती ज्वाला और उन पाँचों के मुख से निकलते मंत्रोच्चारण क्षण प्रतिक्षण आक्रामक से होते जा रहे थे.
विशेष कर बाबा जी तो बहुत ही दृढ़ संकल्पित लग रहे थे. उनके हरेक मंत्र पाठ से आस पास उपस्थित निर्जीव पदार्थ तक में कंपन सी हो रही थी.
अग्नि की लपटें तक बाबा जी के मुख से निकलने वाले हरेक मन्त्र व उनके लय, छंद, ताल पर थिरकन कर रही थीं.
ये क्रम अभी अनवरत चल ही रहा था कि तभी एक साथ देबू और रुना हवा में उसी तरह रहते हुए वहाँ पहुँच गए.
पहले तो दोनों ने एक दूसरे को आश्चर्य से देखा.. आँखों ही आँखों में बात हुई और फिर गुस्से से काँपते हुए दोनों ने उन पाँच साधकों की ओर देखा.
दोनों के बदली नेत्रों और बदले रूप को देख कर गोपू और चांदू भयभीत तो अवश्य हुए पर बाबा जी पर उनका अगाध विश्वास था... इसलिए निर्भय हो कर अपने मन्त्र जाप में रमे रहे और वाद्य यंत्र बजाते रहे.
देबू और रुना को वहाँ आया देख कर बाबा जी को भी कुछ क्षणों के लिए अचरज अवश्य हुआ पर तब तक उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ इतनी अधिक प्रबल रूप से सक्रिय हो चुकी थीं कि उन्हें समझते देर न लगी की ये दोनों वास्तव में शौमक और अवनी हैं.... देबू और रुना के शरीर में... देबू और रुना; जो इसी ग्राम के ग्रामवासी हैं.
सब ने गौर किया की अत्यंत क्रोध में होने के बाद भी दोनों के शरीर से एक अद्भुत आभा प्रकाशित हो रही थी. देबू जहाँ अत्यंत सुकुमार लग रहा था वहीँ रुना हद से अधिक चित्ताकर्षक एवं रूपवती लग रही थी.
दोनों ही इतने अच्छे लग रहे थे की यदि ये कोई और समय होता और देखने वाले साधारण जन होते तो अब तक देबू और रुना को देव-देवी या यक्ष-यक्षिणी मान कर उनकी पूजा – आराधना और जयजयकार शुरू कर दिए होते.
पाँचों एकाग्रचित्त हो कर अनुष्ठान में पूरा मन लगाते हुए देबू और रुना पर दृष्टि जमाए हुए थे.
जब उन पाँचों में से कोई कुछ न बोला तब रुना क्रोध से काँपती – हाँफती कुछ कदम आगे बढ़ी और खनकते; पर खतरनाक आवाज़ में बोली,
“ये क्या कर रहे हो तुम लोग..? कौन हो तुम? क्या चाहते हो?”
कोई कुछ नहीं बोला.
रुना ने दोबारा वही प्रश्न किया.
कोई कुछ न बोला.
पर बाबा जी ने एक बार उन दोनों की ओर देखा और आँखों से एक प्रकार का संकेत किया जिसके बाद देबू व रुना और प्रश्न न कर के चुपचाप वहीँ खड़े रहे.
अग्नि में थोड़ी धान को स्वाहा करते हुए बाबा जी ने उन दोनों को देखा और कहा,
“मैं कुछ बोलूँ इसके पहले ये बताओ की हमारे पहनावे से तुम्हें क्या लगता है... हम कौन हैं?”
“साधु – संन्यासी लग रहे हैं.” देबू ने उत्तर दिया.
“हाँ. वही हैं हम.”
“ऐसे इस अनुष्ठान का कारण?”
“ओह.. तो तुम्हें पता है की हम यहाँ अनुष्ठान कर रहे हैं..??”
“हाँ.. और ये जो हवन किया जा रहा है; ये भी कोई साधारण हवन नहीं है. अन्य हवनों से बहुत भिन्न है.” देबू ने उत्तर दिया.
“हम्म.. वाह! तुम तो बहुत जानते हो?” बाबा जी ने व्यंग्य किया.
देबू और रुना पर इस व्यंग्य का कोई असर नहीं हुआ.
रुना का क्रोध तो अभी भी शांत नहीं हुआ था. उसकी आँखें तो ऐसी लग रही थीं मानो बाबा जी को कच्चा ही चबा जाने को व्याकुल हो रही हो.
“हाँ. जानता हूँ. ये हवन हमें यहाँ बुलाने के लिए किया जा रहा है.”
“सिर्फ़ बुलाने के लिए?”
“अ...और भी कारण हो सकते हैं. उतना मुझे पता नहीं.” रुना ने चुपके से देबू का एक हाथ दबा दिया. देबू ने भी बात नहीं बढ़ाने का सोच कर जरा सा जवाब दिया.
“ठीक है. पर ये तो बताओ की ये हवन किसे बुलाने के लिए किया जा रहा है?”
“हमें बुलाने के लिए!”
“हमें..? किसे??”
“हमें.”
“तुम दोनों कौन हो?”
“आप नहीं जानते?”
“नहीं जानता. तुम ही बताओ.”
“हमें मतलब मुझे अर्थात् देबू को और इन्हें; रुना को.”
“पर हमने तो किसी ओर को यहाँ बुलाने के लिए ये हवन किया था..
”
“ठीक से नहीं किया होगा तुमने.” विष घुला हुआ सा स्वर में बोली रुना अब... इतनी देर बाद. उसके हाव भाव और अब उसके स्वर से ये स्पष्ट हो गया कि इस तरह यहाँ बुलाए जाने को ले कर वो तनिक भी खुश नहीं थी.
“मेरे द्वारा किया हुआ कोई भी अनुष्ठान, यज्ञ, हवन इत्यादि कभी विफल नहीं होता..... (थोड़ा रुक कर).. अवनी!”
ये नाम सुनते ही देबू और रुना चिहुंक उठे. कदाचित इस तरह इस नाम का लिए जाने के बारे में उन दोनों ने कल्पना नहीं की थी.
“क्या हुआ? तुम दोनों के होश क्यों उड़ गए?”
“नहीं.. ऐसा तो कुछ नहीं हुआ.” देबू ने बात संभालने का प्रयास किया.
बाबा जी हँस पड़े.
बोले,
“अब हमें इतना भी मूर्ख मत समझो... शौमक... कहने - दिखने के लिए तो तुम दोनों देबू और रुना हो परन्तु वास्तव में..... तुम दोनों शौमक और अवनी हो जो इन दोनों बेचारे ग्रामवासी के शरीर को अपना घर बनाए हुए हो.”
इस रहस्योद्घाटन के बाद रुना अर्थात् अवनी का गुस्सा पलक झपकते ही फुर्र हो गया. देबू.. अर्थात् शौमक भी एकदम से चुप हो गया.
“क्या हुआ...? अब कुछ नहीं कहना?” बाबा जी मुस्कराते हुए बोले.
“चाहते हैं क्या आप?” कुछ सोच कर शौमक ने पूछा.
“तुम दोनों के बारे में जानना चाहता हूँ.”
“आप नहीं जानते?”
“नहीं जानता.”
“लगता तो नहीं है.”
“हम्म..”
“ये ढोंग कर रहा है. इसका कोई और ही मतलब है. ये पाखंडी है.... साला.”
रुना ने दांत भींचते हुए कहा.
उसकी बात सुन बाबा जी हँसते हुए बोले,
“सुनो बालिके... तुम्हारी दुःखद मृत्यु को हुए वर्षों बीत गए... किन्तु बुद्धि कदाचित किशोरावस्था पार कर अभी अभी नवयुवती होते एक किशोरी की भांति ही है. यदि मैं पाखंडी होता तो रात के इस समय अपने सहयोगियों के साथ इस प्रकार के अनुष्ठान करने का साहस नहीं करता... यदि मैं पाखंडी होता तो तुम दोनों शक्तिशाली आत्माओं को यहाँ बुला लाने योग्य शक्ति न रखता. संदेह करना तुम्हारा अधिकार हो सकता है परन्तु विवेक का प्रयोग उससे भी कहीं अधिक वांछनीय है.”
अवनी के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था. गुस्से में मुँह फेर ली.
देबू ने स्थिति को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया,
“हमारी कहानी सुन कर आप क्या करेंगे?”
“तुम दोनों के विषय में कुछ तो जानता अवश्य हूँ किन्तु दूसरों के मुख से सुनी हुई बातों पर विश्वास नहीं करना चाहता. जिनकी ये कहानी है... मैं उन्हीं से सुनना चाहता हूँ. एक वाक्य में कहूँ तो मैं सत्य जानना चाहता हूँ.... और जान कर क्या करूँगा.. ये तो सब कुछ जान लेने के बाद ही कह पाऊंगा.”
देबू और रुना... यानि शौमक और अवनी ने एक दूसरे को देखा... देबू ने रुना का हाथ पकड़ा और उसकी आँखों में कुछ क्षण देखता रहा. उन कुछ क्षणों में ऐसा लगा मानो समय जहाँ का तहाँ ठहर गया हो.
फिर बाबा जी की ओर मुड़ गया.
और एक बदले से आवाज़ में बोला,
“ठीक है... मैं सुनाता हूँ.”
“ठीक है.
तुम ही शुरू करो.”
एक गहरी साँस ले कर शौमक अपने बारे में कहना शुरू किया,
“जब से होश संभाला है माँ बाप की कोई खबर नहीं. बाप का भी कोई सगा नहीं था इसलिए नानी ने ही मुझे अपने साथ रखा. बचपन से ही पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता था.. स्कूल जाता अवश्य था पर पढ़ने नहीं; वहाँ आने वाले दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए. स्कूल से आने के बाद भी दिन भर खेलता, धमा चौकड़ी करता था. हाँ, इस बात का बचपन से ही बड़ा ध्यान रखता था कि मेरे कारण मेरी नानी को कोई दिक्कत न हो कभी भी. नहाना भी अच्छा नहीं लगता था.. क्योंकि नहा लेने के बाद दोबारा खेल कूद कर गंदा होना अच्छा नहीं लगता था और बिना खेले कहीं भी एक पल के लिए शांति से बिल्कुल नहीं बैठता था. दिन इसी तरह मस्ती में बीतते जा रहे थे. समय बीतने के साथ साथ अब मैं बड़ा भी होने लगा था.
यही कोई दस - बारह साल का रहा होऊँगा कि एक बार गाँव में कुछ साधु – संन्यासी लोग आए. गाँव में आए ऐसे अपरिचितों की ओर ध्यान आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं था. प्रायः खेल से कुछ समय निकाल कर उन लोगों को देखने जाता था. कभी गाँव के ही ऐसे लोगों के साथ जो उन साधु – संन्यासी लोगों के लिए खाने पीने का सामान ले कर जाते तो कभी कभी मैं कहीं पेड़ पर चढ़ कर या झाड़ियों के पीछे से छुप कर उन साधु – संन्यासियों को देखता रहता था. रोज़ रोज़ उनको देखने रहने से मैं उनके खान पान, रहन सहन, दैनिक क्रियाकलाप को देख कर प्रभावित एवं उनकी ओर आकर्षित होता गया.
मैं उनके साथ मिलने लगा, बैठ कर बातें करने लगा.
धीरे धीरे मैं अधिक से अधिक समय उन लोगों के साथ बिताने लगा.
खेल छूटता गया...
पर अब मुझे कोई परवाह नहीं रहा अपने दोस्तों का, उनके साथ खेलने वाले खेलों का.
मैं तो बस सुबह शाम उन साधु – संन्यासियों के साथ ही बीताता रहता.
और एक दिन जब साधुओं को गाँव छोड़ कर कहीं ओर जाने का समय आया तो मैंने भी उन्हें अपने साथ ले चलने की हठ किया. वे नहीं माने. कहा की अभी मेरा समय नहीं हुआ है. मैं बहुत निराश हो गया. चूँकि इतने दिनों में मेरे प्रति उनका भी एक लगाव हो गया था इसलिए जाने से पहले उन लोगों ने मुझे ढेर सारा आशीर्वाद और फल इत्यादि दिए, और एक स्वस्थ और अच्छे जीवन की मंगलकामना की...
उन साधु – संन्यासियों के चले जाने के कई दिनों बाद तक भी मैं बहुत अधिक निराशा में रहा. सुबह शाम, उठते बैठते बस यही मनाता की बस एक बार फिर से वही साधु – संन्यासी लोग कुछ दिनों के लिए आ जाए.
मेरी ये इच्छा पूरी भी हुई... हुबहू तो नहीं... पर.....
कुछ समय और बीतने के बाद गाँव में एक और संन्यासी आया...
अकेला...
किन्तु ये वाला संन्यासी पहले वालों से भिन्न था...
इसके वस्त्र काले थे, माथे पर एक बड़ा सा काला तिलक, नशे में डूबे बड़े बड़े लाल नेत्र...
हमेशा अपने में ही मगन रहता था.
गाँव वाले इनसे बातचीत करने का प्रयास करते पर ये संन्यासी अधिकांश समय चुप ही रहता.. सबसे बात नहीं करता था...
मेरा भोला मन उसकी ओर आकर्षित होने लगा और कुछेक भेंट के बाद मैं उसकी भी सेवा करने लगा. पीने के लिए घड़े में पानी भर देना, साधना के सभी सामानों को अच्छे उठा कर उनके नियत स्थान पर रखना, भोजन तैयार रखना, उनके सोते समय उनके पैरों को दबा देना, इत्यादि.
मेरे इस निष्काम सेवा से वो साधक बहुत ही प्रसन्न हुआ...
और एक दिन मुझसे ढेर सारी बातें की.. मैं कहाँ रहता, क्या करता हूँ, घर में कौन कौन हैं... सब कुछ जान लेने के बाद वो और भी कई तरह की बातें करने लगा जैसे की ये जीवन नश्वर है, सब कुछ क्षण भंगुर है, सारा संसार कितना रहस्यमयी एवं मायावी है, इत्यादि.
उस दिन के बाद से मैं और भी अधिक ज्ञान पाने की लालसा में उनकी और भी अधिक सेवा करने लगा.
बदले में वो साधक भी मुझे कुछ न कुछ सिखाया करता था.
वो जो कुछ भी जैसे जैसे सिखाता जाता; मैं बिल्कुल वैसे वैसे करता जाता था.
इसी तरह दिन बीतते गए.
मैं अब उस साधक का सहयोगी बन चुका था. उसके अधिकांश तंत्र विधियों को मैं स्वयं अपनी आँखों से सफल होता हुआ देख चुका था. समय लगा मुझे कुछ सीखने में पर समय बीतने के साथ साथ बहुत कुछ सच में सीख गया था.
इधर, अपनी गाँव की ही एक लड़की से प्यार हो गया था.
अवनी नाम था उसका. (कहते हुए उसने रुना / अवनी की ओर देखा.)
(थोड़ा रुक कर बोलना शुरू किया)
अवनी से प्रेम करना तो सरल था.. पर अवनी से प्रेम पाना नहीं.
क्योंकि वो थी एक धनी संपन्न घर की बेटी और मैं.... मेरा तो यदि सुबह का खाना हो जाए तो दोपहर का पता नहीं होता और यदि दोपहर का हो जाए तो रात में क्या होगा उसका पता नहीं होता था.
अवनी को जब से देखा था तब से इतना अधिक खोया खोया सा रहने लगा था कि अपने दैनिक कार्यों को पूरे निष्ठा से पूर्ण कर पाना दिन ब दिन कठिन होता जा रहा था.
रात दिन अपने और अवनी के साथ के सपने देखता रहता था.
अपने सेवा में त्रुटि पाता देख उस साधक को भी अटपटा सा लगा.
सो एक दिन उन्होंने मुझसे मेरे भटकाव का कारण पूछ लिया. मैं अपने मन के भावों को छुपाता अवश्य था परन्तु यदि पकड़ा जाऊं तो सत्य बताने से पीछे नहीं हटता था.
सो मैंने सब कुछ सच सच उस साधक को; जो अब मेरे गुरु थे.. उनको बता दिया... अवनी मुझे मिल नहीं सकती और अवनी के बिना मैं जी नहीं पाता.. इसलिए मैं गुरु जी से हठ करने लगा की कोई उपाय कर के मेरे लिए अवनी के मन में प्रेम लाया जाए. पहले तो गुरु जी ने स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया. कह दिया कि ये उचित नहीं है. ऐसे ही किसी के मन में प्रेम नहीं लाया जा सकता है. और यदि लाया भी गया तो ये बहुत बड़ा धोखा होगा.
किन्तु मैं कहाँ मानने वाला था.
मैंने भी प्रण कर लिया की यदि गुरु जी कोई उपाय नहीं कर देंगे तो मैं अपने प्राण दे दूँगा...
आत्महत्या कर लूँगा.
गुरु जी से रहा नहीं गया... मेरी बात मान गए. एक रात शुभ घड़ी देख कर उन्होंने सम्मोहिनी विद्या का प्रयोग किया. कहा, जब तक मैं चाहूँगा ये विद्या तब तक अवनी पर अपना प्रभाव जमाए रखेगी. ये कह कर उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया.
अगले दिन सुबह से ही मुझे चमत्कार दिखा. बाजार में खरीददारी करते समय अवनी से टकरा गया.
मैंने देखा की वो मुझे मुस्कराते हुए देख रही थी. मैं समझ गया... अब अवनी भी मुझे चाहने लगी है.
और फिर हमारा रोज़ का मिलना शुरू हुआ. घंटों समय साथ बिताया करते थे हम. उससे मिलने के लिए मैं अपने गुरु से अनुमति भी ले लिया करता था.
हमारा प्रेम तो परवान चढ़ने लगा परन्तु जल्द ही थोड़े ही समय बाद मुझे बहुत बुरा लगने लगा अपने इस कृत्य पर. ऐसे भी कभी कोई प्रेम होता है क्या? इसे प्रेम पाना नहीं अपितु प्रेम करवाना कहते हैं... छि... धिक्कार है मुझे स्वयं पर... गुरु जी ने सही कहा था... ये सब अत्यंत ही अनुचित और अन्याय है.
इस विद्या का तोड़ तो गुरु जी ने बता ही दिया था; अतएव जैसे ही मुझमें अपराधबोध जागृत हुआ मैंने इस विद्या के हट जाने की कामना की. फलस्वरूप अवनी के ऊपर से वशीकरण का प्रभाव हट गया..
मैं बहुत ही दुखी हो गया था कि अब अवनी मेरी नहीं होगी...
पर आश्चर्य!
घोर आश्चर्य...!
अवनी अब भी मुझसे प्रेम करती थी! ये देख-जान कर मुझे बहुत अच्छा लगा और स्वयं को सौभाग्यमान मान कर ये सोचा की शायद अवनी भी मुझसे सच में प्यार करने लगी है. फिर तो कई महीने प्रेम में हम दोनों सुबह शाम, दिन रात मगन रहे.
और जैसा हर प्रेम कहानी में होता है... हमारा चोरी छिपे मिलना अधिक दिनों तक गुप्त नहीं रहा.... हम पकड़े गए. और जैसा की होना था.. वही हुआ. अवनी के घरवालों को ये सब बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा. मुझे तो देखना तक पसंद नहीं किया उन लोगों ने.
पंचायत बैठी.
पूरा गाँव आया... भरी सभा में सख्त निर्देश मिला की फिर कभी हम दोनों नहीं मिलेंगे. दोनों के अलग रास्ते होंगे.
उस दिन सबके सामने तो हमने निर्देश मान लिया पर वास्तव में हमारा प्रेम कभी कम नहीं हुआ. हम फिर मिलने लगे और शीघ्र ही ये निर्णय लिया दोनों ने मिल कर की अब हमें शादी कर लेनी चाहिए और इस गाँव को छोड़ दूर कहीं और जा कर बस जाना चाहिए.
सही अवसर देख कर हम घर से भाग गए...
गाँव के मंदिर में ही शादी की. गुरु जी के पास जा कर उनसे आशीर्वाद ले कर विदा लिया. हम तुरंत गाँव छोड़ देना चाहते थे... पर... (तनिक रुक रुना / अवनी की ओर देखा).. न जाने क्यों हमने सोचा की शादी की पहली रात यहीं गाँव में ही कहीं गुज़ार ली जाए..
(अब बाबा जी ने भी रुना / अवनी की ओर देखा और मुस्करा दिए. वो समझ गए कि दरअसल शौमक जल्द से जल्द गाँव छोड़ना चाहता था पर अवनी ही शादी की पहली रात गाँव में गुज़ारना चाहती थी. देबू / शौमक रुना / अवनी के सम्मान के खातिर झूठ बोल रहा है.
)
पर पहली रात को ही हम पकड़े गए.
गाँव वाले काफी आक्रामक हो गए थे.. बुरी तरह मारना पीटना शुरू कर दिया था मुझे... अवनी को भी बहुत लगी थी.. अवनी को मैंने भागने का संकेत दे कर स्वयं भी भागा.. दोनों दो अलग दिशा में भागे...
(इतना कह कर देबू / शौमक रुक गया.. गला भर आया था उसका. अवनी की भी आँखों में आँसू आ गए थे.. बाबा जी समेत उनके शिष्यों और सहयोगियों को भी बहुत बुरा लगने लगा अब.)
भागता भागता मैं नदी की ओर चला गया. गाँव वाले इस तरह पीछे पड़ गए थे मानो सबके दिमाग में खून सवार था. कोई भी कुछ नहीं सुनना चाहता था. मेरे पास अपने प्राण बचाने के लिए सिवाय भागने के और कोई उपाय नहीं था.
सामने नदी थी तो मैं नदी में ही चला गया... स्वयं को बचाने के लिए. तैरते हुए दक्षिण दिशा में चला गया. वहाँ गहराई थोड़ी अधिक है.... मैं डूबने लगा था.. गाँव वाले कुछेक नौका ले कर मेरे पास तक आए भी थे पर एक दूरी पर रुक गए. सब पीछे हो लिए. सहायता के लिए चिल्लाता मैं क्षण भर में समझ गया कि ये लोग मुझे बचाना नहीं चाहते हैं. अपने ही गाँव वालों के इस व्यवहार पर मैं आश्चर्यचकित सा रह गया. मेरे वो गाँववाले जिनके सहृदयता व सहायता भाव के किस्से दूर दूर तक प्रचलित थे... वे ही आज अपने ही गाँव के लड़के को अपने सामने प्राणलेवा संकट में यूँ ऐसे ही छोड़ कर जा रहे थे. सहायता माँगता तो आखिर किससे?
अंत में प्रेम करने का दंड मुझे अपने प्राण दे कर भोगना पड़ा.”
इतना कह कर देबू / शौमक सुबकते हुए चुप हो गया..
उसकी ये व्यथा कथा सुन कर तुरंत कोई कुछ नहीं बोला.
कुछ पल चुप्पी में ही बीत गए.
स्वयं बाबा जी को भी यह दुविधा होने लगी की वो शौमक को सान्तवना दें या कोई अन्य प्रश्न करे....
अंत में उन्होंने यही निर्णय लिया की अब शौमक से प्रश्न न कर के अवनी से करेंगे.
अवनी की ओर देख कर बाबा जी ने मुस्कराते हुए पूछा,
“बेटी, मैं जानता हूँ की तुम्हारी कहानी भी कुछ हद तक शौमक जैसी ही रही होगी.. फिर भी, यदि कुछ और है बताने को तो अभी बता सकती हो.”
भरे गले में गुस्से से बोली,
“उससे क्या होगा?”
एक दीर्घ श्वास लेते हुए बाबा जी बोले,
“देखो बेटी, बता देने से न तो तुम्हारे पुराने दिन वापिस आएँगे और न ही तुम दोनों फिर से जीवन प्राप्त कर लोगे... पर यदि बता दिया तो तुम्हारे मन पर से बोझ उतर जाएगा... मन में कोई बोझ; अब चाहे वो कोई गुप्त बात हो या कोई ग्लानि; यदि लंबे समय तक मन में रहे तो वो अपने आप ही एक अभिशाप बन जाता है. यदि बताने के लिए कुछ हो और वो तुम बता दो तो विश्वास करो मेरा कि उससे तुम्हें शांति मिलेगी, मन हल्का होगा...”
रुना / अवनी ने बगल में ही खड़े देबू / शौमक को एकबार देखा. उसकी आँखों से ये आभास हुआ की कदाचित किसी बात पर उसे विश्वास नहीं हो रहा और और साथ ही उसका दिल दुखा था.. और कदाचित वो बात शौमक का उसपे वशीकरण प्रयोग से संबंधित था.
वो सिर झुका ली..
अश्रुधाराएँ पहले की तुलना में और अधिक बहने लगे..
वो सिर उठाई... होंठों पर एक कुटिल मुस्कान थी..
भयानक हिंसक स्वर में बोली,
“हाँ... है कुछ बताने को... (अत्यंत दुःख और क्रोध से काँपने लगी वो)... और वो ये कि मैंने आत्महत्या नहीं की थी!”
वाक्य के अंत में ‘नहीं की थी’ को इतने ज़ोर से बोली की वहाँ उपस्थित सभी वनस्पतियों के पत्ते थरथरा कर काँप उठे... बाबा जी समेत बाकियों के कान कुछ क्षण के लिए शून्य से पड़ गए.
अचरज में डूबे बाबा जी पूछे,
“आत्महत्या नहीं की थी? पर सारा गाँव तो यही.....”
बाबा जी की बात को बीच में काटते हुए बोली अवनी,
“मेरे साथ हुई दुर्घटना को मैं बेहतर जानूँगी या वो कमीने गाँव वाले?”
“निःसंदेह तुम्ही जानोगी. बताओ क्या हुआ था तुम्हारे साथ?”
कुटिल मुस्कान गायब हो गई... होंठ अत्यधिक क्रोध के कारण काँपने लगे...
बोली,
“तुम.... आपने मुझे बेटी कहा है... इसलिए मैं बताऊँगी नहीं... वरन, दिखाऊँगी...”
और अचानक से रुना / अवनी की दोनों आँखें सफ़ेद प्रकाश से जल उठे... वो सीधे बाबा जी की आँखों में देख रही थी. बाबा जी भी उसी की आँखों में टकटकी लगाए देख रहे थे.....
स)
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बाबा जी की आँखों में आँखें डाल कर उन्हें देखती अवनी की आँखें और अधिक चमक उठीं और इसी के साथ बाबा जी को ठीक उसी क्षण अपनी आँखों के आगे एक चलचित्र चलता हुआ सा अनुभव होने लगा..
वाद्य यंत्र बजने बंद हो चुके थें.
केवल मंत्रों की ध्वनियाँ ही गूँज रही थीं वहाँ... जो कि निकल रहे थे बाबा जी के दोनों सहयोगियों और शिष्यों के कंठों से...
और बाबा जी किसी बुत की भांति चुपचाप अवनी की आँखों में देखते हुए खड़े थे..
थोड़े समय बाद... यही कोई पंद्रह मिनट बीते होंगे,
बाबा जी के शरीर में एक तीव्र कंपन हुई... और वे तुरंत आँखें बंद कर उन्हें मसलने लगे..
“ओह... बुरा हुआ... बहुत बुरा हुआ...”
स्तंभित स्वर में शोकाकुल होते हुए बोले.
रुना कब देबू का बायाँ हाथ पकड़ ली थी ये किसी के नज़रों में नहीं आया था; परन्तु अब उसका हाथ छोड़ते सबने देखा.
देबू और रुना की आँखें भीगी हुई थीं.
सहयोगियों का तो पता नहीं पर दोनों शिष्य गोपू और चांदू को बड़ा अचरज होने लगा था ये पूरा दृश्य यूँ बदलता हुआ देख कर. कहाँ तो अब तक दोनों ही पक्षों में तीखे शब्दों और व्यंग्य बाणों के प्रयोग हो रहे थे... दोनों में से कोई भी पहले प्रहार के लिए तत्पर था.. पर अब.. दोनों ही पक्ष ऐसे भावुक क्यों हो रहे हैं?
“हाँ.. बुरा तो हुआ... बहुत बुरा हुआ था... पर आपको को बुरा लगा... लेकिन उसका क्या; जिसके साथ इतना बुरा हुआ... जिसके सम्मान की हत्या हुई.. जिसके विश्वास का गला घोंटा गया...” रुंधे स्वर में रुना बोली.
बाबा जी चुप थे.. कुछ कहना अवश्य ही चाह रहे थे परन्तु इस समय कदाचित चुप रहना ही उन्हें श्रेयस्कर लगा.
रुना ने कहना जारी रखा,
“हर व्यक्ति यही दो तो चाहता है... सम्मान और विश्वास... यदि यही दो न मिले... या जिसकी ओर सहारा समझ कर हम देखे.. वही यदि इन दो बातों का हत्यारा निकल जाए तो...?? फिर क्या कोई और मार्ग शेष रह जाता है?? …. आत्महत्या करने के सिवाय???”
बाबा जी अब भी बहुत दुखी थे..
सच में...
यदि कोई इस तरह किसी के साथ व्यवहार करे... भरोसा तोड़े... तब तो...
‘नहीं...’
मन ही मन सोचा बाबा ने..
‘ये ठीक नहीं.. मुझे कुछ कहना होगा...’
अवनी की ओर देख कर दृढ़ स्वर में बाबा ने कहा,
“सुनो बेटी, तुम दोनों के साथ ही बहुत अन्याय हुआ ये बात मैं मानता हूँ... और बेटी तुम्हारे साथ अन्याय तो क्या, घोर पाप हुआ है. परन्तु इसका अर्थ ये तो नहीं कि तुम दोनों अपने हाथों को वर्ष दर वर्ष, अविराम रक्तरंजित करते जाओ.. क्योंकि इतने वर्षों में कई ऐसे भी मारे गए जिनका तुम्हारे; तुम दोनों के साथ हुए दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना के साथ कोई संबंध नहीं था. प्रतिशोध की अग्नि ऐसी होती है पुत्री की यदि समय पर न बुझी तो बाद में कई सारे जतन करने के बाद भी शांत नहीं होती और एक समय बाद व्यक्ति विशेष; चाहे वो मृत हो या जीवित; के स्वभाव, चरित्र, प्रकृति, इत्यादि सब कुछ जला कर भस्म कर देती है. तुम दोनों ने कईयों के रक्त से अपने हाथ लाल कर लिए हैं... बहुत हुआ... अब अपने क्रोधाग्नि को शांत करने का यत्न करो और ये सब छोड़ दो. यदि इतना करते हो तो मैं तुम्हें ये वचन देता हूँ कि मैं स्वयं तुम दोनों को इस योनि से आज ही मुक्ति दिलाऊँगा और एक सुखी जीवन के लिए अगले जन्म का मार्ग प्रशस्त करूँगा.”
इतना कह कर बाबा चुप हुए....
शौमक और अवनी भावहीन मूर्ति समान बाबा की बातों को सुन रहे थे... उनके चुप होते ही दो पल बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा.
अवनी के होंठों पर एक हल्की मुस्कान बिखर गई.
शौमक उसका आशय समझ गया. उसने भी मुस्कराते हुए सहमति में सिर हिलाया.
फ़िर दोनों एक साथ बाबा जी की ओर देखा.
और एक साथ ही कहा,
“नहीं.!!”
“नहीं??!”
“हमारी प्रतिशोध की अग्नि कब और कैसे शांत होगी ये हम स्वयं निश्चित करेंगे. कोई बाहरी आ कर हमें नहीं बतायेगा कि हमें कब, क्या करना है.”
बाबा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ.
“लेकिन क्यों... क्यों ऐसा करते रहना चाहते हो तुम लोग? आखिर कब तक?”
“तब तक.. जब तक कि इस गाँव के सभी दोषी मारे नहीं जाते.”
“लेकिन सभी तो दोषी नहीं हैं!?”
“कौन दोषी है या नहीं है; इसका निर्णय भी हम करेंगे!”
इस बार भी दोनों ने एक साथ कहा.
“देखो बेटी, (बाबा अवनी की ओर देखते हुए बोले) मैं समझता हूँ तुम्हारी पीड़ा को. तुम्हारे साथ बहुत बहुत बुरा हुआ है और दोषी को दंड तो मिलना ही चाहिए. परन्तु इन गाँव वालों का इतना भी भयंकर दोष नहीं की इस तरह सब को एक एक कर के मार दिया जाए....
”
बाबा के बात को बीच में ही काटते हुए बोली अवनी,
“तो क्या उन लोगों से निवेदन कर के उन्हें मारूँ?? ये गाँव वाले भी कम दोषी नहीं हैं.. अतएव इन्हें भी उचित दंड मिलना ही चाहिए और ये दंड मृत्युदंड ही है.”
“मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूँगा.”
“तू रोकेगा??”
“हाँ.”
“फिर तो तू भी मारा जाएगा!”
“चिंता नहीं.”
“सोच ले.”
“इसमें सोचना कैसा? मैं यहाँ अच्छे से सोच कर ही आया था. गाँव वाले मेरी शरण में हैं अब... मैं उनका कोई अहित नहीं होने दूँगा.”
“हाहाहा.. तेरी ही शरण में रहते हुई ही आठ लोग मारे गए इतने दिनों में.!!”
“हाँ.. वो भी इसलिए क्योंकि उन लोगों ने मेरी बात नहीं मानी थी.”
“तू फिर भी नहीं रोक पाएगा उन्हें मरने से ऐ साधक!”
“प्रयास कर लो.”
“क्या ये तुम्हारी चुनौती है, साधक?”
“हाँ... चुनौती है.”
दोनों की ही आँखें अत्यधिक क्रोध से लाल हो गए.
उनके क्रोध और तेज़ से आस पास के पेड़ हिलने लगे और तेज़ हवाएँ चलने लगीं.
बाबा तो तैयार हो कर ही आए. थे. तुरंत उन्होंने अब तक अधबुझी हो चुकी हवन से एक लकड़ी का टुकड़ा उठा लिया और उन दोनों की ओर फेंक दिया. दोनों हवा में ही लड़खड़ा गए.
अधिक समय नहीं था हाथ में. कुछ क्षणों बाद ही वे संभल जाएँगे.
बाबा भी तैयार...
हवन से एक छोटी लकड़ी निकाला.. दूसरे हाथ में थोड़ा सा भस्म लिया.. दोनों का आपस में स्पर्श कराया और फिर उस लकड़ी को एक ओर रख कर उस भस्म से शरीर पर भस्म-लेप किया, धारण किए हुए उन तांत्रिक-आभूषणों को पोषित किया, छोटे से बर्तन में रखे रक्त के घोटे से माथे को सुसज्जित किया! और फिर अपना त्रिशूल निकाला! बाएं गाड़ा! आसान बिछाया और उस पर थोड़े अनाज रख दिया...
फिर चिमटा निकाला, चारों दिशाओं में खड़खड़ाया और क्षण भर में दिशा-पूजन किया!
झोले में से दो कपाल निकाले. एक कपाल को सामने रख कर दूसरे कपाल को त्रिशूल पर टांग दिया!
पीछे बैठे उनके एक सहयोगी ने दो हाथों की अस्थियां बाबा को दिया... बाबा ने उन अस्थियों को सामने रखे कपाल पर रखा और क्रंदक-मंत्र पढ़ा!
दोनों अस्थियों को आपस में जो से दे मारा.. और फिर से उस कपाल से छुआ दिया..
ऐसा करते ही दोनों अस्थियाँ काँप उठी और कपाल भी अपने स्थान पर ज़ोर से हिला !
वातावरण में एक अत्यंत ही दिल दहला देने वाला कानफोड़ू अट्ठहास हुआ!
तंत्र क्रिया सक्रिय एवं आरम्भ हो गई..!
और अब तक संभल चुके शौमक और अवनी भी इस पूरे व्यवस्था को आश्चर्य से आँखें फाड़े देख रहे थे.
बाबा को उन्होंने कम कर के आँका तो नहीं था पर अब तो बाबा उनके कल्पना से भी कहीं अधिक तंत्र ज्ञाता निकले!
कुछ देर के लिए चुप्पी छा गई वहाँ..
सहयोगी और शिष्य अब अत्यंत धीमे स्वर में मंत्रपाठ कर रहे थे..
इनके अलावा अगर और कहीं से आवाज़ें आ रही थीं तो बस सम्मुख जल रही हवन की लकड़ियों से आती चट-चट की आवाज़ें...
!
मरघट की सी शांति चारों ओर छाई हुई थी...
बाबा काफ़ी सतर्कता से तीक्ष्ण दृष्टि से उन दोनों को देख रहे थे..
शौमक और अवनी भी बराबर सावधानी बरतते हुए बाबा, उनके सहयोगियों और शिष्यों को देख रहे थे.
बाबा ने एक विशेष संकेत किया.. शिष्यों ने मंत्रपाठ के उच्चारण की गति और स्वर; दोनों को तनिक बढ़ा दिया. वातावरण में अब मंत्र ऐसे गूँज रहे थे जैसे शिथिल पड़े हुए धौंकनी रुपी श्मशान में हवा भर दी जा रही हो जिसके परिणामस्वरूप वो अब फुफकारने लगी है!
हवन से उठता धुआँ वहाँ उपस्थित सभी के अस्तित्व की पहचान लिए इस भूलोक से विदा लिए जा रहा था!
शौमक कदाचित अब भी असमंजस में था परन्तु अवनी ने मानो कुछ ठान लिया था.
उसके दोनों हथेलियाँ सख्ती से मुट्ठी में परिणत हो गए थे और दोनों मुट्ठियों से एक चमक बिखरने लगी थीं..
ये देख बाबा यूँ धीमे हँसे जैसे कोई अभिभावक एक बच्चे के भोले शरारत को देख हँसता है. बाबा ने पास ही रखा एक कपाल उठाया, सहयोगी ने तुरंत उसमें मदिरा डाला.. बाबा ने एक मंत्र पढ़ा और एक महानाद करते हुए मदिरा कंठ से नीचे उतार लिया!
फिर बाबा जी ने वाचाल-प्रेत का आह्वान किया, वो उपस्थित हुआ! उसके बाद कर्ण-पिशाचिनी का आह्वान कर उसको भी राजी कर लिया. फिर वे दोनों मुस्तैद हो गए!
फिर आरम्भ हुआ तंत्र युद्ध!!
दोनों और से तंत्रों का अद्भुत टकराव होने लगा.
बाबा के पास उन दोनों के हरेक वार – प्रहार का पर्याप्त उत्तर था.. और बड़ी ही सरलता से उन दोनों के वारों से निपट रहे थे.
बाबा पर रत्ती भर भी अपने वारों का प्रभाव न होता देख कर अवनी प्रतिक्षण अत्यंत क्रोधित होती हुई और भी अधिक शक्ति से वार करने लगी और शौमक अपनी पूरजोर दम लगा कर बाबा के वारों से अवनी को सुरक्षित रखने का प्रयास करने लगा.
वैसे, बाबा केवल अवनी के प्रहारों से स्वयं की रक्षा ही कर रहे, पलट कर वार नहीं कर रहे थे.
तभी उनका एक सहयोगी उठ कर बाबा के कानों में कुछ कहा... बाबा ने ऊपर गगन में देखा.. समय निकला जा रहा था... इन दोनों से अधिक समय तक यूँ ही लड़ते रहने का कोई अर्थ नहीं था.
तंत्र युद्ध में उनकी शक्ति देख बाबा जी समझ गए थें कि इन्हें ये शक्तियाँ चंडूलिका से मिल रही हैं... क्योंकि ऐसे तंत्र और वार करने की शक्ति साधारण आत्माओं में तो कभी होती ही नहीं है...
तुरंत ही स्वयं को एक तंत्र कवच में सुरक्षित कर के बाबा ने नेत्र बंद कर के मंत्र पढ़ना शुरू किया. उनके चेहरे पर आते जाते भावों ने ये बिल्कुल ही स्पष्ट कर दिया की अब बाबा इस खेल को यहीं समाप्त करने हेतु किसी महा शक्ति का आह्वान कर रहे हैं.
और कुछ ही पलों बाद वो शक्ति वहाँ उपस्थित भी हो गई.
एक महा गर्जन के साथ!
महाप्रेत था ये...
सभी प्रकार की आत्माओं, भूत – पिशाच, चुड़ैल, डायन, इत्यादि का बाप!
बाप क्या...
अगर इसे इन सबका भगवान भी कह दिया जाए तो कदचित कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.
अब तो अवनी का भी हालत ख़राब!
और किसी से भी लड़ लेगी.. कुछ समय तक टक्कर दे देगी.. परन्तु ये..?! ये तो महाप्रेत है.. अवनी जैसी आत्माओं का मास्टरजी!
इससे पहले की शौमक और अवनी कोई उपाय सोचते; बाबा जी ने त्वरित गति से एक ऊर्जा पाश से दोनों को घेर लिया. अब चंडूलिका लाख चाह कर भी इनकी किसी तरह कोई सहायता नहीं कर पाएगी.
“इन्हें उचित दंड दो!”
बाबा के मुख से हुंकार रुपी आदेश निकला.
महाप्रेत न एक क्षण भी न गँवाया.. दोनों को पकड़ा और शुरू हो गई उठा पटक..
आख़िर कितनी देर और टिकते.
दया की भीख माँगने लगे.
अवनी की हेकड़ी निकली हो न हो... चाहे क्रोध शांत हुआ हो या न हो.. लेकिन महाप्रेत के हाथों शौमक की दुर्गति होते और न देख सकी.
उसने भी हाथ जोड़े.
क्षमा माँगी.
“ठहरो!”
महाप्रेत रुका. पलट कर बाबा जी की ओर देखा.. अगले आदेश के लिए.
पर बाबा ने और कोई आदेश नहीं दिया. महाप्रेत के लिए पहले से तैयार भोग को आगे बढ़ाया.
महाप्रेत तो अति प्रसन्न!
भोग स्वीकार किया और बाबा को प्रणाम कर के अदृश्य हो गया.
बाबा अब उन दोनों प्रेमी आत्माओं की ओर देखा.
मुस्कराए,
पूछा,
“अब भी टक्कर लेना है?”
“नहीं...” दोनों ने कराहते हुए कहा.
“तो अब....?”
“हम अपनी भूल स्वीकार करते हैं.”
“ह्म्म्म...तो.. अवनी.. तुम्हारे साथ हुए पूरे घटना को सविस्तार सुनाओ.”
“पर मैंने तो तुम... आपको सब दिखा दिया.”
“केवल मैंने देखा.. और किसी ने नहीं.”
“तो?”
“तो यह कि अब तुम वो सारी घटना सुनाओगी.. यही तुम्हारी एक प्रकार की स्वीकारोक्ति भी होगी.”
समय व्यर्थ न गँवाते हुए वह बोलना शुरू की,
“जब गाँव वाले मेरे पीछे पड़े थे तब मैं अपने परिवार वालों के साथ न जा कर अलग जाने का निर्णय लिया. मैं जंगल के रास्ते भागी. ऐसे संकट की घड़ी में केवल और केवल शौमक के गुरु ही मुझे बचा सकते थे. मैं भागते भागते उनके पास गई और उनसे भेंट होते ही उनके पैर पकड़ ली. प्राणों की भीख माँगने लगी.
उस साधक ने मुझे पकड़ कर उठाया. दो मीठे बोल बोला. सान्तवना दिया की सब ठीक हो जाएगा. मुझे अंदर जा कर सोने के लिए कहा. उससे पहले कुछ खाने पीने को दिया. खा पी कर मैं सो गई.
अगले दिन सो कर उठी. अच्छा लगने के बजाए पूरा शरीर मानो टूट सा रहा था.
बदन के सभी कपड़े अस्त व्यस्त थे.
शौच के लिए गई तो देखा की योनि से रक्तस्राव हो रहा है. एक अलग ही पीड़ा है वहाँ. समझते देर न लगी मुझे.
रात में मेरे निद्रा में ही कल तक अक्षत रही कौमार्य को तोड़ दिया गया है! धर्षण हुआ है मेरा!
ये एक सदमा था मेरे लिए.
उस साधक से आमने सामने बात करने के लिए मैं उन्हें ढूँढने लगी. पर वो कहीं नहीं मिले. मैं वहाँ से, उनकी कुटिया से तुरंत निकल जाना चाही.. पर आश्चर्य!! कितना भी प्रयास कर लूँ..
कुटिया से पाँच कदम दूर जाने के बाद मैं आगे बढ़ ही नहीं पा रही थी. जब भी आगे बढ़ती, किसी अदृश्य दीवार से टकरा जाती! निरंतर प्रयास करती रही पर विफ़ल रही. थक हार कर मैं कुटिया में ही रोते रोते सो गई.. भूखे पेट...
संध्या समय वो साधक लौट आया.
हाथ में कुछ सामान भी था.
मुझे खाने को दिया.
मैं मना करना चाहती थी पर उस साधक की आँखों में देखते ही मैं अपने सारे प्रतिरोध, कुंठा इत्यादि को भूल गई... खाना खाने के बाद मुझे परोसे गए एक कपाल में मदिरा को भी पी गई.
आँखें भारी होने लगी.. नींद आने लगी बहुत ज़ोरों से...
वहीँ लुढ़क गई.
फिर रात भर मेरे साथ मेरे इच्छा विरुद्ध यौन क्रीड़ा चलता रहा. मेरे बदन के हरेक इंच को जैसे कच्चा ही चबा जाना चाहता था वह. पिछली रात तो कदाचित बदन पर कपड़े रह गए थे.. लेकिन आज पूरी तरह से निर्वस्त्र कर के ही माना वो नीच.. इतनी बुरी तरह से पूरे शरीर के हरेक अंगों का माँस मर्दन हुआ; जिसका मैंने कभी अपने सबसे बुरे स्वप्न में भी कल्पना नहीं की होगी.
लेकिन इस बुरे स्वप्न का यहीं अंत नहीं था..
क्योंकि...
केवल योनि से मिले सुख से संतुष्ट नहीं हुआ वो. कुछ अलग चाहता था.. मैं समझ गई थी कि ये क्या चाहता है... पर मैं मना कर पाऊँ; इतनी शक्ति नहीं बची थी मेरे अंदर.
फ़िर उसने वही किया जो वो चाह रहा था..
अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित किया मेरे साथ... बहुत तड़पी मैं.. पर उसे तो केवल स्वयं के आनंद से ही मतलब था.
अगले दिन मुझे पता चला की वो इसी तरह हर गाँव से ऐसे पाँच लड़कियों से संसर्ग करता है जिनका कौमार्य पर कोई दाग न हो.. फिर एक महाशक्ति को एक विशिष्ट रात्रि में बलि देता है.. नर बलि!
उसने स्वयं हँसते हुए कहा की इसकी ये तंत्र क्रिया दूसरे सभी तंत्रों से भिन्न है; बल्कि दूसरे शब्दों में देखा व कहा जाए तो ये कोई तंत्र क्रिया नहीं कुछ और ही था.. कुछ ऐसा जो इस दुनिया में विरले लोगों को ही पता है.
हर किसी में साहस नहीं होता है ये क्रिया करने का!
इस क्रिया व पद्धति को करने से उसे और अधिक विशिष्ट शक्तियां मिलेंगी. वो और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा.
इस गाँव में आने के कुछ ही समय में उसने इसी गाँव की चार लड़की के साथ दुराचार कर के उनका बलि दे चुका था.. अंतिम की खोज थी उसे. एक दिन गाँव के हाट (बाजार) में मुझे शौमक के साथ देख लिया था.
उसके चेले की इतनी सुंदर, देह से पूर्ण एक प्रेमिका हो सकती है ऐसा उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था.
शौमक के द्वारा मेरे ऊपर से वशीकरण हटा लेने के तुरंत बाद ही उस साधक ने भी मुझ पर वशीकरण अस्त्र चलाया और मुझे शौमक पर मुग्ध करवा दिया.
संसर्ग करते समय उस साधक ने मुझसे कहा था कि उसे पता था कि मैं और शौमक इस गाँव से बाहर नहीं जा सकते.. और मैं स्वयं ही इनके पास आऊँगी.. ये उस रात मेरी ही प्रतीक्षा में थे...
तैयार!
अगले दो दिनों तक मेरे साथ यही कुकर्म चलता रहा..
चौथे दिन की रात्रि को मेरा बलि होना था... और संयोग से उस दिन उस साधक ने दिन भर और जी भर कर मदिरा पान किया. उसे बेहोश देख मैंने एक बार फिर वहाँ से भाग जाने का प्रयास करने का निर्णय लिया.
कदाचित उस दिन उस कुटिया को चारों ओर से बाँधने भूल गया था वो नीच... इसलिए मैं बड़े आराम से वहाँ से निकल गई.
पर अब भाग कर जाती कहाँ...
कौमार्य नष्ट हो चुका था मेरा... शौमक का क्या हुआ... वो जीवित रहा भी या नहीं... क्या ऐसी दशा में मुझे अपनाएगा? और यदि अपना भी लिया; तो क्या मुझे ये शोभा देगा की मैं अपने देवता को झूठे, बासी फूल अर्पण करूँ?
क्या मुँह ले कर घर जाऊँ? क्या वापस लौट आने के लिए ही घर से भाग कर प्रेमी के साथ शादी की थी? समस्त गाँव वालों के सामने तो परिवार वालों के मुँह पर कालिख पोत ही चुकी थी मैं.. तो अब कैसे... परिवार वाले मुझे स्वीकार कर अपनाना भी चाहे तो समाज उन्हें ऐसा करने नहीं देगा...
कहेंगे की ऐसा करने से एक ऐसे उदाहरण की सृष्टि होगी जिससे भविष्य पर गाँव की कई जवान – नादान लड़कियों पर गलत प्रभाव पड़ेगा.
किसी और के घर नहीं जा सकती. कोई रख भी ले तो कहीं वो भी उस नीच साधक की ही भांति न निकले..
चलते चलते इसी स्थान पर, इसी पेड़ के नीचे आ कर बैठी मैं. रुलाई छूट गई मेरी. बहुत देर तक रोती रही..
और कोई मार्ग शेष न था.. अतः एक भयानक निर्णय ले ली.
आत्महत्या!!
हत्या तो मेरी उसी रात हो गई थी; जिस रात उस नीच ने मेरा देह धर्षण कर के कौमार्य ले लिया था..
अब तो बस खानापूर्ति करनी थी.
स्वयं को दैहिक रूप से मार कर...
कार्य सहज न था. भला स्वयं के प्राण लेना भी कभी सहज होता है??
अपने भगवान और पूर्वजों से क्षमा माँगी..मन को दृढ़ की... और इसी पेड़ की सबसे ऊँची डाली से.... लटक गई.
समाप्त... मेरी इहलीला.”
अवनी की आपबीती ने सबकी आँखों को भीगा दिया.
अंदर से हर कोई बुरी तरह से हिल गया.
कुछ पलों की चुप्पी के बाद बाबा ने पूछा,
“अब वो शैतान तांत्रिक कहाँ है?”
अवनी के बदले शौमक ने उत्तर दिया,
“अवनी के उसके चंगुल से छूट कर निकल जाने और बाद में आत्महत्या कर लेने के कारण उसका बलि का कार्यक्रम अधूरा रह गया था. जो सिद्धि उसे कुछ ही समय पश्चात मिलने वाली थी अब उसमें और भी अधिक विलम्ब हो गया. इसी कारण वो क्रोध से अत्यंत पागल हो उठा था. लक्ष्य के इतने निकट पहुँच कर असफ़ल होना किसी से भी सहन नहीं होता है.
अवनी के इस हरकत से उसे जो असफ़लता मिली और जो क्षति हुई; क्रोध के उन्माद में इसका प्रतिशोध वो पूरे गाँव से लेने की सोचा और एक रात यहाँ से जाने से पहले एक भयंकर क्रिया का संपादन किया. एक ऐसा अनुष्ठान जो कि किसी भी साधारण मनुष्य की कल्पना से परे थी.
चंडूलिका को जाग्रत किया उसने!
और हमें उसके अधीन कर दिया.
(कहते हुए कुछ क्षणों के लिए शौमक रुक गया. देखा की सभी उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रहे थे.. मुख से निकलते एक एक शब्दों को. पेड़, पौधे, घास, इत्यादि सभी वनस्पतियाँ भी मानो ठहर कर उसकी बातें सुनने को उत्सुक थे.)
(शौमक ने कहना जारी रखा...)
शादी की पहली रात से ही एक साथ घटी इतने सारे घटनाओं का हम दोनों पर बहुत गहरा धक्का लगा था जिसका प्रभाव हमारे मरणोपरांत भी रहा. उस तथाकथित तांत्रिक घेतांक और चंडूलिका ने हम दोनों को और भी अधिक वहशी बना दिया. अब हम दोनों को ही यौन संतुष्टि चाहिए थी.. हम दोनों ही गाँव वालों के बुद्धि को भ्रमित कर उनसे यौन सम्बन्ध स्थापित करते और जब काम हो जाता तब चंडूलिका के इशारे पर ही उन्हें मार भी दिया करते थे.. वैसे भी गाँव वालों को लेकर हमारे मन में अब तो कोई अच्छा विचार रहा नहीं था.. इसलिए उन लोगों को मारने में रत्ती भर का भी संकोच नहीं होता था.”
इतना कह कर शौमक अपनी बात ख़त्म किया.
कदाचित बाबा से रहा नहीं गया; ज़ोर से बोल पड़े,
“बस... !! बहुत हुआ... अब और नहीं.. अब और कष्ट नहीं!!”
कहते हुए आसन पर बैठ गए.
मंत्रोच्चारण प्रारंभ किया.
अब की बार अलग ही उद्देश्य था बाबा का जो शीघ्र ही सामने आ गया.
एक नारियल लिया. लम्बा सा लाल तिलक लगाया. मंत्रोच्चारण चलता रहा.
और थोड़े ही समय पश्चात् एक मद्धम नील प्रकाश से आलोकित हो गया वह नारियल. थोड़े और मंत्रोच्चारण के बाद अचानक न जाने कहाँ से एक सफ़ेद तेज़ रौशनी आई और उस नारियल में समा गई!
बाबा सामने देख कर बोले,
“तुम दोनों ने बहुत कष्ट झेला है.. अब विश्राम करो. मैं कल सुबह ही तुम दोनों की अंत्येष्टि एवं अन्य क्रियाकर्म कर दूँगा. साथ में पिंडदान की व्यवस्था भी. अब जाओ! विश्राम करो!!”
बाबा के हुंकार रुपी आदेश का तुरंत प्रभाव देखने को मिला.
धीरे धीरे शौमक और अवनी हवा में विलीन हो गए. मुखमंडल में एक सुखद प्रसन्नता, आभार एवं संतुष्टि लिए.
बाबा ने भुजंग का आह्वान किया. उसके आते ही बाबा ने सामने धरा पर बेसुध पड़े देबू और रुना को उनके घर पहुँचा देने का आदेश दिया.
तत्क्षणात् आदेश का पालन हुआ.
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अगले दिन सुबह,
अपने वचनानुसार बाबा ने सभी कार्य संपन्न कर दिया.
फ़िर अपने साथ सहयोगियों और शिष्यों को लेकर जंगल के बहुत अंदर एक सुनसान स्थान पर गए. जंगल के और सभी स्थानों से ये स्थान तनिक हट कर था.
बाबा ने गणना कर के ज़मीन पर एक बहुत गहरा गड्ढा खुदवाया.
तत्पश्चात वहाँ उस गड्ढे के अंदर मंत्रोच्चारण के बीच उस नारियल को झोले में से निकाल कर बहुत सावधानी से एक लाल कपड़े में पूरी तरह से लपेट कर ढक कर रख दिया और फिर मंत्रोच्चारण के साथ ही उस गड्ढे को भरने का आदेश दिया.
गड्ढा भरते ही चांदू बहुत उत्सुकतावश पूछ बैठा,
“गुरूदेव...
इस नारियल में क्या है? कल एक अद्भुत प्रकाश को इसमें प्रविष्ट होते देखा था.”
“इसमें उस चंडूलिका की प्रतिछाया है वत्स... महाप्रेत को बुलाते समय मैंने शौमक और अवनी को अपने तंत्र पाश में बाँध दिया था. ऐसा करते ही उस चंडूलिका को पता चल गया था की कदाचित कल उसकी पराजय निश्चित है. जो महाप्रेत को बुलाने की क्षमता रखता हो वो और कई तरह की सिद्धियाँ भी अवश्य ही रखता होगा.
यह सोच कर ही वह फ़ौरन इस गाँव को छोड़ कर अन्यत्र कहीं चली गई. जाने से पहले अपनी प्रतिछाया को छोड़ गई. क्यों... इसका कोई सटीक उत्तर नहीं है मेरे पास.
इस बात का सदैव ध्यान रहे वत्स... की ये है तो चंडूलिका की प्रतिछाया मात्र; पर कम शक्तिशाली नहीं है. अतः ये इस सुनसान... इस वीराने में ही इस गड्ढे के अंदर नारियल में कैद रहनी चाहिए.. किसी भी प्रकार से यदि बाहर निकलने में सफ़ल हो गई तो घोर अनर्थ हो जाएगा...
..... वैसे..”
“वैसे.. क्या गुरूदेव?”
“ऐसा कहते हैं कि इन्हें जो कोई भी स्वतंत्र करता है ये उन्हीं की हो कर रह जाती हैं... संसार का समस्त सुख, हर प्रकार का सुख अपने उद्धार करने वाले की झोली में डाल देती है. कभी कभी तो कई प्रकार की शक्तियाँ भी प्रदान करती हैं.
पर ये सब कहने सुनने की बातें हैं.. वास्तविकता से इनका कोई लेना देना है या नहीं; ये कोई नहीं जानता आज तक.”
“परन्तु गुरूदेव... गाँव वालों ने वाकई बहुत बुरा किया था न शौमक और अवनी के साथ.”
“गाँव वाले क्या कर रहे थे ये स्वयं गाँव वालों को भी पता नहीं था क्योंकि वे सभी उस शैतान घेतांक के सम्मोहनी विद्या से प्रभावित थे. गाँववालों को अपनी करनी केवल दिख रही थी; अपने सोच पर कदापि नियंत्रण नहीं था उन लोगों का.”
अब गोपू ने एक प्रश्न किया,
“गुरूदेव, ये शौमक और अवनी की आत्माएँ देबू और रुना के शरीर में क्यों प्रवेश कर गए थे... कारण क्या था?”
“देबू और रुना, दोनों ही काफ़ी हद तक शौमक और अवनी के जैसे दिखने में थे. अति संयोग ही है यह कि देबू और रुना के जन्म के समय की ग्रह – नक्षत्र की दिशा दशा बिल्कुल वैसी ही थी जैसी शौमक और अवनी की. और देबू भी रुना की ओर आकर्षित था कुछ समय से. इन्हीं सब कारणों ने ऐसी अवांछनीय परिस्थितियों को बल दिया.”
“घेतांक और चंडूलिका का क्या होगा गुरूदेव... क्या वो फिर कभी गाँव वापस आएँगे?”
“चंडूलिका तो नहीं आएगी वत्स. इनका एक स्वभाव होता है कि जिस स्थान को एक बार ये छोड़ देती है, वो वहाँ दोबारा कभी नहीं जाती. अतः गाँव वाले चंडूलिका के आतंक से अब पूर्णतः मुक्त हैं और सदैव रहेंगे. रहा प्रश्न घेतांक का तो उसका कुछ कह नहीं सकता. वापस आ भी सकता है... और नहीं भी. वैसे, न आने के ही संभावनाएँ अधिक हैं; क्योंकि अगर आ गया, तो अब गाँव वाले उसे जीवित नहीं छोड़ेंगे.
”
इसके बाद बाबा और उनके दो सहयोगियों ने कुछेक क्रियाएँ और की वहाँ और फिर सब वहाँ से चले गए.
गाँव में कुछेक दिन और रह कर, सब के धन्यवाद स्वरूप अनेक प्रकार के भेंट पा कर; एक निश्चित दिन, निश्चित घड़ी देख कर बाबा अपने सहयोगियों और शिष्यों के साथ गाँव वालों से विदा ले कर चले गए. गाँव वालों ने नम आँखों से उन्हें विदा किया.