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Wo Lal Bag Wali (Completed)

Story Hindi 113 pages 6 months ago

भाग 1​

आज से करीब १०००-१२०० वर्ष पूर्व (देखो वैसे मुझे घंटा आईडिया नहीं है के १००० साल पहले क्या माहौल था लोगो का रेहन सेहन कैसा था बोलीभाषा क्या हुआ करती थी इसीलिए जहा तक दिमाग के घोड़े दौड़ रहे थे उतना लिख रहा हु )

हिन्द महासागर

इस वक़्त हिन्द महासागर मैं कुछ ३-४ नावे चल रही थी, देखते ही पता चलता था के मुछवारो की नाव है जो वह मछली पकड़ने का अपना काम कर रहे थे, वैसे तो नाव एकदूसरे से ज्यादा दूर नहीं थी पर उन्होंने अपने बीच पर्याप्त अंतर बनाया हुआ था,

ये कुछ जवान लड़के थे जो पैसा कमाने और मछली पकड़ने की होड़ मैं आज समुन्दर मैं कुछ ज्यादा ही दूर निकल आये थे, सागर के इस और शायद ही कोई आता था क्युकी इस भाग मैं अक्सर समुद्र की लहरें उफान पर रहती थी इसीलिए ये लड़के यहां तो गए थे पर अब घबरा रहे थे पर आये है तो बगैर मछली पकडे जा नहीं सकते थे इसीलिए जल्दी जल्दी काम निपटा के लौटना चाहते थे

पर जब मछलिया जाल मैं फसेंगी तभो तो कुछ होगा न अब उसमे जितना समय लगता है उतना तो लगेगा ही

"हम तो पहले ही बोले थे यहाँ नहीं आते है यहाँ अक्सर तूफान उठते रहते है हमारा तो जी घबरा रहा है" उनमे से एक लड़का दूसरी नाव वाले से बोला, हवा काफी तेज चल रही थी तो वो चिल्ला के बोल रहा था

"ए चुप बिरजू साले को पैसा भी कामना है और जोखिम भी नहीं लेना है " दूसरे लड़के ने उसे चुप कराया

"बिरजू सही कह रहा है पवन मेरे दादा भी कहते है के सगर का ये भाग खतरनाक है उन्होंने तो ये भी बताया था के ये इलाका ही शापित है" तीसरा बाँदा भी अब बातचीत मैं शामिल हो गया

"इसीलिए तो मैं कह रहा हु के जितनी मछलिया मिल गयी है लेके के चलते है मुझे मौसम के आसार भी ठीक नहीं लग रहे " बिरजू ने कहा

बिरजू की बात के पवन कुछ बोलना छह रहा था के "अरे जाने दे से पवन ये बिरजू और संजय तो फट्टू है सालो को दिख नहीं रहा के यहाँ कितनी मछलिया जाल मैं फास सकती है कमाई ही कमाई होगी और अगर कोई बड़ी मछली फांसी तो राजाजी को भेट कर देंगे हो सकता है कुछ इनाम मिल गए " ये पाण्डु था चौथा बंदा

"सही बोल रहा है तू पाण्डु " पवन

वो लोग वापिस अपने काम मैं जुट गए , देखते देखते दोपहर हो गयी और अब तक उन चारो ने काफी मछलिया पकड़ ली थी और अब वापिस जाने मैं जुट गए थे

"बापू काफी खुश होगा इतनी मछलिया देख के " बिरजू ख़ुशी से बोला

"हमने तो पहले ही कहा था इस और आने अब तो रोज यही आएंगे मछली पकड़ने " पाण्डु बोल पड़ा

तभी मौसम मैं बदलाव आने सुरु हो गए, धीरे धीरे मौसम बिगड़ने लगा और इस प्रकार के मौसम मैं नाव चलना मुश्कुल हो रहा था, हवा की गति भी अचानक से काफी तीव्र हो गयी थी, वो चारो नाविक लड़के परेशानी की हालत मैं थे के इस तूफ़ान से कैसे बचे, किनारा अब भी काफी दूर था , तभी उन्हें समुद्र के बीच से कही से हवा का बवंडर अपनी और आता दिखा जिसकी तेज गति से पानी भी १३-१४ फुट

तक ऊपर उठ रहा था, वो चारो घबरा गए और मन ही मन भगवन को याद करने लगे

देखते ही देखते उस बवंडर ने उनकी नावों को अपनी चपेट मैं ले लिया पर इसके पहले ही वो चारो पनि मैं कूद चुके थे,

वैसे तो वो तैरना जानते थे पर इस तूफ़ान मैं उफनती सागर की लेहरो मैं तैरना आसान काम नहीं था, कभी मुश्किल से थोड़ा ही तेरे थे के उस बवंडर से उन्हें अपने अधीन कर लिया और वे चारो सागर की गहराइयो मैं गोता लगाने लगे

बिरजू उन सब मैं सबसे अच्छा तैराक था इसीलिए वो थोड़े लम्बे समय तक तैरता रहा जबकि उसके बाकि साथी तो पहले ही सागर की गहराइयो मैं खो चुके थे

धीरे धीरे बिरजू के सीने पे पानी का दबाव पड़ने लगा और वो भी डूबने लगा उसकी आँखें बंद होने लगी थी......

कुछ समय बाद बिरजू की आँखें खुली तो उसने अपने आप को सागर की गहराइयो मैं आया पर आश्चर्य उसे सास लेने मैं कोई कठनाई नहीं हो रही थी पर जब उसने सामने देखा तो उसके होश उड़ गए थे

उसके सामने विशालकाय ३० फुट ऊचा कोई व्यक्ति जंजीरो से बंधा हुआ था, सबसे भयावह और अजीब बात ये थी के उसका सर आम इंसानो जैसा न होकर सर्प के सामान था और उसके पीठ पर ड्रैगन जैसे पंख लगे हुए थे, उस अजीबोगरीब चीज़ को देख के बिरजू की डर से हालत ख़राब हो रही थी तभी उसके कानो मैं कही से आवाज गुंजी

"मनुष्य"

बिरजू एकदम से घबरा गया

"घबराओ नहीं मनुष्य मैं कालदूत हु और मैं तुम्हे कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगा"

"तुम क्या हो और मुझसे कैसे बात कर पा रहे हो "

"मैं कालदूत हु मनुष्य ये मेरे लिए मुश्किल नहीं है मैं तुम्हारी मानसिक तरंगों से जुड़ा हु और मैं तुम्हे कुछ नहीं करूँगा मैं तो खुद लाखो वर्ष से समुद्रतल की गहराइयो मैं कैद हु, देवताओ ने मुझे कैद किया था"

"पर मैं यहाँ कैसे आया " बिरजू

"क्युकी मैं तुम्हे यहाँ लाया हु, मुझे मुक्त होने के लिए तुम्हारी आवश्यकता है तुम्हे हर तीन सालो मैं १०० लोगो की बलि देनी होगी वो भी निरंतर १००० वर्षो तक ताकि मैं मुक्त हो पाउ बदले मैं मैं तुम्हे असीम शक्ति प्रदान करूँगा, आज से मै ही तुम्हारा भगवान हु, तुम जो ये पानी के भीतर भी सास ले पा रहे हो ये मेरी ही कृपा है अब जाओ और हमारी मुक्ति का प्रबंध करो "

कालदूत की बातो का बिरजू पर जादू हो गया और वो उसके सामने नतमस्तक हो गया तभी वहा एक किताब प्रगट हुयी

"उठो वत्स और ये किताब को यह हमारा तुम्हारे लिए प्रसाद है जिसमे वो विधि लिखी है जिससे तुम हमें अपने भगवान हो मुक्त करा पाओगे और इसी किताब की सहायता से तुम्हे और भी कई साडी सिद्धिया प्राप्त होगी "

बिरजू ने वो किताब ली

“पर 1000 वर्ष मैं जीवित कैसे रह सकता हु प्रभु”

“यही किताब उसमे सहायक होगी वत्स और हमारी शरण में आते ही तुम्हारी आयु साधारण मनुष्य से अधिक हो गयी है पर तुम्हे यह कार्य जारी रखने के लिए संगठन बनाना होगा हमारे और भक्त बनाने

होंगे अब जाओ हम सदैव तुमसे जुड़े रहेंगे”

"महान भगवान कालदूत की जय" और इतना बोलते साथ ही बिरजू की आँखें बंद हो गयी और जब खुली तब उसने अपने आप को किनारे पे पाया,

पहले तो उसे यकीं नहीं हुआ की ये क्या हुआ पर जब उसकी नजर अपने हाथ मैं राखी किताब पे पड़ी तब उसे यकीन हो गया की जो हुआ वो सत्य था और वो लग गया अपने स्वामी को मुक्त करने की मोहिम मैं........

भाग २ ​

समय रात के 11 बजे

अमावस की वो एक बेहद ही काली और भयान रात थी हर तरफ निर्जीव शांति फैली हुई थी सिवाय जंगल के.....
जंगल के बीचों बीच एक हवन कुंड जल रहा था और उसके इर्द गिर्द 5 लोग काले कपडे पहन कर कुछ मंत्रोच्चारण कर रहे थे और उस हवन कुंड के ठीक सामने एक पेड़ पर एक व्यक्ति अधमरी हालत मैं जंजीरो से बंधा हुआ था

यहा इन पांचों लोगो का मंत्रोच्चारण सुरु था, उन सभी के चेहरे ढके हुए थे और आँखें लाल होकर देहक रही थी तभी उनलोगों ने हवन मैं आहुतियां देना सुरु किया और जोर जोर से मंत्रोच्चारण करते हुए आहुतियां देने लगे,
उनलोगों की आवाजें उस जंगल की शांति की भंग कर रही थी वातारवण ऐसा हो रखा था मानो किसी ने संसार से सारि ख़ुशी चूस ली हो

जैसे ही उन लोगो ने अपनी आखरी आहुति पूरी की वहा उन पांचो मैं से एक व्यक्ति की अट्टहास भरी हँसी की आवाज गूंगी

"आखिर को क्षण आ ही गया, मेरे मालिक की मुक्ति अब ज्यादा दूर नहीं"

वो शख्स अपनी जगह से उठा और उसी हवन कुंड से जलती हुयी एक लकड़ी उठायी और उस पेड़ से बंधे इंसान के पास गया और अपने चेहरे से नकाब हटाया

"न.... नहीं.....म... मुझे... म...मत..मारो....मैं ...मैं तुम्हारा बाप हु...." उस अधमरे इंसान ने बोलने की कोशिश की

"जो मेरे भगवान को नहीं मानता वो मेरा बाप नहीं हो सकता आप बहुत खुशनसीब है के आपको महान भगवन कालदूत की मुक्ति के लिए योगदान देने का अवसर मिला है" और इतना बोलने के साथ ही उस आदमी ने अपने हाथ मैं पड़की वो जलती हुई लकड़ी उस आदमी को लगाई. उन लोगो ने पहले ही इस इंसान पर मिटटी का तेल छिड़का होने की वजह से उस इंसान का शरीर जलने लगा. उसकी चीखे पुरे जंगल में गूंज उठी

वो पांचो वहा उस जलते हुए शख्स को देख कर खुश हो रहे थे... आग ने जिस पेड़ पे वो इंसान बंधा हुआ था उसे भी अपनी चपेट में ले लिया था और अब आग की लपटें ऊँची ऊँची उठ रही थी....

थोड़े समय बाद वह केवल रख बची थी और उस जल हुए शारीर के अंश...

"महान भगवान कालदूत अपने भक्त बिरजू के हाथो पहली आहुति स्वीकार करे" और इतना बोलते साथ ही बिरजू ने वहा राख बने अपने पिता के शरीर के कुछ अंश उठाये और उस हवन कुंड मैं डाल दिए.

बिरजू और कालदूत की भेंट हुए आज दो माह हो गए थे और कालदूत ने मनो बिरजू पर सम्मोहन कर दिया था. बिरजू उसका निस्सीम भक्त बन गया था और उसे ही अपना देवता मानता था... और साथ ही उस किताब की पूजा करता था जो उसे कालदूत ने दी थी...

वो किताब खुद कालदूत ने लिखी थी जो उसके जीवन के अनुभवो पर आधारित थी जिसमे उसके देवताओ से लड़ने की कई कहानियां थी और ये भी लिखा था के पापी देवताओ ने कैसे उसे छल से समुद्रतल की गहराइयों में कैद किया था जिससे मुक्ति पाने के लिए कालदूत को आत्माओ की शक्ति की आवश्यक्ता थी... उस किताब मैं काले जादू से सम्बंधित कई सिद्धिया और उसे प्राप्त करने की विधि के बारे में विस्तृत जानकारी थी जिसकी कोई भी सामान्य मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता....

बिरजू जैसे जैसे उस किताब को पढता गया वैसे वैसे कालदूत के प्रति उसकी भक्ति भी बढ़ रही थी, वो मानने लगा था के सृष्टि का उद्धार केवल कालदूत ही कर सकता है, उसने जंगल मैं कालदूत का मंदिर भी बनाया था जहा अभी अभी उसने अपने पिता की बलि दी थी

इंसान जब भी कोई नयी चीज़ करता है तो वो उसकी सुरवात अपने परिवार से करता है बिरजू ने भी वैसा ही किया, उसके परिवार मैं उसके पिता के अलावा कोई नहीं था उसने अपने पिता को कालदूत के बारे मैं बताया और कालदूत की शरण मैं आने के लिए समझाया लेकिन उसके पिता ने उसकी पागलो मैं गिनती की और ईश्वर की राह चलने की सहल दी और यही से.... जब बिरजू के पिता बटुकेश्वर ने कालदूत की भक्ति से इंकार कर दिया बिरजू के मन मैं उनके प्रति नफरत के भाव बनने लगे.......

जिस दिन बिरजू समुद्र के तूफ़ान से बच कर आ गया था और उसके तीनो साथिओ मरे गए थे तब उसने अपने गाओ वालो को भी कालदूत के बारेमे बताया पर उस समय किसीने उसकी बातो पर यकीं नहीं किया सिवाय ४ लोगो को छोड़ के जिनके मन मैं कालदूत को लेकर कुतूहल जगा था....धीरे धीरे १ महीने का समय व्यतीत हुआ, बिरजू उस किताब का अध्यन करके कई सारी सिद्धिया प्राप्त कर चूका था और कालदूत का भक्त तो वो पहले ही बन चूका था और अब अपने स्वामी को मुक्त करना चाहता था लेकिन ये काम आसान नहीं था और ये उसके अकेले के बस का भी नहीं था उसे लोगो की जरुरत थी जो उसी की तरह कालदूत के भक्त हो.....

बिरजू ने ऐसे लोगो को ढूंढ़ना सुरु किया जिनके मन मैं ईश्वर के प्रति गुस्सा हो, जिन्होंने अपनी कोई अतिमुल्यवान चीज़ खोई हो और उसका जिम्मेवार ईश्वर को मानते हो और जब उसने ऐसे लोगो की खोज की तो पाया के इनके सबसे अग्रणी वही ४ थे जिनके मन मैं कालदूत को लेकर कुतूहल जगा था.....

बिरजू ने धीरे धीरे उनसे दोस्ती बनायीं, उन्हें कालदूत के बारेमें बताया, और ये भी बताया के कैसे महान कालदूत को देवताओ ने कैद किया था, बढ़ते समयके साथ साथ वो चारो भी बिरजू के साथ कालदूत की भक्ति करने लगे और इन सब क्रियाओ मैं बिरजू अपने पिता से दूर होता गया क्युकी उसके पिता बार बार उसे समझने की कोशिश करते,

इस पुरे घटनाक्रम मैं कालदूत बिरजू के दिमाग से जुड़ा हुआ था और समय समय पर सपनो के जरिये उसे निर्देश भी देता था और जैसे ही बिरजू के अलावा वो चारो भी कालदूत की भक्ति करने लगे तो कालदूत उनके सपनो मैं भी आ गया और इन पांचो को बताया के उसकी भक्ति करने से वो उन्हें कई प्रकार की सिद्धिया देगा न की उनके भगवान् की तरह उन्हें दुःख और गरीबी देगा.....कालदूत की बाते उसके भक्तो पर सम्मोहन की तरह काम करती थी......बिरजू को अपने पिता की बलि देने के लिए भी कालदूत ने ही आदेश दिए थे जिसे बिरजू ने पूरा किया......

"आज ये पहली बलि है हमारे भगवन कालदूत की मुक्ति के लिए लेकिन अंतिम नहीं, जब मेरी भेट कालदूत से हुयी थी उन्होंने कहा था के हमें हर 3 वर्षो मैं १०० बलिया देनी होगी वो भी निरंतर १००० वर्ष तक तब हम हमारे स्वामी को उस समुद्रतल से मुक्त कर पाएंगे साथियो हमारा असली काम अब सुरु हुआ है, बोलो महान भगवान कालदूत की..!" बिरजू बोला जिसके पीछे सब एकसाथ चिल्लाये "जय !!"

उसके बाद इनलोगो ने अपना संगठन मजबूत करने पर जोर दिया और उसे नाम दिया 'कालसेना' समय के साथ साथ इनकी विचारधारा से कई लोग जुड़े और कालसेना का हिस्सा बने, बलि के लिए ये लोग मुख्यत्व उनलोगो को निशाना बनाते जो किसी भी धार्मिक कार्य से जुड़े होते जिससे ये लोगो को यकीन दिला सके के इनका ईश्वर इन्हे बचाने नहीं आएगा बल्कि कालदूत की शरण मैं आने से इनके दुःख दूर होंगे,

कालसेना छिप कर काम करती थी और बलि का तरीका वही था जिससे इन्होने पहली बलि दी थी, कालसेना की विचारधारा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे प्रसारित होती रही और हर ३ वर्षो मैं १०० बलिया कालदूत को निरंतर मिलती रही,

आज कालसेना से कई लोग जुड़े थे और कालदूत की भक्ति कर उसे मुक्त करना चाहते थे, ये एक काफी बड़ा संगठन था जिसका मुखिया आज भी बीरजु का परिवार था बिरजू के मरने के बाद ये हक़ उसके बेटे को मिला लेकिन उसके बाद कालसेना का मुखिया बनने के लिए संगठन मैं द्वन्द होता और जो श्रेष्ठ होता उसे कालसेना के मुखिया का पद मिलता जिसमे हमेशा से ही बिरजू के परिवार का बोल बाला रहा

कालसेना बड़ा संगठन था लेकिन छिपा हुआ था और इनके लोग हर क्षेत्र मैं मौजूद थे व्यवसाय से लेकर राजनीति और मीडिया तक मैं इनकी पहुंच थी जो इनका भेद छिपा रखने मैं मदद करती थी, कालसेना का मानना था के जिस दिन इनके भगवान कालदूत मुक्त होंगे उसी दिन ये भी दुनिया के समक्ष आएंगे...

और फिर दुनिया पर राज करेंगे और अब काल सेना अपने लक्ष के काफी करीब थी आने वाले 3 वर्षो मैं १०० बलि देने से उनकी १००० वर्षो की तपस्या सफल होने वाली थी जिसमे से वो २० बलियो का प्रबंद कर चुके थे बस इंतज़ार कर रहे थे सही अवसर का...........

भाग ३ ​

वर्तमान समय
छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट, मुंबई

अभी अभी एयरपोर्ट के डोमेस्टिक टर्मिनल पर दिल्ली से आयी हुयी फ्लाइट लैंड हुयी थी जिसमे रोहित दिल्ली से मुंबई आया था, रोहित अपने सबसे खास दो दोस्तों से पुरे चार साल बाद मिलने वाला था जिसके लिए वो काफी खुश था. ये लोग मुंबई से २०० कम दूर बने राजनगर(काल्पनिक) जाने वाले थे जो की एक हिल स्टेशन था और यहाँ पर काफी ख्याति प्राप्त बोर्डिंग स्कूल भी थे, रोहित ने भी अपनी स्कूलिंग और ग्रेजुएशन यही से कम्पलीट की थी इस लिए उसे इस जगह से काफी लगाव था और अब वो वापिस राजनगर जा रहा था अपने सबसे खास दोस्तों से साथ जो उसे के साथ पढ़े थे फिर से अपनी उन्ही यादो को ताजा करने...

रोहित जैसे ही डोमेस्टिक एयरपोर्ट टर्मिनल से बहार आया उसकी नजर अपने दोस्त संतोष पर पड़ी जो उसे वह रइवे करने आया था, और यहाँ से वो दोनों साथ मैं राजनगर के लिए निकलने वाले थे जहा अगले दिन शाम मैं उनका दोस्त विक्रम भी उनके पास पहुंचने वाला था

संतोष के पास पहुंच कर रोहित ने उसे गले लगा लिया, अपने दोस्त से काफी समय बाद मलने की बात ही कुछ और होती है

संतोष- साले इतना कस के गले लगाएगा तो लोग गलत समझेंगे अपने बारे मैं दूर हैट लवडे

रोहित- तुमको तो BC दोस्तों से मिलना भी नहीं आता हट !! चल सामान उठा अब

संतोष- कुली नहीं हु bsdk एक ही तो बैग है खुद उठा ले

रोहित- मैं खुद को संभाल रहा हु काफी नहीं है

संतोष- है और मेरे बाप ने तो कुली पैदा किया है न मुझे

रोहित- भाई संतो चार साल बाद मिलके भी लड़ाई करनी है क्या चल न यार भूख भी लगी है

संतोष- है भाई चल पहले मस्त तेरा मटका भरेंगे और फिर राज नगर के लिए निकलेंगे

रोहित- अरे गज़ब चलो तो फिर देर किस बात की

बात करते हुए कार तक पहुंच गए डिक्की में रोहित का सामान रख कर संतोष ने क्यार५ एक बढ़िया से रेस्टोरेंट की और बढ़ा दी....
कुछ ही देर मैं वो रेस्टॉरेंट के सामने थे

रोहित- तेरी बात हुयी विक्रम से कब तक पहुंचने वाला है वो

रोहित ने कहते टाइम संतोष से पूछा

संतोष- आज बात नहीं हुयी है वैसे भी अभी तो वो फ्लाइट मैं होगा उसकी कंपनी का मुंबई मैं कुछ काम है वो करके कल हमसे मिलेगा

रोहित- चलो अच्छा है वैसे मैं भी सोच के आया हु उसे सब बता के माफी मांग लूंगा

संतोष- किस बारे मैं कह रहा है तू...

संतोष ने सवालिया नजरो से रोहित को देखा

रोहित- तू जानता है संतो मैं नंदिनी और अपनी बात कर रहा हु विक्रम की शादी से पहले हम दोनों के बीच जो भी था....

नहीं यार

संतोष- भाई वो सब पहले की बात है अब उस बारे मैं सोचने का कोई मतलब नहीं है नंदिनी और विक्रम खुश है अपनी जिंदगी मैं क्यों इस बारे मैं विक्रम को बताना चाहता है वैसे भी अब ऐसा कुछ नहीं हैतेरे और नंदिनी के बीच

रोहित- नहीं भाई, मेरे मन पे बोझ है यार अपने दोस्त को धोका देने का मैं उसे सब बता के माफ़ी मांगना चाहता हु फिर चाहे वो जो भी करे

संतोष- ठीक है जैसा तुझे सही लगे पर मैं इतना ही कहूंगा के एक बार और सोच लियो कही तेरा डिसिशन नंदिनी और विक्रम की जिंदगी ख़राब न करे.....अब चले

रोहित- है चलो चलते है

फिर अपना खाना ख़तम करके रोहित और संतोष अपनी मंजिल की तरफ रवाना हो गए ......

उसी सुबह ७ बजे
राजनगर

'राधे कृष्णा की ज्योत अलौकिक तीनो लोक मैं छाए रही है' ये भजन गाते हुए सुमित्रा देवी तुसली के पौधे को जल चढ़ा रही थी जो उनके घर के आँगन के बीचो बीच था घर की बनावट आलिया भट के घर के जैसी थी जो २ स्टेट्स मूवी मैं दिखाया गया था जिन्होंने को फिल्म देखि है वो समझ जायेंगे बाकि गूगल कर लेना तो सुमित्रा देवी के सुमधुर भजन की वजह से पुरे घर का वातावरण प्रफुल्लित हो रहा था तभी उस कर्णप्रिय आवाज के बीच एक दूसरी आवाज गुंजी

'ॐ भग भुगे भगनी भोगोदरी भगमासे ॐ फट स्वाहा......!!!
ॐ भग भुगे भगनी भोगोदरी भगमासे ॐ फट स्वाहा......!!! '

ये आवाज सुनके सुमित्रा देवी ने अपना भजन रोक दिया और उस आवाज की तरफ देखने लगी तो उनकी नजर वह पड़े एक खाट पे पड़ी जिसपर उनका छोटा बेटा राघव सोया हुआ था वैसे तो इसका और इसके बड़े भाई का एक कमरा था पर एक साल पहले भाई की शादी होने के बाद ये कमरे से बहार हो गए थे और ये आवाज़ उसके फ़ोन से आ रही थी...ये ॐ फट स्वाहा फ़ोन की रिंगटोन थी

फ़ोन की रिंगटोन की आवाज से राघव की आँख खुली और उसने फ़ोन उठाया
राघव-हेलो

"नींद से उठ जाओ महाराज यूनिवर्सिटी चलने का है "

राघव- सूरज तू नहीं होता तो मेरा क्या होता

फ़ोन राघव के दोस्त का था

सूरज- BC जल्दी आ गाड़ी का टायर पंक्चर है मेरे इसीलिए फ़ोन किया तुझे

राघव- रख फ़ोन आ रहा हु

राघव, उम्र २३ साल, अनिरुद्ध शास्त्री के छोटे बेटे बाप पेशे से पंडित है और बेटा पूरा नास्तिक, इनका मानना है के जो आँखों से दीखता ही नहीं है उसपे कोई विश्वास कैसे करे इसके हिसाब से भगवन केवल एक काल्पनिक किरदार है जिसे पुराने लोगो ने आम जानता को आदर्श जीवन सिखाने के लिए बनाया है और कुछ नहीं.....

इसी वजह से इनकी पिता से थोड़ी काम बनती है

रिंगटोन से अब राघव की नींद खुल चुकी थी और कुछ समय बाद वो मस्त तैयार होक नाश्ते की टेबल पर आके बैठा जहा उसका भाई भी बैठा था

अनिरुद्ध- ये कैसी रिंगटोन लगा राखी है तुमने सुबह सुबह दिमाग भ्रष्ट कर दिया कोई अछि सी धुन नहीं रख सकते थे

राघव जैसे ही टेबल पर बैठने लगा उसके पिता अनिरुद्ध ने कहा

राघव- अब आपको इससे भी दिक्कत है

"राघव ये क्या तरीका हुआ बाबूजी से बात करने का " ये बोला राघव का बड़ा भाई रमन अपने ही शहर के पुलिस स्टेशन मैं सब इंस्पेक्टर है, वैसे इनको पूरा ईमानदार पुलिस वाला तो नहीं बोलूंगा बस दबंग के सलमान के जैसे है पैसा भी लेते है और काम भी पूरा करते है इसीलिए जल्द ही इनके प्रमोशन के आसार है पर फिलहाल एक केस मैं फसे हुए है

तो रमन के बोलने पे अनिरुद्ध और राघव चुप हो गए और चुप चाप नाश्ता करने लगे

रमन-तो राघव कुछ काम करना है या कोई और प्लानिंग है

राघव- फिलहाल कुछ सोचा नहीं है भैया अभी यूनिवर्सिटी जा रहा हु शाम को मिलता हु

और राघव उठ के चला है

रमन-ये क्या करता है कुछ समझ नहीं आता बाबूजी आप इससे काम ही बोला करिये अभी भी आपके बोलने पे वो कुछ बोलने वाला था पर मेरे बोलने पे रुक गया

अनिरुद्ध- मैंने तो उससे सारी उमीदे छोड़ दी है खैर मैं चलता हु एक यजमान के यहाँ पूजा करने जाना है

रमन- है मैं भी निकलता हु थाने के लिए इस मिसिंग केस ने परेशान किया हुआ है बाबूजी आप संभाल कर जाना जो लोग पूजा पाठ मैं ज्यादा है वही आजकल गायब हो रहे है

अनिरुद्ध- हम्म.....

और रमन भी अपनी बीवी और माँ से मिलके निकल गया....

भाग ४ ​

घर का सभी पुरुष वर्ग अपने अपने कामो के लिए निकल गया था अनिरुद्ध जी अपने पूजा अनुष्ठान केलिए रमन अपने ठाणे की ओर ओर राघव अपने दोस्त के साथ, अब घर में केवल सुमित्रा देवी ओर उनकी बहु श्रुति बचे थे,

राघव जिस हिसाब से अपने पिता से उखड़े स्वर मैं बात करता था उससे कोई भइये स्पष्ट अन्दाज लगा सकता था के दोनों बाप बेटे की आपस मैं जमती नहीं है, राघव ओर अनिरुद्धजी की नोक झोक घर मैं आम बात थी, केवल एक रमन ही था जिसके बोलने से वो दोनों चुप हो सकते थे रमन ही दोनों कोचुप करा सकता था ओर राघव भी कभी रमन की कोईबात नहीं टालता था, हालाँकि ऐसा भी नहीं था के राघव अपने पिता से प्यार नहीं करता था या उनके लिए उसके मन मैं कोई आदर नहीं था ये सब तो उस एक घटना की वजह से हुआ था जो शास्त्री परिवार मैं घटी थी जिसके बाद राघव का स्वाभाव ही एकदम बदल सा गया था.

अनिरुद्ध शास्त्री एक जाने मने ज्योतिष पंडित थे ओर सदैव ईश्वर की भक्ति मैं लीं रहने वाले इंसान थे वही राघव बिलकुल उल्टा था उसका तो मनो भगवन से छतीस का आकड़ा हो, उसका मानना था के जो दीखता ही नहीं उसपर विश्वास कैसे किया जाये उसके हिसाब से जो दीखता ही नहीं है वो तो है ही नहीं और बस इसी बात पे दोनों बाप बेटे मैं नोक झोक होती रहती थी .

अब ये बात तो किसी को भी अटपटी लगेगी के बाप एक विख्यात पंडित और बेटा शुद्ध नास्तिक और यही बात श्रुति को भी खटकती थी पसर उसने आज तक इस बारे मैं किसी से पूछा नहीं था घर मैं पर आज उसने इस बारे मैं सुमित्रा देवी से बात करने की ठानी

श्रुति- मम्मीजी आपसे एक बात पूछनी है (किचन मैं काम करते हुए श्रुति से सुमित्रा देवी से कहा )

सुमित्रादेवी- हा पूछो न बेटा

श्रुति- ये राघव भैया का स्वाभाव मतलब मेरी शादी को एक साल होते आया है और जितना मैंने देखा है राघव भैया किसी से ज्यादा बात नहीं करते बस अपने मैं खोये रहते है उनसे जितनी बात करो उतना ही जवाब देते है और तो और उन्हें हस्ते हुए तो मैंने कभी देखा ही नहीं है ऐसा क्यों है? और उनके और बाबूजी के बीच की ये रोज की नोकझोक इसकी क्या वजह है?

श्रुति का सवाल सुन सुमित्रादेवी मुस्कुरायी

सुमित्रादेवी- ये सवाल तुमने पहले क्यों नहीं पूछा

श्रुति- पूछना तो चाहती थी मगर पूछ नहीं पायी

सुमित्रादेवी- चलकोई बात नहीं अब पूछ ही लिया है तो तुम्हे सब बाबति हु पहले काम निपटा ले कहानी जरा लम्बी है फिर तुम्हे आराम से बताउंगी

श्रुति- ठीक है

और दोनों सास बहु अपने काम निपटने मैं लग गयी

वही दूसरी और रमन अपने पुलिस स्टेशन पहुंच गया था, उसके ऊपर मिसिंग केसेस सॉल्व करने का दबाव बढ़ता जा रहा था, अभी ३ दिन पहले ही थाने मैं एक चर्च के फादर की गुमशुदगी की रिपोर्ट आयी तह जिसके साथ ही रमन के पास पेंडिंग मिसिंग केसेस की संख्या कुल १४ हो गयी थी जो पिछले दो सालो मैं आये थे जिनमे से एक भी केस के बारे मैं रमन के पास कोई सुराग नहीं था और इन्ही बढ़ते केसेस के चलते रमन के सीनियर ऑफिसर्स भी उससे खफा चल रहे थे और उसपास जल्द से जल्द केसेस सॉल्व करने का दबाव बना रहे थे और अगर इस केस मैं भी कोई सुराग नहीं मिला तो रमन से ससपेंड होने के भी चान्सेस थे, वैसे तो रमन कि शादी को एक साल होते आया था लेकिन इन केसेस के चलते वो श्रुति के साथ भीअचे से समय नहीं बिता पाया था

रमन ने सरे केसेस को एक बार फिर शुरू से स्टडी करने का सोचा क्या पता शुरुवात से देखने पर कोई क्लू ही हाथ लग जाये, इस सब केसेस मैं एक बात जो रमन के धयान मैं आयी थी वो ये थी के इन दो सालो में राजनगर मैं जितने भी लोग गायब हुए है वो सभी किसी न किसी धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े हुए थे और इन लोगो का आपस मैं एक दूसरे से कोई ताल्लुक नहीं था, और गायब हुए सभी

लोग माध्यम वर्गीय परिवार वाले थे और कुछ ऐसे थे जो अकेले थे जिनका दुनिया मैं कोई नहीं था, किसी भी गायब शक्श के लिए फिरौती का फ़ोन नहीं आया था और रमन का ये मानना था के हो न हो ये गायब हुए लोग अब शायद इस दुनिया मैं नहीं है, उन्हें मार दिया गया है लेकिन ये सोच सोच के उसका दिमाग फटा जा रहा था के ये जो कोई भी इस घटनाओ को अंजाम दे रहा है आखिर वो चाहता क्या है, क्युकी इन सब घटनाओ के पीछे किसी बड़े गिरोह का हाथ था जिसका पता रमन को लगाना था.

इस पुरे घटनाक्रम में एक बात हैरान करने वाली थी के इतनी गुमशुदा लोगो की रिपॉर्ट होने के बाद भी मीडिया शांत बैठा हुआ था कही किसी न्यूज़ चैनल पर या अख़बार मैं कोई भी खबर नहीं छपी थी पर इन घटनाओं का असर शहर में देखा जा सकता था लोग बगैर काम के घर से बहार नहीं निकलते थे और दुकाने भी जल्द ही बंद होने लगी थी लोगो के मन में डर था कि कल को कहिब्व ही गायब न हो जाये इसीलिए लोग ज्यादा से ज्यादा समय अपने परिवार के साथ बिताना चाहते थे

रमन अपने केबिन मैं बैठा इन्ही सब बातो के बारे मैं सोच रहा था और फिर उसने अपने एक साथी को आवाज लगायी

रमन- चन्दन!

चन्दन- जय हिन्द सर ! (अंदर आते हिसालुते करते हुए चन्दन ने कहा)

रमन- उस लापता हुए फादर के बारे मैं कुछ पता चला

चन्दन - नहीं सर, जैसा हाल बाकि केसेस मैं था वैसा ही हाल है, हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे है पर कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है, और अब तोये बात शहर मैं भी फैलने लगी है की लोग लापता हो रहे है जिससे शहर मैं भी डर का माहौल बन रहा है

रमन- है वो तो मैं भी देख रहा हु के शहर का माहौल कुछ बदला बदला सा है

चन्दन- सर ये बातसमझ मैं नहीं आ रही के जब शहर का माहौल बदल रहा है तो कोई भी अख़बार या न्यूज़ चैनल ये बात क्यों नहीं दिखा रहा है

रमन- चन्दन जो कोई भी ये अपहरण कर रहा है न वो जरूर कोई बड़ा आदमी है या उसकी पहुंच बहुत ऊपर तक है पर इस सब के पीछे का उसका मकसद मुझे समझ नहीं आ रहा है आखिर क्या वजह हो सकती है इसके पीछे, खैर और कोई अजीब बात तुम्हारे धयान मैं आयी हो

चन्दन- नहीं सर

रमन- एक काम करो शहर मैं आने जाने वाले टूरिस्ट्स की भी लिस्ट निकालो क्या पता वह से कोई सुराग मिल जाये या हो सकता है के उन टूरिस्ट को भी कोई खतरा हो

चन्दन- ठीक है

रमन ने चन्दन को काम बता कर वहा से भेज दिया और फिर से अपने केस के बारे मैं सोचने लगा वही दूसरी तरफ अनिरुद्ध शास्त्री के घर से थोड़ी दुरी पर पुरे काले कपडे पहने एक शख्स खड़ा था, उसने अपना चेहरा ढका हुआ था और बगैर पलक झपकाए शास्त्रीजी के घर पर अपनी नजरे गड़ाए हुए था......

क्या लगता है कौन है वो शख्स ??? और ऐसी कौनसी घटना हुयी ही जिससे राघव का स्वाभाव ऐसा बन गया? जानने के लिए पढ़ते रहिये कालदूत, अगला भाग जल्द ही.....

भाग ५​

घर के सारे काम ख़त्म करने के बाद श्रुति ने फिर से सुमित्रा देवी से अपना सवाल दोहराया और अब सुमित्रा देवी ने उसे सब बताने की ठानी

श्रुति- अब बताइए माजी राघव भैया के बारे मैं

सुमित्रादेवी- सबसे पहले तो ये बात तुम राघव से नहीं करोगी क्युकी उसे इस बात के बारे मैं पता नहीं है और मैं नहीं चाहती के उसे कभी भी पता चले पहले तुम मुझसे वडा करो ये बात तुम राघव से नहीं करोगी

श्रुति- जैसा आप चाहे माजी मैं इस बात के बारे मैं राघव भैया को पता नहीं चलने दूंगी

सुमित्रादेवी- राघव हमारा बेटा नहीं है रमण बहुत छोटा था जब राघव को उसके दादाजी यानि मेरे ससुरजी इस घर मैं लेकर आये थे जिसके बाद उनके कहने पर हमने राघव को विधिवत गोद लिया था, हमारे शहर के बहार जो प्राचीन शिव मंदिर है न वही मेरे ससुरजी रहते थे वो उस मंदिर मैं पुजारी थे और एक विद्वान् साधू

मेरी शादी को ३ साल हो गए थे और रमण भी २ साल का हो गया था पर इन ३ सालो मैं मैंने अपने ससुरजी को बहुत कम बार देखा था असल मैं वो बहुत कम घर आते थे और रमण के बाबूजी को भी उनसे खास लगाव नहीं था पर फिर भी इन्होने बाबूजी की कोई बात कभी नहीं ताली दरअसल जब हमने राघव को विधिवत गोद लिया तभी से ही उन्होंने घर मैं रहना सुरु किया,

उस समय हमारा राजनगर इतना बड़ा शहर नहीं था फिर भी महंत शिवदास के पास लोग दूर दूर से आते थे, बाबूजी मंदिर के पुजारी के साथ साथ एक सिद्ध साधू थे और उन्होंने मंदिर मैं रहते हुए कई सिद्धिय हासिल की थी, अपनी समस्याओ के समाधान के लिए दूर दूर से लोग उनके पास आते थे, बाबूजी के पास दिमाग पढने की अदभुत सिद्धि थी वो अगर किसी की आँखों मैं कुछ सेकंड्स के लिए देख लेते थे तो बता देते की उसके दिमाग मैं क्या चल रहा है और इसके साथ ही उन्हें तंत्र विद्या का भी थोडा ज्ञान था

जीवन एकदम सलार चल रहा था एक दिन रात को ३ बजे दरवाजा खटखटाने की आवाज से हमारी नींद खुली और जब दरवाजा खोला तो हमने देखा के बहार बाबूजी है और उनकी गोद मैं राघव, उन्होंने बताया के राघव उन्हें राघव उन्हें शिवमंदिर मैं शिवलिंग के पास मिला वो मंदिर के पीछे की तरफ कोई अनुष्ठान कर रहे थे की उन्हें राघव के रोने की आवाज आई जिसके बाद उन्होंने जब मंदिर मैं जेक देखा तो शिवलिंग के पास उन्हें राघव दिखाई दिया, इसके बाद उन्होंने वाला आसपास काफी देखा लेकिन उन्हें ऐसा कोई नहीं दिखा जिसने राघव को वह छोड़ा हो इसके बाद बाबूजी राघव को शिव का प्रसाद मान कर घर ले आये, उनका कहना था के भगवान् शिव की इचा से ही राघव उन्हें मिला है और अवश्य की उसके जन्म के पीछे कोई बहुत गहरा उद्देश्य है और शिव चाहते है ये राघव का पालन हमारे परिवार मैं हो इसीलिए वो राघव को घर ले आये और हमसे मांग की के हम राघव को गोद लेले और उनकी इसी बात का आदर करते हुए हमने राघव को

गोद ले लिया

अब चुकी राघव पिताजी के लिए शिव का प्रसाद था इसीलिए वो भी राघव के साथ घर मैं ही आ गए वो हमेशा कहते थे के राघव कोई बहुत बड़ा काम करेगा अपने जीवन मैं और उस काम के लिए मुझे उसे तयार करना है, वो अपना सारा ज्ञान राघव पर उड़ेल देना चाहते थे,

राघव जब ३ साल का हुआ तबसे की उन्होंने राघव की शिक्षा दीक्षा आरम्भ कर दी थी और उससे मंत्रोच्चार करवाते थे, उन्होंने रमण को भी ये सब सीखने कहा पर रमण ने कभी इस और रूचि नहीं दिखाई और बाबूजी ने भी उसे कभी जबरदस्ती राघव के साथ मंत्रपाठ नहीं करवाया, राघव बचपन से मस्तीखोर और हसमुख बच्चा था और घर मैं सिर्फ बाबूजी और रमण ही थे जिनकी वो बात सुनता था, जितना प्रेम बाबूजी को राघव से था उतना किसी और से नहीं था और राघव भी अपने दादाजी से उतना ही प्रेम करता था, जब राघव १६ वर्ष का हुआ तब तक बाबूजी ने उसे कई शास्त्रों मैं निपुण बना दिया था, पर इसका असर उसकी पढाई पर हो रहा था जिससे रमण के पापा बहुत नाराज थे पर बाबूजी कहते थे जब राघव की असली परीक्षा की घडी आएगी तब उसका साथ केवल ये शास्त्र देंगे जो उन्होंने उसे पढाये थे और अब उन्होंने राघव को विविध सिद्धियों का अभ्यास सिखाना सुरु किया पर अब बाबूजी की उम्र उनका साथ नहीं दे रही थी उनकी तबियत बिगड़ने लगी और इतनी ख़राब हो गयी के उन्हें हॉस्पिटल मैं भारती करवाना पड़ा, उन्होंने हॉस्पिटल जाते हुए ही कह दिया था के वो अब वापिस नहीं आयेंगे और राघव के कहा था के वो अपनी सिद्धियों का अभ्यास जरी रखेगा, बाबूजी हॉस्पिटल मैं ३ दिन रहे और इन ३ दिनों तक राघव ने बगैर अन्न जल के महामृतुन्जय का जप किया अपने दादाजी के लिए पर जो होनी होती है वो होकर ही रहती है

बाबूजी के निर्वाण के बाद से ही राघव के स्वाभाव मैं बदलाब आ गया वो गुमसुम सा चिडचिडा हो गया किसी से ढंग से बात नहीं करता था उसके मन मैं भगवन के लिए गुस्सा भर गया था को उसके दादाजी को ठीक नहीं कर पाए, वो कहने लगा के ऐसे भगवन की पूजा करने का क्या उपयोग को अपने भक्त की प्राणरक्षा न कर पाए

हमने उसे बहुत समझाया के इस बात के लिए इश्वर को दोष देना ठीक नहीं है और तुम्हे अपने दादाजी की कही बात पूरी करनी है उनके बताये अनुष्ठान पुरे करने है पर राघव ने एक बात नहीं सुनी और तभी से इश्वर के मुद्दे पर ये दोनों बाप बेटो मैं नोकझोक होती रहती है

हमारे घर के पीछे की तरफ एक कमरा बना हुआ है जो हमेशा बंद रहता है वो बाबूजी का कमरा है उसमे उनके सरे ग्रन्थ सारी किताबे उन्हें अपनी विविध अनुष्ठानो के अनुभव सब राखी हुयी है और मुझे यकीन है के बाबूजी ने राघव को आगे क्या करने है इसके बारे मैं भी कुछ लिख रखा होगा बाबूजी की कही कोई भी बात कभी गलत साबित नहीं हुयी है पर अब लगता है राघव ही नहीं चाहता के उसके दादाजी की उसके प्रति भविष्यवाणी सही

हो, उनके मरने के बाद राघव कभी उस कमरे मैं गया ही नहीं के देख सके उसके दादाजी ने उसके लिए विरासत मैं क्या छोड़ा है, बाबूजी ने कहा था के राघव के हाथो कोई महँ काम होने निश्चित है पर राघव का बर्ताव देख कर अब मुझे उनकी बातो पर संदेह होता है

बोलते बोलते सुमित्रादेवी का गला भर आया श्रुति अब तक चुप चाप सुमित्रादेवी की बात बड़े धयन से सुन रही थी, श्रीति ने तो कभी सोचा भी नहीं था के राघव को उसके सास ससुर ने गोद लिया होगा,

सुमित्रादेवी ने इशारे से श्रुति से पानी माँगा जो लेन के लिए वो किचन की तरफ जा ही रही थी के उसकी नजर दरवाजे पर पड़ी जहा राघव खड़ा था और नजाने कब से उनकी बाते सुन रहा था.......

भाग ६​

शाम होते होते रोहित और संतोष राजनगर पहुच चुके थे पर वह पहुच कर उन्हें राजनगर की हवा मैं एक अजीब सा सूनापन महसूस हुआ, सर्दी और कोहरा बढ़ गया था और लोग कम हो गए थे, वो पहले वाली चहल पहल भी नहीं थी जो राजनगर मैं हुआ करती थी,

संतोष- यार कुछ कुछ अजीब सा लग रहा है.

रोहित- हा कुछ अजीब बात तो है, लगता नहीं की ये वही जगह है जहा हमने अपने कॉलेज के दिन गुजारे थे

संतोष- लोग भी डरे डरे से लग रहे है

रोहित और संतोष राजनगर पहुच कर अपनी पसंदीदा जगह पर खड़े होकर शहर के बदले वातावरण के बारे मैं बात कर रहे थे की तभी उनके पीछे से एक रौबीली और कड़कदार आवाज आयी “ये उनकी वजह से है “ रोहित और संतोष ने पीछे मुड़कर देखा तो इस रौबीली आवाज का मालिक इंस्पेक्टर रमण उनके पीछे खड़ा था, रमण अपने थाने से गश्त लगाने बहार आया हुआ था और जब वो इस जगह पहुच तो इन दो नए लोगो को देख कर और इनकी बातो को सुनकर वह ठिठक गया

रमण- आपलोग टूरिस्ट है क्या??

संतोष- जी नहीं, दरअसल हमने हमारी कॉलेज की पढाई यहाँ के विवेकानंद इंजीनियरिंग कॉलेज से पूरी की है, ग्रेजुएशन तक हम यही थे फिर नौकरी के सिलसिले मैं अलग अलग जगह जाना पड़ा, हमारा एक और दोस्त भी आज रत तक यहाँ आने वाला है

रमण- हम्म,फिरतो आपलोगों को पता नहीं होगा की यहाँ क्या चल रहा है ?

संतोष- जी नहीं

रमण- किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि मैं संलग्न लोग गायब हो रहे है, मुख्या रूप से बड़े बड़े पंडित मौलवी पादरी इत्यादि, काफी तहकीकात करने के बाद भी हम केवल इतना पता लगा पाए है की ये किसी एक आदमी का काम नहीं बल्कि किसी रहस्मयी संगठन का काम है.

रोहित- क्या? ये तो बहुत बड़े स्टार का मामला है फिर इस घटना का उल्लेख अखबारों मैं या कसी न्यूज़ चैनल पर्क्यु नहीं नहीं ?

रमण- ये मामला भि पेचिदा है सुरु की घटनाओ कोटो मैंने ही मीडिया की नजरो मैं आने से रोक रखा था, ये एक संवेदनशील मुद्दा है कुछ पोलिटिकल पार्टीज अपने लाभ के लिए इस बात का प्रयोग करने की कोशिश कर सकती है जिससे शायद सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे इसीलिए पुलिस प्रशासन ने सोचा था के ये बात जितनी दबी रहे ठीक होगा पर लगता है मीडिया को इस मामले की भनक है और इसी के चलते उनकी चुप्पी से भी अचंभे मैं हु, अब बस उम्मीद कर सकता हु के जो भी इस के पीछे है जल्द से जल्द उसे गिरफ्तार कर सकू.

संतोष- लेकिन कोई भी धार्मिक क्रिया मैं जुड़े व्यक्ति को ही क्यों उठाना चाहेगा?

रमण- यही तो हम पता लगाने की कोशिश कर रहे है, आप लोग शहर मैं आज हि आये है आप लोगो को अपने आसपास कोई भी अजीब घटना होते दिखे तो तुरंत पुलिस से संपर्क करे, फिलहाल तो पूरा शहर आतंकित है

रोहित- जी ठीक है

रमण- देखिये ऐसा कहकर मैं आपको हतोत्साहित नहीं करना चाहता लेकिन आपने राजनगर आने के लिए शायद सही समय नहीं चुना है.

रमण से बात करने के बाद रोहित और संतोष वह से निकल गए,

रमण- चन्दन इन लोगो पर नजर रखो मुझे कुछ खटक रहा है और कोई भी गड़बड़ हो तो तुरंत मुझे फ़ोन करना

चन्दन-ठीक है सर

रमण ने चन्दन को रोहित और संतोष पर नजर रखने कह दिया और वापस पुलिस स्टेशन आ गया वही रोहित और संतोष रमण की कही बातो पर भी गाड़ी मैं बात चित कर रहे थे

संतोष- इंस्पेक्टर साहब ने काफी मदद की

रोहित-(गंभीर स्वर मैं ) हम्म

संतोष- अब तुमको क्या हुआ?

रोहित- इंस्पेक्टर की बाते सुनी न तुमने ?

संतोष- हा, लेकिन ये लोगो का अपहरण करने वाले हो कौन सकते है ?

रोहित-क्या पता? शायद आतंकवादी हो, भय का माहोल कायम करने के लिए धार्मिक कार्यो से जुड़े नमी गिरामी लोगो को उठा लिया होगा, ये जो भी लोग है बहुत चालक है, इतनी आसानी से पुलिस को चकमा देते हुए लोगो को उठाना किसी साधारण गंग के बस की बात नहीं है.

बाते करते करते ही दोनों होटल पाइनग्रोव पहुचे गाड़ी पार्क करके होटल मैं चेक इन किया

रोहित- ये होटल भी कही....

शांत शांत सा लग रहा है

संतोष- हा सही कहा खैर चलो अपने अपने रूम देख लेते है

रिसेप्शन पर चेक इन करके रोहित और संतोष अपने अपने कमरों मै चले गए , संतोष ने कमरे मैं घुसते से ही अपना बैग एक साइड पटका और बहार का व्यू शिद्की के शिशे से देखने लगा, शायद ये वो राजनगर नहीं था जिसे ये लोग जानते थे, वह उन्होंने अपने कॉलेज का सबसे बेहतरीन समय गुजरा था, हर तरफ मौत सा संन्नता पसरा हुआ था और लोग घर से बहार निकलने मैं डरते थे तभी अचानक रोहित संतोष के कमरे मैं आया

रोहित- विक्रांत से बात हुई तुम्हारी

संतोष- इतनी जल्दी क्या है वो आ जायेगा तो खुद की फ़ोन करेगा.

रोहित- अरे तुमको यार नहीं क्या उसके परिवार का फार्महाउस है यहाँ पर, हम लोग तो कॉलेज होटल मैं रहते थे उसका घर था, जितनी जल्दी वो आ जायेगा हाही शिफ्ट हो जायेंगे वैसे भ ये तेल थोडा महंगा है.

संतोष-(मुस्कुराते हुए) लगता हा इंस्पेक्टर ने तुमको अपनी कहानी से डरा दिया है

रोहित-क्या!! नहीं नहीं उसकी बातो से इसका कोई लेना देना नहीं है

संतोष- ठीक है मेरे बहादुर भाई आ होटल बालकनी से राजनगर कि सुन्दरता देखे , इतने समय बाद यहाँ आना का मौका मिला है

रोहित और संतोष बालकनी मैं कहते थे की तभी उनने देखा के होटल से थोड़ी दुरी पर एक तरफ एक सुनसान इलाका थ जहा छोटी छोटी तोड़ी झाडिया उगी हुयी थी वह खड़ा एक रहस्यमयी व्यक्ति जिसने काले रंग का चोगा रहना हुआ था और चेहरा भी नकाब से ढक रखा था लगातार उनके फ्लोर की तरफ घूरे जा रहा था

रोहित- ये कौन है?और हमारी तरफ क्यों देख रहा है

संतोष- मुझे कैसे पता होगा

रोहित-पहनने ओढने के ढंग से कोई सामान्य व्यक्ति तो नै लगता

संतोष-होगा कोई पागल हमें क्या करना है आओ केलकर कुछ खाने के लिए ऑर्डर करते है

होटल मैं कहना का करोहित आर संतोष होटल के बहार टहलने के लिए निकल गये, रोहित के दिमाग मैं अभी भी उस रहस्यमयी व्यक्ति की अजीब सी वेशभूषा का ख्याल रह रहकर आ रहा था, दोनों दोस्त बाते करते हुए होटल से दूर सुनसान जंगल के इलाके की तरफ निकल आये थे

रोहित- ये होटल शहर से थोड़ी दूर है यहाँ तो जंगले झाड सब है

संतोष- सोचो इतने साल राजनगर मैं रहने के बाद भी हमें इस जगह का पता नहीं था

रोहित- राजनगर काफी बड़ी जगह है संतो तुम हर आदमी से राजनगर का पूरा नक्षा जानने की उम्मीद नहीं कर सकते

तभी संतोष का फ़ोन बज उठा

संतोष- अरे विक्रांत का फ़ोन है

संतोष ने फ़ोन उठा लिया

संतोष- हेल्लो बिक्रांत! कहा तक पहुचे भाई

विक्रांत(फोनेपर)- बस अभी निकला हु जल्द ही मिलते है

संतोष- ठीक है तो तुम यहाँ पहुच कर हमें होटल पाइनग्रोव से पिक कर लेना

विक्रांत- ठीक है पहुच कर बात करता हु

और फ़ोन डिसकनेक्ट हो गया

रोहित- क्या बोला

संतोष- आ रहा है मैंने बता दिया के हमें कहा से पिक करना है

रोहित-सही है ......

तभी अचानक पास के झाड मैं दोनों को कुछ हलचल महसूस हुयी दोनों ने मुड़कर देखा तो बुरी तरह चौक गए क्युकी एक सात फूट का व्यक्ति चिंघाड़ मार कर भरी सी कुल्हाड़ी लेकर उनकी तरफ दौड़ा आ रहा था..........

भाग ७​

संतोष- ठीक है तो तुम यहाँ पहुच कर हमें होटल पाइनग्रोव से पिक कर लेना

विक्रांत- ठीक है पहुच कर बात करता हु

और फ़ोन डिसकनेक्ट हो गया

रोहित- क्या बोला

संतोष- आ रहा है मैंने बता दिया के हमें कहा से पिक करना है

रोहित-सही है ......
तभी अचानक पास के झाड मैं दोनों को कुछ हलचल महसूस हुयी दोनों ने मुड़कर देखा तो बुरी तरह चौक गए क्युकी एक सात फूट का व्यक्ति चिंघाड़ मार कर भरी सी कुल्हाड़ी लेकर उनकी तरफ दौड़ा आ रहा था..........

वो सात फूट लम्बा आदमी भागते हुए रोहित और संतोष के पास पंहुचा और उसने रोहित और संतोष पर अपनी कुल्हाड़ी से वार करने की कोशिश तो दोनों ने उसका वार बचा लिया फिर उसने संतोष की तरफ वार किया लेकिन संतोष ने असाधारण फुर्ती दिखाते हुए उसका वार नाकाम कर दिया और उसके हाथ पर लात मार कर उसके हाथ से कुल्हाड़ी निचे गिरा दी औरन सिर्फ कुल्हाड़ी गिराई बल्कि उस आदमी की छाती मैं लात मार कर उसे कुछ फूट पीछे धकेल दिया, फिर वो व्यक्ति रोहित की तरफ मुड़ा और उसे गर्दन से पकड़ कर उठा लिया

रोहित- स...संतोष कुछ कर..!

संतोष-चिंता मत करो मैं कुछ करता हु

संतोष गठीले शारीर का मालिक था लेकिन वो भी जोर लगाकर वो भरी कुल्हाड़ी नहीं उठा पा रहा था पर कुछ कोशिशो बाद उसने ताकत का एक एक कतरा लगा कर वो कुल्हाड़ी उठाई और उस लम्बे व्यक्ति की गार्डन पर जोरदार वार किया,

‘खच्च’ की आवाज उस सुनसान जंगल मैं गूंज उठी, कुल्हाड़ी उस आदमी के कंधे से होते हुए गर्दन के पार निकल गयी, हमला करने वाली की पकड़ रोहित की गर्दन पर ढीली पड़ गयी और उसका उसका निर्जीव शारीर धरती पर धराशायी हो गया. ये पूरा घटनाक्रम इतनी तेजी से घटित हुआ के रोहित और संतोष बिलकुल समझ नहीं पाए के आखिर ये सब था क्या .

रोहित(खस्ते हुए) – उफ़ ये कौन था?? और हमें मरना क्यों चाहता था??

संतोष हाथ मैं कुल्हाड़ी और चेहरे पर खून लिए स्तब्ध खड़ा था

संतोष-म...म..मैंने एक आदमी का खून कर दिया! उसे मार दिया!!!!

रोहित(संतोष को झंझोड़कर)- संतोष मेरि बात सुन..तूने जो कुछ भी किया है आत्मरक्षा के लिए किया है जिसमे कुछ गलत नहीं है...समझ रहा है न तू...

संतोष-तो क्या हमें पुलिस को बता देना चाहिए....

रोहित(कुछ सोचते हुए)- नहीं....

देखो ये समझदारी की बात नहीं होगी उल्टा हम भी फस सकते है

संतोष-तो फिर क्या करे??

रोहित- एक काम करते है इसके शारीर को यही पास के जंगल मैं गाड देते है, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा वैसे भी यहाँ हम दोनों और इस अनजान हमलावर के अलावा इस सुनसान जंगली इलाके मैं कोई नहीं है जिसने हमें देखो हो

संतोष-क्या ये उस समूह का हिस्सा हो सकता है जिसकी बात उस इंस्पेक्टर रमण ने की थी?? जिसकी वजह से लोग लापता हो रहे है??

रोहित-क्या पता? फ़िलहाल तो इसे उठाओ ताकि जंगल मैं इसको गाड़ा जा सके

संतोष को भी रोहित की बात सही लगी, रोहित और संतोष ने सम्लावर को उठाया और जंगल मैं ले जाने लगे, जंगल भी उस समय बड़ा शांत था, चिडियों के चहचहाने की भी आवाज नहीं आ रही थी

संतोष-ह्म्फ़!! बड़ा भरी है कम्भख्त

रोहित-हा सो तो है अच एक बात बताओ तुम इतना अच्छा लड़ना कब सीखे?

संतोष-वो...वो यहाँ से जाने के बाद करते की ट्रेनिंग ली थी कुछ समय के लिए

रोहित-और तुमने इतनी भरी कुल्हाड़ी भी उठा ली ये तो वाकई काबिले तारीफ था

संतोष-आ..हा....हा...धन्यवाद पर ये भैसा बहुत भरी है

रोहित-हा सो तो है

रोहित को संतोष का जवाब सुन कर लगा की वो बस उसे टालने के प्रयास कर रहा है लेकिन उसे इस विषय मैं सोचने का ज्यादा मौका नहीं मिला क्युकी उसी वक़्त उस शांत जंगल मैं उन दोनों को अपने अलावा किसी और की हलकी चहलकदमी कि अवाज आयी, रोहित ने संतोष की तरफ देखा तो संतोष उसका इशारा समझ गया, उन्होंने लाश वही पर छोड़ दी फिर दोनों उस आवाज की दिशा मैं बढे लेकिन वहा उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया फिर वो जब वापिस लाश लेने आये तो वह से लाश भी गायब थी और इस घटना से वो बुरी तरफ घबरा गए

संतोष(हैरान होकर)- लाश कहा गयी? इतने भरी आदमी की लाश इतनी जल्दी कौन गायब कर सकता है ?

रोहित-एक बात तो साफ़ है कोई हमें मरने का प्रयास कर रहा है और हो न हो ये वही संगठन है जिसके बारे मैं इंस्पेक्टर साहब बता रहे थे

संतोष-तुम कंपनी मैं काम करते हो और मैं बैंक मैं, इंस्पेक्टर के कहे अनुसार ये उन लोप्गो को गायब करते है जो किसी धर्मिल कार्य मैं संलग्न हो जबकि हमलोग तो साधारण नौकरी करते है हमें भला कोई क्यों मरना चाहेगा?

रोहित-दिमाग बिलकुल काम नहीं कर रहा इस वक़्त इससे पहले की कोई और जानलेवा हमला हो चलो होटल लौट चले

संतोष- लेकिन वो लाश

रोहित-लाश को भूल जाओ यार यहाँ थोड़ी देर और रुके तो शायद हम ही लाश बन जायेंगे

संतोष-ठीक है

संतोष और रोहित दोनों होटल जाने के लिए लौट ही रहे थे कि न जाने कहा से काले नकाब और काले चोगे वाले लोग जंगल से निकल कर आये और उन्हें चारो तरफ से घेर लिया, रोहित और संतोष दोनों की ही धड़कने तेज हो उठी

रोहित(घबराकर)-ये...

ये तो वैसी ही वेशभूषा वाले लोग है जैसी उस व्यक्ति ने पहनी थी जो हमको बालकनी से घूर रहा था उस लम्बे पहलवान की वेशभूषा भी ऐसी ही थी, अब शक की कोई गुंजाईश नहीं है के ये वही लोग है जो इतने दिनों से यहाँ राजनगर मैं आतंक मचाये हुए है

अचानक ही दो चार लोग तेजी से रोहित और संतोष की तरफ बढ़कर आये और उन्हें पकड़ लिया, उनके हाथो मैं जैसे कोई अमानवीय शक्ति थी जिसकी वजह से दोनों मैं से कोई भी छुट नहीं पा रहा था फिर उन्ही मैं से एक व्यक्ति ने सफ़ेद रुमाल पर क्लोरोफार्म डालकर उन्हें सुंघा दिया, अब उन दोनों के लिए अपने होश कायम रखना मुश्किल था, दो मिनट के अंदर ही उनकी आँखें बोझिल हो गयी और वो बेहोशी के समुन्दर मैं धुब्ते चले गए......

रमण के कहे अनुरस चन्दन रोहित और संतोष पर नजर बनाये हुए थे उसने इन्हें जंगल की तरफ जाते देखा था और कही इतनी शक न हो इसिलिओये इनके पीछे नहीं आया था जब जब काफी समय बीतने के बाद भी रोहित और संतोष जंगल से लौट कर नहीं आये तो चन्दन को थोडा अजीब लगा और उसने इस बात की जानकारी तुरंत रमण को दी

वही दूसरी तरफ शास्त्री सदन मैं सुमित्रादेवी अपनी बहु के पूछने पर उसे राघव के बारे मैं बता रही थी कि कैसी राघव उनका बीटा नहीं है बल्कि उन्होंने अपने ससुर के कहने पे उसे गोद लिया था और कैसे उनके सरुर के कहा था के राघव के हाथ से कोई महान काम होने वह है जिसे उनकी बहु श्रुति सुन रही और जब सुमित्रादेवी की बात ख़तम हुयी तब उनका और श्रुति का ध्यान दरवाजे के पास खड़े राघव पर गया जिसने उनकी सारी बाते सुन ली थी,

सुमित्रादेवी कभी नहीं चाहती थी के राघव को इस बात का कभी पता चले के उन्होंने उसे गोद लिया था, उन्होंने बचपन से ही राघव और रमण मैं कभी कोई भेदभाव नहीं किया था बल्कि राघव तो उनके लिए रमण से भी ज्यादा लाडला था और जब उन्होंने देखा ये राघव को इस बारे मैं पता चल गया है तो उनका मन घबरा रहा था ये सोच सोच कर की अब पता नहीं राघव क्या कहेगा या उसे कैसा लगेगा

राघव की आँखें पनिया गयी थी उसे समझ नहीं आ रहा था के किस बात का दुःख मनाये, वो अनिरुद्ध शास्त्री और सुमित्रादेवी का बेटा नहीं है इस बात का या अपने दादाजी की इच्छा पूर्ण न कर सकने का

राघव बस आँखों मैं पानी लिए सुमित्रादेवी को देख रहा था और फिर वो वह से निकल गया और जाते जाते अपनी माँ से ये कह गया के उसे कुछ समय अकेला रहना है

राघव को वह से ऐसे जाता देख सुमित्रादेवी की भी आँखें झलक आयी,

राघव वह से निकल कर सीधा अपने दादाजी के कमरे मैं आया, अपने दादाजी की मृत्यु के बाद वो पहली बार इस कमरे मैं आया था, यही वो जगह थी जहा उसके दादाजी उसे अभ्यास कराते थे, फिलहाल सुमित्रादेवी की कही बाते सुनने के बाद राघव का दिमाग फटा जा रहा था एक साथ कई ख्याल दिमाग मैं घूम रहे थे तभी उसकी नजर अपने दादाजी की तस्वीर

पर पड़ी और उसके मन मैं ख्याल आया की अब वही राह दिखायेंगे जिन्होंने उसे इस घर मैं आया है और राघव अपने दादाजी की तस्वीर के सामने धयान की मुद्रा मैं बैठ गया, राघव ने आज कही समय बाद धयान लगाया था या हु कहे उसके दादाजी के जाने के बाद शायद पहली बार और जब राघव धयान्स्त होता तो उसे समय का भान नहीं रहता था

धयान करने से राघव का दिमाग शांत होने लगा और उसके दिमाग मैं एक सफ़ेद रौशनी कौंध उठी और उसके मानसिक पटल पर एक छवि उभरने लगी............

भाग ८​

राघव को धयान लगाये हुए एक घंटा हो चला था, उसका चेहरा एकदम शांत था मगर मन मैं उथलपुथल मची हुयी थी, राघव के मन मैं अपने अस्तित्व को लेकर इस वक़्त ढेरो सवाल उमड़ रहे थे जिनका उसे जवाब जानना था, राघव का मानसिक पटल एक सफ़ेद दुधिया रौशनी मैं नाहा गया था और उसी प्रकाश मैं उसे एक आकृति उभरती दिखी, वो आकृति एक पुस्तक की थी, राघव को समझ नहीं आ रहा था की ये किताब उसे क्यों दिख रही है, धीरे धीरे वो प्रकाश का घेरा कम होने लगा और राघव ने अपनी आँखें खोली

राघव का मन अब पहले की तुलना मैं काफी ज्यादा शांत था मगर अब भी उसे उसके सवालो का जवाब नहीं मिला था

राघव ने अपनी आंखे खोली और उस कमरे मैं चारो तरफ अपनी नजर दौडाई, सारा कमरा उसके दादाजी के सामान से भरा हुआ था जिनमे से अधिकांश किताबे और ग्रन्थ थे, राघव अब उन सब चीजों को देखने लगा, बचपन मैं उसके दादाजी के कहने पर भी कभी राघव ने इन चीजों मैं ज्यादा रूचि नहीं दिखाई थी जितनी आज दिखा रहा था तभी उसकी नजर वह राखी एक किताब पर पड़ी जिसने राघव को हैरत मैं दाल दिया क्युकी ये यही पुस्तक थी जिसकी छवि उसने कुछ समय पहले देखि थी

राघव ने उस किताब को उठाया और धयान से देखने लगा, वो किताब उसके दादाजी ने खुद लिखी थी राघव ने जब उसे खोला तो उस किताब के पहले ही पन्ने पर उसके नाम का जिक्र था, वो किताब सिर्फ राघव के लिये लिखी गयी थी, राघव को अब उस किताब को पढने की और ज्यादा उत्सुकता होने लगी थी, उसने अगला पन्ना पलटा तो उसपर भगवन शिव का एक चित्र बना हुआ था जिसके सामने एक शिवलिंग था और उस शिवलिंग के पास एक छोटा सा बच्चा, राघव ने उस चित्र दो देखने के बाद अगला पन्ना पलटा

“राघव मेरे बच्चे मैं ये किताब सिर्फ तुम्हारे लिए लिख रहा हु, मैं जनता हु ये किताब जब तुम पढोगे तब मैं तुम्हारे पास नहीं रहूँगा और ऐसे समय मैं यही किताब तुम्हे आगे का रास्ता दिखाएंगी,

राघव मैंने अपना सारा जीवन शिव की आराधना मैं गुजारा है और उसी भगवान् शिव के आशीर्वाद से मुझे कई सिद्धिया और शक्तिया मिली जिनके उपयोग से मैंने कई लोगो की मदद की, मैं कुछ क्षण किसी भि९ की आँखों मैं देख कर उसके विचार बता सकता था और एक विशिष्ट अनुष्ठान की वजह से मुझे थोडा बहुत भविष्य का ज्ञान भी था,

जिस समय मैंने तुम्हे जंगल मैं उस शिव मंदिर मे

देखा था तब मुझे काफी अचम्भा हा था क्युकी उस समय वह किसी इंसान का आना कफि दुर्लभ था, मैंने जब तुम्हे अ[प्निगोद मैं उठाया था तब मुझे एक विशिष्ट उर्जा का बहाव अपने अंदर महसूस हुआ था, राघव तुम्हे अंदाजा भी नहीं है की तुम किन शक्तियों के स्वामी हो बस जरुरत है तुम्हे उन शक्तियों को समझने की,

मेरे लिए तुम मेरे शिव का प्रसाद थे इसीलिए मैंने तुम्हे अपने साथ अपने घर ले आया और अनिरुद्ध को तुम्हे गोद लेने कहा, ये शायद मेरे पुण्य कर्म थे की मेरे बेटे बहु ने कभी मेरी कोई बात नहीं टाली, मैंने अपनी विद्याओ से कई बार तुम्हारे जन्म का समय जानने की कोशिश की और तुम्हारे असल माता पिता का पता भी लगा चाह पर मैं असफल रहा, शायद शिव की यही इच्छा हो की तुम अनिरुद्ध और सुमित्रा के बेटे बने रहो,

जिस समय तुम मुझे मले थे उस समय के अनुसार मैंने तुम्हारी कुंडली बनायीं थी और उस समय जोग्रहो का योग बन रहा था उसके हिसाब से तुम कोई साधारण बालक नहीं हो, इश्वर ने तुम्हे किसी खास कार्य के लिए चुना है, और मुझपर ये जिन्ना था की मैंने तुम्हे इश्वर के उस खास कार्य के लिए तयार करू जो मैंने मेरे हिसाब से किया,

मेरे बच्चे आने वाला समय काफी विकट है, इस ब्रह्माण्ड पर अन्धकार का सामराज्य फैलने वाला है, कई काली शक्तिया जागृत होने वाली है, ये मानवजाति अपने ही हाथो से अपनी मृत्यु को आमंत्रण देगी और अन्धकार का साम्राज्य इस ब्रह्माण्ड मैं स्तापित करेगी

निकट भविष्य मैं होने वाले महा विनाश को केवल तुम रोक सकते हो इसलिए तुम कौन हो इसपर अपना धयान केन्द्रित न कर तुम क्या हो ये सोचो अपनी सुप्त शक्तियों को जागृत करो,

इस महा विनाश को तुम अकेले नहीं रोक पाओगे राघव तुम्हे अपने साथ कुछ सच्चे और बहादुर लोगो की जरुरत होगी, उन महारथियों की खोज करो मैंने तुम्हे और रमण को सामान शिक्षा दी है रमण का मन साफ़ है इसलिए अपने भाई का साथ मत छोड़ना वो तुम्हारे इस कार्य मैं निरंतर तुम्हारा सहयोग करेगा

मैंने अपनी योग शक्ति से अपनी मृत्यु को भाप लिया था और उसे रोक भी सकता था लेकिन मैं इश्वर की बनायीं इस सृष्टि के नियमो मैं दखल नहीं देना चाहता था,

मैंने अपना शारीर त्यागने से पहले अपना सारा ज्ञान अपनी सटी सिद्धिया-शक्तिया अपनी रुद्राक्ष की माला मैं एकत्रित की थी वो माला मैं तुम्हे प्रदान करता हु, यर तुम्हे तुम्हारी लक्ष्पुर्ती मैं सहायता करेगी

राघव तुम्हारा सामना कालदूत नामक महाभयंकर शक्ति से होने वाला है, उससे सामना करने से पहले तुम्हे उसके बारे मैं जानना होगा....इससे अधिक मेरे पास तुम्हारे लिए और कुछ नहीं है

मेरा अशोर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है राघव......

”

राघव ने वो किताब बंद की, जहा से उसने वो किताब उठाई थी वही उसे वो रुद्राक्ष की माला भी मिल गयी जो उसके दादाजी ने उसके लिए छोड़ी थी, राघव को अपने सवालो के जवाब मिल गए थे, उसके जीवन का उद्देश्य उसके सामने स्पष्ट था और केवल एक ही नाम उसके दिमग मैं चल रहा था ‘कालदूत’

राघव कालदूत के बारे मैं कुछ नहीं जानता था न ही अपनी शक्तियों के बारे मैं, सबसे पहले उसके सामने अब यही कार्य था की कालदूत के बारे मैं जितना हो सके पता करे लेकिन किससे......

राघव कमरे से बहार आया तो उसने देखा की सुमित्रादेवी गुमसुन की बैठी रो रही है और श्रुति उनके पास बैठी है

“भाभी क्या हुआ है माँ को ऐसे रो क्यों रही है” राघव ने एकदम नॉर्मली कहा जीने सुन श्रुति और सुमित्रादेवी हैरान ह गए की ये इतना शांत कैसे है

“वो...” श्रुति ने बोलने की कोशिश की तो सुमित्रादेवी से उसे इशारे से रोक दिया

राघव अपनी माँ के सामने जाकर घुटने पर बैठ गया और उनका हाथ पकड़ लिया

“माँ.....”

“तू...तू हमें छोड़ के जायेगा तो नहीं न वो सब सुन के.....”

“मैं...मैं कहा जाऊंगा, मैं अपनी माँ के पास से कही नहीं जाने वाला ये मेरा घर है मैं क्यों जाऊ यहाँ से..और किस बारे मैं बात कर रही हो तुम...”

राघव को इस तरह नार्मल देख कर सुमित्रादेवी काफी खुश हुयी उन्हें डर था की सच पता चलने के बाद राघव कही कुछ उल्टा सीधा न कर दे पर अब उनके मन को शांति मिली थी राघव को नार्मल देख कर

“भाभी कुछ खिला दो यार भूख लगी है” राघव ने कहा

वैसे तो राघव एकदम नार्मल लग रहा था पर अब भी उसके दिमाग मैं एक ही नाम घूम रहा था ‘कालदूत’

वही दूसरी तरफ जब संतोष और रोहित काफी समय तक जंगल से बहार नहीं आये तो चन्दन ने तुरंत रमण को इस बात की खबर की और रमण अपनी साडी टीम के साथ संतोष और रोहित को ढूंढने निकल पड़ा.....

भाग ९​

रोहित और संतोष को जंगल मैं गए हुए आधे घंटे से उपर हो गया था ये बात चन्दन को खटकी और उसने तुरंत रमण को इस बात की खबर की और रमण भी अपनी फाॅर्स के साथ उन दोनों को ढूंढने निकल गया क्युकी अगर राजनगर से टूरिस्ट भी गायब होने लगते तो मामला और भी ज्यादा बिगड़ जाता

वही वो काले नकाब वाले लोग रोहित और संतोष को बेहोश करके अपने साथ ले गए थे,

धीरे धीरे जब रोहित और संतोष को होश आया तो वो एक अँधेरे सीलन भरे कमरे मैं अलग अलग दीवारों पर आमने सामने लोहे की जंजीरों मैं जकड़े हुए थे. वो कमरा किसी पुराने वेअरहाउस की तरह था, आने जाने के लिए पुराना लकड़ी का दरवाजा था, लकड़ी का दरवाजा पुराना होने की वजह से उसमे जगह जगह दरारे थी और उन्ही दरारों के बीच से हल्की सी मध्हीम रोशनी उस अँधेरे कमरे मैं पहुच रही थी

संतोष-र....रोहित....क्या ये तुम हो...रोहित!

रोहित(धीरे धीरे होश मैं आते हुए)- आह! संतोष...उफ्फ....

ये कहा है हम!

संतोष-पता नहीं, कोई पुराना सा कमरा है

रोहित(चिल्लाकर)- कौन हो तुम लोग! क्या चाहते हो?

संतोष-चिल्लाने का कोई खास मतलब नहीं लग रहा, मुझे लगता है की उन्होंने हमें किसी आबादी वाले इलाके से दूर सुनसान इलाके मैं कैद किया होगा

तभी लकड़ी का वो दरवाजा धीरे धीरे चर्रर की आवाज के साथ खुला और चार पांच काले चोगे वाले रहस्यमयी लोगो ने अंदर प्रवेश किया

संतोष-कौन हो तुम लोग, क्या चाहते हो?

उन काले चोगे वालो मैं से एक आगे आया और बडी ही शांत धीमी आवाज मैं बोला जिसने दोनों को अंदर तक हिला दिया “हम चाहते है.....तुम्हारी जान!!”

संतोष(घबराकर)- प...पर क्यों?

काले चोगे वाला व्यक्ति-वैसे तो हमें अब तक कोई जनता नहीं नहीं पर जल्द ही ये सारा ब्रह्माण्ड हमें जानेगा, तुम चाहो तो हमें कालसेना कह सकते हो, आम दुनिया से अलग हमारी अपनी दुनिया है, हमारे अपने विश्वास है मान्यताये है.....और अपना इश्वर है.

रोहित(झुंझलाकर)- ठीक है ठीक है! सीधे मुद्दे पर आते है..कितना पैसा चाहिए बोलो तुमलोगों को?

वो काले चोगे वाला व्यक्ति धीरे धीरे रोहित की तरफ बढ़ा औ एक जोरदार थप्पड़ रोहित के गाल पर रसीद किया, थप्पड़ इतना जोरदार था के रोहित फिर से बेहोश होते होते बचा, फिर उस व्यक्ति ने रोहित के गिरेब्वन को पकड़कर उसे अपनी तरफ खिंचा और उसके कान मैं बहुत धीमे फुसफुसाया “धन और दौलत! आखिर लोग क्यों इन सब के पीछे पूरी जिंदगी निकल देते है! क्या तुम्हारा इश्वर तुमको ये सब उपलब्ध नहीं करवा सकता? दुनिया मैं दुःख दर्द क्यों है? असंतोष क्यों है? लोग क्यों धर्म के नाम पर क़त्ल करते है? क्या तुम्हारा इश्वर पक्षपात करता है? अगर नहीं तो अमीर और गरीब क्यों है? सबको सबकुछ क्यों नहीं मिल पता! लेकिन हमारा इश्वर ऐसा नहीं है क्युकी हम कमसे कम उसके वजूद के बारे मैं जानते तो है लेकिन तुमको तो अपने इश्वर के वजूद का ही नहीं पता, लेकिन कोई बात नहीं, जब हमारे प्रभु इस धरती पर आयेंगे तो सबको उन्हें मानना पड़ेगा, जो ऐसा नहीं करेगा वो धुल मैं मिल जायेगा और अपने इश्वर को इस धरती पर लेन के लिए हमको कुछ कुर्बानिया देनी होंगी!” जैसे ही उसने अपना आखरी वाकया ख़त्म किया दुसरे कालसैनिक ने आकर केरोसिन से भरी बोतल को रोहित के उपर उड़ेल दिया

संतोष-ये...ये क्या कर रहे हो तुम लोग!! रुको...

रुक जाओ!!

पर तबतक बहुत देर हो चुकी थी, रोहित के उपर जलती हुयी माचिस की तीली दाल कर उसे जला दिया गया था, रोहित बहुत चीखा बहुत चिल्लाया लेकिन वह पर उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था,

रोहित इतनी बुरी तरह चीख रहा था के उसकी आवाज पुरे इलाके मैं गूंज रही थी, आग उसके शारीर को से चमड़ी को गलाकर धीरे धीरे अलग कर रही थी, जल्द ही उसकी आवाज शांत पड़ती चली गयी, चीखो ने गले मैं ही दम घोट दिया, आग बुझ चुकी थी लेकिन अब दिवार पर रोहित नहीं बल्कि मांस का लोथड़ा लटक रहा था जिसके शारीर से अभी भी हल्का हल्का धुआ उठ रहा था,

संतोष अपने दोस्त को अपने सामने जलता देख कर सदमे जैसी स्तिथि मैं पहुच गया था, उसके मुह से अब कोई बोल नहीं फुट रहे थे, उसे शायद यकीं नहीं हो पा रहा था के उसके सबसे अच्छे दोस्त ने उसके सामने ही आग मैं जलकर तड़प तड़पकर दम तोड़ दिया था

जिस कालसैनिक से रोहित को जलाया था वही संतोष के पास आकर बोला “चिंता मत कर दो घंटे बाद तेरी बारी है! तुझे आज अपने सारे दर्द सारी यातनाओ से मुक्ति मिल जाएगी”

फिर वो सभी कालसैनिक उस कमरे से बहार निकल आये, वो लकड़ी का छोटा सा कमरा एक विशाल कब्रिस्थान की धरती पर बना हुआ था

वो सभी एक घेरा बना कर खड़े हुए थे और उनमे से एक बुलंद आवाज मैं बाकि सबसे बोला

“आज एक और कुर्बानी पूरी हुयी, अब बस कुछ कुर्बानिया और, उसके बाद हिन्द महासागर की गहराइयों मैं कैद हमारे इश्वर कालदूत अपनी कैद से स्वतंत्र हो जायेंगे और पूरी दुनिया पर राज करेंगे!”

भाग १०​

रमण अपनी पूरी टीम के साथ संतोष और रोहित को ढूंढने निकल गया और चन्दन की बताई जगह पर पंहुचा, वो लोग काफी समय तक जंगल मैं रोहित और संतोष को तलाश करते रहे मगर उनका कोई पता नहीं चला

शाम हो चली थी और सूरज धीरे धीरे ढलने लगा था, संतोष उस अंधेरे सीलन भरे कमरे में करीब 1 घंटे से कैद था

वह कई बार पूरी ताकत के साथ 'बचाओ बचाओ' चिल्ला चुका था लेकिन कोई बाहरी प्रतिक्रिया नहीं मिलने की वजह से उसने रही सही उम्मीद भी छोड़ दी थी

इस समय तापमान गिरने की वजह से ठंड भी थोड़ी सी बढ़ गई थी सामने रोहित की जली हुई लाश लोहे की जंजीरों में अब भी बंधी हुई थी तभी खटाक से लकड़ी का दरवाजा टूटा इंस्पेक्टर रमन अपनी पूरी टीम के साथ वहां आ चुका था उसने संतोष को और रोहित की जली हुई लाश को लोहे की मोटी जंजीरों से आजाद करवाया संतोष अभी भी सदमे की स्थिति में था और फटी फटी आंखों से रोहित को घूर रहा था

रमन- मैं जानता हूं कि तुम पर बहुत बुरी बीती है लेकिन यकीन मानो यह दरिंदे ज्यादा दिनों तक नहीं बच पाएंगे

संतोष - लेकिन आप आपको पता कैसे चला कि हम लोग यहां कैद है

रमन- सब बताऊंगा लेकिन पहले तुम मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलो

रमन ने संतोष को अपनी जीप में बैठाकर पुलिस स्टेशन में ले आया और अपने हवलदार से कहा

रमन-

मुझे इससे अकेले में कुछ जरूरी पूछताछ करनी है इतने सारे लोगों को एक साथ देख कर घबरा सकता है वैसे भी इसने अभी-अभी अपने दोस्त की हत्या होते हुए अपनी आंखों से देखी है इसीलिए इसकी मानसिक स्थिति का अंदाजा लगा पाना मुश्किल काम है मैं चाहूंगा कि आप लोग पूछताछ के दौरान मुझे किसी भी काम के लिए डिस्टर्ब ना करें जरूरी काम के लिए ही केबिन में आए

उसके बाद किसी भी हवालदार ने रमण से कोई सवाल नहीं किया

इस वक़्त संतोष शाल ओढ़े रमण के केबिन मैं उसके सामने बैठा हुआ था, रमण ने उसके और अपने लिए दो कॉफ़ी मंगवायी, संतोष अब भी अपने विचारो की दुनिया मैं खोया हुआ था ये देख कर रमण ने ही बात की पहल करना सही समझा

रमण- तुम लोग वह कैसे पहुचे बता सकते हो

रमण से बात आगे बढ़ने की कोशिश की लेकिन संतोष ने उसका कोई जवाब नहीं दिया तो रमण से उससे दोबारा पूछा और अब की बार संतोष की आँखों से आसू बहने लगे, उसने अभी अभी अपना सबसे खास दोस्त खोया था रमण ने भी उसे रो लेने दिया और जब कुछ समय बाद संतोष शांत हुआ तब रमण ने दोबारा अपना सवाल किया

रमण-संतोष मैं जनता हु ये समय तुम्हारे लिए काफी मुश्किल है पर अपने आप को संभालो और जो भी हुआ मुझे सब सच बताओ वरना मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाउँगा, क्या तुम कुछ बता सकते हो उन लोगो के बारे मैं जो कुछ हुआ है मुझे सुरु से सब बताओ

संतोष ने रमण को शुरू से सब बताया की कैसे वो जंगल की तरफ बस टहलने गए थे कैसे वहा उनपर एक अनजान शख्स ने हमला किया और खुदकी आत्मरक्षा मैं इनके हाथो उसका खून हो गया और फिर उस लाश का गायब होना और संतोष उर रोहित का उन लोगो द्वारा अपहरण संतोष ने रमण को सब बता दिया था

संतोष की बाते सुन कर रमण के एक्सप्रेशन बदल रहे थे उसे जरा भी अंदाजा नहीं था के इतना सब कुछ हुआ होगा

रमण- उनलोगों ने तुम्हे कुछ बताया के वो कौन है या तुम्हे उनकी बातो से कुछ पता चला हो

संतोष- वो अपने आप को कालसेना बता रहे थे और कुछ और लोगो को मारने का भी कह रहे थे, उनमे से एक शख्स के बताया की वो ये सब अपने भगवान् को आजाद करने के लिए कर रहे थे

रमण-किसी का नाम सुना था तुमने

संतोष- नहीं, वो किसी कालदूत का जिक्र कर रह थे

रमण-कालदूत? खैर मुझे लगता ई बाकि किगुम्शुदा घटनाओ मैं भी इसी गिरल का हाथ होगा क्या नाम बताया ‘कालसेना’, तुम एक काम करो संतोष तुम आज रात यही पुलिस स्टेशन मैं रुको यहाँ तुम सेफ रहोगे और तुम्हारा एक और दोस्त आने वाला था न उसका क्या हुआ

संतोष-वो आएगा तो कॉल करेगा पर सर आपको कैसे पता चला की हमे वह कैद किया गया है

रमण-मैंने अपना एक आदमी तुमपर नजर रखने के लिए छोड़ रखा था उसी से पता चला के तुम जंगल की तरफ गए हो, मेरी टीम तुम लोगो को ढूंढते हुए जब काफी अंदर पहुची तब हमें एक पुराने कब्रिस्तान मैं एक कमरा मिला जब उसे हमने खोला तो तुम मिले, हम

रोहित को तो नहीं बचा पाए इसका अफ़सोस है

संतोष- थैंक यू सर आप सही वक़्त पर आये वरना शायद मेरा हाल भी रोहित जैसा होता

रमण-हम्म तुम रुको मैं आता हु

रमण संतोष को अपने केबिन मैं छोड़ कर बहार आया उसे न जाने क्यों संतोष की बातो पे डाउट हो रहा था क्युकी जिस हिसाब से संतोष ने कालसेना के बारे मैं जवाब दिया था उससे रमण को लग रहा था के संतोष इस बारे मैं और भी कुछ जनता है पर उसने अभी ये बात पूछना सही नहीं समझी उसने २ हवलदारो को उसपर नजर रखने कहा और घर की और निकल गया, उसके दिमाग मैं केवल २ चीज़े घूम रही थी कालसेना और कालदूत जिसके बारे मैं उसे पता लगाना था

वहा घर पर राघव भी यही सोच रहा था के आगे उसे क्या करना है

रमण कुछ देर बाद घर पंहुचा और हाथ मुह धोकर सबके साथ खाना खाने बैठा पर उसका धयान खाने मैं नहीं था वो कुछ सोच रहा था, बाकि लोग भी शांत बैठे थे राघव ने रमण से पूछना भी चाह की क्या हुआ है पर उसने कुछ नहीं कह कर बात को ताल दिया जो राघव को अटपटा लगा क्युकी रमण अक्सर घर पर केसेस की बात करता था, राघव ने अपने दादाजी की रुद्राक्ष की माला पहनी हुयी थी और वो देखना चाहता था के इस माला की शक्तिया कितनी कारगर है उसने कुछ सेकंड्स अपनी आँखें बंद की और फिर खोल कर रमण की आँखों द्वारा उसके दिमाग मैं झाँकने की कोशिश की....रमण के दिमाग मैं उसे कालसेना का सन्दर्भ मिला उनदोनो भाइयो को एक ही चीज़ के बारे मैं पता लगाना था, राघव ने उस समय कुछ नहीं कहा और खाना खाने के बाद रमण से बात करने की ठानी........

भाग ११​

सबका खाना हो चूका था, रमण अब भी अपने की खयालो मैं गम था, रमण इस वक़्त अपने घर की छत पर खड़ा हो कर अपने केस बे बारे मैं सोच रहा था तभी राघव वहा आया

राघव-कालदूत के बारे मैं सोच रहे हो भाई

रमण-ह...क....क्या मैं समझा नहीं?

राघव के अचानक वहा आने और सीधे कालदूत के बारे मैं पूछने से रमण चौका

राघव-आपका नया केस जो आप संभल रहे हो वो कालदूत से जुडा हुआ है न

रमण-हा...

पर तुम्हे इसके बारे मैं कैसे पता मैंने तो आज इस बारे मैं घर मैं भी कोई बात नहीं की

राघव ने फिर रमण दिन भर मैं हुयी घटनाओ के बारे मैं बताया और ये भी बताया के कैसे उस माला की मदद से उसके रमण का दिमाग पढ़ा और उसके दादा की किताब और कालदूत के बारे मैं भी रमण साडी बातो को गौर से सुन रहा था

रमण-राघव तुम्हे सच मैं लगता है की कोई कालदूत होगा

राघव-पता नहीं भाई इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं है फिलहाल पर आप बताओ आपको क्या लगता है और इस कालदूत नाम से आपका पला कैसे पडा

रमण ने फिर संतोष से हुयी पूरी बात राघव को बताई और साथ ही अपनी शंका भी की उसे संतोष मैं कुछ गड़बड़ लग रहा है

रमण- राघव मैं नहीं जनता की ये लोग कौन है और कोई कालदूत है भी या नहीं मैं बस इतना जनता हु के ये कुछ दिमाग से विक्षिप्त लोग है जोइस समाज के लिए एक खतरा है और इन्हें अगर यहाँ नहीं रोका गया तो पता नहीं और कितनी जाने जाएँगी

रमण राघव से बात कर रहा था उर राघव कुछ सोच रहा था

रमण-क्या सोच रहे हो

राघव-भाई आप जब उन लडको को वह बचने गए थे तब वह उनके अलावा भी कोई था क्या

रमण-नहीं हमें वह बस संतोष और रोहित की जली हुयी लाश ही मिली और हम संतोष को अपने साथ ले आये

राघव-आपने उस जगह को छान मारा था

रमण-हा मगर हमें वहा कुछ नहीं मिला संतोष ने कहा था के वो लोग दोबारा आयेंगे उसकी बलि देने ऐसा कह कर वह से चले गए थे

राघव-मतलब उनलोगों को पता नहीं था के पुलिस ने संतोष को बचा लिया है, भाई मुझे लगता है वो लोग संतोष की बलि देने वह जरूर आये होंगे उन्हें रेंज हाथ पकड़ा जा सकता था

राघव की बात सुन कर अचानक रमण के दिमाग मैं कुछ आया और वो वहा से उठकर कही जाने लगा

राघव-अरे अचानक कहा चले

रमण- एक काम याद आ गया बस वही पूरा करने

राघव-रुको भाई अकेले मत जाओ मैं भी साथ मैं चलता हु

रमण-तुम क्या करोगे मेरे साथ मै यु गया और आया

राघव-मैं जनता हु भाई तुम किस काम के लिए जा रहे हो मैं तुम्हारे दिमाग मैं झक सकता हु इसीलिए मैं तुम्हारे साथ चलूँगा और अब पहले पुलिस स्टेशन चलो और अपनी टीम को साथ लो क्युकी आगे क्या खतरा आने वाला है हम नहीं जानते

रमण को भी राघव की बात सही लगी और वो उसे साथ लेकर पुलिस स्टेशन की तरफ निकल गया...

रमण राघव पुलिस स्टेशन मैं पहुचे...

संतोष अब भी स्टेशन मैं ही था जैसा उसे रमण से कहा था, राघव ने संतोष को देखते ही सबसे पहले उसकी आँखों के जरिये उसके दिमाग मैं झाकने की कोशिश की मगर संतोष पता नहीं क्यों उससे नजरे नहीं मिला रहा था, राघव को कुछ खटका पर अभी उसने इस बात पर धयन नहीं दिया, रमण ने चन्दन और ३ हवलदारो को अपने साथ लिया और उन्हें साडी बात समझाई

संतोष-सर क्या मैं आपके साथ चल सकता हु

रमण-क्या??लेकिन अभी अभी ट्यूम मौत के मुह से बचकर इतनी मुश्किल से आये हो फिर वापिस क्यों जाना चाहते हो

संतोष-उन्होंने मेरे सबसे आचे दोस्त को मारा है इंस्पेक्टर , मुझे उम्मीद है की आप समझोगे मेरी बात

रमण(कुछ सोचकर)-हां, ठीक है तुम आ सकते हो लेकिन ध्यान रहे की हमको सही मौका मिलने तक छिप कर रहना है ये लोग काफी खतरनाक है

संतोष- मैं समझ गया

अँधेरा हो चूका था रमण राघव संतोष और अपनी टीम के साथ उस कब्रिस्तान वाली जगह पर पहुच गया और वो लोग वह छिप कर बैठ गए, इस वक़्त कब्रिस्तान मैं चाँद की रौशनी फैली हुयी थी और वह केवल एक कालसैनिक था, रमण ने आगे बढ़ कर उसके पकड़ना चाह पर राघव ने उसे वही कुछ देर रुक कर इंतजार करने कहा,

कुछ ही देर मैं वहा एक काले रंग की बडी सी वैन आकर रुकि और उसमे से काले चोगे और नकाब वाले कुछ लोग उतरे, वो लोग आपस मैं कुछ बात कर रहे थे और चुकी रमण और बाकि सब पास ही छिपे हुए थे वो उनकी आवाज़ इन लोगो तक पहुच रही थी

व्यक्ति१- मुझे लगता है उन्होंने यहाँ तक हमारा पीछा किया है

व्यक्ति२-तो तयार रहो याद है न पिछली बार क्या हुआ था?

व्यक्ति३- वह देखो वे जानते है की हम यहाँ पर है

ये लोग किस बारे मैं बात कर रहे थे ये रमण और बाकि सबको समझ नहीं आ रहा था लेकिन रमण इतना समझ गया था की इन लोगो को अब तक संतोष के गायब होने का पता नहीं चला है तभी उन्होंने देखा के वहा पर एक सफ़ेद रंग की वैन आकर उस काली वैन के आगे रुकी जिसमे से कुछ लोग उतरे जिनका पहनावा कालसैनिको की तरह था बस कपडे का रंग काले की बजाय नीला था

संतोष(धीमी आवाज मैं)- इनके भी ग्रुप्स है क्या

रमण-मैं भी स्तिथि को समझने का प्रयास कर रहा हु श्श्श...

लगता है कुछ बोल रहे है

काले और नीले चोगे वाले आमने सामने थे

व्यक्ति१(नीले चोगे वाला)- लगता है आपने कुर्बानी का इंतजाम कर लिया है, उसे हारे हवाले कीजिये और अपने प्राण बचाइए

ब्यक्ति२(काला)- पिछले २ लोगो को ढूंढने मैं काफी समय लगा है और इसमें हम एक आदमी भी मारा गया है तो बेहतर होगा तुम कुर्बानी भूल जाओ और यहाँ से चलते बनो

व्यक्ति१(नीला)- लगता है तुम ब्लैक हुड वालो को विनम्रता रास नहीं आती तो हमें दूसरा तरीका अपनाना होगा

वहा मौजूद काले और नीले चोगे वाले लोगो ने अपनी बंदूके निकाल की, रमण समझ गया की अगर उन्होंने बीच मैं दखल नहीं दी तो यहाँ भीषण रक्तपात हो जायेगा वो तुरन अपने साथियों को लेकर उन लोगो के सामने पहुच गया जबकि राघव और संतोष अब भी छिपे हुए थे

रमण- freeze everyone freeze और अपनी अपनी बंदूके निचे गिरा दो

वो लोग इस घटना से आश्चर्यचकित जरूर हुए लेकिन तुरंत ही अपने बीच का झगडा भूल कर उन्होने अपनी बंदूके पुलिस की और तान दी और फायर करने लगे, पुलिस ने भी जवाबी हमला किया जिसमे दो पुलिस वाले घायल भी हुए वही रमण ने अपने अचूक निशाने का प्रदर्शन करते हुए कई कालसैनिको की खोपड़ी उदा दी,

अचानक हुए इस हमले से वो लोग घबरा गए और अपनी बंदूके छोड़ कर भागने लगे तभी वहा एक अदभुत घटना घटी

एक काले चोगे वाला कालसैनिक पीछे मुडा और उसने अपना हाथ एक विशेष मुद्रा मैं हवा मैं घुमाया जिसके साथ ही रमण की बन्दूक भी उसके हाथो से छूटती चली गयी, ये देख कर रमण हैरान रह गया उसे समझ नहीं आया की कैसे इस व्यक्ति ने हवा मैं हाथ घुमा कर उसकी बन्दूक उसके हाथ से छुटा दी लेकिन उसे इस बारे मैं ज्यादा सोचने का मौका नहीं मिला क्युकी वो कालसैनिक बेतहाशा भगा जा रहा था

रमण से छलांग लगा कर उसे पकड़ लिया लेकिन उस कालसैनिक मैं बहुत शक्ति थी और रमण का उसे पकडे रखना मुश्किल ताल तभी राघव और संतोष उसकी मदद को वहा आये और संतोष ने एक पत्थर का प्रहार इस कालसैनिक के सर परे किया जिससे उसकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा और रही सही कसार रमण और राघव के मुक्को ने पूरी कर दी पर इस चक्कर मैं बाकि लोग वहा से भाग गए थे

रमण ने हाँफते हुए संतोष की तरफ देखा

रमण-मदद के लिए शुक्रिया

सभी लोग उस बेहोश कालसैनिक के पास जमा हो गए थे

रमण-राघव इसका नकाब हटाओ मुझे इसका चेहरा देखना है

जैसे ही राघव ने उस कालसैनिक का नकाब हटाया तो संतोष बुरी तरह चौका

संतोष- विक्रांत....!

भाग १२​

संतोष- विक्रांत...!

रमण-तुम जानते हो इसे?

संतोष- ये..ये हमारा दोस्त विक्रांत है सर यही तो हमसे यहाँ मिलने आने वाला था पर...

संतोष दुविधा मैं था, उसे समझ नहीं आ रहा था के विक्रांत ऐसा क्यों करेगा, रमण भी संतोष के मुह से विक्रांत के बारे मैं सुन कर कुछ सोच रहा था और राघव जो हो रहा है उसे समझने की कोशिश कर रहा था उसे फिलहाल इस बात से कोई मतलब नहीं था के ये विक्रांत है या कोई और वो तो बस कुछ समय पहले किये विक्रांत के हाथ हवा मैं हिलाकर बन्दूक गिराने वाले कारनामे के बारे मैं सोच रहा था

विक्रांत के मुह पर पानी फैंककर उसे होश मैं लाया गया, उसके हाथो मैं पहले की हथकडिया लगायी जा चुकी थी ताकि वो भागने की कोशिश न कर सके, विक्रांत होश मैं आते ही जोर जोर से हसने लगा, इस वक़्त वह कोई इंसान नहीं बल्कि पिशाच लग रहा था

संतोष(गुस्से मैं)- तुमने ऐसा क्यों किया विक्रांत? क्यों अपने ही दोस्त की जान ले ली तुमने और तुम्हारे लोगो ने?

विक्रांत- हा हा हा, हाँ मार डाला मैंने उसे, उस कमीने का चक्कर था मेरी बीवी के साथ इसीलिए मैंने मार डाला उसे!

संतोष- तुम्हे कैसे पता, ये...ये तो बहुत समय पहले की बात है

विक्रांत- उसका मेरी बीवी के साथ अफेयर था संतोष ऐसी बात मैं कभी नहीं भूल सकता, मैं नंदिनी के साथ सेटल तो हो गया लेकिन रोहित और उसकी पस्त रिलेशनशिप की सच्चाई जानने के बाद मेरा दिल बुरी तरह से टूट चूका था, मैं डिप्रेशन मैं चला गया था, मैं एक मनोचिकित्सक के पास जाने लगा, जब उसे मेरी स्तिथि का पता चला तब उसने मुझे कुछ लोगो से मिलवाया, वो मनोचिकित्सक खुद कालसेना का सदस्य था, कालसेना से साथ जुड़ने के बाद मुझे पता चला की जिस दुनिया मैं हम रह रहे है वो कितनी खोकली है, कितनी मतलबी है कितनी नकली है और कितना नकली है इसे बनाने वाला भगवान! इसीलिए मैंने अपने लिए नया भगवान ढूंढ लिया जो मुझे वाकई मैं समझता है जो वाकई हमारे पास है और कैद है समुद्रतल की गहराइयों मैं लेकिन एक बाधा थी, हम लोगो को कुछ कुर्बानिया देनी थी ताकि कालदूत हमारा देवता समुद्रतल से बहार आ सके इसलिए हमने निशाना बनाया धर्मगुरूओ, मौलवियों और धार्मिक कार्य मैं संलग्न और लोगो को, ऐसा हमने ये देखने के लिए किया की उनको बचने उनका भगवन आता है या नहीं लेकिन कोई नहीं आया, हा हा हा...

हमने उनको रोहित की तरह ही लोहे की जंजीर मैं बांधकर जला दिया लेकिन कोई नहीं आया, रोहित से बदला लेना और कुर्बानी के रिवाज को पूरा करने का परफेक्ट प्लान था मेरे पास, इसीलिए मैंने नंदिनी को बगैर बाते तुम दोनों को यहाँ बुलाया ताकि मैं रोहित को अपने हाथो से मर्टने का आनंद ले सकू और कसम से बता रहा हु संतोष उस कमीने की चीखे सुनकर आग के द्वारा उसके पिघले मांस को देखकर, उसकी छटपटाहट देखकर जो सुकून मिला वो किसी और चीज़ मैं नहीं, तुम तो बेकार ही रस्ते मैं आ गए तुमसे मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी लेकिन एक और कुर्बानी ढूंढने मैं समय लग जाता इसीलिए तुमको भी स्वः करने की योगना बनानी पड़ी, आज रोहित की कुर्बानी के साथ ही हमने अलग अलग जगहों पर कई कुर्बानिय दी है और बस बस १ कुर्बानि शेष है जो कि आने वाली पुरनमासी की रात को दी जाएगी और हमारे देवता आजाद होंगे, हा हा हा.

तुम और तुम्हारे लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त है जो एक काल्पनिक देवता को पूजते है और उसके नाम पर क़त्ल करते है, इंस्पेक्टर प्लीज इसे यहाँ से ले जाइये न जाने मैं क्या कर दूंगा

रमण-ठीक है पर क्या तुम ठीक हो, खुद को संभल लोगे

संतोष-हम्म

रमण विक्रांत को अपने साथ ले अपनी जीप मैं ले गया साथ मैं वो घायल पुलिस वाले भी थे और एक हवलदार को उसने संतोष को होटल पहुचांने कहा

जिस केस ने रमण को बुरी तरह उलझा रखा था वो केस अब उसके सामने स्पष्ट था, विक्रांत ने बगैर किसी जोर जबरदस्ती के रमण के आगे सब बक दिया था की कैसे इन लोगो ने कई लोगो का अपहरण करके उन्हें जला कर मार दिया था और साथ ही उसने कालसेना के बारे मैं भी कई साडी बाते बताई थी

रमण ने विक्रांत को पुलिस स्टेशन मैं लॉकअप मैं बंद कर दिया और राघव के साथ घर की और निकला, राघव जब से कब्रिस्तान से निकला था तब से चुप चाप था और अब भी जब गाड़ी मैं सिर्फ वो दोनों भाई थे तब भी राघव एकदम चुप था

रमण- राघव क्या हुआ इतने चुप क्यों हो अब तो एक आरोपी पकड़ा गया था जल्द ही इससे और भी जानकारी मिलेंगी, क्या सोच रहे हो

राघव-आप जितना सोच रहे हो ये सब उतना आसान नहीं है भैया, आपसे उस आदमी की बाते नहीं सुनी थी की अब केवल एक कुर्बानी शेष है मैं ये सोच रहा हु की यदि कोई कालदूत सच मैं है और अगर आपने संतोष को बचाया न होता और ये आखरी कुरबानु पूरी हो जाती तो क्या होता

रमण- तुम उसकी बातो पर विश्वास तो नहीं कर रहे?

राघव- विश्वास न करने का एक कारण बताइए, मैंने पछले २४ घंटो मैं बहुत अकल्पनीय चीज़े देखि है भाई और इसका सीधा उदहारण है मेरा घर पर आपका दिमाग पढ़ पाना, आपने कब्रिस्तान मैं उस आदमी ने क्या किया था देखा नहीं था, कैसे उसने बस अपने हाथो के इशारे से आपकी गन गिरा दी थी

अब रमण चुप था, विक्रांत को पकड़ने की जो ख़ुशी उसके मन मैं थी उसे राघव ने एक पल मैं मिटा दिया था

रमण- उस कारनामे

से तो मैं भी चौक गया था

राघव-वो तेलेकिनेसिस जनता है भाई मैंने उसकी मानसिक तरंगो को महसूस किया है जो काफी प्रबल है और मेरा मन कहता है के इसके जैसे और भी होंगे

रमण-कहा मैं सोच रहा था की ये केस मैं जल्द से जल्द ख़तम कर दूंगा पर तुम्हारी बातो ने मुझे डरा दिया है

राघव- अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है भाई हम विक्रांत से और भी बहुत साडी बाते जान सकते है बस मुझे उसके दिमाग मैं झाकने की देर है

रमण-तो तुमने ये अभी क्यों नहीं किया

राघव-क्युकी मैं कुछ और सोच रहा हु

रमण-क्या?

राघव-भाई हमारे पास एक महीने का समय है क्युकी जैसा विक्रांत ने बताया अगर वो बात सही है तो आज पुरनमासी की रात है और अगली पुरनमासी को अंतिम कुर्बानी होगी अगर हम किसी तरह ये पता लगा ले की वो अंतिम कुर्बानी किसकी होगी तो हम उस इंसान को बचा सकते है और उसके जरिये इस कालसेना के मुखिया तक भी पहुच सकते है

रमण- पर ये लोग किसीकी भी बलि दे सकते है उस इंसान का पता कैसे लगाये

राघव-किसी की भी नहीं भाई ये लोग जिनकी कुर्बानी देनी होती है उन्हें चुनते है जैसे विक्रांत ने कहा था की धर्मगुरु, और धार्मिक कार्य से जुड़े लोग

रमण- पर अब राजनगर मैं ऐसा कौन है?

राघव-वही तो पता लगाना है कल सुबह विक्रांत से मिल कर आगे क्या करना है देखते है

दोनों बात करते हुए घर पहुच चुके थे वही दूसरी तरफ संतोष अपने होटल पहुच चूका था और ईस्वक्त वो अपने रूम मैं बैठ कुछ सोच रहा था तभी उसका फ़ोन बजा

संतोष- हा काम हो गया है! ब्लैक हुड के एक सदस्य को पुलिस ने पकड़ लिया है...नहीं किसी को मुझपर कोई शक नहीं हुआ लेकिन इस पुरे नाटक मैं मैं मरते मरते बचा हु, अगर वो इंस्पेक्टर सही समय पर नहीं आता तो ये ब्लैक हुड वाले मेरी जान ले लेते लेकिन कोई बात नहीं, हमारे महान उद्देश्य के लिए अगर मेरी जान भी चली जातो तो मुझे कोई अफ़सोस नहीं होता, जय कालसेना, जय कालदूत!

संतोष के चेहरे के भाव बदल चुके थे और अब उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी....

भाग १३​

अगली सुबह रमण जल्दी पुलिस स्टेशन के लिए निकल गया वो विक्रांत से मिल कर जल्द से जल्द उसके मुह से कालसेना के ठिकाने का पता लगाना चाहता था, साथ ही उसके दिमाग मैं संतोष की बताई बाते भी थी, कल संतोष ने उन्हें बताया था के उसके और रोहित के हाथो से एक आदमी का खून हुआ था, रमण ने संतोष से इस घटना की पूरी जानकारी ली और एक सर्च टीम भी उस लाश की तलाश मैं लगायी थी और पुलिस को उस 7 फूट के इंसान की लाश भी मिल गयी थी

विक्रांत को इस वक़्त एक अँधेरे लॉकअप मैं बंद किया हुआ था, उस कमरे मैं केवल एक बल्ब की मधिम रोशनी थी और वो मद्धिम रौशनी उस पुरे कमरे के लिए काफी नहीं थी, रमण और विक्रांत एक दुसरे के सामने लकड़ी की खुर्ची पर बैठे हुए थे, विक्रांत के चेहरे पर पिछली लादे के कारन कई चोटों के निशान थे और उसके हाथो मैं हथकड़ी लगी हुयी थी, उस लॉकअप मैं मौत जैसा सन्नाटा था जिसे रमण की आवाज ने भंग किया

रमण- मैंने हर एक पुलिस वाले तुम्हरू सेल से दूर रहने को कहा है ताकि मैं तुमसे अकेले मैं कुछ पूछताछ कर सकू

विक्रांत- क्या जानना चाहते हो इंस्पेक्टर जो तुम्हे बताना था मैं बता चूका हु इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बताऊंगा, काफी हिम्मत मैं तुममे तुम भी मेरी तरह कालदूत की भक्ति करो ताकतवर भक्तो की वे कदर करते है

रमण-अपनी बकवास बंद करो और मुझे अपने मुखिया के अड्डे का पता बता दो

विक्रांत(कुटिल मुस्कराहट के साथ)- तुम उसे कभी ढूंढ नहीं पाओगे, एक आखरी कुर्बानी और कालदूत को स्वतंत्र करा देंगे हम लोग

रमण-तुम अंधविश्वासी लोगो से तंग आ गया हु मैं, तुम लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त हो

विक्रांत-यानि की तुम्हे लगता है कालदूत सिर्फ एक मिथ्या रचना है? काश मेरे हाथ इस वक़्त खुले होते तो मैं तुम्हे बताता, telekinesis करके तुम्हारी खोपड़ी खोल देता

रमण-मुझे यकीन है की ये जो telekinesis तुम लोग करते हो इसके पीछे भी अवश्य कोई वैज्ञानिक कारण होगा,

विक्रांत-गलत इंस्पेक्टर, हमारे देवता ने हमें ये शक्तिया दी है

रमण-यानि कालदूत ने? वो इतना ही शक्तिशाली है तो अपनी कैद से खुद आजाद क्यों नहीं हो जाता? उसे तुम लोगो की जरुरत क्यों है?

विक्रांत-चाहे कोई भी आराध्य देव हो, उसे अपने भक्तो की शक्ति की जरुरत होती है जैसे तुम्हारे इश्वर को तुम्हारी भक्ति की अवशकता है वैसे ही हमारे इश्वर को हमारी भक्ति की अवशकता है, कालदूत तुम्हारे देवताओ के शाराप के कारन युगों युगांतर से समुद्रतल की गहराइयों मैं कैद है, उनको आत्माओ की शक्त चाहिए जिससे वो अपने बन्धनों से आजाद हो सके, बस एक इंसानी रूह और हमारा देवता समुद्रतल से धरातल पर आ जायेगा, हमारी १००० वर्षो की तपस्या रंग लाएगी

रमण- बस बहुत हुआ मैं तुम्हारी बकवास और नहीं सुनूंगा, तुम्हारा तथाकथित भगवान आजाद होगा या नहीं मैं नहीं जनता पर इतना

जरूर जनता हु की तुम अब इस चारदीवारी से कभी बहार की दुनिया नहीं देख पाओगे,

रमण बहार आकर अपने केबिन मैं बैठा हुआ था, विक्रांत की बातो ने उसके दिमाग को विचलित किया हुआ था,

वही घर पर राघव इस समय ध्यान लगाये बैठा था और कल से उसने जितनी भी बाते उसने कालसेना और कालदूत के बारे मैं देखि और सुनी थी उन सबका आकलन अपने दिमाग मैं कर रहा था

राघव के दादाजी की उस सिद्ध माला का असर इतना जबरदस्त था की जिसे पहनते ही राघव की सुनने की क्षमता बढ़ गयी थी वो अगर पूर्ण एकाग्र होकर किसी आवाज पर धयान लगाये तो करीब १ किलोमीटर तक की आवाज सुन सकता था और अपनी इस काबिलियत का पता उसे कल शाम ही चला था जब उन्होंने विक्रांत को पकड़ा था तब राघव को कुछ लोगो की अस्पष्ट आवाजे आये थी जो जंगल मैं किसी ठिकाने की बात कर रहे थे, राघव ने जब आजू बाजु मैं नजर दौडाई तो उसे वहा कोई नहीं दिखा और फिर विक्रांत की बातो ने उसका ध्यान अपनी और खीचा था, इस वक़्त राघव अपना मस्तिष्क एकाग्र करके उन्ही आवाजो को स्पष्ट करने की कोशिश कर रहा था पर उसका कोई खास फायदा नहीं हो रहा था आखिर मैं उसे उन आवाजो से जो इन्फो मिली थी उसी के सहारे उसने आगे जाने का सोचा, राघव ने अपना ध्यान समाप्त किया और बगैर किसी को बताये घर से निकल गया, कहा जाना है वो नहीं जनता था बस उन अनजान आवाजो से उसे एक ठिकाने का पता चला था और राघव उसी की खोज मैं निकला....

राघव ने अपनी खोज की शुरुवात कल की घटना वाली जगह से करने की सोच और वो जंगल मैं उस पुराने कब्रिस्तान मैं पहुच गया पर कल ही तरह उसे आज भी वहा कुछ नहीं मिला तभी उसे कुछ दुरी पर कदमो की हलकी हलकी आवाजे सुने दी और राघव ने उनका पीछा किया, वो कदमो की आवाजे उसे जंगल के दूसरी तरफ वाले बहरी इलाके की और ले आयी,

जंगल के बहार वीरान इकले मैं एक दो मंजिला इमारत बनी हुयी थी और इस दो मंजिला ईमारत मैं कुछ हलचल हो रही थी, उस इमारत की सुरक्षा के लिए कुछ १०-१२ लोग हाथ मैं बन्दूक लिए बहार तैनात खड़े थे राघव कुछ समझ नहीं पा रहा था, उसने कभी सपने मैं भी नहीं सोचा था की उसके शहर के बहार उसे ऐसा कुछ देखने मिलेगा, राघव ने अब अपनी दूर का सुनने की काबिलियत का इस्तमाल करने का सोचा और वही छिप कर उस इमारत से आती आवाजो पर ध्यान केन्द्रित किया,

उस इमारत के उपरी हिस्से मैं एक बहुत ही आलिशान शयनकक्ष बना हुआ था वहा बिस्तर पर एक व्यक्ति चिंता की मुद्रा मैं बैठा हुआ था, लगभग ३५ की उम्र और बलिष्ट शारीर वाला वो व्यक्ति जिसकी दाढ़ी उसकी छाती तक आ रही थी, चेहरा दाढ़ी से ढका हुआ लेकिन बहुत प्रभावशाली था, जीन्स और ढीली ढली बनियान पहने वो व्यक्ति ठोड़ी पर हाथ रखकर किसी गहन चिंतन मैं डूबा हुआ था, घडी की टिक टिक उस शांत कमरे की शांति को भंग कर रही थी तभी उस कमरे मैं एक खबसूरत महिला आई और व्यक्ति की तन्द्रा को उसके कंधे पर हाथ रखकर भंग कर दिया.....

To be continue......

भाग १४​

राघव अपने ध्यान मैं उस इमारत की आवाजे सुनने की कोशिश कर रहा था, उसे इस जगह पर ये इमारत और ये लोग देख के अचंभा भा था क्युकी उसने नहीं सोचा था की शहर के इस इलाके या यु अकाहे की जंगल की तरफ कोई रह सकता है वो जानना चाहता था की ये लोग कौन है पर उसे क्या पता था की जिन लोगो की तलाश मैं वो निकला है किस्मत उसे वही ले आई है

उस इमारत के उपरी हिस्से मैं एक बहुत ही आलिशान शयनकक्ष बना हुआ था वहा बिस्तर पर एक व्यक्ति चिंता की मुद्रा मैं बैठा हुआ था, लगभग ३५ की उम्र और बलिष्ट शारीर वाला वो व्यक्ति जिसकी दाढ़ी उसकी छाती तक आ रही थी, चेहरा दाढ़ी से ढका हुआ लेकिन बहुत प्रभावशाली था, जीन्स और ढीली ढली बनियान पहने वो व्यक्ति ठोड़ी पर हाथ रखकर किसी गहन चिंतन मैं डूबा हुआ था, घडी की टिक टिक उस शांत कमरे की शांति को भंग कर रही थी तभी उस कमरे मैं एक खबसूरत महिला आई और व्यक्ति की तन्द्रा को उसके कंधे पर हाथ रखकर भंग कर दिया.

सारा-क्या कल की घटना को लेकर अभी तक चिंतित हो?

सुशेन-कल हमारे एक आदमी को पुलिस ने पकड़ लिया

सारा-चिंता मत करो विक्रांत अपना मुह कभी नहीं खोलेगा

सुशेन- मुझे उसकी चिंता नहीं है, मैं जनता हु विक्रांत अपना मुह नहीं खोलेगा मुझेतो एक बात समझ मैं नहीं आ रही है की ये ब्लू हुड वालो को कैसे पता चला की हम उस जगह अंतिम कुर्बानी देने वाले थे?

सारा-हा, पूरा प्लान एकदम सही था, कल के दिन हमने इतनी साडी कुर्बानिय दी और बस एक अंतिम कुर्बानी देनी बची थी लेकिन ब्लू हुड और पुलिस दोनों हमारी लोकेशन जान गए

सुशेन- हमारा एक आदमी अब इंस्पेक्टर रमण की गिरफ्त मैं है

सरह-ये रमण आजकल कुछ ज्यादा ही तंग कर रहा है तुम्हे हनी

सुशेन- इसका भी बंदोबस्त जल्द ही होगा सारा इसे भी भगवान कालदूत के काम मैं रोड़ा बनने की सजा मिलेगी

तभी एक २७ वर्ष का लड़का तेजी से दौड़ते हुए कमरे मैं आया,उसके चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही थी और उसका पूरा चेहरा पसीने से भरा हुआ था

सुशेन(गुस्से से )- क्या है सिद्धार्थ? क्या हुआ जो तुमने दरवाजा खटखटाना जरुरी नहीं समझा

सिद्धार्थ-क्षमा करे लेकिन बात ही कुछ ऐसी है की..

सुशेन-क्या बात है

सिद्धार्थ-हमारे ब्लैक हुड का एक कालसैनिक रमेश जंगल मैं मरा पड़ा मिला है, पुलिस ने लाश बरामद कर ली है

सारा(चौक कर)- क्या! पर उसे कौन मार सकता है?

सुशेन-सामान्य व्यक्ति के लिए रमेश को मारना बड़ा मुश्किल था क्युकी रमेश telekinesis का अच्छा ज्ञाता है

सारा-तो क्या ये ब्लू हुड का काम हो सकता है ?

सुशेन-इशारा तो इसी तरफ है हर चीज़ का, मुझे अपने छोटे भाई से बात करनी होगी

सारा-तुम्हारा भाई शक्ति आखिर ऐसा कर क्यों रहा है? कालदूत की पूजा तो हम सबको मिलकर करनी चाहिए चाहे वो ब्लैक हुड हो या ब्लू हुड, कालदूत हम सबके आराध्य देव है

सुशेन (गहरी सास लेकर)- जैसा की तुम्हे पता है की कालसेना के मुखिया की मृतु होने पर मुखिया के पद के लिए कालसेना के सबसे काबिल सदस्यों के बीच जंग होती है, ये पद हमेशा से मेरे परिवार के पास रहा है क्युकी तंत्र, मंत्र और telekinesis मैं हमसे अच्छा ज्ञाता कोई नहीं है, जब पिताजी की मृतु हुयी तब मैंने भी हर शक्तिशाली कालसैनिक से लड़ कर ये पद जीता है लेकिन मुझे बराबर की चुनौती अगर किसी से मिली तो मेरे खुद भाई से, शक्ति से....लेकिन जब काफी समय तक लड़ते रहने के बाद भी हमारे बीच कोई हल नहीं निकला तो पूरी कालसेना के बीच मतदान कराया गया, उसमे भी ७५% लोगो ने मुझे ही अपना मुखिया चुना लेकिन शक्ति को ये गवारा नहीं हुआ और वो अपने २५% समर्थक लेकर कालसेना से अलग हो गया और तबसे ये कालसेना दो भागो मैं बट गयी...

ब्लैक हुड और ब्लू हुड

सारा- एक मिनट! मुझे तो लगा था के ब्लू हुड और ब्लैक हुड को उगम एक साथ हुआ है

सुशेन-नहीं सारा! ब्लैक हुड जो की मुख्या रूप से कालसेना कहा जाता है उसकी स्थापना मेरे महँ पूर्वज बिरजू नाम के एक नाविक ने १००० साल पहले की थी जबकि बलुद हुड अभी ६ साल पहले बना है जिसे मेरे भाई शक्ति ने बनाया है, तुम ये सब बाते नहीं जानती क्युकी तब तुम हमारे साथ नहीं थी बाद मैं आई हो

सिद्धार्थ-तो...आपको लगता है के रमेश को बलौर हुड के लोगो ने मारा है?

सुशेन-मुझे शक्ति से इस बारे मैं बात करनी होगी तभी मैं कुछ कह पाउँगा मुझे उससे मिलना होगा

सारा-पर तुम अकेले नहीं जाओगे सिद्धार्थ भी तुम्हारे साथ जायेगा

सुशेन- ठीक है उसके पहले सिद्धार्थ तुम ब्लू हुड से संपर्क करो और उन्हें मिलने की जगह बताओ

सिद्धार्थ- ठीक है

उसके बाद सिद्धार्थ ने ब्लू हुड के लोगो से फ़ोन पर बात की और उन्हें सुशेन की बताई जगह पर मिलने बुलाया,

राघव जो उस इमारत से कुछ दुरी पर बैठा था उसने अपनी शक्ति के इस्तमाल से ये सारी बाते सुनी थी, राघव ने अनजाने मैं ही कालसेना के मुखिया का पता लगा लिया था साथ ही उसे ये भी पता चल गया था की १००० वर्षो पुराणी इस कालसेना मैं फूट गिरी है, इसके लोग आपस मैं ही एकदूसरे को पसंद नहीं करते और इसका उदहारण भी वो पिछली रात को देख चूका था जब भैक और बलुद हुड के लोगो ने एकदूसरे पर बन्दूक तानी हुयी थी,

अब राघव ने वहा से न हटने की ठान ली वो अब इस कालसेना को पूरी तरह से जानना चाहता था इनकी शक्तियों के बारे मैं पता लगाना चाहता था, कुछ समय बाद राघव को उस घर मैं कुछ हलचल होती दिखी वहा उस घर के बहार कुछ काले रंग की कार आकर खडी हुयी और उसमे एक कालसैनिक कुछ सामान रखने लगा जिसके बाद वो अंदर चला गया, इस वक़्त घर के बहार पहरा देने केवल एक आदमी खड़ा था और वो हर दिशा मैं घूम कर निगरानी कर रहा था, बाकि सब लोगो अंदर बुलाया गया था, अंदर कोई मीटिंग चल रही थी

राघव ने इसी बात का फायदा उठाया और बगैर किसी की नजर मैं आये cctv कैमरे से बचते हुए वो एक कार की डिक्की मैं जाकर छिप गया, कुछ समय बाद कुछ कालसैनिक आकर उस गाड़ी मैं बैठे और मीटिंग वाली जगह की और निकल गए.....

भाग १५​

सुशेन सिद्धार्ट को साथ लेकर अपनी कार से अपने भाई शक्ति से मिलने निकल गया

सिद्धार्थ- सर क्या आपको सचमे लगता है के रमेश को मारने मैं ब्लू हुड वालो का हाथ है

सुशेन- कभी कभी जो हम सोचते है वो सही नहीं होता सिद्धार्थ, मैं ये नहीं कहता की मेरा भाई ऐसा नहीं कर सकता मगर मेरी चिंता का विषय शक्ति नहीं है, जितना मैं मेरे भाई को जानता हु उस हिसाब से शक्ति ने अगर रमेश को मारा होता तो वो ये काम छिपकर नहीं करता बल्कि बता कर करता, शक्ति कायर नहीं,

सिद्धार्थ-तो आपके हिसाब से ये काम ब्लू हुड का नहीं है

सुशेन-हम सिर्फ चीजों का अनुमान लगा सकते है सिद्धार्थ और मेरा यकीं करो अगर रमेश की हत्या मैं कही भी ब्लू हुड शामिल रहा तो मैं शक्ति समेत सरे ब्लू हुड को ख़तम कर दूंगा, पर फिलहाल मुझे एक और बात ने परेशां किया हुआ है

सिद्धार्थ-किस बात ने?

सुशेन-बात ऐसी है की सिर्फ रमेश ही नहीं मरा है और भी कई लोग मरे है..

सिद्धार्थ- क्या?कौन? कैसे?

सुशेन- ये कालसेना काफी बडी है सिद्धार्थ, हमारे लोग साडी दुनिया मैं मौजूद है और कालदूत की भक्ति करते है, कालसेना के मुखिया को एक शक्ति विरासत मैं मिलती है....चुकी अभी मैं इस कालसेना का मुखिया हु तो हर कालसैनिक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मेरी मानसिक तरंगो से जुडा हुआ है और मेरे जरिये भगवन कालदूत से फिर वो चाहे ब्लैक हुड हो या ब्लू हुड, कालदूत हमें इसी माध्यम से शक्तिया प्रदान करते है, पिछले कुछ दिनों मैं मैंने अपनी इन मानसिक तरंगो मैं थोड़ी कमी महसूस की है, जब मैंने इसकी छानबीन की तोमैने पाया की हमारे कई कालसैनिक दुनिया के अलग अलग कोनो मैं मरे पाए गए है, पिछले कुछ दिनों मैं हमने जितनी भी बलिया दी है उससे कई ज्यादा अपने लोगो को खोया है, कोई तो है जो सालो से छिपी हमारी कालसेना से बारे मैं जानता है और हमपर पीछे से वार कर रहा है ताकि हमें कमजोर कर सके और उसका यु छिपा होना ही मेरे लिए सबसे बडी चिंता का विषय है....

सिद्धार्थ-ये तो काफी गंभीर बात है

सुशेन-इसीलिए मैं शक्ति से मिलना चाहता हु ताकि आपसी मतभेद मिटा कर कालसेना को और भी मजबूत कर सकू.....

डिक्की मैं छुपा राघव सुशेन और सिद्धार्थ की बाते सुन रहा था, उसे सुशेन की बाते सुन कर आश्चर्य और ख़ुशी हो रही थी...आश्चर्य इस बात का की जहा उसे कालसेना और कालदूत के बारे मैं कुछ ही दिन पहले पता चला था वही इस दुनिया मैं कोई ऐसा था जो स कालसेना से मुकाबला कर रहा था और उसके लोगो को मार भी रहा था और ख़ुशी इस बात की की इस लडाई मैं वो अकेला नहीं था, उसके दादाजी की लिखी बात उसे याद आ गयी की इस लडाई मैं उसे और भी लोगो की जरुरत होगी और शायद ये वही लोग थे जिनके बारे मैं सुशेन बात कर रहा था.....

कुछ समय बाद....

शहर के बाहर एक सुनसान इलाके मैं सन्नाटे को चीरती हुयी सफ़ेद रंग और काले रंग की गाडिया आमने सामने जा खड़ी हुई, काले रंग की गाड़ी से सुशेन और सिद्धार्थ निकले और सफ़ेद रंग की गाड़ी से शक्ति जो की सिद्धार्थ की ही उम्र का था, बाहर आया, राघव अब भी गाड़ी की डिक्की मैं छिपा हुआ था, वो सुन सब सकता था पर किसी को देख नहीं सकता था,

शक्ति- बहुत दिनों बाद मिले बड़े भाई

सुशेन-तुमने ऐसा क्यों किया शक्ति? तुमने रमेश को क्यों मारा?

शक्ति(हतप्रभ होकर)- क्या? मैंने किसी को नहीं मारा!

सुशेन(क्रोध मैं)- बहुत हुआ! पहले तुम्हारे लोगो ने कब्रिस्तान मैं आखरी कुर्बानी होने नहीं दी फिर तुम्हारी वजह से मेरा एक आदमी विक्रांत पुलिस कस्टडी मैं है और अब ये क़त्ल!

शक्ति- क्या बकवास कर रहे हो भाई, तुम अच्छी तरह जानते हो शक्ति जो भी करता है डंके की चोट पर करता है ऐसे कायरो की तरह छिप कर वार नहीं करता और हा वो आखरी कुर्बानी जिसकी तुम बात कर रहे हो वो मेरा ही आदमी था...संतोष!

सुशेन-क्या?

सुशेन की तरह राघव भी इस बात से काफी हैरान हो गया था....

शक्ति-हा, दरअसल लगातार हो रहे अपहरणों और हत्याओ की वजह से पुलिस ने जगह जगह घेराबंदी कर राखी थी इसीलिए मैंने संतोष को अपने किसी जान पहचान वाले को कुर्बानी के लिए लाने कहा क्युकी उसकी मौत से इतना हल्ला भी नहीं मचता लेकिन मेरे कुछ करने से पहले ही तुम्हारे आदमी विक्रांत ने जाकर दोनों को पकड़ लिया, रोहित को तो उसने मार दिया लेकिन किस्मत से संतोष बच गया, हम कुछ करते इससे पहले ही उस इंस्पेक्टर ने उसे बचा लिया

सुशेन- पर तुमको कैसे पता चला की हमने रोहित और संतोष को कहा रखा है

शक्ति-विक्रांत की बीवी हमारे ब्लू हुड की मेम्बर है

सुशेन- या? मतलब तुम्हे नंदिनी के जरिये विक्रांत और हमारी सारी गुप्त खबरे मिलती थी

शक्ति- सारी तो नहीं लेकिन थोडा बहुत पता चल ही जाता था, जब विक्रांत का अचानक राजनगर आने का प्लान बना तभी नंदिनी ने हमको सतर्क कर दिया था, दरअसल विक्रांत और नंदिनी अपने आपसी रिश्ते के कारन बहुत परेशां थे और कई बार बात तलाक तक पहुच चुकी थी, जब तुमने विक्रांत को ब्लैक हुड मैं शमिल किया तभी मैंने नंदिनी को ब्लू हुड का सदस्य बनाया, इसके लिए मुझे ज्यादा म्हणत भी नहीं करनी पड़ी, नंदिनी जानती थी की विक्रांत ब्लैक हुड का मेम्बर है जबकि विक्रांत नंदिनी की सच्चाई के बारे मैं अनजान था, एक ही छत के निचे दो अलग अलग दलों के सदस्य रह रहे थे और जहा तक बात पुलिस की है तो तुम्हारा आदमी विक्रांत अपनी मुर्खता की वजह से पकड़ा गया है

सुशेन- लेकिन.....

सुशेन कुछ बोलता तभी अचानक शक्ति का फ़ोन बजा, उसने फ़ोन उठाया लेकिन कुछ सुनने के बाद एकदम हैरान रह गया

सुशेन-क्या हुआ?

शक्ति- मेरे दो लोगो को किसी ने एक पेड़ पर फासी से तांग दिया है

सुशेन-ये सब आखिर हो क्या रहा है? हम कालसेना है हमें मारने की हिम्मत किसमे आ गयी वो भी इतना चोरी छिपे और इतनी सफाई के साथ?

शक्ति-लोगो को मारते वक़्त कभी ये ख्याल आया ही नहीं की हम भी मारे जा सकते है, हमें लगने लगा था की कालदूत के भक्त होने के कारन हम अभेद्द है लेकिन अब इस बात पर मुझे संशय होने लगा है

सुशेन-किसी भी प्रकार के संशय मैं मत रहो छोटे भाई, कालदूत के भक्त भले ही संख्या मैं कम हो लेकिन सबसे शक्तिशाली थे और सबसे शक्तिशाली रहेंगे, हमारे दल के कुछ लोग मरे गए इसका ये अर्थ नहीं की पूरी कालसेना कमजोर है, ये जो कोई भी है इसे अपने किये की भरी कीमत चुकानी पड़ेगी, हमारे बिच मतभेद हो सकते है लेकिन किसी भी बाहरी समस्या से लड़ने के लिए हमें एकजुट हो जाना चाहिए

शक्ति-सही कहा तुमने भाई, आखरी कुर्बानी कोई भी दे बस कालदूत का जागना आवश्यक है, अभी मैं चलता हु कुछ होगा तो खबर कर दूंगा

सुशेन- ठीक है

शक्ति अपनी सफ़ेद गाडी मैं बैठकर निकल गया और सुशेन भी अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ा ही था की तभी अचानक उसके कानो को हवा मैं एक तेज सरसराहट की आवाज सुने दी, उसने देखा की एक तेज धार चाकू गाड़ी के पास खड़े असावधान सिद्धार्थ की ओर तेजी से बढ रहा है, सुशेन ने तुरंत अपना हाथ उठाया और telekinesis द्वारा उस चाकू को हवा मैं ही रोक दिया फिर सुशेन और सिद्धार्थ दौड़ कर उस दिशा मैं गए जहा से चाकू आया था पर वहा उन्हें कोई नहीं मिला जिसके बाद वो वापिस गाड़ी के पास आये

सुशेन-तुम ठीक हो न लड़के?

सिद्धार्थ-ज..जी,, ये चाकू मैं कुछ लगा है?

तब सुशेन का ध्यान गया की चाकू मैं एक छोटा कागज का टुकड़ा लगा हुआ है, उसने चाकू उठाकर कागज का टुकड़ा उसकी नोक से बाहर निकाला, उसपर लिखा था “दो घंटे मे हीरालाल रेस्टोरंट आ जाओ, जिसे तुम धुंध रहे हो वो मैं ही हु” ये पढ़ते ही सुशेन की आँखें क्रोध से लाल हो गयी

सिद्धार्थ-क्या हुआ?

सुशेन-उसकी इतनी हिम्मत? मेरे लोगो को मारकर मुझे ही रेस्टोरंट मैं बुलाता है

सिद्धार्थ-कौन है ये?

सुशेन-वही, ब्लैक और ब्लू हुड के लोगो का कातिल

सिद्धार्थ-मैं चलता हु आपके साथ

सुशेन-नहीं तुम वापस जाओ मैं अकेले जाऊंगा

सिद्धार्थ-लेकिन सर....

सुशेन-मैंने कहा न जाओ मुझे कुछ नहीं होगा, जाओ...

सिद्धार्थ चला गया और सुशेन गाड़ी लेकर हीरालाल रेस्टोरेंट की तरफ बढ़ गया और उसकी के साथ राघव भी......

भाग १६​

सुशेन ने सिद्धार्थ को रवाना कर दिया था और खुद गाडी लेकर हीरालाल रेस्टोरंट की और निकल गया और कुछ ही समय मैं वो हीरालाल रेस्टोरंट मैं था, सुशेन ने अपनी गाड़ी भीड़ भाड से दूर शांत जगह पार्क की और रेस्टोरंट मैं चला गया,

जब कुछ समय तक गाडी की कोई हलचल नहीं हुयी तो राघव ने बहार निकलने का सोचा, उसने डिक्की को हल्का सा खोलकर बाहर का जायजा लिया की कही कोई उसे देख तो नहीं रहा और जब वो पूर्ण निश्चिन्त हो गया तब वो डिक्की से निकलकर बहार आया, गाडी पहले ही भीडभाड से दूर कड़ी होने की वजह से राघव का काम आसान हो गया था और अब वो भी हीरालाल रेस्टोरंट की और जाने लगा तभी उसे उसका दोस्त सूरज वहा मिल गया

सूरज-ओए राघव

राघव-सु..सूरज तू...तू यहाँ क्या कर रहा है

सूरज-वही सवाल मुझे पूछना है, जब मैंने तुझे सुबह फ़ोन किया था तब तो तू बोल रहा था के तेरी तबियत ख़राब है और अब तू यहाँ रेस्टोरंट मैं जा रहा है, कोई लड़की वडकी पता ली क्या जो छिप कर उससे मिलने जा रहा था

राघव-अरे नहीं भाई वो...कुछ काम से आया था

सूरज-वो सब काम बादमे करियो पहले मेरे साथ चल मेरा काम ज्यादा जरुरी है

राघव-पर..भाई...वो...

सूरज-पर वर नहीं बैठ गाड़ी पे और चल

राघव ने सूरज को टालने की काफी कोशिश की लेकिन आखिर मैं उसे सूरज के साथ जाना पड़ा

वही दूसरी तरफ सुशेन रेस्टोरंट मैं पंहुचा वो वहा पहुचकर इधर उधर देख ही रतः था के तभी एक २०-२२ साल के लड़के ने उसकी तरफ देख्कर हाथ हिलाया, सुशेन उस तरफ गया, लड़का काला चश्मा लगाकर एक ब्राउन लंग का ब्लेजर और जीन्स पहनकर बैठा था, सुशेन को देखकर वो मुस्कुराता हुआ बोला “बडी ठण्ड है न राजनगर मैं, है न?

सुशेन को यकीन नहीं हो रहा था के इन हत्याओ के पीछे इस लड़के का हाथ हो सकता है, उसने पैनी नजरो से उसे देखते हुए पुचा “तो कालसैनिको को मारने के पीछे तुम्हारा हाथ है?”

वो लड़का बड़े हिउ निश्चिन्त भाव से बोला “हा, और हाथ नहीं उनको मारने के पीछे पूरा का पूरा मैं ही हु”

सुशेन अविश्वास से बोला “यकीन नहीं होता की एक बच्चा इतने काबिल लोगो को मार सकता है जो काले जादू और telekinesis मैं विशेषज्ञ थे”

लकड़ा फिर मुस्कुराता हुआ बोला..”दाढ़ी बढ़िया राखी है तुमने”

सुशेन को अब काफी गुस्सा आ रहा था लेकिन उस समय वहा रेस्टोरंट मैं काफी लोग थे इसीलिए सुशेन इस समय कुछ नहीं कर सकता था, उसने क्रोध से तमतमाते हुए पूछा “तुझे डर नहीं लग रहा लड़के?”

लड़के ने फिर बेफिक्री से कहा “मुझे भला क्यों डर लगेगा?”

सुशेन ने फिर अपनी मुट्ठी भींच ली थी, उसके क्रोध के कारण मेज पर रखे चाय के कप हिलने लगे थे, उसने उस लड़के को फाड़ कर खा जाने वाली नजरो से घूरते हुए जवाब दिया..

”पता नहीं तुम बहुत ज्यादा हिम्मत वाले हो या बहुत ही ज्यादा बेवकूफ जो मेरे ही लोगो को मारकर मुझे यहा मिलने का न्योता दिया, अब तू इओस धरती पर ज्यादा दिनों का मेहमान नहीं है, पूरी कालसेना तेरे पीछे पड़ जाएगी फिर चले वो ब्लैक हुड हो या ब्लू हुड”

उस लड़के की जगह अगर कोई और होता तो सुशेन का वो अवतार देख कर सूखे पत्ते की तरफ डर से कांपने लगता लेकिन उस लड़के पर कोई असर नहीं हो रहा था

उस लड़के से सुशेन से घूरते हुए पूछा “और मुझे मरोगे कैसे? अपने काले जादू या telekinesis से? क्युकी मुझपर दोनों ही असर नहीं करते, तुम कहो तो कोशिश करके देख लो”

सुशेन(आश्चर्य से)-तुम कौन हो??

लड़के ने जवाब दिया “मेरा नाम रूद्र है और इससे ज्यादा तुम्हे बस ये जानने की जरुरत है की तुम लोग अपने अंत के लिए तयार रहो, तुम कालसेना के लोगो का पाप का घड़ा भर गया है”

सुशेन-लेकिन क्यों? क्यों मार रहे हो तुम मेरे लोगो को?

रूद्र-हा हा हा, देखो पूछ भी कौन रहा है? उस सेना का मुखिया जो १००० वर्षो से हर तीन साल के भीतर १०० लोगो की बलि दे रहा है

सुशेन-ये...ये जानकारी तुझे कैसे मिली?

रूद्र-मैंने भी अपनी रिसर्च की है कालसेना पर, खैर जो मेरी समझ मैं नहीं आया वो ये के ऐसा क्या हुआ था १००० साल पहले जो इस कालसेना की स्थापना की गयी?

सुशेन-मैं तुमको कुछ भी नहीं बताने वाला

रूद्र-देखो तुम मुझपर यहा हमला तो वैसे भी नहीं करने वाले क्युकी ये एक सार्वजनिक जगह है और तुम लोगो की आदत है छिपकर वार करना और हमला करके भी तुम खुदको ही हानि पहुचाओगे क्युकी तुम्हारा जादू मुझपर असर नहीं करता हा पर मेरे वारो का असर तुमपर जरूर पड़ेगा और वैसे भी व्यर्थ के झगडे से अच्छा है समय का सदुपयोग किया जाये

रूद्र की बातो ने सुशेन पर जादू जैसा असर किया, वो खुद को एकदम बेबस महसूस कर रहा था, आखिर वो गहरी सास लेकर बोला

सुशेन-ठीक है, वैसे भी तुमको बताने मैं कोई हानि नहीं है, हम तो चाहते है कि ये कहानी ज्यादा से ज्यादा लोग जाने और हमारे आराध्य कालदूत की शरण मैं आये तो सुनो, आज से १००० साल पहले.......

(पूर्ण कहानी विस्तृत रूप से पहले और दुसरे भाग मैं बताई गयी है) बिरजू ने समुरतल से बहार आकर ऐसे लोगो को ढूंढा जो इश्वर से असंतुष्ट और नाराज थे, उनमे ऐसे लोग भी शामिल थे जिन्होंने किसी न किसी प्रकार के युद्ध मैं, महामारी के कारन या फिर किसी और वजह से अपनों को खो दिया था जिसकी वजह से इश्वर पर उनका अटूट विश्वास बुरी तरह डगमगा गया था, ऐसे लोगो को कालसेना मैं शामिल किया गया, कालसेना मैं कालदूत के भक्त सिमित संख्या मैं थे लेकिन वो ऐसे लोग थे जिनकी पहुच राजनीति, मीडिया अभिनय जैसे बड़े बड़े क्षेत्रो मैं थी, फिर शुरू हुआ बलि देने का दौर, सर्वप्रथम महात्मा बिरजू ने अपने ही पिता की बलि दी थी जो उनकी कालदूत की भक्ति के आड़े आ रहे थे, हर ३ सालो मैं कालसेना के लोग बहार निकलते और और कुर्बानी देते और फिर से गायब हो जाये और अगले तीन सालो मैं किसकी कुर्बानी देनी है इसकी प्लानिंग करते, हमारा निशाना मुख्य रूप से वो लोग रहे जो धार्मिक क्रियाओ मैं सम्मिलित रहते, कल कालसेना के लोग प्राण त्याग देते थे तब उनकी जगह उनके बच्चे ले लेते है और साथ ही नए लोग भी शामिल हो जाते है,मुखिया की म्रोत्यु के बाद सबसे काबिल लोगो मैं जंग होती है और जीतने वाले को मुखिया बनाया जाता है, अब इसे संयोग कहो या कालदूत का आशीर्वाद बिरजू के वंशजो ने हमेशा खुद को साबित करके सत्ता को अपने हाथ मैं रखा है, हमने अलग अलग देशो मैं इतनी सफाई के साथ हत्याए की थी की पुलिस प्रशासन का हमें पकड़ना नामुमकिन था, लोगो के सामने तो कालसेना कभी आई ही नहीं, दरअसल हम ही लोगो के सामने नहीं आना चाहते थे और अदृश्य रहने का काम हमने बहुत सहजता पूर्वक किया, बड़े बड़े देशो की ख़ुफ़िया एजेंसीज जैसे रॉ, CIA आदि मैं भी हमारे लोग उची पोजीशन पर थे जिन्होंने हमारे राज को बनाये रखने मैं सहायत की...

रूद्र-और अब १००० साल पुरे होने को है

सुशेन-हा इन तीन सालो मैं हम लोगो ने ९९ कुर्बानि दे दी है एक आखरी कुर्बानी और फिर हमारा देवता आजाद होगा समुद्र की गहराइयों से

रूद्र-अब ऐसा कुछ नहीं होगा

सुशेन-तुम हमको रोक नहीं पाओगे

रूद्र-दरअसल मैं रोक सकता हु पूरी कालसेना को रोक सकता हु, पता है मैंने तुम्हारे लोगो को कैसे मारा? उन्होंने मुझसे याचना की ताकि मैं रहम खाकर उन्हें छोड़ दू लेकिन मैंने अपने इन्हों हाथो से उनकी गर्दन की हड्डी तोड़ डाली, तुमको मैं छोड़ रहा हु क्युकी कालसेना को ख़तम करने के लिए किसी को पहले ही चुन लिया गया है मैं तो बस उसका काम आसान कर रहा हु पर ऐसा मत सोचना की मैं हर बार तुम्हे छोड़ दूंगा, अगली बार जब हम मिलेंगे तब हम दोनों मैं से कोई एक ही जिन्दा जायेगा.....

इतना कहकर रूद्र तेजी से वहा से बाहर निकल गया लेकिन सुशेन अब भी वही बैठा था, वो पहली बार डर महसूस कर रहा था, वही डर तो कालसेना की वजह से राजनगर मैं व्याप्त था

रूद्र के रेस्टोरंट से बहार जाते ही उसने अपने एक आदमी को फ़ोन किया “हा, एक २०-२२ साल का लड़का है...हा पीछा करो उसका....वो अभी हीरालाल रेस्टोरंट से बाहर निकला है काले रंग का चश्मा और ब्राउन रंग का ब्लेजर पहना है, पता करो वो कहा जाता है बस उसे तुम्हारी भनक नहीं लगनी चाहिए......

भाग १७​

राजनगर एक बहुत ही खुबसूरत हिल स्टेशन था, चारो और पहाड़ो और घने पेडो बीच बसा हुआ पर पिछले कुछ दिनों मैं गायब हो रहे लोगो ने शहर मैं दहशत भर दी थी,

रूद्र सुशेन से मिल कर उसे चेता कर अपने रस्ते निकल गया था उर इस वक़्त वो एक सुनसान रस्ते पर अकेला चलता हुआ जा रहा था की तभी उसे अपने पीछे कुछ हलचल सुनाई दी, उसने जब पीछे मिदकर देखा तो वहा कोई नहीं था, वो थोडा मुस्कुराया और तेज आवाज मैं बोला “ऐसे कायरो की तरह छिपने का कोई फायदा नहीं है मैं जनता हु की तुम मेरा पीछा कर रहे हो” उसके इतना बोलते ही ६ लोग काले कपडे पहने हुए झाड़ियो से निकल कर उसके सामने आ गए, उनमे से एक बोला “वैसे तो हमें कहा गया था के सिर्फ चुपचाप तेरा पीछा करे लेकिनाब इस सुनसान इलाके मैं अगर हम तुझे मार भी दे तो शायद बॉस बुरा नहीं मानेंगे, उनको रेस्टोरंट मैं बुलाकर धमकाना तेरी आखरी गलती थी लड़के!”

रूद्र-और इस तरह मेरे सामने आना तुम सब की जिंदगी की आखरी गलती है

उन सब लोगो ने रूद्र को गोला बनाकर घेर लिया और उनमे से एक व्यक्ति धारदार कुल्हाड़ी लेकर रूद्र को मरने के लिए आगे आया लेकिन रूद्र ने तेजी से उसके हाथ को पकड़ा और एक झटके के साथ उसका हाथ उखाड़कर फेक दिया, वो आदमी दर्द के कारन जोर से चीखने लगा वही बाकि सब की आँखें ये दृश्य देख कर फटी रह गयी,

ये सब देखकर एक कालसैनिक दुसरे से बोला “ये आखिर है कौन? धरती पर कोई भी इस तरह हमारा मुकाबला नहीं कर सकता” इसपर दूसरा कालसैनिक बोला “इस पर telekinesis का प्रयोग करके देखो, ये हमसे बल मैं अधिक हो सकता है लेकिन इसके पास हमारी शक्तियों की कोई काट नहीं होगी”

सभी कालसैनिको ने अपना हाथ एक विशेष मुद्रा मैं घुमाया, इस दौरान रूद्र ने कुछ नहीं किया, वो बस खड़े खड़े मुस्कुरा रहा था और ये देखकर सभी कालसैनिक सकते मैं आ गए, उनमे से एक घबरायी आवाज मैं बोला “ये...

ये तो हमारी शक्तियों का विरोध कर रहा है” तभी रूद्र के चेहरे से भाव तेजी से बदलने लगे, उसने तेजी से घूमकर एक कालसैनिक की छाती पर अपने हाथ से प्रहार किया जो इतना शक्तिशाली था के वो कालसैनिक वही धराशायी हो गया और ये देखकर बाकि सब के पैर उखड गए और वो वहा से भागने लगे

भागते हुए उनमे से एक ने कहा “ये कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता हमें फ़ौरन बॉस को इस बारे मैं खबर करनी होगी” लेकिन रूद्र की रफ़्तार उन सब से अधिक थी उसने आगे जाकर उनका रास्ता रोक लिया और बस फिर कुछ ही मिनटों मैं सभी कालसैनिको की लाश वहा पड़ी थी और रूद्र खून से सने हाथ लिए वहा खड़ा था

रूद्र-हम्म्फ़....जिन्हें लोगो को लाश बनाने का शौक था आज वो खुद लाश बन गए

फिर रूद्र वापिस अपने रस्ते किसी सामान्य नागरिक की तरह निकल गया जैसे कुछ हुआ ही न हो

राजनगर से बहार थोडा दूर खुबसूरत वादियों मैं एक छोटा सा घर बना हुआ था जिसकी दीवारे सफ़ेद और दरवाजा गोलाकार था और दरवाजे पर डोरबेल लगी थी, रूद्र इस समय इसी घर के बहार खड़ा था, उसने बेल बजायी तो दरवाजा एक ५०-५५ की उम्र के आदमी ने खोला, वो आदमी उम्र के हिसाब से काफी तंदरुस्त था, बाल हलके हलके सफ़ेद थे और चेहरा क्लीन शेव, उसने जीन्स और टीशर्ट पहना हुआ था और रूद्र को देखते ही वो बोला “मुझे ऐसा क्यों लग रहा है की तुम कही से दंगा फसाद करके आ रहे हो ?”

रूद्र- वो कुच्घ काले कपडे वाले कालसैनिको ने हमला कर दिया था मुझ पर नरेश जी

नरेश-हा हा...फिर तो मैं ये समझू की ये उनकी आखरी गलती थी

रूद्र-सही कहा

नरेश-आओ जल्दी अंदर आओ

रूद्र-बाकि सब कहा गए ?

नरेश-बाकी सब है ही कौन, एक अरुण ही तो है और वो किसी काम से बाहर गया हुआ है बाकी शिवानी राहुल और बाकि की टीम कल शाम तक आयेगी

रूद्र-अच्छी बात है वैसे भी अब ज्यादा समय नहीं बचा है, वो लोग अगर आखरी कुर्बानी देने मैं सफल हुए तो अनर्थ हो जायेगा

नरेश-सही कहा लेकिन अब किसी को मारना उनके लिए आसान नहीं होगा पुलिस को भी उनकी भनक लग चुकी है और मुझे लगता है अब समय भी हो गया है

रूद्र सोफे पर बैठा और उसने एक लम्बी सास की

रूद्र-मैं ये सब क्या कर रहा हु नरेश जी, लोगो को मारना मेरा काम नहीं है

नरेश-हममे से कोई भी किसी को भी मारना नहीं चाहता है रूद्र लेकिन उनलोगों को जिन्दा छोड़ना कितना खतरनाक हो सकता है इसका अंदेशा हम सबको है

रूद्र-हम्म

नरेश-मुझे लगता है अब यही समय है राघव को उसकी शक्तियों से अवगत करने का हमें जल्द से जल्द उसकी ट्रेनिंग शुरू करनी पड़ेगी

रूद्र कुछ बोलता उससे पहले ही नरेश का फ़ोन बजने लगा, फ़ोन अरुण का था नरेश ने फ़ोन स्पीकर पर डाला तो दूसरी तरह अरुण ने बस दो ही शब्द बोले...”रमण..

शक्ति”

रूद्र जितनी तेजी के साथ घर आया था उतनी ही तेजी के साथ घर से निकल गया

इधर पुलिस स्टेशन मैं रमण विक्रांत से कुछ उगलवाने की कोशिश कर रहा था तभी उस कमरे मैं लगी एकमात्र लाइट जलने बुझने लगी जिससे रमण को परेशानि हो रही थी तो वो जोर से चिल्लाकर बोला “रामदास ये बल्ब क्यों काम नहीं कर रहा देखो जरा”

लेकिन रामदास की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो रमण अपनी खुर्ची से उठकर उस अँधेरे लॉकअप से बाहर आया और वहा उसने कुछ ऐसा देखा की उसे बहुत बड़ा झटका लगा, उसके सरे साथी मरे पड़े थे, किसी की आँखें निकली हुयी थी, किसी की अंतड़िया पेट के बाहर झाक रही थी, किसी की गर्दन फटी हुयी थी और हड्डिया साफ़ दिख रही थी,

रमण ने अपने पुरे जीवन मैं ऐसा वीभत्स दृश्य कभी नहीं देखा था, उसने लाशो को पार किया तो सामने नीला चोगा और नकाब पहने चार लोग खड़े थे, रमण पहचान गया की ये लोग कौन है, उनमे से एक ने अपना नकाब निकला, वो सुशेन का छोटा भाई शक्ति था जो फाड़ जाने वाली नजरो से रमण को घुर रहा था, रमण ने बगैर कुछ सोचे अपनी गन निकली लेकिन शक्ति ने अपने हाथ को हल्का सा झटका दिया और वो गन दूर जा गिरी

रमण- तुमने मेरे सभी साथियों को मार डाला दरिंदो!!

शक्ति-मगर तुम जिन्दा हो इंस्पेक्टर और वो भी शायद तुम्हारी बहादुरी की वजह से क्युकी मैं बहादुरों की क़द्र करता हु तुम जैसे बहादुर लोग कालदूत को काफी प्रिय है

रमण-भाड़ मैं गया तुम्हारा कालदूत, मुझसे क्या चाहते हो

शक्ति-विक्रांत को हमारे हवाले कर दो

रमण-नहीं होगा...

और वो तो ब्लैक हुड का सदस्य है वो तुमको क्यों चाहिए?

शक्ति-वो एक कालसैनिक है और मेरे सम्बन्ध मेरे भाई से इतने भी ख़राब नहीं है की मैं उसके लोगो को तुम्हारे पास सड़ने दू

रमण- अच्छा भाईचारा है पर मैं किसी भी हाल मे विक्रांत को तुम्हे नहीं दूंगा और मेरे आदमियों की मौत का खामियाजा भी तुम्हे भुगतना होगा

शक्ति-तब तो मुझे तुम्हे भी ख़त्म करना होगा

शक्ति ने कुछ करने के लिए अपना हाथ हवा मैं उठाया लेकिन अचानक एक टेबल उडती हुयी उसकी तरफ आयी लेकिन शक्ति ने सही समय पर ध्यान देकर telekinesis से उसे हवा मे रोक दिया और उसके टुकड़े कर दिया, सभी लोगो का ध्यान टेबल फेकने वाले पर गया तो वहा रूद्र खड़ा था

रूद्र-हर बार telekinesis काम नहीं आयेगी

शक्ति(गुस्से से )- कौन हो तुम?

रूद्र-मेरे बारे मैं सोचने के लिए तुम जिन्दा नहीं रहोगे

शक्ति-इस लड़के और इंस्पेक्टर को पकड़ो

कालसैनिक दौड़कर रूद्र को पकड़ने गए लेकिन रूद्र एक एक जोरदार झापड़ से एक कालसैनिक की खोपड़ी ‘चटाक’ की आवाज से मुडी और वो धरती पर गिर गया, दुसरे से कालसैनिक ने telekinesis द्वारा रूद्र के शारीर को अंदर से फाड़ने की कोशिश की लेकिन रूद्र पर कोई असर नहीं हुआ जिससे रमण और शक्ति दोनों चकित हो गए, दो और लोग रूद्र की तरफ बढे लेकिन उनका भी वही हाल हुआ वो पहले वालो का हुआ था, पुलिस वालो को निर्ममता से मरने वाले अब खुद लाश बने हुए थे और सिर्फ शक्ति बचा था, उसने रमण की गन उठाई और रूद्र पर चलायी लेकिन गोलियों का रूद्र पर कोई असर नहीं हुआ

शक्ति-कौन हो तुम, तुम इंसान नहीं हो?
रूद्र-कोई ऐसा जिसके लिए इंसानी जाने मायने रखती है और तुम जैसो को मारने के लिए मजबूर हु ताकि दोबारा ऐसा न हो

रूद्र शक्तिके पास गया और उसे अपने दोनों हाथो से उठाकर उसने सामने वाली दिवार पर फेक दिया, शक्ति का शारीर इतना तेज इम्पैक्ट झेल नहीं पाया और उसने प्राण त्याग दिए

फिर रूद्र ने रमण की गन उठाई और उस सेल की तरफ गया जहा विक्रांत बंद था, रमण उसे रोकने की हालत मैं नहीं था फिर उस सेल से गोलिया चलने की कुछ आवाजे आयी और विक्रांत का शारीर शांत पड गया

लॉकअप से बहार आकर रूद्र रमण को गन थमाते हुए बोला

रूद्र-रमण आओ मेरे साथ चलो

रमण-रुको!! कौन हो तुम और तुमने ये सब कैसे किया

रूद्र- सब बताता हु अभी मेरे साथ चलो..

तभी वहा राघव आ पंहुचा जो सूरज से पीछा छुड़ा कर रमण से मिलने आया था और उसे अपनी सुनी हुयी सब बाते बताना चाहता था लेकिन पुलिस स्टेशन का नजारा देख उसकी आँखें फटी रह गयी

रुद्र- राघव अच हुआ तुमज भी आ गए अब तुम दोनो मेरे साथ चलो, कालसैनिको को यहाँ की घटना के बारे मैं पता चलने मैं ज्यादा समय नहीं लगेगा थोड़ी देर मैं ये इलाका इन लोगो से भर जायेगा इसीलिए जल्दी निकलो यहाँ से

रमण भी स्तिथि की गंभीरता को समझ रहा था इसीलिए बिना कोई न नुकुर किया तो रूद्र के साथ चलने को तयार हुआ और राघव को भी साथ चलने कहा जो की अब भी वहा क्या हुआ ये समझने की कोशिश कर रहा था....

वही दूसरी तरफ सुशेन अपने घर की छत पर खड़ा था सूरज ढल चूका था और आसमान मैं काले बदल छाये हुए थे और बिजलिया कड़क रही थी लेकिन इस बिजली की कडकडाहत का सुशेन पर कोई असर नहीं हो रहा था तभी पीछे से सारा ने आवाज लगायी “वहा क्या कर रहे हो सुशेन? घर मैं चलो”

सुशेन मुडा तो सारा ने महसूस किया की उसकी आँखों मैं एक सूनापन था बहुत सारा दुःख था, अब सारा को किसी अनिष्ट की आशंका हो रही थी

सारा-क्या हुआ है सुशेन?

सुशेन-वो मर गया सारा...उन लोगो ने मेरे भाई को मार दिया........

भाग १८​

रूद्र रमण और राघव को लेकर पुलिस जीप मैं काफी दूर निकल आया था, रमण अब वापिस बोलने की स्तिथि मैं आ चूका था, हालाँकि वो काफी साहसी व्यक्ति था लेकिन कुछ समय पहले उसने जो कुछ भी देखा था उससे वो बुरी तरह हिला हुआ था वही राघव पीछे बैठे हुए चुप चाप एकटक रूद्र को देख रहा था आखिर मैं रमण ने बोलना शुरू किया

रमण-तुम हमें कहा ले जा रहे हो?

रूद्र- किसी सुरक्षित स्थान पर, कालसेना के लोगो को अब तक पता चल चूका होगा इन सबकी मृत्यु का, वो तुम्हारे पीछे आयेंगे

रमण-मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा की तुम पर इनके काले जादू का असर क्यों नहीं हुआ? आखिर तुम चीज़ क्या हो?

रूद्र-देखो रमण फिलहाल हम समय व्यर्थ नहीं कर सकते, मैं सही समय आने पर आपको सब कुछ बता दूंगा पहले हमें उनको आखरी कुर्बानी देने से रोकना होगा हम उन्हें कामयाब होने नहीं दे सकते वरना कालदूत जाग जायेगा औए हा राघव तुम जो ये इतने समय से मेरे दिमाग मैं झाकने की कोशिश कर रहे हो इसे प्लीज रोक दो, जब मुझपर telekinesis का असर नहीं हुआ तो तुम्हारी शक्तिया भी काम नहीं करेंगी

राघव-तुम..कैसे जानते हो मेरे और मेरी शक्तियों के बारे मैं?

रूद्र-मैं तुम्हारे बारे मैं तुमसे ज्यादा जानता हु दोस्त और मेरा यकीन करो मैं तुम्हारे ही साथ हु साडी बाते सही समय पर तुम्हे पता चलेंगी बस कुछ देर रुक जाओ

राघव-तुम कैसे जानते हो कालदूत के बारे मैं

रूद्र- वो....

रमण-पता नहीं क्या हो रहा है.....क्या सच मैं कोई कालदूत है भी...

मैं अब इन सब अंधविश्वास से तंग आ गया हु

रूद्र-अपने भाई की दिमाग पढने की काबिलियत और पुलिस स्टेशन मैं जो कुछ हुआ उसे देखने के बाद भी तुम ऐसा कैसे कह सकते हो इंस्पेक्टर, जरा मुझे बताओगे की ये लोग बिना हाथ लगाये चीज़े कैसे हिला लेते है

रमण-इसके पीछे जरूर कोई न कोई कारन होगा, कोई ठोस कारण!

रूद्र-कारण है न!! कालदूत का शारीर जरूर समुद्र मैं बंधा हुआ है लेकिन वो मानसिक तरंगे भेजकर इन सबको इस तरह की शक्तिया प्रदान करता है, वो इनसे शक्तिया ले भी सकता है और इन्हें और शक्तिशाली भी बना सकता है इसीलिए अगर आखरी कुर्बानी दी गयी तो हम सब ख़तम हो जायेंगे

राघव-ये आखरी कुर्बानी है क्या?, अभी अभी इन लोगो ने पुलिस स्टेशन मैं इतना कुछ किया वो काफी नहीं था जो आखरी कुर्बानी बाकि है??

रूद्र-कुर्बानी के लिए इनके कुछ रिवाज मैं राघव और इन्हें उन रिवाजो के अनुसार चलना पड़ता है, व्यक्ति को लोहे की जंजीर मैं बांधकर जिन्दा जलना होता है तभी कुर्बानी मान्य होती है

राघव-ऐसा क्यों??
रूद्र-पता नहीं! शायद मानव आत्मा इस तरह से मारने पर ज्यादा समय तक इस लोक मे इस plane of existence पर बनी रहती है और कालदूत को आजाद होने के लिए आत्माओ की उर्जा की ही जरुरत है

रमण-ओह..तभी हमें रोहित की लाश जली हुयी मिली थी

रूद्र-हा..इन्होने सभी कुर्बानिया इसी प्रकार से दी है और अब अगर ये लोग आखरी कुर्बानी देने मैं सफल हो गए तो वो प्राणी सदियों की कैद से आजाद हो जायेगा जिसे ये लोग अपना इश्वर मानते है.....

राघव-पर आखरी कुर्बानी मैं अभी एक माह का समय है, आखरी कुर्बानी आने वाली पुरनमासी को होगी

रूद्र-हा हा हा, ये किसने कह दिया तुम्हे

रमण-विक्रांत ने ऐसा बताया था

रूद्र-देखो भाइयो ये कालसैनिक किसी भी मुहूर्त या दिन मैं विश्वास रखने वालो मैं से नहीं है अगर ऐसा होता तो हर कुर्बानी किसी विशिष्ट दिन दी जाती लेकिन ऐसा नहीं है इन्हें जब उचित लगे और कोई व्यक्ति कुर्बानी के लिए मिल जाये उसी दिन उसे जलाया जाता है, और आज जब मैंने कालसेना के मुखिया के भाई को मारा है तो ते लोग अब जल्द से जल्द आखरी कुर्बानी पूर्ण करने की कोशिश करेंगे

राघव-तुम जानते हो उन लोगो को मैंने.....(फिर राघव ने रूद्र और रमण को साडी बात बताई जो भी उसने देखा सुना था सब)

रूद्र-तुमने अपनी तरफ से काफी कुछ पता लगा लिया है राघव पर इनमे से ज्यादातर बाते मैं जानता हु..मैंने ही सुशेन को मिलने बुलाया था

राघव-वो तो मैं जान गया था जब पुलिस स्टेशन मैं तुम्हे उन लोगो को मरते देखा था

रूद्र-लो बातो बातो मैं हम पहुच गए....

राघव-कहा??

रूद्र-जहा इन कालसैनिको से भिड़ने वाले मौजूद है....

वो तीनो जीप से निकलकर घर के अंदर पहुचे जहा नरेश पहलेसे ही मौजूद था और उसके साथ २८-३० साल का एक आदमी संजय हॉल मैं बैठा था, संजय एक दुबला पतला आदमी था और घनी मुछे और रौबीले व्यक्तित्व का मालिक

रूद्र-क्या हाल है संजय भाई? बहुत समय बाद दिखे

संजय-तुम भी तो बहुत समय बाद मिले हो

रूद्र-और नरेश जी अरुण भाई नहीं आये अभी तक?

नरेश-आ जायेगा थोड़े समय मैं वो कुछ जरुरी काम से गया हुआ है...

रमण-ये सब क्या चल रहा है यहाँ पे? कौन है आप लोग?

नरेश-राघव, रमण आराम से बैठो सोफे पर हम तुम्हे सब बताएँगे

राघव और रमण दोनों ने एक एक खुर्ची ली और बैठ गए, नरेश गौर से राघव को देख रहा था, कुछ समय तक वहा अजीब सी शांति मैं सिर्फ घडी की टिक टिक सुनाई दे रही थी, सबसे पहले नरेश ने अपनी चुप्पी तोड़ी

नरेश-मेरा नाम नरेश है और ये है संजय, हमारे एक और साथी अरुण को अभी आना है और रूद्र से तो तुम लोग मिल ही चुके हो.....हम सभी ने कही न कही कालसेना की वजह से अपनों को खोया है...मेरी बीवी और भाई को उन्होंने बडी ही क्रूरता से मार दिया....

संजय-और मेरा तो पूरा परिवार ही ख़तम कर दिया गया...बीवी बच्चा माँ बाप बहन सब, सबसे बुरी बात तो ये है की ये लोग इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया मैं उच्च पद पर है जिसकी वजह से इनकी कोई खबर हम तक नहीं पहुचती, जब मैंने नेट पर लोगो के ब्लॉग पढ़े तब पता चला की कितने लोग इनके शिकार हुए है, मैंने नरेश और अरुण से वही मिला था थोडा समय लगा कालदूत का अस्तित्व स्वीकारने मैं लेकिन सच्चाई जो है वो हम सब जानते है

रमण-आप सब की कहानी जान कर बहुत दुःख हुआ लेकिन मैं ये जानना चाहता हु की आपलोग मुझे और राघव को कैसे जानते है और ये रूद्र कौन है?

राघव-हा....

नरेश(मुस्कुरा कर)- मैं तो तुम्हारे पिताजी को भी जानता हु रमण...मैं तुमदोनो को शुरू से सारी बात बताता हु तब शायद तुम्हे पूरी बात समझ मैं आये और ये भी समझ मैं आये की इस वक़्त ये दुनिया कितने बड़े खतरे मैं जिसे हमें रोकना है......

नरेश-बात ऐसी है की...............

To Be Continue.......

भाग १९​

नरेश(मुस्कुरा कर)- मैं तो तुम्हारे पिताजी को भी जानता हु रमण...मैं तुमदोनो को शुरू से सारी बात बताता हु तब शायद तुम्हे पूरी बात समझ मैं आये और ये भी समझ मैं आये की इस वक़्त ये दुनिया कितने बड़े खतरे मैं जिसे हमें रोकना है......

नरेश- राघव, रमण तुम्हारे दादाजी महंत शिवदासजी मेरे और मेरे भाई के गुरु थे, हमारे माता पिता मेरे छोटे भाई के जन्म के के बाद एक दुर्घटना मैं मारे गए थे हम दोनों भाई काफी छोटे थे हमारे रिश्तेदारों का हमारे प्रति व्यवहार अच्छा नहीं था इसीलिए मैं एक दिन हिम्मत करके अपने रिश्तेदारों के पास से भाग तो निकला लेकिन अब आगे क्या करू मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था ऐसे मैं एक दिन भटकते हुए हमें गुरूजी ने देखा, तुम्हारे दादाजी एक नेक दिल इंसान थे और काफी विद्वान थे, राजनगर और बाकि आसपास के शहरों मैं उनका नाम चलता था, उन्होंने हम दोनों भाइयो को आसरा दिया, वो उस समय पुराने शिवमंदिर मैं रहते थे और हम दोनों भाई भी उन्ही के साथ रहते थे, मेरे छोटे भाई महेश की पढने मैं काफी रूचि थी और इसीके चलते गुरूजी ने अपनी पहचान से हम दोनों भाइयो का दाखिला स्कूल मैं करवाया था, हम अपनी पढाई के साथ साथ गुरूजी के अनुष्ठानो मैं हाथ भी बताया करते थे, गुरूजी के पास इंसान का दिमाग पढ़ सकने की अदभुत शक्ति थी और ये बात हम दोनों भाई जानते थे, धीरे धीरे समय बीता मैंने बस जरुरत जितनी पढाई की लेकिन मेरा छोटा भाई महेश उसके सपने काफी बड़े थे उसे अध्यात्म मैं विज्ञान और विज्ञान मैं अध्यात्म की झलक मिलती थी उसका कहना था की अगर विज्ञान को अध्यात्म का साथ मिल जाये तो इस दुनिया मैं ऐसे चमत्कार होंगे जो किसी ने सोचे नहीं होंगे, गुरूजी उसके मन की बात जानते थे उन्होंने उसे आगे बढ़ने से कभी नहीं रोका और महेश ने अपनी बुद्धि के बल पर काफी बडी जगह नौकरी पायी और विदेश चला गया उसके कुछ सालो बाद हमें तुम मिले राघव तुम्हे मिलने के बाद गुरूजी ने मुझसे कहा था की तुम ही वो लड़के बनोगे जो आने वाले समय मैं इस दुनिया के लिए कोई महान काम करोगे बस जरुरत होगी तो तुम्हे तुम्हारी शक्तियों से अवगत करने की, गुरूजी अपना पूरा ध्यान तुम पर लगाना चाहते थे राघव और इसीलिए उन्होंने मुझे अपने से दूर किया और मैं अपने भाई के पास आ गया और अपना छोटा सा काम शुरू करके शादी कर ली, जिंदगी हसी ख़ुशी कट रही थी,

मेरा भाई महेश बायो इंजीनियरिंग मैं एक महारत वाला वैज्ञानिक था जो उस समय किसी गुप्त आर्गेनाइजेशन के लिए काम करता था, वो आर्गेनाइजेशन पता नहीं कैसे महेश को इतने पैसे और संसाधन मुहैया कहा देती थी की जिससे उसके जीवन मैं रिसर्च मैं किसी प्रकार की बाधा न आये

राघव-किस प्रकार की रिसर्च?

नरेश-Artificial Metahumans यानि की कृत्रिम महामानवो पर रिसर्च, बात तब की है हम हम दोनों भाई अमेरिका मैं रहते थे मतलब मैं महेश और मेरी बीवी, महेश एक ऐसा शारीर या कहो मानव बनाना चाहता था जिसका शारीर हमारी तरह हो लेकिन हड्डियों मैं तरह तरह के मिश्रित धातुये यानि alloys का संगम को जौसे अभेद्द बना सके

रमण-यानि एक रोबोट जैसा?

नरेश-नहीं

रोबोट नहीं वो तो केवल एक निर्जीव यन्त्र है, महेश कुछ ऐसा बनाना चाहता तह किसका शारीर हमारी तरह हो सरे अवयव हमारी तरह हो. जो इंसानों की तरह रोजमर्रा के काम करे लेकिन बहरी त्वचा इतनी सख्त हो की जिसपर बन्दुक की गोली भी असर न करे और आखिर मैं उसने एक ऐसा शारीर बनाने मैं कामयाबी भी हासिल कर ली थी जिसमे, दिल गुर्दे फेफड़े बाकि बस अंदरूनी अंग हमारी तरह थे लेकिन कंकाल का ढाचा बेहद मजबूत था, उसने त्वचा का composition भी वैसा ही रखा था ताकि उपरी शारीर अभेद्द और कठोर हो, एक कृत्रिम मस्तिष्क का निर्माण भी किया गया जो आम मानव मस्तिष्क जैसा हो लेकिन अब समस्या ये थी की बेजान शारीर मैं जान कैसे डाले, मेरे भाई ने कई प्रयोग किया उस शारीर मैं जान डालने के लेकिन सब विफल रहे क्युकी उसके पास वो उर्जा नहीं थी जो हर मनव शारीर को संचालित करती है......आत्मा, ऐसे समय मैं हमें हमारे गुरूजी का ध्यान आया, हम दोनों भाइयो ने गुरूजी को बचपन से देखा था जिससे हमें उनकी शक्ति का अंदाजा था, महेश ने गुरु जो पत्र लिखकर साडी समस्या बताई और गुरूजी ने भी मदद का आश्वासन दिया, तुम दोनों को याद होगा वो गुरूजी उनकी मृत्यु के १ साल पहले कुछ समय के लिए कही बाहर गए थे, उस समय वो हमारे पास आये थे, गुरूजी ने अपनी सिद्धियों की मदद से एक आत्मा को इस लुक मैं खिंच लिया, फिर वो आत्मा उस शारीर मैं चली तो गयी लेकिन कोइ भी आत्मा तब तक किसी शारीर मैं स्थिर नहीं होती जबतक वो उसका अपना शारीर न हो, उस उर्जा के तत्त्व को stabilize करने के लिए एक निश्चित मात्र मैं बिजली का प्रयोग किया गया, वो शारीर बिलकुल शांत था किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था की ये प्रोयोग सफल हुआ या नहीं लेकिन गुरूजी निश्चिन्त थे और वो भारत लौट आये थे उसके कुछ दिनों बाद मेरा भाई लैब मैं उस कृत्रिम शारीर पर कुछ टेस्ट कर रहा था तभी न जाने कैसे कालसैनिको को इस प्रयोग का पता चला और उनके मन मैं उस कृत्रिम मानव को पाने की लालसा जाग उठी और उन्होंने लैब पर हमला कर दिया उस हमले मैं बाकि वैज्ञानिक तो बचकर भाग गए लकिन मेरा भाई पकड़ा गया और उसे उनलोगों ने लोहे की जंजीर से बांधकर जिन्दा जला दिया लेकिन तब तब उस कृत्रिम मानव को होश आ चूका था वो वो अपने निर्माता को पहचानने लगा था और जो उसे पहला अहसास हुआ वो क्रोध था उसने इतना भीषण हत्याकांड अपने आँखों से देखा था, कालसेना तो उस कृत्रिम मानव को मानवता के खिलाब हथियार बनाना चाहती थी लेकिन तब तक वो कृत्रिम मनव जाग गया और उसने उन कालसैनिको को वो भयानक मौत दी जिसके वो हक़दार थे, महेश की गुप्त आर्गेनाइजेशन के लोग बाद मैं मुझसे मिले और मुझे अपने भाई की अमानत सँभालने को कहा और मैंने उसे घर ले आया, मेरी बीवी ने उसका नाम रूद्र रखा, हमने रूद्र को अपना बच्चा मन क्युकी हमारी कोई संतान नहीं थी, मैं अपने भाई

की मौत को भुला नहीं था मैंने अपने स्तर पर खोज की लेकिन शायद कालसेना को इसकी भनक लग चुकी थी और जब मैं और रूद्र दोनों बाहार थे तब उन्होंने मेरी बीवी की कुर्बानी दी, हम जब घर पहुचे तब मेरी बीवी की लाश पर एक नोट लिखा था की ‘हमें ढूंढने की कोशिश मैं इसी तरह मारे जाओगे’ पर अब मेरे पास खोने को कुछ नहीं था, अब मैंने कालसेना का खत्म करने की ठानी थी और मेरे साथ रूद्र भी था इसी सब के बीच मुझे गुरूजी की मौत की खबर मिली और साथ ही गुरुजी का एक ख़त जो उन्होंने मेरे नाम छोड़ा था जिसे तुम्हारे पिता ने मुझे बादमे भेजा जिसमे राघव की खूबियों और शक्तियों का जिक्र था, मैंने रूद्र के साथ राजनगर लौट आया और ऐसे लोगो को खोजा वो कालसेना से पीड़ित हो ऐसे मैं हमें संजय मिला जो एक राज परिवार से है और अब हमारे हथियारों के खर्च को देखा है और अरुण जिससे तुम कुछ ही समय मैं मिलोगे वो एक एक्स कमांडो है जिसे हथियारों की काफी समझ है,..हमने जब राघव पर नजर रखी तो पाया की राघव को अभी अपनी शक्तियों का अंजादा नहीं है और अब यही सही समय है उसे सब बताने का मैं और रूद्र तुम लोगो से मिलने वाले थे लेकिन आज तुमसे अचानक मिलना होगा सोचा नहीं था,

रमण- आपकी कहानी और आपके भाई के मौत का काफी दुःख हुआ और साथ ही मैं आपके लड़ने के जज्बे को सलाम करता हु, अब समझ आ रहा है की रूद्र पर काला जादू असर क्यों नहीं करता क्युकी उसने हमारी तरह जन्म नहीं लिया बल्कि उसे लैब मैं बनाया गया है...लेकिन आप बार बार किसी गुप्त संस्था का जिक्र कर रहे थे जिसमे आपका भाई काम करता था, क्या आप नहीं जानते उस संस्था के बारे मैं

नरेश-उस संस्था के कुछ लोग हमसे जुड़े हुए है वो लोग भी कल आने वाले है तब ये सवाल तुम उन्ही से पूछना

ये लोग बात कर ह रहे थे की दरवाजे से अरुण उन्हें अंदर आता दिखाई दिया.......

To Be Continue.........

भाग २०​

पुलिस स्टेशन मैं हुए उस भयानक हत्याकांड की ख़राब पुरे राजनगर मैं फ़ैल चुकी थी देश के बड़े बड़े न्यूज़ चैनल इस खबर को कवर करना छह रहे थे और इस वक़्त पुलिस स्टेशन के सामने रिपोर्टर्स की भरी भीड़ थी, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था के आखिर इतने सरे पुलिस कर्मचारी इतनी बेरहम तरीके से कैसे मारे गए कौन है इस घटना के पीछे, रिपोर्टर्स और रिज़र्व पुलिस फाॅर्स जब तक वहा पहुचे तक तक कालसेना के लोग अपने लोगो की लाशो को वहा से ले जा चुके थे वो अब भी खुल कर सामने नहीं आना चाहते थे अगर उनके बस मैं होता तो शायद ये खबर भी दब जाती लेकिन मामला बड़ा था और इसे दबाना इतना आसन भी नहीं था

इस वक़्त सरे न्यूज़ चैनलों पर सिर्फ राजनगर की ये न्यूज़ दिखाई जा रही थी घर पर अनिरुद्ध शाश्त्री जी सुमित्रादेवी और श्रुति भी ये न्यूज़ देख रहे थे और उन्हें अपने बेटे की चिंता हो रही थी क्युकी न्यूज़ देखते ही वो समझ गए थे के ये सब घटनाये रमण के स्टेशन मैं हुयी है, श्रुति का हाल रोने जैसा था वही सुमित्रादेवी अपने को संभाले हुए थी साथ ही राघव के बारे मैं भी इन्हें कोई खबर नहीं थी

इस वक़्त टीवी पर न्यूज़ चल रही थी जिसका एंकर बोल रहा था “इस वक़्त हम राजनगर के पुलिस स्टेशन मैं खड़े है जहा आज दिन धहदे कई पुलिस वालो को मारा गया है, हैरानी की बात ये है ये आस पास के लोगो ने किसी ने भी कोई गोली की आवाज नहीं सुनी, इन सरे पुलिस कर्मचारियों को बेहद ही क्रूरता के साथ मारा गया है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकेंगे, आसपास के कुछ लोगो से पूछ ताछ मैं उन्होंने बताया की उन्होंने कुछ नीले कपडे पहले लोगो को अंदर जाते देखा था पर उसके बाद क्या हुआ किसी को इस बात की कोई जान करी नहीं, सूत्रों के अनुसार पुलिस स्टेशन मैं उस वक़्त मौजूद कोई भी पुलिस वाला जिन्दा नहीं बच पाया है S.I.

रमण शास्त्री की बॉडी अभी तक बरामद नहीं हुयी है शायद वो जिन्दा बच गए हो लेकिन अभी तक उनकी हमारे पास कोई खबर नहीं है, कौन हो सकता है इन सब के पीछे? क्या इसमें हमारे किसी दुश्मन देश का हाथ है? ये आतंकवादी हमला है या कुछ और? इन सब बातो पर चर्चा के लिए देखे हमारा विशेष कार्यक्रम अब से कुछ ही देर मैं रात ९ बाते, कैमरा मैन गौरव के साथ मैं अविनाश +२४ न्यूज़”

न्यूज़ सुन कर श्रुति और सुमित्रादेवी का बुरा हाल हो रहा था पर कही न कही उन्हें लग रहा था के रमण ठीक होगा

श्रुति-मम्मी जी मैं तब से इनका फ़ोन लगा रही हु लग नहीं रहा है राघव भैया भी फ़ोन नहीं उठा रहे है

सुमित्रादेवी-तुम फ़ोन लगाती रहो कुछ जरूर पता चलेगा

वही अनिरुद्ध जी कुछ सोच रहे थे और अचानक वो खड़े हुए

अनिरुद्ध-चिंता मत करो बहु रमण को कुछ नहीं होगा और राघव भी ठीक होगा तुम उन्हें फ़ोन लगाती रहो और कुछ पता चले तो मुझे सूचित करना मैं आता हु

सुमित्रादेवी- आप कहा जा रहे है पहले ही हमारे दोनों बेटो का कुछ पता नहीं है ऐसे मैं आप

अनिरुद्ध-ये सुनिश्चित करने जा रहा हु के मेरे दोनों बच्चे सुरक्षित रहे, मेरी चिंता मत करो महादेव मेरे साथ है मुझे कुछ नहीं होगा, एक ऐसे व्यक्ति से मिलने जा रहा हु जहा से मुझे आशा मैं की मैं खली हाथ नहीं आऊंगा

सुमित्रादेवी-पर.....

सुमित्रादेवी कुछ कह पाती इससे पहले ही अनिरुद्ध शास्त्री वह से निकल गए, वो कहा जा रहे थे ये केवल उनका मन जानता था.....

वही दूसरी तरफ नरेश राघव और रमण को अपनी कहानी सुना रहा था की कैसे उसके भाई ने रूद्र को बनाया और जब कालसेना ने उसके परिवार को मार दिया तब से वो और रूद्र उसने भीड़ रहे है और कैसे उन्होंने अपने जैसे लोगो को खोज कर कालसेना के खिलाफ अपनी एक टीम तयार की है तभी वहा अरुण आ पंहुचा

अरुण के चेहरे पर चिंता साफ़ देखि जा सकती थी, रात का समय हो चला था और मौसन भी बिगड़ने लगा था अरुण काफी चिंतित चेहरे के साथ सोफे पर जा बैठा उसके हाथ मैं एक किताब थी

नरेश-अरुण तुम तो आधी रात तक आने वाले थे इतनी जल्दी कैसे आ गए? रमण राघव इनसे मिलो हमारे वेपन एक्सपर्ट अरुण जो आर्मी मैं कमांडो भी रह चुके है और अब कालसेना से लड़ने मैं हमारी मदद कर रहे है, पुलिस स्टेशन पर कालसेना के हमले की सुचना हमें अरुण ने ही दी थी

अरुण-मैं एक बुरी खबर लाया हु नरेश भाई, आज रात कुछ तो बड़ा होने वाला है हो सकता है शायद अंतिम कुर्बानी?

राघव-पर उसमे तो अभी समय है अंतिम कुर्बानी तो आने वाली पुरनमासी को होगी

अरुण-ये लोग किसी मुहूर्त का इंतजार नहीं करते बच्चे यदि इन्होने किसी को पकड़ा होगा तो कुर्बानी आज ही होगी पर मेरी जानकारी मैं अभी तक कालसेना को आखरी कुर्बानी नहीं मिली है.....

नरेश-मुझे लगता है तुम व्यर्थ चिंता कर रहे हो अरुण हो सकता है ऐसा कुछ न हो

रमण-पर आपको ये सब कैसे पता है? मतलब पहले पुलिस स्टेशन वाली घटना और अब ये??

अरुण-तुम्हे शायद जानकार हैरानी हो इंस्पेक्टर, मेरे पिता इन मे से एक थे, वो इन अन्धविश्वासी कालसैनिको मैं से एक थे और जब उन्हें कोई कुर्बानी नहीं मिली तो उन्होंने मेरी आँखों के सामने मेरी माँ को कुर्बानी के नाम पर जला कर मार डाला था, उस समय मैं छोटा था जिसके बाद मैंने ठान लिया था इस कालसेना को ख़तम करने का, जितनी अच्छी तरह मैं कालसेना को जानता हु उनता शायद यहाँ मौजूद कोई नहीं, मेरा अपना एक नेटवर्क है जिसके जरिये मुझे ये खबरे मिलती रहती है,

रमण-आपकी कहानी सुन कर दुःख हुआ और मैं आपके लड़ने के जज्बे की करदा करता हु, मेरी जान बचने का शुक्रिया अगर आप रूद्र को न भेजते तो शायद मैं यहाँ नहीं होता

रूद्र-पर अरुण भाई आप गए कहा था और ये आपके हाथ मैं क्या है?

अरुण-मैं अपने घर गया था रूद्र अपने बाप के घर जहा उसका सामान पड़ा हुआ था ये देखने की कही उसके सामान मैं हमें कोई ऐसी चीज़ मिल जाये जो हमारी इस लडाई मैं मदद करे और वहा मुझे ये मिली, ये किताब जिसकी ये कालसैनिक पूजा करते है

अरुण ने वो किताब सबको दिखाते हुए कहा

नरेश-क्या ये वही है जो मैं सोच रहा हु?

अरुण-काले जादू की किताब जिसका लेखक स्वयं कालदूत को माना जाता है, मेरे पिता की है, कभी सोचा नहीं था की मैं इसे देखूंगा

नरेश-मुझे लगा था ये एक ही है

अरुण-कालदूत ने तो एक ही दी थी पर कालसैनिको ने इसकी प्रतिया तयार की है जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इनसे जुड़े

रूद्र-इसे खोलकर देखो पता चले इसमें क्या राज दफ़न है

उनलोगों ने उस ख़िताब के पन्ने पलटे, शुरवाती पन्नो मैं तो कुछ बेहद ही विभत्स रीती रिवाज थे जो कालसैनिक बनने की प्रक्रिया मैं करने पड़ते थे जैसे भैसे का सर काटकर खाना और सिर्फ कंकाल छोड़ना, मनुष्य की आंते निकालकर खाना आदि, ऐसे चित्र देख कर वहा मौजूद हर कोई घृणा से भर गया

रमण-काफी भयानक चित्र है पर ये भाषा क्या है

राघव-ये इस दुनिया की भाषा नहीं है

राघव के इतना बोलते ही सब उसकी तरफ देखने लगे

नरेश-तुम ये भाषा पढ़ सकते हो??

राघव-पता नहीं मैं ये कैसे कर पा रहा हु पर हा मैं इसे पढ़ सकता हु, ये किताब काले जादू का भंडार है, इसमें ऐसी सिद्धियों का वर्णन है जो यदि किसी एक इंसान के पास हो तो वो पुरे ब्रह्माण्ड पर राज कर सकता है

नरेश-लगता है तुममे किसी भी भाषा को समझने की भी काबिलियत है

राघव-पता नहीं शायद

संजय-पर ये भाषा जब इस दुनिया की नहीं है तो ये उन कालसैनिको को कैसे समझ मैं आ सकती होगी?

नरेश-ये समझना इतना भी मुश्किल नहीं है संजय....

कालदूत उनसे मानसिक तरंगो द्वारा जुडा हुआ है वो इसे आसानी से समझ सकते है

ये लोग इन सब के बारे मैं बात ही कर रहे थे की दरवाजे पर दस्तक हुयी

रूद्र-इस समय कौन हो सकता है??

नरेश-मैं देखता हु...

नरेश ने जब दरवाजा खोला तो उसके सामने अनिरुद्ध शास्त्री खड़े थे........

भाग २१​

नरेश ने जब दरवाजा खोला तो सामने अनिरुद्ध शास्त्री खड़े थे, उन्हें वहा देख कर पहले तो नरेश चौका, उसे कभी उम्मीद ही नहीं थी के अनिरुद्ध उससे मिलने आएगा

नरेश- अनिरुद्ध भैया आप आइये अंदर आइये

अनिरुद्ध अंदर आकर नरेश से कुछ बात करता या बोलता इससे पहले ही उसकी नजर राघव और रमण पर पड़ी...

राघव-बाबूजी आप यहाँ??

अनिरुद्ध-तुम दोनों यहाँ और रमण तुम्हारे पुलिस स्टेशन मैं आज इतनी भयानक घटना हुयी है हम सबको तुम्हारी चिंता हो रही है, श्रुति कब से तुम दोनों भाइयो का फ़ोन तरी कर रही है....बात क्या है तुम यहाँ क्या कर रहे हो??

नरेश-मैं बताता हु भैया आप बैठिये...

फिर नरेश ने अनिरुद्ध शास्त्री को सारी बात बताई की कैसे रूद्र ने रमण को बचाया वगैरे जिसके बाद

अनिरुद्ध- रूद्र, नरेश मैं जिन शब्दों मैं तुम्हारा शुक्रिया अदा करू समझ नहीं आ रहा है

नरेश-ये आप कैसी बात कर रहे है भैया राघव और रमण की सुरक्षा करना मेरा फर्ज था, अफ़सोस इस बात का है के अगर गुरूजी के कहे मुताबिक मैं राघव से मिल लेता तो शायद आज दुनिया पर इतना बड़ा खतरा न मंडरा रहा होता पर आपने.....

रमण-आप नरेश जी को कैसे जानते है पिताजी?

अनिरुद्ध- वो..

नरेश-ये कैसा सवाल है रमण....मैं अभी तुम्हे बताया था के मैं और मेरा भाई महेश गुरूजी के साथ रहते थे जाहिर है मैं अनिरुद्ध भैया और भाभी को अच्छी तरह जानता हु...

अनिरुद्ध-मैं डर गया था नरेश, पिताजी के जाने के बाद मैं अपने बच्चो को किसी मुसीबत मैं नहीं देखना चाहता था और यहाँ तो पिताजी ने राघव के कंधो पर पूरी दुनिया का जिम्मा डाला था..

राघव-मतलब आप को इन सब के बारे मैं पहले से खबर थी

अनिरुद्ध-हा, पिताजी ने जो बाते तुम्हारे बारे मैं नरेश को चिट्ठी मैं बताई थी वो उन्होंने मुझसे कहा था लेकिन मैं नहीं चाहता था के तुम इस तरह के किसी खतरे मन पड़ो इसीलिए मैंने कभी तुमसे इस बारे मैं कोई बात नहीं की राघव, नरेश जब अमेरिका से लौट कर तुमसे मिलना चाहता था तब मैंने ही उसे रोका था, पर नियति को जो मंजूर होता है वही होता है तुम आज यहाँ पहुच ही गए

नरेश-मैं आपकी चिंता समझता हु भैया....

अनिरुद्ध-पिताजी सही कहते थे आप कितनी ही कोहिश क्यों न कर लो जो होना है वो होकर ही रहता है खैर जो हुआ सो हुआ अब मैं उन लोगो से लड़ने मैं क्या मदद कर सकता हु बताओ...

रमण-ये काम हम पर ही छोडिये पिताजी आप घर जाइये और माँ और श्रुति से कहिये की मैं और राघव ठीक है कुछ काम ख़त्म करके जल्द ही आते है...

अनिरुद्ध-पर...

राघव-भाई सही कह रहा है पिताजी....

ये सब बाते यहाँ चल ही रही थी तभी अरुण को किसी का फ़ोन आया जिसे सुन कर उसका चेहरा गंभीर हो गया..

अरुण-नरेश भाई बुरी खबर है..मेरा शक सही निकला आज रात कुछ बड़ा होने वाला है कालसैनिक अंतिम कुर्बानी की तयारी कर रहे है....

नरेश-क्या??

अरुण-हा हमारे पास समय बहुत कम है

नरेश-रमण तुम भैया को घर छोड़ आओ और मुझे यही आकर मिलो तब तक हम आगे की रणनीति सोचते है..

रमण-ठीक है....

वही दूसरी तरफ...

इस वक़्त रात के १२ बज रहे थे और राजनगर मं भरी बारिश शुरू हो गयी थी, समय समय पर थर्रा देने वाली बिजली भी चमक उठती थी लेकिन बारिश या बिजली का असर उन काले लम्बे चोगे वाले नकाबपोशो पर नहीं पड़ रहा था जो उस विशाल कब्रिस्तान मैं भरी तादाद मैं मौजूद थे जहा रोहित की बलि दी गयी थी...

सुशेन एक उची जगह पर खड़ा होकर अपनी बुलंद आवाज मैं सबको संबोधित कर रहा था

सुशेन-मेरे दोस्तों! १००० वर्ष बाद अब जाकर हमें लोगो के बीच छिपने की जरुरत नहीं रहेगी क्युकी आज रात आखरी कुर्बानी की रात है जो इतने समय से चले आ रहे कुर्बानियों के चक्र को तोड़ेगी.....हमारा देवता समुद्रतल की गहरायो से आजाद होकर इस धरती पर राज करेगा....मैं जानता हु पिछले कुछ दिन हमारे लिए अच्छे नहीं रहे है...उन तुच्छ मनवो ने आज मेरे भाई को मार दिया, मैं इस दुखद घटना के कारण शोक मैं डूब गया था लेकिन कुछ समय बाद मुझे समझ आया के मेरे भाई का बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए, शक्ति के अंत के बाद ब्लू हुड पूरी तरह बिखर गया था मैंने उन्हें हमारे साथ शामिल कर लिया है, हमारे पास जितने अधिक लोग होंगे लक्ष्य तक पहुचना उतना ही आसान होगा, इससे कालसेना की सिमित संख्या मैं बढ़ोतरी हो चुकी है....मेरे साथ दोहराओमहान भगवान कालदूत की.....

कालसैनिक एकसाथ- जय!!!

सुशेन-महान कालदूत अमर रहे!!

कालसैनिक- अमर रहे कालदूत.....!!

कालदूत का जयकारा लगाने मैं सबसे आगे संतोष खड़ा था......

वही राघव नरेश और बाकि सब घर पर तयारियो मैं जुटे थे, रूद्र खिड़की के बाहर देख रहा था नरेश उसके पास जाकर खड़ा हो गया

रूद्र-आज की रात बहुत काली है नरेश जी, बारिश भी तेज है....

नरेश-इतनी फ़िक्र मत करो लड़के

अरुण-हा रूद्र अब इन कालसैनिको पर आखरी वार करने का वक़्त है, वो अपना रिवाज पूरा करने किसी को ढूंढ रहे होंगे हमें उनपर पूरी ताकत से हमला करना है....

रूद्र-अगर मेरे पास उनका पता हो तो मैं अभी जाकर उन सब को ख़त्म कर सकता हु आप लोगो को आने की जरुरत नहीं है...

रमण-लेकिन तुम्हे नहीं पता की वो लोग इस वक़्त कहा पर है और सारे कालसैनिक एक जगह तो मिलेंगे नहीं, उनका प्लान होगा अलग अलग जगह से लोगो को उठाने का प्रयास करे, उन्हें नाकाम करने के लिए हमें भी बिखरना होगा

रमण ने अंदर आते हुए कहा....

संजय-अब हमारा प्लान क्या है आगे क्या करना है?

नरेश-राजनगर मैं कुछ ही ऐसे संवेदनशील हिस्से मैं जहा पर आजतक कालसेना ने हमला किया है जब मैंने इन हिस्सों को मार्क करना शुरू किया तो मुझे समझ मैं आया की असल मैं तीन ही ऐसी जगह है जहा ये कालसेना के लोग हमला करते है, अब हमें भी उन्हें ढूंढने के लिए तीन टीम्स मैं बटना होगा, उत्तर दिशा की तरफ रूद्र अकेला जायेगा क्युकी उसपर काले जादू का telekinesis का असर नहीं होता है, पूरब मे मैं और अरुण जायेंगे और दक्षिण मैं राघव संजय और रमण, रूद्र के अलावा हम सबको उनका सामना करने के लिए हथियारों की जरुरत होगी क्युकी हम मे से कोई भी रूद्र जैसा अभेद्द नहीं है, राघव हो सकते तो अपनी शक्तियों को पहचानने की कोशिश करो हमें तुम्हारी जरुरत है बच्चे, अपनी रफ़्तार और बहुबल हो पहचानो, तुम यहा अकेले ऐसे इंसान हो जो कालसैनिको का खात्मा चंद पालो मैं कर सकते हो तुमसे हमें बहुत उमीदे है

राघव-मैं पूरी कोशिश करूँगा

नरेश-पहले हम छिपकर उनकी गतिविधि देखेंगे, उनका कोई गुप्त अड्डा जरूर होगा जहा पर वो सब मिलते होंगे और आज जब वो आखरी कुर्बानी ढूंढने निकले है तो सारे कालसैनिक एक जगह जरूर इकठ्ठा होंगे, हम बस चुप चाप उनका पीछा करके वो गुप्त स्थान ढूंढेंगे और फिर बिना नजरो मैं आये RDX प्लांट करेंगे और पूरी जगह ही उड़ा देंगे और अगर फिर भी कोई कालसैनिक बच गया ओ उसके लिए हथियारों का इंतजाम अरुण ने कर दिया है, देखते ही मार देंगे उन्हें बस ध्यान रहे उन्हें मौका नहीं मिलना चाहिए वरना आखरी कुर्बानी हम मैं से किसी की होगी, सभी को गुड लक

सभी लोग घर के बाहर निकले, अबतक बारिश हलकी हो चुकी थी और हवा मैं ठण्ड के साथ नमी भी बढ़ चुकी थी लेकिन रात का अँधेरा और सन्नाटा बरक़रार था साथ ही रह रहकर बिजली भी जोरो से कड़क रही थी, तीनो टीम के लोग आपस मैं एकदूसरे से गले मिले और रूद्र नरेश के पास आया

रूद्र(झिझकते हुए)- देखिये...अगर आपको वो लोग मिले तो आपको मुझे या राघव को कॉल करना है खुद कोई एक्शन नहीं लेना है

नरेश-मैं समझता हु रूद्र तुम्हे मेरी चिंता है लेकिन अगर हमारा प्लान काम कर गया तो चिंता की कोई बात नहीं है

रूद्र-कुछ चांस ये भी है के हमारी योजना काम न करे फिर हम क्या करेंगे? आप जानते है आपके सिवा मेरा दुनिया मे कोई नहीं है मैं नहीं चाहता आपका हाल आपके भाई और मेरे निर्माता जैसा हो...

नरेश-मैं वादा करता हु की अगर मुझे कुछ गड़बड़ लगी तो तुम्हे या राघव को कॉल करूँगा खुद कोई एक्शन नहीं लूँगा, अब मेरी चिंता करने का वक़्त नहीं है बल्कि धावा बोलने का वक़्त है

फिर तीनो टीम्स अपने लक्ष्य की तरफ रवाना हुयी, रमण संजय और राघव रमण की जीप मैं जिसके पीछे वाली सीट पर उन्होंने अरुण के दिए हुए हथीयार रखे थे, नरेश और अरुण अरुण की गाड़ी मैं जिकसी डिक्की मैं भी काफी हथीयार थे और रूद्र अपनी बाइक पर बैठकर अपनी लोकेशन की तरफ रवाना हुआ.....

भाग २२​

अरुण और नरेश तेजी से अपनी गाड़ी मैं पूरब दिशा की और बढ़ रहे थे, जिस तरफ वो लोग इस वक़्त जा रहे थे वो कुछ कुछ जंगली इलाका था, समय समय पर गीदड़ और भेडियो की मनहूसियत भरी आवाज से वातावरण गूंज रहा था लेकिन उनके पास इन सब बातो पर ध्यान देने का वक़्त नहीं था.

वो एक ऐसे इलाके मैं पहुचे जहा सड़क और संकरी हो गयी थी और चारो तरफ जमीन पर छोटी छोटी झाड उगी हुयी थी, दूर दूर तक एक भी स्ट्रीटलाइट नहीं थी, इंसान तो छोडो कोई जानवर भी नजर नहीं आ रहा था, ख़राब इंटरनेट की वज्र से नरेश के मोबाइल का जीपीएस ढंग से काल नहीं कर रहा था और इसी वजह से मजबूरन उन्हें कागज का नक्षा खोलकर देखना पड़ा..

नरेश-नक़्शे के हिसाब से तो यही वो जगह है जाया ये कालसैनिक एक बार नहीं बल्कि कई बार देखे जा चुके है, यहाँ से कई लोगो सारे को गायब किया है उन्होंने

अरुण-इसका मतलब हमें गाडी की गति धीमी कर लेनी चाहिए और सतर्क हो जाना चाहिए, इस प्रकार की अँधेरे और वीरान जगह पर वो लोग कही भी घात लगा कर बैठे हो सकते है हमें काफी सावधानी बरतनी होगी

नरेश-वो तो ठीक है अरुण पर तुम ज्यादा जोश मैं मत आ जाना, हमें पहले छिपकर चुपचाप चीजों का अवलोकन करना है उन्हें शक नहीं होना चाहिए

अरुण-मैं ये बात जानता हु नरेश भाई मुझे पता है की ये सब कितना जरुरी है

नरेश-और और बात है अरुण

अरुण-तो बोलिए न नरेश भाई

नरेश-अगर वो लोग मुझे पकड़ ले तो तुम तेजी से निकल जाना पहले अपनी जान बचाना समझे...

अरुण-पर आप ऐसा सोच ही क्यों करे है? हमारा प्लान जरूर कामयाब होगा और अगर उनलोगों ने आपको कुछ भी किया तो रूद्र हर एक के दस टुकड़े कर देगा.

नरेश-इसी बात का तो डर है

अरुण-मतलब?

नरेश-रूद्र कोई इंसान तो है नहीं न अरुण, मतलब मेरी या तुम्हारी तरह नहीं, वो बिना ज्यादा सोचे लोगो को निर्दयता से मार देता है, हालाँकि ये कालसैनिक जिन्दा छोड़े जाने के लायक भी नहीं है पर कभी कभी मैं सोचता हु के अगर रूद्र इंसानियत के विपक्ष मैं लड़ा तो क्या होगा? राघव ही केवल एकमात्र ऐसा इंसान है जो रूद्र की क्षमताओ पर काबू कर सकता है बस वो जल्द से अपने अप को जान ले

अरुण(मजाकिया अंदाज मे)-वो सब तो ठीक है नरेश भाई पर पहले फिलहाल तो हमें अपने लक्ष्य परे ध्यान देना चाहिए, वैसे भी आप इस तरह के काम के लिए बूढ़े हो चले है

नरेश(मुस्कुराकर)- हा हा और तुम तो अभी बच्चे हो न

तभी अचानक अरुण ओ गाड़ी के ब्रेक लगाने पड़े और नरेश को झटका महसूस हुआ, एक व्यक्ति सड़क पर बेहोश पडा हुआ था

नरेश-लगता है उनलोगों को उनका शिकार मिल गया, इसे किसी कारण उन्होंने यहा छोड़ दिया, तुम इसे उठा लो और एम्बुलेंस को फ़ोन कर दो

अरुण-रुको नरेश भाई! गाड़ी से उतरना ठीक नहीं होगा ये उनलोगों की कोई चाल भी हो सकती है

नरेश-और अगर चाल नहीं हुयी तो? एक जिर्दोश मारा जायेगा अरुण, अपनी बन्दूक उठाओ और सावधानी से जाकर चेक करो

बारिश और कदक्तो बिजली माहोल को और भिज्यदा भयानक बना रही थी, इस माहोल मैं अरुण गाडी से बाहर निकला, वातावरण मैं अब कुत्तो और बिल्लियों की मनहूस आवाजे भी शामिल हो गयी थी, अरुण धीरे धीरे बन्दूक लेकर बेहोश व्यक्ति की तरफ बढा, उसने धीरे से उस व्यक्ति को देखने के लिए उसे हाथ लगाया ही था के तभी अचानक उस बेहोश पड़े व्यक्ति ने अरुण के गर्दन को पकड़ लिया और एक ‘चटाक’ की आवाज़ हुयी और उसी के साथ ही अरुण की जान चली गयी, नरेश गाड़ी मैं बैठ ये नजारा देख चूका था और अब वो घबराने लगा था,

वो व्यक्ति उठा और उसने अपना काला चोगा और नकाब पहना और अरुण को वही सड़क पर मरा छोड़कर वो व्यक्ति गाडी की तरफ बढ़ा, अब तक नरेश गाडी का स्टीयरिंग संभाल चूका था, उसने तेजीसे गाडी को उस इंसान की तरफ बढाया लेकिन उस व्यक्ति ने केवल अपना हाथ हवा मैं उठाया और गाडी बंद पड गयी, नरेश ने कई बार चाबी घुमाकर गाडी दोबारा स्टार्ट करने की कोशिश की लेकिन कुछ नहीं हुआ,

उस व्यक्ति के हाथो मैं फिर से हरकत हुयी और अबकी बार गाडी का पूरा दरवाजा उखाड़कर निकल गया, उस इंसान ने कुछ देर नरेश को घुरा और फिर उसके करीब आया, नरेश अबतक उस आदमी का चेहरा ठीक ढंग से देख नहीं पाया था और उसने अरुण को मारते ही नकाब पहन लिया था और अब उस इंसान से नरेश को घूरते हुए फिर से अपना काला नकाब उतारा.....

वो कोई और नहीं सुशेन था और इस वक़्त उसके चेहरे पर अजीब सा वहशिपन था! उसने नरेश को गाडी से बाहर खिंच लिया, नरेश ने एक जोरदार मुक्का उसके चेहरे पर जड़ना चका लेकिन उसने नरेश का हाथ पकड़ कर जोर से भींच दिया जिससे नरेश की हथेली की हड्डियों का कचूमर बन गया जिससे नरेश की चींख निकल गयी, नरेश की चींख ने उस सुनसान माहोल को बुरी तरह देहला दिया, फिर सुशेन ने एक जोरदार घुसा नरेश के पेट मैं जादा जिससे उनके मुह से खून आने लगा, अब नरेश पूरी तरफ अशक्त होकर जमीन पर पड़ा हुआ था.....

सुशेन-तुम लोग मेरे भाई के मौत के जिम्मेदार हो.

सुशेन ने काफी क्रोध मैं कहा

नरेश-तुम...तुम्हे कैसे पता?

सुशेन-जब पुलिस स्टेशन मे रूद्र ने शक्ति को मारा और इस इंस्पेक्टर और उसके भाई को लेकर तुमसे मिलने आया तब भी मेरे लोग बेहद सावधानी से उनका पीछा कर रहे थे, उन्हें तुम्हारी लोकेशन मिल गयी, हम चाहते तो किसी भी वक़्त तुम्हारे घर पर हमला कर सकते थे लेकिन हमसे सही मौके का इंतजार किया और तुम तक हमारी खबर पहुचाई और हमें मौका मिल गया जब तुम लोग अलग अलग रस्ते हमारी तलाश मैं निकले

नरेश-म...मतलब तुम्हे पुरे समय हमपर नजर राखी?

सुशेन-हा हा हा, हमने इस मामले मैं तुमसे थोडा ज्यादा होशियारी से काम किया लेकिन चिंता मत करो, तुम्हारी मृत्यु को हम ऐतहासिक बनायेंगे, क्युकी तुमको हम मौका देंगे वो अंतिम कुर्बानी बनने का को कालदूत के लिए इस दुनिया का मार्ग प्रशस्त करेगी.....

फिर सुशेन ने एक जोरदार घुसा नरेश को जड़ा जिससे उसका दिमाग बेहोशी के अँधेरे मैं डूबता चला गया, फिर उसके बेहोश शारीर को अपने कंधे पर डालकर सुशेन एक और बढ़ता चला गया

दूसरी तरफ राघव जो रमण और संजय के साथ निकला था उसे किसी अनहोनी घटना का आभास होने लगा, उन्हें अब तक अपने मार्ग मैं कोई भी ऐसी चीज़ या हरकत नहीं दिखी थी जो इस और इशारा करे करे की यहाँ कालसेना की मौजूदगी होसकती है

राघव ने अरुण और नरेश ने संपर्क बनाने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ उनका फ़ोन नहीं लग रहा था और जब राघव की कई कोशिशो ने बाद भी नरेश का फ़ोन नहीं लगा तो उसे चिंता होने लगी और उसने रूद्र को फ़ोन लगाया

रूद्र बाइक से तेजी से बढ़ रहा था तभी उसका फ़ोन बजा और उसने फ़ोन उठाकर कान को लगाया

राघव-रूद्र! मैं राघव बात कर रहा हु

रूद्र-हा! क्या हुआ है सब ठीक है न?

राघव-हमारे पास सब ठीक है लेकिन अरुण और नरेश जी से हमारा संपर्क टूट गया है

रूद्र-शायद बारिश की वजह से ऐसा हो..!

राघव-काश ऐसा ही हो वैसे हमें यहाँ किसी भी कालसैनिक का नामोनिशान नहीं मिला है तुम कहो

रूद्र-अभी तक तो नहीं...

राघव-तो क्या नरेश जी और अरुण......

रूद्र मेरे मन को किसी अनहोनी का आभास हो रहा है

राघव की बात सुनकर रूद्र भी बुरी तरह आशंकित हो गया उसे अचानक कुछ याद आया और उसने राघव की बात को बीच मैं काटकर पूछा

रूद्र-रमण ने किसी कब्रिस्तान के बारे मैं बताया था कुछ!

राघव-हा एक पुराना कब्रिस्तान है जहा भाई को रोहित नाम के एक इंसान की जली हुयी लाश मिली थी मैं जानता हु उस जगह के बारे मैं

रूद्र-तुम सबको लेकर तुरंत वहा पहुचो मैं भी पहुच रहा हु बस एक बात का ध्यान रखना राघव मेरे आये तक प्लीज कोई एक्शन मत लेना मेरा इंतजार करना

राघव-ठीक है...

उसके बाद राघव ने रमण और संजय को ये बात बताई और वो लोग उस कब्रिस्तान की और निकल गए और रूद्र ने भी अपनी बाइक उस कब्रिस्तान की और मोड़ ली....

भाग २३​

राघव संजय और रमण अपनी जीप से कुछ ही समय मैं कब्रिस्तान पहुच गए थे और उन्होंने अपनी जीप कब्रिस्तान से कुछ दूर पहले ही कड़ी कर दी थी ताकि उसकी आवाज से कही कालसैनिक सतर्क नहो जाए फिर जीप की पिछली सीट से एक एक रायफल उठाकर वो सावधानी से कब्रिस्तान की और बढे, कब्रिस्तान के बाहर लोहे के गेट के बगल मैं एक बरगद का पेड़ था वो लोग उसकी ओट मैं छिप गए,

वहा से कब्रिस्तान के अंदर का दृश्य देख पाना इतना आसन नहीं था क्युकी अँधेरा होने के कारण दूर तक ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन कब्रिस्तान के अंदर से आ रही आवाजो को सुना जा सकता था, ये आवाजे उनलोगों को दूर से ही सुने दे रही थी जिससे इतना तो तय हो चूका था के ये लोग अंदर की है और कुछ भरी गड़बड़ कर रहे है

रमण(फुसफुसाकर)- ये क्या! ये लोग तो अंदर कोई मंत्र वगैरा पढ़ रहे है

राघव-इन्हें अंतिम कुर्बानी मिल गयी है भैया ये वही मंत्र है जो मैंने उस किताब मैं देखे थे, इनकी तो....! मैं इन्हें अभी ख़त्म कर दूंगा..!

संजय-रुको राघव! गुस्से मैं बेवकूफी के कदम नहीं उठाया करते, तुम पूरी तरह टायर नही हो, हमें रूद्र का इंतजार करना है, देखो वो भी आ गया है

संजय को रूद्र दूर से आता हुआ दिखाई दिया, रूद्र ने अपनी बाइक उनकी जीप के पास कड़ी कर दी और तेजी से उनलोगों के पास पंहुचा

रूद्र-क्या चल रहा है?

राघव-उन लोगो को अंतिम कुर्बानी मिल गयी है

रूद्र-अच्छा है ये सब एक जगह है, मैं उन कमीनो को छोडूंगा नहीं तुम लोग यही रुको

राघव-तुम नहीं हम मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा

रूद्र-तुम तयार हो

राघव-बिलकुल ज्यादा नहीं तो उनके दिमाग मैं घुस के उनकी नसे तो फाड़ ही सकता हु

रूद्र-ठीक है तो फिर चलो आज इनका काम ही ख़तम कर दे

रमण-रुको हम भी चलते है

रूद्र-क्या आप मेरी तरह कृत्रिम मानव है या आपके पास राघव के जैसी शक्तिया है

रमण-आ....

नहीं

रूद्र-तो फिर अप दोनों यही रुके, मेरा तो यर लोग वैसे भी जादू टोने से कुछ बिगाड़ नहीं सकते और राघव अपनी शक्तियों से इन्हें मसल देगा बस अगर कोई कालसैनिक हमसे बचकर बाहर भागने का प्रयास करे तो उसे गोली मारने मैं देर मत कीजियेगा, अपने हथियार तयार रखिये

राघव-रूद्र सही कह रहा है भाई....

फिर कुछ पल के लिए राघव ने वही आसन लगा कर अपनी आँखें बंद की और ध्यान की मुद्रा मैं बैठ गया मनो अपनी शक्तियों का आकलन कर रहा हो और जब उसने अपनी आँखें खोली तो उसकी आँखें हलके हरे रंग मैं चमक रही थी और उसके होठो पर एक मुस्कान थी और मस्तिक्ष एकदम शांत, अब राघव जानता था की उसे क्या करना है

वही रूद्र धडधडाते हुए कब्रिस्तान मैं घुस गया लेकिन वहा का दृश्य देख कर उसका खून खुल उठा, कालसैनिक गोल घेरा बनाकर मंत्रोच्चारण कर रहे थे और उनके घेरे के ठीक बीच मैं बुरी तरह से घायल नरेश अर्धबेहोशी की अवस्था मैं दिवार मे के एक बड़े से टुकड़े मैं गडी हुयी लोहे की जंजीरों से बंधा हुआ था

रूद्र को देखते ही मंत्र का उच्चारण करते कालसैनिक एकदम से रुक गए और रूद्र ने गुस्से मैं अपनी मुट्ठिया भींच ली

यहाँ राघव ने जैसे ही आंखन खोली तब तक रूद्र कब्रिस्तान मैं जा चूका था तो राघव ने भी उसके पीछे दौड़ लगा दी पर इस बार उसकी गति अकल्पनीय रूप से बढ़ी हुयी थी वो पलक झपकते ही रूद्र के पास खड़ा था मनो उसने एक जगह से दूसरी जगह टेलिपोर्ट किया हो, राघव खुद अपनी गति से चौक गया था पर ये समय इन सब के बारे मैं सोचने का नहीं था सामने का नजारा देख कर राघव भी गुस्से से उबलने लगा तभी रूद्र क्रोध मैं आकर बोला

रूद्र-तुम लोगो की यह हिम्मत जो नरेशजी को कैद करो!! मैं तुममे से किसी एक भी जिन्दा छोड़ने वाला नहीं हु

राघव वहा मौजूद सभी कालसैनिको की मानसिक स्तिथि का अंदाजा लगा सकता था उसने जैसे ही कब्रिस्तान के मैंदान मैं चारो तरफ नजर दौडाई उसी के साथ वो अपनी शक्तियों से वहा मौजूद सभी के दिमाग से मानसिक रूप से जुड़ चूका था पर वो एकसाथ सब पर हमला नहीं कर पा रहा था पर उनके दिमाग को भाप रहा था ,रूद्र की गुस्से भरी गर्जना सुन कर कालसैनिक कुछ समय के लिए घबराये जरूर थे पर उनमे डर का नामोनिशान नहीं था

रूद्र तेज कदमो से उस घेरे की तरफ आगे बढ़ने लगा तभी अचानक किसी ने उसे एक जोरदार लात मार कर दूर फेक दिया,, रूद्र के जीवन मैं ये पहली बार था के वो किसी के प्रहार से इतनी दूर जाकर गिरा था वही इस बात ने राघव को भी चौका दिया था क्युकी जो रूद्र की क्षमता को जनता था और अगर किसी ने रूद्र को एक लात मैं इतनी दूर फेका है तो वो कोई मामूली इंसान नहीं हो सकता, राघव और रूद्र दोनों ने रूद्र पर हमला करने वाले को देखा तो सामने चेहरे पर राक्षसी भाव लिए सुशेन खड़ा था, उसकी आँखों की पुतलिया पूरी तरह लाल हो चुकी थी जिसके कारण वो

बेहद भयानक लग रहा था

सुशेन(कुटिलता से मुस्कुराते हुए)- तो अब हम दोबारा मिल गए! और तुम अपने साथ इस बच्चे को भी ले आये, अगर मुझे पहले पता होता की तुम इस तुच्छ इंसान को अपने साथ लाने वाले हो तो अंतिम कुर्बानी के लिए इस बुड्ढे को नहीं चुनता मैं

राघव-अभी तुम्हे पता चल जायेगा की तुच्छ कौन है

और राघव ने सुशेन की तरफ दौड़ लगा दी और पलक झपकने भर मणि राघव ने सुशेन को पूरी ताकत से एक मुक्का जड़ दिया पर उसका सुशेन पर इतना खास प्रभाव नहीं परा पर इतना उसे समझ आ गया था के राघव कोई मामूली इंसान नहीं है, सुशेन राघव ने मुक्के से बस एक फूट दूर सरका था और फिर जब उसने राघव पर telekinesis करने का सोचा तो वो उसका दिमाग भेद नहीं आया, सुशेन ने इतना प्रबल मस्तिक्ष पहले कभी महसूस नहीं किया था

सुशेन(हैरानी से )-कौन हो तुम??

राघव-इतनी जल्दी क्या है जान जाओगे

तभी रूद्र अपनी जगह से उठ आया और उसने सुशेन पर वार करने की कोशिश की लेकिन सुशेन ने इस बार भी उसका हमला नाकाम कर दिया

सुशेन-तुम आज मुझसे नहीं बचोगे रूद्र

रूद्र-तुममे इतनी जबरदस्त शक्ति कहा से आ गयी?? क्या किया है तुमने?

सुशेन-हमारे प्रभु कालदूत का शारीर भले ही समुद्र की गहराइयों मैं दफ़न है लेकिन वे मंसिर रूप से हरदम हम लोगो के रूप मैं सक्रिय है इसीलिए उनको ये बात ज्ञात है की उनको स्वतंत्र करने से हम लोग केवल १ कुर्बानी दूर है इसीलिए उन्होंने अपनी शक्ति का एक बड़ा हिस्सा मुझे दे दिया है तकी इस कार्य मैं कोई बाधा न आये मेरे शारीर मैं इस वक़्त ऐसी शक्ति है की मैं तुझे चींटी की तरह अभी मसल दू

वहा मौजूद सारे कालसैनिक इस वाकये को अपने सामने होता देख रहे थे मगर कोई भी एक वक़्त सुशेन के बीच मैं नहीं आ रहा था या राघव और रूद्र को रोकने की कोशिश नहीं कर रहा था

राघव-मेरे होते हुए ये इतना भी आसन नहीं है

राघव ने सुशेन से कहा औरपने दोनों हाथ हवा मैं एक विशिष्ट मुद्रा मैं लहराए और उन्हें सुशेन की तरफ किया जिससे एक तेज हवा का झोका धुल को अपने मैं समेटे सुशेन की तरफ बढ़ा और उसी हवा की रफ्तारसे राघव ने सुशेन पर हमला किया लेकिन सुशेन ने अपने एक हाथ राघव का वार खली कर दिया और उसे दूर फेक दिया

रूद्र गुस्से से चिल्लाते हुए सुशेन की तरफ भगा लेकिन सुशेन ने फिर एक जोरदार घुसा रूद्र के मुह पर रसीद किया जिससे वो वही गिर५ पड़ा, उसके कृत्रिम शारीर ने जीवन मैं पहली बार खून दर्द और बेबसी का अनुभव किया था, रूद्र और राघव दोनों ही इस वक़्त अपने आप को सुशेन के सामने बेबस महसूस कर रहे थे, सुशेन रूद्र को घसीटते हुए राघव के पास ले गया, राघव इस वक़्त जमीन पर पड़ा करह रहा था, क्या करे उसे कुछ सूझ नहीं रहा था, सुशेन ने उन दोनों को गर्दन से पकड़कर उठा लिया, राघव और रूद्र दोनों अपनी पूरी ताकत के लगाकर भी सुशेन की पकड़ से छुट नहीं पा रहे थे, राघव

तो दर्द मैं अपनी शक्तिया भी भुला बैठा था

सुशेन(क्रोध से)- तुम लोगो ने मेरे भाई को मार डाला! पता है कितना दर्द होता है जब हम किसी अपने को खोते है? मैं बताता हु,

सुशेन ने दोनों को गर्दन से पकड़ कर उठाकर रखा था फिर उसने एक कालसैनिक को इशारा किया और उसने राघव और रूद्र के सामने telekinesis द्वारा नरेश को यातना देना शुरू किया, नरेश दर्द के कारण बुरी तरह चीख रहा था क्युकी धीरे धीरे उसके पेट का उपरी आवरण हट रहा था और त्वचा से फटकार बाहर आती अंतड़िया दिखने लगी थी

राघव और रूद्र काफी कोशिशो के बाद भी खुद को छुड़ा नहीं पा रहे थे

सुशेन- हा हा हा! अब वक़्त है आखरी कुर्बानी देने का, इस कुर्बानी के कारण हजार वर्षो से चला आ रहा कुर्बानी का चक्र समाप्त हो जायेगा और महान कालदूत का आगन इस धरती पर होगा, फिर वे देवताओ की इस सृष्टि को अपनी सृष्टि बनायेंगे और मैं बनूँगा इस नई दुनिया के सृजन मैं उनका सहयाक, उनका परम अनुयायी!

सुशेन ने दुसरे कालसैनिक को इशारा किया उर उसने पास ही पड़ा एक केरोसिन का डब्बा telekinesis द्वारा नरेश के पिरे शारीर पर छिड़क दिया और माचिस से आग लगा दी, इस दौरान बाकि कालसैनिको का मंत्रोच्चारण काफी तेज हो गया था और नरेश को अत्याधिक्क पीड़ा का अनुभव हो रहा था, उसका शारीर जल उठा था वो चीख रहा था लेकिन उससे भी बुरी तरह रूद्र चीख रहा था वही राघव अपने पुरे प्रयास के बाद भी सुशेन की मजबूत पकड़ से नहीं निकल पा रहा था और नरेश को जलता देखने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा था.......

भाग २४​

सुशेन ने दुसरे कालसैनिक को इशारा किया उर उसने पास ही पड़ा एक केरोसिन का डब्बा telekinesis द्वारा नरेश के पिरे शारीर पर छिड़क दिया और माचिस से आग लगा दी, इस दौरान बाकि कालसैनिको का मंत्रोच्चारण काफी तेज हो गया था और नरेश को अत्याधिक्क पीड़ा का अनुभव हो रहा था, उसका शारीर जल उठा था वो चीख रहा था लेकिन उससे भी बुरी तरह रूद्र चीख रहा था वही राघव अपने पुरे प्रयास के बाद भी सुशेन की मजबूत पकड़ से नहीं निकल पा रहा था और नरेश को जलता देखने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा था.......

जल्द ही नरेश ने रहा सहा प्रतिरोध करना भी बंद कर दिया, उसके शारीर की सारी हरकते और तड़प शांत हो चुकी थी, अब तक हलकी पड़ चुकी बारिश अब एकबार फिर तेज हो गयी थी और अब तक बुरी तरह गल चुके उनके शारीर को जलाती आग भी धीरे धीरे बारिश से बुझने लगी थी लेकिन आग बुझने तक वो शारीर शारीर नहीं रहा बल्कि जंजीरों मैं लटका मांस का एक लोथड़ा बन चूका था, आखरी कुर्बानी की प्रक्रिया संपन्न हो चुकी थी, रूद्र बस एकटक उस जगह की तरफ देखे जा रहा था जहा कुछ समय पहले नरेश जी जीवित मौजूद थे,

सुशेन ने उन दोनों की गर्दन छोड़ दी, रूद्र घुटनों के बल जमीन पर बैठ गया वही राघव अर्धबेहोशी की हालत मैं पहुच चूका था और जमीन पर लेट रहा था और अपनी सास नोर्मल कर रहा था,

रूद्र जमीन पर बैठा नरेश को लाश को एकटक देख रहा था, पहले इनलोगों ने उसके निर्माता को मारा था फिर जिस व्यक्ति ने उसे पिता की तरह पाला उसे इन कालसैनिको ने इतनी भयानक मौत दी थी, रूद्र की पूरी दुनिया ही उजाड़ गयी थी और जब किसी के साथ ऐसा होता है तो उसे दुःख नहीं होता बल्कि उसका पूरा दिमाग ही कुछ समय के लिए शुन्य मैं चला जाता है, रूद्र के साथ ऐसा ही हुआ था उसके रोना नहीं आ रहा था, सही कहा जाये तो उसे कुछ भी महसूस होना बंद हो चूका था,

नरेश की मौत से वो भी इतनी भयानक मौत से राघव भी शोक मैं डूबा हुआ था कही न कही उसे ऐसा लग रहा था के ये सब उसी के कारण हुआ है क्यों वो अपनी शक्तिया सही से इस्तमाल नहीं कर पाया, उसने मान ही लिया थाए ये जंग वो हार चुके थे और अब कुछ नहीं बचा था और धीरे धीरे राघव की ऑंखें बंद होने लगी

वही सुशेन कुटिल और विजयी मुस्कान लेकर खड़ा था, गोले मैं खड़े कालसैनिको के मंत्रोच्चारण बंद हो चुके थे, कालदूत के जागने की प्रक्रिया पूर्ण होने की आपर ख़ुशी उन सबके चेहरे पर देखी जा सकती थी

सुशेन- हा हा हा...

प्रक्रिय पूरी हुयी, अब १००० साल का इंतज़ार ख़त्म! हमारे देवता अब इस नापाक धरती पर अपना कदम रखेंगे, सभी धर्मो के लोग अब सिर्फ कालदूत की पूजा करेंगे और को विरोध करेगा उसे ऐसी ही भयानक मौत दी जाएगी और सबसे पहले इन्ही लोगो की बारी है जिन्होंने कालदूत के माहन कार्य मैं बाधा बनने की कोशिश की है

रूद्र के मुह से खून रिस रहा था और उसके कपडे जगह जगह से फटे हुए थे पर अब भी वो शुन्य मैं था, उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी वही राघव ने जैसे ही अपनी आंखे बंद की उसे उसके मस्तिष्क मैं उसके दादा की छवि उभर्तोई दिखी मनो वो उससे कह रहे हो की ये अंत नहीं है अभी तो और भी काम करने बाकि है, अब राघव की चेतना लौटने लगी थी और उसमे एक नई हिम्मत का संचार हुआ था, राघव की हालत भी रूद्र से अलग नहीं थी चोटे उसे भी आयी थी लेकिन वो दोबारा उठ खड़ा हुआ, अब उसे दर्द महसूस नहि हो रहा था और शारीर मैं ये नई उर्जा न मनो प्रवाह बह रहा हो, इस बार राघव के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे न डर न गुस्सा न दुःख, उसकी हिम्मत देख कर रूद्र भी अपनी चेतना मैं वापिस आया और एक बार फिर वो कालसैनिको से लड़ने के लिए उठ खड़ा हुआ

अभी तक सुशेन और कालसैनिको का ध्यान इनपर नहीं गया था सुशेन कालदूत की आज़ादी की ख़ुशी मन रहा था

सुशेन-हा हा, कालसैनिको कुछ ही समय मैं हमारे भगवान हमारे बीच होंगे उसके पहले हमें इन बद्जतो को इनके किये की सजा देनी है सबसे पहले तो ये मरेगा जिसपर telekinesis असर नहीं करती, इसे मैं अपने हाथो से मारूंगा और उसके बाद इसके साथ आया हुआ लड़का

तभी पीछे से राघव से सुशेन को आवाज दी जिससे सुशेन का ध्यान उन दोनों पर गया

राघव-ओ.....तट्टो के सौदागर, ये लडाई अभी ख़त्म नहीं हुयी है और भेंचोद अगर मरना ही है तो कमसे कम तुमको मार के मरेंगे मादरजात.....

राघव की बात और उसके मुह से अपने लिए गाली सुनके सुशेन का गुस्सा भड़क रहा था मगर जब तक वो कुछ करता राघव ने उसकी तरफ दौड़ लगा दी और राघव इतनी तेजी से सुशेन की और लपका की किसी को समझ ही नहीं आया और राघव मे सुशेन पर अपने मुक्को की बारिश कर दी पर कालदूत की दी हुयी शक्तियों की वजह से सुशेन राघव के हमले को भाप गया और उसने भी अब राघव का प्रतिरोध करना शुरू कर दिया अब लग रहा था की दो टक्कर के प्रतिद्वंदी लड़ रहे है वही जब इनदोनो के बीच कालसैनिको ने हस्तक्षेप करने ने कोशिश की तो उनके बीच रूद्र खड़ा था

लड़ते लड़ते सुशेन ने एक जोरदार प्रहार राघव पर किया जिससे वो कुछ फूट पीछे सरक गया मगर इतने मैं रूद्र सुशेन से लड़ने उसके सामने थे, सुशेन ने फिर रूद्र को घुसा मारने की कोशिश की लेकिन इस बार रूद्र ने सुशेन के वार को अपने हाथ से रोक लिया, ये देख कर सुशेन को बेहद हैरानी हुयी, उसे कुछ देर पहले अपने शारीर मैं जो असीम शक्ति थी वो अब कम होती महसूस हो रही थी, उसकी आँखों की पुतलिया जो अब तक लाल थी वो सामान्य हो रही थी, अपने अंदर इतने शारीरिक परिवर्तन देख कर अब सुशेन घबराने लगा था

सुशेन-ये...ये क्या हो रहा है? मेरी शक्तिया कहा चली गयी?

रूद्र-तुम्हारा इश्वर तो स्वार्थी निकला रे...जबतक तुमसे काम था तबतक तुम्हे उसने शक्तिया दी और जैसे ही प्रक्रिया पूर्ण हुयी शक्ति वापिस ले ली?

सुशेन से चेहरे पर डर साफ़ देखा जा सकता था रूद्र ने उसके हाथ को जोर से भींच दिया जिससे उसके हाथ की हड्डीया टूट हाई और सुशेन अपना हाथ लेकर वही बैठ गया, ये घटना देख कर बाकि कालसैनिको ने वह से भागने की कोशिश की लेकिन रूद्र और राघव अब उन्हें छोड़ने के मूड मैं बिलकुल नहीं थे

राघव ने अपनी मानसिक शक्तियों के उपयोग से कालसैनिको के सोचने और भागने की गतिको धीमा कर दिया था और जल्द ही पुरे वातावरण कालसैनिको की चीख पुकार से दहल रहा था, रूद्र और राघव एक एक कालसैनिक को तेजी से मार रहे थे

रूद्र ने एक कालसैनिक की छाती के आरपार अपना हाथ ऐसे निकाल दिया मनो उसका शारीर हाड मांस का नहीं बल्कि कागज का बना हो, राघव कालसैनिको के telekinesis से ही उन्हें मात दे रहा था उस कब्रिस्तान मैं मनो इस समय प्रलय नाच रहा था

कुछ सौभाग्यशाली कालसैनिक को दरवाजे से बाहर भागने का मौका मिला भी लेकिन बाहर कदम रखते ही रमण और संजय ने अपनी भरी बन्दूको से उन्हें मारना शुरू कर दिया, कालसैनिक telekinesis के प्रयोग से पहले ही मौत के घाट उतर रहे थे वही कुछ कालसैनिक छिप कर वहा से भाग चुके थे

काफी सारे कालसैनिक अब लाश बन चुके थे और जो दो चार बचे थे उनसे राघव निपट रहा था और रूद्र सुशेन की तरफ बढ़ा तभी एक काला चोगा पहने स्त्री उसके और सुशेन के बीच आ गयी......

भाग २५​

काफी सारे कालसैनिक अब लाश बन चुके थे और जो दो चार बचे थे उनसे राघव निपट रहा था और रूद्र सुशेन की तरफ बढ़ा तभी एक काला चोगा पहने स्त्री उसके और सुशेन के बीच आ गयी.....

रूद(क्रोध से)- सामने से हट जाओ लड़की!

सुशेन बैठा बैठा की अपनी भयानक पीड़ा भूलकर जोर से चिल्लाया

सुषाओं-हट जाओ सारा! ये तुम्हे भी मार डालेगा!

सारा(सुशेन को प्यार से देख कर)- तो मैं ख़ुशी ख़ुशी से तुम्हारे लिए जान दे दूंगी मेरी जान

इतना कहकर सारा ने telekinesis द्वारा वहा मौजूद एक भरी पत्थर उठाया और उसे रूद्र की तरफ फेका अब तक राघव का ध्यान भी इस लडाई की तरफ हो चूका था और वो भरी पत्थर जब तक रूद्र के करीब पहुच कर उसे हानी पहुचता तब तक रूद्र ने एक जोरदार प्रहार उस पत्थर पर किया और उसके टुकड़े हो गए, रूद्र की आँखों मैं अब और क्रोध उतर आया था

रूद्र-मेरा शारीर कोई आम मानव शारीर नहीं है बल्कि तरह तरहके धातुओ से बना है देखना चाह्तिहो मेरी ताकत

सुशेन(घबराकर)-न...नहीं..रूद्र! मुझे मार डालो जितनी बुरी मौत देनी हो दे दो लेकिन इसे छोड़ दो

रूद्र(सुशेन की तरफ देखकर)- तू हमें अपनों की मौत से होने वाले दर्द के बारे मैं बता रहा था न?तुम कालसैनिको ने मेरा निर्माता महेश को मारा और उनके भाई मेरे पिता सामान नरेशजी और उनकी बीवी को मारा तब मैं कुछ नहीं पर सका मगर आज मैं हैवानियत दिखाऊंगा और तुम लोग कुछ नहीं कर सकोगे, कोई एक भी यहाँ से बचकर जिन्दा नहीं जायेगा, तुम लोग हमारे समाज मैं कैंसर की तरफ हो जो हमारे बीच सामान्य लोगो की तरफ रहकर हमें ही नुक्सान पहुचाएंगे

तभी सारा ने एक बार फिर रूद्र पर हमला करने का सोचा वही राघव को मनो आगे होने वाली घटना का पूर्वानुमान हो गया था उसने रूद्र को आवाज़ लगायी “रूद्र रुको!!” पर रूद्र भी सारा की मंशा समझ चूका था और राघव रूद्र को रोक पता या सारा रूद्र पर हमला करती इससे पहले ही रूद्र ने उसे एक जोरदार थप्पड़ रसीद किया जिससे सारा की नाजुक गर्दन की हड्डिया कडकड़ा उठी, रूद्र तो ये अंदाजा भी नहीं लगा पाया था के क्रोध के वश मैं आकर उसने क्या कर दिया है वही राघव भी अफ़सोस मैं था की वो सही समय पर रूद्र को रोक नहीं पाया था, सारा की सासे थम चुकी थी और उसका निर्जीव शारीर धरती पर पड़ा था, धरती पर गिरने के बाद भी उसकी आँखें खुली हुयी थी जो एकटक सुशेन को प्यार से निहार रही थी

सुशेन-नहीं..! तुमने...

तुमने उसे मार डाला! अब तुमलोगों मैं और मुझमे क्या अंतर रह गया है, जरा अपने आस पास देखो तुम दोनों की वजह से कब्रिस्तान मौत का कितना भयानक मंजर फैला हुआ है! तुम लोग हमें राक्षस बताते हो और खुद क्या हो, आज तुमने भी तो लोगो की जान ली है

राघव ने अपने चारो तरफ फैली लाशो को देखा, कुछ दिन पहले अगर उससे कोई कहता की वो क्रूर है तो वो नहीं मानता पर आज उसने कब्रिस्तान मैं जिस क्रूरता का प्रदर्शन किया था उससे वो खुद चकित था, उसे अपने और कालसैनिको मैं कोई अन्तेर नजर नहीं आ रहा था फिर भी उसने अपने बचाव मैं कह

राघव-तुम सब खुनी हत्यारे थे मौत तो तुम्हारा मुकद्दर थी

सुशेन-मान लिया की यहाँ सभी खुनी हत्यारे थे जिन्हें तुम लोगो ने मारा लेकिन हम सबके बीच ऐसा कोई था जो बिलकुल निर्दोष था, जिसने एक भी जान नहीं ली थी जिसे इस रूद्र ने मार डाला

रूद्र का कृत्रिम दिल जोरो से धड़क रहा था

रूद्र-तू किसकी बात कर रहा है??

सुशेन-मेरी बीवी सारा, वह १ महीने की गर्भवती थी और तुमने उसके साथ साथ उसके बच्चे की भी जान ले ली

रूद्र-या ये कहो की एक कालसैनिक को इस दुनिया मैं आने से रोक दिया जो किसी शैतान की भक्ति के नाम पर अपने पिता की तरफ तमाम निर्दोशो का खून बहाता

सुशेन-या फिर मुझ से बगावत करा अरुण की तरह बनता जो अपने की पिता के खिलाफ लड़ा था, तुमने पहले ही सोच लिया था के मेरा बच्चा मेरे जैसा बनेगा? अब तो स्वीकार कर लो की तुम्हारे हाथो एक मासूम का खून चढ़ गया है और तुम लोगो के हाथ भी किसी मासूम के खून से लाल हो चुके है

सुशेन की बातो से राघव और रूद्र बुरी तरफ हिल चुके थे और अब सुशेन इनकी बेबसी पर हस रहा था, काफी देर से बाहर खड़े रमण और संजय भी अंदर आ गए और उन्होंने बाकि बचे कालसैनिको को अपनी बन्दूको से मार डाला और राघव और रूद्र के करीब आये को बुत बने खड़े थे और सामने सुशेन जोर से हस रहा था जिसके बाद उन्होंने सुशेन को भी अपनी बन्दूक से छलनी कर दिया अब अब सुशेन भी उस कब्रिस्तान मैं पड़ी लासको मैं शामिल हो गया था और उन लाशो के बीच संजय राघव रमण और रूद्र खड़े थे, भीषण गोलीबारी चीखपुकार और भयानक रक्तपात के बाद कब्रिस्तान एक बार फिर शांत हो गया था

रमण ने पीछे से जाकर राघव के कंधे पर हाथ रखा और अपने भाई का स्पर्श समझते ही राघव उससे लिपट गया

संजय-मुझे नहीं पता था की तुम लोगो इतन क्रूरता से मार सकते हो

रूद्र-अब कोई फर्क नहीं पड़ता हम उन्हें आखरी कुर्बनि देने से नहीं रोक पाए, अब कात्दूत को जागने से कोई नहीं रोक सकता

संजय-क्या? हम तो बाहर थे अंदर का कुछ पता नहीं लगा यहाँ क्या हुआ था रूद्र?

रूद्र ने लोने की जंजीरों की तरफ इशारा करते हुए कहा “ये थी आखरी कुर्बानी”

रमण-उफ्फ, कितनी भयानक मौत दी है बिचारे को कौन था वो व्यक्ति?

राघव-नरेश जी

नरेश का नाम सुन कर संजय और रमण के

पैरो तले जमीन खिसक गयी वो कभी उस लाश को देखते तो कभी रूद्र को जिसकी आँखों से अब आंसू बह रहे थे, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था के रूद्र को सांत्वना कैसे दि जाये कुछ समय बाद वो लोग रूद्र को शांत करने मैं सफल हुए और वहा से नरेश की लाश लेकर अंतिम संस्कार करने निकल गए संजय रूद्र के साथ आगे चल रहा था वही राघव रमण के साथ था

राघव-भईया रूद्र ठीक होगा न?

रमण-हम उसकी हालत का अंदाजा नहीं लगा सकते राघव नरेश ने उसे अब तक पाला था, भले ही वो कृत्रिम मानव है पर है एक २२ साल का लड़का ही,उससे आज उसका सब छीन गया है हम उसकी मनोस्तिथि नै समझ सकते बस सांत्वना दे सकते है, अब पता नहीं इस दुनिया का क्या होगा अगर कालदूत सच मैं आ गया तो........

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कही दूर हिन्द महासागर मैं दो मछुवारे मछली पकड़ने वाला जाल समुद्र मैं डाल रहे थे

रघु-आबे आज हम ज्यादा दूर निकल आये है चलो जल्दी से काम निपटाया जाए

हरिया-अबे रुक जा थोड़ी देर थोड़ी मछिलिया और हाथ लगने दे

रघु-अरे हाल देख मौसम का इतने आंधी तूफान मैं नव ज्यादा समय नहीं टिकेगी

तभी अचानक समुद्र मैं हलचल होने लगी, पानी का रंग भी धीरे धीरे बदलने लगा

हरिया- अरे! ये क्या हो रहा है

रघु-पता नहीं ऐसा लग रहा है मनो समुद्र से कोई चीज़ बाहर आ रही हो

हरिया-ये जरूर व्हेल जैसी कोई बडी मछली होगी वरना पानी मैं इतनी हलचल और कौन मचा सकता है?

रघु-पता नहीं! अरे देख! एक काला बड़ा शारीर पानी से बाहर आ रहा है

हरिया-हे भगवान! ये क्या है?

रघु(घबराते हुए)- ये.....ये कोई मछली नहीं है! ये तो शैतान का अवतार लगता है!

उसके बाद उन मछुवारो के सामने उनके जीवन का सबसे भयानक दृश्य उपस्तिथ हो चूका था, धीरे धीरे १०० फूट का एक प्राणी समुद्र से बाहर निकला जिसका सर एक नाग की भांति था शारीर मानव की तरह और पीठ पर ड्रैगन जिसे विशालकाय पंख लगे थे, इतने विशाल शारीर वाले प्राणी को देख कर वो नाविक बुरी तरह आतंकित हो चुके थे....

कालदूत अपनी कैद से आजाद हो चूका था..........

भाग २६​

दूर हिन्द महासागर मे वो स्याह काली भयानक आकृति उपर आ रही थी, धीरे धीरे वो आकृति पूरी तरह समुद्र से बाहर निकल आई थी और एकटक उन मछुवारो को घूर रही थी वही उस शैतान को देख कर उन मछुवारो की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी ही और घबराहट के मारे उनके पैर कांप रहे थे,

हरिया-हे भगवान....ये...ये कैसा प्राणी है!!!

रघु-हरिया...बोल मत जाल निकाल और जल्दी नाव घुमा वरना हम नहीं बचेंगे.....

कालदूत कोदेख कर रघु और हरिया दोनों की हालत काफी खराब थी, हो भी क्यों न कालदूत का रूप ही इतना भयंकर था की सामान्य मनुष्य उसे देख कर ही डर के मरे मर जाये यहाँ तो तब भी रघु और हरिया ने थोड़ी हिम्मत दिखाई और अपनी जान बचने के लिए वहा से भागने लगे

तभी कालदूत की आवाज रघु और हरिया के दिमाग मैं गूंजी “शांत हो जाओ मनुष्यों! हमसे डरने की तुम्हे कोई आवशकता नहीं है, यदि हमें तुम्हे क्षति पहुचानी होती तो ये कार्य हम कबका कर चुके होते, तुम्हारे यहाँ से भागने की प्रतीक्षा नहीं करते पर हमें तुम्हारा डर नै बल्कि भक्ति चाहिए, तुम मुझे भक्ति दो और मैं तुम्हे ऐसी शक्तिया दूंगा जिसकी तुमने कभी अपने जीवन मैं कल्पना भी नहीं की होगी! ऐसी शक्तिया जो तम्हारा तथाकथित इश्वर तुम्हे कभी नहीं दे सकेगा! हमारी शरण मे आ जाओ हम तुम्हारा कल्याण कर देंगे!”

उन डरे हुए नाविकों पर कालदूत की बातो ने जादुई असर किया और वे अपना डर भुलाकर तुरंत कालदूत के सामने झुक गए, उन्होंने कालदूत के सामने घुटनों पर बैठकर अपना सर उसके सामने झुका लिया,

जैसे ही कालदूत ने देखा की ये नाविक उसके सामने झुक गए है,उसकी शरण मे आ गए है कालदूत के भयानक नेत्रों से एक विशेष प्रकार की तरंगे निकली जो सीधी जाकर उन मछुवारो के शारीर से जा टकराई, हरिया और रघु इन तरंगो के प्रभाव से निचे गिर गए और बुरी तरह तड़पने लगे पर फिर धीरे धीरे उनमे कुछ आश्चर्यजनक शारीरिक परिवर्तन होने लगे, उनके शारीर का आकर बदलने लगा, उनके दांत पैने, आँखें लाल और चमड़ी नीली हो गयी थी, देखते ही देखते वो सामान्य से नाविक अब एक भयानक दरिंदे बन चुके थे...

कालदूत ने अपने आज़ादी के साथ ही अपने लिए दो भयानक सेवको का निर्माण किया था और फिर कालदूत ने तुरंत अपना वो भयानक और विशाल रूट त्यागा और एक खतरनाक लेकिन प्रभावशाली मनुष्य का रूप धारण कर लिया,

कालदूत का मानव रूप उसके असल रूप से कम प्रभावशाली नहीं था,एक लम्बा चौड़ा व्यक्ति जिसने काली शेरवानी जैसा वस्त्र परिधान कर रखा था ये रूप भी सामान्य लोगो के मन मैं सिरहन पैदा करने के लिए पर्याप्त था

कालदूत(मुस्कुराकर)- इस दुनिया को महान कालदूत के आगमन का पैगाम दिया जाये......

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सुबह के ६ बज चुके थे, घनी अँधेरे कालरात्र के बाद एक बार फिर से सूरज चारो और अपनी छटा बिखेरता नजर आ रहा था, दुनिया के लिए नई उम्मीद नई उमंगो और नए खतरों के साथ ये सुबह आयी थी, वही इस दुनिया मैं एक इंसान ऐसा भी था जिसने इस सुबह के साथ अपना सब कुछ खो दिया था, ये दुनिया इस वक़्त कालदूत के आगमन से भले ही अनजान हो लेकिन लेकिन उसके आगमन के बाद इस पृथ्वी पर कई जगहों पर भयानक हादसे देखने मिले थे पर फिलहाल जिनपर इस दुनिया की रक्षा का, कालदूत से लड़ने का जिम्मा था वो इस वक़्त इन सब घटनाओ से अनजान अपनों के जाने के शोक मैं बैठे थे

नरेश और अरुण के अंतिम संस्कार की क्रिया पूरी करके सभी लोग इस वक़्त नरेश के घर मैं बैठे हुए थे, रूद्र ने भी अपने आप को काफी हद तक संभल लिया था लेकिन वो चुपचाप बैठा हुआ था, नरेश के बगैर ये घर उसे कचोट रहा था, राघव भी एकदम शांत था कुछ ही घंटो मैं उसे नरेश से एक जुडाव महसूस होने लगा था साथ ही उसके मन मैं नरेश को न बचा पाने का मलाल था और सारा के अजन्मे बच्चे के मरने का दुःख, राघव को बार बार ये बात खाए जा रही थी के अगर वो चाहता तो रूद्र को कब्रिस्तान मैं रोक सकता था और कही न कही इस बात ने राघव के मन मैं घर किया हुआ था के एक अजन्मे बच्चे को उसने दुनिया मैं आने से ही रोक दिया, पर ये बात राघव ने अभी तक किसी से कही नहीं थी

रमण और संजय भी वही बैठे हुए थे पर किसी से भी कुछ भी बोलते नहीं बन रहा था आखिरकार रूद्र ने ही चुप्पी तोड़ी

रूद्र-अब मैं राजनगर मे नहीं रुकने वाला

रमण-ऐसा क्यों?

रूद्र-नरेशजी ने मुझे अपने बच्चे की तरह पाला, उन्होंने अपनी पत्नी के मरने के बाद कभी दूसरी शादी भी नहीं की लेकिन इस सब के बदले मैं उन्हें क्या मिला...एक दर्दनाक मौत!

राघव रूद्र की बात सुन रहा था पर कुछ बोल नहीं रहा था

संजय-ये तूम कैसी बात कर रहे हो ? उनकी मृत्यु के जिम्मेदार तुम नहीं हो

रूद्र-आपलोग कुछ भी बोले लेकिन ये सच्चाई कभी कोई नहीं बदल पायेगा की हम लोग उनके साथ हुयी अनहोनी को नहीं रोक पाए

रमण उठ कर रूद्र के पास गया और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला

रमण-मेरी बात सुनो लड़के और राघव तुम भी, तुम दोनों अपने आप मैं बेहद खास हो और इसका नजारा हम कल रात उस कब्रिस्तान मैं देख चुके है जहा तुम दोनों इतने सरे लोगो से भीड़ गए थे, तुम लोगो ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है, तुमदोनो ने जो हो सकता था किया है, ये सब जो कुछ हुआ है उसमे तुम्हारी कोई गलती नहीं थी, नरेश भाई की मौत का दुःख हम सबको है लेकिन ये वक्त शोक मैं डूबने का नहीं है, इस तरह तो नरेश जी का बलिदान व्यर्थ चला जायेगा अगर हम यही बैठे रहेंगे और कालदूत को रोकने के लिए कुछ नहीं करेंगे तो....

संजय-अब हमें कालदूत को रोकना तो होगा ही वरना ये दुनिया ख़तम होते देर नहीं लगेगी

राघव(मुट्ठी भींचते हुए)- कमर कास लो भैया नरेश जी की मौत व्यर्थ नहीं जाएगी कालदूत को हम रोककर करेंगे रूद्र तुम साथ हो न?

रूद्र-हमेशा....

संजय-उसके पहले हमें दुनिया की खोज खबर ले लेनी चाहिए, आखिर पता तो चले की कालदूत के आगमन ने दुनिया पर किस प्रकार असर डाला है

संजय की बात सुन कर रूद्र ने टीवी चालू किया और वो सब लोग टीवी देखने बैठ गए

न्यूज़ फ़्लैश- कल रात दुनियाभर के मौसम मैं कई तरह के अजीबोगरीब परिवर्तन पाए गए, अमेरिका के कई शहरो मे भयानक बिजली गिरी जिससे सडको और इमारतों को भरी नुकसान हुआ तो भारत मैं भी कई जगह भारी वर्षा के कारन फसलो को काफी नुकसान हुआ है साथ ही देश मैं कई जगह आंधी तूफान आने की खबरे मिली है,लेकिन सबसे अजीबोगरीब खबर मिली थी कच्छ मरुस्थल से उस भाग से जिसकी सीमा समुद्र तट से जुडी हुयी है, स्थानीय लोगो के अनुसार उन्होंने किसी बडी की आकृति को रात के अँधेरे मैं समुद्र के पास देखा था हालाँकि ये बात एक अफवाह ही साबित हुयी है पर वहा के कुछ मछुवारो के गायब होने की खबर जरुर सामने आई है, कुछ लोग इन घटनाओ को अपशकुन मान रहे है वही कुछ ने तो इसे दुनिया का अंत ही घोषित कर दिया है, इन सब अफरा तफरी मैं कई लोगो की जाने भी गयी है जिसके बारे मैं जानकारी हम आपको अपने अगले सेगमेंट मैं देंगे, अन्य कोई खबर मिलते ही आपको वो सबसे पहले हमारे ही चैनल पर देखने मिलेगी तब तक बने रहिये हमारे साथ......

राघव ने टीवी ऑफ किया और बाकियों से बोला

राघव-कही पर भी कल रात राजनगर मैं हुए हत्या कांड की कोई खबर नहीं है

संजय-तुम्हे क्या लगता है ये कालसैनिक १००० साल से इतने खून करके कैसे बचे हुए है, उनके लोग पूरी दुनिया भर मैं फैले हुए है, मीडिया मैं भी, तभी तो आज तक उनसे जुडी कोई खबर लोगो तक नहीं पहुच पाई है

राघव-एक मिनट! मुझे तो लगा था के कल रत हमने सुशेन के साथ सभी कालसैनिको को कब्रिस्तान मैं खत्म कर दिया था

रूद्र-हमें एक बडी संख्या मैं उनलोगों को खत्म किया है राघव पर अब भी कई कालसैनिक बचे हुए है और मुझे लगता है कालदूत जरूर अपने उन बचे हुए कालसैनिको एक जगह इकठ्ठा करेगा

तभी उन्हें घर मैं उपर की तरफ की कुछ हलचल सुनाई दी और सबका ध्यान उस और चला गया.......

भाग २७​

रूद्र-हमें एक बडी संख्या मैं उनलोगों को खत्म किया है राघव पर अब भी कई कालसैनिक बचे हुए है और मुझे लगता है कालदूत जरूर अपने उन बचे हुए कालसैनिको एक जगह इकठ्ठा करेगा

तभी उन्हें घर मैं उपर की तरफ की कुछ हलचल सुनाई दी और सबका ध्यान उस और चला गया.......

राघव मुह पर ऊँगली रखकर धीमी आवाज मैं बोला

राघव-श्श्श...

सब लोग धीरे बोलो लगता है कोई घर के अंदर चोरी से घुसा है

रमण(धीमी आवाज मैं)- ये जरूर उन कालसैनिको मैं से कोई होगा चलो चलकर देखते है उपर क्या है, रूद्र क्या है वैसे उपर?

रूद्र-कुछ खास नहीं नहीं जो चीज़े रोजमर्रा के काम नहीं आती थी उन्हें नरेश जी उपर के कमरे मैं रखवा देते थे, वहा बड़े बड़े कांच के शीशे लगे है जहा से घर मैं घुसना आसन है

राघव-ठीक है उपर चल कर देखते है कौन है रूद्र तुम यही पीछे रुको ताकि अगर उपर कुछ गड़बड़ हो तो तुम हमारे बैकअप की तरह काम आ सको

रूद्र-ठीक है

सब धीरे धीरे सीढियो से उपर की तरफ बढे, कोशिश कर रहे थे की उनकी कदमो की आवाज न हो, जल्द ही वो लोग उपर पहुच गए, उपर के फ्लोर पर कोई बल्ब वगैरा भी नहीं लगा हुआ था जो भिओ रौशनी आ रही थी खिड़की पर लगे शिशो से आ रही थी, राघव संजय और रमण बडी सावधानी से आगे बढ़ रह थे

संजय-यहाँ तो कोई नहीं दिख रहा है

राघव(गुस्से से चिल्लाकर)- ये चूहे बिल्ली का खेल बहुत हुआ अब अगर अपनी जान प्यारी हो तो चुपचाप बाहर निकल आओ वरना अगर मैं ढूंढने लगा तो अच्छा नहीं होगा

तभी संजय का ध्यान छत की तरफ गया जिसके दो कोनो मैं दो लड़के अपने शारीर को एक विशिष्ट कोण मैं रखकर छत से मकड़ी की तरह चिपके हुए थे संजय की उनपर नजर पड़ते ही वो अपनी जगह से कूदे और उन्होंने राघव रमण और संजय पर धावा बोल दिया....

उन्होंने साधे टीशर्ट और जीन्स पहन रखे थे और चेहरे पर नाक से निचे वाले हिस्से को काले नकाब से ढक रखा था ताकि पहचान मैं न आये, रमण ने उस लड़के से भिड़ने की कोशिश की लेकिन वो गजब का निकला, रमण कुछ करता या कुछ समझ पाटा उससे पहले ही उसके पेट पीठ और गर्दन मैं पर तीन चार मुक्के पड़ चुके थे, संजय ने भी दुसरे लड़के से निपटने की कोशिश की लेकिन वो लड़का फुर्ती से संजय के हर वार से बच रहा था, उसने हवा मैं घूमकर एक तेज़ लात संजय के सीने पर मारी जिससे संजय खुद को संभल नहीं पाया और गिर पड़ा राघव ने उस लड़के को उसका कॉलर पकड़कर खिंचा, उस लड़के ने राघव के पेट पर भी तेज लात मारी जिससे राघव पर कोई असर नहीं हुआ, कल रात के हत्या काण्ड के बाद राघव की शक्तिया जागृत थी जिससे उसकी शारीरिक क्षमता मैं बहुत बढ़त हुयी थी, अब तो सामान्य इंसानों के प्रहारों का उसपर ज्यादा असर नहीं होता था पर उस लड़के के पैर मैं जरूर चोट लग गयी और राघव ने उसे गर्दन से पकड़कर हवा मैं उठा लिया और रमण से लड़ते लड़के को देखकर राघव चिल्लाया

राघव-रुक जाओ! वरना तुम्हारे साथी की गर्डर तोड़ दूंगा मैं और ये बेकार ही मारा जायेगा, पहले बताओ तुम लोग ककून हो? यहाँ क्या करने आये हो?

राघव की बात सुनकर उन नकाबपोश ने भी रमण की गर्दन पर एक छोटा सा चाकू रख दिया

नकाबपोश-कोशिस तो करो तुम्हारा साथी भी जान से जायेगा

तभी वहा रूद्र भी पहुच गया लड़ने की आवाज सुन कर उसे गड़बड़ का अंदाजा हुआ और वो वहा आ

गया

रूद्र-तुम जो कोई भी हो इसका अंजाम नहीं जानते तुम रमण की गर्दन से चाकू हटाओ

राघव(क्रोधित होकर)- आखिर कितनी जाने लोगे तुम कालसैनिक?कितने निर्दोशो की मौत से पेट भरेगा तुम्हारा?

राघव के प्रश्न पर रमण को गिरफ्त मैं लिए लड़के की भोहे चौड़ी हो गयी, वो भी गुस्से मैं बोला

नकाबपोश-क्या बकवास कर रहा है? हम कालसैनिक? हम तो यहाँ नरेश जी से मिलने आये थे पर जब यहाँ उके घर मैं अजनबियों को देखा तो हमें कुछ गड़बड़ लगी इसीलिए इसतरह अंदर आये, हमें लगा तुम कालसैनिक हो

रूद्र से बहस करते हुए उस लड़के की पकड़ रमण की गर्दन पर ढीली पद गयी जिसका फायदा उठाते हुए रमण से उसका हाथ पकड़कर उसे एक जोरदार धोबी पछाड़ दी

रमण-अगर हम कालसैनिक होते तो तुमको telekinesis के प्रयोग से रोकते कुश्ती नहीं खेलते तुम्हारे साथ

तभी वहा एक लड़की की बुलंद आवाज गूंजी “बस करो तुम सब लोग”

वहा उस कमरे मैं मौजूद सभी का ध्यान उस कमरे मैं अँधेरे कोने की तरफ गया जहा से अभी तक खामोश कड़ी लडकी निकलकर आगे की तरफ आई थी, खिड़की से आते मद्धिम प्रकाश मैं उसकी लहराती जुल्फे और खुबसूरत बडी सी आँख साफ़ दिखाई देने लगी थी, अब तक बाकि दोनो लड़के बभी अपना नकाब उतर चुके थे, वो लगभग राघव के ही उम्र के थे

लड़की थोडा आगे बढ़ी और रूद्र को गौर से देखते हुए उन दोनों लडको से बोली “हमें ग़लतफहमी हो गयी थी, ये लोग कालसैनिक नहीं हो सकते क्युकी ये कृत्रिम मानव इनके साथ है

ये बात सुन कर सबको झटका लगा और सबसे ज्यादा तो उन दोनों लडको को उनमे से एक बोला

लड़का-तुम जो कह रही हो जानती हो न? तुम्हे कैसे पता की ये वही है जिसका निर्माण हमारी संस्था ने करवाया था

लड़की-मैं जानत हु मैं क्या कह रही हु मुझे नरेश जी ने इसके बारे मैं बताया था और मैंने इसकी फोटो देखि थी वही ये दूसरा लड़का शायद राघव है नरेश जी ने इसके बारे मैं भी बताया था बस मैं पहचान नहीं पायी

लड़का-तुम जानतो हो न क्या कह रही हो?
लड़की-तुम जब इनसे लड़ रहे थे तब मैं अँधेरे मैं छिप कर तुम्हारी लडाई का एक एक मोमेंट नोटिस कर रही थी, अविनाश की किक से ये हिला तक नहीं जभी अविनाश अकेला ही १० से भीड़ जाये पर इसने उसे आसानी से काबू कर लिया, तुम लोग ये बात नोटिस नहीं कर पाए क्युकी तुम लड़ने मैमश्गुल थे

तभी रूद्र के अचानक ध्यान मैं आया और उसने पूछा

रूद्र-शिवानी??

लड़की-हा सही पहचाना

रूद्र-माफ़ करना पर मैंने पहले तुम्हे कभी देखा नहीं था बस नरेश जी से तुम्हारे बारे मैं सुना था इसीलिए तुमलोगों को पहचान नहीं पाया

शिवानी-कोई बात नहीं....

उनलोगों के वार्तालाप से राघव भ्रमित सा हो गया था वो उनकी तरफ देखकर बोला

राघव-आपलोगों की बात मुझे समझ मैं नहीं आ रही है थोडा विस्तार से बताओ रूद्र ये लोग कौन है और यहाँ क्या करने आये है

शिवानी-हमलोग उसी गुप्त संस्था के लोग है जिसने रूद्र को बनाने के लिए महेश जी को फंडिंग किया था, मेरा नाम शिवानी है और ये मेरे भाई है चेतन और अविनाश

रूद्र-तो इसका मतलब आपलोग मेरे निर्माता महेश को भी जानते होंगे?

अविनाश-महेश जी हमारे पिता थे, उन्होंने हम तीनो अनाथ बच्चो को गोद लिया थ और जब कालसेना से उन्हें मारा था तभी से उसके बाद हमारा भरण पोषण आर्गेनाईजेशन ने किया, हमें बचपन से ऐसा कठोर प्रशिक्षण दिया गया जिसके कारण हम आज संस्था के काबिल लड़ाको मैं से एक बन गए है

रमण-बीच मैं रोकने के लिए माफ़ी चाहता हु पर ये ‘आर्गेनाईजेशन’ है क्या??.......

भाग २८​

अविनाश-महेश जी हमारे पिता थे, उन्होंने हम तीनो अनाथ बच्चो को गोद लिया थ और जब कालसेना से उन्हें मारा था तभी से उसके बाद हमारा भरण पोषण आर्गेनाईजेशन ने किया, हमें बचपन से ऐसा कठोर प्रशिक्षण दिया गया जिसके कारण हम आज संस्था के काबिल लड़ाको मैं से एक बन गए है

रमण-बीच मैं रोकने के लिए माफ़ी चाहता हु पर ये ‘आर्गेनाईजेशन’ है क्या??.......

चेतन-हालाँकि हमारी संस्था के अस्तित्व से ये दुनिया अनभिज्ञ है पर आप लोग नरेश जी के साथ है इसीलिए मुझे नहीं लगता के आप लोगो को यह राज बताने मैं कोई बुरे है, ये बात तो बहुत छोटी है उनके सामने..

हम लोग हिडन वारियर्स है, छिपे हुए योद्धा, हम अपनी आर्गेनाईजेशन मैं ऐसे लोगो का चुनाव करते है जिन्होंने युद्ध काला, हथियार और विज्ञान मे क्षेत्र मैं बहुत अधिक प्रशिक्षण हासिल किया हो, यह आर्गेनाईजेशन पिछली एक शताब्दी से अस्तित्व मैं है, हमारे पास दुनिया के बड़े बड़े वैज्ञानिक, वेपन एक्सपर्ट अलग अलग देशो की मिलिट्री इत्यादि से जुड़े लोग भी है, कालसेना की तरह ही हमारी भी पहुच रॉ इण्टरकॉम FBI जैसे संगठनो मैं है, हम लोग मुख्य रूप से पैरानोर्मल या कह लीजिये की ऐसी चीजों से लड़ने का प्रयास करते है जिनके अस्तित्व पर या तो दुनिया को यकीन नहीं होता या फिर बाकि नमी गिरामी संस्थाए इस लायक नहीं होती की उन असाधारण शक्तियों को रोक सके, पीछे १०० सालो मैं अगर हम किसी को रोक नहीं पाए है तो वो है कालसेना, इसके पीछे एक कारन यह भी था के इनके लोग भी हमारी तरफ कई पावरफुल पोजीशन पर थे, हमने समय समय पर इनसे भिड़ने की कोशिश भी की लेकिन कभी भी इनको पूरी तरह से नष्ट नहीं कर पाए ,कालसेना से लड़ने के दौरान हमारी आर्गेनाईजेशन को कालदूत नाम के प्राणी का पता कुछ सालो पहले ही चला और तब हमारी आर्गेनाईजेशन ने रूद्र को बनाने का निर्णय लिया क्युकी आम मनुष्य उनके आगे घुटने टेक सकता था पर कृत्रिम मानव नहीं, हमें तब राघव के बारे मैं पता नहीं था हमें तो राघव के बारे मैं महेश जी के गुरूजी ने बताया था जब वे रूद्र के शारीर मैं आत्मा डालने आये थे तभी से हमारी नजर राघव पर भी बनू हुयी थी अब रूद्र को बनाने के बाद कैसे कालसैनिको ने उसके निर्माता और हमारे पिता को मारा ये तो आप सब जानते ही होंगे

हमारी संस्था चौबीसों घंटे वातावरण मं फैली तामसिक उर्जाओ को ढूंढती रहती है और हम एजेंट्स का काम होता है उस उर्जा को कैद करना या नष्ट करना, कालदूत की स्वतंत्रता के बाद हमें वातावरण मैं बेहद भीषण तामसिक उर्जा के संकेत मिले है इतनी भरी मात्र मे ये उर्जा हमारे यंत्रो ने कभी महसूस नहीं की थी, जब हमें पता चला की नरेशजी यानि हमारे चाचा इनके भिड़ने मैं लगे है तब शिवानी ने उन्से संपर्क किया था और हम तो यहाँ उन्हें अपने साथ शामिल करने आये है

संजय-आपको कैसे पता चला के हमलोग और नरेशजी कालसेना को ढूंढ कर ख़तम कर रहे है?

शिवानी-हमारे संपर्क सूत्र कालसेना से बेहतर है दुनिया के किसी भी हिस्से की जानकारी हम तक पहुचने मैं समय नहीं लगता

रूद्र(दुखी होकर)- अफ़सोस लेकिन एक जानकारी तुम्तक समय रहते नहीं पहुची..

शिवानी-क्या?

रूद्र-कालदूत की जागने की प्रक्रिया मैं जो आखरी कुर्बानी थी को नरेशजी की ही थी, वो अब इस दुनिया मैं नहीं रहे हम अभी उनका अंतिम संस्कार करके लौटे है

रूद्र की बात सुनकर शिवानी अविनाश और चेतन एकदम सन्न रह गए थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था की इस बात पर कैसे प्रतिक्रिया दे, शिवानी के चेहरे पर दुःख साफ़ झलक रहा था, वो अपनी भावनाओ को काबू मैं नहीं रख पाई और उसकी आँखों से आसू निकलने लगे, उसके दोनों भाई उसे सँभालने की कोशिश कर रहे थे पर आँखें उनकी भी नाम थी, शिवानी कोरोता देख कर राघव का भी मन भरी होने लगा था परिस्तिथि सो सँभालने के लिए रमण बोला

रमण-चलिए अब जब साडी बाते स्पष्ट हो गयी है तो निचे चलकर बात कर लेते है

वो सब लोग निचे सोफे पर आकर बैठ गए रूद्र उनसब के पिए पानी ले आया था पानी पीकर शिवानी थोड़ी शांत हुयी

शिवानी-हिडन वारियर्स मैं शामिल होने के बाद हम कभी नरेश चाचा से नहीं मिल पाए थे बस एक सुचना मिली थी के चाचाजी रूद्र के साथ राजनगर मे है, मुझे लगा था कोई तो है जो पिताजी के रिक्त स्थान को भर सकता है लेकिन कालसेना से हमारी वो उम्मीद भी छीन ली

रूद्र भी शिवानी के आक्रोश को महसूस कर सकता था उसी आक्रोश के चलते उसने और राघव ने कब्रिस्तान मैं एक भी कालसैनिक को जिन्दा नहीं छोड़ा था

रमण से उनतीनो को विस्तार से एक एक घटना बताई जो कल रात हुयी थी

अविनाश-आप लोगो के साथ एक और इंसान भी था जिसका नाम हमारे रिकार्ड्स मैं है जिसके पिता कालसैनिक थे

रमण-आप शायद अरुण की बात कर रहे है पर अफ़सोस वो भी अब नहीं रहा

अविनाश-उफ्फ...अगर वो होते तो उनसे काले जादू की किताब के बारे मैं पता चल सकता था

राघव-कही आप इस किताब की बात तो नहीं कर रहे

राघव ने अरुण की दी हुयी किताब अविनाश को दखाई

अविनाश-हा यही तो है वो

रमण-पर ये तो सिर्फ एक कॉपी है ऐसी और कई होंगी

अविनाश-कॉपी...नहीं ये कॉपी नहीं है..एक किताब कालदूत ने बिरजू को दी थी जिसने कालसेना की स्थापना की थी १००० साल पहले फिर उई ने बस ४-५ किताबे लिखी थी बिलुल ऐसी ही

रमण-ओह....

चेतन-ये किताब सिर्फ कालदूत के बारे मैं नहीं है ये वो ज्ञान है को कालदूत ने अर्जित किया है अपने जीवन के अनुभवों से, जो बाते और रहस्य हम इस ब्रह्माण्ड के बारे मैं नहीं जानते वो सब इसी किताब मैं है बस एक एक बेहद प्राचीन भाषा मैं है जिसे डिकोड करना इस दुनिया मैं किसी के बस की बात नहीं है, साथ ही काले जादू और telekinesis के बारे मैं भी बहुत कुछ है जो भी इसे सीखता है वो कालदूत से मानसिक संपर्क मैं आ जाता है

संजय-ये बाते तो हमने कभी सोची भी नहीं थी

अविनाश-हम यहाँ जल्दी आ जाये लेकिन नहीं आ सके क्युकी कल रात दुनिया भर के हमारे गुप्त अड्डो पर कालसेना से धावा बोला था, कालसेना से अपने कुछ लोग हिडन वारियर्स मैं भी छोड़ रखते थे शाय, उनसे निपटने मैं समय लग गया अब समझ आ रहा है की उनलोगों ने हमारा वक़्त क्यों नष्ट करवाया ताकि हम यहाँ समय से न पहुच पाए और जैसा उन्होंने सोचा था वैसा ही हुआ हम नरेश चाचा को नही बचा पाए और न ही कालदूत को आजाद होने से रोक पाए

रमण-देखो जो होना था हो गया उसे हम बदल नहीं सकते लेकिन जो सामने है उससे निपटने का प्रयास जरुर कर सकते है क्या तुम लोगो के पास कोई प्लान है कालदूत को रोकने का

अविनाश-फिलहाल हमारे पास कोई प्लान नहीं है कल रात हमारे ठिकाने पर हुए हमले मैं हमारे काफी सारे यन्त्र नष्ट हो गए है वरना हम उनकी मदद से कालदूत की लोकेशन का पता लगा सकते थे हमारे काफी हथीयार भी नष्ट हो गए है हमारा एक साथी बची हुयी चीजों को सँभालने मैं लगा हुआ है उससे बात करके देखता हु यदि को कोई मदद कर दे

रमण-तुम लोग तांत्रिको की तरह भुत पकड़ते ही क्या अगर कालदूत का पता भी चला तो उसका सामना कैसे करोगे

चेतन-हमारा सामना कई तरह ही चीजों से होता है दोस्त हमारी संस्था के पास कई ऐसे गुप्त हथियार है जिसके सामने अमेरिका रूस या जापान के सबसे विध्वंसक हथीयार भी खिलौने लगेंगे, अभी तक ऐसी नौबत नहीं आयी के उन्हें इस्तमाल करना पड़े पर अब लगता है उनके इस्तमाल का समय आ गया है पर अफ़सोस अभी वो हथियार हमारे पास नहीं है राहुल उन्हें सुरक्षित करने मैं लगा है और न ही हमारे पास कालदूत का पता है

राघव-तुमने कहा था इस किताब को पढ़ कर समझने वाला कालदूत के दिमाग से जुड़ सकता है

चेतन-हा

राघव-मैं इस किताब को पढ़ सकता हु मैं इसे जरिये कोशिश कर सकता हु के कालदूत के दिमाग मैं झांक कर उसकी लोकेशन पता कर सकू पर इसमें कितना समय लगेगा पता नहीं

अविनाश-यदि तुम सच मैं ऐसा कर सकते हो तो ये बहुत बढ़िया बात है मैं राहुल के बात करके उसे हमारे यन्त्र ठीक करने कहता हु एक बार हमें पता चल जाये कालदूत कहा है तो उससे लड़ा जा सकता है

इसके बाद राघव ने उस किताब को उठाया और पढने लगा और कोशिश करने लगा की वो कालदूत के दिमाग से संपर्क बना सके वही बाकि लोग भी आगे की रणनीति पर चर्चा करने लगे.

......

भाग २९​

कच्छ के विशाल रेगिस्तान मैं दूर नजर दौड़ाने पर तीन आकृतिया नजर आई, एक था मानव स्वरूपी काल्दोत और बाकि वो दोनों मछुवारे जिनको काल्दोत ने अपनी शक्ति द्वारा एक जानवर जैसा खूंखार बना दिया था

कालदूत ने उन जानवर रूपी मछुवारो के सर पर हाथ फेरते हुए कहा

कालदूत-ये कोई आम स्थल नहीं है वत्स, इस स्थान से और भी कई रहस्यमयी संसारो का द्वार खुलता है, आमतौर पर हमें हमारा संसार ही नजर आता है परंतु हमारे आसपास ऐसे अनगिनत संसारो के द्वार हर पल तैरते रहते है जिन्हें मनुष्य की सामान्य आँखें नहीं देख सकती, उन अदृश्य संसारो तक पहुचने वाले द्वरो को कहते है आयाम! सामान्यतः एक आयाम द्वार खोलने के लिए हमें अत्यधिक उर्जा चाहिए, मुझे भी एक आयाम द्वार खोलना है परंती इतने वर्षो तक समुद्र की गहराइयों मैं कैद रहने की वजह से हमारे शारीर मैं अभी आयाम द्वार खोलने के लिए पर्याप्त उर्जा नहीं है, सर्वप्रथम हम अपने शारीर को पहले की भांति शक्तिशाली बनायेंगे और फिर इस दुष्कर कार्य को संपन्न करेंगे इस धरती को और बेहतर बनाने का समय आ गया है, अब विश्व को ये बताने का समय आ गया है के कालदूत स्वतंत्र को चुके है आने वाले कुछ समय मैं हम इस धरती को अपने अधीन कर लेंगे

तभी अचानक ही कालदूत की नजर कुछ दुरी पर पड़ी वह उसने कुछ लोगो को ऊँटो की सवारी करते देखा तो उसकी भोहे तन गयी और वो बोला

कालदूत-मेरी सृष्टि मैं कोई भी जीव मेरे अलावा किसी और की सत्ता को नहीं स्वीकारेगा! इन मनवो को हमेशा से ही अपने से कमजोर का लाभ उठाने की आदत रही है पर मेरे राज मैं ऐसा अन्याय नहीं होगा

फिर कालदूत ने उन दो मछुवारो को कुछ इशारा किया जिसके बाद वो दोनों दौड़ते हुए उन मनवो की तरफ गए, ऊंट पर बैठे लोगो ने दूर से किसी चीज़ को अपनी तरफ दौड़ कर आते देखा तो पहले तो वो समझ नहीं पाए की ये, उनमे से एक आदमी बोला, “अरे ये क्या है? ये कैसे जानवर है?” बाकि लोगो को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था लेकिन जब राक्षसी रूप मैं वो दो मछुवारे उन लोगो के पास पहुचे तो वो बुरी तरह घबरा गए और उनमे से एक ऊंट सवार बोला “भागो यहाँ से! ये..

ये कोई जानवर नहीं है ये तो राक्षस लग रहे है!”

लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी, दोनों मछुवारो ने एक एक ऊंट सवार पर छलांग लगा दी, फिर उनको रेट मैं पटककर अपने पैने पंजेनुमा हाथो से उनकी छाती चिर दी और उनका धड़कता हुआ दिल निकाल कर खाने लगे, इतना भयंकर और वीभत्स दृश्य देख कर बाकि ऊंट सवारों ने अपना ऊंट तेजी से हाकना शुरू किया लेकिन वे भी ज्यादा डोर नहीं जा पाए और उनका भी उन राक्षसी मछुवारो ने वही हाल किया,

कच्छ की धरती उन ऊंट सवारों केव रक्त से लाल हो चुकी थी, वो मछुवारे किसी आज्ञाकारी पालतू कुत्ते की तरफ कालदूत के पास वापिस लौट आये

कालदूत-हा हा हा! अब इन तुच्छ मनवो की अक्ल ठिकाने आएगी, अब मुझे संसार भर मैं पीले अपने भक्तो को अपनी शक्ति द्वारा अपने पास बुला लेता हु ताकि देवताओ की इस सृष्टि पर अधिकार करने की अपनी योजना क्रियान्वित कर सकू.....

कालदूत ने अपने दोनों हाथो को हवा मैं उठाकर अपनी आँखें बंद कर ली और उसके ऐसा करते ही आसपास के वातावरण मैं एक अजीब सी उर्जा का प्रवाह होने लगा और अचानक एक एक करके संसार के सभी बचे हुए कालसैनिक काले चोगे और काले नकाब धारण किये हुए अपनी पारंपरिक वेशभूषा मैं कालदूत के समक्ष खड़े थे, कालदूत के अपनी शक्ति के बल पर सबको वहा इकठ्ठा कर लिया था और कालदूत को सामने देख कर वो सब अपने घुटनों पर बैठ गए

कालदूत इतनी सिमित संख्या मैं भक्तो को देखकर हैरान था, पिछले १००० वर्षो मैं कई लोगो ने कालदूत की भक्ति करनी शुरू की थी लेकिन जब कालदूत ने इतनी कम संख्या मे पने भक्तो कोदेखा तो उसे काफी निराशा हुयी, वो बोला

कालदूत-बस इतने ही लोग है? ये तो ५०० के आसपास होंगे,

तभी एक कालसैनिक नकाब उतारकर कालदूत के सामने जाकर खड़ा हुआ, वो और कोई नहीं बल्कि संतोष था जो उस रात कब्रिस्तान से बचकर भागने मैं कामयाब हो गया था, संतोष कालदूत से बोला

संतोष-लोग तो और भी थे प्रभि लेकिन उस राघव रुद्र और किसी गुप्त संस्था की वजह से अब हम लोग आधे भी नहीं बचे है, हालाँकि हम सभी कालसैनिक को आपके आगमन की सुचना मिल गयी थी लेकिन सुशेन और शक्ति की अकस्मात मृत्यु के कारण अब हमारा नेतृत्व करने वाला कोई नहीं बचा है, ब्लू हुड तो शक्ति के साथ पूरी तरह ख़तम हो गया था जिसके कारण हम ब्लू हुड के बचे हुए लोग भी ब्लैक हुड मैं शामिल हो गए थे लेकिन आपके परम विरोधियो ने ब्लैक हुड को भी नहीं छोड़ा

कालदूत-कोई बात नहीं वत्स! मेरे रहते लोगो की संख्या मैं अब कोई कमी नहीं आएगी और न ही अब इससे कोई फर्क पड़ता है,अब तो पूरी दुनिया कालदूत की बहती स्वीकारने वाली है और जो विरोध करेगा उसे तुरंत मृत्यु के घाट उतार दिया जायेगा, रही बात सुशेन की तो उसके हश्र से मैं पूर्णतः वाकिफ हु क्युकी मैं न सिर्फ सुशेन से अपितु तुम सभी से मानसिक रूप से जुडा हु, सुशेन को मैंने

अपनी शक्ति का कुछ हिस्सा दिया था ताकि वो मेरे विरोधियो से निपट सके लेकिन जब आखरी कुर्बानी संपन्न हुयी तो युगों युगांतर से समुद्र की गहरायी मैं पड़े मेरे अशक्त शारीर को बाहर निकालने के लिए मुझे मेरी शक्ति का एक एक कतरा चाहिए थे इसीलिए कुछ समय मुझे सुशेन को प्रदान की गयी अपनी शक्ति वापस लेनी पड़ी लेकिन उतनी देर मैं उसकी हत्या कर दी गयी, अपने भक्त के इस हश्र के लिए मन कही न कही स्वयं को दोषी मानता हु और आपलोगों को नया नेता देना भी आवश्यक है इसीलिए मैं आज से संतोष को आपका नया मुखिया बनाता हु, आप सब संतोष के नेतृत्व मे मेरे विरोधियो का सामने करेंगे

कालदूत की बात सुनकर संतोष उसके चरणों मे गिर गया और कालदूत ने अपना हाथ उसके सर पर रखा

कालदूत-मुझे उम्मीद मैं वत्स तुम भी सुशेन की तरह अपने लोगो के लिए अच्छे मुखिया साबित होंगे

संतोष खड़ा हुआ और बाकि कालसैनिको की तरफ देख कर बुलंद आवाज़ मैं बोला

संतोष-मेरे मित्रो,आज हम सबको हमारी इतने वर्षो की तपस्या का फल मिला है, हमारे इश्वर लाखो वर्षो की कैद से मुक्त होकर इस धरती पर वापिस आये है लेकिन ये समय ख़ुशी मानाने का नहीं है बल्कि दुनिया को दुनिया को अपनी मुट्ठी मैं करने का है जिसकी शुरुवात आसपास के गाँव से होगी, सब लोग दक्षिण दिशा के गाँव की और जाओ और भगवान कालदूत की और से सन्देश पहुचाओ की ये हमारे साथ मिल जाये या एक दर्दनाक मौत के लिए तयार रहे.

वहा मौजूद सभी कालसैनिको ने संतोष की बात मणि और उनके जाते ही कालदूत संतोष से बोला

कालदूत-वत्स संतोष! हमें कुछ दिनों के लिए संपूर्ण एकांत की आवशकता है तो ध्यान रहे कोई भी हमें न छेड़े

संतोष-जो आज्ञा प्रभु!

फिर कालदूत ने हवा मैं हाथ लहराकर अपने लिए वहा एक आसन की व्यस्था कर ली और अपनी आँखें मूंद ली.......

भाग ३०​

आज कालदूत को आजाद हुए पुरे १४ दिनों का समय बीत गया था और इन चौदा दिनों से कालदूत लगातार अपने ध्यान मैं लगा हुआ था वही उसके भक्त जो अपने आप को कालसेना कहलवाते थे उन्होंने कच्छ के उस रेगिस्तान मे आसपास के गांवों मैं हडकंप मचाया हुआ था, कालसेना ने अपनी ताकत के बल पर कई गांवों को घुटने पर ला दिया था और जहा भी कोई भी व्यक्ति उनलोगों का विरोध करता उसे वो लोग इतनी दर्दनाक मौत देते जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था और इसी डर के चलते कई लोग कालदूत की गुलामी स्वीकारने लगे थे

कालदूत के पृथ्वी पर आते ही उसका असर साफ़ मालूम हो रहा था , जहा इस समय कालदूत था उसके आसपास के पुरे इलाके मैं एक अजीब सी मनहूसियत फैली हुयी थी मनो किसी ने वातावरण से साडी ख़ुशी चूस ली हो जबकि अभी तो कालदूत अपने पूर्ण प्रभाव मैं भी नहीं था और आनेवाले समय मैं ये लडाई राघव और बाकि सब के लिए काफी मुश्किल होने वाली थी

इन पिछले चौदा दिनों मैं राघव ने अपनी शक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण पा लिया था जिसमे उसकी मदद अविनाश और चेतन ने की थी, अविनाश चेतन और शिवानी trained fighters थे और उन तीनो ने राघव को न सिर्फ अपनी शक्तियों को कण्ट्रोल करना सिखाया बल्कि साथ ही उनका योग्य इस्तमाल और लडाई के कई और पैतरे भी सिखाये

इन [पिछले चौदा दिनों मैं हिडन वारियर्स की हालत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी, उनके कई सरे छिपे हुए ठिकानो पर कालसैनिको ने हमला किया था और उन ठिकानो को तबाह किया था पर ये हिडन वारियर्स की खुशकिस्मती रही के उनके सबसे घटक हथियार अब तक कालसैनिको के हाथ नहीं लगे थे,

राघव अपनी ट्रेनिंग के साथ साथ कालदूत की उस काले जादू की किताब का अध्यन कर रहा था ताकि किसी भी तरह से वो कालदूत के दिमाग से संपर्क बनाकर उसका ठिकाना पता कर सके पर इसमें वो अब तक पूरी तरफ असफल रहा था, कालदूत की शक्तियों की झलक वो कब्रिस्तान मैं देख चूका था जब कालदूत ने अपनी शक्ति का एक छोटा सा हिस्सा सुशेन को दिया था जिससे वो और रूद्र दोनों ही मात खा गए थे इन दिनों बस एक ही अच्छी घटना हुयी थी वो ये की राघव अब अपनी शक्तियों के पूर्ण नियंत्रण मैं था और इसी दौरान उसे अपने अंदर की कई और भीनई शक्तियों के बारे मैं पता चला था

संक्षेप मे कहा जाये तो इन चौदा दिनों मैं पूरी टीम के हाल ज्यादा अच्छे नहीं थे सबकी बैंड बजी हुयी थी, जहा हिडन वारियर्स अपने ठिकानो पर लगातार हो रहे हमले से परेशां थे और लगातार अपने साथियों से जुड़े हुए थे वही राघव कालदूत के बारे मैं और उससे निकट भविष्य मैं होने वाली लडाई की कल्पना से डर रहा था उसका कॉन्फिडेंस पूरी तरह हिला हुआ था साथ ही उसके मन मैं ये बात घर कर गयी थी के वो एक अजन्मे बच्चे की मृत्यु का कारन है वो चाहता तो रूद्र को समय रहते रोक सकता था, राघव इस समय अपने घर की छत पर बैठा

यही सब बातो के बारे मैं सोच रहा था तभी उसके पिता अनिरुद्ध शास्त्री वहा आये

अनिरुद्ध-यु अकेले बैठे बैठे क्या सोच रहे हो बेटे

राघव-सोच रहा हु के जिंदगी भी कितनी अजीब है पिताजी, कुछ ही दिनों मैं सब कुछ एकदम से बदल गया, एक साधा पंडित का बेटा आज दुनिया का रखवाला बना हुआ है, मैंने कभी अपने लिए ये नहीं चाह था पिताजी, सोच रहा हु के क्या इस जिम्मेदारी के लिए मैं सही इंसान हु?

अनिरुद्ध-और तुमने ये कैसे मान किया की तुम सही इंसान नहीं हो, देखो राघव ये सब शक्तिया सिद्धिया किसी भी इंसान को इतनी आसानी से नहीं मिलती है काफी वर्षो के कठिन ताप के बाद मनुष्य इसे हासिल कर पता है पर ये सभी खुभिया तुम्हे तुम्हारे जन्म के साथ ही प्राप्त हुयी है इसके पीछे कुछ तो कारण होगा, मैं अपने पिताजी को जानता था वो कोई भी काम बगैर सोचे विचारे नहीं करते थे और यदि उन्होंने तुम्हे ये कार्य दिया है की तुम कालदूत से लड़ो तो वो ये भी अवश्य जानते होंगे की तुम इस काबिल हो

राघव-पर मैं कोई हत्यारा नहीं हु, उस दिन कब्रिस्तान मैं मैंने न जाने कितने लोगो को मारा है

अनिरुद्ध-मानवता की रक्षा के लिए की गयी हत्या को मैं हत्या नहीं मानता राघव, यदि उस दिन तुम उन लोगो को नहीं मारते तो आज वोही लोग नजाने कितने परिवार उजाड़ते, उनलोगों को मारकर तुमने तो कई लोगो की जान बचायी है

राघव-पर हम कालदूत को आजाद होने से तो नहीं रोक पाए

अनिरुद्ध-पर अब भी कहा बात बिगड़ी है कालदूत अब तक प्रत्यक्ष रूप से दुनिया के सामने नहीं आया है मुझे लगता है इतने वर्षो की कैद ने उस राक्षस को कमजोर बना दिया होगा यही सही समय है उसे रोकने का

राघव-उससे लड़ना इतना आसन नहीं है पिताजी, मैं कालदूत की शक्ति का नजारा उस कब्रिस्तान मैं देख चूका हु जिसके छोटे से हिस्से ने मुझे हरा दिया था वो कमजोर भले ही होगा पर फिर भी हम सब को मार सकता है

अनिरुद्ध-तो मैंने ये समझू की तुम डर रहे हो

राघव-मैंने ऐसा नहीं कहा पिताजी

अनिरुद्ध-जीत या हार हमारे हाथ मैं नहीं है राघव, और इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता मायने रखती है जीतने की कोशिश, कभी हार न मानने का जज्बा, उस रात तुम इसलिए हरे क्युकी तुमने अपने प्रतिद्वंदी को अपने से कम आँका और पूरी तयारी नहीं की पर अब तुम पूर्ण रूप से तयार को और अपने दुश्मनों की क्षमता जानते हो इसीलिए ऐसे हतोत्साहित होकर मत बैठो बल्कि इस बारे मैं सोचो की आगे क्या करना है, तुमपर बाकि लोग निर्भर है बेटे और शक्तियों के साथ जिम्मेदारी भी आती है, तुम ही ऐसे हतोत्साहित हो जाओगे तो ये लडाई हम लड़े बगैर ही हार जायेंगे

राघव-शुक्रिया पिताजी मुझे समझाने के लिए

अनिरुद्ध-तुम जीतो या हरो बस इतना ध्यान मैं रखना की तुम्हारे पिता को तुमपर गर्व है.....

अगली सुबह

आज कालदूत को अपनी तपस्या मैं बैठे १५ दिन हो चुके थे और अब जाकर उसने अपनी आँखें खोली वही राघव अपने घर मैं कालदूत की किताब को हाथ मैं लेकर ध्यान लगाये हुए थे और कालदूत के दिमाग से संपर्क जोड़ने की कोशिश कर रहा था, इधर जैसे ही कालदूत ही अपनी आँखें खोली उसी पल राघव का उसके दिमाग से संपर्क जुड़ गया पर ये सिर्फ कुछ सेकंड्स के लिए हुआ था जिसके बाद कालदूत अपने दिमाग मैं किसी की उपस्तिति जान गया था और वो राघव के दिमाग तक पहुच पता इससे पहले ही राघव ने संपर्क तोड़ दिया पर इन चाँद सेकंड्स मैं राघव ने ये तो पता लगा लिया था के कालदूत किसी रेगिस्तानी इलाके मैं है पर कहा ये वो नहीं जान पाया था

वही घर के बाहर की तरफ अविनाश अपने एक साथी से बात कर रहा था और उसके चेहरे पर कुछ ख़ुशी थी अपनी बात ख़तम करके को अंदर आया और ठीक उसी समय राघव भी अपने ध्यान से निकल कर बाहर आया और वो दोनों बाकि सभी से एकसाथ बोले

राघव और अविनाश-कालदूत का पता चल गया है!

पहले राघव ने उन सबको बताया जो उसने देखा था और कैसे उसे ये पता चला की कालदूत किसी रेगिस्तान मैं है जिसके बाद अविनाश ने बोलना शुरू किया

अविनाश-हमने आपको बताया था की हमारे पास ऐसे यंत्र है जो वातावरण मैं फैली तामसिक उर्जा को पाकड़ सकते है, अभी अभी मेरी हमारे एक साथी से बात हो रही थी हमारे मशीन ठीक हो गए है और सबसे ज्यादा तामसिक उर्जा का प्रवाह कच्छ के मरुस्थल के पास देखने को मिल रहा है, जिस हिसाब से राघव ने कहा है की कालदूत किसी रेगिस्तानी इलाके मैं है तो हो न हो हमारे मशीन से जिस तामसिक उर्जा को महसूस किया है वो कालदूत ही है

रूद्र-तो अब जब हमें पता चल ही गया है के वो कहा है वो अब देर नहीं करनी चाहिए.......

भाग ३१​

सभी लोग अपनी अपनी जरूरतों का सामान पैक कर रहे थे, कालदूत की लोकेशन प्राप्त होने के बाद हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठ सकते थे

रूद्र एक कोने मैं बैठा अपनी जरुरत का सामान पैक कर रहा था, उसपर नरेशजी की मौत का काफी गहरा असर हुआ था भले ही वो किसी से कुछ नहीं कहता था पर वो अब भी अंदर से काफी दुखी था तभी शिवानी उसके पास आई

शिवानी-तुम पर चाचा की मौत का काफी गहरा असर हुआ है

शिवानी की बात सुन कर रूद्र बाद पैक करते करते रुक गया और शिवानी की तरफ देख कर बोला

रूद्र-वो मेरे पिता नहीं थे शिवानी लेकिन फिर भी उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ किया, उनको न बचा पाने का गम तो साडी जिंदगी रहेगा

शिवानी-तुम एक मानव नहीं हो, मतलब वैसे नहीं हो जैसे हम सब है फिर भी तुम्हारे अंदर भी वैसी ही भावनाए है जैसी हममे है ये देख कर मैं हतप्रभ हु

रूद्र(मुस्कुराकर)- मैं कोई रोबोट नहीं हु शिवानी, मेरा शारीर भी उसी तरह काम करता है जैसीक सामान्य मनुष्य का बस उसमे फर्क सिर्फ इतना है के मेरी हड्डिया और त्वचा का कम्पोजीशन सामान्य इंसान से बेहद भिन्न है

शिवानी-मैंने कभी सोचा नहीं था के जिंदगी मैं तुमसे मिलना होगा, मैंने हिडन वारियर्स के साथ काम करते हुए अपने पिता महेश के बारे मैं काफी बाते सुनी थी लेकिन कभी सोचा नहीं था की उनकी रचना से मिलने का मौका मिलेगा, अब चाचा और पिताजी दोनों ही इस दुनिया मैं नहीं है पर कही न कही वे दोनों ही तुमसे जुड़े हुए है और यही बात तुम्हे खास बनती है

रूद्र और शिवानी बात कर ही रहे थे के राघव अपने कमरे से बाहर आया, उसने टीशर्ट जीन्स और एक ब्लैक लेदर जैकेट पहना हुआ था और कंधे पर उसका बैग टंगा हुआ था, उसको देख कर शिवानी उसके पास आयी और आँखों मे देख कर बोली

शिवानी- क्या बात है शास्त्री बड़े हैण्डसम लग रहे हो तुम कालदूत से लड़ने जा रहे हो या गुजरात की लडकियों को पटाने

राघव-तुम ठीक तो हो ऐसी बहकी बहकी बाते क्यों कर रही हो आज तक तो कभी तुम्हारे मुह से ये नहीं सुना मैंने

शिवानी-कमाल है अब तुम आचे लग रहे हो तो बोलू भी ना मैं भी लड़की हु यार हा मानती हु दिनभर दुनिया को बुरी शक्तियों से बचाती हु पर कभी कभी तो अरमान जाग ही जाते है शास्त्रीजी

शिवानी की बात सुनकर राघव मुस्कुराने लगा, दोनों थोड़ी देर एक दुसरे को देखते रहे पर ये समय इन बातो मैं उलझने का नहीं था अजीब सी स्तिथि को नकारने के लिए राघव के बात बदली और शिवानी से प्रश्न कर डाला

राघव-वैसे एक बात बताओ शिवानी, तुम लोग अपनी आर्गेनाईजेशन के लिए लोगो का चयन कैसे करते हो ?

शिवानी-वो काम हमलोग नहीं हमसे उपर के लोग करते है, ऐसा तभी होता है जब बहुत जरुरत हो और ऐसा बहुत कम होता है, हमें हमेशा बेस्ट लोग चाहिए अपने साथ

राघव-तो मान लो की आर्गेनाईजेशन का कोई आदमी काम छोड़ना चाहे या आर्गेनाईजेशन

के राज दुनिया के सामने लेन की धमकी दे तो?

शिवानी-तो दोनों ही सूरतो मे एक विशेष प्रकार की गैस का इस्तमाल करके व्यक्ति की याददाश्त मिटा दी जाती है, और अगर वो इससे बाख भी गया तो भी अगर वो दुनिया के सामने चिल्ला चिल्ला कर भी हमारी आर्गेनाईजेशन के बारे मैं बताएगा तो कोई भला उसपर यकीन क्यों करेगा क्युकी हमारी उपस्तिति का कोई सबूत भी तो होना चाहिए, वैसे छोडो इन बातो को तुम्हारी ट्रेनिंग आचे से हो गयी है और उस काले जादू की किताब से तुम भी telekinesis जानते हो और तो अगर सोचो की लडाई है सेकड़ो कालसैनिक तुमपर हमला करे तो बाख जाओगे न?

राघव-तुम्हे कोई डाउट है क्या? वैसे शक्तिशाली होने के अपने फायदे है कालसैनिको से तो मैं चुटकी बजा के निपट लू

शिवानी-तो कालदूत से भिड़ने के लिए तयार हो?

राघव-हा अब ऐसा कह सकते है पर सच बहुँत तो अंदर से काफी घबराया हुआ हु, कालसैनिको से लड़ना एक बात है और कालदूत का मुकाबला करना अलग बात, कालदूत कुछ और ही है, उसको मैं अकेला नहीं हरा सकता, उसने अपने एक भक्त हो अपनी शक्ति का हिस्सा दे दिया तो वो मुझपर और रूद्र पर भरी पड़ गया तो कालदूत की शक्ति की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती, हम लोग जब तक साथ है हम उसे हरा पाएंगे जिसमे हमें हिडन वारियर्स के हथियारों की भी जरुरत पद सकती है अकेले तो कालदूत के सामने जाना आत्महत्या के समान है

रमण और संजय बडी देर से राघव और शिवानी को बात करते हुए देख रहे थे

रमण-संजय भाई मुझे यहाँ कुछ कुछ होता है टाइप फीलिंग क्यों आ रही है

संजय-तुम शिवानी के बारे मैं बात कर रहे हो

रमण-मुझे लगता है अपना छोटा भाई पसंद करता है उसे क्या बोलते हो?

संजय(हसकर)- वाह इंस्पेक्टर बाबु दस मिनट की बातचीत से कितना कुछ पता कर लिया तुमने तो

तभी चेतन और अविनाश घर के अंदर आये जो बाहर लगातार किसी से फ़ोन पर बात कर रहे थे

चेतन-मेरी बात राहुल से हो गयी है अब हम लोगो को निकलना होगा

रमण-ये राहुल कौन है?

चेतन-हमारी आर्गेनाईजेशन के जिन खतरनाक हथियारों का हमने जिक्र किया था उनका इंस्पेक्शन राहुल ही करता है वो सिर्फ देख कर किसी भी आधुनिक हथीयार के अंदर की बारीक़ बारीक़ खराबी को न सिर्फ पहचान सकता है बल्कि ठीक भी कर देता है, हिडन वारियर्स के पास छोटे मोटे पिस्तौल राइफल जैसे हथियारों के साथ कई ऐसे भी हथीयार है जिनका निर्माण कई देशो मैं बन है,ऐसे हथीयार जो आजतक कभी चलाये नहीं गए, वो अलग अलग जगहों पर रखे गए थे ताकि किसी अमानवीय शक्ति से सामना हो तो काम आ सके, राहुल उन्ही हथियारों को सुरक्षित करने मैं लगा हुआ था ताकि वो किसी गलत हाथ मैं न पड़े, वो हमारे उन गिने चुने लोगो मैं से है जो न सिर्फ आधुनिक हथीयार की समझ ररखते है बल्कि उन्हें चलाना भी जानते है, वो गुजरात पहुच चूका है इसीलिए हमें भी निकलना होगा समय बहुत कम है हमारे

पास

संजय-लेकिन इतने कम समय मैं गुजरात कैसे पहुचेंगे हम जब तक वहा पहुचेंगे कालदूत वहा से निकल भी सकता है

अविनाश-आप सफ़र की चिंता मत्कारिये बस बाहर चलकर देखए

सभी लोग अपने अपने बग्स टांग कर बाहर आ गए

रमण-यहाँ तो कुछ भी नहीं है

तभी अचानक एक बेहद आधुनिक जेट हवा मैं प्रकट होने लगा जिसे देखकर राघव रमण रूद्र संजय बुरी तरह चौक गए

रमण-अरे! ये क्या है?

चेतन-हम लोग हिडन वारियर्स है रमण जी और एक शताब्दी से दुनिया के सर्वश्रेष्ट वैज्ञानिको से साथ काम कर रहे है और अब विज्ञान के ऐसे अजूबे देखने की आदत दाल लीजिये वैसे आपसब की जानकारी के लिए बता दू के ये जेट हमें सिर्फ १ घंटे मैं गुजरात पंहुचा देगा सामान्य लोगो की नजरो मैं न आने के लिए हम हमेशा अपना इनविजिबल मोड ओं रखते है अब सभी लोग अंदर चलो ताकि हम आगे कूच कर सके

उसके बाद सभी लोग एक एक करके जेट मे जाने लगे पर राघव ने रमण को बाहर रोक लिया

राघव-भैया आपका आना जरुरी है क्या? वह क्या होगा हम मे से कोई नहीं जानता आपको कुछ हो गया तो?

रमण-बकवास बंद करो अपनी राघव भलेही तुम्हारे पास पावर्स होंगी पर हो तुम मेरे छोटे भाई ही इसीलिए मैं इस लडाई से पीछे नहीं हटने वाला और अब चलो चुपचाप हमें देर हो रही है

उसके बाद राघव और रमण भी जेट मैं चले गए.....

To Be Continue........

भाग ३२​

सभी लोग अब जेट मैं आ चुके थे, जेट के सामने की तरफ दो सीट लगी गयी थी जिसपर दो सफ़ेद हेलमेट पहने पायलट बैठे हुए थे, अंदर से जेट काफी बड़ा था और सभी के बैठने के लिए वहा पर्याप्त जगह थी

अंदर घुसते ही अविनाश ने पायलट से पूछा

अविनाश-और भाई रामदीन क्या हाल है?

रामदीन-अभीत तक तो सब बढ़िया ही है साब आगे कालदूत से भिड़ने के बाद का पता नहीं

अविनाश(हसकर)- चिंता मत करो इस आर्गेनाईजेशन मे रहने का यही तो फायदा है की मेंबर्स के मरने के बाद उनके परिवार की देख रेख आर्गेनाईजेशन करता है तो तुम्हारे बीवी बच्चे आराम से पल जायेंगे

रामदीन- क्या साब आप तो अभी से हमारे मरने की दुआ कर रहे है खैर अब जरा सीट पर जाकर बैठ जाइये वरना जेट इतनी स्पीड से उड़ेगा की सीधा छत फाड़ कर बाहर निकल जायेंगे

इसके बाद सभी अपनी अपनी जगह बैठ गए और उन्होंने सीटबेल्ट लगा ली और जेट चलना शुरू हुआ, पहले वो हवा मे धीरे धीरे उपर उठा और फिर एक निश्चित ऊचाई पर पहुच कर ‘सांय’ से हवा को काटता हुआ आकाश मैं उड़ने लगा और इसी के साथ रामदीन के एक बटन दबाया दिया जिससे जेट वापस अदृश्य हो चूका हा, हालाँकि सभी ने सीटबेल्ट पहन राखी थी फिर भी वो जेट की अपीड को महसूस कर पा रहे थे

रूद्र-तो अब क्या प्लान है?

रूद्र की बात सुनकर अविनाश ने मुस्कुराकर अपना पास रखा एक काला सा बैग निकाला

रमण-अरे! ये बैग तो तुम्हारे पास पहले नहीं था तो क्या तुम्हारी आर्गेनाईजेशन ने जेट के साथ इसे भी भेजा

है

अविनाश-बिलकुल सही

बैग के अंदर एक गिटार के बराबर का यंत्र रखा हुआ था जो दिखने मैं बहुत ही खतरनाक लग रहा था उसने बहुत से छोटे छोटे खांचे बने हुए थे और अंत मैं एक ट्रिगर जिससे उसे संचालित किया जा सकता था

राघव-ये क्या है?

अविनाश-इसे हमलोग गेटवे कहते है

रमण-ऐसा यंत्र न पहले कभी देखा न सुना

चेतन-आप इसके बारे मैं जान भी नहीं सकते थे ये हिडन वारियर्स के उन गुप्त हथियारों मैं से है जो पूरी पृथ्वी को ख़तम करने की ताकत रखते है इसीलिए उन्हें दुनिया की नजरो से बचाकर रखना भी हमारी जिम्मेदारी है

संजय-लेकिन ये काम कैसे करता है?

चेतन-आपलोगों ने ब्लैक होल के बारे मैं सुना ही होगा

राघव-हा अंतरिक्ष वो विशेष हिस्सा जहा गुरुत्वाकर्षण शक्ति इतनी सघन होती है जो ठोस वस्तुओ के साथ साथ प्रकाश को भी अपने भीतर कैद करने की क्षमता रखता है लेकिन उसका इससे क्या लेना देना

अविनाश-लेना देना इसीलिए की हमारा ये शस्त्र कुछ समय के लिए कृत्रिम ब्लैक होल उत्पन्न करने की क्षमता रखता है

रूद्र-पर ये कैसे संभव है अंतरिक्ष मैं तो ब्लैक होल किसी तारे से फटने से सुपरनोवा द्वारा उत्पन्न होता है तुमलोग भला इससे ब्लैक होल कैसे पैदा करोगे

चेतन-जब हमने इसके बारे मैं पहली बार सुना था की ये ब्लैक होल उत्पन्न करता है तो हम भी चौक गए थे लेकिन पहली बात तो ये है की ये एक कृत्रिम ब्लैक होल पैदा करता है जिसकी वस्तुओ को अपने भीतर खींचने की क्षमता असली से बहुत कम होती है और दूसरी बात की ये ब्लैक होल मात्र कुछ क्षणों के लिए प्रकट होता है जिससे कुछ ज्यादा नुकसान नहीं फ़ैल सकता, आइंस्टीन की थ्योरी of रिलेटिविटी के अनुसार अगर हम किसी स्पेस को मत्तेर द्वारा इतना अधिक डिसटॉर्ट करदेते है की सघन गुरुत्वाकर्षण के कारण प्रकाश भी उस जगह पर कैद होकर रह जाता है तब उस जगह पर ब्लैक होल उत्पन्न करना संभव है बस इसी सिद्धांत पर ये यंत्र कम करता है, कालदूत बहुत ज्यादा शक्तिशाली हो सकता है पर अगर हम इस यंत्र का उपयोग उसे ब्लैक होल के अंदर खींचने के लिए करे तो क्या वो उसे रोक पायेगा? शायद नहीं क्युकी शक्तिशाली से शक्तिशाली प्रन्नी या उर्जा भी ब्लैक होल का विरोध नहीं कर सकती

रमण-क्या तुमलोगों ने पहले भी इसका इस्तमाल किया है कभी?

अविनाश-नहीं उसका कभी मौका नहीं मिला क्युकी इतनी खतरनाक मुसीबत कभी हिडन वारियर्स के सामने आयी ही नहीं की इतने उच्च कोटि के हथीयार का प्रयोग किया जा सके लेकिन ये पूरी तरह काम करता है इसकी गारंटी हम लेते है

रमण-बात काम करने की नहीं है सवाल तो ये है की इससे पैदा हुआ ब्लैक होल वापिस नष्ट कैसे होगा?

रमण का सवाल वाजिब था जिसे सुन कर चेतन और अविनाश एकदूसरे का मुह ताकने लगे

रमण-तो तुमलोग ब्लैक होल उत्पन्न करोगे लेकिन इसे बंद करने का तरीका

तुम्हारे पास नहीं है

चेतन-वो अपने आप ही कुछ क्षणों के लियेखुलकर बंद हो जायेगा.......जहा तक हमें लगता है

रूद्र-पक्के तौर पर कहो चेतन

अविनाश-देखिये मैं आप सबकी चिंता समझ रहा हु लेकिन ये हमारे पास आखरी मौका है कालदूत को रोकने का हम हिडन वारियर्स आज तक भुत प्रेत दायाँ चुड़ैल आदि इत्यादि से लडे है पर अपने हथियारों के बल पर उन्हें हराया भी है लेकिन इतने शक्तिशाली शत्रु से हम्मर कभी सामना नहीं हुआ है, हमारे साथी राहुल की थथ्योरी के हिसाब से ये कृत्रिम ब्लैक होल कुछ मिनटों के लिए खुलेगा और अपने आसपास की चीज़ खिंच कर बंद हो जायेगा

रमण(क्रोधित होकर)- थ्योरी! यहाँ मानवता डाव पर लगी है और तुम्हे एक थ्योरी पर भरोसा है? क्या पता ब्लैक होल बंद न हो और पूरी पृथ्वी को अपने अंदर खिंच ले

चेतन-पर ऐसे हमारे पास एक मौका तो है कालदूत के होते हुए पृथ्वी वैसे भी सुरक्षित नहीं है

राघव-बकवास मत करो चेतन ये दो धारी तलवार पर चलने के सामान है क्या तुम्हे मुझ्कर और रूद्र पर भरोसा नहीं है, तुम हरामी ताकत जानते हो भले ही कालदूत हमसे ज्यादा शक्तिशाली है पर अगर हम साथ है तो उसे हरा सकते है हथीयार रख दो हम कोई दूसरा रास्ता निकालेंगे

शिवानी-तुम्हे हमारी बात कर भरोसा नहीं है

राघव-तुमपर भरोसा है पर इस हथीयार पर नहीं है

जेट गुजरात पहुचने वाला था और साथ ही इन लोगो की आपसी बहस ने भी विकराल रूप धारण कर लिया था

चेतन-हमारे पास दुनिया को बचाने का ये आखरी विकल्प है तुम लोग समझ क्यों नहीं रहे हो

राघव-दुनिया को बचाने के लिए उसे ख़तम करने वाले हथीयार का इस्तमाल कभी आखरी विकल्प नहीं हो सकता, दुनिया को बचाने के कोई और रास्ता खोज लिया जाएगा

चेतन-जब तक हम दूसरा रास्ता खोजेंगे कालदूत पृथ्वी को नरक बना देगा

अविनाश-बस बहुत हुयी बहस! यहा हमें पता नहीं है की कालदूत कितनी तभी मचा चूका है और तुम लोग दुसरे विकल्प की बात कर रहे हो? हम यही हथीयार इस्तमाल करेंगे और तुम ल्लोग हमें नहीं रोक सकते

राघव(गुस्से से)- अगर यही बात है तो ठीक है फिर करो मुझसे मुकाबला! एक कालदूत की दुनिया को नष्ट करने पर आमदा है लेकिन तुम्हारा हथीयार उम्मीद देने के बजाय रही सही उम्मीद भी ख़तम कर देगा मैं अभी इसे उठाकर इस जेट से बाहर फेक देता ही

राघव ने अपना सीट बेल्ट खोला और अविनाश की तरफ बढा तभी अविनाश ने अपनी जेब से एक छोटा सा पेन जैसा कुछ निकला और उसपर लगा बटन दबाया जिससे एक विशेष प्रकार का धातुई जल निकला और उसने राघव को जकड लिया और उसे सीट से बाँध दिया जिसे देख कर रूद्र भी तैश में आ गया और उसने अविनाश पर प्रहार करना चाहा पर उसके पहले वो भी उसी धातुई जाल मैं बंद चूका था उर साथ ही संजय और रमण भी

अविनाश-ये नायलो स्टील का जाल है हालाँकि तुम्हारे अंदर असीमित ताकत है पर तुम्हे भी इससे

निकलने मैं काफी मेहनत करनी पड़ेगी, हम ऐसा नहीं करना चाहते थे पर तुमने हमको मजबूर कर दिया, शायद तुमने ध्यान नहीं दिया मगर हमारा जेट इस वक़्त कच्छ के उपर ही है, अब हम पैराशूट लेकर निकलते है, तुमलोग हमारे साथ आ सकते थे लेकिन तुमने हमारे खिलाफ जाना चुना अब हमारे दोनों पायलट्स तुम्हे आचे से पुरे गुजरात की सवारी करा देंगे, हैप्पी जर्नी.

अविनाश और चेतन ने अपना पैराशूट बैग लिया और विमान का द्वार खुल गया और वो दोनों निचे कूद गए, सबसे अंत मैं द्वार के पास शिवानी पहुची और उसने कूदने से पहले एक नजर राघव की तरफ डाली और बोली

शिवानी-सॉरी राघव पर ये जरुरी है

राघव(चिल्लाते हुए)- तुम लोग पागलपन करने जा रहे हो

पर तब तक शिवानी कूद चुकी थी

रमण-कोई फायदा नहीं है राघव हमें पहले इस जाल और जेट से निकलने पर ध्यान देना चाहिए

अब राघव का गुस्सा सातवे आसमान पर था और रूद्र भी अपनी पूरी ताकत लगा रहा था उस जाल से निकलने के लिए, वो जाल तो कही स नही टुटा लेकिन पूरी सीट ही उखड गयी और सीट उखाड़ते ही जाल की पकड़ उनपर ढीली पड़ने लगी फिर ऐसे ही राघव और रूद्र ने संजय और रमण को जल से छुडवाया और कुल पांच मिनट मे वो जाल से आजाद थे

बिना वक़्त गवाए रूद्र पायलट के पास पंहुचा और गुस्से से बोला

रूद्र-अगर पांच मिनट मे हम वहा नहीं पहुचे जहा वो तीनो लोग पैराशूट लेकर कूदे है तो मैं अपने हाथो से तुम दोनों की खोपड़ी पिचका दूंगा

तभी वहा राघव भी पहुच गया और उनको क्रोध से तमतमाते देख एक पायलट बोला

पायलट-रुको हम आपको वही पंहुचा देंगे जहा वो लोग उतरे है

संजय-ये उनलोगों ने बिलकुल ठीक नहीं किया अब ऍम उनको कहा ढूंढेगे

रमण-मुझे इनसे बातचीत के दौरान पता चला था के ये अपने साथी राहुल के होटल MKB मे मिलने वाले थे जो कच्छ के रण के आसपास ही है हमें भी वही जाना होगा

राघव-बस अब ये खेल बहुत हो गया अब जो जंग होगी वो आखरी होगी भले ही मुझे अपनी आखरी सास तक लड़ना पड़े लेकिन मैं कालदूत का राज इस धरती पर कभी कायम नहीं होने दूंगा........

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भाग ३३​

चेतन अविनाश और शिवानी तेज कदमो से चलते हुए होटल MKB मे पहुच चुके थे और राहुल उनको बाहर रिसेप्शन के पास ही खड़ा मिल गया और राहुल ने उनको तेजी से अपनी और आते देख पूछा

राहुल-इतनी देर कहा लगा दी?

चेतन-लम्बी कहानी है, रास्ते मे कुछ ज्यादा ही एक्शन हो गया था

राहुल-गेट वे गन लाये हो?

चेतन(काला बैग दिखाकर)- हा वो तो हम लाये ही है लेकिन क्या तुम पक्के तौर पर कह सकते हो की ब्लैक होल कुछ समय तक प्रकट होकर अपने आप बंद हो जायेगा? अगर कालदूत को अपने भीतर खींचने के बाद भी ये बंद नहीं हुआ तो? अगर पृथ्वी हमारी वजह से खतरे मे आ गयी तब क्या होगा?

राहुल-देखो दोस्त, जब ये गन बन रही थी तो मैं भी बाकि वैज्ञानिकों के साथ मिलकर प्रोसेसिंग देख रहा था तो मैं पूरी तरह से आश्वस्त हु के ब्लैक होल कुछ ही क्षणों के लिए खुलेगा उम बस इसकी दुआ करो की उतने समय मे हम कालदूत को उसमे कैद करने मे सफल हो जाये, बस अपना निशाना सही रखना, द्वार कालदूत के आसपास ही खुलना चाहिए, वो बहुत ताकतवर है और जरा सी भी चुक हमारी मौत का कारण बनेगी रुकोमें उसकी पोजीशन देख लेता हु

फिर राहुल ने अपनी जेब से एक लोकेटर यंत्र निकला और उसमे ध्यान से देखते हुए बोला

राहुल-ये कच्छ का रण मरुस्थल ७५०० वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल मे फैला हुआ है लेकिन सबसे तेज तामसिक उर्जा का सिग्नल यहाँ से कुछ की दूर पश्चिम दिशा के वीरान रेगिस्तान से कैच हो रहा है वह कुछ छोटे छोटे गाँव भी है कालदूत वही होगा

अविनाश-ठीक है अब ज्यादा समय नष्ट मत करो अगर राघव पहुच गया तो बेकार मे काम मे बाधा आएगी

वो लोग राहुल को साथ लेकर होटल से निकल गए और उनके निकलने के कुछ देर बाद राघव और बाकि सब भी होटल पहुच गए

रूद्र-यहाँ तो आसपास कोई नजर नहीं आ रहा

रमण-लगता है वो लोग राहुल को साथ लेकर कालदूत से भिड़ने निकल गए है

रूद्र-राहुल कुछ समय के लिए यहाँ रुका था तो हो सकता है उसने किसी रूम मे चेक इन किया हो?

रमण-चलो चलकर रिसेप्शन पर पूछते है

उनलोगों ने जाकर रिसेप्शन पर राहुल के बारे मैं पूछा पर रिसेप्शन ने उन्हें बता ने मन कर दिया जिसके बाद संजय ने एक २००० का नोट उस आदमी को दिए और उसने सारी बात बता दी

रिसेप्शनिस्ट(नोट लेकर)-हा सर किसी राहुल नाम के लड़के ने कुछ समय पहले ही चेक आउट किया है वो यही कुछ लोगो का इंतजार कर रहा था और वो बडी अजीब बाते कर रहे थे जैसे कोई ‘गेटवे’ ‘ कालदूत’ ‘बालकक होल’ पता नहीं क्या क्या मेरे पल्ले बस इतना पड़ा के वो लोग पश्चिम दिशा के सुनसान रेगिस्तान मैं जाने की बात कर रहे थे

राघव-क्या वो इलाका पूरी तरह से सुनसान है?

रिसेप्शनिस्ट-नहीं पूरी तरफ नहीं वहा कुछ छोटे मोटे गाँव बसे हुए है

राघव-पता चल गया है वो लोग कहा पर है, अब हमको बिना देर किया यहाँ से निकलना चाहिए, वे मुर्ख

कालदूत से निपटने के लिए खुद ही मुसीबत बनते जा रहे है, अगर उसका यंत्र वाकई ब्लैक होल उत्पन्न कर सकता है तो नजाने पपृथ्वी का क्या होगा

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रण के दूर दराज के इलाके मे बसा एक छोटा सा गाँव जो शहर और बाकि आसपास के गांवों से थोडा कटा हुआ था, गाँव की सीमा कर लल्लन पान वाले की एक छोटी सी दुकान थी और वहा कुछ दो चार लोग खड़े बातचीत कर रहे थे

विनोद-भाई सरकार का दावा है के इस बार अपने गाँव मे बिजली पानी की व्यस्था आ ही जाएगी

मनोज-अरे भैया अभी १० घंटे आ जाये बस काफी है फ़िलहाल तो हालात इतने ख़राब है की लोग गाँव छोड़कर शहर की तरफ भाग रहे है

लल्लन-अरे वो सब छोडो भैया ये बताओ की आज दुकान ज्यादा देर तक खोलना ठीक रहेगा या नहीं? क्युकी कुछ दिनों से मौसन बड़ा ख़राब चल रहा है, दिन मे मानो शाम हो गयी हो, हमें लग रहा है आज तेज आंधी तूफान आने वाला है

विनोद-अरे क्यों मनहूसियत की बाते कर रहे हो पहले ही हमारी मुसीबते कम है क्या जो अब आंधी तूफान भी झेले?

तभी अचानक ही तेज बिजली चमकी और पुरे गाँव की बिजली चली गयी, हालाँकि दिन मैं बिजली जाने का पता कम ही लगता था पर आसमान मे घने बादल होने की वजह से दिन मे शाम वाला माहोल हो गया था

लल्लन-लो भाई आ गयी २४ घंटे बिजली, हा हा हा

विनोद-जब तक सरकार मैं निकम्मे लोग रहेंगे यही हाल रहेगा

मनोज-वैसे इस टाइम तो बिजली हमेशा रहती है आज क्या हुआ

विनोद-हम्म, बात तो सही है कटिया चोर रघु का काम तो नह्जी है ये?

तभी दूर से सबको रघु आता दिखा

रघु-अरे भैया हम ये सब गलत काम छोड़ दिए है हम बिजली विजली नहीं चुराते अब

विनोद-फिर कोई नया होगा

तभी शांत वातावरण मे कुत्तो बिल्लियों के रोने की आवाजे एक साथ गूंजने लगी

लल्लन-अब ये सब क्यों चिल्लम चिल्ली मचा रहे है?

विनोद-सब एकसाथ रो रहे है कोई बड़ा अपशगुन है

मनोज-ये कैसी बाते कर रहे हो

तभी सबको गाँव के बाहरी हिस्से से दो जानवरनुमा अकृतिया गाँव के भीतर की और आतियो दिखी. दूर होने के कारण पहले तो किसी को स्पष्ट कुछ नहीं दिखा पर वो तेजी से आगे बढ़ रही थी

विनोद-अबे ये क्या है?

रघु-भ....भैया...ये तो बड़े जानवर से लग रहे है

उन दो जानवरों को पास आते देर नहीं लगी, ये वही दो मछुवारे थे जो कालदूत की शक्ति के प्रभाव से दरिंदे बन चुके थे, उनका भयानक स्वरुप देख कर लल्लन की दुकान पर बैठे लोगो के पैरो तले जमीन खिसक गयी

मनोज-भ..भागो....

विनोद-हा हा जल्दी भागो!

मनोज और विनोद उन मछुवारो के वहा पहुचने के पहले ही भाग चुके थे पर लल्लन और रघु की किस्मत उतनी अच्छी नहीं थी, उनकी जोरदार चीखे तेजी से भागते मनोज और विनोद के कानो मे पड़ी लेकिन वो पीछे नहीं मुड़े और भागते हुए सीधे ठाणे पहुचे जहा इंस्पेक्टर सीताराम आराम से पैर पसरकर बैठा था, मनोज और विनोद दौड़ते हुए अंदर गए, पसीने से तरबतर हाफते हुए

सीताराम-अबे क्या तूफानमेल की तरफ आ रिये हो

विनोद-वो..रघु और लल्लन, वो दोनों...

सीताराम-रघु? फिर से बिजली चोरी के धंदे पर लग गया क्या?

मनोज-नहीं साब! मारा गया, दोनों मारे गए

सीताराम-मारे गए? किसने मारा?

वोनोद-दो जानवर थे, पता नहीं क्या थे

सीताराम-जानवर? अबे यहाँ आजतक कभी लकड़बग्घे को भी घूमते देखा है? एक तो बिजली नहीं ऊपर से तुम दोनों गांजा मार्के आ गए दिमाग का दही करने

मनोज-सच बोल रहे है हम आप चलिए हमारे साथ अगर कुछ नहीं रहा तो अंदर कर देना

सीताराम-ठीक है, गाड़ी निकाल प्रजापति चल थोडा टहल के आया जाये

पुलिस जीप मैं बैठकर वो सब लोग लल्लन की दुकान पर पहुचे तो वहा का नजारा दिल देहला देने वाला था, सामने लल्लन और रघु के लाशे पड़ी हुयी थी और वो दो मछुवारे उनका सीना चिर कर दिल निकालकर खा रहे थे, ये देखकर जीप मैं बैठे हर व्यक्ति की हालत ख़राब हो गयी, जीप उनसे बस १० कदम दूर थी

सीताराम- प्रजापति ब..बन्दूक निकाल, अबे जल्दी कर!

प्रजापति भी बुरी तरफ घबराया हुआ था वो बोला

प्रजापति-साहब! वहा जाना जरुरी है क्या मैं तो कहता ही गाड़ी निकालो और निकलते है यहाँ से

सीताराम(दांत भींचकर)- अबे गाड़ी भागकर जायेगा कहा इनके यहाँ नहीं रोका तो गाँव मे घुसकर पता नहीं कितने लोगो को मार दे

सीताराम की बात प्रजापति को ठीक लगी, वो दोनों और बाकि दो हवलदार धीरे धीरे सावधानी से जीप से निचे उतरे लेकिन उनकी आहात राक्षसरूपी मछुवारो को मिल गयी लेकिन इससे पहले की वो किसी की तरफ बढ़ते धडाधड गोलिया चलने लगी, एक मछुवारे के शारीर को तो एक साथ कई गोलियों ने छलनी कर डाला लेकिन दूसरा मछुवारा फुर्तिसे बचकर आगे खड़े हवलदार के पास पंहुचा और पंजा मारकर उसकी गर्दन चिर डाली, मुह से खून फेकते हवलदार का शारीर कठोर धरातल से जा टकराया, ये खतरनाक दृश्य देख कर बाकि सब और भी बुरी तरह डर गए फिर आँखों मे अंगारे लिए वो दरिंदा बाकि सब की तरफ बढ़ा, उसका शारीर हवा मे उछला ही था के सीताराम ने निशाना लगा कर उसपर गोली चलायी और गोली उसके पेट को चीरती हुयी निकल गयी, मौका देखकर बाकियों ने भी उसपर गोलिया चलाना शुरू किया और उसका हश्र भी पहले वाले मछुवारे जैसा हुआ, अब उन दोनों मछुवारो का निर्जीव शारीर धरातल पर पड़े हुए थे, उनका विचित्र स्वरुप देखकर बाकि सब भी हैरान थे

सीताराम-ये आखिर है क्या चीज़? इंसान जैसे जानवर?

प्रजापति-ये तो

राक्षस जैसे लग रहे है, ऐसे प्राणी न तो कभी देखे न सुने

तभी उन सबसे सामने से आते काले चोगे वाले नकाबपोश लोगो को देखा, जिसमे सबसे आगे संतोष था

वही दूसरी तरफ कालदूत अपनी तपस्या से जान चूका था और उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी, कालदूत खड़ा होकर अपने हठी को हवा मे इधर उधर घुमा रहा था और अचानक ही उसका हाथ एक जगह पर रुक गया और उसके चेहरे पर एक भयानक मुस्कान फैलती चली गयी और वो अपनी प्रभावशाली गंभीर आवाज मे बोला “आख़िरकार मुझे दूसरी दुनिया का आयाम द्वार मिल ही गया, अब मुझे इसे अपनी शक्तियों से खोलना चाहिए”

उसके हाथो से एक तरंग निकली जिसने कुछ दूर जाकर हवा मे एक गोल उज घेरा बना लिया

कालदूत-हा हा हा! बस कुछ देर की बात है और फिर इस आयाम से आजाद हो जायेंगे मेरे गुलाम प्राणी जो इस पृथ्वी को गुलाम बनाने की क्षमता रखते है, अब जरा ये भी देख लू के मेरे भक्त क्या कर रहे है.......

भाग ३४​

जब सीताराम ने उन काले चोगे वाले लोगो को आते देखा तो उसे कुछ समझ नहीं आया तो वो तुरंत उनकी तरफ अपनी बन्दूक तानकर खड़ा हो गया लेकिन संतोष ने telekinesis द्वारा उसकी बंदूक गिरवा दी तभी अचानक तेज हवाए चलने लगी, हवा की मार इतनी तेज थी के खड़े रहना भी मुश्किल लग रहा था, बिजली की तेज गडगडाहट और तेज रेतीली आंधी के कारण गांववाले भी बुरी तरह आशंकित हो गए थे

सीताराम ने आगे बढ़कर घबराते हुए पूछा

सीताराम-क...कौन हो तुम लोग? और क्या चाहते हो?

तब संतोष अपनी बुलंद आवाज मे बोला

संतोष-गाँव वालो! तुमको कालसेना की तरफ से ये सुचना दी जाती है की हमारे देवता कालदूत लाखो वर्षो की कैद से बाहर आ चुके है, वे तुम्हे वो सब देंगे जो तुम जीवन मे पाना चाहते हो उसके लिए तुम सभी अलग अलग धर्मो और संप्रदाय के लोगो को आज से सिर्फ एक ही इश्वर की पूजा करनी होगी और वे होंगे महान कालदूत!

सीताराम-और अगर हमने ऐसा नहीं किया तो

संतोष(कुटिलता से सीताराम की और देखकर)-तो फिर तुम्हारे इस छोटे से गाँव का नामोनिशान मिटा दिया जायेगा, हर उस जगह का नामोनिशान मिटा दिया जायेगा जहा लोग हमारे इश्वर की भक्ति को अस्वीकार करेंगे

शोर शराबे के कारण बाकि गांववाले भी बाहर निकल आये थे और संतोष की बाते और कालसेना की अजीब वेशभूषा देखकर वो हसने लगे तभी संतोष ने अपना एक हाथ हवा मैं घुमाया और एक गांववाले की गर्दन धड से अलग हो गयी और ये देखकर वहा मौजूद सभी घबरा गए

संतोष(मुस्कुराते हुए)- तुम सबको अपनी जान बचने का एक मौका दिया गया लेकिन लगता है तुममे से कोई भी अपने प्राणों को लेकर गंभीर नहीं है, खैर तुम सबकी जान लेने मे मजा आएगा

तभी कही से आवाज आई “रुक जाओ!”

सभी गांववाले और कालसेना का ध्यान उस तरफ गया जहा रेत का टीला थोडा सा उठा हुआ था और उसके उपर खड़े थे चारो हिडन वार्रोर्स- चेतन, अविनाश, शिवानी और

राहुल

संतोष-अब तुम लोग कौन हो?

चेतन-हिडन वारियर्स का नाम तो सुना ही होगा तुमने

संतोष-वो तो लगभग हर कालसैनिक ने सुना है सभी कल्सैनिको को तुम्हारे बारे मे पता है पर तारीफ़ करनी होगी तुम्हारी संस्था की जो इतने सालो से हमारी नाक मे दम कर रखा है पर अब हमारे प्रभि आजाद है अब तुममे से कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता

अविनाश-मानवता को हराने मे कोई सफल नहीं हो सकता न तुम न तुम्हारा भगवान

संतोष-वाकई? जरा हम भी देखे तुम चार क्या कर सकते हो

संतोष ने अपना हाथ हवा मे उठाया और अविनाश ने अपनी छाती पर दबाव महसूस किया

अविनाश-ये लोग telekinesis का इस्तमाल कर रहे है अपना हथीयार निकालो राहुल

राहुल ने अपने बैग से एक विशेष प्रकार की रॉड निकली और उस रेगिस्तानी रेतीली जमीन पर गाड दी, उस यांत्रिक रॉड ने अपने आप उस रेतीले धरातल पर अपनी पकड़ बना ली

संतोष-हा हा हा! कुछ नहीं हुआ तुम्हारे इस हथीयार से अब मरने के लिए तयार.......अरे, telekinesis क्यों काम नहीं कर रहा?

राहुल-ये रॉड वातावरण मे फैली हर प्रकार की ताकतवर तामसिक उर्जकिरनो को काट सकती है, तुम्हारी शक्तिया कालदूत की दें है और वो भी इसलिए की तुम उससे मानसिक रूप से जुड़े हुए हो अब अब तुम्हारा संपर्क कालदूत से टूट गया है, अब तुमको हमसे पीटना पड़ेगा

वही कालदूत भी अपने गुलामो को आजाद करके इनकी तरफ बढ़ रहा था

कालसेना और हिडन वारियर्स तेज़ कदमों से एक दूसरे की तरफ बढ़ रहे थे

चेतन - तैयार हो जाओ दोस्तों, इनके पास telekinesis भले ही न हो लेकिन असाधारण शारीरिक बल अभी भी है हमें पूरी जान लगाकर इनसे भिड़ना होगा

अविनाश- अगर ये शक्तिशाली हैं तो हम भी अपनी आर्गेनाइजेशन के सबसे प्रशिक्षित योद्धा हैं। हमसे पार पाना इनके लिए इतना आसान ना होगा

एक कालसैनिक अवनीश की तरफ बढ़ा और उसके चेहरे पर तेज़ मुक्का मारने का प्रयास किया लेकिन अवनीश तेज़ी से नीचे झुककर बच गया और उस कालसैनिक के घुटनों पर तेज़ लात मारी जिससे वह पीछे गिर पड़ा। चेतन और शिवानी भी असाधारण फुर्ती से अपने विरोधियों से बच रहे थे और साथ ही साथ वार भी कर
रहे थे लेकिन लड़ते लड़ते ही अचानक एक कालसैनिक का लोहे जैसा घूंसा चेतन के चेहरे पर पड़ा और उसने अपने मुंह से खून फेंक दिया वह ज़मीन पर बैठ गया, तेज़ मुक्के के कारण कुछ पलों के लिए उसके आंखों के आगे अंधकार छा गया था।

शिवानी का ध्यान भी अचानक घायल चेतन की तरफ चला गया जिसके कारण
दो कालसैनिको ने उसे पकड़ लिया, उनकी बेहिसाब ताकत के कारण उनकी पकड़ से छूटना उसके लिए मुश्किल था, कई सारे कालसैनिक अवनीश की तरफ भी बढ़ते चले जा रहे थे कि तभी अचानक एक ऊर्जा ब्लास्ट हुआ और एक कालसैनिक के शरीर के चिथड़े हो गए

राहुल ने एक विचित्र सी गन निकाल ली थी जिससे वह एक एक करके कालसैनिको को निशाना बना रहा था उसने एक गन अवनीश की तरफ भी फेंक दी जिससे सबसे पहले अवनीश ने उन कालसैनिको को निशाना बनाया जिन्होंने चेतन और शिवानी को पकड़ रखा था और उसके बाद वे एक एक करके सभी कालसैनिको को निशाना बनाने लगे।

राहुल ने गन चलाते हुए अवनीश से पूछा

राहुल-मेरी ब्लास्टर कैसी लगी भाई? यह एक बार में पूरी फौज को उड़ा सकती है, ये कालसैनिक नहीं टिकने वाले अब अपने सामने

अवनीश(चिढ़कर)- बहुत अच्छी लगी, अगर हम लोगों के मार खाने से पहले, निकाल लेते तो और ज़्यादा अच्छा होता।

राहुल- सॉरी भाई। दरअसल इतना डर गया था कि मैं भूल ही गया कि मैं दो ब्लास्टर्स अपने साथ लाया हूँ

वे लोग इतनी कुशलता से ब्लास्टर को चला रहे थे की कालसैनिक उन तक पहुंचने से पहले ही चीथड़ों में तब्दील हो जा रहे थे

दस मिनट बाद रेगिस्तान की रेतीली ज़मीन पर सैकड़ों कालसैनिको की लाशें पड़ी हुई थीं, सिर्फ संतोष बचा हुआ था, जब अवनीश और चेतन ब्लास्टर थामे उसके पास पहुंचे तब भी उसके चेहरे पर मौत का भय नहीं था, वह मुस्कुराता हुआ बोला

संतोष-तुम्हें क्या लगता है कि हमको खत्म करके तुम हमारे अभियान को खत्म कर सकते हो? हमारे प्रभु की शरण में जाने वाले लोगों की कमी नहीं है दुनिया में कालसेना कभी खत्म नहीं हो सकते क्योंकि हम कुछ "लोग" नहीं बल्कि एक विचारधारा हैं तुम लोगों को खत्म कर सकते हो लेकिन एक विचारधारा को नहीं

अवनीश गुस्से से संतोष के माथे पर ब्लास्टर को टिकाकर बोला

अविनाश-और क्या विचारधारा है तुम्हारी? यही की सब तुम्हारे प्रभु की भक्ति करें और जो ना करें उन्हें तुम निर्ममता से मार डालो, लोगों को उनके धर्म और आस्था के विरुद्ध कोई और विश्वास उन पर जबरन थोपने की विचारधारा एडोल्फ हिटलर की भी थी लेकिन उसका क्या हश्र हुआ? उसे खुद को गोली मारकर आत्महत्या करनी पड़ी मुझे वाकई तुम लोगो पर तरस आता है क्योंकि तुमने एक समुद्र से निकले एक जीव को ना सिर्फ भगवान का दर्जा दे दिया बल्कि उसके नाम पर मारकाट करने पर भी उतारू हो, तुम्हें तो ये भी नज़र नहीं आता कि तुम्हारा आराध्य देव कालदूत इतना स्वार्थी है कि वह बस अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए तुम जैसे हज़ारों की बलि चढ़वा देगा और उफ तक नहीं करेगा जब तक उसे सुशेन की ज़रूरत थी तब तक उसने उसे शक्ति दी लेकिन समुद्र से स्वतंत्र होते ही अपनी शक्ति का वह

अंश वापस ले लिया? अगर तुममें थोड़ी सी भी समझदारी होती तो तुम लोग उसी वक्त समझ जाते कि तुम्हारी भक्ति सिर्फ एक जरिया है जिससे कालदूत इस दुनिया पर राज कर सकता है और यहाँ धरती पर वह तुम लोगों के दुख दर्द दूर करने नहीं बल्कि अपना उल्लू सीधा करवाने आया है लेकिन अगर तुम इतने समझदार होते तो उसकी भक्ति के लिए अपने पतन के मार्ग पर न निकल पड़ते खैर, तुम्हें ये सब समझाने का कोई मतलब नहीं क्योंकि तुम उसके अंधभक्त हो, तुम जैसों से निपटने का तरीका सिर्फ एक ही है

इतना कहकर अवनीश ने ब्लास्टर का ट्रिगर दबा दिया और संतोष की खोपड़ी की राख धरती पर जा गिरी

कुछ देर तक पूरे वातावरण में मौत जैसी खामोशी थी कि तभी अचानक चेतन का ध्यान अपने लोकेटर की तरफ गया जिसकी स्क्रीन पर तेजी से जल बुझ रहा एक बिंदु उन्हीं की तरफ बढ़ रहा था

चेतन – कालदूत! वो इसी तरफ आ रहा है! गेटवे गन तैयार करो जल्दी!

राहुल- इतनी जल्दी मत करो! कालदूत को अपने भक्तों की नाकामयाबी का पता तो चल ही गया होगा, हमें छुपकर उसका इंतजार करना होगा हथियार मुझे दो ज़रा

चेतन (बैग थमाते हुए)-ये लो, क्या करोगे इसका?

राहुल- गेटवे गन में कोई ट्रिगर नहीं है जिसे दबाते ही यह एकदम से चल पड़ेगी, इसे चालू करने के बाद यह दो मिनट की लोडिंग लेगी और उसके बाद चलने के लिए रेडी हो जाएगी

तभी वातावरण में एक आवाज़ गूंजी " मुझसे लड़ने की कोई आवश्यकता नहीं बच्चों, मैं तो धरती पर सभी मानवों का उद्धार करने आया हूँ तुम्हें वह शक्ति देने आया हूँ जो तुमको मानव से महामानव बना देगी।" सभी ने आवाज़ की दिशा में मुड़कर देखा तो एक दिल दहला देने वाला दृश्य पाया मनुष्यरूपी कालदूत धीरे
धीरे हवा में उड़ता हुआ उन्हीं की तरफ आ रहा था और साथ मे थी उन एक आंख वाले भयानक प्राणियों की सेना जिसे उसने उस आयामद्वार को सक्रिय करके बाहर निकाला था। वे छह फुट लंबे एक आंख वाले प्राणी बेहद बलिष्ठ शरीर के स्वामी थे, उनका पूरा शरीर हल्के नीले रंग का था, उनके दांत और पंजे इतने तीक्ष्ण थे कि किसी को भी फाड़ खाने की क्षमता रखते थे वे संख्या में अधिक नहीं थे लेकिन उनको देखकर ही किसी आम इंसान के शरीर में सिहरन दौड़ सकती थी

कालदूत- तुम बालकों ने मेरे भक्तों को इतनी आसानी से खत्म कर दिया मतलब की तुममें असाधारण कौशल है इस दुनिया मे मेरा राज कायम करने में मेरी मदद करो और मैं तुमको इतनी शक्तियां दूंगा जिसके बारे में तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा मैं तुम्हारे निर्दयी ईश्वर की तरह नहीं हूं, मैं सबकी सुनूँगा और सबकी इच्छाएं पूरी करूंगा
शिवानी- गेटवे गन लोड करिए राहुल भैया, जल्दी

राहुल- ह..

हां, मैं कर रहा हूँ पर इसमें अभी भी थोड़ा वक्त है

कालदूत हवा में तैरता हुआ राहुल के समीप आ गया उसके पीछे एक आंख वाले राक्षसों की टुकड़ी बिल्कुल स्थिर सावधान की मुद्रा में खड़ी थी जैसे कि बस कालदूत से आदेश मिलने की ही प्रतीक्षा कर रही हो।

कालदूत राहुल की तरफ ध्यान से देखकर बोला

कालदूत-तुमको तुम्हारी माँ वापिस चाहिए, जिनका देहांत बचपन में हो गया था, क्यों है ना?"

राहुल (अचंभित होकर)-त..तुम्हें कैसे पता?

कालदूत- मैं तुमको अवसर देता हूँ, मेरी मदद करो और मैं तुम्हारी माँ को जिंदा
वापिस ले आऊंगा

राहुल (आंखों में आंसू भरकर)-क्या तुम..आप ऐसा कर सकते हैं?

कालदूत- बिल्कुल, मैं तुमको वो सब दे सकता हूँ जो तुम्हारा ईश्वर कभी नहीं देगा

चेतन (फुसफुसाकर)-उसकी मत सुनो राहुल, ये कालदूत भी मरे हुए इंसान को वापिस नहीं ला सकता

अब राहुल पर किसी की भी बातों का कोई असर नहीं हो रहा था, कालदूत के शब्दों ने जैसे उसपर कोई जादुई असर कर दिया था वह अपने घुटनों पर बैठकर बोला " अमर रहे कालदूत!"

कालदूत धीरे धीरे धरती पर आया और चेतन के सर पर हाथ रखा ये देखकर अवनीश सबसे पहले विचलित हुआ, उसने दौड़कर राहुल के पास पड़ी गेटवे गन उठाना चाही लेकिन कालदूत ने उसे क्रोध भरी नजरों से देखा और उसके नेत्रों से निकली ऊर्जा तरंगों ने अवनीश के शरीर को धूल बनाकर वहीं रेतीले मरुस्थल पर
बिखेर दिया ये देखकर चेतन और शिवानी की हृदय विदारक चीख निकली " नहीं!", उनकी चीख के कारण कालदूत का ध्यान उनकी तरफ भी चला गया वे दोनों ही इस अप्रत्याशित घटना से इस कदर घबरा गए थे कि वे उल्टे पांव भागने लगे, कालदूत ने अभी तक मूर्ति की तरह खड़े एक आंख वाले राक्षसों में से एक को
आदेश दिया

कालदूत-उन दोनों को ढूंढकर खत्म कर दो वे बचने नहीं चाहिए।"

आदेश मिलते ही वह राक्षस मुड़ा और तूफानी गति से चेतन और शिवानी की तरफ भागा चेतन और शिवानी की गति बहुत तेज़ थी और वे कालदूत से काफी दूर निकल भी आये थे, काफी दूर पहुंचकर वे हांफने लगे।

चेतन- रुको शिवानी, थोड़ा दम लेने दो

शिवानी- दम लेने का समय नहीं है हमारे पास, उस हैवान ने अवनीश भैया का कत्ल कर दिया है और देर सवेर हम भी उसके चंगुल में आ ही जायेंगे

चेतन- हमें इस तरह निराश नहीं होना चाहिए कृति, ज़रूर कोई
न कोई हल ….

इससे पहले कि चेतन अपनी बात पूरी कर पाता, एक खौफनाक हाथ पीछे से उसकी छाती को फाड़ते हुए आगे की तरफ निकल आया ये खौफनाक दृश्य देखकर शिवानी बुरी तरह चीखी " नहीं!"

एक आंख वाला वह राक्षस अब चेतन की लाश को वहीं रेतीले धरातल पर फेंककर शिवानी के पीछे भागा, शिवानी अपनी पूरी जान लगाकर भाग रही थी लेकिन राक्षस की गति उससे कहीं अधिक तेज़ थी, जल्द
ही उसका भयानक पंजा शिवानी को भी अपना शिकार बनाने वाला था।

शिवानी को अब अपने जिंदा रहने की उम्मीद भी खत्म सी होती लग रही थी, वह बुरी तरह हांफ रही थी, अब उसके कदम भी थकने लगे थे राक्षस अब भयानकहुंकार भरता शिवानी के एकदम पीछे आ चुका था लेकिन तभी एक मजबूत हाथ ने शिवानी को अपनी तरफ खींचा और एक लात मारकर उस राक्षस को पीछे धकेल दिया.............

भाग ३५​

शिवानी को अब अपने जिंदा रहने की उम्मीद भी खत्म सी होती लग रही थी, वह बुरी तरह हांफ रही थी, अब उसके कदम भी थकने लगे थे राक्षस अब भयानकहुंकार भरता शिवानी के एकदम पीछे आ चुका था लेकिन तभी एक मजबूत हाथ ने शिवानी को अपनी तरफ खींचा और एक लात मारकर उस राक्षस को पीछे धकेल दिया…

शिवानी ने अपने मददगार की और देखा, राघव उसकी मदद के लिए वहा पहुच चूका था और उसके साथ थे रूद्र रमण और संजय, उस राक्षस के चेहरे पर क्रोध के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे वो एक बार फिर से शिवानी की तरफ बढ़ने लगा मगर इसबार उसके और शिवानी के बीच मे राघव नाम की दिवार थी

वो राक्षस शिवानी को मारने के लिए उसकी तरफ बढ़ा और राघव उससे भीड़ गया, राक्षस ने तेजी से राघव पर प्रहार किया, उसके पंजे का वार इतना तेज था के आम इंसान की अंतड़िया मगर राघव का सिर्फ शर्ट थोडा सा फटा और हलकी खरोचे आयी जिसके बाद उस राक्षस का प्रचंड घुसा राघव के मुह पर पड़ा

राघव-उफ्फ! ये राक्षस शक्तिशाली है इसे जल्दी से ख़तम करना पड़ेगा

उसके बाद राघव ने अपनी तेजी का प्रदर्शन करते हुए उस राक्षस पर प्रहार करना शुरू किया जसके बाद उसे संभलने का मौका ही नहीं मिला और कुछ ही क्षणों मे वो राक्षस शांत पड गया

राघव उसके शारीर को छोड़कर खड़ा हो गया और वापिस शिवानी की तरफ मुडा, शिवानी दौड़कर राघव के पास आई और उससे लिपटकर रोने लगी

शिवानी-उसने मार दिया, उसने मेरे भाइयो को मार दिया

राघव-तुम ये क्या कह रही हो शिवानी?

शिवानी-हा, राहुल ने ऐन मौके पे हमें धोका दे दिया और पूरा मिशन फेल हो गया

रूद्र-वो...

वो गेटवे गन कहा है?

शिवानी-वो अब भी वही पड़ी है लेकिन वहा जाना खातेरे से खली नहीं है, वो तुमलोगों को भी मार डालेगा वो सबको मार डालेगा

शिवानी की हालत देखकर र५अमन ने उसे अपने बैग से पानी निकालकर दिया, पानी पीकर शिवानी थोड़ी शांत हुयी तब रूद्र ने उस राक्षस की और गौर से देखा और शिवानी से पूछा

रूद्र-इस एक आँखवाले राक्षस को कालदूत ने तुम्हारे पीछे भेजा था

शिवानी-हा पर ये अकेला नहीं था, कालदूत के पास ऐसे राक्षसों की पूरी फ़ौज है

उसके बाद शिवानी ने उनके साथ हुयी सारी घटनाये उन लोगो को सुनाई

संजय-अब क्या करे?

राघव-अब स्तिथि हद से ज्यादा बिगड़ गयी है और कोई उपाय नजर नहीं आ रहा

रूद्र-देखो राघव मैं ऐसा कहना नहीं चाहता लेकिन मुझे लगता है की गेटवे गन इस्तमाल करना ही हमारे पास अंतिम विकल्प है

राघव-शायद तुम सही कह रहे हो

संजय-ये तुमलोग क्या कह रहे हो तुम्ही दोनों ने गेटवे गन का सबसे ज्यादा विरोध किया था और अब तुम ही ऐसी बात कर रहे हो

राघव-विरोध तब किया था संजय भाई जब हमें दुनिया को बचने की कोई उम्मीद नजर आ रही थी लेकिन आप खुद सोचिये की क्या हमारे पास कालदूत को रोकने का कोई विकल्प है, मानता ही हमारे पास शक्तिया है हिम्मत है लेकिन हम कालदूत जितने शक्तिशाली नहीं है और अब वो उसके पास अजीबोगरीब भयानक प्राणियों की पूरी फ़ौज है, चेतन और अविनाश मारे गए है, हम सब लोग अगर साथ होतेतो शायद उन्हें बचाया जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं हुआ, नरेशजी अरुण भाई चेतन अविनाश की कुर्नाबी व्यर्थ न जाने देने का यही एक तरीका है और आपलोगों के पास बेहतर विकल्प है तो मैं सुनने को तयार हु

जब कुछ समय तक कोई कुछ नहीं बोला तो राघव समझ गया की उसे सबकी मूक सहमती मिल गयी है

राघव-रूद्र क्या तुम इस राक्षसों से निपटकर इन्हें ख़तम कर सकते हो

रूद्र-थोडा मुश्किल है क्युकी ये कालसेना जैसे आम इंसान नहीं है मगर हा मैं इन्हें मार सकता हु

राघव-गुड, मेरे दिमाग मे कुछ है लेकिन हमें जल्द ही उसपर काम करना होगा अब सुना मेरा प्लान....

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कालदूत और राहुल अब एकसाथ खड़े थे

राहुल-क्या हमें उस लड़की को नहीं पकड़ना चाहिए महान कालदूत?

कालदूत-नहीं, वो फिलहाल के लिए कोई खतरा पैदा नहीं करेगी अब जरा अपना ये हथीयार तो दिखाओ जिसके बलपर ये मुझे पराजित करने का सोच रहे थे, क्या मनुष्य के विज्ञान मे वाकई इतनी क्षमता है के मेरा सामना कर सके?

राहुल-अवश्य महान कालदूत मैं अभी इस यंत्र को चलाकर दिखाता हु

इससे पहले की राहुल कालदूत को उस यंत्र की कार्यप्रणाली समझाता वहा अचानक से राघव आ गया

राघव(तेज आवाज मे)- अमर रहे कालदूत!

कालदूत और राहुल दोनों का ध्यान राघव की तरफ चला गया, कालदूत राघव को अपने संमे देख हैरान हुआ क्युकी कालसैनिको से मनसिक रूप से जुड़े होने के कारण कालदूत राघव को भली भांति जानता था की राघव उसकी राह का सबसे बड़ा काँटा है और कुछ समय पहले वो अपने दिमाग मे राघव की उपस्तिति महसूस कर चूका था इसीलिए राघव के मुह से अपनी जय जयकार सुनकर उसे यकीन नहीं हो रहा था

कालदूत-वो अलौकिक मनुष्य वो मेरे भक्तो के नरसंहार के लिए जवाबदेह है आज मेरे समक्ष खड़ा है पर तुम्हारा साथी वो कृत्रिम मानव कहा है

राघव-उसे मैंने मार दिया है और ये सब मैंने बस आपकी नजरो मे आने के लिए किया है ताकि आपको बता सकू की मैं आपके लिए सुशेन से बेहतर सिष्य साबित हो सकता हु, मैं नास्तिक हु और उसी को अपना इश्वर मानूंगा जिसे देखूंगा और इस समय आप मेरे सामने है तो आपही मेरे आराध्य देव है

कालदूत के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कुहारत आ गयी

कालदूत-नाटक अच्छा खेल लेते हो बच्चे पर कालदूत मुर्ख नहीं है उसे मुर्ख समझने की तुम्हारी गलती आखरी गलती साबित हो सकती है, इस तरह मेरे सामने आने के पीछे अवश्य ही तुम्हारी कोई मंशा है और मुझे वही जाननी है

राघव से बहस करने के कारण कालदूत का ध्यान भटक गया था जिसके चलते रूद्र ने बडी सफाई से बगैर आवाज किये कई राक्षसों को मार गिराया था क्युकी वो सब एक कतार मे खड़े बस कालदूत को देख रहे थे और उसके आदेश के बगैर कुछ नहीं कर सकते थे वही दूसरी तरफ संजय धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था और अब वो राहुल के एकदम करीब पहुच गया था और इससे पहले की राहुल कुछ समझ पता संजय ने उसके हाथ से गेटवे गन छीन की और रमण की और फेकी और रमण ने उछालकर बीच हवा मे ही उस गन को पकड़ लिया

शिवानी-इसे जल्दी से चालू कर दीजिये रमण जी क्युकी ये लोड होने मे २ मिनट का समय लेगी फिर कालदूत पर प्रहार किया जा सकता है

रमण(गन को चालू करते हुए)- यानि हमें कालदूत और इसके गुलामो को २ मिनट रोकना होगा

राहुल ने अपने निकट खड़े संजय के पेट मे जोरदार घुसा मारा जिससे संजय के मुह से खून निकलने लगा और फिर राहुल ने संजय का सर अपने घुटनों पर दे मारा, संजय को सँभालने का मौका नहीं मिल रहा था तभी संजय को मार खता देख शिवानी बीच मे आ गयी और और उसे

आता देख राहुल अधमरे संजय को छोड़ कर शिवानी की तरफ लपका, राहुल हथियारों का एक्सपर्ट था लडाई का नहीं इसिलए वो शिवानी के सामने कुछ पल भी नहीं टिक पाया और शिवानी ने उसे अधमरा करके छोड़ा

कालदूत इस प्रकरण से अनजान नहीं था और अब वो पूरी तरफ क्रोधित हो चूका था, और अब उन राक्षसों को भी रूद्र के होने का आभास हो गया था और वो रूद्र की तरफ लपके पर रूद्र पूरी हिम्मत के साथ उनका मुकाबला करने मे लगा हुआ था

कालदूत-ओह! तो यह थी तुम्हारी योजना अपने इस हथीयार को वापिस पाना और मेरे सेवको को संख्या कम करना

राघव-तुम्हे क्या लगा मैं वाकई तुम्हारा भक्त बन गया? अच्छाई के उपर बुराई कभी हावी नहीं हो सकती

कालदूत(मुस्कुराकर)- क्या तुम्हे वाकई लगता है के अच्छाई के ऊपर बुराई हावी नहीं हो सकती लेकिन तुम अपनी गिनती अच्छे लोगो मे कैसे कर रहे हो जो न नाजे कितने लोगो की मौत का जिम्मेदार है जिसमे के अजन्मी नन्ही जी जान भी है

कालदूत की बात सुन कर राघव के पैरो तले जमीन खिसक गयी

राघव-तू...तुम्हे कैसे पता

कालदूत-मैं लोगो के अंतर्मन मे झक सकता हु, अंतर्मन की दमित इच्छाए और काले रहस्य को जान सकता हु

कालदूत के इतना कहते ही राघव के दिमाग मे सुशेन की कहिगायी आखरी बाते गूंजने लगी जिसमे उसने राघव और रूद्र को भी अपने जैसा राक्षस बताया था, राघव कमान उसे कचोट रहा था और वो वही जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया कालदूत उसके दिमाग पर पूरी तरह हावी था

कालदूत-तुम्हारे लिए कालदूत की सृष्टि मे एक ही सजा है मौत की सजा

कालदूतने कुछ राक्षसों को इशारा किया और वेरघव की तरफ बढ़ने लगे पर राघव को इस बात का एहसास ही नहीं था की उसकी तरफ मौत बढ़ रही है तभी रूद्र उन राक्षसों से लड़ते हुए चिल्लाया

रूद्र-राघव कालदूत को अपने उपर हावी मत होने को तुमने कुछ नहीं किया है वो मेरी गलती थी पर मैं यहाँ लड़ रहा हुउठो और मुकाबला करो

शिवानी-उठो राघव अपने आप को बचाओ

रूद्र और शिवानी की आवाजो ने जैसे राघव के अंतर्मन को जगा दिया और राघव कालदूत की शक्ति से प्रभाव से निकल आया पर तब तक वो राक्षस उसके बेहद करीब पहुच चुके थे पर अब राघव को उससे ज्यादा फरक नहीं पड़ने वाला था उसने अपनी रफ़्तार से कालदूत की और दौड़ लगायी और पुई तेजी के साथ कालदूत पर वार किया वही शिवानी ने वह पड़ी ब्लास्टर गन उठा ली और वो और रूद्र उन गनो से उन राक्षसों को सफाया करने लगे वही रमण संजय को बचा कर साइड मे ले आया था और गेटवे गन की लोड हने की प्रतीक्षा कर रहा था

कालदूत-काफी समय बाद किसी शातिशाली पुरुष से मुकाबला हुआ है

कालदूत ने अपने हाथ हवा मे उठाये और वो धीरे धीरे हवा मे उपर उठने लगा और उसके अपने हाथो को इस कदर लहराया की वह एक रेट का तूफान उठने लगा और वो राघव की तरफ बढ़ने लगा मानो राघव को अपने अंदर समां लेगा पर राघव तेजी से दौड़

कर एक राक्षस के कंधे पर चढ़ कर कालदूत की और कुढ़ और कालदूत के शारीर पर एक जोरदार लात का प्रहार किया जिससे कालदूत जमीन पर आ गिरा

कालदूत-बस बहुत हुआ तुमलोग समझते हो की तुम मेरी सेना को हरा दोगे और मुझे हरा दोगे ऐसा नहीं होगा अभी तो मेरे और भी गुलाम आयेंगे पर उससे पहले मैं ही तुम सब का सफाया कर दूंगा

उसके बाद कालदूत ने अपनी सारी शक्ति के साथ राघव पर प्रहार किया, उसके हाथ से पीले रंग उर्जा किरने निकलकर राघव की तरफ बढ़ने लगी, राघव ने अपने गले मे पहनी रुद्राक्ष माला को अपने हाथ मे लिए और कुछ मंत्र पाहते हुए उसने भी अपने हाथ कालदूत की तरफ कर दिए और राघव के हाथ ने नीली उर्जा निकलली और राघव और कालदूत की शक्तिया आपस मे टकराई जिससे वह एक छोटा सा धमाका हो गया जिसके बाद कालदूत ने एपने एक गुलाम राक्षस को राघव की और भेजा और जब्रक राघव उस राक्षस को ख़तम करता कालदूत ने राघव पर एक और वार किया जब राघव असावधान था पर एक बाद रूद्र ने उस वार को राघव के शारीर तक पहुचने से पहले ही अपने उपर ले लिए और वही गिर गया

राघव ने जब ये देखा तो वो क्रोध से भर गया

राघव-मुझे पता था तेरे लिए तेरे भक्तो की जान कोई मायने नहीं रखती लेकिन तेरे लिए तो मानवता भी कोई मायने नहीं रखती तू इस सृष्टि पर कब्ज़ा करना चाहता है न पर ऐसा होगा नहीं, हम मनवो की वजह से तू हारेगा

तभी रमण ने पुरी तरह लोड हो चुकी गेटवे गन राघव की तरफ उछाली और राघव ने उसे उठाकर उसका मुह कालदूत की तरफ कर दिया “भक्क” की आवाज के साथ उस गन से इतनी भरी मात्र मे उर्जा निकली के उसके धक्के से गन को मजबूती से पकड़ा राघव भी कई फूट पीछे सरक गया

उस गन से निकली उर्जा ने कालदूत के आसपास मैटर को डिसटॉर्ट करना और अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण वातावरण को सघन करना शुरू कर दिया धीरे धीरे हवा मे एक हल्का सा स्याह छिद्र बना जो धीरे धीरे बड़ा होने लगा, वो ब्लैक होल अपने आसपास की चीजों को अंदर खीचने लगा, कालदूत भी उस आकर्षण शक्ति से खुद को बचा नहीं पा रहा था तो वो क्रोधित होकर बोला

कालदूत-तुम मानव ऐसे नहीं मानोगे मुझे अपने असली रूप मे आना ही होगा

उसके बाद काल्दूर ने अपना मानव रूप त्यागा और अपने उस असल १०० वाले भयानक रूप मे आ गया लेकिन उसका ये शक्तिशाली रूप भी उसे ब्लैक होल से नहीं बचा पा रहा था धीरे धीरे उसके पो जमीन से उखाड़ने लगे राघव रूद्र के घायल शारीर को लेकर उस ब्लैक होल के चुम्बकीय क्षेत्र से बाहर आ गया था उर बाकि अब भी उस ब्लैक होल से दूर थे और कालदूत की राक्षसी सेना भी अब ब्लैक होल मे सामने लगी थी कालदूत बुरी तरह हताश होकर चीखा

कालदूत-नही! ऐसा नहीं हो सकता, मेरा अभियान विफल नहीं हो सकता

राघव-सच्चाई को स्वीकार कर लो कालदूत तुमिश्वर से भिड़ने चले थे पर उसी इश्वर के बनाये चंद तुच्छ जीवो ने तुम्हे पराजित कर

दिया जिन्हें ‘मनुष्य’ कहा जाता है

“नहीं मैं पराजित नहीं हो सकता, मुझे मनुष्य पराजित नहीं कर सकते” ये कालदूत के आखरी शब्द थे इसके बाद वो और उसकी सेना उस ब्लैक होल मैं समां गयी पर अब भी उस ब्लैक होल का प्रभाव खातान नहीं हुआ था बल्कि अब तो उसका चुम्बकीय प्रभाव बढ़ गया था और अब राघव और बाकि सब भी उसे महसूस करने लगे थे....

भाग ३६​

“नहीं मैं पराजित नहीं हो सकता, मुझे मनुष्य पराजित नहीं कर सकते” ये कालदूत के आखरी शब्द थे इसके बाद वो और उसकी सेना उस ब्लैक होल मैं समां गयी पर अब भी उस ब्लैक होल का प्रभाव खातान नहीं हुआ था बल्कि अब तो उसका चुम्बकीय प्रभाव बढ़ गया था और अब राघव और बाकि सब भी उसे महसूस करने लगे थे....

रमण- उफ्फ! ये क्या मुसीबत मोल ले ली कालदूतको हराने के चक्कर में!

राघव- शिवानी! इस ब्लैक होल को नष्ट करने का क्या रास्ता हो सकता है!

शिवानी- इसका तरीका मुझे नहीं पता राघव।

संजय- जब कालदूत जैसा शक्तिशाली जीव अपनी पूरी शक्ति के इस्तेमाल के बावजूद खुद को इस ब्लैक होल में समाने से नहीं रोक पाया तो भला हम कितनी देर तक बचे रहेंगे?

तभी शिवानीसे मार खाकर धरती पर पड़ा हुआ राहुल उठा और रमण की तरफ आकर बोला

राहुल- मुझे ये गन दे दो! मैं इसकी पोलेरिटी रिवर्स करके फिर से इस कृत्रिम ब्लैक होल पर दागूंगा जिससे सघन गुरत्वाकर्षण क्षेत्र खत्म हो जाएगा और सब सामान्य हो जाएगा

रमण- लेकिन हम तुम्हारी बात क्यों मानें?

राहुल- शिवानीकी मार ने मेरे दिमाग के उस हिस्से को भी मुक्त कर दिया जो कालदूतके प्रभाव में आ गया था और मैं भला आप लोगों को धोखा देकर करूँगा भी क्या? ब्लैक होल यदि ऐसे ही खुला रहा तो कुछ ही समय में पूरी पृथ्वी को निगल जाएगा, इससे अच्छा मुझ पर विश्वास करके आप मुझे एक मौका दें

सबने एक दूसरे की तरफ देखा, राघव बोला

राघव-सोचने विचारने का समय नहीं है हमारे पास, अगर राहुल कह रहा है कि वह हमें बचा सकता है तो एक कोशिश करने में क्या हर्ज है।मर तो वैसे ही रहे हैं, कोशिश करके मर लेंगे

रमण ने गेटवे गन राहुल को पकड़ा दी राहुल उसके यंत्रों से कुछ छेड़खानी करने लगा

राघव- उफ्फ! थोड़ा जल्दी करो राहुल, ब्लैक होल का प्रभावबढ़ता ही जा रहा है!

अचानक से राहुल उठा और बोला

राहुल-मैंने इस यंत्र की पोलेरिटी रिवर्स कर दी है लेकिन ….

रमण-लेकिन क्या?

राहुल- इस यंत्र को चलाने के वाली बायो एनर्जी का स्टोर कृत्रिम ब्लैक होल के निर्माण में खत्म हो चुका है अब अगर इस गन को चलाना है तो इस गन से अटैच्ड पारदर्शी नली (Transparent tube) को चालक (operator) को अपने शरीर से कनेक्ट करना पड़ेगा ऐसे केस में गेटवे चालक की प्राण ऊर्जा (life force) को सोखकर उसे कई गुना अधिक magnify करके ऐसी ऊर्जा किरण छोड़ेगी जो सघन गुरुत्वाकर्षण और मैटेरियल डिस्टॉर्शन के प्रभाव को समाप्त करके ब्लैक होल को नष्ट कर देगी लेकिन जो भी इस यंत्र को चलाने के लिए अपनी प्राण ऊर्जा देगा उसका जीवित बचना मुश्किल है

रमण- यानी कि हमारी प्राण ऊर्जा इस यंत्र के लिए ईंधन का काम करेगी?

राहुल- बिल्कुल ठीक समझे आप और मैंने सोच लिया है कि यह काम कौन करेगा

रमण - कौन?

राहुल (नज़रें झुकाकर)-मैं, मैं दूंगा अपनी कुर्बानी।

शिवानी- लेकिन राहुल …..
राहुल (बात बीच में काटकर)-ना नुकुर का तो प्रश्न ही नहीं उठता शिवानी, मैं कमज़ोर था इसलिए कालदूतने मुझे अपने वश में कर लिया मेरी वजह से चेतन और अवनीश की जान चली गयी, अगर मैं अपनी जान दे भी दूंगा तो यह उस सच्चे योद्धाओं को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि होगी

रूद्र- अगर ऐसी बात है तो मेरा गुनाह तुमसे ज़्यादा बड़ा है राहुल, एक नवजात
के इस दुनिया में आने से पहले ही उसकी सांसें छीन लीं मैंने तुमने तो जो किया वह
कालदूतके वश में किया लेकिन मैंने तो अपने होशोहवास में यह सब किया

रमण- लेकिन तुम नहीं जानते थे कि वह महिला गर्भवती थी रूद्र वरना तुम
ऐसा कभी नहीं करते और वैसे भी तुमिस वक़्त इस हाल मे नहीं हो की ये काम कर पाओ

रूद्र - लेकिन इससे यह सच्चाई नहीं बदल जाती रमण की मेरे हाथों यह जघन्य
पाप हुआ है गेटवे मुझे दे दो राहुल, मैं अपनी प्राण ऊर्जा देकर नष्ट करूँगा इस ब्लैक होल को

राघव- यहाँ इस वक़्त हम सबमे शक्तिशाली मैं हु और वैसे भी कालदूत से दुनीया को बचने का जिम्मा दादाजी ने मुझे सौपा था इसीलिए कोई बीच मे नहीं आएगा और ये काम मैं करूँगा

राहुल- नहीं राघव, तुम्हारे जैसे लोगों की दुनिया को ज़रूरत है मैं तुम्हें अपनी प्राण ऊर्जा व्यर्थ नहीं करने दूंगा

तभी राघव का जोरदार घूसा राहुल के मुंह पर पड़ा, जिसके बाद राघव ने गेटवे उससे छीन लिया

राघव- इस घूसे के लिए माफी चाहूंगा राहुल लेकिन फिलहाल दुनिया को बचाना ज़्यादा ज़रूरी है

राघव ने पारदर्शी नली को अपनी कलाई से कनेक्ट कर लिया और ब्लैक होल की तरफ बढ़ चला
शिवानी पीछे से चिल्लाई " रुक जाओ राघव! प्लीज रुक जाओ!" उसने राघव के पीछे भागने की भी कोशिश की लेकिन रमण और राहुल ने उसे रोक दिया

रमण- और आगे जाना हमारे लिए खतरे से खाली नहीं है शिवानी, वो मेरा भाई है मैं जानता हु उसे वो नहीं रुकेगा लेकिन मैं तुम्हें नहीं जाने दे सकता

तभी राघव ने एक बार पीछे

मुड़कार देखा रमण जो उसका बड़ा भाई था और संजय को वो अपना बड़ा भाई मानने लगा था और शिवानी जिसकी वह ज़रूरत से ज़्यादा ही परवाह करने लगा था, सभी की आंखों में
आंसू थे, वे सभी राघव को रोकना चाहते थे लेकिन जानते थे कि राघव रुकने
वालों में से नहीं, कुछ करके दिखाने वालों में से है

राघव धीमे से बोला " शायद यही है इस लडाई अंत।" और गेटवे से एक प्रचंड किरण निकलकर ब्लैक होल की ओर बढ़ी, जैसे ही वह किरण ब्लैक होल से टकराई, एक भीषण चमक के साथ सब कुछ सामान्य हो गया अब ना तो धरती को कालदूतसे खतरा था और ना ही ब्लैक होल से

जब चमक कुछ धुंधली पड़ी तो सबसे पहले शिवानी राघव को ढूंढने भागी, रेत के बीच में राघव का शांत शरीर पड़ा हुआ था गेटवे यंत्र भी पूरी तरह से नष्ट हो चुका था, उसके आंतरिक पुर्जे इतना तीव्र ऊर्जा प्रवाह झेल सकने योग्य नहीं थे शिवानी, रमण और संजय के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे

शिवानी रोते हुए बोली " तुम भी मुझे छोड़कर चले गए राघव! क्यों आखिर क्यों?"

तभी राहुल ने महसूस किया कि राघव की उंगलियों में हल्की सी हरकत हुई, फिर धीरे धीरे उसका हाथ हिला वह राघव के समीप गया और गेटवे यंत्र की पारदर्शी नली को उसकी कलाई से अलग कर दिया अचानक से सराघव बुरी तरह खांसने लगा, सभी दौड़ते हुए उसके पास पहुंचे वह ज़िंदा था लेकिन बुरी तरह से अशक्त हो चुका था

शिवानीने उसे उठाकर बैठाया और उससे गले लगकर रोने लगी, रमण और संजय बस उसे दूर से देखकर मुस्कुरा दिए

दो दिन बाद-

रमण और संजय अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर खड़े थे

रमण- भाई यह चारो कहाँ रह गए? कह रहे थे कि हमसे पहले पहुँच जाएंगे, देखो अभी तक नहीं आये

संजय- लगता है गुजरात से मन नहीं भरा इनका।

तभी राघव, शिवानी और राहुल भी अपने अपने सामान के साथ उनकी तरफ आते दिखे उनके साथ रूद्र भी था जो फिलहाल व्हील चेयर पर था और ठीक होने क बाद हिडन वारियर्स ज्वाइन करने वाला था

रमण- अब जल्दी चलो भाई, मुंबई तक फ्लाइट लेकर फिर वहाँ से गाड़ी में जाना पड़ेगा राजनगर के लिए।

शिवानीके चेहरे पर दुख के भाव देखकर राघव रमण और संजय से बोला

राघव-आप लोग चलिए, मैं अभी आता हूँ

रमण (मुस्कुराकर)- जल्दी आ जाना साहब, फ्लाइट उड़ान भरने से पहले इंतज़ार नहीं करेगी आपका

रमण ने जाते जाते राघव और शिवानी को देखा और फिर हल्के से मुस्कुराकर राघव को आंख मारी जिससे राघव ने उसे हाथ हिलाकर जल्दी जल्दी जाने का इशारा किया अब केवल राघव, शिवानी राहुल और रूद्र वहा थे, राघव ने प्यार से शिवानी के गाल पर हाथ रखकर पूछा "क्या बात है?"

शिवानी(दुखी आवाज़ में)- मुझे नहीं लगता कि अब मैं ये काम जारी रख पाऊंगी।

मुझे हिडन वारियर्स का हिस्सा नहीं बने रहना वरना मैं चेतन और अवनीश भैया की मौत को कभी भुला नहीं पाऊंगी

राघव- तुमको मजबूत बने रहना होगो शिवानी

रूद्र- तुम्हारे दो भाई नहीं रहे तो क्या हुआ, ये भाई तो ज़िंदा है ना मेरी खातिर हिडन वारियर्स मत छोड़ो शिवानी क्यों राहुल

राहुल-हा शिवानी रूद्र सही कह रहा है

राघव – रूद्र सही कह रहा है, फिलहाल कालदूत नाम के खतरे को हमने भले ही टाल दिया हो लेकिन क्या पता कि भविष्य में कैसा खतरा सर उठा ले उससे निपटने के लिए हमें तैयार रहना होगा

शिवानी- इस जंग ने मेरा सब कुछ ले लिया राघव, पिता, चाचा, दो भाई, पूरा परिवार बलि चढ़ गया

राघव (भरे गले से)- सही कहा तुमने, अच्छी बात यह है कि कालसेना समाप्त हो गयी और दुनिया को नरक बनाने की उनकी योजना धराशायी हो गयी

शिवानी- तो अब आगे क्या करने का सोचा है

राघव- फिलहाल तो घर जाऊंगा और मस्त भाभी के हाथ का खाना खा के कुछ दिन आराम करूँगा, उसके बाद ज़िन्दगी जहाँ ले जाये वहीं चले जायेंगे

राहुल- तुम हिडन वारियर्स को जॉइन क्यों नहीं कर लेते राघव? हमारी आर्गेनाइजेशन को तुम जैसे लोगों की ज़रूरत हमेशा ही रहती है

राघव- मैं इस बारे में ज़रूर सोचूंगा राहुल, पूछने के लिए धन्यवाद (फिर वह शिवानीकी ओर देखकर बोला) अब जाने का समय हो गया है

शिवानीकी आंखों से आंसू की धार बह निकली थी, राघव ने उसके कंधे पर सांत्वना देने के लिए हाथ रखा तो शिवानी उसके सीने से जा लगी।

शिवानी- अगर मुझे कभी किसी काम मे मदद की ज़रूरत पड़ी तो क्या तुम मेरा साथ दोगे?

राघव(मुस्कुराकर)- हमेशा, बस एक कॉल कर देना।

शिवानी- मुझे कुछ समय तक कुछ नहीं करना, बस अकेले रहना है

राघव- मैं समझ सकता हूँ, जिन मुश्किल हालातों से तुम गुज़रीहो, उसके बाद एक ब्रेक तो बनता ही है

शिवानी - अब मैं चलती हूँ

राघव - तुम्हारे पास मेरा नंबर तो है ना?

शिवानी(मुस्कुराकर पीछे पलटते हुए)- हां है, व्हाट्सएप पर मैसेज कर दूंगी

राहुल- अब हमें चलना चाहिए, हिडन वारियर्स का जेट हमारी प्रतीक्षा कर रहा होगा

राघव शिवानीको तब तक जाते देखता रहा जब तक वो उसकी नज़रों से ओझल नहीं हो गयी, फिर वह अपनी फ्लाइट की तरफ जाने लगा जिसमें बैठे रमण और संजय उसका इंतज़ार कर रहे थे.........

समाप्त....
(रुको जरा कहा चले जरा निचे के पोस्ट्स पढ़ के जाओ यार)​भाग ३६​

“नहीं मैं पराजित नहीं हो सकता, मुझे मनुष्य पराजित नहीं कर सकते” ये कालदूत के आखरी शब्द थे इसके बाद वो और उसकी सेना उस ब्लैक होल मैं समां गयी पर अब भी उस ब्लैक होल का प्रभाव खातान नहीं हुआ था बल्कि अब तो उसका चुम्बकीय प्रभाव बढ़ गया था और अब राघव और बाकि सब भी उसे महसूस करने लगे थे....

रमण- उफ्फ! ये क्या मुसीबत मोल ले ली कालदूतको हराने के चक्कर में!

राघव- शिवानी! इस ब्लैक होल को नष्ट करने का क्या रास्ता हो सकता है!

शिवानी- इसका तरीका मुझे नहीं पता राघव।

संजय- जब कालदूत जैसा शक्तिशाली जीव अपनी पूरी शक्ति के इस्तेमाल के बावजूद खुद को इस ब्लैक होल में समाने से नहीं रोक पाया तो भला हम कितनी देर तक बचे रहेंगे?

तभी शिवानीसे मार खाकर धरती पर पड़ा हुआ राहुल उठा और रमण की तरफ आकर बोला

राहुल- मुझे ये गन दे दो! मैं इसकी पोलेरिटी रिवर्स करके फिर से इस कृत्रिम ब्लैक होल पर दागूंगा जिससे सघन गुरत्वाकर्षण क्षेत्र खत्म हो जाएगा और सब सामान्य हो जाएगा

रमण- लेकिन हम तुम्हारी बात क्यों मानें?

राहुल- शिवानीकी मार ने मेरे दिमाग के उस हिस्से को भी मुक्त कर दिया जो कालदूतके प्रभाव में आ गया था और मैं भला आप लोगों को धोखा देकर करूँगा भी क्या? ब्लैक होल यदि ऐसे ही खुला रहा तो कुछ ही समय में पूरी पृथ्वी को निगल जाएगा, इससे अच्छा मुझ पर विश्वास करके आप मुझे एक मौका दें

सबने एक दूसरे की तरफ देखा, राघव बोला

राघव-सोचने विचारने का समय नहीं है हमारे पास, अगर राहुल कह रहा है कि वह हमें बचा सकता है तो एक कोशिश करने में क्या हर्ज है।मर तो वैसे ही रहे हैं, कोशिश करके मर लेंगे

रमण ने गेटवे गन राहुल को पकड़ा दी राहुल उसके यंत्रों से कुछ छेड़खानी करने लगा

राघव- उफ्फ! थोड़ा जल्दी करो राहुल, ब्लैक होल का प्रभावबढ़ता ही जा रहा है!

अचानक से राहुल उठा और बोला

राहुल-मैंने इस यंत्र की पोलेरिटी रिवर्स कर दी है लेकिन ….

रमण-लेकिन क्या?

राहुल- इस यंत्र को चलाने के वाली बायो एनर्जी का स्टोर कृत्रिम ब्लैक होल के निर्माण में खत्म हो चुका है अब अगर इस गन को चलाना है तो इस गन से अटैच्ड पारदर्शी नली (Transparent tube) को चालक (operator) को अपने शरीर से कनेक्ट करना पड़ेगा ऐसे केस में गेटवे चालक की प्राण ऊर्जा (life force) को सोखकर उसे कई गुना अधिक magnify करके ऐसी ऊर्जा किरण छोड़ेगी जो सघन गुरुत्वाकर्षण और मैटेरियल डिस्टॉर्शन के प्रभाव को समाप्त करके ब्लैक होल को नष्ट कर देगी लेकिन जो भी इस यंत्र को चलाने के लिए अपनी प्राण ऊर्जा देगा उसका जीवित बचना मुश्किल है

रमण- यानी कि हमारी प्राण ऊर्जा इस यंत्र के लिए ईंधन का काम करेगी?

राहुल- बिल्कुल ठीक समझे आप और मैंने सोच लिया है कि यह काम कौन करेगा

रमण - कौन?

राहुल (नज़रें झुकाकर)-मैं, मैं दूंगा अपनी कुर्बानी।

शिवानी- लेकिन राहुल …..

राहुल (बात बीच में काटकर)-ना नुकुर का तो प्रश्न ही नहीं उठता शिवानी, मैं कमज़ोर था इसलिए कालदूतने मुझे अपने वश में कर लिया मेरी वजह से चेतन और अवनीश की जान चली गयी, अगर मैं अपनी जान दे भी दूंगा तो यह उस सच्चे योद्धाओं को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि होगी

रूद्र- अगर ऐसी बात है तो मेरा गुनाह तुमसे ज़्यादा बड़ा है राहुल, एक नवजात
के इस दुनिया में आने से पहले ही उसकी सांसें छीन लीं मैंने तुमने तो जो किया वह
कालदूतके वश में किया लेकिन मैंने तो अपने होशोहवास में यह सब किया

रमण- लेकिन तुम नहीं जानते थे कि वह महिला गर्भवती थी रूद्र वरना तुम
ऐसा कभी नहीं करते और वैसे भी तुमिस वक़्त इस हाल मे नहीं हो की ये काम कर पाओ

रूद्र - लेकिन इससे यह सच्चाई नहीं बदल जाती रमण की मेरे हाथों यह जघन्य
पाप हुआ है गेटवे मुझे दे दो राहुल, मैं अपनी प्राण ऊर्जा देकर नष्ट करूँगा इस ब्लैक होल को

राघव- यहाँ इस वक़्त हम सबमे शक्तिशाली मैं हु और वैसे भी कालदूत से दुनीया को बचने का जिम्मा दादाजी ने मुझे सौपा था इसीलिए कोई बीच मे नहीं आएगा और ये काम मैं करूँगा

राहुल- नहीं राघव, तुम्हारे जैसे लोगों की दुनिया को ज़रूरत है मैं तुम्हें अपनी प्राण ऊर्जा व्यर्थ नहीं करने दूंगा

तभी राघव का जोरदार घूसा राहुल के मुंह पर पड़ा, जिसके बाद राघव ने गेटवे उससे छीन लिया

राघव- इस घूसे के लिए माफी चाहूंगा राहुल लेकिन फिलहाल दुनिया को बचाना ज़्यादा ज़रूरी है

राघव ने पारदर्शी नली को अपनी कलाई से कनेक्ट कर लिया और ब्लैक होल की तरफ बढ़ चला
शिवानी पीछे से चिल्लाई " रुक जाओ राघव! प्लीज रुक जाओ!" उसने राघव के पीछे भागने की भी कोशिश की लेकिन रमण और राहुल ने उसे रोक दिया

रमण- और आगे जाना हमारे लिए खतरे से खाली नहीं है शिवानी, वो मेरा भाई है मैं जानता हु उसे वो नहीं रुकेगा लेकिन मैं तुम्हें नहीं जाने दे सकता

तभी राघव ने एक बार पीछे मुड़कार देखा रमण जो उसका बड़ा भाई था और संजय को वो अपना बड़ा भाई मानने लगा था और शिवानी जिसकी वह ज़रूरत से ज़्यादा ही परवाह करने लगा था, सभी की आंखों में
आंसू थे, वे सभी राघव को रोकना चाहते थे लेकिन जानते थे कि राघव रुकने
वालों में से नहीं, कुछ करके दिखाने वालों में से है

राघव धीमे से बोला " शायद यही है इस लडाई अंत।

" और गेटवे से एक प्रचंड किरण निकलकर ब्लैक होल की ओर बढ़ी, जैसे ही वह किरण ब्लैक होल से टकराई, एक भीषण चमक के साथ सब कुछ सामान्य हो गया अब ना तो धरती को कालदूतसे खतरा था और ना ही ब्लैक होल से

जब चमक कुछ धुंधली पड़ी तो सबसे पहले शिवानी राघव को ढूंढने भागी, रेत के बीच में राघव का शांत शरीर पड़ा हुआ था गेटवे यंत्र भी पूरी तरह से नष्ट हो चुका था, उसके आंतरिक पुर्जे इतना तीव्र ऊर्जा प्रवाह झेल सकने योग्य नहीं थे शिवानी, रमण और संजय के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे

शिवानी रोते हुए बोली " तुम भी मुझे छोड़कर चले गए राघव! क्यों आखिर क्यों?"

तभी राहुल ने महसूस किया कि राघव की उंगलियों में हल्की सी हरकत हुई, फिर धीरे धीरे उसका हाथ हिला वह राघव के समीप गया और गेटवे यंत्र की पारदर्शी नली को उसकी कलाई से अलग कर दिया अचानक से सराघव बुरी तरह खांसने लगा, सभी दौड़ते हुए उसके पास पहुंचे वह ज़िंदा था लेकिन बुरी तरह से अशक्त हो चुका था

शिवानीने उसे उठाकर बैठाया और उससे गले लगकर रोने लगी, रमण और संजय बस उसे दूर से देखकर मुस्कुरा दिए

दो दिन बाद-

रमण और संजय अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर खड़े थे

रमण- भाई यह चारो कहाँ रह गए? कह रहे थे कि हमसे पहले पहुँच जाएंगे, देखो अभी तक नहीं आये

संजय- लगता है गुजरात से मन नहीं भरा इनका।

तभी राघव, शिवानी और राहुल भी अपने अपने सामान के साथ उनकी तरफ आते दिखे उनके साथ रूद्र भी था जो फिलहाल व्हील चेयर पर था और ठीक होने क बाद हिडन वारियर्स ज्वाइन करने वाला था

रमण- अब जल्दी चलो भाई, मुंबई तक फ्लाइट लेकर फिर वहाँ से गाड़ी में जाना पड़ेगा राजनगर के लिए।

शिवानीके चेहरे पर दुख के भाव देखकर राघव रमण और संजय से बोला

राघव-आप लोग चलिए, मैं अभी आता हूँ

रमण (मुस्कुराकर)- जल्दी आ जाना साहब, फ्लाइट उड़ान भरने से पहले इंतज़ार नहीं करेगी आपका

रमण ने जाते जाते राघव और शिवानी को देखा और फिर हल्के से मुस्कुराकर राघव को आंख मारी जिससे राघव ने उसे हाथ हिलाकर जल्दी जल्दी जाने का इशारा किया अब केवल राघव, शिवानी राहुल और रूद्र वहा थे, राघव ने प्यार से शिवानी के गाल पर हाथ रखकर पूछा "क्या बात है?"

शिवानी(दुखी आवाज़ में)- मुझे नहीं लगता कि अब मैं ये काम जारी रख पाऊंगी।

मुझे हिडन वारियर्स का हिस्सा नहीं बने रहना वरना मैं चेतन और अवनीश भैया की मौत को कभी भुला नहीं पाऊंगी

राघव- तुमको मजबूत बने रहना होगो शिवानी

रूद्र- तुम्हारे दो भाई नहीं रहे तो क्या हुआ, ये भाई तो ज़िंदा है ना मेरी खातिर हिडन वारियर्स मत छोड़ो शिवानी क्यों राहुल

राहुल-हा शिवानी रूद्र सही कह रहा है

राघव – रूद्र सही कह रहा है, फिलहाल कालदूत नाम के खतरे को हमने भले ही टाल दिया हो लेकिन क्या पता कि भविष्य में कैसा खतरा सर उठा ले उससे निपटने के लिए हमें तैयार रहना होगा

शिवानी- इस जंग ने मेरा सब कुछ ले लिया राघव, पिता, चाचा, दो भाई, पूरा परिवार बलि चढ़ गया

राघव (भरे गले से)- सही कहा तुमने, अच्छी बात यह है कि कालसेना समाप्त हो गयी और दुनिया को नरक बनाने की उनकी योजना धराशायी हो गयी

शिवानी- तो अब आगे क्या करने का सोचा है

राघव- फिलहाल तो घर जाऊंगा और मस्त भाभी के हाथ का खाना खा के कुछ दिन आराम करूँगा, उसके बाद ज़िन्दगी जहाँ ले जाये वहीं चले जायेंगे

राहुल- तुम हिडन वारियर्स को जॉइन क्यों नहीं कर लेते राघव? हमारी आर्गेनाइजेशन को तुम जैसे लोगों की ज़रूरत हमेशा ही रहती है

राघव- मैं इस बारे में ज़रूर सोचूंगा राहुल, पूछने के लिए धन्यवाद (फिर वह शिवानीकी ओर देखकर बोला) अब जाने का समय हो गया है

शिवानीकी आंखों से आंसू की धार बह निकली थी, राघव ने उसके कंधे पर सांत्वना देने के लिए हाथ रखा तो शिवानी उसके सीने से जा लगी।

शिवानी- अगर मुझे कभी किसी काम मे मदद की ज़रूरत पड़ी तो क्या तुम मेरा साथ दोगे?

राघव(मुस्कुराकर)- हमेशा, बस एक कॉल कर देना।

शिवानी- मुझे कुछ समय तक कुछ नहीं करना, बस अकेले रहना है

राघव- मैं समझ सकता हूँ, जिन मुश्किल हालातों से तुम गुज़रीहो, उसके बाद एक ब्रेक तो बनता ही है

शिवानी - अब मैं चलती हूँ

राघव - तुम्हारे पास मेरा नंबर तो है ना?

शिवानी(मुस्कुराकर पीछे पलटते हुए)- हां है, व्हाट्सएप पर मैसेज कर दूंगी

राहुल- अब हमें चलना चाहिए, हिडन वारियर्स का जेट हमारी प्रतीक्षा कर रहा होगा

राघव शिवानीको तब तक जाते देखता रहा जब तक वो उसकी नज़रों से ओझल नहीं हो गयी, फिर वह अपनी फ्लाइट की तरफ जाने लगा जिसमें बैठे रमण और संजय उसका इंतज़ार कर रहे थे.........

समाप्त....
(रुको जरा कहा चले जरा निचे के पोस्ट्स पढ़ के जाओ यार)​

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